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इस बार कश्मीरी केसर का बंपर उत्पादन, जीआई टैग मिलने से बढ़ेगी मांग

इस बार कश्मीरी केसर का बंपर उत्पादन, जीआई टैग मिलने से बढ़ेगी मांग

28 July, 2020

मिलावट पर लगेंगी रोक, किसानों को मिलेंगे बेहतर दाम

इस साल केसर का बंपर उत्पादन होने की उम्मीद जताई जा रही है। इससे केसर का उत्पादन करने वाले किसानों को फायदा होगा। केसर के उत्पादन को बढ़ाने के लिए एनएमएस के तहत, केंद्र सरकार ने 411 करोड़ रुपए के एक प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी जिसके तहत केसर के लिए 3,715 हेक्टेयर क्षेत्र का कायाकल्प किया जाना प्रस्तावित था। इसमें से अब तक 2,500 हेक्टेयर के क्षेत्र का कायाकल्प किया जा चुका है। इससे केसर का उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिलेगी। बता दें कि भारत में कश्मीर में केसर का उत्पादन होता है। इसके अलावा अब शेखावाटी में भी केसर की खेती की जाने लगी है। वहीं उत्तरप्रदेश में इसकी खेती के प्रयास जारी है।  

 

कश्मीरी केसर को मिला जीआई ( जियोग्रॉफिकल इंडीकेशन ) टैग

कश्मीर में उगाए गई केसर को जीआई (जियोग्रॉफिकल इंडीकेशन) टैग मिला गया है। इस मौके पर मीडिया में दिए अपने वक्तव्य में लेफ्टिनेंट गवर्नर जी सी मुर्मू ने कहा है कि कश्मीर घाटी के उत्पाद को वैश्विक नक्शे पर लाने के लिए यह प्रमुख ऐतिहासिक कदम है। एक आधिकारिक प्रवक्ता ने बताया कि केंद्र सरकार ने कश्मीर घाटी में पैदा किए गए केसर के लिए जीआई राजिस्ट्रेशन का सर्टिफिकेट जारी कर दिया है। नेशनल मिशन ऑन सैफरॉन (हृरूस्) की तरफ से की गई पहल के कारण कश्मीर में केसर के केंद्र पंपोर में इस सीजन में मसाले की बंपर फसल होने की उम्मीद है। 

 

 

मिलावट पर लगेगी रोक, किसानों को मिलेंगे बेहतर दाम

एक अधिकारी ने कहा, जीआई सर्टिफिकेशन के बाद केसर में मिलावट पर रोक लगेगी, इससे किसानों को केसर के बेहतर दाम मिलेंगे। उन्होंने कहा कि अब तक 2,500 हेक्टेयर के क्षेत्र का कायाकल्प किया गया है और चालू सीजन के दौरान बंपर केसर उत्पादन होने की उम्मीद है। इस उपलब्धि पर खुशी व्यक्त करते हुए, जम्मू और कश्मीर एलजी ने कहा कि कश्मीर घाटी में पैदा हुए केसर को दुनिया के नक्शे पर लाने के लिए यह पहला बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि जीआई टैग के साथ, कश्मीर केसर निर्यात बाजार में अधिक प्रमुखता हासिल करेगा और किसानों को इसके लिए सबसे अच्छी कीमत दिलाने में मदद करेगा। कृषि उत्पादन विभाग के प्रमुख सचिव नवीन के चौधरी ने कहा कि जीआई टैग से कश्मीरी केसर को नई पहचान मिलेगी।

 

किस काम आता है केसर

केसर खाने में कड़वा होता है, लेकिन खुशबू के कारण विभिन्न व्यंजनों एवं पकवानों में डाला जाता है। इसका उपयोग मक्खन आदि खाद्य द्रव्यों में वर्ण एवं स्वाद लाने के लिए किया जाता हैं। गर्म पानी में डालने पर यह गहरा पीला रंग देता है। यह रंग कैरेटिनॉयड वर्णक की वजह से होता है। अनेक खाद्य पदार्थो में केसर का उपयोग रंजन पदार्थ के रूप में किया जाता है। इसके अलावा केसर का उपयोग आयुर्वेदिक नुस्खों में, खाद्य व्यंजनों में और देव पूजा आदि में तो केसर का उपयोग होता ही था पर अब पान मसालों और गुटकों में भी इसका उपयोग होने लगा है। 

 

देश में सिर्फ 17 टन केसर की पैदावार, ईरान दुनिया में नंबर वन पर

कश्मीर देश का इकलौता केसर उत्पादक राज्य है। यहां हर साल करीब 17 टन केसर का उत्पादन होता है। दुनियाभर में करीब 300 टन केसर की पैदावार होती है। ईरान दुनियाभर में केसर उत्पादन में नंबर वन है। दुनिया में जितनी केसर पैदा होती है उसका करीब 90 फीसदी ईरान में ही पैदा होता है। अब केंद्र सरकार इसके उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दे रही है। इससे हमारे देश में इसका उत्पादन बढऩे की उम्मीद जागी है। 

 

बाजार में कितना होता है केसर का भाव

केसर विश्व का सबसे कीमती पौधा है। कश्मीर की केसर हल्की, पतली, लाल रंग वाली, कमल की तरह सुन्दर गंधयुक्त होती है। असली केसर बहुत महंगी होती है। कश्मीरी मोंगरा सर्वोतम मानी गई है। इसकी विश्व बाजार में अधिक मांग रहती है। आमतौर पर कश्मीरी केसर का भाव 1 लाख 60 हजार रुपए से 3 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के बीच रहता है।

 

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सौंफ की खेती : रबी सीजन में सौंफ की ये किस्में देगी भरपूर मुनाफा

सौंफ की खेती : रबी सीजन में सौंफ की ये किस्में देगी भरपूर मुनाफा

जानें, सौंफ की उन्नत खेती का तरीका और रखें इन बातों का ध्यान मसाला फसलों में सौंफ का अपना विशिष्ट स्थान है। ये अपनी खुशबू के कारण लोकप्रिय होने के साथ ही औषधी के रूप में भी पहचानी जाती है। इसका सब्जियों में प्रयोग होने के साथ ही आचार बनाने में भी किया जाता है। यदि इसके औषधीय महत्व की बात करें तो इसे कई रोगों में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में सौंफ को त्रिदोष नाशक बनाया गया है। यानि ये वात, पित्त, कफ इन त्रिदोषों को खतम करने में सक्षम है। इसका किसी भी रूप में सेवन शरीर को लाभ ही पहुंचाता है। पर याद रखें इसका आवश्यकता से अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। इसकी खेती भारत में मुख्यत: राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, गुजरात, हरियाणा व कर्नाटक राज्य में की जाती है। यदि व्यवसायिक स्तर पर इसकी खेती की जाए तो काफी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। आइए जानते हैं सौंफ की कौन-कौनसी किस्म की खेती करना अधिक लाभप्रद रहेगा और साथ ही किसान भाई इसकी खेती में क्या-क्या सावधानियां बरते कि उन्हें अधिक बेहतर उत्पादन होने के साथ ही अधिक मुनाफा मिल सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सौंफ की उन्नत किस्में और उसकी विशेषताएं गुजरात सौंफ 1 सौंफ की यह किस्म मसाला अनुसंधान केन्द्र, जगुदन (गुजरात) द्वारा विकसित की गई है। यह किस्म शुष्क परिस्थिति के लिए उपयुक्त है। यह किस्म किस्म 200 से 230 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी 16.95 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.60 प्रतिशत होती है। गुजरात सौंफ-2 सौंफ की इस किस्म को मसाला अनुसंधान केन्द्र जगुदन, गुजरात द्वारा विकसित किया गया हैं। यह किस्म सिंचित तथा असिंचित दोनों परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 19.4 किंवटल प्रति हैक्टर हैं। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 2.4 प्रतिशत होती हैं। गुजरात सौंफ 11 सौंफ की यह किस्म का विकास मसाला अनुसंधान केन्द्र, जगुदन (गुजरात) द्वारा किया गया है। यह किस्म सिंचित खेती के लिए उपयुक्त है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.8 प्रतिशत है। इसकी औसत पैदावार 24.8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है। आर एफ 125 इस सौंफ की किस्म का विकास राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के अधीन श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) द्वारा किया गया है। यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी उपज क्षमता 17.30 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक होती है। पी एफ 35 इस किस्म का विकास मसाला अनुसंधान केन्द्र, जगुदन (गुजरात) द्वारा किया गया है। सौंफ की यह किस्म 216 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी 16.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। यह किस्म झुलसा एवं गुंदिया रोग के प्रति मध्यम सहनशील है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.90 प्रतिशत होती है। आर एफ 105 इस सौंफ की किस्म का विकास राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के अधीन श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) द्वारा किया गया है। यह किस्म 150 से 160 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज क्षमता 15.50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। हिसार स्वरूप यह सौंफ की किस्म हरियाण कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई है। इसके दाने लंबे एवं मोटे होते हैं। इसकी औसत उपज 17 क्विंटल प्रति हैक्टर हैं। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.6 प्रतिशत पायी जाती हैं। एन आर सी एस एस ए एफ 1 इस किस्म का विकास राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र, अजमेर द्वारा किया गया है। यह किस्म 180 से 190 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म सीधी बुवाई द्वारा 19 तथा पौध रोपण द्वारा 25 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज देती है। आर एफ 101 यह किस्म दोमट एवं काली कपास वाली भूमियों के लिये उपयुक्त है। यह 150 से 160 दिन में पक जाती है। इसकी औसत उपज क्षमता 15 से 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा भी अधिक (1.2 प्रतिशत) होती है। इस किस्म में रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक तथा तेला कीट कम लगता है। आर एफ 143 सौंफ की यह किस्म 140 से 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसमें वाष्पशील तेल अधिक (1.87 प्रतिशत) होता है। सौंफ की खेती में ध्यान रखने वाली महत्वपूर्ण बातें सौंफ की खेती खरीफ एवं रबी दोनों ही मौसम में की जा सकती है। लेकिन रबी का मौसम सौंफ की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। खरीफ में इसकी बुवाई जुलाई माह में तथा रबी के सीजन में इसकी बुवाई अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से लेकर नवंबर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है। मसाला फसल संसोधन केंद्र जगुदन के अनुसार सौंफ की खेती करते समय 4 से 5 किलो /हेक्टेयर के हिसाब से बीज की बुवाई करनी चाहिए। बीजों को उपचारित करके ही बोना चाहिए क्योंकि सौंफ की फसल जिससे इसका अच्छा उत्पादन मिल सके। बीज को बुवाई पहले फफूंद नाशक दवा (कार्बेन्डाजिम अथवा केप्टान से प्रति 2.5 से 3 ग्राम /प्रति किलो बीज) से अलावा सौंफ के बीज को ट्राईकोडरमा (जैविक फफूंद नाशक प्रति 8 से 10 ग्राम/प्रति किलो बीज) से बीज को आठ घंटे उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए। कार्यक्षम सिंचाई हेतु टपक सिंचाई पद्धति का इस्तेमाल करना जरूरी है। सौंफ की रबी की फसल में टपक पद्धति द्वारा सिंचाई करने के लिए 90 से.मी के अन्तराल में दो लेटरल और 60 से.मी अन्तराल के दो इमिटर, लगभग 1.2 किलो / वर्ग मीटर के दबाव वाली एवं 4 लीटर प्रति घंटा पानी के डिस्चार्ज का इस्तेमाल करना चाहिए। खेत की तैयारी सौंफ की खेती के लिए खेत की तैयारी करते समय पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में 3 से 4 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत को समतल बनाकर पाटा लगाते हुए एक सा बना ले। खेती की आखिरी के जुताई समय 150 से 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद मिला देनी चाहिए और पाटा फेर दे ताकि खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाए। बुवाई का तरीका सौंफ के बीजों की बुवाई लाइनों में करना चाहिए। इसकी दो तरीके से बुवाई की जाती है। पहली छिटककर तथा दूसरी लाइनों में रोपाई कर के की जाती है। लाइनों में रोपाई करने के तरीके में लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इसमें ध्यान देने वाली बात ये हैं कि जब इसकी पौध की रोपाई की जाती है तो 7 से 8 सप्ताह पहले रोपाई से पौध डालकर की जानी चाहिए। खाद एवं उर्वरक की मात्रा रबी में सौंफ की खेती करने वाले किसानों को सलाह दी जाती है की सौंफ की फसल के लिए खाद प्रबंधन में 90 किलो ग्राम नत्रजन, 40 किलो ग्राम फास्फोरस और 30 किलो ग्राम पोटास प्रति हेक्टेयर देना चहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फोस्फोरस एवं पोटास की संपूर्ण मात्रा बुवाई के समय ही खेत में मिला देना चाहिए। इसके बाद शेष नाइट्रोजन की मात्रा बुवाई के बाद 30 एवं 60 दिनों बाद ट्रैपड्रेसिंग के रूप में सिंचाई के साथ देना चाहिए। मसाला संसोधन केंद्र जगुदन के अनुसार नाइट्रोजन 90 किलो, फास्फोरस 30 किलो प्रति हेक्टेयर दिया जाना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटास की पूरी मात्रा बुवाई के समय एवं शेष नाइट्रोजन 30 एवं 60 दिवस के के अंतराल में देना चाहिए। सिंचाई व निराई - गुड़ाई सौंफ की फसल की सिंचाई के लिए टपक पद्धति अपनाई जा सकती है। इस पद्धति से पानी कम लगता है। इससे विधि से सिंचाई करने पर आवश्यक मात्रा में पानी पौधों तक पहुंच जाता है। इसकी पहली सिंचाई पौध रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। इसके अलावा बीज बनते तथा पकते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। अब बात करें इसकी निराई गुड़ाई की तो इसकी निराई गुड़ाई कार्य पहली सिंचाई के बाद शुरू कर देना चाहिए तथा 45 से 50 दिन बाद निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए, क्योंकि फसल बड़ी होने पर होने पर निराई-गुड़ाई करते समय पौधे टूटने का डर बना रहता है। कब करें फसल की कटाई सौंफ के अम्बेल जब पूरी तरह विकसित होकर और बीज पूरी तरह जब पककर सूख जावे तभी गुच्छों की कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद एक-दो दिन धूप में सुखा देना चाहिए तथा हरा रंग रखने के लिए 8 से 10 दिन छाया में सुखाना चाहिए जिससे इसमें अनावश्यक नमी जमा न हो। हरी सौंफ प्राप्त करने हेतु फसल में जब अम्बेल के फूल आने के 30 से 40 दिन में गुच्छों की कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद गुच्छों को छाया में ही अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

आलू के बीज (Potato seeds) : महंगे भावों के चलते किसानों ने दूसरी खेती करने का मन बनाया आलू के भावों में जोरदार तेजी ने स्टॉकिस्टों को मालामाल कर दिया है। कोल्ड स्टोरेज में आलू भरने वाले किसानों ने भी अच्छी कमाई की है लेकिन यह प्रतिशत बहुत कम है। आलू की तेजी ने किसानों के सामने आलू की नई फसल बोने को लेकर एक चुनौती खड़ी कर दी है। अब किसान असमंजस मेंं है कि महंगे भावों पर आलू के बीज खरीदकर बुवाई करें या ना करें। अगले साल नई फसल के दाम अच्छे मिलेंगे या नहीं। आपको बता दें कि आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडक़र सारे देश में आलू उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जो विश्व औसत से काफी कम है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 आलू की कीमतों में उछाल / आलू के भावों में तेजी आलू की अच्छी कीमतों के कारण इस बार भी किसानों ने ज्यादा खेती करने का मन बना रखा है लेकिन आलू के बीज के भाव किसानों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। खुले बाजार में आलू का बीज 60 रुपए किलो तक मिल रहा है। वहीं सरकार कोल्ड स्टोरों में ३२ रुपए किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। आलू बीजों की ज्याद कीमत की वजह से किसानों ने इस बार फसल बदलने का मन बना लिया है। इससे आलू की फसल का रकबा घटने का अंदेशा जताया जा रहा है। आलू की बुवाई सीजन में सबसे ज्यादा मंग कुफरी लालिमा, चंद्रमुखी, चिप्सोना और कुफरी बादशाह प्रजाति के बीजों की होती है। इन बीजों की कीमत बाजार में 55 से 60 रुपए प्रतिकिलो है। जबकि पिछले साल बीजों के भाव 10-12 रुपए किलो थे। किसानों का कहना है कि इस बार करीब 500-600 प्रतिशत तक बीजों के दाम बढ़ गए हैं। खेती की लागत भी बहुत बढ़ जाएगी। सामान्यत: देखा गया है कि जिस वर्ष आलू का बीज महंगा होता है उस साल फसल के दाम अच्छे नहीं मिलते हैं। किसानों के अनुसार इस साल आलू की पैदावार की लागत खासी ज्यादा हो जाएगी जबकि उस हिसाब से दाम नहीं मिलेंगे। उत्तर प्रदेश में होता है आलू का बंपर उत्पादन उत्तरप्रदेश में पिछले तीन सालों से आलू का बंपर उत्पादन हो रहा है। उत्तरप्रदेश में पिछले साल ही आलू की पैदावार 165 लाख टन से ज्यादा थी। फसल के बाजार में आने के बाद दाम गिरने पर प्रदेश सरकार ने आलू की सरकारी खरीदन शुरू की थी। प्रदेश सरकार ने खरीद केंद्र खोल कर दो लाख क्विंटल आलू की खरीद सीधी खरीद की थी। वहीं बाहरी प्रदेशों को माल भेजने वाले किसानों को भाड़े में सब्सिडी भी दी गई थी। देश में आलू का रकबा घटना तय कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक बीघा आलू की बुआई के लिए कम से कम चार क्विंटल बीज की जरूरत होती है। इसके बाद मजदूरी, खाद व सिंचाई की लागत को जोड़ दें तो पैदावार खासी महंगी हो जाती है। इस बार नयी फसल के बाजार में आने के बाद किसान को क्या कीमत मिलेगी यह कहा नहीं जा सकता है। इन आशंकाओं के चलते इस बार देश में आलू की खेती का रकबा घटना तय है। । लघु और सीमांत किसान आलू की बजाए सरसों प्याज और लहसुन की खेती करने का मन बना रहे हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

जानिए बैंगन की खेती ( brinjal cultivation ) की बुवाई का सही समय और उन्नत किस्म के बारे में अक्टूबर व नवंबर का महीना किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इन दो महीनों में किसान रबी की फसल की बुवाई करते हैं। रबी के सीजन में किसानों के पास गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू व गन्ना आदि की फसल बोने का विकल्प होता है। इसके अलावा किसान इन दिनों में बैंगन की खेती करके भी लाखों रुपए कमा सकता है। बैंगन की खेती दो महीने में तैयार हो जाती है। बैंगन की सब्जी भारतीय जनसमुदाय में बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन को भर्ता, आलू-बैंगन की सब्जी, भरवा बैंगन, फ्राई बैंगन सहित कई तरीकों से पकाया जा सकता है। उत्तर भारत के इलाकों में बैंगन का चोखा बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन की उत्पत्ति भारत में ही हुई है। विश्व में सबसे ज्यादा बैंगन चीन में 54 फीसदी उगाया जाता है। बैंगन उगाने के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। बैंगन विटामिन और खनिजों का अच्छा स्त्रोत है। इसकी खेती सारा साल की जा सकती है। बैंगन की फसल बाकी फसलों से ज्यादा सख्त होती है। इसके सख्त होने के कारण इसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बैंगन की उन्नत किस्में / बैंगन की प्रजाति बैंगन की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। बैंगन की उन्नत किस्मों में पूसा पर्पर लोंग, पूसा पर्पर कलस्टर, पूर्सा हायब्रिड 5, पूसा पर्पर राउंड, पंत रितूराज, पूसा हाईब्रिड-6, पूसा अनमोल आदि शामिल है। एक हेक्टेयर में करीब 450 से 500 ग्राम बीज डालने पर करीब 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन मिल जाता है। बैंगन की फसल के लिए मिट्टी / बैंगन की फसल के लिए भूमि बैंगन एक लंबे समय की फसल है, इसलिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ रेतली दोमट मिट्टी उचित होती है और अच्छी पैदावार देती है। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी और अधिक पैदावार के लिए चिकनी और नमी या गारे वाली मिट्टी उचित होती है। फसल की वृद्धि के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.6 के बीच में होनी चाहिए। सिंचाई का उचित प्रबंधन भी होना चाहिए। बैंगन की फसल सख्त होने के कारण इसे अलग अलग तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। खेत में बैंगन की बिजाई का तरीका / बैंगन के बीज बैंगन का अधिक उत्पादन पाने के लिए बैंगन के बीजों का सही रोपण होना चाहिए। दो पौधों के बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए। दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज रोपण करने से पहले खेत की अच्छे तरीके से 4 से 5 बार जुताई करके खेत को समतल करना चाहिए। फिर खेत में आवश्यकतानुसार आकार के बैड बनाने चाहिए। बैंगन की खेती में प्रति एकड़ 300 से 400 ग्राम बीजों को डालना चाहिए। बीजों को 1 सेंटीमीटर की गहराई तक बोने के बाद मिट्टी से ढक देना चाहिए। बैंगन बिजाई का सही समय / बैंगन की वैज्ञानिक खेती बैंगन की फसल पूरे सालभर की जा सकती है लेकिन अक्टूबर और नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसान पहली फसल के लिए अक्टूबर में पनीरी बो सकते हैं जिससे नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। दूसरे फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोनी चाहिए जिससे फरवरी के पहले पखवाड़ तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। तीसरी फसल के लिए फरवरी के आखिरी पखवाड़़े और मार्च के पहले पखवाड़े में पनीरी बोनी चाहिए जिससे अप्रैल के आखिरी सप्ताह में पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोनी चाहिए ताकि अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। बैंगन की खेती में खाद और उर्वरक बैंगन की खेती में मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरक डालनी चाहिए। अगर मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है तो खेत तैयार करने समय 20-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। इसके बाद 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फॉस्फेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए। बैंगन की खेती में सिंचाई बैंगन की खेती में अधिक पैदावार लेने के लिए सही समय पर पानी देना बहुत जरूरी है। गर्मी के मौसम में हर 3-4 दिन बाद पानी देना चाहिए और सर्दियों में 12 से 15 के अंतराल में पानी देना चाहिए। कोहरे वाले दिनों में फसल को बचाने के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखें और लगातार पानी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बैंगन की फसल में पानी खड़ा न हो, क्योंकि बैंगन की फसल खड़े पानी को सहन नहीं कर सकती है। बैंगन की फसल की तुड़ाई खेत में बैंगन की पैदावार होने पर फलों की तुड़ाई पकने से पहले करनी चाहिए। तुड़ाई के समय रंग और आकार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बैंगन का मंडी में अच्छा रेट मिले इसके लिए फल का चिकना और आकर्षक रंग का होना चाहिए। बैंगन का स्टोरेज / बैंगन का भंडारण बैंगन को लंबे समय के लिए स्टोर नहीं किया जा सकता है। बैंगन को आम कमरे के सामान्य तापमान में भी ज्यादा देर नहीं रख सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से इसकी नमी खत्म हो जाती है। हालांकि बैंगन को 2 से 3 सप्ताह के लिए 10-11 डिग्री सेल्सियस तापमान और 9२ प्रशित नमी में रखा जा सकता है। किसान भाई बैंगन को कटाई के बाद इसे सुपर, फैंसी और व्यापारिक आकार के हिसाब से छांट लें और पैकिंग के लिए, बोरियों या टोकरियों का प्रयोग करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

जानिएं त्योहारी मांग के कारण सरसों सहित अन्य तिलहनों में आई कितनी तेजी सरसों में तेजी रोजाना नए रिकॉर्ड बना रही है। पिछले साल 2019 में 25 अक्टूबर के आसपास सरसों के भाव 4500 रुपए प्रति क्विंटल था। इस बार अक्टूबर 2020 में सरसों के भाव जयपुर मंडी में 6000-6100 के आसपास चल रहे हैं। आगरा की कई बड़ी तेल कंपनियों द्वारा सरसों 6500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से खरीदने के समाचार भी हैं। सरसों के अलावा अन्य तिलहनों में भी तेजी बनी हुई। त्योहारी मांग के कारण सरसों का तेल 120 से 130 रुपए किलो बिक रहा है। अन्य तेलों के भावों में भी तेजी है। सरसों की नई फसल आने में अभी 5-6 महीने का समय है। इस बार सरसों उत्पादक क्षेत्रों में बारिश भी कम हुई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सरसों का स्टॉक कम है इसलिए भविष्य में सरसों में मंदी की संभावना कम है। सरसों सहित अन्य तिलहनों के भावों में कमी सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सरसों के भाव त्योहारी मौसम में विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सरसों की मांग वृद्धि होने से भी सरसों दाना सहित इसके तेल-तिलहन कीमतों में सुधार आया। जम्मू-कश्मीर में सरसों दाना (तिलहन फसल) की मांग में काफी वृद्धि हुई है, जहां की मंडियों में हरियाणा से खरीदी गई सरसों 6250 रुपये क्विन्टल के भाव से बिक रही है। जयपुर की हाजिर मंडी में सरसों दाना का हाजिर भाव बढक़र 6000-6100 रुपए क्विंटल हो गया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार नफैड को अब सोच-समझ के साथ सीमित मात्रा में सरसों की बिकवाली करनी होगी, क्योंकि अगली पैदावार आने में अभी पांच-छह महीने का समय है और त्योहारों के साथ साथ सर्दियों की मांग और भी बढऩे वाली है। मूंगफली का भाव त्योहारी मांग के कारण तेल-तिलहन बाजार में तेजी बनी हुई है और भविष्य में भी तेजी की धारणा है। विदेशी बाजारों में मूंगफली दाना के साथ-साथ मूंगफली तेलों की भारी मांग ने भावों में तेजी को बल दिया है। नंबर एक गुणवत्ता वाले मूंगफली दाने की निर्यात मांग में भारी तेजी के कारण मूंगफली तेल-तिलहन कीमतों में तेजी बनी है। मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत व चीन में होता है। नंबर वन मूंगफली दाने की कीमत 70 रुपए किलो तक पहुंच गई है। सबसे सस्ते तेल सोयाबीन में तेजी / सोयाबीन का भाव हल्के तेलों में शामिल सोयाबीन इस समय सबसे सस्ता है। इस साल सोयाबीन की खपत में पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। सूरजमुखी फसल के कम उत्पादन होने, सरसों जैसे हल्के तेल में 'ब्लेंडिंग' (सम्मिश्रण) की मांग बढऩे तथा उत्तर भारत के मौसम की वजह से सोयाबीन तेल मांग के बढऩे से इसके तेल कीमतों में तेजी आई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त में कम बारिश के कारण मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल और इसकी उपज प्रभावित हुई है। वहीं महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण इसकी फसल प्रभावित हुई है, जिससे सोयाबीन किसानों की हालत पतली है और उनके लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। त्योहारी मांग होने और फसल को पहुंचे नुकसान से समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान सोयाबीन दाना और लूज की कीमतें 105-105 रुपये सुधरकर 4300-4325 रुपये और 4170-4200 रुपये प्रति क्विन्टल के आसपास चल रही हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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