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फसलों की कटाई पूरी : अनाज भंडारण के नायब तरीके, हर किसान की पहली पसंद

फसलों की कटाई पूरी : अनाज भंडारण के नायब तरीके, हर किसान की पहली पसंद

24 April, 2020

अनाज भंडारण के नायब तरीके, हर किसान की पहली पसंद

टै्रक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं अनाजों के सुरक्षित भंडारण की। देश में रबी की फसल की कटाई का अंतिम चरण चल रहा है। अधिकांश किसानों ने अपनी फसल को काट ली है। लॉकडाउन के चलते जिंसों की बिक्री अटकी हुई है। किसानों को उनके अनुमान के अनुसार फिलहाल भाव नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में किसानों को अनाजों का सुरक्षित भंडारण करना चाहिए और भविष्य में बाजार में तेजी आने पर अपनी उपज को बेचना चाहिए। ट्रैक्टर जंक्शन के इस लेख में किसानों को अनाज भंडारण के नायाब तरीके बताए जा रहे हैं जिससे किसानों की फसल लंबे समय तक खराब नहीं होगी।

 

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अनाज भंडारण की आवश्यकता

फसल कटाई के बाद बाजार में अनाज की उपलब्धता बनाए दिन-प्रतिदिन की आवश्यकता है एवं बीज के लिए अनाज को संग्रहित करना आवश्यक है। आधुनिक किसान ने उन्नत बीज, महंगे उर्वरक तथा फसल सुरक्षा के उपायों के साथ उपज बढ़ाने की नई-नई तकनीकें अपनाकर उत्पादन बढ़ा लिया है। परंतु जब किसान की सालभर की कमाई को भंडारित किया जाता है, तब अनेक तरह के कीट और बीमारियां 10 से 15 प्रतिशत तक की क्षति पहुंचाते हैं। ऐसे में किसानों के लिए सुरक्षित भंडारण की आवश्यकता है। 

 

 

कीटों के प्रकोप से बचने के उपाय

  • अनाज भंडार के लिए पक्के भंडार गृह बनाएं।
  • अनाज रखने से पहले भंडार गृहों एवं कीटों की दीवारों पर दरारों को सीमेंट से बंद कर दें।
  • बीज कंटेनर को मैलाथियान 50 ईसी दवा से अच्छी तरह साफ करें।
  • भंडारण में चबूतरा जमीन से 2 या 2.5 फीट ऊंचा और दीवारों से 1.5 से 2.0 फीट दूरी चारों ओर छोडक़र बनाएं।
  • भंडारण से पूर्व मैलाथियान 500 ईसी दवा की 1:100 के अनुपात में या फिर नुवान दवा 1: 300 लीटर के अनुपात में पानी के साथ घोलकर गोदाम में फर्श और दीवारों पर छिडक़ाव करें। 3 लीटर घोल से 100 वर्ग मीटर की दीवार साफ करें।
  • पुराने बोरों के प्रयोग से पूर्व तेज धूप में सुखाएं या उबलते पानी में डालकर धूप में रखें और एक प्रतिशत मैलाथियान के घोल में 10 मिनट तक डुबोकर फिर धूप में रखें।
  • नए बोरे ही प्रयोग में लें।
  • अनाज ढोने के बर्तन, गाड़ी व अन्य सामान को धूप में सूखा लें।
  • फसल मढ़ाई से पूर्व खलिहान को साफ-सुथरा करके गोबर से लीपकर सुखा लें।
  • भंडार से पूर्व अनाज में 10-20 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं हों।
  • यदि अनाज को बोरो में भरकर रखना हो तो गोदाम के फर्श पर लडक़ी का तख्ता, खजूर की चटाई, पॉलीथिन, तिरपाल या फिर गेहूं के भूसे की परत बिछा दें। जिससे नमी बोरे तक नहीं पहुंचे।
  • अनाज के बोरों को दीवार से कम से कम आधा मीटर की दूरी पर रखें।
  • अनाज की सुरक्षा के लिए जहरीले रसायन का प्रयोग नहीं करें।
  • अनाज को गोदाम में रखने से पूर्व 1 क्विंटल अनाज में 1 किलो नीम की निंबोली का पाउडर मिलाकर रखे जिससे कीटों की क्षति कम होती है।
  • यदि अनाज को ढेरों में रखना हो तो उसमें नीम की पत्तियां मिला दें।
  • भंडार में नमी रोकने के लिए बिना जहर वाले पाउडर जैसे कैल्शियम ऑक्साइड, कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड, कैल्शियम व मैग्रेशियम कार्बोनेट और सोडियम व बेरेलियम के फ्यूरोसिलिकेट के बीज या अनाज के साथ वजन के मुताबिक 1:100 से या 1: 500 के हिसाब से प्रयोग करें।
  • पहाड़ी इलाकों और छोटे किसानों तथा निजी प्रयोग के लिए घरों में जीआई शीट की चादर से बने कोठों का प्रयोग करें।
  • यदि अनाज को बीज हेतु सुरक्षित रखने के लिए अनाज पॉलीथिन शीट पर फैलाकर मैलाथियान 5 प्रतिशत चूर्ण की 250 ग्राम की मात्रा प्रति क्विंटल बीज में अच्छी तरह से मिलाकर भंडारित करें।

 

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अनाज में कीटों का प्रकोप होने पर सुरक्षा के उपाय

  • अनाज को तेज धूप में सुखाएं। धूप में कीट बाहर निकलते हैं और इनके अंडे खत्म हो जाते हैं।
  • अनाज को दुबारा सुखाने से उनकी नमी खत्म होने से कीटों का खतरा कम हो जाता है।
  • गोदाम, टंकी या कोठों में हवा के आने-जाने का रास्ता बंद करके उनमें दवाओं का प्रयोग करें।
  • इथाइलीन डाइब्रोमाहड ईडीबी यह सूती कपड़े में लिपटा कांच का कैप्सूल या इंजेक्शन होता है। यह एम्यूल/इंजेक्शन 3.5 एवं 10 मिमी के पैक में आता है। एक एम्यूल 3 मिली को प्रति क्विंटल के हिसाब से प्रयोग करते हैं। इसका प्रयोग कोठे या टंकी के लिए अच्छा रहता है। टंकी या कोठे में आधा अनाज से भरकर अच्छी तरह से सात दिन तक बंद रखें। इस तरह से किसान अपने अनाज को ज्यादा समय तक सुरक्षित रख सकते हैं।

 

 

अनाज को इन जीवों और कीटों से होता है नुकसान

चूहा :  चूहों से किसानों की फसलों को बड़ा नुकसान होता है। चूहों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए किसानों को एक सामूहिक अभियान चलाना होगा। जिस क्षेत्र में चूहों का प्रकोप हो वहां सारे बिल बंद करें व दूसरे दिन जो बिल खुला मिले वहां जहर रहित चुग्गा रखें। इसके लिए 960 ग्राम अनाज में 20 ग्राम मीठा तेल व 20 ग्राम गुड या शक्कर मिलाकर बिलों के पास रखे। यह क्रिया दो-तीन दिन तक करते रहें। इसके बाद उसी जगह शाम को 6 से 10 ग्राम विषयुक्त चुग्गा रखें। इसमें 940 ग्राम अनाज, 20 ग्राम खाने का तेल, 20 ग्राम गुड या शक्कर, 20 ग्राम जिंक फॉस्फाइड मिलाकर गोलियां बना लें। मरे चूहों को गड्ढा खोदकर गाड़ दें जो चूहे बच गए वे विषयुक्त चुग्गा नहीं खाएंगे। इनके लिए एक सप्ताह बाद  आंतचनरोधी विष रेटामिन, वारफेरिन, ब्रोमोडियोलोन (सुपर वारफेरिन) की टिकिया के छह हिस्से एक समान बना लें। एक बिल के अंदर एक टुकड़ा डालकर बिल बंद कर दें। इसको चूहा खाना शुरू कर देंगे एवं इसके लगातार खाने से चूहों का चार-पांच दिन बाद मरना शुरू हो जाता है।

चावल का घुन :  इसकी खोज सर्वप्रथम चावल में होने से इसे चावल का घुन कहा जाता है। प्रौढ़ मादा अनाज में छेद बनाकर अंडे देती है। इनसे निकलने वाली सूंडियां अंदर ही अंदर दाने को खाती है। इसका आक्रमण अप्रैल से अक्टूबर माह के बीच अधिक देखने को मिलता है। प्रौढ़ व सूंडियां दानों को खाकर खोखला कर देती है।

खपरा भृंग :  गेहूं पर इसका अधिक प्रकोप होता है। अनाज की ऊपरी सतह में ज्यादा प्रकोप होता है। यह जुलाई से अक्टूबर के मध्य अधिक नुकसान करता है एवं दानों के भ्रूण को खाता है। इसके अधिक प्रकोप से अनाज में अधिक मात्रा में भूसी हो जाती है।

चावल का पतंगा :  इनका आक्रमण चावल, ज्वार, सूजी, तिल और अलसी पर होता है। किंतु चावल और ज्वार पर अत्यधिक आक्रमण होता है। इसकी सूंडी ही नुकसान करती है एवं कीट बाधित अनाज जालनुमा हो जाता है।

लाल आटा बीटल :  इसमें साबुत दानों को भेदने की क्षमता होती है। इसके व्यस्क व सूंडी मुख्य रूप से पिसे हुए उत्पाद आटा, सूजी, मैदा व बेसन आदि उत्पादों में अधिक हानि पहुंचाते हैं। आटे में इसकी संख्या अत्यधिक होने पर आटा पीला पड़ जाता है एवं जाल बन जाते हैं और गंध आती है।

दाल भृंग :  इस कीट का आक्रमण मूंग, उड़द, चना, अरहर, मसूर तथा अन्य दालों पर होता है। कीट अपने अंडे हरी फलियों पर देती हैं। दानों के अंदर भृंग छेदकर घुस जाता है तथा छेद बंद कर देता है एवं वहां से गोदामों में पहुंच जाते हैं। ये सालभर सक्रिय रहते हैं किंतु जुलाई से सितंबर तक ज्यादा आक्रमण करते हैं।

अनाज का पतंगा :  ये सूंडियां भंडारित गेहूं, चावल, मक्का, ज्वार आदि के दानों में सुराख करके घुस जाती है तथा उन्हें खोखला कर अपने अवशिष्ट पदार्थ से भर देती है। ये सूंडियां टूटे हुए चावलों पर बाहरी आक्रमण करती है। दानों का जाल बनाती है और अनाज को खाती रहती है।

आटे की पंखी :  इसकी सूंडियां व व्यस्क दोनों नुकसान करते हैं। इसमें उडऩे की क्षमता होती है। यह भंडारित चावल, मक्का, ज्वार आदि पर मार्च से नवंबर के बीच आसानी से देखा जा सकता है। यह कीट दानों में सुराख कर देती है।

 

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जैविक खेती की ओर बढ़ते कदम : गोबर से खाद बनाने की मशीन से अच्छी कमाई

जैविक खेती की ओर बढ़ते कदम : गोबर से खाद बनाने की मशीन से अच्छी कमाई

जानें, कैसे बनता है इस मशीन से गोबर खाद, क्या है इसकी उपयोगिता सरकार जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए काफी प्रयास कर रही है। इसका प्रमुख कारण है कि लगातार यूरिया सहित अन्य कीटनाशकों के प्रयोग से भूमि की उर्वरक क्षमता कम होती जा रही है और खेत बंजर होते जा रहे हैं जिससे खेती योज्य भूमि का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। इस समस्या को लेकर सरकार ये प्रयास कर रही है कि किसानों की रूचि जैविक खेती की ओर बढ़े जिससे प्राकृतिक तरीके से खेती कर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को बढ़ाया जा सके। जैविक खेती के लिए सरकार से भी मदद मिलती है। हाल ही बिजनौर के एक किसान ने अपने स्तर पर जैविक खेती की शुरुआत भी कर दी है। इस किसान ने ऐसी मशीन लगाई है जो कुछ ही समय में गोबर को खाद में बदल देती है। मीडिया में प्रकाशित जानकारी के अनुसार बिजनौर के सिकंदरी गांव के रहने वाले किसान राजीव सिंह ने गोबर से खाद बनाने वाली मशीन लगाई है। इससे किसान गोबर के खाद की जरूरत को तुरंत पूरा कर सकते हैं। किसान राजीव सिंह के अनुसार उन्हें मशीन लगवाने में आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल सिंह योगी ने जागरूक किया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 जैविक खेती : गोबर खाद मशीन इस मशीन की सहायता से कम समय में गोबर को खाद में तब्दील किया जा सकता है। इसमें खर्चा भी कम आता है और किसानों को जब जरूरत हो वह गोबर यहां लाएं और खाद बनवाकर उसे ले जाए। इससे किसान को एक ओर अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है और दूसरी ओर गांव के किसानों को ताजा खाद उपलब्ध हो रहा है। इससे गांव के किसानों को फायदा मिल रहा है और जैविक खेती को बढ़ावा भी। इस संबंध में आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल सिंह योगी का कहना है कि राजीव सिंह की मशीन से जैविक खेती से किसानों को जुडऩे का मौका मिलेगा। किसानों की खेत की सभी पोषक तत्वों की जरूरत को मशीन से पूरा किया जा सकता है। इससे खेती की लागत घटेगी और किसान की आय भी बढ़ेगी। क्या है गोबर खाद की उपयोगिता गाय के गोबर में 86 प्रतिशत तक द्रव पाया जाता है। गोबर में खनिजों की भी मात्रा कम नहीं होती। इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन, चूना, पोटाश, मैंगनीज़, लोहा, सिलिकन, ऐल्यूमिनियम, गंधक आदि कुछ अधिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं तथा आयोडीन, कोबल्ट, मोलिबडिनम आदि भी थोड़ी थोड़ी मात्रा में रहते हैं। अस्तु, गोबर खाद के रूप में, अधिकांश खनिजों के कारण, मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। पौधों की मुख्य आवश्यकता नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटासियम की होती है। वे वस्तुएं गोबर में क्रमश: 0.3- 0.4, 0.1- 0.15 तथा 0.15- 0.2 प्रतिशत तक विद्यमान रहती हैं। मिट्टी के संपर्क में आने से गोबर के विभिन्न तत्व मिट्टी के कणों को आपस में बांधते हैं, किंतु अगर ये कण एक दूसरे के अत्यधिक समीप या जुड़े होते हैं तो वे तत्व उन्हें दूर दूर कर देते हैं, जिससे मिट्टी में हवा का प्रवेश होता है और पौधों की जड़ें सरलता से उसमें सांस ले पाती हैं। गोबर का समुचित लाभ खाद के रूप में ही प्रयोग करके पाया जा सकता है। इस प्रकार दुधारू पशुओं से प्राप्त गोबर उसे पैदावार तो अच्छी होती है साथ ही स्वस्थ उत्पादन प्राप्त होता है। अब तो मशीन से गोबर खाद बनाई जाने लगी है। ऐसी ही मशीन बिजनौर के किसान ने लगाई है जो कुछ ही घंटों में गोबर को खाद बना देती है। इससे किसानों किसानों को जैविक खेती के लिए खेतों में डालने के लिए तुरंत ही ताजा खाद मिल जाएगा। कैसे तैयार की जाती है इस मशीन से गोबर खाद गांव सिकंदरी के किसान राजीव सिंह के अनुसार गोबर को गड्ढ़े में डालकर उसमें जीवाणु वाला पानी मिलाया जाता है। फास्फोरस, नाइट्रोजन आदि किसी भी तत्व की पूर्ति के लिए ये जीवाणु मिलाए जाते हैं। अगर खेत में दीमक की समस्या है तो उसे दूर करने के लिए मैटाराइजम मिलाया जाता है। इससे तैयार घोल को मशीन के अंदर ले जाया जाता है। अगर मशीन में दस क्विंटल गोबर डाला जाए तो इससे तीन क्विंटल खाद मिल जाता है। बाकी 70 प्रतिशत जीवामृत/पानी मिलेगा। यह पानी भी पोषक तत्वों से युक्त होता है। इसे भी खेत में डाला जा सकता है। एक बीघा में कितना लगता है गोबर खाद गोबर के खाद से मुख्य रूप से कार्बन मिलता है। बिना कार्बन के कोई भी खाद असर नहीं करता है। सामान्य तीन से चार महीने पुरानी कूड़ी में कार्बन कम होता है। ऐसा खाद प्रति बीघा जमीन में 50 से 60 क्विंटल डालना होता है। केंचुए से बनने वाला खाद एक बीघा जमीन में केवल छह क्विंटल ही डालना होता है। जबकि मशीन से तैयार खाद केवल 40 किलो प्रति बीघा ही डालना होता है। मशीन से बनी गोबर खाद दिलाएंगी दीमक की समस्या से मुक्ति जमीन की उपजाऊ क्षमता बनाएं रखने के लिए किसान खेतों में गोबर की खाद डालते हैं। लेकिन गोबर की खाद भी हर समय किसान के पास उपलब्ध नहीं होती है। गोबर से खाद बनने में तीन से छह महीने का समय लगता है। अगर खाद तैयार न हो तो किसान कच्चा गोबर ही खेत में डाल देते हैं। इससे खाद का पूरा लाभ खेत को नहीं मिलता है। साथ ही कच्चा खाद दीमक की खुराक भी होता है। कच्ची खाद खेत में डालने से खेत में दीमक डेरा डाल देती हैं और फिर फसलों को भी नुकसान पहुंचाती हैं। लेकिन इस मशीन द्वारा तैयार खाद दीमक की समस्या को खतम करने में सहायक है क्योंकि गोबर से खाद बनाते समय इसमें मैटाराइजम मिलाया जाता है जो दीमक के खात्में के लिए काफी असरकारक माना गया है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गेहूं की अगेती खेती : इन किस्मों की करें बुवाई, होगा भरपूर फायदा

गेहूं की अगेती खेती : इन किस्मों की करें बुवाई, होगा भरपूर फायदा

जानें, कौनसी अगेती किस्म की करें बुवाई और क्या रखें सावधानियां? यह समय गेहूं की अगेती किस्म की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय है। इस समय किसान इन किस्मों की बुवाई करके अच्छा उत्पादन कर भरपूर मुनाफा कमा सकता है। किसान को अगेेती किस्म की बुवाई करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल सके। अगेती किस्म की बुवाई के संदर्भ में कृषि विशेषज्ञों ने कुछ सावधानियां बताईं हैं और इसी आधार पर इन किस्मों को तीन चरणों में बांटा गया है। इसी के साथ कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अगेती किस्म की बुवाई करते समय बीजों करना बेहद आवश्यक है। आइए जानते हैं कि आप किस तरह कुछ सावधानियां रखते हुए अगेती किस्मों की बुवाई कर अच्छा लाभ कमा सकते हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 अगेती गेहूं की किस्मों की बुवाई के समय का विभाजन कृषि विशेषज्ञों ने अगेती गेहूं की किस्मों के आधार पर इनकी बुवाई के समय को तीन चरणों में बांटा है। इसका पहला चरण 25 अक्टूबर से 10 नवंबर तक रखा गया है। दूसरा चरण 11 नवंबर से 25 नवंबर तक का है। वहीं तीसरा चरण 26 नवंबर से 25 दिसंबर तक का रहेगा। यानि गेहूं की अगेती किस्म की बुवाई किसान 25 अक्टूबर से लेकर 25 दिसंबर तक कर सकता है, लेकिन उसमें उसे हर चरण के अनुरूप खाद की मात्रा व बीज को उपचारित करने पर विशेष ध्यान रखना होगा। चरणों के अनुसार गेहूं की अगेती किस्में पहला चरण- (25 अक्टूबर से 10 नवंबर) के लिए अगेती गेहूं की किस्मों में एचडी 2967, डब्ल्यूएच 542, यूपी 2338, एचडी 2687, डब्लयूएच 1105 और देसी गेहूं सी-306 किस्में अच्छी है। दूसरा चरण- (11 नवंबर से 25 नवंबर) के लिए डब्ल्यूएच 542, डब्ल्यूएच 711, डब्ल्यूएच 283, डब्ल्यूएच 416 किस्मों की बुवाई की जा सकती है। तीसरा चरण- (25 नवंबर से 25 दिसंबर) के लिए पछेती किस्म एचडी 2851, यूपी 2338, आरएजे 3765, पीबीडब्ल्यू 373, आरएजे 3077 की बुवाई कर सकते हैं। इस समय किसान पहले चरण की बुवाई कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें पहले चरण की किस्मों का चयन कर सकते हैं। गेहूं की अगेती किस्म की बुवाई से पहले इन बातों का रखें ध्यान गेहूं की बुवाई के लिए तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। गेहूं की बुवाई के समय मिट्टी में नमी होना बेहद जरूरी है। इसके लिए खेत की अच्छे से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। गेहूं की बुवाई करने से 15-20 दिन पहले खेत तैयार करते समय 4-6 टन/एकड़ की दर से गोबर की खाद का खेत में डाल देनी चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ जाती है। गेहूं की बुवाई हैप्पी सीडर और सुपर सीडर की सहायता से करनी चाहिए जिससे बीज को सही मात्रा में उचित गहराई पर छोड़ा जा सके। ऐसा करने से अंकुरण अच्छा होता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पहले दो चरणों में 40 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की बुवाई करना चाहिए। वहीं तीसरे चरण में 50 से 60 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की बुवाई की जा सकती है। रोगों से बचाव के लिए बुवाई से पहले बीजों को 2 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बावास्टीन और बीटावैक्स से उपचारित करना चाहिए। वहीं दीमक से बचाने के लिए क्लोरोपाइरीफॉस 1.5 मिली, प्रति किलोग्राम से बीज को उपचारित किया जाना चाहिए। गेहूं की अगेती फसल की कब - कब करें सिंचाई गेहूं की खेती में सिंचाई प्रबंधन है जरूरी अधिक उपज के लिए गेहूं की फसल को पांच-छह सिंचाई की जरूरत होती है। पानी की उपलब्धता, मिट्टी के प्रकार और पौधों की आवश्यकता के हिसाब से सिंचाई करनी चाहिए। गेहूं की फसल के जीवन चक्र में तीन अवस्थाएं जैसे चंदेरी जड़ निकलना (21 दिन), पहली गांठ बनना (65 दिन) और दाना बनना (85 दिन) ऐसी हैं, जिन पर सिंचाई करना अति आवश्यक है। यदि सिंचाई के लिए जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो तो पहली सिंचाई 21 दिन पर इसके बाद 20 दिन के अंतराल पर अन्य पांच सिंचाई करें। वहीं पानी की बचत के लिए फव्वारा विधि या टपका विधि का प्रयोग करें। सिंचाई की इन तकनीकों पर केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी के रूप में अनुदान भी दिया जाता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए ये करें उपाय खरपतवार प्रबंधन गेहूं की फसल में संकरी पत्ती (मंडूसी/कनकी/गुल्ली डंडा, जंगली जई, लोमड़ घास) वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए क्लोडिनाफॉप 15 डब्ल्यूपी 160 ग्राम या फिनोक्साडेन 5 ईसी 400 मिलीलीटर या फिनोक्साप्रॉप 10 ईसी 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर प्रयोग करें। यदि चौड़ी पत्ती (बथुआ, खरबाथु, जंगली पालक, मैना, मैथा, सोंचल/मालवा, मकोय, हिरनखुरी, कंडाई, कृष्णनील, प्याजी, चटरी-मटरी) वाले खरपतवारों की समस्या हो तो मेटसल्फ्यूरॉन 20 डब्ल्यूपी 8 ग्राम या कारफेन्ट्राजोन 40 डब्ल्यूडीजी 20 ग्राम या 2,4 डी 38 ईसी 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें। सभी खरपतवारनाशी/शाकनाशी का छिडक़ाव बीजाई के 30-35 दिन बाद 120-150 लीटर पानी में घोल बनाकर फ्लैट फैन नोजल से करें। मिश्रित खरपतवारों की समस्या होने पर संकरी पत्ती शाकनाशी के प्रयोग उपरान्त चौड़ी पत्ती शाकनाशी का छिडक़ाव करें। बहुशाकनाशी प्रतिरोधी कनकी के नियंत्रण के लिए पायरोक्सासल्फोन 85 डब्ल्यूडीजी 60 ग्राम/एकड़ को बीजाई के तुरंत बाद प्रयोग करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

राज्य सरकार ने 19 जनपदों के किसानों को दिया फसल नुकसान का मुआवजा

राज्य सरकार ने 19 जनपदों के किसानों को दिया फसल नुकसान का मुआवजा

उत्तरप्रदेश में बाढ़ प्रभावित 3.48 लाख से अधिक किसानों को मिला 113.20 करोड़ रुपए का मुआवजा देश में इस वर्ष कई राज्यों में भारी बारिश के कारण बाढ़ आ गई थी। इससे किसानों की फसल को काफी नुकसान पहुंचा। कई इलाकों में तो बाढ़ से किसान की पूरी की पूरी फसल तबाह हो गई थी। इसको लेकर राज्य की सरकारों ने अपने-अपने राज्यों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर नुकसान का आकलन कराया था। इसके बाद भी इन राज्यों के किसानों को अभी तक बाढ़ से हुए फसल नुकसान का मुआवजा अभी तक नहीं दिया गया है जिसका उन्हें इंतजार है। वहीं उत्तरप्रदेश की सरकार ने राज्य के बाढ़ प्रभावित किसानों को सहायता राशि दे दी है। जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने बाढ़ प्रभावित 3.48 लाख से अधिक किसानों को 113.20 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया गया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 राज्य के 19 जनपदों को दिया फसल नुकसानी का मुआवजा उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने राज्य के 19 जनपदों के किसानों को सहायता राशि का वितरण किया। मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी आवास पर बाढ़ से प्रभावित 19 जनपदों के 3 लाख 48 हजार 511 किसानों को क्षतिपूर्ति अनुदान के रूप में 113 करोड़ 20 लाख 66 हजार रुपए की राशि उनके बैंक खातों में ऑनलाइन हस्तांतरित की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि वैश्विक बीमारी कोराना वायरस के बावजूद बाढ़ से प्रभावित जिलों में राहत कार्य युद्ध स्तर पर किया गया। हमारा यही प्रयास रहा कि सभी पीडि़तों तक राहत सामग्री मिले। सरकार सुख-दुख में किसानों के साथ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि शीघ्र ही यूपी सरकार बाढ़ की समस्या का स्थाई हल निकालेगी। इस बाबत कार्ययोजना तैयार हो रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि बाढ़ के कारण हुए नुकसान की भरपाई मुश्किल होती है। फिर भी सरकार के द्वारा बाढ़ से प्रभावित किसानों के जख्मों पर मलहम लगाने का कार्य किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर जनपद लखीमपुर खरी, गोरखपुर, बाराबांकी, बहराइच और सिद्धार्थ नगर के किसानों से बात भी की। किसानों को हर हाल में मिले उपज का समर्थन मूल्य किसानों की हित की बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार किसानों के हितों के कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है। किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिले यह सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है। इस दौरान उन्होंने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य हर हाल में मिलना ही चाहिए। मुआवजा राशि को किया सीधे किसानों के खाते में की हस्तांतरित अनुदान राशि डी.बी.टी.के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खातों में इस वर्ष बाढ़ से प्रभावित किसानों तथा क्षति संबंधित विवरण को पहली बार ऑनलाइन करते हुए एन.आई.सी. के माद्यम से वेब बेस्ड क्षति सर्वेक्षण तथा राहत वितरण तैयार किया गया, जिसके माध्यम से कृषि निवेश अनुदान राशि डी.बी.टी.के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खातों में अंतरित की गई। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब रायपुर में खोला जाएगा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का क्षेत्रीय केंद्र

अब रायपुर में खोला जाएगा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का क्षेत्रीय केंद्र

छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए अच्छी खबर, स्थानीय स्तर पर फसलों की लागत के निर्धारण में होगी सहुलियत छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए एक अच्छी खबर आई हैं। खबर ये हैं कि अब इस राज्य के रायपुर जिले में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का क्षेत्रीय केंद्र खुलने जा रहा है। इससे यहां स्थानीय स्तर पर किसानों की फसलों का लागत मूल्य निर्धारण किया जा सकेगा। आज देश भर के अलग-अलग जगहों पर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के 16 केंद्र खुले हुए हैं। यह 17 वां केंद्र होगा जो रायपुर में खोला जाएगा। जानकारी के अनुसार भारत सरकार द्वारा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का क्षेत्रीय केंद्र खोलने की स्वीकृति प्रदान की गई है। यह केंद्र आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 से कार्य करना प्रारंभ कर देगा। इस केन्द्र के संचालन हेतु भारत सरकार द्वारा 25 पद भी स्वीकृत किए गए हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 परियोजना के क्रियान्वयन हेतु केन्द्र सरकार से 10.75 करोड़ रुपए की मांग राज्य निर्माण के बाद से यहां किसानों द्वारा उत्पादित फसलों के लागत का आंकलन करने हेतु कोई केन्द्र नहीं था। अब तक जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर स्थित केन्द्र द्वारा ही छत्तीसगढ़ में फसल उत्पादन लागत का निर्धारण किया जा रहा था। विश्वविद्यालय विगत चार वर्षों से यहां इस केंद्र की स्वीकृति हेतु प्रयासरत था। अब केंद्र सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ के किसानों की खेती की लागत निर्धारण हेतु इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को एक परियोजना स्वीकृत की गई है। इस परियोजना के संचालन हेतु समस्त राशि भारत सरकार की ओर से प्रदान की जाएगी। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा परियोजना संचालित करने हेतु सहमति एवं आवश्यक बजट का प्रस्ताव भारत सरकार को भेज दिया गया है। परियोजना के क्रियान्वयन हेतु केन्द्र सरकार से 10.75 करोड़ रुपए की मांग की गई है। क्या है कृषि लागत एवं मूल्य आयोग और उसका काम कृषि लागत एवं मूल्य आयोग भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का एक संलग्न कार्यालय है। यह आयोग जनवरी1965 में अस्तित्व में आया। यह आयोग कृषि उत्पादों के संतुलित एवं एकीकृत मूल्य संरचना तैयार करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सलाह देता है। भारत सरकार द्वारा किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान, गेहूं, मक्का, ज्वार,बाजरा, जौ, रागी, सोयाबीन, अरहर, चना, उड़द, मूंग, मसूर, मूंगफली, तिल, रामतिल, सरसों, तोरिया, सूरजमुखी, कुसुम, गन्ना, कपास, जूट आदि फसलों की खरीदी की जाती है। इसके लिए प्रतिवर्ष आयोग द्वारा 23 कृषि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त गन्ने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की जगह उचित एवं लाभकारी मूल्य की घोषणा की जाती है। गन्ने का मूल्य निर्धारण आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति द्वारा अनुमोदित किया जाता है। अब तक कहां-कहां खोले गए हैं कृषि लागत एवं मूल्य आयोग केंद्र समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद के लिए फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण करने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा देश के 16 राज्यों आंध्रप्रदेश, आसाम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचलप्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय केन्द्र संचालित किए जा रहे हैं। अब केंद्र सरकार द्वारा छत्तीसगढ़, झारखंड एवं तेलंगाना में नवीन केंद्रों की स्थापना के लिए मंजूरी दी गई है। इसमें छत्तीसगढ़ के रायपुर में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का 17वां केंद्र खुलने जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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