धान में कंडुआ रोग का प्रकोप, ऐसे करें बचाव

जानें, क्या है कंडुआ रोग? और उसके लक्षण व नियंत्रण के उपाय

पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के कई जिलों में धान की फसल में कंडुआ रोग देखा जा रहा है। हालांकि इस समय अधिकतर धान की फसल कट चुकी है लेकिन कई जिलों में धान की पछेती फसल तैयार होने को है लेकिन उससे पहले ही इस रोग ने फसल पर हमला बोल दिया है जिससे किसानों की मुश्किल बढ़ गई है। जानकारी के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, देवरिया, गोरखपुर, बनारस, चंदौली, महाराजगंज और यूपी से सटे बिहार के कैमूर जैसे जिलों में कंडुआ का प्रकोप देखा गया है। इस रोग की खासियत ये है कि जैसे-जैसे धान की फसल बढ़ती जाती है इसका असर भी बढ़ता जाता है। इस रोग से प्रभावित फसल की उत्पादन कम हो जाता है। वहीं अनाज का वजन कम हो जाता है और आगे अंकुरण में भी समस्या आती है। ये रोग उच्च आर्द्रता और जहां 25-35 सेंटीग्रेड तापमान होता है वहां पर ज्यादा फैलता है, ये हवा के साथ एक खेत से दूसरे खेत उडक़र जाता है और फसल को संक्रमित कर देता है।

 

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क्या है कंडुआ रोग ( फाल्स स्मट )

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कंडुआ एक प्रमुख फफंूद जनित रोग है, जो कि अस्टीलेजनाइडिया विरेन्स से उत्पन्न होता है। इसका प्राथमिक संक्रमण बीज से होता है, इसलिए धान की खेती में बीज शोधन करना जरूरी है। इसका द्वितीय संक्रमण वायु जनित बीजाणु द्वारा होता है। यह रोग कंडुआ अक्टूबर से नवंबर तक धान की अधिक उपज देने वाली किस्मों में आता है। जिस खेत में यूरिया का प्रयोग अधिक होता है और वातावरण में काफी नमी होती है उस खेत में यह रोग प्रमुखता से आता है। धान की बालियों के निकलने पर इस रोग का लक्षण दिखाईं देने लगता है। इस रोग से धान की फसल को काफी नुकसान होता है।

 


क्या है कंडुआ रोग के लक्षण

धान वैज्ञानिकों के अनुसार धान का ये रोग बालियों के निकलने पर दिखाई देता है। इसका असर धान के दानों पर पड़ता है। यह रोग लगने पर प्रभावित दानों के अंदर रोगजनक फफूंद अंडाशय को एक बड़े कटुरुप में बदल देता है। बाद में ये दाने जैतुनी हरे रंग के हो जाते है। इस रोग के प्रकोप से दाने कम बनते है और उपज में दस से 25 प्रतिशत की कमी आ जाती है।


धान को कंडुआ रोग से बचाने के उपाय

धान को कंडुआ रोग से बचाने के लिए धान की बुवाई से पहले बीजों उपचारित किया जाना बेहद जरूरी है। जिस खेत में इस रोग का प्रकोप हुआ हो उस खेत से लाकर बीज कभी न बोएं। इसके अलावा बीजों को बोने से पहले उपचारित कर करें। इसके लिए सदैव प्रमाणिक बीज का ही इस्तेमाल करें। धान वैज्ञानिक के अनुसार कंडुआ रोग वाले खेतों में नमक के घोल में धान के बीज को उपचारित करना चाहिए। बीज को साफ कर सुखाने के बाद नर्सरी डालने के समय कार्जेन्डाजिम-50 के चूर्ण दो ग्राम या एक ग्राम यीरम किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद रोग के लक्षण दिखने पर टाईसाईक्लाजोल-75 डब्ल्यू पी पंद्रह ग्राम प्रति लीटर अथवा क्लोरोयाईनोनील-75 डब्ल्यू पी बीस ग्राम प्रति लीटर अथवा प्रोपिकोनाजोल-25डब्ल्यू पी पंद्रह ग्राम प्रतिलीटर की दर से पानी में मिलाकर प्रति एकड छिडक़ाव करना चाहिए। इस प्रकार इस रोग से धान की फसल को बचाया जा सकता है।

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