• Home
  • News
  • Agriculture News
  • कपास की खेती : बुवाई का समय शुरू, अतिरिक्त लाभ के लिए करें सहफसली खेती

कपास की खेती : बुवाई का समय शुरू, अतिरिक्त लाभ के लिए करें सहफसली खेती

कपास की खेती : बुवाई का समय शुरू, अतिरिक्त लाभ के लिए करें सहफसली खेती

05 May, 2020

 खेतों में सफेद सोना बोएं, भारी लाभ कमाएं

ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का स्वागत है। किसान भाइयों, आज हम बात करते हैं कपास की उन्नत खेती की। कपास भारत में महत्वपूर्ण कृषि उपज में से एक है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है। पहले नंबर पर चीन आता है। प्राकृतिक रेशा प्रदान करने वाली कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण रेशेवाली नकदी फसल है। जिसका देश की औद्योगिक व कृषि अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान है। विश्व में निरंतर बढ़ती खपत और विविध उपयोग के कारण कपास की फसल को सफेद सोने के नाम से जाना जाता है। किसान भाइयों मई माह में बुवाई का उचित समय शुरू हो चुका है। कपास की खेती सिंचित और असिंचित क्षेत्र दोनों में की जा सकती है। किसान भाई कपास के साथ सहफसली खेती करके अतिरिक्त लाभ कमा सकते हैं।

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1

 

कपास की खेती के लिए मौसम/ जलवायु

यदि पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध हैं तो कपास की फसल को मई माह में ही लगाया जा सकता है। सिंचाई की पर्याप्त उपलब्धता न होने पर मानसून की उपयुक्त वर्षा होते ही कपास की फसल लगा सकते हैं। कपास की उत्तम फसल के लिए आदर्श जलवायु का होना आवश्यक है। फसल के उगने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेंटीग्रेट और अंकुरण के लिए आदर्श तापमान 32 से 34 डिग्री सेंटीग्रेट होना उचित है। इसकी बढ़वार के लिए 21 से 27 डिग्री तापमान चाहिए। फलन लगते समय दिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तथा रातें ठंडी होनी चाहिए। कपास के लिए कम से कम 50 सेंटीमीटर वर्षा का होना आवश्यक है। 125 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा का होना हानिकारक होता है।

 

 

कपास की खेती के लिए भूमि का चुनाव

कपास के लिए अच्छी जलधारण और जल निकास क्षमता वाली भूमि होनी चाहिए। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है, वहां इसकी खेती अधिक जल-धारण क्षमता वाली मटियार भूमि में की जाती है। जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हों वहां बलुई एवं बलुई दोमट मिटटी में इसकी खेती की जा सकती है। यह हल्की अम्लीय एवं क्षारीय भूमि में उगाई जा सकती है। इसके लिए उपयुक्त पी एच मान 5.5 से 6.0 है। हालांकि इसकी खेती 8.5 पी एच मान तक वाली भूमि में भी की जा सकती है।

 

कपास की उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी

उत्तरी भारत में कपास की खेती मुख्यत: सिंचाई आधारित होती है। इन क्षेत्रों में खेत की तैयारी के लिए एक सिंचाई कर 1 से 2 गहरी जुताई करनी चाहिए एवं इसके बाद 3 से 4 हल्की जुताई कर, पाटा लगाकर बुवाई करनी चाहिए। कपास का खेत तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि खेत पूर्णतया समतल हो ताकि मिट्टी की जलधारण एवं जलनिकास क्षमता दोनों अच्छे हों। यदि खेतों में खरपतवारों की ज्यादा समस्या न हो तो बिना जुताई या न्यूनतम जुताई से भी कपास की खेती की जा सकती है।
दक्षिण व मध्य भारत में कपास वर्षा-आधारित काली भूमि में उगाई जाती है। इन क्षेत्रों में खेत तैयार करने के लिए एक गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से रबी फसल की कटाई के बाद करनी चाहिए, जिसमें खरपतवार नष्ट हो जाते हैं और वर्षा जल का संचय अधिक होता है। इसके बाद 3 से 4 बार हैरो चलाना काफी होता है। बुवाई से पहले खेत में पाटा लगाते हैं, ताकि खेत समतल हो जाए।

 

यह भी पढ़ें : सूरजमुखी की खेती : बीज और तेल बेचने से डबल मुनाफा

 

कपास की उन्नत किस्में 

देश में वर्तमान में बी.टी. कपास अधिक प्रचलित है। जिसकी किस्मों का चुनाव किसान भाई अपने क्षेत्र व परिस्थिति के अनुसार कर सकते हैं। लेकिन कुछ प्रमुख नरमा, देशी और संकर कपास की अनुमोदित किस्में क्षेत्रवार विवरण नीचे दिया गया है।
उत्तरी क्षेत्र के लिए अनुमोदित किस्में
 

उत्तरी क्षेत्र के लिए अनुमोदित किस्में

राज्य नरमा (अमरीकन) कपास देशी कपास संकर कपास
पंजाब एफ- 286, एल एस- 886, एफ- 414, एफ- 846, एफ- 1861, एल एच- 1556, पूसा- 8-6, एफ- 1378 एल डी- 230, एल डी- 327, एल डी- 491, पी एयू- 626, मोती, एल डी- 694 फतेह, एल डी एच- 11, एल एच एच- 144
हरियाणा एच- 1117, एच एस- 45, एच एस- 6, एच- 1098, पूसा 8-6 डी एस- 1, डी एस- 5, एच- 107, एच डी- 123 धनलक्ष्मी, एच एच एच- 223, सी एस ए ए- 2, उमा शंकर
राजस्थान गंगानगर अगेती, बीकानेरी नरमा, आर एस- 875, पूसा 8 व 6, आर एस- 2013 आर जी- 8 राज एच एच- 116 (मरू विकास)
पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास लोहित यामली ---

 

मध्य क्षेत्र हेतु अनुमोदित किस्में-

राज्य नरमा (अमेरिकन) कपास देशी संकर
मध्य प्रदेश कंडवा- 3, के सी- 94-2 माल्जरी जे के एच वाई 1, जे के एच वाई 2
महाराष्ट्र पी के वी- 081, एल आर के- 516, सी एन एच- 36, रजत पी ए- 183, ए के ए- 4, रोहिणी एन एच एच- 44, एच एच वी- 12
गुजरात गुजरात कॉटन- 12, गुजरात कॉटन- 14, गुजरात कॉटन- 16, एल आर के- 516, सी एन एच- 36 गुजरात कॉटन 15, गुजरात कॉटन 11 एच- 8, डी एच- 7, एच- 10, डी एच- 5

 

दक्षिण क्षेत्र हेतु अनुमोदित किस्में-

राज्य नरमा (अमेरिकन) कपास देशी संकर
आंध्र प्रदेश एल आर ए- 5166, एल ए- 920, कंचन श्रीसाईंलम महानदी, एन ए- 1315 सविता, एच बी- 224
कर्नाटक शारदा, जे के- 119, अबदीता जी- 22, ए के- 235 डी सी एच- 32, डी एच बी- 105, डी डी एच- 2, डी डी एच- 11
तमिलनाडु एम सी यू- 5, एम सी यू- 7, एम सी यू- 9, सुरभि के- 10, के- 11 सविता, सूर्या, एच बी- 224, आर सी एच- 2, डी सी एच- 32

 

अन्य प्रमुख प्रजातियां : पिछले 10 से 12 वर्षों में बी टी कपास की कई किस्में भारत के सभी क्षेत्रों में उगाई जाने लगी हैं। जिनमें मुख्य किस्में इस प्रकार से हैं, जैसे- आर सी एच- 308, आर सी एच- 314, आर सी एच- 134, आर सी एच- 317, एम आर सी- 6301, एम आर सी- 6304 आदि है।

कपास की उन्नत खेती में बीज की मात्रा

संकर तथा बी.टी. के लिए चार किलो प्रमाणित बीज प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए. देशी और नरमा किस्मों की बुवाई के लिए 12 से 16 किलोग्राम प्रमाणित बीज प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें. बीज लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर डालें.

 

कपास की उन्नत खेती में बीजोपचार

  • कपास के बीज में छुपी हुई गुलाबी सुंडी को नष्ट करने के लिए बीजों को धूमित करना चाहिए। 40 किलोग्राम तक बीज को धूमित करने के लिए एल्यूमीनियम फॉस्फॉइड की एक गोली बीज में डालकर उसे हवा रोधी बनाकर चौबीस घंटे तक बंद रखें। धूमित करना संभव न हो तो तेज धूप में बीजों को पतली तह के रूप में फैलाकर 6 घंटे तक तपने देवें।
  • बीज जनित रोग से बचने के लिये बीज को 10 लीटर पानी में एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या ढाई ग्राम एग्रीमाइसिन के घोल में 8 से 10 घंटे तक भिगोकर सुखा लीजिये इसके बाद बोने के काम में लेवें।
  • जहां पर जड़ गलन रोग का प्रकोप होता है, ट्राइकोड़मा हारजेनियम या सूडोमोनास फ्लूरोसेन्स जीव नियंत्रक से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें या रासायनिक फफूंदनाशी जैसे कार्बोक्सिन 70 डब्ल्यू पी, 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या कार्बेन्डेजिम 50 डब्ल्यू पी से 2 ग्राम या थाईरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  • बीजों से रेशे हटाने के लिएं जहां संभव हो, 10 किलोग्राम बीज के लिए एक लीटर व्यापारिक गंधक का तेजाब पर्याप्त होता है। मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में बीज डालकर तेजाब डालिए तथा एक दो मिनट तक लकड़ी से हिलाइए। बीज काला पड़ते ही तुरंत बीज को बहते हुए पानी में धो डालिएं एवं ऊपर तैरते हुए बीज को अलग कर दीजिए। गंधक के तेजाब से बीज के उपचार से अंकुरण अच्छा होगा। यह उपचार कर लेने पर बीज को प्रधूमन की आवश्यकता नहीं रहेगी।
  • रेशे रहित एक किलोग्राम नरमे के बीज को 5 ग्राम इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू एस या 4 ग्राम थायोमिथोक्साम 70 डब्ल्यू एस से उपचारित कर पत्ती रस चूसक हानिकारक कीट और पत्ती मरोड़ वायरस को कम किया जा सकता है।
  • असिंचित स्थितियों में कपास की बुवाई के लिये प्रति किलोग्राम बीज को 10 ग्राम एजेक्टोबेक्टर कल्चर से उपचारित कर बोने से पैदावार में वृद्धि होती है।

 

कपास की खेती में बुवाई की विधि

  • बी टी कपास की बुवाई बीज रोपकर (डिबलिंग) 108 & 60 सेंटीमीटर अर्थात 108 सेंटीमीटर कतार से कतार और पौधे से पौधे 60 सेंटीमीटर या 67.5 & 90 सेंटीमीटर की दूरी पर करें।
  • अमेरिकन किस्मों की कतार से कतार की दूरी 60 सेन्टीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेन्टीमीटर रखनी चाहिए।
  • देशी किस्मों में कतार से कतार की दूरी 45 सेन्टीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेन्टीमीटर रखनी चाहिए।
  • पौलीथीन की थैलियों में पौध तैयार कर रिक्तस्थानों पर रोपकर वांछित पौधों की संख्या बनाये रख सकते हैं।
  • लवणीय भूमि में यदि कपास बोई जाये तो मेड़े बनाकर मेड़ों की ढाल पर बीज उगाना चाहिए।

 

कपास की उन्नत खेती में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

  • बुवाई से तीन चार सप्ताह पहले 25 से 30 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से जुताई कर भूमि में अच्छी तरह मिलानी चाहिए।
  • अमेरिकन और बीटी किस्मों में प्रति हैक्टेयर 75 किलोग्राम नत्रजन तथा 35 किलोग्राम फास्फोरस व देशी किस्मों को प्रति हैक्टेयर 50 किलोग्राम नत्रजन और 25 किलो फास्फोरस की आवश्यकता होती है।
  • पोटाश उर्वरक मिट्टी परीक्षण के आधार पर देवें, फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई से पहले देवें। नत्रजन की शेष आधी मात्रा फूलों की कलियां बनते समय देवें।

 

कपास की खेती में सिंचाई प्रबंधन

  • बुवाई के बाद 5 से 6 सिंचाई करें, उर्वरक देने के बाद एवं फूल आते समय सिंचाई अवश्य करें। 
  • दो फसली क्षेत्र में 15 अक्टूबर के बाद सिंचाई नहीं करें।
  • अंकुरण के बाद पहली सिंचाई 20 से 30 दिन में कीजिए। इससे पौधों की जडं़े ज्यादा गहराई तक बढ़ती है। इसी समय पौधों की छंटनी भी कर दीजिये। बाद की सिंचाईयां 20 से 25 दिन बाद करें।
  • नरमा या बीटी की प्रत्येक कतार में ड्रिप लाइन डालने की बजाय कतारों के जोड़े में ड्रिप लाइन डालने से ड्रिप लाइन का खर्च आधा होता है।
  • इसमें पौधे से पौधे की दूरी 60 सेंटीमीटर रखते हुए जोडे में कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर रखें और जोडे से जोडे की दूरी 120 सेंटीमीटर रखें। प्रत्येक जोडे में एक ड्रिप लाईन डाले तथा ड्रिप लाईन में ड्रिपर से ड्रिपर की दूरी 30 सेंटीमीटर हो और प्रत्येक ड्रिपर से पानी रिसने की दर 2 लीटर प्रति घण्टा हो।
  • सूखे में बिजाई करने के बाद लगातार 5 दिन तक 2 घण्टे प्रति दिन के हिसाब से ड्रिप लाईन चला देवें। इससे उगाव अच्छा होता है और बुवाई के 15 दिन बाद बून्द-बून्द सिंचाई प्रारम्भ करें।
  • बूंद-बूंद सिंचाई का समय संकर नरमा की सारणी के अनुसार ही रखे, वर्षा होने पर वर्षा की मात्रा के अनुसार सिंचाई उचित समय के लिये बंद कर दें। पानी एक दिन के अन्तराल पर लगावें।
  • दस मीटर क्यारी की चौड़ाई और 97.50 प्रतिशत कट ऑफ रेशियो पर अधिकतम उपज ली जा सकती है।
  • बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति से सिफारिश किए गए नत्रजन की मात्रा 6 बराबर भागों में दो सप्ताह के अन्तराल पर ड्रिप संयंत्र द्वारा देने से सतही सिंचाई की तुलना में ज्यादा उपयुक्त पायी गयी है।
  • इस पद्धति से पैदावार बढऩे के साथ-साथ सिंचाई जल की बचत, रूई की गुणवत्ता में बढ़ौतरी और कीड़ों के प्रकोप में भी कमी होती है।

 

यह भी पढ़ें : बाजार हस्तक्षेप योजना : फल-सब्जियों की बिक्री में नहीं होगा नुकसान, मिलेंगे अच्छे दाम

 

कपास की फसल में निराई-गुड़ाई

  • निराई-गुड़ाई सामान्यत: पहली सिंचाई के बाद बतर आने पर कसौले से करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकतानुसार एक या दो बार त्रिफाली चलाएं।
  • रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालीन 30 ई सी, 833 मिलीलीटर (बीजों की बुवाई के बाद मगर अंकुरण से पहले) या ट्राइलूरालीन 48 ई सी, 780 मिलीलीटर (बीजाई से पूर्व मिट्टी पर छिडक़ाव) को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से लेट फेन नोजल से उपचार करने से फसल प्रारम्भिक अवस्था में खरपतवार विहीन रहती है। इनका प्रयोग बिजाई से पूर्व मिट्टी पर छिडक़ाव भली-भांति मिलाकर करें।
  • प्रथम सिंचाई के बाद कसोले से एक बार गुड़ाई करना लाभदायक रहता है। यदि फसल में बोई किस्म के अलावा दूसरी किस्म के पौधे मिले हुए दिखाई दें तो उन्हें निराई के समय उखाड़ दीजिए क्योंकि मिश्रित कपास का मूल्य कम मिलता है।

 

कपास की खेती में फूल और टिंडों को गिरने से बचाना

स्वत: गिरने वाली पुष्प कलियों और टिंडों को बचाने के लिए एन ए ए 20 पी पी एम (2 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का घोल बनाकर पहला छिडक़ाव कलियां बनते समय एवं दूसरा टिंडों के बनना शुरू होते ही करना चाहिए। नरमा कपास की फसल में पूर्ण विकसित टिंडे खिलाने हेतु 50 से 60 प्रतिशत टिंडे खिलने पर 50 ग्राम ड्राप अल्ट्रा (थायाडायाजुरोन) को 150 लीटर पानी में घोल कर प्रति बीघा की दर से छिडक़ाव करने के 15 दिन के अन्दर करीब-करीब पूर्ण विकसित सभी टिंडे खिल जाते हैं। ड्राप अल्ट्रा का प्रयोग करने का उपयुक्त समय 20 अक्टूबर से 15 नवंबर है। इसके प्रयोग से कपास की पैदावार में वृद्धि पाई गई है। गेहूं की बिजाई भी समय पर की जा सकती है।

कपास की चुनाई

कपास में टिंडे पूरे खिल जाये तब उनकी चुनाई करना चाहिए। प्रथम चुनाई 50 से 60 प्रतिशत टिंडे खिलने पर शुरू करें और दूसरी शेष टिंडों के खिलने पर करें।
 

पैदावार

उपरोक्त उन्नत विधि से खेती करने पर देशी कपास की 20 से 25, संकर कपास की 25 से 32 और बी टी कपास की 30 से 50 क्विण्टल प्रति हैक्टेयर पैदावार ली जा सकती है।

 

 

कपास की खेती में अतिरिक्त लाभ के लिए सहफसली खेती

किसान भाई कपास की फसल के साथ सह फसली खेती करके अतिरिक्त लाभ अर्जित कर सकते हैं। कपास एक लंबी अवधि वाली फसल है और प्रारंभिक अवस्था में इसके पौधों में बढ़वार की धीमी गति से होती है। इसके अलावा कपास की  पंक्तियों के मध्य खाली स्थान भी अधिक होता है। कपास की दो पंक्तियों के मध्य मूंग,उड़द, मूंगफली, सोयाबीन आदि फसलों की बुवाई कर अतिरिक्त मुनाफा अर्जित किया जा सकता है।  सहफसली खेती से कपास में खरपतवार, कीट रोग का प्रकोप भी कम होता है।  कपास के साथ दलहनी फसलों की सह फसली खेती भूमि की उर्वरा शक्ति में इजाफा करने और नमीं सरंक्षण में सहायक होती है।

 

सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।
 

Top Agriculture News

किसान संगठित होकर बनाएं एफपीओ, सरकार से मिलेगी 15 लाख की मदद

किसान संगठित होकर बनाएं एफपीओ, सरकार से मिलेगी 15 लाख की मदद

जानें, क्या है एफपीओ और उसकी शर्तें और नियम केंद्र सरकार के निर्देशानुसार प्रत्येक राज्य में एफपीओ यानि किसान उत्पादक संगठन बनाए जा रहे हैं। मोदी सरकार की मंशा के अनुसार साल 2024 तक देश में करीब 10 हजार एफपीओ जाने प्रस्तावित हैं। बता दें कि केंद्र सरकार ने अच्छे रेटिंग वाले प्रत्येक एफपीओ को तीन साल में 15-15 लाख रुपए की मदद देने का ऐलान किया हुआ है। इस दिशा में हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा दिया गया टारगेट पूरा करते हुए राज्य में 500 एफपीओ बनाए हैं। इस संबंध में प्रदेश के कृषि मंत्री जेपी दलाल ने मीडिया को बताया कि एफपीओ एक ऐसी व्यवस्था है जो किसानों से फल, सब्जी, फूल, मछली व बागवानी से संबंधित फसलों को खरीदकर सीधे कंपनियों को बेचा जाता है। इसमें किसान जुड़े होते हैं और उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है। इन एफपीओ से अब तक प्रदेश के लगभग 80,000 किसान जुडक़र लाभ प्राप्त कर रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा एफपीओ का ग्रेडेशन करने का कार्य भी शुरू कर दिया गया है। अब शानदार कार्य करने वाले एफपीओ को स्टार रेटिंग भी दी जाएगी। प्रदेश के 90 एफपीओ ऐसे हैं जिन्होंने अपने कार्यालय भी स्थापित कर लिए हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या है एफपीओ / किसान उत्पादक समूह ? किसान उत्पादक संगठन, असल में यह किसानों का एक समूह होता है, जो वास्तव में कृषि उत्पादन कार्य में लगा हो और कृषि व्यावसायिक गतिविधियां चलाने में एक जैसी धारणा रखते हो, एक गांव या फिर कई गांवों के किसान मिलकर भी यह समूह बना सकते हैं। यह समूह बनाकर संगत कंपनी अधिनियम के तहत एक किसान उत्पादक कंपनी के तौर पर पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के माध्यम से जहां किसान को अपनी पैदावार के सही दाम मिलते हैं, वहीं खरीदार को भी उचित कीमत पर वस्तु मिलती है। वहीं यदि अकेला उत्पादक अपनी पैदावार बेचने जाता है, तो उसका मुनाफा बिचौलियों को मिलता है। एफपीओ सिस्टम में किसान को उसके उत्पाद के भाव अच्छे मिलते हैं, उत्पाद की बर्बादी कम होती है, अलग-अलग लोगों के अनुभवों का फायदा मिलता है। यह शर्तें पूरी करने पर मिलेगी 15 लाख रुपए की सहायता मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य विनोद आनंद ने बताया कि सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने एफपीओ बनाने के लिए जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. वाईके अलघ के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी। इसके तहत कम से 11 किसान संगठित होकर अपनी एग्रीकल्चर कंपनी या संगठन बना सकते हैं। अगर संगठन मैदानी क्षेत्र में काम कर रहा है तो कम से कम 300 किसान उससे जुड़े होने चाहिए। यानी एक बोर्ड मेंबर पर कम से कम 30 लोग सामान्य सदस्य होना जरूरी है। पहले यह संख्या 1000 थी। वहीं पहाड़ी क्षेत्र में एक कंपनी के साथ 100 किसानों का जुडऩा जरूरी है। उन्हें कंपनी का फायदा मिल रहा हो। नाबार्ड कंस्ल्टेंसी सर्विसेज आपकी कंपनी का काम देखकर रेटिंग करेगी, उसके आधार पर ही ग्रांट मिलेगी। इसके अलावा बिजनेस प्लान देखा जाएगा कि कंपनी किस किसानों को फायदा दे पा रही है। वो किसानों के उत्पाद का मार्केट उपलब्ध करवा पा रही है या नहीं। कंपनी का गवर्नेंस कैसा है। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर कागजी हैं या वो काम कर रहे हैं। वो किसानों की बाजार में पहुंच आसान बनाने के लिए काम कर रहा है या नहीं। अगर कोई कंपनी अपने से जुड़े किसानों की जरूरत की चीजें जैसे बीज, खाद और दवाइयों आदि की कलेक्टिव खरीद कर रही है तो उसकी रेटिंग अच्छी हो सकती है। क्योंकि ऐसा करने पर किसान को सस्ता सामान मिलेगा। एफपीओ से किसानों को क्या होगा लाभ यह एक सशक्तिशील संगठन होने के कारण एफपीओ के सदस्य के रूप में किसानों को बेहतर सौदेबाजी करने की शक्ति देगी जिसे उन्हें जिंसों को प्रतिस्पर्धा मूल्यों पर खरीदने या बेचने का उचित लाभ मिल सकेगा। बेहतर विपणन सुअवसरों के लिए कृषि उत्पादों का एकत्रीकरण। बहुलता में व्यापार करने से प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन इत्यादि मदों में होने वाले संयुक्तखर्चों से किसानों को बचत होगी। एफपीओ मूल्य संवर्धन के लिए छंटाई/ग्रेडिंग, पैकिंग, प्राथमिक प्रसंस्करण इत्यादि जैसे गतिविधियां शुरू कर सकता है जिससे किसानों के उत्पादन को उच्चतर मूल्य मिल सकता है। एफपीओ के गठन से ग्रीन हाउस, कृषि मशीनीकरण, शीत भंडारण, कृषि प्रसंस्करण इत्यादि जैसे कटाई पूर्व और कटाई बाद संसाधनों के उपयोग में सुविधा रहेगी। एफपीओ आदान भंडारों, कस्टम केन्द्रों इत्यादि को शुरू कर अपनी व्यवसायिक गतिविधियों को विस्तारित कर सकते हैं। जिससे इसके सदस्य किसान आदानों और सेवाओं का उपयोग रियायती दरों पर ले सकते हैं। एफपीओ किसान उत्पादक संगठन के गठन के लिए कहां से मिलेगी मदद एफपीओ का गठन और बढ़ावा देने के लिए आप तीन संस्थाओं से मदद ले सकते हैं। इनमें लघु कृषक कृषि व्यापार संघ, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक व राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम शामिल हैं। एफपीओ गठित करने के इच्छुक किसानों को विस्तृत जानकारी के लिए संबंधित विभाग/ लघु कृषक कृषि व्यवसाय संगठन के निदेशक ( ई- मेल: [email protected]) से संपर्क कर सकते हैं। एफपीओ के लिए कैसे करा सकते हैं ऑनलाइन पंजीकरण / किसान उत्पादक संगठन पंजीकरण पंजीकरण के लिए सबसे पहले http://www.upagriculture.com पर जाएं और पंजीकरण लिंक पर क्लिक करें। एक नया पेज खुलेगा जिसमें आपको ऑनलाइन पंजीकरण लिंक पर क्लिक करें। अब आपके सामने एक फार्म खुलेगा, जिसमें मांगी गई सभी जानकारी भरें। सभी जानकारी पूरी तरह भरने के बाद सबमिट बटन पर क्लिक कर दें। इस प्रकार आपका पंजीकरण हो जाएगा। यदि आप अपनी रिपोर्ट देखना चाहते है तो पंजीकरण रिपोर्ट लिंक पर क्लिक कर देख सकते है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सौंफ की खेती : रबी सीजन में सौंफ की ये किस्में देगी भरपूर मुनाफा

सौंफ की खेती : रबी सीजन में सौंफ की ये किस्में देगी भरपूर मुनाफा

जानें, सौंफ की उन्नत खेती का तरीका और रखें इन बातों का ध्यान मसाला फसलों में सौंफ का अपना विशिष्ट स्थान है। ये अपनी खुशबू के कारण लोकप्रिय होने के साथ ही औषधी के रूप में भी पहचानी जाती है। इसका सब्जियों में प्रयोग होने के साथ ही आचार बनाने में भी किया जाता है। यदि इसके औषधीय महत्व की बात करें तो इसे कई रोगों में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में सौंफ को त्रिदोष नाशक बनाया गया है। यानि ये वात, पित्त, कफ इन त्रिदोषों को खतम करने में सक्षम है। इसका किसी भी रूप में सेवन शरीर को लाभ ही पहुंचाता है। पर याद रखें इसका आवश्यकता से अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। इसकी खेती भारत में मुख्यत: राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, गुजरात, हरियाणा व कर्नाटक राज्य में की जाती है। यदि व्यवसायिक स्तर पर इसकी खेती की जाए तो काफी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। आइए जानते हैं सौंफ की कौन-कौनसी किस्म की खेती करना अधिक लाभप्रद रहेगा और साथ ही किसान भाई इसकी खेती में क्या-क्या सावधानियां बरते कि उन्हें अधिक बेहतर उत्पादन होने के साथ ही अधिक मुनाफा मिल सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सौंफ की उन्नत किस्में और उसकी विशेषताएं गुजरात सौंफ 1 सौंफ की यह किस्म मसाला अनुसंधान केन्द्र, जगुदन (गुजरात) द्वारा विकसित की गई है। यह किस्म शुष्क परिस्थिति के लिए उपयुक्त है। यह किस्म किस्म 200 से 230 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी 16.95 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.60 प्रतिशत होती है। गुजरात सौंफ-2 सौंफ की इस किस्म को मसाला अनुसंधान केन्द्र जगुदन, गुजरात द्वारा विकसित किया गया हैं। यह किस्म सिंचित तथा असिंचित दोनों परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 19.4 किंवटल प्रति हैक्टर हैं। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 2.4 प्रतिशत होती हैं। गुजरात सौंफ 11 सौंफ की यह किस्म का विकास मसाला अनुसंधान केन्द्र, जगुदन (गुजरात) द्वारा किया गया है। यह किस्म सिंचित खेती के लिए उपयुक्त है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.8 प्रतिशत है। इसकी औसत पैदावार 24.8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है। आर एफ 125 इस सौंफ की किस्म का विकास राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के अधीन श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) द्वारा किया गया है। यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी उपज क्षमता 17.30 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक होती है। पी एफ 35 इस किस्म का विकास मसाला अनुसंधान केन्द्र, जगुदन (गुजरात) द्वारा किया गया है। सौंफ की यह किस्म 216 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी 16.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। यह किस्म झुलसा एवं गुंदिया रोग के प्रति मध्यम सहनशील है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.90 प्रतिशत होती है। आर एफ 105 इस सौंफ की किस्म का विकास राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के अधीन श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) द्वारा किया गया है। यह किस्म 150 से 160 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज क्षमता 15.50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। हिसार स्वरूप यह सौंफ की किस्म हरियाण कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई है। इसके दाने लंबे एवं मोटे होते हैं। इसकी औसत उपज 17 क्विंटल प्रति हैक्टर हैं। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा 1.6 प्रतिशत पायी जाती हैं। एन आर सी एस एस ए एफ 1 इस किस्म का विकास राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र, अजमेर द्वारा किया गया है। यह किस्म 180 से 190 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। यह किस्म सीधी बुवाई द्वारा 19 तथा पौध रोपण द्वारा 25 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज देती है। आर एफ 101 यह किस्म दोमट एवं काली कपास वाली भूमियों के लिये उपयुक्त है। यह 150 से 160 दिन में पक जाती है। इसकी औसत उपज क्षमता 15 से 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसमें वाष्पशील तेल की मात्रा भी अधिक (1.2 प्रतिशत) होती है। इस किस्म में रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता अधिक तथा तेला कीट कम लगता है। आर एफ 143 सौंफ की यह किस्म 140 से 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसमें वाष्पशील तेल अधिक (1.87 प्रतिशत) होता है। सौंफ की खेती में ध्यान रखने वाली महत्वपूर्ण बातें सौंफ की खेती खरीफ एवं रबी दोनों ही मौसम में की जा सकती है। लेकिन रबी का मौसम सौंफ की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। खरीफ में इसकी बुवाई जुलाई माह में तथा रबी के सीजन में इसकी बुवाई अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से लेकर नवंबर के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है। मसाला फसल संसोधन केंद्र जगुदन के अनुसार सौंफ की खेती करते समय 4 से 5 किलो /हेक्टेयर के हिसाब से बीज की बुवाई करनी चाहिए। बीजों को उपचारित करके ही बोना चाहिए क्योंकि सौंफ की फसल जिससे इसका अच्छा उत्पादन मिल सके। बीज को बुवाई पहले फफूंद नाशक दवा (कार्बेन्डाजिम अथवा केप्टान से प्रति 2.5 से 3 ग्राम /प्रति किलो बीज) से अलावा सौंफ के बीज को ट्राईकोडरमा (जैविक फफूंद नाशक प्रति 8 से 10 ग्राम/प्रति किलो बीज) से बीज को आठ घंटे उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए। कार्यक्षम सिंचाई हेतु टपक सिंचाई पद्धति का इस्तेमाल करना जरूरी है। सौंफ की रबी की फसल में टपक पद्धति द्वारा सिंचाई करने के लिए 90 से.मी के अन्तराल में दो लेटरल और 60 से.मी अन्तराल के दो इमिटर, लगभग 1.2 किलो / वर्ग मीटर के दबाव वाली एवं 4 लीटर प्रति घंटा पानी के डिस्चार्ज का इस्तेमाल करना चाहिए। खेत की तैयारी सौंफ की खेती के लिए खेत की तैयारी करते समय पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में 3 से 4 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके खेत को समतल बनाकर पाटा लगाते हुए एक सा बना ले। खेती की आखिरी के जुताई समय 150 से 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद मिला देनी चाहिए और पाटा फेर दे ताकि खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाए। बुवाई का तरीका सौंफ के बीजों की बुवाई लाइनों में करना चाहिए। इसकी दो तरीके से बुवाई की जाती है। पहली छिटककर तथा दूसरी लाइनों में रोपाई कर के की जाती है। लाइनों में रोपाई करने के तरीके में लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इसमें ध्यान देने वाली बात ये हैं कि जब इसकी पौध की रोपाई की जाती है तो 7 से 8 सप्ताह पहले रोपाई से पौध डालकर की जानी चाहिए। खाद एवं उर्वरक की मात्रा रबी में सौंफ की खेती करने वाले किसानों को सलाह दी जाती है की सौंफ की फसल के लिए खाद प्रबंधन में 90 किलो ग्राम नत्रजन, 40 किलो ग्राम फास्फोरस और 30 किलो ग्राम पोटास प्रति हेक्टेयर देना चहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फोस्फोरस एवं पोटास की संपूर्ण मात्रा बुवाई के समय ही खेत में मिला देना चाहिए। इसके बाद शेष नाइट्रोजन की मात्रा बुवाई के बाद 30 एवं 60 दिनों बाद ट्रैपड्रेसिंग के रूप में सिंचाई के साथ देना चाहिए। मसाला संसोधन केंद्र जगुदन के अनुसार नाइट्रोजन 90 किलो, फास्फोरस 30 किलो प्रति हेक्टेयर दिया जाना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटास की पूरी मात्रा बुवाई के समय एवं शेष नाइट्रोजन 30 एवं 60 दिवस के के अंतराल में देना चाहिए। सिंचाई व निराई - गुड़ाई सौंफ की फसल की सिंचाई के लिए टपक पद्धति अपनाई जा सकती है। इस पद्धति से पानी कम लगता है। इससे विधि से सिंचाई करने पर आवश्यक मात्रा में पानी पौधों तक पहुंच जाता है। इसकी पहली सिंचाई पौध रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। इसके अलावा बीज बनते तथा पकते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। अब बात करें इसकी निराई गुड़ाई की तो इसकी निराई गुड़ाई कार्य पहली सिंचाई के बाद शुरू कर देना चाहिए तथा 45 से 50 दिन बाद निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए, क्योंकि फसल बड़ी होने पर होने पर निराई-गुड़ाई करते समय पौधे टूटने का डर बना रहता है। कब करें फसल की कटाई सौंफ के अम्बेल जब पूरी तरह विकसित होकर और बीज पूरी तरह जब पककर सूख जावे तभी गुच्छों की कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद एक-दो दिन धूप में सुखा देना चाहिए तथा हरा रंग रखने के लिए 8 से 10 दिन छाया में सुखाना चाहिए जिससे इसमें अनावश्यक नमी जमा न हो। हरी सौंफ प्राप्त करने हेतु फसल में जब अम्बेल के फूल आने के 30 से 40 दिन में गुच्छों की कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद गुच्छों को छाया में ही अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

आलू के बीज (Potato seeds) : महंगे भावों के चलते किसानों ने दूसरी खेती करने का मन बनाया आलू के भावों में जोरदार तेजी ने स्टॉकिस्टों को मालामाल कर दिया है। कोल्ड स्टोरेज में आलू भरने वाले किसानों ने भी अच्छी कमाई की है लेकिन यह प्रतिशत बहुत कम है। आलू की तेजी ने किसानों के सामने आलू की नई फसल बोने को लेकर एक चुनौती खड़ी कर दी है। अब किसान असमंजस मेंं है कि महंगे भावों पर आलू के बीज खरीदकर बुवाई करें या ना करें। अगले साल नई फसल के दाम अच्छे मिलेंगे या नहीं। आपको बता दें कि आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडक़र सारे देश में आलू उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जो विश्व औसत से काफी कम है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 आलू की कीमतों में उछाल / आलू के भावों में तेजी आलू की अच्छी कीमतों के कारण इस बार भी किसानों ने ज्यादा खेती करने का मन बना रखा है लेकिन आलू के बीज के भाव किसानों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। खुले बाजार में आलू का बीज 60 रुपए किलो तक मिल रहा है। वहीं सरकार कोल्ड स्टोरों में ३२ रुपए किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। आलू बीजों की ज्याद कीमत की वजह से किसानों ने इस बार फसल बदलने का मन बना लिया है। इससे आलू की फसल का रकबा घटने का अंदेशा जताया जा रहा है। आलू की बुवाई सीजन में सबसे ज्यादा मंग कुफरी लालिमा, चंद्रमुखी, चिप्सोना और कुफरी बादशाह प्रजाति के बीजों की होती है। इन बीजों की कीमत बाजार में 55 से 60 रुपए प्रतिकिलो है। जबकि पिछले साल बीजों के भाव 10-12 रुपए किलो थे। किसानों का कहना है कि इस बार करीब 500-600 प्रतिशत तक बीजों के दाम बढ़ गए हैं। खेती की लागत भी बहुत बढ़ जाएगी। सामान्यत: देखा गया है कि जिस वर्ष आलू का बीज महंगा होता है उस साल फसल के दाम अच्छे नहीं मिलते हैं। किसानों के अनुसार इस साल आलू की पैदावार की लागत खासी ज्यादा हो जाएगी जबकि उस हिसाब से दाम नहीं मिलेंगे। उत्तर प्रदेश में होता है आलू का बंपर उत्पादन उत्तरप्रदेश में पिछले तीन सालों से आलू का बंपर उत्पादन हो रहा है। उत्तरप्रदेश में पिछले साल ही आलू की पैदावार 165 लाख टन से ज्यादा थी। फसल के बाजार में आने के बाद दाम गिरने पर प्रदेश सरकार ने आलू की सरकारी खरीदन शुरू की थी। प्रदेश सरकार ने खरीद केंद्र खोल कर दो लाख क्विंटल आलू की खरीद सीधी खरीद की थी। वहीं बाहरी प्रदेशों को माल भेजने वाले किसानों को भाड़े में सब्सिडी भी दी गई थी। देश में आलू का रकबा घटना तय कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक बीघा आलू की बुआई के लिए कम से कम चार क्विंटल बीज की जरूरत होती है। इसके बाद मजदूरी, खाद व सिंचाई की लागत को जोड़ दें तो पैदावार खासी महंगी हो जाती है। इस बार नयी फसल के बाजार में आने के बाद किसान को क्या कीमत मिलेगी यह कहा नहीं जा सकता है। इन आशंकाओं के चलते इस बार देश में आलू की खेती का रकबा घटना तय है। । लघु और सीमांत किसान आलू की बजाए सरसों प्याज और लहसुन की खेती करने का मन बना रहे हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

जानिए बैंगन की खेती ( brinjal cultivation ) की बुवाई का सही समय और उन्नत किस्म के बारे में अक्टूबर व नवंबर का महीना किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इन दो महीनों में किसान रबी की फसल की बुवाई करते हैं। रबी के सीजन में किसानों के पास गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू व गन्ना आदि की फसल बोने का विकल्प होता है। इसके अलावा किसान इन दिनों में बैंगन की खेती करके भी लाखों रुपए कमा सकता है। बैंगन की खेती दो महीने में तैयार हो जाती है। बैंगन की सब्जी भारतीय जनसमुदाय में बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन को भर्ता, आलू-बैंगन की सब्जी, भरवा बैंगन, फ्राई बैंगन सहित कई तरीकों से पकाया जा सकता है। उत्तर भारत के इलाकों में बैंगन का चोखा बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन की उत्पत्ति भारत में ही हुई है। विश्व में सबसे ज्यादा बैंगन चीन में 54 फीसदी उगाया जाता है। बैंगन उगाने के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। बैंगन विटामिन और खनिजों का अच्छा स्त्रोत है। इसकी खेती सारा साल की जा सकती है। बैंगन की फसल बाकी फसलों से ज्यादा सख्त होती है। इसके सख्त होने के कारण इसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बैंगन की उन्नत किस्में / बैंगन की प्रजाति बैंगन की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। बैंगन की उन्नत किस्मों में पूसा पर्पर लोंग, पूसा पर्पर कलस्टर, पूर्सा हायब्रिड 5, पूसा पर्पर राउंड, पंत रितूराज, पूसा हाईब्रिड-6, पूसा अनमोल आदि शामिल है। एक हेक्टेयर में करीब 450 से 500 ग्राम बीज डालने पर करीब 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन मिल जाता है। बैंगन की फसल के लिए मिट्टी / बैंगन की फसल के लिए भूमि बैंगन एक लंबे समय की फसल है, इसलिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ रेतली दोमट मिट्टी उचित होती है और अच्छी पैदावार देती है। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी और अधिक पैदावार के लिए चिकनी और नमी या गारे वाली मिट्टी उचित होती है। फसल की वृद्धि के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.6 के बीच में होनी चाहिए। सिंचाई का उचित प्रबंधन भी होना चाहिए। बैंगन की फसल सख्त होने के कारण इसे अलग अलग तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। खेत में बैंगन की बिजाई का तरीका / बैंगन के बीज बैंगन का अधिक उत्पादन पाने के लिए बैंगन के बीजों का सही रोपण होना चाहिए। दो पौधों के बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए। दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज रोपण करने से पहले खेत की अच्छे तरीके से 4 से 5 बार जुताई करके खेत को समतल करना चाहिए। फिर खेत में आवश्यकतानुसार आकार के बैड बनाने चाहिए। बैंगन की खेती में प्रति एकड़ 300 से 400 ग्राम बीजों को डालना चाहिए। बीजों को 1 सेंटीमीटर की गहराई तक बोने के बाद मिट्टी से ढक देना चाहिए। बैंगन बिजाई का सही समय / बैंगन की वैज्ञानिक खेती बैंगन की फसल पूरे सालभर की जा सकती है लेकिन अक्टूबर और नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसान पहली फसल के लिए अक्टूबर में पनीरी बो सकते हैं जिससे नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। दूसरे फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोनी चाहिए जिससे फरवरी के पहले पखवाड़ तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। तीसरी फसल के लिए फरवरी के आखिरी पखवाड़़े और मार्च के पहले पखवाड़े में पनीरी बोनी चाहिए जिससे अप्रैल के आखिरी सप्ताह में पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोनी चाहिए ताकि अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। बैंगन की खेती में खाद और उर्वरक बैंगन की खेती में मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरक डालनी चाहिए। अगर मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है तो खेत तैयार करने समय 20-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। इसके बाद 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फॉस्फेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए। बैंगन की खेती में सिंचाई बैंगन की खेती में अधिक पैदावार लेने के लिए सही समय पर पानी देना बहुत जरूरी है। गर्मी के मौसम में हर 3-4 दिन बाद पानी देना चाहिए और सर्दियों में 12 से 15 के अंतराल में पानी देना चाहिए। कोहरे वाले दिनों में फसल को बचाने के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखें और लगातार पानी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बैंगन की फसल में पानी खड़ा न हो, क्योंकि बैंगन की फसल खड़े पानी को सहन नहीं कर सकती है। बैंगन की फसल की तुड़ाई खेत में बैंगन की पैदावार होने पर फलों की तुड़ाई पकने से पहले करनी चाहिए। तुड़ाई के समय रंग और आकार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बैंगन का मंडी में अच्छा रेट मिले इसके लिए फल का चिकना और आकर्षक रंग का होना चाहिए। बैंगन का स्टोरेज / बैंगन का भंडारण बैंगन को लंबे समय के लिए स्टोर नहीं किया जा सकता है। बैंगन को आम कमरे के सामान्य तापमान में भी ज्यादा देर नहीं रख सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से इसकी नमी खत्म हो जाती है। हालांकि बैंगन को 2 से 3 सप्ताह के लिए 10-11 डिग्री सेल्सियस तापमान और 9२ प्रशित नमी में रखा जा सकता है। किसान भाई बैंगन को कटाई के बाद इसे सुपर, फैंसी और व्यापारिक आकार के हिसाब से छांट लें और पैकिंग के लिए, बोरियों या टोकरियों का प्रयोग करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

close Icon

Find Your Right Tractor and Implements

New Tractors

Used Tractors

Implements

Certified Dealer Buy Used Tractor