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कृषि सहित अन्य क्षेत्रों में शुरू करें स्टार्टअप, सरकार खर्च करेगी एक हजार करोड़ रुपए

कृषि सहित अन्य क्षेत्रों में शुरू करें स्टार्टअप, सरकार खर्च करेगी एक हजार करोड़ रुपए

स्टार्ट अप इंडिया अभियान : जानें, क्या है स्टार्टअप इंडिया सीड फंड

अगर आप युवा हैं साथ ही नई सोच के साथ खुद का उद्यम स्थापित करके दूसरों को रोजगार देने की सोच रहे हैं तो केंद्र की मोदी सरकार की नीतियां अब आपकी हर कदम पर मदद करेगी। केंद्र सरकार ने नए उद्यमियों की मदद के लिए एक हजार करोड़ रुपए के स्टार्ट अप इंडिया सीड फंड की घोषणा की है। इस समय देश में आईटी, स्वास्थ्य व कृषि क्षेत्र से जुड़े स्टार्टअप सबसे ज्यादा संख्या में काम कर रहे हैं और अभी यहां काम करने की बहुत गुंजाइश है।

 

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प्रारंभ : स्टार्टअप भारत अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मिला तोहफा

मोदी सरकार ने पांच साल पहले 16 जनवरी 2016 को स्टार्ट अप इंडिया अभियान शुरू किया था। इस अभियान के पांच वर्ष पूरे होने पर पीएम मोदी ने देश में एडवांस टेक्नोलॉजी वाले नए एंटरप्राइजेज (उद्यमों) और इनोवेशन (नवाचार) को बढ़ावा देने के लिए एक हजार करोड़ रुपये के ‘स्टार्ट-अप इंडिया सीड फंड’ की शुरुआत की है। प्रारंभ : स्टार्टअप भारत अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधित करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज देश में ई.टॉयलेट से लेकर पीपीई किट और दिव्यांगों के लिए सेवाएं देने तक के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उनका मकसद नए स्टार्ट अप की वृद्धि को बढ़ावा देने में मदद करना है। इससे नये उद्यमियों को शुरुआती पूंजी उपलब्ध होने के साथ नये उद्यमों की शुरुआत और उनकी वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगा।

इस कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि स्टार्ट-अप की वृद्धि से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और उस क्षेत्र के लोगों के जीवन में सुधार लाने में मदद मिलेगी। इस अवसर पर आयोजित सम्मेलन में बिमस्टेक सदस्य देशों की भी भागीदारी रही। बिमस्टेक बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के देशों में बहुक्षेत्रीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग की पहल वाला क्षेत्रीय संगठन है। इसमें भारत के अलावा बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और थाइलैंड को मिलाकर सात देश शामिल हैं।

 

 

देश में 41 हजार स्टार्टअप, 30 से ज्यादा का मूल्यांकन एक अरब से ज्यादा

सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सन् 2014 में केवल चार स्टार्टअप का मूल्यांकन ही एक अरब से ज्यादा का था जो कि यूनिकॉर्न क्लब में शामिल थे लेकिन आज 30 से ज्यादा भारतीय स्टार्ट-अप यूनिकॉर्न क्लब के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में 2020 में ही 11 भारतीय स्टार्ट-अप यूनिकॉर्न क्लब में शामिल हुए हैं। देश में इस समय 41 हजार से ज्यादा स्टार्ट-अप काम कर रहे हैं। इनमें से 5,700 से ज्यादा आईटी के क्षेत्र में हैं, वहीं 3,600 से ज्यादा स्वास्थ्य क्षेत्र और करीब 1,700 स्टार्टअप कृषि क्षेत्र में काम कर रहे हैं। आपको बता दें कि ऐसा स्टार्टअप जिसका मूल्यांकन एक अरब डॉलर तक पहुंच जाता है, वह यूनिकॉर्न कहलाता है। 44 प्रतिशत स्टार्ट-अप में महिलाएं मुख्य भूमिका में हैं।

 

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स्टार्टअप को गारंटी के जरिए कोष जुटाने में मदद करेगी सरकार

सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि केंद्र सरकार स्टार्ट-अप के लिए इक्विटी पूंजी जुटाने में मदद के वास्ते कोषों के फंड की योजना को पहले ही अमल में ला चुकी है। अब आने वाले दिनों में सरकार स्टार्ट-अप को गारंटी के जरिए कोष जुटाने में भी मदद करने वाली है। मोदी ने कहा कि आज स्टार्ट-अप के मामले में भारत दुनिया का तीसरा बड़ा देश बन गया है। इस दौरान कई उभरते उद्यमियों को आगे बढऩे में मदद की गई। इनोवेटिवटेक्नोलॉजी के साथ ये उद्यमी आगे बढ़े और इनमें कई बड़ी कंपनी बन चुके हैं।

 

40 प्रतिशत स्टार्टअप छोटे शहरों से

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत में स्टार्ट-अप केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि नए उभरते 40 प्रतिशत स्टार्ट-अप देश के दूसरी और तीसरी कैटेगरी के शहरों से सामने आ रहे हैं। भारत स्टार्टअप पारिस्थितिकी के मामले में ‘युवा का, युवा द्वारा, युवाओं के लिए’के मंत्र पर काम कर रहा है।

 

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देश में स्टार्टअप के कुछ अनूठे उदाहरण, जिनसे आपको मिलेगी सीख

  • फैबहेड्स की स्थापना भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व इंजीनियर दिनेश कनगराज ने की है। यह कंपनी कार्बन फाइबर प्रिंटिंग क्षमताओं के साथ स्व-विकसित 3 डी प्रिंटर तैयार करती है। चेन्नई की यह कंपनी कई ऐप्लिकेशन उपलब्ध करा रही है। उदाहरण के लिए, लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले ड्रोन के लिए उसकी बैटरी के साथ-साथ ड्रोन का वजन अहम भूमिका निभाता है। कार्बन फाइबर बॉडी वाले ड्रोन उच्च शक्ति एवं कठोरता होने के साथ ही कम वजन के हो सकते हैं। मिश्रित उत्पादों एवं नवीन विनिर्माण प्रौद्योगिकियों के डिजाइन में अपनी विशेषज्ञता के साथ, फैबहेड्स देश की अग्रणी ड्रोन कंपनियों के लिए पसंदीदा भागीदार बन रही है। यह अपनी एक सहायक कंपनी के माध्यम से भारतीय नौसेना को भी ड्रोन की आपूर्ति कर रही है।
  • फ्रेश रूम की स्थापना भोपाल में आशुतोष गिरि ने की है, जो एक प्रौद्योगिकी संचालित स्वच्छता क्षेत्र से जुड़ी स्टार्टअप है। यह 'भुगतान करो, उपयोग करो एवं रिडीम पॉइंट हासिल करो' के मॉडल पर चलता है। फ्रेश रूम टॉयलेट को साफ, ताजा एवं कीटाणुरहित रखने के लिए इंसानों पर निर्भर होने के बजाय इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) एवं क्लाउड तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। सार्वजनिक शौचालयों में स्वच्छता के मुद्दे का ख्याल रखने के साथ-साथ फ्रेश रूम में अपने उपयोगकर्ता के सामान की देखभाल करने का वादा किया है। यह ऐप निकटतम सार्वजनिक शौचालय का पता लगाने के साथ उसके खुलने का समय, पहुंच, पार्किंग और बेबीकेयर जैसी अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराता है। गिरि का कहना है कि ये स्मार्ट शौचालय हर साल 40 फीसदी पानी बचा सकते हैं। उन्होंने साल 2024 तक 5,000 ऐसे स्मार्ट शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा है।
  • जिंजरमाइंड्स टेक्नोलॉजीज बेंगलुरू स्थित स्टार्टअप है जो कृत्रिम मेधा (एआई) तकनीक संचालित ऐप उपलब्ध करता है। यह दृष्टिबाधितों को चलने में मदद करने, वस्तुओं की पहचान करने और उनके स्मार्टफोन की सहायता से संदेश पढऩे में मदद करता है। यह दृष्टिïहीनों के लिए 'सिरी' की तरह है जो उन्हें एक स्वतंत्र जीवन जीने में मदद करता है। जब दृष्टिहीन व्यक्ति इस ऐप को खोलते है, तो यह उन्हें अपने दैनिक कार्यों में मदद करने के लिए विभिन्न विकल्पों के बारे में बताता है। कंपनी ने दृष्टिहीनों की सहायता के लिए पहनने योग्य उत्पाद भी विकसित किए हैं। यदि कोई उपयोगकर्ता अखबार पढऩा चाहता है, तो वह इसे फोन के माध्यम से स्कैन कर सकता है और ऐप उसे पढ़ेगा। यह सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करता है। आई-डी के 160 से अधिक देशों में 70,000 से अधिक दृष्टिहीन उपयोगकर्ता हैं।
  • हैदराबाद के पवन कुमार चंदना का स्टार्टअप 'स्काईरोट एयरोस्पेस' कई तरह के रॉकेटों का निर्माण कर रही है। यह अंतरिक्ष के लिए उत्तरदायी, विश्वसनीय एवं आर्थिक रूप से सस्ती प्रौद्योगिकियों का निर्माण कर रही है। यह कंपनी एक ऐसे भविष्य की कल्पना करती है जहां अंतरिक्ष का सफर किसी हवाई उड़ान की तरह नियमित, विश्वसनीय एवं सस्ता हो।
  • हरियाणा के सोनीपत निवासी सतीश कुमार और विलास चिकारा ने एसएनपीसी मशीन्स द्वारा विकसित ईंट बनाने वाली एक चलती फिरती मशीन भी लोगों को बहुत पसंद आ रही है। यह एक वाहन की तरह चलती है और ईंटें बिछाती है और भट्टा मालिकों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कहीं भी ईंट बनाने की स्वतंत्रता देती है। इस मशीन की उत्पादन क्षमता 12 हजार ईंट प्रति घंटा है।

 

 

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