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स्टीविया की खेती : खेतों में उगाएं, लाखों कमाएं, चीनी से 300 गुना मीठा होता है

स्टीविया की खेती : खेतों में उगाएं, लाखों कमाएं, चीनी से 300 गुना मीठा होता है

19 September, 2020

स्टीविया की खेती के बारे में पूरी जानकारी.

भारत सहित अन्य देशों में मधुमेह रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी और अनियमित खान-पान के कारण करीब 10 में से 5 व्यक्ति इस बीमारी से ग्रसित हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड एवेल्यूएशन और पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की नवंबर 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 25 बरस में भारत में डायबिटीज के मामलों में 64 प्रतिशत का इजाफा हुआ। एक शोध के अनुसार, साल 2017 में दुनिया के कुल डायबिटीज रोगियों का 49 प्रतिशत हिस्सा भारत में था और 2025 में जब यह आंकड़ा 13.5 करोड़ पर पहुंचेगा तो देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर एक बड़ा बोझ होने के साथ ही आर्थिक रूप से भी एक बड़ी चुनौती पेश करेगा। शोध में दिए गए ये आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। इसे देखते हुए मधुमेह रोगियों के लिए स्टीविया एक औषधी के रूप में उन्हें लाभ पहुंचा सकती है। 

 

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स्टीविया से आएगी जीवन में मिठास, एक एकड़ में 5 लाख की कमाई

स्टीविया चीनी से 300 गुना मीठा होता है और उसमें कैलोरीज की मात्रा शून्य होती है जो शरीर में शुगर के लेवल को कंट्रोल करने में मदद करता है। इसलिए डाक्टरों द्वारा मधुमेह रोगियों को इसके सेवन की सलाह दी जाती है। यदि इसकी आधुनिक तरीके से खेती की जाए तो किसान इस फसल से लाखों रुपए कमा सकता है। स्टीविया को उगाया जाना काफी आसान है और इसकी लागत भी कम आती है और मुनाफा कई गुना अधिक होता है। चूंकि बाजार में इसकी मांग काफी होने के कारण इसे बेचने में भी किसान को कोई परेशानी नहीं आती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि किसान को भी स्मार्ट तरीके से काम करना होगा तभी उसे अधिक कमाई मिल सकती है। उसे परंपरागत तरीके से काम नहीं करके आधुनिक तरीके से काम व सोच को विकसित करना होगा ताकि वे अधिक आमदनी का प्राप्त कर सके। यही कारण है कि वर्तमान समय में कुछ स्मार्ट किसान ऐसी फसलों की खेती कर रहे हैं जिससे अधिक मुनाफा होता है। स्टीविया एक ऐसी उपज है जो किसान के जीवन में ही नहीं अपितु मधुमेह रोगियों के जीवन में भी मिठास घोल देगी। तो आइए जानते हैं स्टीविया के उत्पादन और इससे होने वाली आमदनी के बारे में।

 


क्या है स्टीविया

स्टीविया माने मीठी तुलसी, सूरजमुखी परिवार (एस्टरेसिया) के झाड़ी और जड़ी बूटी के लगभग 240 प्रजातियों में पाया जाने वाला एक जीनस है, जो पश्चिमी उत्तर अमेरिका से लेकर दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। स्टीविया रेबउडियाना प्रजातियां, जिन्हें आमतौर पर स्वीटलीफ, स्वीट लीफ, सुगरलीफ या सिर्फ स्टीविया के नाम से जाना जाता है, मीठी पत्तियों के लिए वृहत मात्रा में उगाया जाता है।

स्वीटनर और चीनी स्थानापन्न के रूप में स्टेविया, चीनी की तुलना में धीरे-धीरे मिठास उत्पन्न करता है और ज्यादा देर तक रहता है, हालांकि उच्च सांद्रता में इसके कुछ सार का स्वाद कड़वापन या खाने के बाद मुलैठी के समान हो सकता है। इसके सार की मिठास चीनी की मिठास से 300 गुणा अधिक मीठी होती है, न्यून-कार्बोहाइड्रेट, न्यून-शर्करा के लिए एक विकल्प के रूप में बढ़ती मांग के साथ स्टीविया का संग्रह किया जा रहा है। 

 

भारत सहित अन्य देशों में तेजी से बढ़ रही है स्टीविया की मांग

चिकित्सा अनुसंधान ने भी मोटापे और उच्च रक्त चाप के इलाज में स्टीविया के संभव लाभ को दिखाया है। क्योंकि रक्त ग्लूकोज में स्टीविया का प्रभाव बहुत कम होता है, यह कार्बोहाइड्रेट-आहार नियंत्रण में लोगों को स्वाभाविक स्वीटनर के रूप में स्वाद प्रदान करता है। इसके अलावा इसमें ग्लूकोज रक्त पर स्टीविया का प्रभाव नगण्य होता है, यहां तक कि ग्लूकोज सहनशीलता को यह बढ़ाता है, इसलिए, यह प्राकृतिक मिठास के रूप में मधुमेह रोगियों और कार्बोहाइड्रेट नियंत्रित आहार पर रहने वाले अन्य लोगों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है।


कहां-कहां होती है स्टीविया की खेती

स्टीविया की खेती मूल रूप से पराग्वे में होती है। दुनिया में इसकी खेती पराग्वे, जापान, कोरिया, ताइवान, अमेरिका इत्यादि देशों में होती है। भारत में दो दशक पहले इसकी खेती शुरू हुई थी। इस समय इसकी खेती बंगलोर, पुणे, इंदौर व रायपुर और उत्तर प्रदेश व महाराष्ट के कुछ हिस्सों में इसकी खेती की जाती है।


कैसे उगाए स्टीविया 

स्टीविया को उगाने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत नहीं पड़ती है। किसान चाहे तो इसे खेत की मेड पर भी उगा सकता है। इतना ही नहीं घर के गार्डन में भी इसे उगाकर इसका लाभ लिया जा सकता है। यदि व्यवसायिक स्तर पर इसका लाभ लेना है और कमाई करनी है तो इसे व्यापक स्तर पर उगाना ही फायदेमंद रहता है। इसका रोपण कलम द्वारा किया जाता है।


जलवायु व भूमि

स्टीविया के लिए समशीतोष्ण जलवायु अधिक उपयुक्त रहती है। इसे 10 से 41 अंश तक की जलवायु में स्टीविया बिना किसी बांधा के सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है परन्तु यदि तापक्रम इससे कम या ज्यादा हो तो उसे मेंटेन करने हेतु उचित व्यवस्था करनी आवश्यक होगी। इसकी खेती करते समय किसान को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्टीविया की वही वेराइटी लगाई जाए जो उच्च तापक्रम में सफलतापूर्वक उगाई जा सके तथा पौधों को तेज गर्मी से बचाने के लिए इनका रोपण मक्की अथवा जैट्रोफा आदि के पौधों के बीच में किया जाए तो ज्यादा तापक्रम का प्रभाव नहीं होगा। इसकी भूमि की बात करें तो इसकी खेती के लिए समुचित जलनिकास, भुरभुरी, समतल, बलुई दोमट अथवा दोमट भूमि सबसे उपयुक्त रहती है।

 


रोपण का उचित समय

इसकी खेती का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसकी बुवाई सिर्फ एक बार की जाती है और सिर्फ जून और दिसंबर महीने को छोडक़र दसों महीनों में इसकी बुवाई होती है। एक बार फसल की बुवाई के बाद पांच साल तक इससे फसल हासिल कर सकते हैं। साल में हर तीन महीने पर इससे फसल प्राप्त कर सकते हैं। एक साल में कम से कम चार बार कटाई की जा सकती है।


स्टीविया की उन्नत किस्में

एस.आर.बी.- 123 : स्टीविया की इस प्रजाति का उदगम स्थल पेरूग्वे है तथा या भारतवर्ष के दक्षिणी पठारी क्षेत्रों के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इस प्रजाति की वर्ष भर में 5 कटाइयां ली जा सकती है तथा इस किस्म मे ग्लुकोसाइड की मात्रा 9 से 12 प्रतिशत पाई गई है।

एस. आर. बी.- 512 : यह प्रजाति ऊत्तरी भारत के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इस प्रजाति 9 से 12 प्रतिशत ग्लुकोसाइड पाए जाए हैं तथा वर्ष भर में 5 कटाइयाँ ली जा सकती है।

एस.आर.बी.- 128 : कृषिकरण की दृष्टि से स्टीविया की या किस्म सर्वोत्तम मानी जाती है। इसमें 12 प्रतिशत तक ग्लुकोसाइड पाए गए हैं। यह प्रजाति भारतवर्ष के उत्तरी क्षेत्रों के लिए भी उतनी ही उपयुक्त है जितनी की दक्षिणी भारतवर्ष के लिए।


खेती हेतु स्टीविया के पौधे लेने से पूर्व रखी जाने वाली सावधानियां

  • स्टीविया के पौधे खरीदने से पूर्व किसानों द्वारा निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-
  • क्या आपके पौधे टिश्यु कल्चर विधि से तैयार किए गये हैं अथवा तने की कलम (स्टेम कटिंग) विधि से? टिश्यु कल्चर विधि से तैयार पौधे नि:संदेह उत्तम होते हैं।
  • स्टीविया की जो वेरायटी आप ले रहे हैं क्या यह आपकी जलवायु के अनुकूल है?
  • आपके द्वारा ली गई वेरायटी से स्टीवियासाइड की मात्रा कितनी है?
  • क्या आपने प्लांटिंग मेटेरियल प्रदायकर्त्ता से संबंधित वेरायटी के स्टिवियोसाइड कंटेंट की मात्रा के बारे में कोई गारंटी ली है?


स्टीविया के रोपण की विधि

इसका प्रवर्धन बीजों द्वारा, वानस्पतिक कल्लो अथवा जड़ सहित छोटे कल्लों द्वारा किया जाता है। स्टीविया का रोपन कलमों द्वारा किया जाता है। जिसके लिए 15 सेंटीमीटर लंबी कलमों को काटकर पोलिथिन की थैलियों में तैयार कर लिया जाता है। टीस्यू कल्चर से भी पौधों को बनाया जाता है जो सामान्यत: 5-6 रुपए प्रति पौधे मिलते हैं। वैसे इसकी अक्टूबर या नवंबर के महीने में पौधों की रोपाई 30*30 सेमी. की दूरी पर करनी चाहिए। रोपाई के बाद तुरन्त सिंचाई करनी चाहिए।


खाद एवं उर्वरक

इसकी खेती में एक और फायदा ये है कि इसमे सिर्फ देसी खाद से ही काम चल जाता है। इसके लिए 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या 5-6 टन केंचुआ खाद तथा 60:60 किग्रा फास्फोरस एवं पोटास पौधरोपण के समय खेत में मिला देना चाहिए। कुल 120 किग्रा नत्रजन को 3 बार बराबर मात्रा में खड़ी फसल में देना चाहिए।


सिंचाई

इसकी पूरी फसल की अवधि में 4-5 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। इसलिए अवश्याकतानुसार इसकी सिंचाई करते रहना चाहिए, क्योंकि स्टीविया की फसल को पानी की आवश्यकता चावल की फसल जैसी ही रहती है। इसे पूरे वर्ष सिंचाई की आवश्यकता रहती है इसलिए इसकी समय-समय पर सिंचाई करना जरूरी है। बेहतर होगा कि इसकी सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई का उपयोग किया जाए ताकि इसे पूरे समय पानी की उपलब्धता होती रहे और 
पानी की बचत भी हो सके।

 

खरपतवार नियंत्रण

स्टीविया की फसल की निरंतर सफाई करते रहना चाहिए तथा जब भी किसी प्रकार के खरपतवार फसल में उन्हें उखाड़ दिया जाना चाहिए। नियमित अंतरालों पर खेत की निकाई-गुड़ाई भी करते रहना चाहिए। जिससे जमीन की नमी बनी रहे। खरपतवार नियंत्रण का कार्य हाथ से ही किया जाना चाहिए तथा इसके लिए किसी प्रकार के रासायनिक खरपतवार नाशी का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।


कीट व रोग नियंत्रण

यू तो स्टीविया पर अधिकांशता किसी विशेष रोग अथवा कीट का प्रकोप नहीं देखा गया है। परंतु काई बार भूमि में बोरोन तत्व की कमी के कारण लीप स्पॉट का प्रकोप हो सकता है। इसके निदान हेतु 6 प्रतिश बोरेक्स का छिडक़ाव किया जा सकता है। वैसे नियमित अंतरालों पर गौमूत्र अथवा नीम के तेल को पानी में मिश्रित करके उसका छिडक़ाव करने से फसल में किसी प्रकार के रोग व कीट नहीं लगते हैं।


पत्तियों की तुड़ाई

रोपण के लगभग चार माह के उपरान्त स्टीविया की फसल प्रथम कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई का कार्य पौधों पर फूल आने के पूर्व ही कर लिया जाना चाहिए क्योंकि फूल आ जाने से पौधे में स्टिवियोसाइड की मात्रा घटने लगती है जिससे इसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इस प्रकार प्रथम कटाई चार माह के उपरान्त तथा आगे की कटाइयाँ प्रत्येक 3-3 माह में आने लगती है। कटाई चाहे पहली हो अथवा दूसरी अथवा तीसरी, यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि किसी भी स्थिति में कटाई का कार्य पौधे पर फूल आने के पूर्व ही कर लेनी चाहिए। इसमें करीब 3-4 बार पत्तियों की तुड़ाई की जा सकती है। अंत में सारी फसल को काट लेना चाहिए।

 


पत्तियों को सुखाना व भंडारण करना

पत्तियों लेने के बाद उन्हें छाया में सुखाया चाहिए। 3-4 दिन तक इन्हें छाया में सूखा लिए जाने पर पत्ते पूर्णतया नमी रहित हो जाते हैं तथा इसके बाद इसका भंडारण, वायुरोधक डिब्बों अथवा पाली बैग में किया जाता है। इस तरह इसे बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। स्टीविया के पत्ते भी बेचे जा सकते हैं, इसको पाउडर बनाकर के भी बेचा जा सकता है तथा इसका एक्सट्रैक्ट भी निकाला जा सकता है। वैसे किसान के स्तर पर इसके सूखे पत्तें बेचे जाना ही उपयुक्त होता है। यदि पाउडर बनाकर बेचा जाए तो इसे बेचने पर सूखी पत्तियों की तुलना में दुगुनी कमाई होती है।


कितनी होती है उपज

एक बहुवर्षीय फसल होने के कारण स्टीविया की उपज में प्रत्येक कटाई के साथ निरंतर बढ़ती जाती है। हालांकि उपज की मात्रा काई कारकों जैसे लगाई गई प्रजाति, फसल की वृद्धि, कटाई का समय आदि पर निर्भर करता है, परन्तु चार कटाइयों में प्राय: 2 से 4 टन तक सूखे पत्तों का उत्पादन हो सकता है। वैसे एक औसतन फसल से वर्ष भर से लगभग 2.5 टन सूखे पत्ते प्राप्त हो जाते हैं। अनुमानत: सूखी पत्तियों का उत्पादन 12-15 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है।


कितनी हो सकती है कमाई

बाजार में स्टीविया के पत्तों की बिक्री दर 60 से 120 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो सकती है। वैसे यदि औसतन 2.5 टन पत्तों का उत्पादन हो तथा इनकी बिक्री दर 100 रुपए प्रति किलोग्राम मानी जाए तो इस फसल से प्रतिवर्ष किसान को 2.5 लाख रूपये प्रति एकड़ की प्राप्तियां होगी। फसल से होने वाले लाभ एवं हानि की गणना यदि पांच एकड़ की प्राप्तियां होगी। फसल से होने वाले लाभ एवं हानि की गणना यदि पंच वर्षीय फसल के आधार पर की जाए तो इस फसल से किसान को पांच वर्षों में लगभग 8.40 लाख रुपए लाभ होना अनुमानित है। वहीं इसकी पत्तियों का पाउडर बनाकर बेचा जाए तो एक एकड़ में करीब 5 लाख की कमाई आसानी से की जा सकती है।

 

भारत में स्टीविया की खेती

देश में स्टीविया की खेती बड़े स्तरपर मुख्यत: कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्य तक ही सीमित है। मध्यप्रदेश में स्टीविया की खेती प्रारंभ हो चुकी है। राजस्थान में स्टीविया की खेती भरतपुर जिला मुख्यालय पर लुपिन ह्यूमन वैलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन द्वारा प्रायोगिक तौर पर कराई जा चुकी है। उत्तरप्रदेश में स्टीविया की खेती के प्रति किसान जागरूक हो रहे हैं और कई जगह किसानों ने स्टीविया की खेती शुरू कर दी है।

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किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

आलू के बीज (Potato seeds) : महंगे भावों के चलते किसानों ने दूसरी खेती करने का मन बनाया आलू के भावों में जोरदार तेजी ने स्टॉकिस्टों को मालामाल कर दिया है। कोल्ड स्टोरेज में आलू भरने वाले किसानों ने भी अच्छी कमाई की है लेकिन यह प्रतिशत बहुत कम है। आलू की तेजी ने किसानों के सामने आलू की नई फसल बोने को लेकर एक चुनौती खड़ी कर दी है। अब किसान असमंजस मेंं है कि महंगे भावों पर आलू के बीज खरीदकर बुवाई करें या ना करें। अगले साल नई फसल के दाम अच्छे मिलेंगे या नहीं। आपको बता दें कि आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडक़र सारे देश में आलू उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जो विश्व औसत से काफी कम है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 आलू की कीमतों में उछाल / आलू के भावों में तेजी आलू की अच्छी कीमतों के कारण इस बार भी किसानों ने ज्यादा खेती करने का मन बना रखा है लेकिन आलू के बीज के भाव किसानों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। खुले बाजार में आलू का बीज 60 रुपए किलो तक मिल रहा है। वहीं सरकार कोल्ड स्टोरों में ३२ रुपए किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। आलू बीजों की ज्याद कीमत की वजह से किसानों ने इस बार फसल बदलने का मन बना लिया है। इससे आलू की फसल का रकबा घटने का अंदेशा जताया जा रहा है। आलू की बुवाई सीजन में सबसे ज्यादा मंग कुफरी लालिमा, चंद्रमुखी, चिप्सोना और कुफरी बादशाह प्रजाति के बीजों की होती है। इन बीजों की कीमत बाजार में 55 से 60 रुपए प्रतिकिलो है। जबकि पिछले साल बीजों के भाव 10-12 रुपए किलो थे। किसानों का कहना है कि इस बार करीब 500-600 प्रतिशत तक बीजों के दाम बढ़ गए हैं। खेती की लागत भी बहुत बढ़ जाएगी। सामान्यत: देखा गया है कि जिस वर्ष आलू का बीज महंगा होता है उस साल फसल के दाम अच्छे नहीं मिलते हैं। किसानों के अनुसार इस साल आलू की पैदावार की लागत खासी ज्यादा हो जाएगी जबकि उस हिसाब से दाम नहीं मिलेंगे। उत्तर प्रदेश में होता है आलू का बंपर उत्पादन उत्तरप्रदेश में पिछले तीन सालों से आलू का बंपर उत्पादन हो रहा है। उत्तरप्रदेश में पिछले साल ही आलू की पैदावार 165 लाख टन से ज्यादा थी। फसल के बाजार में आने के बाद दाम गिरने पर प्रदेश सरकार ने आलू की सरकारी खरीदन शुरू की थी। प्रदेश सरकार ने खरीद केंद्र खोल कर दो लाख क्विंटल आलू की खरीद सीधी खरीद की थी। वहीं बाहरी प्रदेशों को माल भेजने वाले किसानों को भाड़े में सब्सिडी भी दी गई थी। देश में आलू का रकबा घटना तय कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक बीघा आलू की बुआई के लिए कम से कम चार क्विंटल बीज की जरूरत होती है। इसके बाद मजदूरी, खाद व सिंचाई की लागत को जोड़ दें तो पैदावार खासी महंगी हो जाती है। इस बार नयी फसल के बाजार में आने के बाद किसान को क्या कीमत मिलेगी यह कहा नहीं जा सकता है। इन आशंकाओं के चलते इस बार देश में आलू की खेती का रकबा घटना तय है। । लघु और सीमांत किसान आलू की बजाए सरसों प्याज और लहसुन की खेती करने का मन बना रहे हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

जानिए बैंगन की खेती ( brinjal cultivation ) की बुवाई का सही समय और उन्नत किस्म के बारे में अक्टूबर व नवंबर का महीना किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इन दो महीनों में किसान रबी की फसल की बुवाई करते हैं। रबी के सीजन में किसानों के पास गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू व गन्ना आदि की फसल बोने का विकल्प होता है। इसके अलावा किसान इन दिनों में बैंगन की खेती करके भी लाखों रुपए कमा सकता है। बैंगन की खेती दो महीने में तैयार हो जाती है। बैंगन की सब्जी भारतीय जनसमुदाय में बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन को भर्ता, आलू-बैंगन की सब्जी, भरवा बैंगन, फ्राई बैंगन सहित कई तरीकों से पकाया जा सकता है। उत्तर भारत के इलाकों में बैंगन का चोखा बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन की उत्पत्ति भारत में ही हुई है। विश्व में सबसे ज्यादा बैंगन चीन में 54 फीसदी उगाया जाता है। बैंगन उगाने के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। बैंगन विटामिन और खनिजों का अच्छा स्त्रोत है। इसकी खेती सारा साल की जा सकती है। बैंगन की फसल बाकी फसलों से ज्यादा सख्त होती है। इसके सख्त होने के कारण इसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बैंगन की उन्नत किस्में / बैंगन की प्रजाति बैंगन की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। बैंगन की उन्नत किस्मों में पूसा पर्पर लोंग, पूसा पर्पर कलस्टर, पूर्सा हायब्रिड 5, पूसा पर्पर राउंड, पंत रितूराज, पूसा हाईब्रिड-6, पूसा अनमोल आदि शामिल है। एक हेक्टेयर में करीब 450 से 500 ग्राम बीज डालने पर करीब 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन मिल जाता है। बैंगन की फसल के लिए मिट्टी / बैंगन की फसल के लिए भूमि बैंगन एक लंबे समय की फसल है, इसलिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ रेतली दोमट मिट्टी उचित होती है और अच्छी पैदावार देती है। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी और अधिक पैदावार के लिए चिकनी और नमी या गारे वाली मिट्टी उचित होती है। फसल की वृद्धि के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.6 के बीच में होनी चाहिए। सिंचाई का उचित प्रबंधन भी होना चाहिए। बैंगन की फसल सख्त होने के कारण इसे अलग अलग तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। खेत में बैंगन की बिजाई का तरीका / बैंगन के बीज बैंगन का अधिक उत्पादन पाने के लिए बैंगन के बीजों का सही रोपण होना चाहिए। दो पौधों के बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए। दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज रोपण करने से पहले खेत की अच्छे तरीके से 4 से 5 बार जुताई करके खेत को समतल करना चाहिए। फिर खेत में आवश्यकतानुसार आकार के बैड बनाने चाहिए। बैंगन की खेती में प्रति एकड़ 300 से 400 ग्राम बीजों को डालना चाहिए। बीजों को 1 सेंटीमीटर की गहराई तक बोने के बाद मिट्टी से ढक देना चाहिए। बैंगन बिजाई का सही समय / बैंगन की वैज्ञानिक खेती बैंगन की फसल पूरे सालभर की जा सकती है लेकिन अक्टूबर और नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसान पहली फसल के लिए अक्टूबर में पनीरी बो सकते हैं जिससे नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। दूसरे फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोनी चाहिए जिससे फरवरी के पहले पखवाड़ तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। तीसरी फसल के लिए फरवरी के आखिरी पखवाड़़े और मार्च के पहले पखवाड़े में पनीरी बोनी चाहिए जिससे अप्रैल के आखिरी सप्ताह में पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोनी चाहिए ताकि अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। बैंगन की खेती में खाद और उर्वरक बैंगन की खेती में मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरक डालनी चाहिए। अगर मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है तो खेत तैयार करने समय 20-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। इसके बाद 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फॉस्फेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए। बैंगन की खेती में सिंचाई बैंगन की खेती में अधिक पैदावार लेने के लिए सही समय पर पानी देना बहुत जरूरी है। गर्मी के मौसम में हर 3-4 दिन बाद पानी देना चाहिए और सर्दियों में 12 से 15 के अंतराल में पानी देना चाहिए। कोहरे वाले दिनों में फसल को बचाने के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखें और लगातार पानी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बैंगन की फसल में पानी खड़ा न हो, क्योंकि बैंगन की फसल खड़े पानी को सहन नहीं कर सकती है। बैंगन की फसल की तुड़ाई खेत में बैंगन की पैदावार होने पर फलों की तुड़ाई पकने से पहले करनी चाहिए। तुड़ाई के समय रंग और आकार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बैंगन का मंडी में अच्छा रेट मिले इसके लिए फल का चिकना और आकर्षक रंग का होना चाहिए। बैंगन का स्टोरेज / बैंगन का भंडारण बैंगन को लंबे समय के लिए स्टोर नहीं किया जा सकता है। बैंगन को आम कमरे के सामान्य तापमान में भी ज्यादा देर नहीं रख सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से इसकी नमी खत्म हो जाती है। हालांकि बैंगन को 2 से 3 सप्ताह के लिए 10-11 डिग्री सेल्सियस तापमान और 9२ प्रशित नमी में रखा जा सकता है। किसान भाई बैंगन को कटाई के बाद इसे सुपर, फैंसी और व्यापारिक आकार के हिसाब से छांट लें और पैकिंग के लिए, बोरियों या टोकरियों का प्रयोग करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

जानिएं त्योहारी मांग के कारण सरसों सहित अन्य तिलहनों में आई कितनी तेजी सरसों में तेजी रोजाना नए रिकॉर्ड बना रही है। पिछले साल 2019 में 25 अक्टूबर के आसपास सरसों के भाव 4500 रुपए प्रति क्विंटल था। इस बार अक्टूबर 2020 में सरसों के भाव जयपुर मंडी में 6000-6100 के आसपास चल रहे हैं। आगरा की कई बड़ी तेल कंपनियों द्वारा सरसों 6500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से खरीदने के समाचार भी हैं। सरसों के अलावा अन्य तिलहनों में भी तेजी बनी हुई। त्योहारी मांग के कारण सरसों का तेल 120 से 130 रुपए किलो बिक रहा है। अन्य तेलों के भावों में भी तेजी है। सरसों की नई फसल आने में अभी 5-6 महीने का समय है। इस बार सरसों उत्पादक क्षेत्रों में बारिश भी कम हुई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सरसों का स्टॉक कम है इसलिए भविष्य में सरसों में मंदी की संभावना कम है। सरसों सहित अन्य तिलहनों के भावों में कमी सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सरसों के भाव त्योहारी मौसम में विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सरसों की मांग वृद्धि होने से भी सरसों दाना सहित इसके तेल-तिलहन कीमतों में सुधार आया। जम्मू-कश्मीर में सरसों दाना (तिलहन फसल) की मांग में काफी वृद्धि हुई है, जहां की मंडियों में हरियाणा से खरीदी गई सरसों 6250 रुपये क्विन्टल के भाव से बिक रही है। जयपुर की हाजिर मंडी में सरसों दाना का हाजिर भाव बढक़र 6000-6100 रुपए क्विंटल हो गया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार नफैड को अब सोच-समझ के साथ सीमित मात्रा में सरसों की बिकवाली करनी होगी, क्योंकि अगली पैदावार आने में अभी पांच-छह महीने का समय है और त्योहारों के साथ साथ सर्दियों की मांग और भी बढऩे वाली है। मूंगफली का भाव त्योहारी मांग के कारण तेल-तिलहन बाजार में तेजी बनी हुई है और भविष्य में भी तेजी की धारणा है। विदेशी बाजारों में मूंगफली दाना के साथ-साथ मूंगफली तेलों की भारी मांग ने भावों में तेजी को बल दिया है। नंबर एक गुणवत्ता वाले मूंगफली दाने की निर्यात मांग में भारी तेजी के कारण मूंगफली तेल-तिलहन कीमतों में तेजी बनी है। मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत व चीन में होता है। नंबर वन मूंगफली दाने की कीमत 70 रुपए किलो तक पहुंच गई है। सबसे सस्ते तेल सोयाबीन में तेजी / सोयाबीन का भाव हल्के तेलों में शामिल सोयाबीन इस समय सबसे सस्ता है। इस साल सोयाबीन की खपत में पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। सूरजमुखी फसल के कम उत्पादन होने, सरसों जैसे हल्के तेल में 'ब्लेंडिंग' (सम्मिश्रण) की मांग बढऩे तथा उत्तर भारत के मौसम की वजह से सोयाबीन तेल मांग के बढऩे से इसके तेल कीमतों में तेजी आई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त में कम बारिश के कारण मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल और इसकी उपज प्रभावित हुई है। वहीं महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण इसकी फसल प्रभावित हुई है, जिससे सोयाबीन किसानों की हालत पतली है और उनके लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। त्योहारी मांग होने और फसल को पहुंचे नुकसान से समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान सोयाबीन दाना और लूज की कीमतें 105-105 रुपये सुधरकर 4300-4325 रुपये और 4170-4200 रुपये प्रति क्विन्टल के आसपास चल रही हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब कृषि विभाग वाट्सएप पर देगा किसानों को खेती की जानकारी

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राजस्थान सरकार की नई पहल : अब तक 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है ग्रुप में राजस्थान सरकार ने किसानों को सरकारी योजनाओं सहित खेती- बाड़ी की जानकारी पहुंचाने के लिए अब सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का सहारा लिया है। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार अब प्रदेश सरकार सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का उपयोग खेती में करना चाह रही है। इसके लिए सरकार की ओर से कृषि अधिकारियों को निर्देश भी दिए जा चुके है। इस निर्देश के बाद प्रदेश के कृषि विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत खेती-बाड़ी की जानकारी देने के लिए प्रदेशभर में किसानों के करीब पांच हजार वॉट्सएप गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनसे करीब पांच लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। अगर सरकार की ये योजना रंग लाई तो प्रदेश के किसानों को कृषि से जुड़ी जानकरियां उनको घर बैठे-बैठे आसानी से मिलेंगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसानों को मिलेंगी ये जानकारियां मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार कृषि मंत्री लालचंद कटारिया के मुताबिक प्रदेश के किसानों को अब विभागीय योजनाओं की जानकारी के साथ ही खेती के उन्नत तरीकों और नवाचारों की जानकारी वॉट्सएप गु्रप के जरिए मिलेगी। इन गु्रप पर कृषि पर्यवेक्षक सफलता की कहानियां और खेती से जुड़ी डॉक्युमेंट्री समेत विभागीय सूचनाएं साझा करेंगे। यह प्रयोग फसल में रोग और टिड्डी प्रकोप जैसी समस्याओं से निपटने में भी मदद करेगा। कृषि पर्यवेक्षकों दिए गए थे 250-250 किसानों को जोडऩे के निर्देश प्रदेश में कार्यरत सभी कृषि पर्यवेक्षकों को वॉट्सएप गु्रप बनाकर अपने-अपने क्षेत्र के 250-250 किसानों को इससे जोडऩे के निर्देश कृषि विभाग द्वारा दिए गए थे। बता दें कि प्रदेश में करीब साढ़े 5 हजार कृषि पर्यवेक्षक कार्यरत हैं और इनके द्वारा अब तक 4 हजार 786 गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनके जरिये लगभग 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। जयपुर जिले में सबसे ज्यादा 53 हजार किसानों को व्हाट्सएप गु्रप से जोड़ा गया है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो विभाग को अपनी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने में काफी आसानी हो जाएगी और किसानों तक विभाग की पहुंच भी आसान हो होगी। क्या कहते हैं अधिकारी कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आजकल काफी बड़ी संख्या में किसान स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं। वे अब पंरपरागत खेती की बजाय आधुनिक तकनीक का अपनाने में भी खासा रुझान दिखा रहे हैं। खेती की जानकारी साझा करने में किसान भी सोशल मीडिया का फायदा उठाने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। इधर 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी के लिए मोबाइल ऐप्लीकेशन लांन्च केंद्रीय जल शक्ति एवं सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किए जाने वाले कामों की जानकारी प्राप्त करने कि लिए एक मोबाइल ऐप्लीकेशन लांच किया है। यह ऐप्लीकेशन परियोजनाओं की जियो टैगिंग करेगा। जिससे परियोजनाओं की निगरानी करने और उनकी प्रगति तथा उनके विकास में आने वाली बाधाओं का पता लगाया जा सकेंगा। इस एप्लीकेशन का विकास भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीच्यूट आफ स्पेस ऐप्लीकेशंस एंड जियो-इंफार्मेटिक्स (बीआईएसएजी-एन) की सहायता से किया है। इससे 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी की जाएगी। राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने मीडिया को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों के लाभ हेतु कृषि सिंचाई परियोजना की शुरुआत की थी। जिसमें 99 परियोजनाओं की शुरुआत की गई थी। जो कि देश में 34.64 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमी की सिंचाई करने में सहायक होगी। वहीं इन परियोजनाओं में से अभी तक 44 सिंचाई परियोजनाओं का काम पूरा किया जा चुका है। जिससे देश की 21.33 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि की सिंचाई की जा रही है। मोबाइल एप्लीकेशन से इन सभी परियोजनाओं की सतत निगरानी आसानी से की जा सकेगी। किसानों को होगा फायदा इस एप्लीकेशन का उपयोग स्थान, नहर के प्रकार/संरचना, पूर्णता स्थिति आदि जैसे अन्य विवरणों के साथ परियोजना घटक की छवि लेने के लिए निगरानी टीम/परियोजना प्राधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। इसके द्वारा एकत्रित की गई सूचना को जीआईएस पोर्टल पर प्रदर्शित करके किसानों को लाभ पहुंचाया जाएगा। मोबाइल ऐप्लीकेशन को क्षेत्र में उपलब्ध नेटवर्क को देखते हुए आनलाइन एवं आफलाइन दोनों ही तरीके से आपरेट किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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