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गन्ने की फसल से अधिक मुनाफा कमाने के लिए करें ये उपाय

गन्ने की फसल से अधिक मुनाफा कमाने के लिए करें ये उपाय

जानें, गन्ने की फसल उत्पादन काल में बरती जाने वाली सावधानियां व उपाय?

गन्ना भारत वर्ष में उगाई जाने वाली एक प्रमुख नकदी / व्यावसायिक फसल है, जो कि भारतीय शक्कर उद्योग का आधार है किंतु इसके बाद भी किसान इस फसल से उचित लाभ प्राप्त करने में असमर्थ हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि चीनी मिलों की मांग के अनुरूप गन्ने का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। इधर किसान की गन्ना उत्पादन में आने वाली लागत बढ़ रही है। इससे किसानों के लिए गन्ने का उत्पादन करना महंगा सौदा साबित होता जा रहा है। यदि किसान गन्ने की फसल के उत्पादन काल में कुछ महत्वपूर्ण उपायों को अपनाने तो अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके लिए किसान को आधुनिक तरीके अपनाने होंगे जिससे उत्पादन लागत को कम किया जा सके ताकि किसानों को इस फसल का पूरा लाभ मिल सके। आज आवश्यकता इस बात की है कि खेती को बाजार आधारित बनाया जाए। इसके लिए किसान को चाहिए कि वे आधुनिक तकनीक के साथ ही बाजार के रूख को पहचाने और उसी अनुरूप खेती करें। इसके लिए जरूरी है कि उसे सही उत्पादन तकनीक का पता हो। आज इसी विषय लेकर हम आए है कि किसान भाई गन्ना उत्पादन में क्या-क्या सावधानियां और उपाय करें ताकि अच्छा मुनाफा मिल सके। आज हम आपको उन उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों को बताएंगे जो आपकी आय में वृद्धि करने में सहायक हो सकते हैं।

 

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खेत की तैयारी, ऐसे करें जुताई

एक बार लगाने के बाद गन्ना खेत में 3-4 साल तक लगा रहता है। इस कारण खेती की खड़ी, आड़ी एवं गहरी जुताई करें। अंतिम जुताई के बाद पाटा चलकर खेत को समतल करें। रिज फरो की सहायता से गहरी नालियां बनायें क्योंकि जितनी गहरी नालियां बनेगी उतनी ही मिट्टी चढ़ाने हेतु मिलेगी जिससे गन्ने में अच्छी बढ़वार प्राप्त होगी और गिरने की समस्या भी कम होगी।

 


पौध ज्यामितीय का रखें ध्यान

  • किसी भी फसल के उन्नत एवं अधिक उत्पादन लेने के लिए उसका पौध विन्यास एक महत्वपूर्ण कारक है। अत: गन्ना लगाते समय भी पौध ज्यामितीय का ध्यान रखना आवश्यक है।
  • गन्ना मुख्यत: तीन प्रकार से लगाया जाता है-
  • 3-4 आंख के टुकड़े नालियों के बीच 3 फुट दूरी पर टुकड़े सिरे-से-सिरा मिलाकर लगायें। इस विधि में बीज की मात्रा 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक लगती है।
  • 2 आंख के टुकड़े नालियों के बीच 3 फुट दूरी एवं दो टुकड़ों के बीच 9 इंच दूरीकर लगाएं। इस विधि से 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा लगती है।
  • एक आंख का टुकड़ा नालियों के बीच 3 फुट दूरी दो टुकड़ों के बीच 1 फुट की दूरी रखकर लगाएं इसमें बीज मात्रा 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर लगती है।


बीज का चुनाव करने में ये बरते सावधानियां

  • उन्नत जाति के बीज का चयन करें।
  • बीज की उम्र 8-9 माह हो तो सर्वोत्तम है।
  • बीज रोग एवं कीट ग्रस्त नहीं हो।
  • ताजा बीज ही उपयोग करें। बीज काटन एवं लगाने में कम से कम अंतर हो।
  • बीज उपचारित करें अथवा टिश्यू कल्चर से उत्पादित बीज का ही चयन करें।

 

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बीज बोने का सर्वोत्तम समय

गन्ना बोने का सर्वोत्तम समय शरद कालीन गन्ने के लिए अक्टूबर-नबंवर एवं बसंत कालीन गन्ने की फसल के लिए फरवरी-मार्च तक है। इस समय साधारणत: दिन गर्म एवं रातें ठंडी होती हैं। अर्थात् दिन व रात के औसत तापमान में 5-10 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर होता है एवं तापमान का यह अंतर गन्ने के अंकुरण के समय अनुकूल होता है।


इस तरह करें बीजोपचार

  • नम गर्म हवा संयंत्र द्वारा उपचार करावें।
  • 1250 ग्राम कार्बेन्डाजिम, 1250 मिली मैंकोजेब 250 लीटर पानी में घोलकर तैयार टुकड़ों को 30 मिनिट डुबायें। अथवा 23 किलो चूने को 100 लीटर पानी में बुझा लेने के बाद, तैयार टुकड़ों को 30 मिनिट तक उपचारित करें।


इस तरीके से करें बुवाई

  • सिंचाई के साथ-साथ मेड़ों के ऊपर पहले से बिछाये गये टुकड़ों को गीली मिट्टी में पैर से या हाथ से दबाएं।
  • सूखी बोनी- नालियों में गन्ने के टुकड़े बिछाकर फिर हर एक मेढ़ छोडक़र दूसरी को उल्टे बखर से समतल करें। यह मिट्टी बिछाये गन्ने को दबा देगी तथा सिंचाई में सुविधा होगी।


खरपतवार नियंत्रण के लिए अपनाएं उपाय

  • गन्ना बोने के 15-20 दिन बाद एक गुड़ाई चाहिए। जिससे अंकुरण अच्छा होता है। इसके बाद फसल को आवश्यकतानुसार निंदाई-गुड़ाई कर एवं खरपवतार नाशियों का प्रयोग कर 90 दिन तक नींदा रहित रखें। अर्थात् बुवाई से 90 दिन तक गन्ना के खरपतवार हेतु क्रोनिक अवस्था है। अत: इस समय में खरपतवार की रोकथाम न करने से सर्वाधिक हानि होती है।
  • खरपतवार की रोकथाम के लिए कीटनाशकों का छिडक़ाव किया जा सकता है। इसके लिए एट्रॉजीन 2 कि.ग्रा. अथवा ऑक्सीफ्लोरकेन 0.75 कि.ग्रा./हेक्टेयर का छिडक़ाव बुवाई की तीसरे दिन तक 600 लीटर पानी के घोल बनाकर फ्लैट फेन नोजल का प्रयोग करते हुए छिडक़ाव करें।
  • अधिकतम गन्ना उपज के लिए एट्रॉजीन 1.0 कि.ग्रा./हे. बुवाई के तीसरे दिन के साथ 45 दिन बाद ग्लायफोसेट 1.0 ली./ हे. हुड स्प्रेयर के साथ नियंत्रित छिडक़ाव तथा 90 दिन की फसल अवस्था पर निदाईं करवायें।
  • यदि अंकुरण पूर्व छिडक़ाव नहीं कर पाते हैं तब ग्रेमेक्जोन 1.0 ली. 2,4-डी सोडियम साल्ट 2.5 कि.ग्रा./हे. को 600 ली. पानी में घोलकर बुवाई के 21 दिन की अवस्था में छिडक़ाव करें।
  • यदि परजीवी खरपतवार स्ट्राइगा की समस्या है तब 2,4 डी सोडियम सॉल्ट 1.0 कि.ग्रा./हे. 500 ली. पानी में घोलकर छिडक़ाव करें अथवा 20 प्रतिशत यूरिया का नियंत्रित छिडक़ाव कर भी स्ट्राइगा को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • मौथा आदि के लिए ग्लायफोसेट 2.0 कि.ग्रा./हे. के साथ 2 : अमोनियम सल्फेट का छिडक़ाव बुुवाई के 21 दिन पूर्व करें तथा बुवाई के 30 दिन बाद पुन: स्पेशल हुड से 2.0 कि.ग्रा./हेक्टेयर एवं 2 प्रतिशत अमोनियम सल्फेट का घोल का नियंत्रित छिडक़ाव करने से मौथा पर अच्छा नियंत्रण प्राप्त होता है।
  • अंतरवर्तीय फसल विशेषकर सोयाबीन, उड़द अथवा मूंगफली के साथ गन्ना फसल होने पर थायबेनकार्ब 1.25 कि.ग्रा./हेक्टेयर की दर में अंकुरण पूर्व उपयोग करना लाभदायक होता है।


मिट्टी चढ़ाना एवं संघाई क्रिया

गन्ना फसल के लिए मिट्टी चढ़ाना एक महत्वपूर्ण सस्य वैज्ञानिक क्रिया है। क्योंकि गन्ना की ऊंचाई बढऩे पर गन्ना गिरना एक प्रमुख समस्या बन जाती है। जिससे उत्पादन में बहुत हानि होती है। अत: वर्षा पूर्व गन्ना फसल में मिट्टी चढ़ाने का कार्य किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार मिट्टी चढ़ाने में गन्ना फसल की जड़ों में मजबूत पकड़ प्राप्त होती है। कल्लों के निकलने पर भी रोक लगती है। गन्ना तेज हवाओं से न गिरे इसके लिए कतारों के गन्ने की झुंडी को गन्ने की सूखी पत्तियों से बांधना चाहिए। यह कार्य अगस्त अंत में या सितम्बर माह में करें। बंधाई का कार्य इस प्रकार करें कि हरी पत्तियों का समूह एक जगह एकत्र न हो अन्यथा प्रकाश संलेषण क्रिया प्रभावित होगी।

 

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कब और किन अवस्थाओं में करें सिंचाई

गन्ना फसल के सफल उत्पादन हेतु लगभग 220-250 से.मी. सिंचाई की आवश्यकता होती है। गन्ना फसल से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने हेतु मौसम के अनुसार सर्दी के मौसम में 15-20 दिन के बाद तथा गर्मी के मौसम में 10-12 दिन के बाद पर सिंचाई करनी चाहिए। इस प्रकार संपूर्ण फसल काल में लगभग 10-12 दिन सिंचाई की आवश्यकता होती है।


कम पानी में अधिक उत्पादन कैसे लें?

  • गन्ने की कतारों में सूखी पत्तियों की पलवार बिछाएं।
  • जब खेत में पानी की कमी संभावित हो 2.5 प्रतिशत एमओपी का घोल 2 प्रतिशत यूरिया मिलाकर 15-20 दिन के अंतर से छिडक़ाव करें।
  • जिप्सम एवं गोबर की खाद का प्रयोग अवश्य करें।
  • उन्नत सिंचाई तकनीकें जैसे टपक सिंचाई विधि एवं अधो सतही सिंचन का प्रयोग कर पानी बचाएं।
  • कतार छोड़ सिंचाई पद्धति अपनाएं।

 

 

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पशुपालन के लिए उन्नत नस्ल : मेवाती गाय का पालन कर कमाएं भारी मुनाफा

पशुपालन के लिए उन्नत नस्ल : मेवाती गाय का पालन कर कमाएं भारी मुनाफा

जानें, इस नस्ल की गाय की पहचान और विशेषताएं देश के ग्रामीण इलाकों में कृषि के साथ पशुपालन एक मुख्य व्यवसाय बनता जा रहा है। आम तौर गाय, भैंस, बकरी आदि दुधारू पशुओं पालन किया जाता है। पशुपालन का मुख्य उद्देश्य दुधारू पशुओं का पालन कर उसका दूध बेचकर आमदनी प्राप्त करना है। यदि ये आमदनी अच्छी हो कहना ही क्या? पशुपालन से बेहतर आमदनी प्राप्त करने के लिए जरूरी है पशु की ज्यादा दूध देने वाली नस्ल का चुनाव करना। आज हम गाय की अधिक दूध देने वाली नस्ल के बारें में बात करेंगे। आज बात करते हैं मेवाती नस्ल की गाय के बारें में। यह नस्ल अधिक दूध देने वाली गाय की नस्लों में से एक है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मेवाती गाय कहां पाई जाती है? यह गाय मेवात क्षेत्र में पाई जाती है। राजस्थान के भरपुर जिले, पश्चिम उत्तर प्रदेश के मथुरा और हरियाणा के फरीदाबाद और गुरुग्राम जिलों में अधिक पाई जाती है। गाय पालन में यह नस्ल काफी लाभकारी मानी जाती है। इस नस्ल की गाय को कोसी के नाम से भी जाना जाता है। मेवाती नस्ल लगभग हरियाणा नस्ल के समान होती है। मेवाती गाय की पहचान / विशेषताएं मेवाती नस्ल की गाय की गर्दन सामान्यत: सफेद होती है और कंधे से लेकर दाया भाग गहरे रंग का होता है। इसका चेहरा लंबा व पतला होता है। आंखें उभरी और काले रंग की होती हैं। इसका थूथन चौड़ा और नुकीला होता है। इसके साथ ही ऊपरी होंठ मोटा व लटका होता है तो वहीं नाक का ऊपरी भाग सिकुड़ा होता है। कान लटके हुए होते हैं, लेकिन लंबे नहीं होते हैं। गले के नीचे लटकी हुई झालर ज्यादा ढीली नहीं होती है। शरीर की खाल ढीली होती है, लेकिन लटकी हुई नहीं होती है। पूंछ लंबी, सख्त व लगभग ऐड़ी तक होती है। गाय के थन पूरी तरह विकसित होते हैं। मेवाती बैल शक्तिशाली, खेती में जोतने और परिवहन के लिए उपयोगी होते हैं। कितना दूध देती है मेवाती गाय यह नस्ल एक ब्यांत में औसतन 958 किलो दूध देती है और एक दिन में दूध की पैदावार 5 किलो होती है। मेवाती नस्ल की गाय की खुराक इस नस्ल की गायों को जरूरत के अनुसार ही खुराक दें। फलीदार चारे को खिलाने से पहले उनमें तूड़ी या अन्य चारा मिला लें। ताकि अफारा या बदहजमी ना हो। आवश्यकतानुसार खुराक का प्रबंध नीचे लिखे अनुसार भी किया जा सकता है। खुराक प्रबंध: जानवरों के लिए आवश्यक खुराकी तत्व- उर्जा, प्रोटीन, खनिज पदार्थ और विटामिन होते हैं। गाय खुराक की वस्तुओं का चयन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसे दिया जा रहा खाद्य पदार्थ पोष्टिता से भरपूर हो। इसके लिए पशुपालक खुराक का प्रबंध इस प्रकार बताएं अनुसार कर सकते हैं जिससे पोष्टिकता के साथ ही दूध की मात्रा को भी बढ़ाया जा सके। गाय की खुराक में शामिल करें यह वस्तुएं अनाज और इसके अन्य पदार्थ: मक्की, जौं, ज्वार, बाजरा, छोले, गेहूं, जई, चोकर, चावलों की पॉलिश, मक्की का छिलका, चूनी, बड़वे, बरीवर शुष्क दाने, मूंगफली, सरसों, बड़वे, तिल, अलसी, मक्की से तैयार खुराक, गुआरे का चूरा, तोरिये से तैयार खुराक, टैपिओका, टरीटीकेल आदि। हरे चारे : बरसीम (पहली, दूसरी, तीसरी, और चौथी कटाई), लूसर्न (औसतन), लोबिया (लंबी ओर छोटी किस्म), गुआरा, सेंजी, ज्वार (छोटी, पकने वाली, पकी हुई), मक्की (छोटी और पकने वाली), जई, बाजरा, हाथी घास, नेपियर बाजरा, सुडान घास आदि। सूखे चारे और आचार : बरसीम की सूखी घास, लूसर्न की सूखी घास, जई की सूखी घास, पराली, मक्की के टिंडे, ज्वार और बाजरे की कड़बी, गन्ने की आग, दूर्वा की सूखी घास, मक्की का आचार, जई का आचार आदि। अन्य रोजाना खुराक भत्ता: मक्की/ गेहूं/ चावलों की कणी, चावलों की पॉलिश, छाणबुरा/ चोकर, सोयाबीन/ मूंगफली की खल, छिल्का रहित बड़वे की खल/सरसों की खल, तेल रहित चावलों की पॉलिश, शीरा, धातुओं का मिश्रण, नमक, नाइसीन आदि। मेवाती गाय के रहने का प्रबंध शैड की आवश्यकता: अच्छे प्रदर्शन के लिए, पशुओं को अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। पशुओं को भारी बारिश, तेज धूप, बर्फबारी, ठंड और परजीवी से बचाने के लिए शैड की आवश्यकता होती है। सुनिश्चित करें कि चुने हुए शैड में साफ हवा और पानी की सुविधा होनी चाहिए। पशुओं की संख्या के अनुसान भोजन के लिए जगह बड़ी और खुली होनी चाहिए, ताकि वे आसानी से भोजन खा सकें। पशुओं के व्यर्थ पदार्थ की निकास पाइप 30-40 सैं.मी. चौड़ी और 5-7 सैं.मी. गहरी होनी चाहिए। अधिक दूध देने वाली गाय की अन्य प्रसिद्ध उन्नत नस्लें मेवाती गाय के अलावा और भी ऐसी नस्ल हैं जिनसे अधिक दूध उत्पादन लिया जा सकता है। इनमें गिर, साहीवाल, राठी, हल्लीकर, हरियाणवी, कांकरेज, लाल सिंधी, कृष्णा वैली, नागोरी, खिल्लारी आदि नस्ल की गाय प्रमुख रूप से शामिल हैं। कहां मिल सकती है मेवाती सहित अन्य उन्नत नस्ल की गायें अगर आप मेवाती सहित अन्य उत्तम नस्ल की गाय किफायती कीमत पर खरीदना चाहते हैं तो आज ही ट्रैक्टर जंक्शन पर विजिट करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब प्रगतिशील किसान बनेंगे राष्ट्रीय स्तर के आइकॉन

अब प्रगतिशील किसान बनेंगे राष्ट्रीय स्तर के आइकॉन

बिहार के इस किसान पर बनाई जा रही है डॉक्यूमेंट्री फिल्म, जानें, किसान पर फिल्म बनाने का सरकार का मकसद और कहां होगा प्रदर्शन? बिहार के तिमौथू के मदारीपुर के एक किसान प्रेम के जीवन पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (सबौर) भागलपुर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहा है। बता दें कि प्रेम एक प्रगतिशील किसान है और उन्होंने बहुत बड़े फार्म हाउस का डबलपमेंट कर उसमें अंडा लेयर फार्म, मछली पालन, बटेर पालन, कडक़नाथ मुर्गा पालन, डेयरी फार्म, चूजा उत्पादन आदि सभी प्रकार की सुविधाओं को विकसित किया है। किसान प्रेम पर बन रही फिल्म में यह बताया जाएगा कि किसान ने कैसे एक छोटे से तालाब से शुरुआत कर आज अपना इतना बड़ा फार्म हाउस विकसित किया। विश्वविद्यालय की ओर से इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म को बनाने के पीछे ये मकसद है कि किसान प्रेम से और किसान प्रेरणा लेकर अपनी आदमनी बढ़ा सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 इंटीग्रेटेड फार्मिंग करने के लिए किसानों के बीच में होगी प्रदर्शित मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार तिलौथू के मदारीपुर में किसान प्रेम के पास बिहार कृषि विश्वविद्यालय (सबौर) भागलपुर की मीडिया टीम उस पर केंद्रित डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने पहुंची। कृषि विश्वविद्यालय की टीम का नेतृत्व कर रहे कृषि विज्ञान केंद्र बिक्रमगंज के कृषि वैज्ञानिक आरके जलज ने बताया कि बिहार सरकार के आदेश पर ऐसे किसानों को राज्य ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर किसानों का आइकॉन बनाने के लिए उनकी पूरी जीवनी व कार्यप्रणाली पर केंद्रित डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई जा रही है। इसे कृषि विभाग पूरे देश में इंटीग्रेटेड फार्मिंग करने के लिए किसानों के बीच में प्रदर्शित करेगी। इसे बिहार कृषि विश्वविद्यालय के यूट्यूब साइट पर भी देखा जा सकेगा। फिल्म के लिए शूट किए किसान के जीवन के ये पहलू डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के दौरान कृषि विश्वविद्यालय सबौर के मीडिया कर्मियों ने किसान प्रेम की जीवनी व इतने बड़े फर्म हाउस का डेवलपमेंट कैसे किया, किस तरह से यह कृषि की ओर प्रेरित हुए, इसे शूट किया। अंडा लेयर फार्म, मछली पालन, बटेर पालन, कडक़नाथ मुर्गा पालन, डेयरी फार्म, चूजा उत्पादन पर पूरी तरह से फोकस करके फिल्मांकन किया गया। यह भी पढ़ें : फसली ऋण : फसली ऋण वितरण की तारीख में किया संशोधन, अब किसान 15 जुलाई तक ले सकेंगे ऋण कृषि विज्ञान केंद्र से मिली प्रेरणा किसान प्रेम ने डॉक्यूमेंट्री के दौरान कैमरा के सामने बताया कि मैंने यह काम तालाब से शुरू किया था, जो मेरे पिताजी ने खुदवाई थी। मुझे विशेष प्रेरणा कृषि विज्ञान केंद्र में ट्रेनिंग लेने से मिली। अब मैं इतने बड़े फार्म हाउस का निर्माण कर लिया हूं। जहां अंडा लेयर फार्म, मछली फार्म, बटेर फार्म, केला उत्पादन, डेयरी फार्म, कडक़नाथ मुर्गा की जानकारी दी। नई तकनीक अपनाकर गेंदे की खेती से की 11 लाख की कमाई इधर इंदौर के धार जिले के गांव एहमद के 39 वर्षीय किसान राजेश शांतिलाल पाटीदार खेती में नई तकनीकों को अपनाकर इससे काफी अच्छा मुनाफा कमा रहे है। उन्हें उद्यानिकी के तहत 15 बीघे की गेंदे की फसल से 11 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ है। जबकि इन्होंने 20 बीघा क्षेत्र में लगाए अमरुद के 8 हजार पौधों से भी लगाएं हैं। इससे भी अच्छा मुनाफा मिलेगा। मीडिया में प्रकाशित खबरों के हवाले से किसान राजेश ने बताया कि 20 बीघे में गेंदे की फसल लगाई है, जिसमें से 15 बीघे की फसल में साढ़े 15 लाख का उत्पादन हुआ, जिसमें 11 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ। जबकि 5 बीघे की फसल निकालना बाकी है। इसी तरह उद्यानिकी के तहत राजेश ने 20 बीघा में गत अप्रैल से जून के दौरान दो किश्तों में अमरुद के 8 हजार पौधे सघन बागवानी पद्धति से पास-पास लगाए हैं। इससे उत्पादन 3-4 गुना ज्यादा मिलता है। पौधों की किस्म थाईलैंड की है। जिसके पौधे हैदराबाद से बुलवाए थे। इन पौधों की कीमत प्रति पौधा 50 रुपए और कुछ पौधों की कीमत 100 प्रति पौधा है। सिंचाई के लिए फिलहाल एक ड्रिप लाइन लगाई है। पौधे बड़े होने पर दो ड्रिप लाइन और लगाएंगे। उत्तम प्रजाति के इस जामफल की फसल 18 माह में तैयार हो जाती है। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : सिंचाई साधनों पर 100 प्रतिशत तक सब्सिडी, अभी करें आवेदन 16 लाख की लागत से प्लास्टिक बिछाकर तालाब का किया निर्माण किसान राजेश पाटीदार ने महाराष्ट्र का भ्रमण कर वहां के किसानों द्वारा अपनाई जा रही नई तकनीकों का अवलोकन किया और अपने खेतों में अपनाया। महाराष्ट्र पैटर्न पर पाटीदार ने खेत में साढ़े तीन बीघा में 16 लाख की लागत से प्लास्टिक बिछाकर तालाब का निर्माण भी किया है जिसकी क्षमता 2 करोड़ 40 लाख लीटर है। तीन कुंए हुए एक नदी से पाइप लाइन डालकर इस तालाब को भरा गया है। जिसका उपयोग गर्मी में नदी और कुंओं के पानी के उपयोग के बाद किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

मरू मेला : जैसलमेर में विश्वविख्यात मेले का आगाज,  ये अनोखी प्रतियोगिताएं होंगी

मरू मेला : जैसलमेर में विश्वविख्यात मेले का आगाज, ये अनोखी प्रतियोगिताएं होंगी

जानें, मरू मेले की खासियत जिसे लेकर विश्वभर में है इसकी अलग पहचान? राजस्थान पर्यटन विभाग तथा जैसलमेर जिला प्रशासन की ओर से आयोजित, चार दिन तक चलने वाले इस परंपरागत मरू महोत्सव में अबकि बार भी कई नवीन और आकर्षक कार्यक्रमों की धूम रहेगी। इस बार जैसलमेर में यह विश्वविख्यात मरू मेला 24 से 27 फरवरी तक आयोजित किया जा रहा है। हर बार ये मेला अपनी विशेष खासियत के लिए चर्चा में रहता है। देश-विदेश से काफी संख्या में पर्यटक इस मेले को देखने के लिए आते हैं। इस बार भी इस मेले के आयोजन को लेकर पिछले काफी दिनों से तैयारियां की जा रही थी। मेले को लेकर स्थानीय प्रशासन ने की ओर से पुलिस व्यवस्था चाक चौबंद की गई हैं ताकि देश-विदेश से मेले में आने वाले पर्यटकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मरू महोत्सव के दौरान होंगे ये कार्यक्रम इस बार मरु महोत्सव ‘नया साल, नई उम्मीद, नया जश्न’ की थीम पर केंद्रित है। मरु महोत्सव में रम्मत नाटक, हॉर्स रन, विभिन्न प्रतिस्पर्धाएं, चित्रकला, हेरिटेज वॉक, फोक डांस, मिस मूमल, मिस्टर डेजर्ट, सांस्कृतिक होंगे। इस बार चार दिवसीय मरु महोत्सव के तहत खुहड़ी, गड़ीसर, जैसलमेर व सम में चार रात स्टार नाइट का आयोजन किया जा रहा है। इसके साथ ही दिन में भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होंगे, जिसमें विभिन्न प्रतियोगिताएं भी शामिल है। मरु महोत्सव के दौरान यहां स्वयं के घरों को सजाने पर प्रशासन द्वारा पुरस्कार दिया जाएगा। चारों दिन लगेगा रात्रि बाजार, रात एक बजे तक रहेगा खुला इस चार दिवसीय मरु महोत्सव के मद्देनजऱ गड़ीसर क्षेत्र में 24 से 27 फरवरी तक चारों ही दिन रात्रि बाजार लगेगा जो रात्रि एक बजे तक खुला रहेगा। इसमें फूड स्टॉल्स, पपेट शो, जादू शो, बहुरूपिया कला आदि के कार्यक्रम होंगे। इसमें कुल्हड़ में चाय-काफी, नाश्ता, हस्तशिल्प उत्पाद, कशीदाकारी, पेचवर्क, सतरंगी राली, जैसलमेरी पाषाण के जाली-झरोखे, बिना जामण के दूध से दही जमा देने वाला हाबूर का पत्थर आदि का प्रदर्शन एवं विक्रय होगा। इस दौरान प्री रिकाडेर्ड म्यूजिक, लोक कलाकारों की जगह-जगह मोरचंग, रावण हत्था, खड़ताल, ढोलक की लहरियों पर प्रस्तुतियां होंगी। सैलानियों के लिए कैमल राइडिंग होगी। इस दौरान पर्यटकों के लिए मिस मूमल एवं मिस्टर डेजर्ट की पांरपरिक वेशभूषा में फोटो खिंचवाने की भी व्यवस्था उपलब्ध रहेगी। यह भी पढ़ें : फसली ऋण : फसली ऋण वितरण की तारीख में किया संशोधन, अब किसान 15 जुलाई तक ले सकेंगे ऋण मरू मेले के वे प्रसिद्ध आकर्षण जिसे देखने देश-विदेश से आते हैं पर्यटक मरू मेले के दौरान विभिन्न परंपरागत कलाओं का प्रदर्शन किया जाता है जो अपने आप में अनूठा है। ये प्रतिष्ठित कलाएं प्राचीन काल से प्रचलित हैं; यह रेगिस्तानी त्यौहार जैसा अवसर होता है, जो इन निर्धारित कलाकारों की मेहनत की इष्टतम उपयोगिता को बाहर निकालता है। इन कलाओं को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक यहां आते हैं। मरू मेले के दौरान होने वाली ये प्रसिद्ध कलाएं इस प्रकार से हैं- कठपुतली कला यह राजस्थानी संस्कृति का अभिन्न अंग है, जो हमेशा किसी भी मेले में शामिल होता है। कठपुतली ने हमेशा पारंपरिक नाटक खंड में एक प्रमुख भूमिका निभाई है, जो विशेष रूप से राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई जाती है। इस प्रकार, विदेशी पर्यटकों को कठपुतली की लुभावनी गतिविधि के माध्यम से राजस्थान की जीवंत संस्कृति में अंतर्दृष्टि मिलती है। डेजर्ट फेस्टिवल इन निर्धारित कलाकारों को वर्ष के अधिकांश समय में आर्थिक रूप से समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नट की कला प्रतिभाशाली कलाबाजों के आश्चर्यजनक कौशल आगंतुकों को गोज़बंप देने के लिए पर्याप्त हैं। स्पाइन-चिलिंग एक्टिविटी को अंजाम देने में कई वर्षों का समय लगता है, जो उन कड़ी मेहनत के संस्करणों को बोलते हैं जो इन बहादुर-दिलों ने अपने जुनून में डाल दिए थे। यहां तक कि, ग्रामीण महिलाएं अपने सिर पर मटका रखकर और साथ ही साथ नृत्य करते हुए अपने शरीर को संतुलित करते हुए अपने अविश्वसनीय कौशल का प्रदर्शन करती हैं। ऊंटों पर कलाबाजी भी की जाती है, जो प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा की जाती है। इस प्रकार, ये अद्भुत गतिविधियां राजस्थानी संस्कृति की विरासत को अपनी महिमा में ले जाती हैं। कालबेलिया नृत्य इस महोत्सव के दौरान कालबेलिया नृत्य का अपना अलग आकर्षण है। इसमें कालबेलिया महिलाओं का प्रदर्शन कुछ ऐसा है जिसे हर कोई दर्शक देखना पसंद करता है। यह राजस्थानी संस्कृति में सबसे पुराने नृत्य रूपों में से एक है। गेयर एंड फायर डांसिंग यह चौंका देने वाली गतिविधि निश्चित रूप से किसी के लिए अनुशंसित नहीं है, क्योंकि विशेषज्ञ भी किनारे पर अपना जीवन जीते हैं। स्थानीय स्टंटमैन अपने मुंह में मिट्टी का तेल डालते हैं, आग की लपटों को पकड़ते हैं। यह स्पाइन चिलिंग अनुभव हजारों आगंतुकों का ध्यान आकर्षित करता है, जो कुल मिलाकर अविश्वसनीय लगता है। यही कारण है कि जब पर्यटक अपने गोल्डन ट्राएंगल टूर पैकेज में अपना पसंदीदा टूर चुनते हैं, तो वे राजस्थान को प्राथमिकता देते हैं। ऊंट की दौड़ प्रतियोगिता यह रेगिस्तान त्योहार मरू उत्सव दौरान होने वाली सबसे प्रतीक्षित घटना है। ऊंटों को उनके सभी शानदार ऐश्वर्य में सजाया जाता है और फिर एक भयंकर दौड़ के लिए रास्ता बनाया जाता है, जो रोमांचकारी भीड़ के बीच एक सनसनी पैदा करता है। यह अविश्वसनीय अनुभव रेगिस्तान के त्योहार में सबसे अद्भुत स्थलों में से एक है, जो रेगिस्तान में एक विशाल महत्व ओड कैमल्स को भी दर्शाता है। इस प्रकार, ऊंटों को देश के इस हिस्से में उनके मूल्य का जश्न मनाने के लिए पूरे उत्साह के साथ सजाया गया है। पोलो मैच यह कार्यक्रम डेजर्ट फेस्टिवल में एक प्रमुख आकर्षण होता है। बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) के जवानों से बनी दो टीमें पोलो की भीषण लड़ाई में हॉर्न बजाती हैं। लेकिन, खेल के इस संस्करण में एक बड़ा मोड़ है। घोड़ों के लिए चयन करने के बजाय, खिलाड़ी इस आश्चर्यजनक खेल को खेलने के लिए ऊंटों की पीठ पर बैठ जाते हैं। यह निश्चित रूप से सभी पर्यटकों के लिए एक आवश्यक अनुभव है। पनिहारी मटका रेस यह गतिविधि राजस्थान की संस्कृति को सबसे सुंदर तरीके से मनाती है। मिट्टी-बर्तनों में पानी ले जाना विशिष्ट विशेषताओं में से एक है, जो देश के इस हिस्से में वर्षों से प्रचलित है। इस प्रकार, उनके सभी शानदार कपड़े पहने महिलाएं इस पेचीदा प्रतियोगिता में भाग लेती हैं, जिसके लिए उन्हें अपने सिर पर पानी के बर्तन रखने और महिमा के लिए प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता होती है। कई स्थानीय महिलाएं इस आकर्षक गतिविधि में भाग लेती हैं, जो रेगिस्तान त्योहार पर एक बड़ा आकर्षण है। मूंछ प्रतियोगिता यह एक विचित्र प्रतियोगिता है, जो ग्रामीण पुरुषों के बीच अविश्वसनीय रूप से लोकप्रिय है। राजस्थान में मूंछें मर्दानगी और गर्व की निशानी हैं। इस प्रकार, अपनी अद्भुत संस्कृति का जश्न मनाने के लिए, कई पुरुष सबसे बड़ी मूंछों वाले आदमी के खिताब का दावा करने के लिए अपनी मूंछों को दिमाग की लंबाई तक बढ़ाते हैं। यह विशेष अभ्यास केवल राजस्थान में ही अनुभव किया जा सकता है। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : सिंचाई साधनों पर 100 प्रतिशत तक सब्सिडी, अभी करें आवेदन पगड़ी बांधने की प्रतियोगिता पगड़ी को राजस्थानी पुरुषों के लिए प्रतिष्ठित पहचान के रूप में माना जाता है। यह समाज में उनके कद की गरिमा, गौरव और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इस प्रकार, पगड़ी बांधने की प्रतियोगिता रेगिस्तान के त्योहार में होने वाली बहुप्रतीक्षित घटनाओं में से एक बन जाती है। इस अद्भुत अभ्यास में अपने हाथ आजमाने वाले विदेशियों के साथ, घटना के मानक एक अद्वितीय स्तर तक बढ़ जाते हैं। लेकिन, यह हंसी के फटने को भी सुनिश्चित करता है क्योंकि विदेशी पगड़ी बांधने की कुछ उल्लासित शैलियों को अंजाम देते हैं। मारू-श्री (मिस्टरडेर्ट प्रतियोगिता) सभी स्थानीय पोशाक पहनकर इस प्रतिष्ठित खिताब को जीतने के लिए अपनी पूरी कोशिश करते हैं। सभी स्थानीय पुरुषों ने पारंपरिक रूप में धोती, पगड़ी और उभरी हुई मूंछें पहनकर मर्दाना रूप धारण किया जाता है। प्रतियोगिता के तहत सबसे आकर्षक व्यक्तित्व प्रतियोगिता जीतता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सिंचाई के साधन : बिना किसी सरकारी मदद के किसानों ने सिंचाई के लिए बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी नहर

सिंचाई के साधन : बिना किसी सरकारी मदद के किसानों ने सिंचाई के लिए बना डाली डेढ़ किलोमीटर लंबी नहर

कम खर्च पर किया नहर का निर्माण, अब खेतों में लहलहा रही है फसलें आदिवासी समाज आज भी समाज की मुख्य धारा से कटे हुए है और अलग-थलग रह रहे हैं। यही कारण है कि यह समाज आज भी गरीब, अशिक्षित है। यही नहीं इन्हें सरकारी मदद भी बहुत ही कम मिल पाती है। हालांकि सरकार इसको समाज की मुख्य धारा में लाने हेतु योजनाएं संचालित कर रही है पर ये नकाफी साबित हो रहा है। इसके बावजूद इन आदिवासियों में मेहनत और लगन से काम करने का जो जज्बा है वे तारीफे काबिल है। बिना किसी सरकारी मदद और संसाधनों के ये अपने परंपरागत तरीकों को अपनाकर आज भी खेतीबाड़ी का काम कर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। इनके परंपरागत जुगाड़ के तरीके काफी रोचक और इंजीनियरों को आश्चर्य में डाल देने वाले है। इसका एक उदाहरण दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र कोटड़ा के किसानों ने पेश किया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मूलभूत सुविधाओं का अभाव, कोई सरकारी मदद नहीं, फिर भी बना डाली नहर मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर यहां के किसानों के पास न मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। इनके पास न तो बिजली है, न मोटर और न ही कोई सरकारी सहायता मुहैया हो पा रही है। इसके बावजूद इन किसानों का जज्बा काफी प्रेरणा देने वाला है। इन किसानों ने अपने खेतों में सिंचाई के लिए पानी की कमी के चलते देशी जुगाड़ अपनाकर करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी नहर बनाई है जिसका पानी उनके खेतों में जाता है। इस काम के लिए न तो उन्होंने सरकार से मदद ली और न ही ज्यादा खर्चा किया। बस अपने देशी जुगाड़ से इस नहर का निर्माण कर लिया। इसकी बदौलत आज भी ये आदिवासी किसान बंजर भूमि पर खेती कर रहे हैं। कैसे किया नहर का निर्माण मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार उदयपुर से 120 किमी दूर कोटडा अंचल के वीर गांव में 20 किसानों के पास करीब 40 बीघा जमीन है। कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते ये लोग ना तो ट्यूबवेल लगवा पा रहे थे और ना बारिश के बाद दूसरी फसल उगा पा रहे थे। ऐसे में इन्होंने खेतों से डेढ़ किलोमीटर दूर बहने वाली नदी का पानी खेतों तक लाने का विचार किया। दरअसल इस गांव में नदी ऊंचाई पर है और उसके आसपास की जमीन कहीं ऊंची तो कहीं नीची है। आदिवासियों ने नदी का पानी खेतों तक पहुंचाने के लिये दो जगह ब्रिज बनाए तो दो जगह जमीन को गैंती-फावड़े से नीचे किया। उसके बाद उस नहर में प्लास्टिक बिछाया। नहर में जब तक पानी बहता है तब तक न तो प्लास्टिक खराब होता और न ही फटता है। इस तरह इन आदिवासी किसानों ने देशी जुगाड़ से डेढ़ किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण बिना किसी सरकारी मदद के कर लिया। अब केवल हर साल प्लास्टिक बदलने का होता है खर्चा किसानों ने मीडिया को बताया कि कई बार तेज बारिश में छोटे पत्थर बह जाते हैं और प्लास्टिक फट जाती है। अब वे हर साल बारिश के बाद नहर का मुआयना कर इसमें जरूरी सुधार करते हैं और प्लास्टिक बदलते हैं। अब हर साल प्लास्टिक पर ही खर्च होता है। लेकिन इससे खेतों तक पानी आसानी से पहुंच जाता है। नहर बन जाने से उनकी समस्या का समाधान हो गया। अब ये नदी के पानी से गेहूं और सौंफ की फसल भी उगा रहे हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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