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रंगीन शिमला मिर्च की खेती - कैसे करें 6 लाख की कमाई, जानें पूरी जानकारी

रंगीन शिमला मिर्च की खेती - कैसे करें 6 लाख की कमाई, जानें पूरी जानकारी

10 September, 2020

इस तरह से करें शिमला मिर्च की खेती होगी 5 से 6 लाख रुपए तक आमदनी

देश में इन दिनों रंगीन शिमला मिर्च की मांग में बढ़ गई है। खाने के शौकिनों ने इसकी मांग में इजाफा किया है। वहीं कोरोना में लोग अपनी सेहत के प्रति काफी जागरूक हो गए है। शिमला मिर्च को सेहत के लिए फायदेमंद मानते हुए भी इसकी बाजार में मांग बढ़ रही है। इसे देखते हुए इसकी खेती किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकता है। वहीं रंगीन शिमला मिर्च मांग ज्यादा होने से इसके बाजार में हरी शिमला मिर्च के मुकाबले कई गुना अधिक दाम मिलते हैं। इसकी व्यवसायिक खेती करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। 

अनुमान के तौर पर यदि आप आपके पास एक एकड़ भूमि है तो आप इसकी खेती करके एक साल में करीब 3 से 3.50 लाख तक की इनकम प्राप्त कर सकते हैं। यदि इसकी खेती पॉली हाउस में करेंगे तो 5 से 6 लाख तक की आमदनी हो सकती है। पाली हाउस में किसान छह रंगों जैसे लाल, पीली, ओरेंज, चॉकलेट, वायलेट और ग्रीन शिमला मिर्च पैदा कर सकता है। जिनसे अच्छा उत्पादन और लाभ किसान को मिलता है। बाजार में इसके अच्छे दाम मिलते हैं। रंगीन शिमला मिर्चों की बाजार में कीमत 100 से 250 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है। जबकि हरी शिमला मिर्च का दाम 40 रुपए प्रति किलो से ज्यादा होते हैं। अगर पोली हाउस में किसान 600 क्विंटल भी पैदावार लेता है तो किसान की आमदनी करीब छह लाख तक हो सकती है।

 

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शिमला मिर्च के पाए जाने वाले विटामिन

शिमला मिर्च, मिर्च की एक प्रजाति है जिसका प्रयोग भोजन में सब्जी की तरह किया जाता है। अंग्रेजी मे इसे कैप्सिकम (जो इसका वंश भी है) या पैपर भी कहा जाता है। शिमला मिर्च एक ऐसी सब्जी है जिसे सलाद या सब्जी के रूप में खाया जा सकता है। बाजार में शिमला मिर्च लाल, हरी या पीले रंग की मिलती है। चाहे शिमला मिर्च किसी भी रंग की हो लेकिन उसमें विटामिन सी, विटामिन ए और बीटा कैरोटीन भरा होता है। इसके अंदर बिल्कुल भी कैलोरी नहीं होती इसलिए यह खराब कोलेस्ट्रॉल को नहीं बढ़ाती। साथ ही यह वजन को स्थिर बनाए रखने में भी मददगार है।

 

 


भारत में कहां - कहां होती है इसकी खेती

भारत में शिमला मिर्च की खेती हरियाणा, पंजाब, झारखंड, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक आदि प्रदेशों में सफलतापूर्वक की जाती है। इसके अलावा अब तो पूरे भारत में इसकी खेती की जाने लगी है। इसकी सबसे ज्यादा मांग दिल्ली और चंडीगढ़ के होटलों में होती है यहां इनका प्रयोग सलाद के रूप में किया जाता है।


पॉलीहाउस में उगाएं कई रंगों की शिमला मिर्च 

सब्जी उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना से प्रदेश के किसानों में पोली हाउस में की जाने वाली संरक्षित खेती के प्रति जागरूकता आई है। पोली हाउस में की जाने वाली शिमला मिर्च की संरक्षित खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा है। शिमला मिर्च की खेती में किसान विभिन्न रंगों की शिमला मिर्च ईजाद कर सकता है। जिनकी मार्केट वेल्यू अलग-अलग होती है। अगस्त-सितंबर माह में पोली हाउस में की जाने वाली इस खेती में प्रति एकड़ 12 हजार शिमला मिर्च के पौधे लगाए जा सकते हैं और प्रत्येक पौधा छह से सात किलो तक फसल देता और किसान यह फसल नौ महीनों तक ले सकता है। जबकि खुले में कम उत्पादन के साथ मात्र हरे रंग की शिमला मिर्च ही उत्पादित की जा सकती है। इसे देखते हुए पॉलीहाउस में शिमला मिर्च की खेती करना अधिक मुनाफे का सौदा है। 


शिमला मिर्च की उन्नत किस्में

बॉम्बे ( रेड शिमला मिर्च ) - यह जल्दी पकने वाली किस्म है। यह किस्म लम्बी, पौधे मजबूत और शाखाएं फैलने वाली होती हैं। इसके फलों के विकास के लिए पर्याप्त छाया की जरूरत होती है। इसके फल गहरे हरे होते है तथा पकने के समय यह लाल रंग के हो जाते हैं, इसका औसतन वजन 130 से 150 ग्राम होता है। इसके फलों को ज्यादा समय के लिए स्टोर करके रखा जा सकता है। यह ज्यादा दूरी वाले स्थान पर ले जाने के लिए उचित होते है।

ओरोबेल ( येलो शिमला मिर्च ) - यह किस्म मुख्यत: ठंडे मौसम में विकसित होती है। इसके फल ज्यादातर वर्गाकार, सामान्य तथा मोटे छिलके वाले होते है। इसके फल पकने के समय पीले रंग के होते है, जिनका औसतन भार 150 ग्राम होता है। यह किस्म बीमारीयों की रोधक किस्म है। जो कि ग्रीन हाउस और खुले खेत में विकसित होती है।

ग्रीन गोल्ड  -  इसके फल लम्बे और मोटे होते है, गहरे हरे और 100 से 120 ग्राम तक वजन के होते है।

सोलन हाइब्रिड 1 -  यह किस्म शीघ्र तैयार होने वाली तथा अधिक पैदावार देने वाली है। यह मध्य क्षेत्रो के लिए उपयुक्त है, यह फल सडऩ रोग रोधी किस्म है।

सोलन हाइब्रिड 2 -  यह किस्म भी अच्छी पैदावार देने वाली है7 इसके फल 60 से 65 दिन में तैयार हो जाते है। यह फल सडन और जीवाणु रोगरोधी किस्म है। इसकी पैदावार 325 से 375 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

सोलन भरपूर -  इसके फल घंटी नुमा होते है। यह फसल 70 से 75 दिन में तैयार हो जाती है। फल सडन और जीवाणु रोग सहनशील है। इसकी पैदावार 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

कैलिफोर्निया वंडर -  यह काफी प्रचलित तथा उन्नत किस्म है। इसके पौधे मध्यम लम्बाई के और सीधे बढ़ते है। फल गहरे हरे तथा चिकने होते है और फलों का छिलका मोटा होता है।

यलो वंडर -  इसके पौधे छोटे आकार के होते है। फल का छिलका मध्यम होता है और फल गहरे हरे होते है।

अन्य किस्में -  शिमला मिर्च की अन्य उन्नत किस्में इस प्रकार है, जैसे- अर्का गौरव, अर्का मोहिनी, किंग आफ नार्थ, अर्का बसंत, ऐश्वर्या, अलंकर, अनुपम, हरी रानी, पूसा दीप्ती, हिरा आदि प्रमुख और अच्छी उपज वाली किस्में है।

 

पीली शिमला मिर्च की है बाजार में सबसे अधिक मांग

शिमला मिर्च की कई रंगों की किस्मों में पीली रंग की शिमला मिर्च की मांग बाजार में सबसे अधिक है। इसकी मुख्य वजह इसका आकर्षक रंग तो है ही जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। साथ ही ये विटामिन की दृष्टि से भी उपयोगी है। जो लोग अपने स्वस्थ केे प्रति सचेत हैं वे इसे शिमला मिर्च का इस्तेमाल सलाद के रूप में करते हैं क्योंकि इसे पकाकर खाने से अधिक इसे सलाद के रूप में उपयोग करना अधिक फायदेमंद है।  पीली शिमला मिर्च में विटामिन ए, बीटा-कैरोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। पीली शिमला मिर्च को आप अगर रोजाना अपने भोजन में शामिल करेंगे तो आपको इसके बहुत से फायदें होंगे। 
 

पीली शिमला मिर्च खाने से होने वाले फायदे

  • अगर आप अपने बढ़ते वजन के कारण परेशान हैं तो पीली शिमला मिर्च आपकी इस समस्या को दूर करने में मदद कर सकता है। इसमें बहुत ही कम मात्रा में कैलोरी पाई जाती है, जिससे वजन कम होता है। 
  • पीली शिमला मिर्च एक बेहतरीन पेनकिलर का काम भी करती है। पीले रंग की सब्जियां और फलों में काफी मात्रा में विटामिन पाए जाते हैं। इन्हें खाने से शरीर में आई सूजन और एलर्जी को रोकने में सहायता मिलती है। पीले रंग के खाद्य पदार्थों में नींबू, अनानास, पीली शिमला मिर्च और अंगूर शामिल हैं।
  • पीली शिमला मिर्च में भरपूर मात्रा में विटामिन ए और सी पाया जाता है जो एक्सी-ऑक्सीडेंट का एक अच्छा स्त्रोत है। इसके अलावा ये दिल से जुड़ी बीमारियों, अस्थमा और मोतियाबिंद से बचाव में भी ये काफी फायदेमंद है। 
  • पीली शिमला मिर्च में कई ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जो शरीर में कैंसर की सेल्स को बनने से रोकते हैं। अगर आप रोज सब्जी, सलाद के रूप में पीली शिमला मिर्च का इस्तेमाल करते हैं तो आपको कैंसर होने की संभावना बहुत कम हो जाती है।
     

शिमला मिर्च का चुनाव करते समय ध्यान रखने वाली बातें

  • पॉलीहाउस में शिमला मिर्च उत्पादकों को किस्में हमेशा वही चुनी जानी चाहिए, जो ज्यादा बिकती हों। 
  • वर्तमान में लाल और पीली (सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली) के अतिरिक्त बैंगनी, संतरी, भूरी रंग की शिमला मिर्च की किस्में भी उपलब्ध हैं। 
  • पॉलीहाउस के अंदर हमेशा संकर (हाईब्रिड) किस्में ही उपयोग करनी चाहिए। 
  • अच्छे रंग के अलावा किस्म में रोगों व फल विकारों के प्रति प्रतिरोध क्षमता भी होनी अत्यावश्यक है।


जलवायु व भूमि

शिमला मिर्च की खेती के लिए नर्म आद्र्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी अच्छी वृद्धि के लिए कम से कम तापमान 21 से 25 डिग्री सेल्सियस होना अच्छा रहता है। इसकी भूमि की बात करें तो इसकी खेती के लिए चिकनी दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो उपयुक्त रहती है। 

 

बुवाई का उपयुक्त समय

पॉली हाउस में इसकी खेती के लिए उपयुक्त समय अगस्त-सितंबर माह की जा सकती है। किसान यह फसल नौ महीनों तक ले सकता है। वहीं बेमौसमी फसल लेनेे के लिए इसे जनवरी से फरवरी माह में भी बोया जा सकता है।


पौध तैयार करना

पौध तैयार करने के लिए 98 छिद्रों वाली प्रो-टे (प्लास्टिक की ट्रे) का प्रयोग करना चाहिए। इसमें कोको पीट, वरमीकुलाइट, बालू या परलाइट मिश्रण प्रयोग करना चाहिए। यह रोगमुक्त होने के साथ-साथ अत्यन्त भुरभुरा होता है, जिससे जड़ों का विकास अच्छे से होता है। सामान्यत: 100 किलोग्राम कोकोपीट से लगभग 100 प्रो-ट्रे भरा जा सकता है। ट्रे के एक छिद्र में एक बीज डालकर कोकोपीट से बीज को ढक देना चाहिए। इसके बाद हजारे की सहायता से हल्की सिंचाई कर इसे पॉलीथीन से ढक देना चाहिए। इससे सामान्यत: 6 से 8 दिनों में इसका अंकुरण हो जाता है। अंकुरण होने के बाद प्रो-ट्रे में तैयार शिमला मिर्च के पौधों से पॉलीथीन को हटा देना चाहिए। इस तरह पौध 4 से 6 सप्ताह में रोपण हेतु तैयार हो जाती है।


क्यारियां तैयार करना

सबसे पहले पॉलीहाउस में मिट्टी की खुदाई के उपरान्त ढेलों को तोडक़र जमीन को भुरभुरा, समतल और मुलायम बनाएं और 100 सेंटीमीटर चौड़ी और 15 सेंटीमीटर ऊंची क्यारियां बनाएं तथा कतारों के मध्य 50 सेंटीमीटर की दूरी छोड़ दें। 


खाद व उरर्वक

क्यारियां बनने के बाद उसमें सड़ी हुई गोबर की खाद 20 किलोग्राम तथा नीम की खली 100 ग्राम प्रति वर्ग मीटर में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं है तथा 4 प्रतिशत फॉरमल्डीहाइड से 4 लीटर प्रति वर्ग मीटर क्यारियों को गीला करें। सभी क्यारियों को चार दिनों तक काली पॉलीथीन की चादरों से ढक़कर पॉलीहाउस की खिडक़ी-दरवाजे बंद कर दें ताकि हानिकारक रोगाणुओं का नाश हो जाए। चार दिनों के बाद पॉलीथीन को हटा दें जिससे फॉरमल्डीहाइड का धुआं पूरी तरह निकल जाए। वहीं पौध लगाने के पहले प्रति वर्ग मीटर नाइट्रोजन 05 ग्राम, फास्फोरस 05 ग्राम एवं पोटाश 05 ग्राम की पोषित खुराक डालें। क्यारियों के मध्य में सिंचाई के लिए इन लाइन लेट्रल पाइप डालें। इस पाइप में 30 सेंटीमीटर दूरी पर छेद होता है, जिससे 2 लीटर पानी का निकास होता है।

 

 


मल्चिग

पॉलीहाउस में तैयार क्यारियों को 100 गेज (25 माइक्रोन) की काली पॉलीथीन से ढक कर दोनों तरफ किनारे से मिट्टी को दबा देना चाहिए।
कतारों के बीच 60 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 30 सेंटीमीटर के अंतर पर दोहरी कतार में छेद बनाए जाते हैं। शिमला मिर्च के पौधों को पॉलीहाउस में प्लास्टिक की ट्रे में तैयार करने के बाद रोपण किया जाता है। 


रोग व कीट प्रबंधन

पौधों को रोग एवं कीटों से बचाने के लिए रोपण के एक दिन पहले 0.3 मिलीलीटर इमिडाक्लोप्रिड प्रति लीटर पानी का मिश्रण बनाकर छिडक़ाव करना चाहिए। रोपने से पहले 1 लीटर पानी में 1 ग्राम फफूंदनाशक (कार्बेन्डाजिम) के मिश्रण से पौधों की जड़ों को गीला किया जाना चाहिए।


पौधरोपण

पौधों को पॉलीथीन के छिद्रों के मध्य में लगाया जाता है। इसमें ध्यान देना चाहिए कि पौध कहीं भी पॉलीथीन की चादर से नहीं छु पाएं। 


सिंचाई

रोपण के तत्काल बाद हजारे से हल्की सिंचाई करना चाहिए। पौध स्थापित होने तक प्रतिदिन इसी तरह सिंचाई होना जरूरी है। यदि पॉलीहाउस में आर्द्रता कम हो तो फॉगर चलाए जाते हैं। पॉलीहाउस को रोग मुक्त करने के बाद भी अगर पौध मरने लगे तो एक लीटर पानी में 3 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या एक लीटर पानी में एक ग्राम कार्बेन्डाजिम से क्यारियों को गीला किया जाना चाहिए।


अन्य वानकी क्रियाएं

शिमला मिर्च के पौधे को 30 सेंटीमीटर ऊपर से काट कर उसकी दो शाखाओं को बढऩे दिया जाता है। पौधे की इन शाखाओं को फसल के अन्त तक रखा जाता है, शेष अन्य सभी शाखाओं को हटाते रहना चाहिए। दूसरी गांठ के पास से फिर काट देना चाहिए। जिससे चार शाखाएं निकल आती हैं। बढ़ते हुए पौधों को सहारा देने के लिए सुतली (रस्सी) या प्लास्टिक ट्यूब से प्रत्येक शाखा को साधा जाता है। इसके अलावा प्रतिदिन 2 से 3 लीटर पानी प्रति वर्ग मीटर की दर से दिया जाना चाहिए। रोपण के तीसरे हफ्ते में घुलनशील उर्वरक 19:19:19 (एन पी के) को 13.74 ग्राम प्रति वर्ग मीटर में ड्रिप सिंचाई द्वारा दिया जाना चाहिए। रोपण के 60 दिन बाद 2 या 3 दिन अन्तराल पर सूक्ष्म पोषक तत्व देना चाहिए।

 


कितना होगा खर्चा और कितनी होगी कमाई

पोली हाउस में अगर किसान साल में 600 क्विंटल भी पैदावार लेता है तो किसान की आमदनी करीब छह लाख तक हो जाती है। इतना ही नहीं पोली हाउस में होने वाली खेती में न के बराबर पेस्टीसाइड दवाइयों का प्रयोग होता है और ड्रीप लाइन से 60 प्रतिशत तक पानी बचता है। पोली हाउस में शिमला मिर्च लगाने के लिए किसान का 10 से 20 हजार का ही खर्च आता है। किसान खुले में खेती करता है तो उसे करीब 30 हजार रुपए ही बचते है।

 

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दालों ने पकड़ी तेजी की रफ्तार, अरहर में 500 रुपए क्विंटल की तेजी

दालों ने पकड़ी तेजी की रफ्तार, अरहर में 500 रुपए क्विंटल की तेजी

अरहर, उड़द व चना दाल की कीमतों में भारी इजाफा, अभी तीन महीने बाद आएगी नई फसल कोरोना संक्रमण काल में जहां आम आदमी की आमदनी कम हुई है वहीं खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं। सब्जियों के भावों में तेजी के बाद अब दालों के भावों ने भी तेजी की रफ्तार पकड़ ली है। साबुत दालों की कीमतों में आई तेजी का असर अरहर, उड़द आर चना दाल की कीमतों पर देखा जा रहा है। थोक में लेमन अरहर दाल की कीमतों में 500 रुपए की तेजी देखी गई है। दिल्ली के नया बाजार में लेमन अरहर दाल के भाव 10 हजार 400 से 10 हजार 800 रुपए प्रति क्विंटल बोले गए हैं। वहीं दिल्ली में उड़द धोया की कीमतों में 300 रुपए की तेजी आई है, भाव 9600 से 9800 रुपए प्रति क्विंटल बोले गए हैं। चना दाल के भाव भी तेजी के बाद 6300 से 6600 रुपए प्रति क्विंटल हो गए हैं। मूंग धोया के भाव 8500 से 8800 रुपए और मसूर मल्का कोरी के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल पर स्थिर बने हुए हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 दाल की कीमतों में तेजी के कारण बाजार विशेषज्ञों के अनुसार भारी बारिश से देश के कई हिस्सों में फसल खराब हुई है। उड़द और मूंग की फसल को काफी नुकसान पहुंचा है। कुछ हिस्सों में तुअर की फसल भी बर्बाद हुई। बारिश के कारण फसल को नुकसान और मांग में सुधार के कारण दालों की कीमतों में लगातार बढ़त देखने को मिल रही है। सरकार द्वारा आयात लाइसेंस जारी नहीं करने के कारण भी घरेलू बाजार में तुअर की सप्लाई कम हुई है जिससे कीमतों को और सपोर्ट मिला है। नैफेड के तुअर ना बेचने से भी कीमतों में तेजी आई है। त्योहारी मांग से चना में लगातार तेजी, मूंग व उड़द के दाम भी बढ़े चने की दाल में भी लगातार तेजी बनी हुई है और भविष्य में त्योहारी डिमांड के चलते तेजी की संभावना है। पिछले एक महीने के दौरान चने की कीमतों में 40 फीसदी का उछाल आया है। एनसीडीईएक्स पर चना 5600 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से बिक रहा है। खरीफ दलहन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढऩे से इसको सहारा मिल रहा है। नैफेड के पास चना का काफी स्टॉक है। सरकार 13.77 लाख टन दलहन और तिलहन खरीदेगी। व्यापारियों के अनुसार चार महीने बाद जब नई फसल आएगी तब ही कीमतों में गिरावट देखने को मिलेगी। इसके साथ ही अगर मटर की दाल के इंपोर्ट पर लगा बैन हट जाता है तो चने की कीमतें नीचे आ जाएंगी। इसके अलावा मूंग और उड़द दाल भी 10 फीसदी तक महंगी हो चुकी है। व्यापारियों ने की आयात कोटा जारी करने की मांग चना दाल की कीमतें पिछले साल इस अवधि में 70-80 रुपये प्रति किलो थी लेकिन इस बार यह 100 रुपये के पार पहुंच चुकी है। अरहर दाल 115 रुपये प्रति किलो बिक रही है। कारोबारियों की मांग है कि सरकारी एजेंसी नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (नेफेड) को सप्लाई बढ़ाने के लिए अपना स्टॉक रिलीज करना चाहिए। देश के अंदर सप्लाई में गिरावट आई है। जबकि, डिमांड लगातार बढ़ रही है। इसलिए कारोबारियों ने 2020-21 के लिए आयात कोटा जारी करने की मांग की है। इस साल बंपर पैदावार का अनुसार सरकार का मानना है कि आपूर्ति की स्थिति ठीकठाक है और अगले तीन महीने में खरीफ सीजन की फसल बाजार में आनी शुरू हो जाएगी। इस साल बंपर पैदावार का अनुमान है। जानकारी के मुताबिक भारत को उम्मीद है कि खरीफ सीजन में दालों का कुल उत्पादन 93 लाख टन होगा। अरहर का उत्पादन पिछले साल के 38.3 लाख टन के मुकाबले इस साल बढक़र 40 लाख टन होने की उम्मीद है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

आपकी किस्मत बदल देगी मोती की खेती

आपकी किस्मत बदल देगी मोती की खेती

मोती की खेती (Pearl Farming) का सीजन शुरू, कम जगह और थोड़ी सी लागत से लाखों रुपए का मुनाफा ट्रैक्टर जंक्शन में किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम आपको मोती की खेती से कमाई संबंधित सभी जानकारी देंगे। देशभर में किसान पारंपरिक खेती के अलावा अन्य विकल्पों में भी अपना भाग्य आजमा रहे हैं और अपनी कमाई का जरिया बढ़ा रहे हैं। देश का किसान मोती की खेती से भी अपनी आय बढ़ा सकते हैं। मोती की खेती के लिए सरकार की ओर से ट्रेनिंग भी दी जाती है। साथ ही कई बैंकों की ओर से मोती की खेती के लिए आसान शर्तों पर लोन उपलब्ध कराया जाता है। तो आइए जानते हैं मोती की खेती के बारे में संपूर्ण जानकारी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मोती की खेती कैसे होती है? ( pearl cultivation ) यहां पर हम आपको मोती की खेती के मौसम, आवश्यक जगह, लागत, ट्रेनिंग सेंटर व बाजार में मोतियों की बिक्री व कीमत के बारे में जानकारी दे रहे हैं। मोती की खेती के लिए मौसम मोती की खेती से कम लागत और मेहनत में अधिक मुनाफा मिलने की संभावना है, इसलिए किसानों का रूझान मोती की खेती तरफ भी बढ़ा है। मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानि अक्टूबर से दिसंबर तक का महीना माना गया है। मोती की खेती के लिए जमीन या जगह मोती की खेती उसी प्रकार से की जाती है जैसे मोती प्राकृतिक रूप से तैयार होता है। किसान भाई अपने खेत या घर के आसपास छोटी जगह पर मोती की खेती कर सकते हैं। मोती की खेती के लिए 500 वर्गफीट का तालाब होना चाहिए। इस तालाब में 100 सीप पालकर मोती का उत्पादन शुरू किया जा सकता है। मोती की खेती में लागत किसान भाई 500 वर्गफीट के तालाब में 100 सीप पालकर मोती का उत्पादन शुरू कर सकते हैं। बाजार में सीप की कीमत 15 से 25 रुपए प्रति नग होती है। वहीं तालाब बनाने पर करीब 15 से 20 हजार रुपए का खर्चा आता है। इसके अलावा वाटर ट्रीटमेंट और उपकरणों पर भी 5 हजार रुपए तक का खर्चा आता है। सीप को कैसे करें तैयार मोती की खेती शुरू करने के लिए सबसे पहले तालाब या नदी आदि जगहों से सीपों को इकट्ठा किया जाता है। इसके अलावा सीपों को बाजार से भी खरीदा जा सकता है। सीप आप सरकारी संस्थानों से या मछुआरों से ले सकते हैं। सबसे पहले इन सीपों को खुले पानी में डाला जाता है। फिर 2 से 3 दिन बाद इन्हें निकाला जाता है। ऐसा करने से सीप के ऊपर का कवच और उसकी मांसपेशियां नरम हो जाती हैं। इनमें मामूली सर्जरी के माध्यम से उसकी सतह पर 2 से 3 एमएम का छेद किया जाता है। इसके बाद इस छेद में से रेत का एक छोटा सा कण डाला दिया जाता है। इस तरह से सीप में रेत का कण डाला जाता है, तो सीप में चुभन होती है और सीप अपने अंदर से निकलने वाला पदार्थ छोडऩा शुरू कर देता है। इसके बाद 2 से 3 सीप को एक नायलॉन के बैग में रखकर तालाब में बांस या किसी पाईप के सहारे छोड़ा जाता है। बाद में इस सीप से 15 से 20 महीने के बाद मोती तैयार हो जाता है। अब कवच को तोडक़र मोती निकाला जाता है। भारत में मोती तैयार करने की विधि भारत में मोती तैयार करने की तीन विधियां ज्यादा प्रचलित हैं। इनमें केवीटी, गोनट और मेंटलटीसू शामिल है। केवीटी में सीप के अंदर ऑपरेशन के जरिए फारेन बॉडी डालकर मोती तैयार किया जाता है। इसका इस्तेमाल अंगूठी और लॉकेट बनाने में होता है। चमकदार होने के कारण एक मोती की कीमत हजारों रुपए में होती है। गोनट में प्राकृतिक रूप से गोल आकार का मोती तैयार होता है। मोती चमकदार व सुंदर होता है। एक मोती की कीमत आकार व चमक के अनुसार 1 हजार से 50 हजार रुपए तक होती है। मेंटलटीस पद्धति में सीप के अंदर सीप की बॉडी का हिस्सा ही डाला जाता है। इस मोती का उपयोग खाने के पदार्थों जैसे मोती भस्म, च्यवनप्राश व टॉनिक बनाने में होता है। बाजार में इसकी सबसे ज्यादा मांग है। मोती की खेती से लाभ किसान भाई मोती की खेती से अच्छा लाभ कमा सकते हैं। एक सीप से एक मोती १५ से 20 महीने बाद तैयार होता है। वर्तमान में एक सीप का बाजार भाव करीब 20 से 30 रुपए के बीच है। बाजार में एक मिमी से लेकर 20 मिमी साइज के सीप के मोती का दाम करीब 300 रुपए से लेकर 2000 रुपए के बीच मिलता है। सीप से मोती निकालने के बाद सीप को बाजार में भी बेच जा सकता है। भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशों में मोती का निर्यात कर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। बेहतर क्वालिटी और डिजाइनर मोती की कीमत इससे कहीं अधिक 10 हजार रुपए तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मिल जाती है। सीप की संख्या को बढ़ाकर कमाई को बढ़ाया जा सकता है। असली मोती की कीमत अगर किसान भाई चाहें तो हैदराबाद, सूरत, अहमदाबाद, मुंबई जैसे शहरों में सीधे भी अपने मोती बेच सकते हैं। इन शहरों में हजारों कारोबारी हैं, जो मोती का के व्यवसाय में लगे हुए हैं। वहीं कई बड़ी कंपनियां देशभर में अपने एजेंटों के माध्यमों से मोतियों को खरीदती हैं। आप चाहें तो इन कंपनियों से भी संपर्क में रह सकते हैं। अगर आपको इंटरनेट की समझ है तो आप ऑनलाइन भी अपने मोती बेच सकते हैं। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार एक असली मोती की कीमत लगभग 360 रुपये / कैरेट और 1800 रुपये प्रति ग्राम होती है। मोती की खेती की ट्रेनिंग देश में मोती की खेती के लिए कई जगह ट्रेनिंग मिलती है। मोती की खेती थोड़ा वैज्ञानिक खेती है। इसलिए इसे शुरू करने से पहले किसानों को प्रशिक्षण की जरूरत होती है। इंडियर काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च के तहत एक विंग देश में बना हुआ है। इस विंग का नाम सीफा यानी सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर है। यह मोती की खेती की ट्रेनिंग देता है। इसका मुख्यालय उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में है। यह संस्थान ग्रामीण नवयुवकों, किसानों एवं छात्र-छात्राओं को मोती उत्पादन पर तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करता है। यहां पर कोई भी 15 दिनों की ट्रेनिंग ले सकता है। भारत सरकार का सेंट्रल मेरिन फिसरिज रिसर्च इंस्टीच्यूट ने केरल के तिरुवनंतपुरम में व्यवसायिक रूप से मोती के उत्पादन का बड़ा केंद्र स्थापित किया है। मोती की खेती के लिए लोन मोती की खेती के लिए कई संस्थाओं व बैंकों द्वारा लोन उपलब्ध कराया जाता है। यह लोन नाबार्ड और कई बैंक से मिलता है। इस लोन पर कम ब्याज देना होता है और 15 सालों तक चुकाने के लिए समय भी मिलता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

धान की सरकारी खरीद  : केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य पर 41,084 किसानों से की 6 लाख टन धान की खरीद

धान की सरकारी खरीद : केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य पर 41,084 किसानों से की 6 लाख टन धान की खरीद

41,084 किसानों के जेब में पहुंचे 1,082.46 करोड़ रुपए किसानों की ओर से नए कृषि कानून के विरोध के बीच शुरू की गई धान की समर्थन मूल्य पर खरीद जोरो पर चल रही है। पिछले 8 दिनों में केद्र सरकार ने करीब 5.73 लाख टन धान की खरीद की है। इससे किसानों के जेब में करीब 1,082.46 करोड़ रुपए पहुंचे हैं। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार अब तक केंद्र सरकार की ओर से 6 लाख टन धान की खरीद की जा चुकी है। केंद्र के अनुसार पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख राज्यों से पिछले आठ दिनों में 1,082.46 करोड़ रुपए का लगभग 5.73 लाख टन धान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा गया है। सरकार ने बताया है कि 41,084 किसानों से एमएसपी पर 1,082.46 करोड़ रुपये का धान खरीदा गया है। पंजाब और हरियाणा में 26 सितंबर से धान की खरीद शुरू हुई, जबकि अन्य राज्यों में यह 28 सितंबर से शुरू हुई। खाद्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा, 3 अक्टूबर तक धान की कुल खरीद 5,73,339 टन रही है। बता दें कि सरकार ने चालू वर्ष के लिए धान का एमएसपी (सामान्य ग्रेड) 1,868 रुपए प्रति क्विंटल और ए ग्रेड किस्म का धान का एमएसपी 1,888 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने इस खरीफ सत्र (2020-21) में समर्थन मूल्य के अनुसार 495 लाख टन (49.5 मिलियन टन) धान खरीद का लक्ष्य रखा है। पिछले साल सरकार ने लगभग 420 लाख टन धान की खरीद की थी जिसको इस साल बढ़ाकर 495 लाख टन खरीद का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 धान की खरीद को लेकर हरियाणा में ये है व्यवस्था वैसे राज्य सरकार ने अधिकारियों ने ऐसी तैयारी की है कि किसानों को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं हो रही है। इसके लिए हरियाणा में इस बार धान की खरीद के लिए 200 अतिरिक्त केंद्र बनाए जा रहे हैं। इसी के साथ राज्य में कुल 400 धान खरीद केंद्र हो जाएंगे। ये खरीद केंद्र उन 8 जिलों में बनाए जा रहे हैं जिनमें धान की पैदावार अधिक होती है। इसी के साथ हरियाणा में खरीद के लिए मेरा पोर्टल मेरा ब्योरा के तहत पंजीकृत किसानों को प्राथमिकता दी जा रही है। इधर पंजाब में धान की खरीद के लिए बनाए गए खरीद केंद्रों पर किसानों की आवाजाही बनी हुई है। हालांकि पंजाब में कृषि कानून विरोध के जारी रहने से इस बार यहां की मंडियों में किसानों की आवाजाही में कमी आई है। छत्तीसगढ़ में एक नबंवर से धान की खरीद शुरू करने की मांग मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार छत्तीसगढ़ में धान की खरीद शुरू करने को लेकर भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों के हित में फैसला लेते हुए 60 लाख मीट्रिक टन धान लेने का फैसला किया है। इस हिसाब से प्रदेश को 90 लाख मीट्रिक टन धान की आवश्कता पड़ेगी। हमारी मांग है कि प्रदेश सरकार भी किसानों के हित में फैसला लेते हुए अब प्रति एकड़ 15 क्विंटल के स्थान पर 20 क्विंटल धान की खरीद करें। साथ ही धान की खरीद एक नबंवर से शुरू की जानी चाहिए। बता दें कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और अभी यहां धान की खरीद को लेकर तारीख तय की जानी है। इधर सीसीआई ने खरीदी 40.80 लाख रुपए की कपास जानकारी के अनुसार कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया सीसीआई ने 40.80 लाख रुपए में एमएसपी पर 147 गांठ खरीदी है। कपास की एक गांठ 170 किलोग्राम की होती है। पिछले साल भारतीय कपास निगम यानी कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा हरियाणा के किसानों से सीधे 30 लाख क्विंटल कपास की खरीद की गई थी। बता दें कि इस साल खरीफ सीजन की कपास के लिए केंद्र सरकार ने 5515 और 5825 रुपए प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया गया है। मीडियम स्टेपल कपास का एमएसपी 5515 रुपए/क्विंटल और स्टेपल कपास का एमएसपी 5825 रुपए/ क्विंटल है। पिछले साल यह मूल्य 5,150 और 5,450 रुपए था। कपास खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई हरियाणा सरकार ने इस वर्ष 2020-2021 में कपास की खरीद को और बढ़ाने का लक्ष्य निधारित किया है। कपास की खरीद के लिए पिछले साल हरियाणा में 20 कपास खरीद केंद्र थे, जिसे इस साल बढ़ाकर 40 कर दिया गया है। कपास को लेकर सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि कपास की खरीद के दौरान 12 फीसदी तक नमी के पहले से ही तय मानक का पालन किया जाएगा और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

उत्तरप्रदेश में समर्थन मूल्य पर धान की खरीद शुरू

उत्तरप्रदेश में समर्थन मूल्य पर धान की खरीद शुरू

जानें क्या है खरीद केंदों पर व्यवस्था और किस समय होगी खरीद, 28 फरवरी 2021 तक जारी रहेगी धान की खरीद उत्तर प्रदेश में धान की खरीद गुरुवार से शुरू हो गई है। इसके लिए विभिन्न खरीद केंद्रों पर समुचित व्यवस्था की गई है ताकि किसानों को कोई परेशानी नहीं हो। उत्तरप्रदेश सरकार इस बार किसानों से 50 लाख टन धान की खरीद करेगी। प्रदेश सरकार के प्रवक्ता ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने मीडिया को बताया कि मंत्रिमंडल ने धान खरीद नीति को अनुमोदित करते हुए सामान्य किस्म के धान को 1850 रुपए प्रति क्विंटल तथा ए ग्रेड के धान को 1837 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदने का निर्णय लिया है। उन्होंने बताया कि धान की छान-बीन के लिए किसानों को 20 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से अतिरिक्त धनराशि चुकाई जाएगी। शर्मा ने बताया कि वर्ष 2018-9 में 48 लाख 25 हजार टन धान खरीदा गया था। वहीं 2019-20 में 50 लाख टन धान खरीद का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष सामान्य श्रेणी का धान 1750 रुपए प्रति क्विंटल जबकि ए ग्रेड का धान 1770 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदा गया था। साथ ही धान की साफ सफाई के लिए 20 रुपए प्रति क्विंटल अलग से भुगतान किया गया था। शर्मा ने बताया कि धान खरीद एक अक्टूबर से शुरू होकर अगले साल 28 फरवरी तक जारी रहेगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 कब राज्य के किस जिले में होगी खरीद खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 के लिए खाद्य एवं रसद विभाग की प्रमुख सचिव वीणा कुमारी ने मूल्य समर्थन योजना के अंतर्गत धान क्रय नीति जारी की है। धान क्रय नीति के तहत लखनऊ संभाग के जनपद हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर तथा संभाग बरेली, मुरादाबाद, मेरठ, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़ तथा झांसी में धान खरीदी की अवधि 1 अक्टूबर 2020 से 31 जनवरी, 2021 तक धान की खरीद की जाएगी। वहीं लखनऊ संभाग के जनपद लखनऊ, रायबरेली, उन्नाव व चित्रकूट, कानपुर, फैजाबाद, देवीपाटन, बस्ती, गोरखपुर, आजमगढ़, वाराणसी, मिर्जापुर एवं प्रयागराज मंडलों में 1 नवंबर, 2020 से 28 फरवरी, 2021 तक धान खरीदी जाएगी। यहां धान के खरीद केंद्रों के खुलने का समय सुबह 9.00 बजे से शाम 5.00 बजे तक का रहेगा। किसानों की सुविधा के लिए खरीद केंद्रों के समय में किया जा सकेगा परिवर्तन धान खरीद नीति के अनुसार जिलाधिकारी, स्थानीय परिस्थितयों के अनुसार खरीदी केंद्रों के खुलने एवं बंद करने के समय में आवश्यक परिवर्तन कर सकेंगें। किसानों को सुविधा प्रदान करने के उद्देश्य से रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों को छोडक़र शेष कार्य दिवसों में धान केंद्र खुले रहेंगे। जिलाधिकारी केंद्रों पर धान की आवक व लक्ष्यपूर्ति को ध्यान में रखते हुए अवकाश के दिनों में भी धान की खरीद की जाएगी। इस बार 3000 खरीद केंद्र खोला जाना है प्रस्तावित खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 के लिए 3000 खरीद केंद्र खोला जाना प्रस्तावित है। खरीदी केंद्रों का निर्धारण एवं चयन जिलाधिकारी द्वारा इस प्रकार किया जाएगा की किसान को अपना धान बेचने के लिए 08 किलोमीटर से ज्यादा दूरी न तय करनी पड़े। उपज खरीद सत्र में 100 मीट्रिक टन से कम खरीद की संभावना वाले क्षेत्र में विकास खंड स्तर पर अधिकतम एक केंद्र ही खोला जाएगा। वहीं उन क्षेत्रों में खरीद केंद्र मुख्य रूप से स्थापित किया जाएगा, जहां धान की अच्छी आवक होती है। धान की उपज बेचने के लिए ऐसे करा सकते हैं पंजीकरण इन खरीद केंद्रों पर धान की उपज बेचने के लिए किसान को अपना पंजीकरण करना जरूरी होता है। इसके बाद ही उससे धान की खरीद की जाती है। उत्तरप्रदेश राज्य में धान की खरीदी खाद्य एवं रसद विभाग के द्वारा की जाती है। किसानों को धान समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए www.fsc.up.gov.in पर पंजीकरण करवाना आवश्यक होता है। किसान इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए टोल फ्री नंबर 1800-1800-150 पर संपर्क कर सकते है। पंजीकरण हेतु आवश्यक दस्तावेज जोतबही / खाता नंबर अंकित कम्प्यूटराइड खतौनी की कॉपी आधार कार्ड की कॉपी बैंक पासबुक के प्रथम पृष्ठ (जिसमें खाता धारक का विवरण अंकित हो) की कॉपी किसान का एक पासपोर्ट साइज फोटो । अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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