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क्या है एपीडा और इसकी निर्यात बढ़ाने में क्या रहेगी भूमिका

क्या है एपीडा और इसकी निर्यात बढ़ाने में क्या रहेगी भूमिका

28 August, 2020

क्या है एपीडा और इसकी निर्यात बढ़ाने में क्या रहेगी भूमिका

देश के कृषि निर्यात को बढ़ाने में कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादन निर्यात विकास प्राधिकरण ( एपिडा ) राज्य सरकारों की मदद करेगा। इसके लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण एपीडा ने कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के हित में आपसी गतिविधियों के समन्वय के लिए एएफसी इंडिया लिमिटेड और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए है। इसका उद्देश्य कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के हित में आपसी गतिविधियों में तालमेल बनाना है, ताकि पारस्परिक रूप से काम करने में विशेषज्ञता का उपयोग हो और हितधारकों को बेहतर मूल्य मिल सके।

 

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क्या है एपीडा

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) संसद के एक अधिनियम और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन स्थापित एक प्राधिकरण है। इसे फल, सब्जियों और उनके उत्पाद मांस और मांस उत्पाद, पॉल्ट्री और पॉल्ट्री उत्पाद, डेयरी उत्पाद, कन्फेक्शनरी, बिस्कुट और बेकरी उत्पाद, शहद, गुड़ और चीनी उत्पाद, कोको और इसके उत्पाद, सभी प्रकार के चॉकलेट, मादक और गैर-मादक पेय, अनाज और अनाज उत्पाद, मूंगफली और अखरोट, अचार, पापड़ और चटनी, ग्वार गम, फूल और फूल उत्पाद, हर्बल और औषधीय पौधे जैसे उत्पादों के निर्यात संवर्धन और विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई हैं। इसके अलावा इस पर चीनी के आयात की निगरानी की जिम्मेदारी है।

 

 

एपीडा की कृषि विकास में भूमिका

एपीडा, हितधारकों के क्षमता-निर्माण के लिए विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर और विशिष्ट विशेषज्ञता वाले संगठनों और संस्थानों के साथ तालमेल के लिए सहयोगी दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और कृषि तथा इसके निर्यात को बढ़ाने के लिए समाधान प्रदान कर रहा है। यह भारत सरकार द्वारा घोषित कृषि निर्यात नीति के उद्देश्यों के अनुरूप है। कृषि निर्यात नीति का निर्माण कृषि निर्यात उन्मुख उत्पादन बढ़ाने, निर्यात संवर्धन, किसान को बेहतर मूल्य की प्राप्ति और भारत सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों में तालमेल स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया था।

यह किसान केन्द्रित दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें स्रोत पर मूल्यवर्धन के माध्यम से बेहतर आय की प्राप्ति सुनिश्चित करना तथा मूल्य-श्रृंखला में नुकसान को कम करने में सहायता प्रदान करना शामिल है।

इसलिए नीति, देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में उत्पाद विशिष्ट समूहों को विकसित करने के दृष्टिकोण को अपनाने का सुझाव देती है ताकि आपूर्ति से संबंधित विभिन्न मुद्दों जैसे मिट्टी पोषक तत्व प्रबंधन, उच्च उत्पादकता, बाजार उन्मुख फसल-किस्म को अपनाना, बेहतर कृषि पद्धतियों का उपयोग आदि से निपटने में मदद मिल सके।

 

26 में से 21 राज्यों में निगरानी समिति का हुआ गठन

एईपी के कार्यान्वयन के लिए एपीडा राज्य सरकारों के साथ लगातार संपर्क में है। महाराष्ट्र, यूपी, केरल, नगालैंड, तमिलनाडु, असम, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मणिपुर और सिक्किम राज्यों ने राज्य-विशिष्ट कार्य योजना को अंतिम रूप दे दिया है, जबकि अन्य राज्यों की कार्य योजनाएँ अंतिम रूप के अलग-अलग चरणों में हैं। 26 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों ने नोडल एजेंसियों को नामित कर दिया है। राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय निगरानी समितियों का गठन 21 राज्यों में किया जा चुका है।

 

20 क्लस्टर स्तरीय समितियों की गठित

पंजाब के क्लस्टर जिले व यू.पी. (दो अलग-अलग जिले) में आलू , राजस्थान में ईसबगोल, महाराष्ट्र में संतरा, अनार, अंगूर, केला (3 जिले), तमिलनाडु व केरल में केला, उत्तर प्रदेश में आम, गुजरात व यूपी में डेयरी उत्पाद, कर्नाटक में गुलाब व प्याज, यूपी में ताजी सब्जियां, मध्य प्रदेश में संतरा और गुजरात (2 जिलों) में आलू। हितधारकों के जागरूक बनाने और आवश्यक हस्तक्षेपों पर चर्चा के लिए क्लस्टरों में दो दौर की बैठकें आयोजित की गई हैं। इस पृष्ठभूमि में एपीडा ने एएफसी इंडिया लिमिटेड और भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) जैसे संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।  

 

एएफसी इंडिया लिमिटेड की क्या रहेगी निर्यात बढ़ाने में भूमिका

एएफसी इंडिया लिमिटेड को सरकारी संगठन माना जाता है। 1968 में स्थापित एएफसी इंडिया लिमिटेड, वाणिज्यिक बैंकों, नाबार्ड और एक्जिम बैंक के पूर्ण स्वामित्व वाला संगठन है। यह भारत में कृषि, ग्रामीण विकास और अन्य रणनीतिक सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों के लिए परामर्श, नीति सलाहकार और कार्यान्वयन सहायता प्रदान करने वाला एक बहु-विषयक विकास संगठन है।

 

सहयोग के क्षेत्र

•    एएफसी इंडिया लिमिटेड जैविक उत्पादन प्रणाली के साथ-साथ रासायनिक/अवशेष मुक्त उत्पादन प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप की आवश्यकता की पहचान करेगा व इन्हें पेश करेगा और साथ ही साथ विभिन्न फसलों/फलों और सब्जियों के वर्तमान प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादन स्तर को बनाए रखेगा/बढ़ाएगा।
•    अंतर्राष्ट्रीय बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप व एपीडा के दिशानिर्देशों का अनुपालन करते हुए एएफसी साझा प्रसंस्करण केंद्रों को विकसित करने के लिए सुविधा और समर्थन प्रदान करेगा।
•    एएफसी, संपूर्ण मूल्य श्रृंखला प्रणाली को प्रभावी ढंग से समर्थन प्रदान करने का प्रयास करेगा और शुरू में वाणिज्यिक क्षमता-निर्माण के लिए आवश्यक मदद करेगा, जब तक ये क्लस्टर और मूल्य श्रृंखला आत्मनिर्भर नहीं हो जाते हैं।
•    एएफसी, कृषि निर्यात नीति के तहत अधिसूचित निर्यात केन्द्रित क्लस्टर्स तथा एपीडा द्वारा परियोजना मोड में सुझाए गए अन्य क्लस्टर में सभी गतिविधियों को जमीनी स्तर पर लागू करेगा और इसके लिए केंद्र व राज्य प्रायोजित कार्यक्रमों के अंतर्गत वर्तमान में उपलब्ध सब्सिडी की मांग करेगा।
•    सभी हितधारकों (किसान समेत) के लिए उत्पादन-पूर्व, उत्पादन, फसल तैयारी के बाद, प्रारंभिक प्रसंस्करण, द्वितीयक प्रसंस्करण और परिवहन/वितरण से सम्बंधित दिशानिर्देश विकसित करने के लिए एपीडा, एएफसी को प्रोत्साहित करेगा, ताकि अंतरराष्ट्रीय मानकों का अनुपालन किया जा सके।
•    एपीडा द्वारा पहचाने गए क्लस्टर के विकास के लिए एएफसी कार्य करेगा और इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों की योजनाओं के समन्वय से संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में विभिन्न परियोजनाओं को लागू करेगा।

 

 

एनसीयूआई निर्यात बढ़ाने में कैसे करेगा मदद

एनसीयूआई, बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 के तहत पंजीकृत है और भारत के सहकारी आंदोलन का शीर्ष संगठन है जिसका मुख्य उद्देश्य भारत में सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देना और विकसित करना, सहकारी क्षेत्र के विस्तार के लिए लोगों को शिक्षित करना व मार्गदर्शन प्रदान करना एवं सहकारी सिद्धांतों के अनुसार सहकारी राय के प्रतिपादक के रूप में कार्य करना है।

 

सहयोग के क्षेत्र

•    किसानों को निर्यात के अवसरों का लाभ प्रदान करके सरकार द्वारा कृषि निर्यात नीति (ए ई पी) में निर्धारित किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिलकर काम करना।

•    कृषि-उपज की गुणवत्ता में सुधार और किसान को बेहतर मूल्य प्राप्ति के लिए कृषि उत्पादन में संलग्न सहकारी समितियों के साथ काम करना। एपीडा, एनसीयूआई द्वारा पहचाने गए और प्रशिक्षित सहकारी समितियों को निर्यात की सुविधा प्रदान करेगा।

•    एपीडा एनसीयूआई द्वारा पहचान की गई सहकारी समितियों को कृषि-उपज, जैविक उत्पादन/कृषि भूमि से सम्बंधित आवश्यक प्रमाणपत्रों की सुविधा प्रदान करेगा।

•    क्षेत्रीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कार्यशालाओं, विभिन्न जागरूकता कार्यक्रमों, और कौशल विकास कार्यक्रमों का आयोजन करके कृषि-प्रसंस्करण के क्षेत्र में सहकारी समितियों / एसएचजी की क्षमता को विकसित करने की दिशा में काम करना।   

•    भारतीय और वैश्विक बाजारों में कृषि उत्पादों के प्रदर्शन के लिए साथ काम करना। देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शनियों / व्यापार मेलों/बी 2 बी बैठकों का आयोजन करके कृषि-उत्पाद/प्रसंस्करण से सम्बंधित सहकारी समितियों द्वारा उत्पादित / प्रस्तुत किए जा रहे उत्पादों और सेवाओं का प्रदर्शन करना। प्रदर्शनियों/व्यापार मेलों / बी2बी बैठकों को क्षेत्रीय/राज्य / राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन के सम्बन्ध में दोनों पक्ष मिलकर निर्णय लेंगे।

•    कृषि-उत्पादन / प्रसंस्करण सहकारी समितियों की एक राष्ट्र-व्यापी निर्देशिका तैयार करना।

 

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समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : 8.54 लाख किसानों के खातों में पहुंचे 18,539.86 करोड़ रुपए

समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : 8.54 लाख किसानों के खातों में पहुंचे 18,539.86 करोड़ रुपए

सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदा 100 लाख टन धान भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और राज्य की खरीद एजेंसियों ने सोमवार तक 98.19 लाख टन धान की खरीद की है। इससे देश के विभिन्न राज्यों के 8.54 लाख किसानों के खातों में करीब 18,539.86 करोड़ रुपए आए हैं। यह खरीद 18,880 रुपए प्रति टन के एमएसपी की दर से की गई है। मीडिया में प्रकाशित खबरों से मिली जानकारी के अनुसार एक सरकारी बयान में कहा गया है कि खरीफ 2020-21 के लिए धान की खरीद पंजाब, हरियाणा, यूपी, तमिलनाडु, उत्तराखंड, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर और केरल जैसे खरीद करने वाले राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में तेजी से चल रही है। इन राज्यों में 19 अक्टूबर तक 8.54 लाख किसानों से 18,880 रुपए प्रति टन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की दर से 18,539.86 करोड़ रुपए मूल्य के 98.19 लाख टन से अधिक धान की खरीद की गई है। बता दें कि खरीफ मार्केटिंग सीजन (केएमएस) 2019-20 की इसी अवधि के दौरान 80.20 लाख टन धान की खरीद हुई थी। चालू सत्र में धान खरीद, पिछले सत्र की तुलना में 22.43 प्रतिशत अधिक है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 779 किसानों से की 806.11 टन मूंग और उड़द की खरीद सोमवार तक, सरकार ने अपनी नोडल एजेंसियों के माध्यम से तमिलनाडु, महाराष्ट्र और हरियाणा में 779 किसानों से 5.80 करोड़ रुपए की 806.11 टन मूंग और उड़द की खरीद की है। इसी प्रकार, कर्नाटक और तमिलनाडु में 3,961 किसानों से 52.40 करोड़ रुपये की 5,089 टन नारियल गरी की खरीद की गई है। बयान में कहा गया है कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में एमएसपी मूल्य पर कपास की खरीद का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। सोमवार तक, 40,196 किसानों से 565.90 करोड़ रुपए मूल्य का 2,00,512 गांठ कपास खरीदा गया। बता दें कि राज्यों से मिले प्रस्ताव के आधार पर, मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और आंध्र प्रदेश से खरीफ विपणन सत्र 2020 के लिए 42.46 लाख टन दलहनों और तिलहनों की खरीद के लिए मंजूरी दी गई थी। वहीं आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्यों के लिए 1.23 लाख टन नारियल गरी की खरीद करने के लिए भी मंजूरी दी गई है। खरीफ सीजन 2020-21 के विभिन्न फसलों लिए तय समर्थन मूल्य / खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 2020-21 धान (सामान्य) 1868, धान (ग्रेड ए)-1888, ज्वार (हाईब्रिड)-2620 , ज्वार (मालदंडी)- 2640 , बाजरा- 2150, रागी 3295, मक्का 1850, तूर (अरहर)-6000, मूंग- 7196, उड़द - 6000, मूंगफली- 5275, सूरजमुखी-5885, सोयाबीन (पिला)- 3880, तिल- 6855, नाइजरसीड- 6695, कपास (मध्यम रेशा)- 5515, कपास (लंबा रेशा)- 5825 रुपए सरकार ओर से तय किया हुआ समर्थन मूल्य है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अनुबंध कृषि : किसान और व्यापारी के बीच विवादों के समाधान के लिए सरकार ने जारी किए नियम

अनुबंध कृषि : किसान और व्यापारी के बीच विवादों के समाधान के लिए सरकार ने जारी किए नियम

जानें, क्या है कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से जुड़े इन नियमों में और इससे किसानों को क्या होगा फायदा अनुबंध कृषि (Contract Farming) से जुड़े विवादों के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने नियम ओर प्रक्रिया जारी की है। अधिसूचित नियमों के अनुसार, सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) दोनों पक्षों से समान प्रतिनिधित्व वाले सुलह बोर्ड का गठन करके विवाद को हल किया जाएगा। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार एक अधिकारी ने बताया कि सुलह बोर्ड की नियुक्ति की तारीख से 30 दिनों के भीतर सुलह की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। यदि सुलह बोर्ड विवाद को हल करने में विफल रहता है, तो या तो पार्टी उप-विभागीय प्राधिकरण से संपर्क कर सकती है, जिसे उचित सुनवाई के बाद आवेदन दाखिल करने के 30 दिनों के भीतर मामले का फैसला करना होगा। अधिकारी ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जहां किसानों की भूमि एक से अधिक सब डिवीजन में आती है। अधिकारी ने बताया, ऐसे मामलों में, भूमि के सबसे बड़े हिस्से पर अधिकार क्षेत्र मजिस्ट्रेट के पास निर्णय लेने का अधिकार होगा। अधिकारी ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में शामिल पक्षों को समीक्षा के लिए उच्च प्राधिकरण के पास जाने का अधिकार होगा। अधिकारी ने कहा- संबंधित जिले के कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा नामित अतिरिक्त कलेक्टर अपीलीय प्राधिकारी होंगे। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसान 30 दिनों के भीतर कर सकते हैं अपील दायर अनुबंध कृषि (Contract Farming) नियमों को लेकर अधिकारी ने कहा कि इस तरह के आदेश के तीस दिनों के भीतर, किसान खुद जाकर या इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील दायर कर सकते हैं। संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, प्राधिकरण को ऐसी अपील दायर करने की तारीख से 30 दिनों के भीतर मामले का निपटान करना होगा। अधिकारी ने कहा कि अपीलीय अधिकारी द्वारा पारित आदेश में सिविल कोर्ट के निर्णय का बल होगा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसान इस कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य किसानों को उनकी फसल खराब होने पर सुनिश्चित मूल्य की गारंटी देना है। क्या है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) और इसे लेेकर किसान में क्यूं बना हुआ है डर अनुबंध पर खेती का मतलब ये है कि किसान अपनी जमीन पर खेती तो करता है, लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए। कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान को पैसा नहीं खर्च करना पड़ता। इसमें कोई कंपनी या फिर कोई आदमी किसान के साथ अनुबंध करता है कि किसान द्वारा उगाई गई फसल विशेष को कॉन्ट्रैक्टर एक तय दाम में खरीदेगा। इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी सब खर्च कॉन्ट्रैक्टर के होते हैं। कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को खेती के तरीके बताता है। फसल की क्वालिटी, मात्रा और उसके डिलीवरी का समय फसल उगाने से पहले ही तय हो जाता है। हालांकि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। बता दें कि गुजरात में बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों में अनुबंध पर खेती की जा रही है और इस खेती के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। इसके बावजूद देश के कई राज्यों में किसान इसका विरोध कर रहे हैं, किसानों को डर है कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग कानून किसी भी विवाद के मामले में बड़े कॉर्पोरेट और कंपनियों का पक्ष लेंगे। इस आशंका को खारिज करते हुए, अधिकारी ने कहा कि किसानों के हित में कृषि कानूनों का गठन किया गया है। अधिकारी ने कहा कि एक समझौते में प्रवेश करने के बाद भी, किसानों को अपनी पसंद के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट को समाप्त करने का विकल्प होगा। हालांकि, अन्य पक्ष-किसी भी कंपनी या प्रोसेसर-को समझौते के प्रावधानों का पालन करना होगा। वे दायित्वों को पूरा किए बिना कॉन्ट्रैक्ट से बाहर नहीं निकल सकते है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

मूंगफली की सरकारी खरीद : नेफैड ने किया इनकार, पंजीयन स्थगित

मूंगफली की सरकारी खरीद : नेफैड ने किया इनकार, पंजीयन स्थगित

किसानों को समर्थन मूल्य पर मूंगफली बेचने के लिए अभी करना होगा और इंतजार भारत सरकार की नोडल एजेंसी नेफैड की ओर से समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद करने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण आगामी आदेशों तक मूंगफली के पंजीयन स्थगित कर दिए गए हैं। सरकार की ओर से मूंगफली की खरीद के लिए अगली व्यवस्था करने तक किसानों को इंतजार करना होगा। बता दें कि राजस्थान में समर्थन मूल्य पर मूंगफली खरीद के लिए 20 अक्टूबर से पंजीयन की प्रक्रिया शुरू की जानी थी लेकिन सरकारी नोडल ऐजेंसी नेफैड ने हाथ खड़े कर दिए। इससे फिलहाल राजस्थान में मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं हो पाएगी। बता दें कि इस वर्ष केंद्र सरकार द्वारा मूंगफली का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5275 रुपए तय किया गया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मूंगफली की सरकारी खरीद नहीं होने से किसानों में मायूसी राजस्थान में मूंगफली की खरीद शुरू होने को लेकर किसान काफी उत्साहित थे। लेकिन समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद के लिए पंजीयन प्रक्रिया स्थगित होने से मूंगफली उत्पादक किसानों के चहरे पर मायूसी छा गई है। बता दें कि राजस्थान में पांच लाख हैक्टेयर में मूंगफली की खेती होती है। इस वर्ष राजस्थान में केंद्र सरकार ने 3.74 लाख मीट्रिक टन मूंगफली की खरीद के लक्ष्य की स्वीकृति प्रदान की है। बता दें कि गुजरात के साथ ही राजस्थान भी मूंगफली उत्पादन में प्रमुख स्थान रखता है। अब चूंकी मूंगफली की सरकारी खरीद को स्थगित कर दिया गया जिससे किसान निजी मंडियोंं की तरफ रूख करेंगे और मजबूरन उन्हें कम कीमत पर अपनी मूंगफली की फसल बेचनी पड़ेगी। जिससे किसानों को हानि उठानी पड़ेगी। मूंगफली की खरीद नहीं करने को लेकर नेफैड ने दी सफाई समर्थन मूल्य पर किसानों से उपज खरीदने वाली सरकारी संस्था नेफैड मूंगफली की खरीद नहीं करने के कारणों को लेकर सफाई दी है। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार नेफैड अधिकारियों का कहना है कि अभी उसके गोदाम बाजरे से भरे पड़े हैं, ऐसे में जब तक रखने की जगह नहीं मिलती तब तक मूंगफली की फसल की खरीद हो ही नहीं पाएगी। राजस्थान सरकार को मंडियों में 18 नवंबर से मूंगफली खरीदनी थी और इसके लिए प्रदेश में 266 खरीद केंद्र चिह्नित भी किए गए थे, लेकिन किसान अब परेशान है क्योंकि उनकी मूंगफली की फसल सरकार नहीं खरीद रही है। राजस्थान में मूंगफली की खरीद में लगातार हो रही है देरी जानकारी के अनुसार नेफैड की ओर से मूंगफली की खरीद नहीं करने के बाद अब राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर किसानों के हित में मूंगफली की खरीद करवाने का फिर से आग्रह किया है। बहरहाल केंद्र और राज्य के अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल नहीं होने के चलते ही मूंगफली की खरीद पर संकट आने की बात कही जा रही है। वैसे राजस्थान में इन दिनों रबी की फसल की बुवाई शुरू हो चुकी है और ऐसे में मूंगफली की फसल की सरकारी खरीद नहीं होने से परेशान किसानों के मंडियों में आने के बावजूद भी वे अब घाटे में बिचौलिये के जरिये बेहद ही कम दामों पर मूंगफली बेचने को मजबूर है। आगे कब होगी मूंगफली की खरीद मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 29 सितंबर को हुई बैठक में नेफैड को दलहन/तिलहन की खरीद व्यवस्था के संबंध में अवगत करवा दिया गया था। भारत सरकार द्वारा भी 12 अक्टूबर को मूंग, उड़द एवं सोयाबीन के साथ-साथ मूंगफली के खरीद लक्ष्य भी स्वीकृत कर दिए गए थे, परन्तु नेफैड द्वारा समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद में असमर्थता व्यक्त करने के कारण विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसी के साथ आगामी आदेशों तक मूंगफली के पंजीयन स्थगित किए गए हैं। राजस्थान राज्य सरकार द्वारा किसानों के हित में कृषि मंत्रालय, भारत सरकार को नेफैड के माध्यम से मूंगफली की खरीद करवाने के लिए अनुरोध किया गया है। भारत सरकार द्वारा नेफैड अथवा अन्य नोडल एजेंसी नियुक्त करने के बाद मूंगफली खरीद हेतु पंजीयन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाएगी। समर्थन मूल्य पर मूंग, उड़द एवं सोयाबीन बेचने के लिए किसान करा सकते हैं पंजीकरण राज्य में मूंग, उड़द एवं सोयाबीन की उपज हेतु ऑनलाइन पंजीकरण प्रारंभ कर दिए गए हैं। किसान ई-मित्र केंद्र एवं खरीद केन्द्रों पर प्रात: 9 बजे से सायं 7 बजे तक की गई है। किसान एक जनआधार कार्ड में अंकित नाम में से जिसके नाम गिरदावरी होगी उसके नाम से एक पंजीयन करवा सकेगें। किसान इस बात का विशेष ध्यान रखे कि जिस तहसील में कृषि भूमि है उसी तहसील के कार्यक्षेत्र वाले खरीद केन्द्र पर उपज बेचान हेतु पंजीकरण कराएं। दूसरी तहसील में यदि पंजीकरण कराया जाता है तो पंजीकरण मान्य नही होगा । किसान पंजीयन कराते समय यह सुनिश्चित कर ले कि पंजीकृत मोबाईल नंबर, से जनआधार कार्ड से लिंक हो जिससे समय पर तुलाई दिनांक की सूचना मिल सके। किसान प्रचलित बैंक खाता संख्या सही दे ताकि ऑनलाइन भुगतान के समय किसी प्रकार की परेशानी किसान को नहीं हो। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

उत्तरप्रदेश में मक्का की सरकारी खरीद शुरू, खरीद केंद्र स्थापित किए

उत्तरप्रदेश में मक्का की सरकारी खरीद शुरू, खरीद केंद्र स्थापित किए

किसान फसल बेचने के लिए यहां कराएं ऑनलाइन पंजीकरण उत्तरप्रदेश सरकार ने सरकारी मंडियों में मक्का की खरीद शुरू कर दी है। मक्का खरीद के लिए सरकारी स्तर पर मंडियों में तैयारी की गई है। इस वर्ष केंद्र सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इसी मूल्य पर किसानों से मक्का की खरीद की जाएगी। इसको लेकर उत्तरप्रदेश सरकार ने कुछ जिले जहां मक्का उत्पादन अधिक होता है वहां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मक्का खरीदने का फैसला लिया है। उत्तरप्रदेश मंत्रीपरिषद् ने खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 में मूल्य समर्थन योजना के तहत मक्का क्रय नीति को स्वीकृति प्रदान कर दी है। उत्तरप्रदेश में समर्थन मूल्य पर 17 अक्टूबर 2020 से शुरू की गई मक्का की खरीद 15 जनवरी 2021 तक जारी रहेगी। मक्का क्रय करने का जिम्मा खाद्य एवं रसद विभाग की विपणन शाखा को सौंपा गया है। खरीद केंद्रों का निर्धारण और चयन जिलाधिकारियों द्वारा किया जाएगा। केवल उन क्षेत्रों में मक्का खरीद केंद्र स्थापित होंगे, जहां मक्का उत्पादन अधिक हो और पर्याप्त खरीद की संभावना हो। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 इन जिलों में होगी मक्का की खरीद प्रथम चरण में मक्का खरीद के लिए अलीगढ़, फीरोजाबाद, कन्नौज, एटा, मैनपुरी, कासगंज, बदायूं, बहराइच, फर्रुखाबाद, इटावा, हरदोई, कानपुर नगर, जौनपुर, कानपुर देहात, उन्नाव, गोंडा, बलिया, बुलंदशहर, ललितपुर, श्रावस्ती, देवरिया, सोनभद्र व हापुड़ में सरकारी खरीद शुरू की गई हैं। अन्य जिलों में आवक को देखकर खाद्य आयुक्त द्वारा मक्का खरीद का निर्णय लिया जाएगा। उत्तरप्रदेश में समर्थन मूल्य व निजी मंडी में मक्का के भावों में अंतर प्रदेश में 20 अक्टूबर 2020 को मक्का के सबसे कम भाव सिकंदराराहु मंडी में 1010-1135 रुपए प्रति क्विंटल और सबसे अधिक दाम कानपुर मंडी में 1200 से 1350 रुपए रहे। वहीं सरकार की ओर से मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इन भावों का अवलोकन करें तो सरकार द्वारा तय समर्थन, मूल्य निजी मंडी के भावों से अधिक हैं। इससे यहां के किसान समर्थन मूल्य पर अपनी मक्का की उपज बेचने के इच्छुक हैं। इसी को देखते हुए राज्य की योगी सरकार ने किसानों को राहत देते हुए मक्का की सरकारी खरीद शुरू की है। मक्का खरीद केंद्रों क्या है व्यवस्था खरीद केंद्र स्थापित इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि किसानों को मक्का बेचने के लिए अधिक दूरी न तय करनी पड़े। इसके लिए खरीद केंद्र ऐसे स्थान पर बनाएं जा रहे हैं जहां किसान आसानी से आ सके। इसके अलावा खरीद केंद्रों पर पर मक्का की खरीद के लिए आनलॉइन पंजीयन करना आवश्यक है। पंजीकरण कराने के बाद ही किसान से मक्का की खरीद की जाएगी। इसके अभाव में किसानों के लिए मक्का का विक्रय करना संभव नहीं होगा। वहीं मक्का क्रय केंद्र हेतु हैंडलिंग एवं परिवहन ठेकेदारों की नियुक्ति नियमानुसार ई-टेंडरिंग के माध्यम से की जाएगी। मक्का के मूल्य का भुगतान आर.टी.जी.एस/पी.एफ.एम.एस के माध्यम से मक्का क्रय के 72 घंटे के अन्दर किया जाएगा। चेक के माध्यम से भुगतान को मान्यता नहीं दी जाएगी। किसान कहां और कैसे कराएं पंजीकरण किसानों को मक्का समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण करवाना आवश्यक है। किसान ऑनलाइन पंजीकरण खाद्य एवं रसद विभाग की वेबसाइट https://fcs.up.gov.in/ से कर सकते हैं। पंजीकरण कराने के लिए किसान को जेातबही खाता नंबर अंकित कम्प्यूटराइजड खतौनी, आधार कार्ड, बैंक पासबुक के प्रथम पृष्ठ (जिसमें खाता धारक का विवरण अंकित हो) की छाया प्रति तथा एक अद्यतन पासपोर्ट साइज फोटो अपलोड करनी होगी। पंजीकरण होने के बाद किसान अपनी मक्का की उपज सरकारी मंडी में बेच सकेंगे। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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