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प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : अब देश के हर खेत में होगी सिंचाई, सरकार देगी 90 प्रतिशत सब्सिडी

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : अब देश के हर खेत में होगी सिंचाई, सरकार देगी 90 प्रतिशत सब्सिडी

07 May, 2020

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में आवेदन की सारी जानकारी

ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का स्वागत है। आज हम बात कर रहे हैं देश के करोड़ों किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की। सभी जानते हैं कि आजादी के 72 साल बीत चुके हैं। इसके बाद देश के महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड सहित सभी राज्यों में कृषि के एक बड़े हिस्से में सिंचाई की व्यवस्था नहीं है। भारत में कुल 14.2 करोड़ हैक्टेयर भूमि पर कृषि होती है। इसमें से 52 फीसदी हिस्सा अनियमित सिंचाई और बारिश पर निर्भर है। मोदी सरकार किसानों की स्थिति बदलने के लिए लगातार नई-नई योजनाएं ला रही है। सरकार ने मानसून पर खेती की निर्भरता कम करने और हर खेत तक पानी पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को लागू किया है। भारत सरकार के बजट 2020 में कृषि, सिंचाई के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपए की राशि शामिल है। योजना का फायदा लेने वाले किसान के पास अपनी जमीन और सिंचाई के पानी का स्रोत होना चाहिए।
 

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1

 

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2020 की खास बातें

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना केंद्र और राज्य सरकार के समन्वय वाली योजना है। इसकी शुरुआत एक जुलाई, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना सही मायनों में हर खेत को समय से पानी उपलब्ध कराने और उपलब्ध पानी की बर्बादी को रोकने जैसे दोनों महत्वपूर्ण काम करती है।
  • इतने बड़े देश में हर खेत को पानी देना आसान नहीं है। इसलिए सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के रूप में एक राष्ट्रीय लक्ष्य तय किया है। इसके तहत सरकार हर खेत को आधुनिक तरीकों से सिंचित करने का प्रयास करेगी।
  • इस योजना के अंतर्गत 99 बड़ी और छोटी परियोजनाओं को शामिल किया गया है। इसमें तीन मंत्रालयों के जरिए काम किया जा रहा है। इसमें जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा कृषि मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं को जोड़ा गया है।
  • राज्यों के लिए कार्यक्रम के तहत धनराशि का आवंटन बढ़ाया भी जा सकता है। कुल मिलाकर मकसद यह है कि हर खेत तक पानी पहुंचे। फसल का उत्पादन बढ़े। इससे खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
  • केंद्र सरकार इस योजना के कुल संभावित खर्च का 75 फीसदी हिस्सा वहन करती है। बाकी बोझ राज्य सरकारें उठाती हैं।
  • वह कृषि क्षेत्र जो ऊंचाई वाले स्थान पर है, उसके लिए केंद्र सरकार 90 फीसदी खर्च एवं राज्य सरकारें 10 फीसदी खर्च वहन करती हैं।

 

 

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2020 का उद्देश्य 

  • पौधों में उनकी जरूरत के मुताबिक पानी का इस्तेमाल करना।
  • खुली सिंचाई में बर्बाद होने वाले पानी की बचत करके जमीन के अंदर पानी के लेवल को कम होने से बचाना।
  • बागवानी, कृषि फसलों में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तकनीक को अपनाकर फसल की क्वालिटी और पैदावार में इजाफा करना।
  • पौधों की जड़ों में ड्रिप सिंचाई के साथ ही खाद और कीट मारने वाले केमिकलों इस्तेमाल करके केमिकलों के इस्तेमाल में कमी लाना।
  • इस तकनीक से ऊंची-नीची जमीन पर भी खेती की जा सकती है।

 

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प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का लक्ष्य

  • जहां भी सिंचाई के लिए पानी कम है, वहां वितरण को ठीक करना। भूजल विकास, लिफ्ट इरिगेशन के माध्यम से पानी पहुंचाने का लक्ष्य।
  • कृषि योग्य भूमि का विस्तार करना तथा विस्तारित भूमि के लिए सिंचाई का प्रबंधन करना।
  • उपजिला/जिला तथा राज्य स्तर पर सिंचाई योजना तैयार कर किसानों के खेतों तक जल को पहुंचाना।
  • पानी की पुरानी टंकियों या स्रोतों की दोबारा मरम्मत करना। इन्हें रेनोवेट करके उसमें दोबारा जल संचयन कर पानी को बचाकर ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाना।
  • जलाशयों को दोबारा भरना, वर्षा जल का संचयन, पानी के बहाव को रोककर उपयोग में लाना, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर कार्यक्रम को लागू करना।

 

 

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की पात्रता 

  • योजना का फायदा सभी वर्ग के किसान उठा सकते हैं। योजना का फायदा लेने वाले किसान के पास अपनी जमीन और सिंचाई के पानी का स्रोत होना चाहिए।
  • योजना का लाभ सहकारी समिति के सदस्यों, सेल्फ हेल्प गु्रप, इनकार्पोरेटेड कंपनीज, पंचायती राज संस्थाओं, गैर सहकारी संस्थाओं, ट्रस्ट्स, उत्पादक कृषकों के समूह के सदस्यों को भी दिया जा रहा है। 
  • ऐसे लाभार्थियों/संस्थाओं को भी योजना का लाभ मिल रहा है जो संविदा खेती (कान्टै्क्ट फार्मिंग) अथवा न्यूनतम 07 वर्ष के लीज ( एग्रीमेन्ट) की जमीन पर बागवानी/खेती करते हैं। 
  • एक लाभार्थी कृषक/संस्था को उसी भू-भाग पर दूसरी बार 7 वर्ष के बाद ही योजना का लाभ ले सकता है। लाभार्थी किसान अनुदान के अतिरिक्त अवशेष धनराशि स्वयं के स्रोत से अथवा ऋण प्राप्त करके अदा करने के लिए सक्षम हों।

 

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प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में रजिस्ट्रेशन/ प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2020 में ऑन लाइन आवेदन

 इस योजना के लिए राज्य सरकारे अपने प्रदेश की कृषि विभाग की अधिक वेबसाइट पर आवेदन स्वीकार कर सकती है। यहां पर हम आपको केंद्र सरकार व कुछ राज्यों की वेबसाइट पर योजना से समबन्धित जानकारी प्रदान कर रहे हैं।

किसान भाई प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना http://pmksy.gov.in/ आधिकारिक वेबसाइट पर योजना के संबंध में सभी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
इस योजना का फायदा उठाने के लिए अलग-अलग राज्यों ने रजिस्ट्रेशन के लिए अलग-अलग नियम और पोर्टल तैयार किए हुए हैं।
- उत्तर प्रदेश के किसान http://www.upagriculture.com/ पर अपना रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं.
- मध्य प्रदेश के किसान dbt.mpdage.org पर रजिस्ट्रेशन और योजना के बारे में जानकारी ले सकते हैं.
बिहार के किसान http://horticulture.bihar.gov.in/PMKSYMI/AboutPMKSY.aspx पर रजिस्ट्रेशन और योजना के बारे में जानकारी ले सकते हैं।
महाराष्ट्र के किसान https://cmdashboard.maharashtra.gov.in/hi/scheme/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A4%BF-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%BE 

पर योजना के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

 

 

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में आवश्यक दस्तावेज

  • आधार कार्ड
  • वोटर आईडी कार्ड
  • बैंक खाते की जानकारी
  • मोबाइल नंबर
  • पासपोर्ट साइज फोटो
  • जमीन के कागजात
  • भूमि का लीज एग्रीमेंट
  • भूमि की जमाबंदी नकल

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में अनुदान

  • योजना के तहत सिंचाई के उन उपकरणों और योजनाओं पर सरकार भारी सब्सिडी दे रही है, जिनमें पानी, खर्च और मेहनत सबकी बचत होती है। 
  • योजना के अन्तर्गत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी ढंग से विभिन्न फसलों में अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। 
  • इस सिंचाई पद्धति को अपनाकर 40-50 प्रतिशत पानी की बचत के साथ ही 35-40 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि और उपज के गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
  • इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश सरकार 90 फीसदी (लघु सीमान्त किसान) और 80 फीसदी (सामान्य किसान) तक की सब्सिडी दे रही है। 
  • मध्य प्रदेश सरकार स्प्रिंकलर सेट, ड्रिप सिस्टम पर 80 फीसदी तक का अनुदान दे रही है। अन्य प्रदेशों की सरकारें भी अनुदान दे रही है।

 

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2020 : कम कीमत पर इरीगेशन सिस्टम लगाएं

देश में 80 फीसदी खेती बारिश के भरोसे है। कहीं ज्यादा बारिश तो कहीं सूखा की वजह से हर साल बड़ी तादाद में किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा हर जगह नाले-नहर से भी सुविधा नहीं होने की वजह से किसानों को डीजल पंप सेट से सिंचाई करनी पड़ती है। पंप सेट सिंचाई करने पर सिंचाई का करीब 30 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है। सिंचाई में एक-एक बूंद पानी का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने ''प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना'' चलाई हुई है। सरकार ने इस योजना का नाम 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप- माइक्रो इरीगेशन' स्कीम चलाई है। इस स्कीम में सिंचाई की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया है। माइक्रो इरीगेशन तकनीक के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल के लिए किसानों को जागरुक किया जा रहा है और किसानों को इसके लिए सब्सिडी दी जा रही है।

 

भारत सरकार की गाइडलाइन 

भारत सरकार के ऑपरेशनल गाईडलाइन्स 2017 के अनुसार बागवानी, कृषि एवं गन्ना फसल में अधिक दूरी एवं कम दूरी वाली फसलों के 14 विभिन्न लेटरेल स्पेसिंग के आधार पर उपयुक्त फसलों में ड्रिप सिंचाई पद्धति को लगाकर उन्नतिशील उत्पादन एवं जल संचयन किया जा सकता है। स्प्रिंकलर सिंचाई मटर, गाजर, मूली , विभिन्न प्रकार की पत्तेदार सब्जियां, दलहनी फसलें, तिलहनी फसलें, अन्य कृषि फसलें, औषधीय एवं सगंध फसलों में मिनी स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर, सेमी परमानेन्ट, पोर्टेबल एवं लार्ज वैक्यूम स्प्रिंकलर (रेनगन) द्वारा सरलता से सिंचाई प्रबन्धन किया जा सकता है।

सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।
 

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समर्थन मूल्य पर खरीद : राजस्थान में मूंग, उड़द, सोयाबीन एवं मूंगफली के लिए पंजीकरण 20 से

समर्थन मूल्य पर खरीद : राजस्थान में मूंग, उड़द, सोयाबीन एवं मूंगफली के लिए पंजीकरण 20 से

किसान ई-मित्र व खरीद केंद्रों पर करा सकेंगे पंजीकरण, किसानों की सुविधा के लिए बनाए जा रहे हैं 850 से अधिक खरीद केंद्र देश के कई राज्यों में इस समय खरीफ की उपज की खरीद शुरू हो चुकी है। हरियाणा और पंजाब में धान, कपास आदि की खरीद का कार्य जोरशोर से चल रहा है। वहीं राजस्थान में मूंग, उड़द, सोयाबीन एवं मूंगफली की खरीद नवंबर माह में शुरू की जानी है जिसको लेकर यहां तैयारियां चल रही हैं। राजस्थान में किसानों को फसल बेचने से पहले अपना पंजीकरण करना होगा। पंजीकरण के अभाव में किसान यहां समर्थन मूल्य पर फसल नहीं बेच पाएंगे। राजस्थान राज्य में समर्थन मूल्य पर मूंग, उड़द, सोयाबीन एवं मूंगफली की खरीद के लिए ऑनलाइन पंजीकरण 20 अक्टूबर 2020 से शुरू किए जा रहे हैं। इस वर्ष राजस्थान में केंद्र सरकार ने मूंग की 3.57 लाख मीट्रिक टन, उड़द 71.55 हजार, सोयाबीन 2.92 लाख तथा मूंगफली 3.74 लाख मीट्रिक टन की खरीद के लक्ष्य की स्वीकृति दी है। पंजीकरण के अभाव में किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीद संभव नहीं होगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसानों से कब की जाएगी समर्थन मूल्य पर खरीद शुरू राजस्थान में किसान 850 से अधिक खरीदी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केन्द्रों पर मूंग, उड़द एवं सोयाबीन की उपज 1 नवंबर से तथा 18 नवंबर से मूंगफली की उपज पर समर्थन मूल्य पर बेच सकेगें। मूंग के लिए 365, उड़द के लिए 161, मूंगफली के 266 एवं सोयाबीन के लिए 79 खरीद केंद्र बनाए जा रहे हैं जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 500 अधिक हैं। पंजीकृत किसान इन खरीद केन्द्रों पर अपनी उपज को लाकर बेच सकते हैं। कब और कैसे करवाएं पंजीकरण किसानों की सुविधा के लिए यहां ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था ई-मित्र केंद्र व केन्द्रों पर सुबह 9 बजे से सायं 7 बजे तक की गई है। इच्छुक किसान ई-मित्र केंद्र पर 20 अक्टूबर से अपनी उपज बेचने के लिए पण पंजीकरण करवा सकते हैं। किसान एक जनआधार कार्ड में अंकित नाम में से जिसके नाम गिरदावरी होगी उसके नाम से एक पंजीयन करवा सकेगें। किसान इस बात का विशेष ध्यान रखे कि जिस तहसील में कृषि भूमि है उसी तहसील के कार्यक्षेत्र वाले खरीद केंद्र पर उपज बेचान हेतु पंजीकरण करावें। दूसरी तहसील में यदि पंजीकरण कराया जाता है तो पंजीकरण मान्य नहीें होगा। पंजीकरण कराते समय इन बातों का रखें ध्यान किसान पंजीयन कराते समय यह सुनिश्चित कर ले कि पंजीकृत मोबाइल नंबर, से जनआधार कार्ड से लिंक हो जिससे समय पर तुलाई दिनांक की सूचना मिल सके। किसान प्रचलित बैंक खाता संख्या सही दे ताकि ऑनलाइन भुगतान के समय किसी प्रकार की परेशानी किसान को नहीं हो। पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज किसान को पंजीकरण केंद्र पर अपने साथ जनआधार कार्ड नंबर, खसरा नंबर, गिरदावरी की प्रति, बैंक पासबुक की प्रति ले जानी होगी। किसानों को यह दस्तावेज पंजीकरण फार्म के साथ अपलोड करने होंगे। जिस किसान द्वारा बिना गिरदावरी के अपना पंजीयन करवाया जाएगा, उसका पंजीयन समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए मान्य नहीं होगा। यदि ई-मित्र द्वारा गलत पंजीयन किए जाते हैं या तहसील के बाहर पंजीकरण किए जाते हैं तो ऐसे ई-मित्रों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वर्ष 2020-21 के लिए सरकार द्वारा तय समर्थन मूल्य वर्ष 2020-21 के लिए सरकार की ओर से मूंग, उड़द, सोयाबीन एवं मूंगफली का समर्थन मूल्य तय किए गए हैं। इसमें उड़द का समर्थन मूल्य 6000 रुपए प्रति क्विंटल, मूंग का समर्थन मूल्य 7196 रुपए प्रति क्विंटल, मूंगफली का समर्थन मूल्य 5275 रुपए प्रति क्विंटल और सोयाबीन का समर्थन मूल्य 3880 रुपए प्रति क्विंटल तय किया गया है। पंजीकरण में समस्या होने पर किसान यहां कर सकते हैं संपर्क पंजीकरण कराने में यदि किसानों को कोई समस्या आ रही हो तो वे इसके समाधान हेतु राजफैड स्तर पर ट्रोल फ्री हेल्पलाइन नंबर 1800-180-6001 पर सुबह 9 से 7 बजे तक दर्ज करा सकते हैं। यह टोल फ्री नंबर 20 अक्टूबर से कार्य करना शुरू कर देगा। इसके अलावा किसान अपनी शिकायत/समस्या को लिखित में राजफैड मुख्यालय में स्थापित काल सेंटर पर [email protected] पर मेल भेज सकते हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब किसानों को मिल सकेगी गेहूं, धान सहित कई फसलों के 17 बॉयोफोर्टीफाइड बीजों की वैरायटी

अब किसानों को मिल सकेगी गेहूं, धान सहित कई फसलों के 17 बॉयोफोर्टीफाइड बीजों की वैरायटी

कृषि वैज्ञानिकों ने विकसित की पोष्टिकता से भरपूर बॉयोफोर्टीफाइड नई किस्में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में फूड एंड एग्रीकल्चर ऑरेनाइजेशन एफपीओ की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई गेहूं, धान सहित कई फसलों के 17 बीजों की वैरायटी को देश को समर्पित किया है। बताया जा रहा है कि जारी किए गए बीजों की वैरायटी अन्य बीजों के मुकाबले पोष्टिता से भरपूर है और ये किसानों और आम नागरिकों के लिए फायदेमंद साबित होगी। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार पीएम मोदी ने इन 17 बॉयोफोर्टीफाइड बीजों की वैरायटी को देश समर्पित करते हुए कहा कि अब कुपोषण से निपटने के लिए महत्वपूर्ण दिशा में काम हो रहे हैं। अब देश में ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसमें पोष्टिक पदार्थ- जैसे प्रोटीन, आयरन, जिंक आदि होते हैं। मोटे अनाज- जैसे रागी, ज्वार, बाजरा, कोडो, झांगोरा, बार्री, कोटकी इन जैसे अनाज की पैदावार बढ़े, लोग अपने भोजन में इन्हें शामिल करें। उन्होंने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय बाजरा दिवस घोषित करने के भारत के प्रस्ताव को पूरा समर्थन दिया है। उन्होंने कुपोषण खत्म करने की दिशा में काम के लिए किसान, कृषि वैज्ञानिकों सहित आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता को बधाई दी और कहा कि यह इस आंदोलन के आधार हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 यह है कृषि वैज्ञानिकों द्वारा जारी की गई 17 बायोफोर्टीफाइड नई किस्में गेहूं : एचआई-1633, एचडी-3298, डीबीडब्ल्यू-303 और एमएसीएस-4058, चावल- सीआरधान-315, मक्का- एलक्यूएमएच-1, एलक्यूएमएच-3, रागी- सीएफएमवी-1, सीएफएमवी-2, सावा– सीएलएवी-1, सरसों- पीएम-32, मूंगफली : गिरनार-4, गिरनार-5 किस्में. रतालू- डीए-340 एवं श्रीनीलिमा नई किस्में जारी की गई हैं। क्या होती है बॉयोफोर्टिफाइड किस्में बायोफोर्टिफिकेशन, पादप प्रजनन द्वारा फसलों की पोषक गुणवत्ता बढ़ाने की तकनीक है। बायोफोर्टिफिकेशन साधारण फोर्टिफिकेशन से अलग है, क्योंकि इसमें फसलों को अधिक पौष्टिक बनाया जाता है। बायोफोर्टिफाइड तकनीक द्वारा फसलों की पोषकता में बढ़ोतरी होती है। वैज्ञानिक इन फसलों के विकास के दौरान उनके बीज में पोषक तत्व और विटामिन, जड़ द्वारा अवशोषित कर बायोफोर्टिफाइड कर रहे हैं। फसलों पर ऐसे किया जाता है बायोफोर्टिफिकेशन बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक में परंपरागत पादप प्रजजन तकनीक से उच्च सूक्ष्म तत्व वाली किस्म का पता लगाया जाता है। इन किस्मों को उच्च उत्पादन देने वाली किस्म से संकरण करवाया जाता है। इससे इन किस्मों में उच्च उत्पादक गुणों के साथ-साथ उच्च मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्व और जरूरी विटामिन उपलब्ध हो सके, जो कि किसानों के लिए फायदेमंद हो सके। ऐसे होता है बायोफोर्टिफिकेशन हाल ही में जारी की गई बॉयोफोर्टीफाइड बीज की किस्मों से पहले भी कई किस्में जारी की गई हैं। हम यहां उदाहरण के तौर पर कृषि वैज्ञानिकों द्वारा इन नई किस्मों से पहले जारी की गई बीजों की किस्मों के द्वारा बायोफोर्टिफिकेशन की प्रक्रिया को इस तरह से समझ सकते हैं- धान : विटामिन ए, फोलिक एसिड, अधिक आयरन गोल्डन राइस पहली बायोफोर्टिफाइड फसल है। संकरण तकनीक से धान में बीटा केरोटीन जीन डाला गया है। यदि रोजाना 40 ग्राम सुनहरा चावला पकाकर खाए जो अंधापन नहीं होगा। मक्का : विटामिन, आयरन, प्रो-विटामिन, विटामिन ई पोषक जरूरतों को पूरा करने के लिए क्यूपीएम मक्का अच्छा विकल्प है। क्योंकि इसमें 3.3 से 4 ग्राम प्रति 100 ग्राम लाइसिन प्रोटीन पाया जाता है, जो साधारण मक्का से दोगुना है। बॉयोफोर्टीफाइड किस्मों की विशेषताएं / लाभ गेहूं और धान सहित अनेक फसलों के 17 नए बीजों की वैरायटी, देश के किसानों को उपलब्ध कराई जा रही हैं। हमारे यहां अक्सर हम देखते हैं कि कुछ फसलों की सामान्य वैरायटी में किसी न किसी पौष्टिक पदार्थ या माइक्रो-न्यूट्रिएंट की कमी रहती है। इन फसलों की अच्छी वैरायटी, बॉयोफोर्टीफाइड वैरायटी, इन कमियों को दूर कर देती है, अनाज की पौष्टिकता बढ़ाती है। बीते वर्षों में देश में ऐसी वैरायटीज, ऐसे बीजों की रिसर्च और डवलपमेंट में काम हुआ है। आज अलग-अलग फसलों की 70 बॉयोफोर्टीफाइड किस्में किसानों को उपलब्ध हैं। इन वैरायटियों के इस्तेमाल से जहां किसानों को बेहतर उत्पादन मिलता है वहीं लोगों को पोष्टिकता से भरपूर भोजन। इस तरह ये नई किस्में किसानों व आम लोगों दोनों के लिए काफी फायदेमंद साबित होंगी। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अक्टूबर माह के कृषि कार्य : प्याज, लहसुन, फूलगोभी, मटर, टमाटर, पपीता, इसबगोल में होगा फायदा

अक्टूबर माह के कृषि कार्य : प्याज, लहसुन, फूलगोभी, मटर, टमाटर, पपीता, इसबगोल में होगा फायदा

अक्टूबर माह में की जाने वाली वानिकी क्रियाएं, किसान करें ये काम किसानों अपने खेत में दाल व अनाज के साथ अलावा सब्जियां व फलों का उत्पादन भी करते हैं। कई किसान तो ऐसे हैं कि वे सिर्फ सब्जी और फल उत्पादन से ही अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इसके पीछे कारण यह है कि वे समय-समय पर सब्जियों व फलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। इस प्रयासों में प्रमुख है, सब्जियों व फलों को समयानुसार बोना व उनके उत्पादन काल के दौरान उनकी अच्छे से देखभाल करना ताकि स्वस्थ व गुणवत्तापूर्ण उत्पाद प्राप्त हो सके। आज हम आपको इसी विषय पर जानकारी देंगे कि सब्जियों व फलों के उत्पादन काल में इनका किस प्रकार ध्यान रखना चाहिए और कौन-कौनसी वानकी क्रियाएं करनी चाहिए, जिससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में बढ़ोतरी हो और किसानों भाइयों को अपने उत्पाद का बाजार में बेहतर दाम मिल सके। आज हम अक्टूबर माह में की जाने वाली वानकी क्रियाओं के बारें में आपको बता रहे हैं। आशा करते हैं ये जानकारी हमारे किसान भाइयों के लिए फायदेमंद साबित होगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 प्याज की नर्सरी लगाएं इस माह प्याज की नर्सरी ऊंची उठी शैय्या पर लगाएं। प्याज की उन्नत किस्मों में अलों ग्रनों, पूसा रेड, पूसा रतनार, पूसा व्हाईट पलैट, पूसा व्हाइट राऊड व पूसा माधवी है। इससे पहले नर्सरी में कम्पोस्ट खाद मिलाकर शैया तैयार करें। इसके बाद 5 किलोग्राम बीज को नर्सरी में लगाएं। यह कार्य 17 अक्टूबर से लेकर 17 नबंवर माह तक किया जा सकता है। गाजर व मूली की बुवाई करें जापानी व्हाईट मूली तथा पूसा केसर व पूसा मघाली गाजर अक्टूबर में बोई जा सकती है। सितंबर में बोई फसल में आधा बोरा यूरिया डाल दें तथा 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। कीट-नियंत्रण के लिए 0.2 प्रतिशत मैलाथियान छिडक़ाब करना चाहिए। मटर की बीजाई करें मटर अर्कल 17 अक्टूबर से 7 नवंबर तक तथा वोर्नवीला एवं लिकंन अक्टूबर के अंत से 17 नवंबर तक बोया जा सकता है। बीजाई से पहले खेत में आधा बोरी यूरिया, 8 टन कम्पोस्ट, 3 बोरे सिंगल सुपर फासफेट, 1 बोरा म्युरेट आफ पोटाश डालना चाहिए। फिर 30 किलोग्राम बीज रातभर भिगोकर 1-1.5 फुट दूर लाइनों में एक इंच पौधों में दूरी रखकर बुवाई करनी चाहिए। बीजाई के बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए 600 ग्राम स्टोम्प को 370 लीटर पानी में घोलकर बिजाई के 1-2 दिन के अंतर पर खेत में छिडक़ाव करें। इसके बाद पहली सिंचाई 27-30 दिन बाद करें। कीट-नियंत्रण के लिए 0.1 प्रतिशत इंडोसल्फान या मैलाथियान का छिडक़ाव करना चाहिए। टमाटर की विशेष फसल के लिए अभी करें बीजाई / टमाटर की बुवाई टमाटर की विशेष फसल के लिए अक्टूबर के शुरू में बीजाई करके मध्य नवंबर तक रोपाई कर कर सकते हैं। बोने से पहले, 170 ग्राम बीज को 0.7 ग्राम थीरम से उपचारित कर लें तथा हर 17 दिन बाद शाम के समय 2 ग्राम थीरम प्रति लीटर पानी में घोलकर का छिडक़ाव करें। सफेट मक्खी की रोकथाम के लिए नर्सरी में 0.1 प्रतिशत मैलाथियान 17 दिन के अंतर पर छिडक़ाव किया जा सकता है। पुरानी टमाटर की फसल से रोगग्रस्त पौधे उखाडक़र जला दें। दवाइयां छिडक़ने से पहले फल तोड़ लेना चाहिए ताकि दवा का दुष्प्रभाव फलों पर न हो। फूलगोभी की नर्सरी तैयार करें फूलगोभी की पूसा स्नोवाल-1 व पूसा स्नोवाल के-1 किस्में 17 अक्टूबर तक नर्सरी में बोई जा सकती है। इसके चार सप्ताह बाद खेत में रोपाई करें। पुरानी फसल में 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहें। खरपतवार नियंत्रण के लिए एक गुडाई करें तथा यूरिया की दूसरी किस्त एक बोरा, पहली किस्त के 30-40 दिन बाद दें। कीड़ों से बचाव के लिए फूलगोभी पर 0.2 प्रतिशत मैलाथियान का छिडक़ाव करते रहना चाहिए। इस माह भी लगा सकते हैं पालक व मैथी पालक व मैथी को अक्टूबर माह में भी लगाया जा सकते है। सितंबर में बोई फसल को 30 दिन बाद काट सकते है। ध्यान रहें तथा हर कटाई के बाद आधा बोरा यूरिया अवश्य डाल दें। सिंचाई हर सप्ताह करें। कीट के नियंत्रण के लिए 0.2 प्रतिशत मैलाथियान का छिडक़ाव किया जाना चाहिए। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में लगाएं बरसीम बरसीम को अक्टूबर के आखिरी सप्ताह तक लगा सकते है। सितंबर में लगी फसल में 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहें। रिजका (लूसर्न) भी चारे की अच्छी फसल है इसे गहरी अच्छे निकास वाली दोमट भूमि में 17 अक्टूबर से लगा सकते हैं। रिजका की उन्नत किस्म लुसर्न-9, एल एल कम्पोजिट-7 तथा लुसर्न-टी है। इसे 7 कि.ग्रा. बीज को राइजावियम जैव खाद लगाकर एक फुट दूर लाइनों में 1-2 इंच गहरा बोया जाना चाहिए। बीजाई के समय आधा बोरा यूरिया तथा 4 बोरे सिंगल सुपरफासफेट को 8 इंच गहरा ड्रिल करें। जई की इन किस्मों को बोएं जई बोने का उत्तम समय 17 से 30 अक्टूबर तक का रहता है। इसलिए इसकी बुवाई अभी कर सकते हैं। इसके लिए उन्नत किस्मों में ओ.एल-9, कैन्ट व हरियाणा जई है जो कई कटाइयां देती है। जई का 27 कि.ग्रा. बीज 27 ग्राम वीटावैक्स से उपचारित करके 7 इंच दूर लाइनों में लगाएं। इसमें बीजाई पूर्व सिंचाई बहुत लाभदायक रहती है। बीजाई के समय पौना बोरा यूरिया व एक बोरा सिंगल सुपर फासफेट खेत में डालना चाहिए। इससे बेहतर उत्पादन मिलता है। कम पानी वाले क्षेत्रों में लगाएं इसबगोल इसबगोल एक औषधीय फसल है जिसे अच्छे जल निकाल वाली मिट्टी तथा कम पानी वाले क्षेत्रों में 17 अक्टूबर से 7 नवंबर के बीच लगा लगाया जा सकता है। बीजों को बोने से पहले इनको उपचारित करें। करीब 3 कि.ग्रा. बीज को 9 ग्राम थिरम से उपचारित करके 9 इंच दूर लाइनों में एक इंच से कम गहरा बोयें। बीजाई के पहले आधा बोरा यूरिया व आधा बोरा सिंगल सुपर फासफेट दें। पहली सिंचाई एक माह बाद करें तथा बाद में आधा बोरा यूरिया दो लाइनों के बीच दें। दूसरी व तीसरी सिंचाई एक माह के अंतर की जा सकती है। देसी किस्म की लहसुन की करें बुवाई लहसुन की देसी किस्म की साफ 200-300 किलोग्राम फांके 6&4 इंच दूरी पर अक्टूबर माह में लगाएं। खेत तैयार करते समय 20 टन कम्पोस्ट, आधा बोरा यूरिया, 1 बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1 बोरा म्युरेट आफ पोटाश दें। शेष आधा बोरा यूरिया नवंबर माह में लहसुन की लाइनों के बीच डालें। पपीते को तना गलन रोग से बचाएं पपीते को तन्ना गलन रोग से बचाने के लिए खेत में पानी जमा नहीं रहने दें। रोग फैलने पर 2 ग्राम केप्टाळून प्रति लीटर पानी में घोल कर 17 दिन बाद छिडक़ाव करें। नींबू में रोगग्रस्त टहनियां काट दें फिर 0.3 प्रतिशत कॉपर-आक्सीक्लोराईड स्प्रे करें। डहलिया लगाएं, गुलाब की देखभाल करें- इस माह डहलिया को गमलों में लगाया जा सकता है। इस मौसम में इसे लगाने पर इसकी बढ़वार अच्छी होती है। गुलदाऊदी पर जल्दी आई कलियों को तोड़ देना चाहिए। इससे फूल बड़े आकार के आते हैं। गुलाब के पौधे की कांट-छांट व गुड़ाई करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर 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चने की खेती : चने की ये किस्में कम पानी में देगी बंपर पैदावार

चने की खेती : चने की ये किस्में कम पानी में देगी बंपर पैदावार

जानें, चने की नई किस्मों के बारें में और रखें कुछ सावधानियां तो होगा भरपूर मुनाफा भारत में रबी की फसल में चना की फसल का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इसकी बाजार में मांग हमेशा बनी रहती है। अन्य फसलों की अपेक्षा इसके बाजार में भाव भी अच्छे मिलते हैं। यदि इसकी उन्नत किस्म का चयन किया जाए तो इसका अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसकी फसल में इसके दाने के आकार का बड़ा महत्व होता है। दानों के आकार के आधार पर ही इसके बाजार में भाव निर्धारित किए जाते हैं। बाजार में मोटे दाने के चने की मांग काफी रहती है। इसलिए किसान भाइयों को इसकी खेती करते समय चने की उन उन्नत किस्मों का चुनाव करना चाहिए जो मोटा दाना देती हो। इसी के साथ ही इसकी खेती में कुछ सावधानियां रखी जाएं तो इसका बंपर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मोटा दाना देने वाली चने की उन्नत किस्म- जीएनजी- 1958 यह चने की मोटा दाना देने वाली उन्नत किस्म है जिसे मरूधर नाम से भी जाना जाता है। इसके 100 दानों का वजन 26 ग्राम होता है। यह किस्म श्रीगंगानगर अनुसंधान केंद्र के दलहन वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है। इसका दाना अन्य किस्मों की अपेक्षा सबसे बड़ा होता है। यह किस्म राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब सहित अन्य राज्यों के लिए उपयुक्त पाई गई है। चने की फसल में जीएनजी- 1958 किस्म की प्रमुख विशेषताएं इस किस्म के चने के पौधे की लंबाई अन्य चने के पौधों से अधिक होती है। इसके पत्ते लंबे होते हैं। चने की इस किस्म के लिए सिर्फ एक सिंचाई की आवश्यकता होती है जिससे पानी की बचत होती है। रेतीली भूमि में यह किस्म में दो सिंचाई में पक कर तैयार हो जाती है। देशी चनों में साम्रट और मरूधर का आकार बड़ा होता है। सम्राट चने के 100 दानों को वनज 24 ग्राम होता है। वहीं मरूधर के 100 चनों को वजन 26 ग्राम होता है। इस किस्म से एक सिंचाई या मावठ में इसकी अच्छी पैदावार हो जाती है। इस किस्म में कीटों का प्रकोप कम होता है। जिससे उत्पादन लागत में कमी आती है। इस किस्म का दाना भूरा किस्म का होता है। जो 120 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। प्रति हेक्टेयर इससे 18 से 24 क्विंटल की उपज प्राप्त होती है। प्राप्ति स्थान इस किस्म को आप श्री गंगानगर आनुसंधान केंद्र से प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए संपर्क सूत्र - 0154-2440619 है। आईसीएआर द्वारा विकसित चने की दो नई उन्नत किस्में / चने की उन्नत किस्में सरकारी अनुसंधान संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद आईसीएआर ने चने की दो उन्नत किस्में विकसित की हैं। ये उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित छह राज्यों में खेती के लिए उपयुक्त बताई जा रही हैं। आईसीएआर और कर्नाटक के रायचूर स्थित कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय ने इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रापिक्स के साथ मिल कर जिनोम-हस्तक्षेप के माध्यम से पूसा चिकपी 10216 और सुपर एन्नीगेरी 1 किस्म के चने के बीज चने के बीज विकसित किए हैं। चने की इन किस्मों से आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को किसानों को फायदा होगा। आईसीएआर के एक अधिकारी के अनुसार इन दो किस्मों की जानकारी मीडिया को दी गई हैं उसके अनुसार इन किस्मों की विशेषताएं इस प्रकार से हैं। पूसा चिकपी 10216 की विशेषताएं पूसा चिकपी 10216 सूखे क्षेत्रों में भी अच्छी उपज दे सकती है। इसकी औसत पैदावार 1,447 किलो प्रति हेक्टेयर है। देश के मध्य के इलाकों नमी की कम उपलब्धता की स्थिति में यह पूसा 372 से करीब 11.9 फीसदी अधिक पैदावार देती है। यह किस्म 110 दिन में तैयार हो जाती है और इसके 100 बीजों का वजन लगभग 22.2 ग्राम होता है। यह किस्म फुसैरियम विल्ट और स्टंट रोगों के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है। यह किस्म मध्य प्रदेश, महाराट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए अच्छा उपयुक्त है। सुपर एन्नीगेरी 1 की विशेषताएं सुपर एन्नीगेरी-1 किस्म 95-110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज 1,898 किलो प्रति हेक्टेयर है। यह आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के लिए उपयुक्त पाई गई है। प्राप्ति स्थान सरकारी अनुसंधान संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) कार्यालय- कृषि भवन, डॉ. राजेंद्र प्रसाद रोड, नई दिल्ली- 110001 चने की अन्य उन्नत किस्में चने की अन्य उन्नत किस्मों में पूसा-256, केडब्लूआर-108, डीसीपी 92-3, केडीजी-1168, जेपी-14, जीएनजी-1581, पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए गुजरात चना-4, मैदानी क्षेत्रों के लिए के-850, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए आधार (आरएसजी-936), डब्लूसीजी-1, डब्लूसीजी-2 और बुन्देलखंड के लिए संस्तुत प्रजातियों राधे व जे.जी-16 और काबुली चना की पूरे उत्तर प्रदेश के लिए संस्तुत प्रजाति एचके-94-134 पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए पूसा-1003, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए चमत्कार (वीजी-1053) और बुन्देलखण्ड के लिए संस्तुत जीएनजी-1985, उज्जवल व शुभ्रा प्रजातियों की बुवाई की जा सकती है। चने की खेती ( gram cultivation ) में ध्यान रखने वाली बातें / चने की उन्नत खेती चने की खेती के लिए जल निकास वाली उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिए। इसकी खेती हल्की व भारी दोनों प्रकार की भूमि में की जा सकती हैं। मध्यम व भारी मिट्टी के खेतों में गर्मी में एक-दो जुताई करना अच्छा रहता है। मानसून के अंत में व बुवाई से पहले अधिक गहरी जुताई नहीं करनी चाहिए। मिट्टी की जांच के हिसाब से ही उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। मिट्टी की उर्वरा शक्ति के लिए असिंचित क्षेत्रों में 10 किलो नाइट्रोजन और 25 किलो फास्फोरस और सिंचित क्षेत्र में बुवाई से पहले 20 किलो नाइट्रोजन और 40 फास्फोरस प्रति हेक्टेयर 12-15 सेमी की गहराई पर आखिरी जुताई के समय डालना चाहिए। दीमक के प्रकोप से बचाव के लिए क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मैलाथियान 4 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से आखिरी जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए। जड़ गलन व उकटा रोग की रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 0.75 ग्राम और थाइरम एक ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज को उपचारित करना चाहिए। जहां पर दीमक का प्रकोप हो वहां 100 किलो बीज में 800 मि.ली. लीटर क्लोरोपायरिफोस 20 ई.सी. मिलाकर बीज को उपचारित करना चाहिए। बीजों का राइजोबिया कल्चर और पीएसबी कल्चर से उपचार करने के बाद ही बोना चाहिए। जिन खेतों में विल्ट का प्रकोप अधिक होता हैं वहां गहरी व देरी से बुवाई करना लाभप्रद रहता हैं। धान/ज्वार उगाए जाने वाले क्षेत्रों में दिसंबर तक चने की बुवाई कर सकते हैं। पहली सिंचाई आवश्यकता अनुसार बुवाई के 45-60 दिन बाद फूल आने से पहले और दूसरी फलियों में दाना बनते समय की जानी चाहिए। यदि जाड़े की वर्षा हो जाए तो दूसरी सिंचाई नहीं करें। फूल आते समय कभी सिंचाई नहीं करनी चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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