• Home
  • News
  • Agriculture News
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य : केरल में सब्जियों व फलों का भी एमएसपी घोषित

न्यूनतम समर्थन मूल्य : केरल में सब्जियों व फलों का भी एमएसपी घोषित

न्यूनतम समर्थन मूल्य : केरल में सब्जियों व फलों का भी एमएसपी घोषित

राज्य सरकार ने 16 सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य किया तय

भारत में पहला एक मात्र राज्य केरल है जिसने केंद्र सरकार की ओर से हर वर्ष जारी किए जाने वाले प्रमुख अनाज व तिलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की तर्ज पर सब्जियों का न्यूनतम आधार मूल्य तय करने की पहल की है। इसके पीछे कारण यह है कि राज्य सरकार चाहती है कि सब्जियों का न्यूनतम आधार मूल्य तय हो ताकि सब्जियों की खेती करने वाले किसान को कम दाम पर अपनी उपज नहीं बेचनी पड़े। यह एक तरीका निकाला गया है किसान की आय बढ़ाने का। केरल राज्य ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। 

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1


16 सब्जियों का आधार मूल्य तय

जानकारी के अनुसार केरल राज्य सरकार ने 16 सब्जियों का आधार मूल्य तय किया है। इसके अनुसार उत्पादन लागत से 20 प्रतिशत अधिक पर इन सब्जियों का विक्रय होगा ताकि किसान को लागत निकलने के साथ ही मुनाफा हो सके। मीडिया में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने बताया कि यह योजना एक नवंबर से प्रभावी होगी। योजना की ऑनलाइन शुरुआत करते हुए, उन्होंने कहा कि यह पहला मौका है जब केरल में उत्पादित 16 किस्मों की सब्जियों के लिए आधार कीमत तय की गई है। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य द्वारा यह पहली ऐसी पहल है, जो किसानों को राहत और सहायता प्रदान करेगी। एक सरकारी विज्ञप्ति में मुख्यमंत्री के हवाले से कहा गया है कि सब्जियों का आधार मूल्य, उनकी उत्पादन लागत से 20 प्रतिशत अधिक होगा। यहां तक कि अगर बाजार मूल्य इससे नीचे चला जाता है, तो किसानों से उनकी उपज को आधार मूल्य पर खरीदा जाएगा।

 


सब्जियों की गुणवत्ता पर तय होगा आधार मूल्य

मुख्यमंत्री ने कहा कि सब्जियों को गुणवत्ता के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा और आधार मूल्य उसी के हिसाब से तय किया जाएगा। उन्होंने कहा कि देश भर के किसान संतुष्ट नहीं हैं, लेकिन पिछले साढ़े चार साल से हमने उनका समर्थन किया है। सरकार ने राज्य में कृषि को विकसित करने के लिए कई लक्षित पहल की हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि केरल में पिछले साढ़े चार साल में सब्जी उत्पादन दुगुना हो गया है। इस दौरान सब्जियों का उत्पादन सात लाख टन से बढक़र 14.72 लाख टन हो गया है।


अभी तक इन सब्जियों व फलों का आधार मूल्य हुआ तय

केरल सरकार ने कुल 21 खाने-पीने की चीजों के लिए एमएसपी तय किए हैं। राज्य में तापियोका का एमएसपी 12 रुपए प्रति किग्रा तय किया गया है। वहीं, केला 30 रुपए, अन्नास 15 रुपए प्रति किग्रा और टमाटर का एमएसपी 8 रुपए प्रति किग्रा तय किया गया है। किसानों की लागत खर्च से 20 फीसदी ऊपर दर पर एमएसपी तय की गई है। इसी प्रकार अन्य सब्जियों व फलों के एमएसपी तय किए जा रहे हैं। सब्जियों के यह एमएसपी 1 नवंबर से राज्य में लागू होंगे। इस योजना के तहत केरल सरकार 1000 स्टोर भी खोलेगी।


सब्जियों व फलों का एमएसपी तय होने पर किसानों को होगा ये लाभ

केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन द्वारा मीडिया को बताए गए अनुसार यह योजना किसानों को आर्थिक तौर पर और ज्यादा मजबूत बनाएगी। सब्जियों का आधार मूल्य उनकी उत्पादन लागत से 20 फीसदी अधिक रखा जाएगा। यदि बाजार मूल्य इससे नीचे चला भी जाता है, तो चिंता की बता नहीं है। किसानों से उनकी उपज को आधार मूल्य पर ही खरीदा जाएगा। हालांकि सब्जियों को क्वालिटी के अनुसार बांटा जाएगा और आधार मूल्य उसी हिसाब से लगाया जाएगा। वहीं केरल के कृषि विशेषज्ञ जी. जनार्दन कहते हैं कि न्यूनतम मूल्य तय होने से किसान फल-सब्जियां उगाने के लिए प्रेरित होंगे। उन्हें यह भरोसा मिलेगा कि वे अपनी उपज का एक निश्चित मूल्य हासिल करेंगे। उनकी आमदनी बढ़ेगी जिससे वे इनके भंडारण पर भी ज्यादा रकम खर्चा कर पाएंगे।


झारखंड राज्य भी लागू करेगा यही सिस्टम

केरल राज्य की देखादेखी अब झारखंड भी नाराज किसानों के हित में यही सिस्टम अपने लागू करने जा रहा है। इसको लेकर सरकार में मंथन किया जा रहा है। मीडिया में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने और उन्हें बिचौलियों से मुक्त कराने के लिए झारखंड सरकार भी सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने जा रही है। इसके लिए केरल, कर्नाटक समेत अन्य राज्यों के ड्राफ्ट का अध्ययन कर रिपोर्ट मंगवाई गई है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही सब्जियों की एमएसपी तय की जाएगी। झारखंड के कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग के सचिव अबु बकर सिद्दीक के मुताबिक, झारखंड सरकार सब्जियों की एमएसपी तय करने को लेकर गंभीर है, ताकि किसानों को औने-पौने दामों में अपनी फसल को न बेचना पड़े। उन्होंने माना कि सब्जियों के लिए एमएसपी सिस्टम लागू करने से पहले उन्हें बहुत तैयारी करनी होगी और सब्जियों के रखरखाव के लिए बड़े पैमाने पर कोल्ड स्टोरेज की भी व्यवस्था करनी होगी।


ये राज्य भी कर रहे है इस योजना को लागू करने पर विचार

कर्नाटक सरकार भी ऐसी मांग पर विचार कर रही है। वहीं, पंजाब में किसान ऐसी मांग कर रहे है। महाराष्ट्र में अंगूर, टमाटर, प्याज जैसी फसलों के किसान भी एमएसपी की मांग कर रहे हैं। पंजाब के किसान संगठनों ने हाल में राज्य सरकार से सब्जियों और फलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने की मांग की है। इन सबसे ऊपर केरल राज्य सब्जियों के लिए न्यूनतम मूल्य तय करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।

 

 

अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

Top Agriculture News

पाला : फसलों को शीतलहर व पाले से बचाएं, ये उपाय अपनाएं

पाला : फसलों को शीतलहर व पाले से बचाएं, ये उपाय अपनाएं

फसल की सुरक्षा : जानें, वे कौन-कौनसे उपाय है जो फसल को सर्द मौसम के प्रकोप से रखेंगे सुरक्षित सर्दी का मौसम चल रहा है और आने वाले समय में सर्दी का प्रकोप और बढऩे वाला है। मौसम वैज्ञानिकों ने इस बार लंबे समय तक सर्दी का असर होने के साथ ही इसके अधिक पडऩे की संभावना जताई है। इसका असर दिखने भी लगा है। दिन-प्रतिदिन तापमान में कमी आ रही है। सुबह और रात के तापमान में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। विशेषकर उत्तरभारत में सर्दी का प्रकोप कुछ अधिक ही रहता है। इसका प्रभाव इंसानों के साथ ही फसलों पर भी पड़ता है। अधिक सर्दी से फसलों की उत्पादकता पर विपरित असर पड़ता है और परिणामस्वरूप कम उत्पादन प्राप्त होता है। इसलिए सर्दी के मौसम में फसलों को विशेष देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे फसलों को शीतलहर व पाले से बचाने के लिए अपने प्रयास तेज कर दें ताकि संभावित हानि से बचा जा सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 पाला : क्या है कारण जब वायुमंडल का तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस या फिर इससे नीचे चला जाता है तो हवा का प्रवाह बंद हो जाता है जिसकी वजह से पौधों की कोशिकाओं के अंदर और ऊपर मौजूद पानी जम जाता है और ठोस बर्फ की पतली परत बन जाती है। इसे ही पाला पडऩा कहते हैं। पाला पडऩे से पौधों की कोशिकाओं की दीवारें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और स्टोमेटा नष्ट हो जाता है। पाला पडऩे की वजह से कार्बन डाइआक्साइड, आक्सीजन और वाष्प की विनियम प्रक्रिया भी बाधित होती है। शीतलहर व पाले से फसलों को कैसे होता है नुकसान शीतलहर व पाले से फसलों व फलदार पेड़ों की उत्पादकता पर सीधा विपरित प्रभाव पड़ता है। फसलों में फूल और बालियां/फलियां आने या उनके विकसित होते समय पाला पडऩे की सबसे ज्यादा संभावनाएं रहती हैं। पाले के प्रभाव से पौधों की पत्तियां और फूल झुलसने लगते हैं। जिसकी वजह से फसल पर असर पड़ता है। कुछ फसलें बहुत ज्यादा तापमान या पाला झेल नहीं पाती हैं जिससे उनके खराब होने का खतरा बना रहता है। पाला पडऩे के दौरान अगर फसल की देखभाल नहीं की जाए तो उस पर आने वाले फल या फूल झड़ सकते हैं। जिसकी वजह से पत्तियों का रंग मिट्टी के रंग जैसा दिखता है। अगर शीतलहर हवा के रूप में चलती रहे तो उससे कोई नुकसान नहीं होता है, लेकिन हवा रूक जाए तो पाला पड़ता है जो फसलों के लिए ज्यादा नुकसानदायक होता है। पालेे की वजह से अधिकतर पौधों के फूलों के गिरने से पैदावार में कमी हो जाती है। पत्ते, टहनियां और तने के नष्ट होने से पौधों को अधिक बीमारियां लगने का खतरा रहता है। सब्जियों, पपीता, आम, अमरूद पर पाले का प्रभाव अधिक पड़ता है। टमाटर, मिर्च, बैंगन, पपीता, मटर, चना, अलसी, सरसों, जीरा, धनिया, सौंफ, अफीम आदि फसलों पर पाला पडऩे के दिन में ज्यादा नुकसान की आशंका रहती है। जबकि अरहर, गन्ना, गेहूं व जौ पर पाले का असर कम दिखाई देता है। शीत ऋतु वाले पौधे 2 डिग्री सेंटीग्रेट तक का तापमान सहन कर सकते हैं। इससे कम तापमान होने पर पौधे की बाहर और अंदर की कोशिकाओं में बर्फ जम जाती है। शीतलहर व पाले से फसल की सुरक्षा के उपाय / फसल की सुरक्षा के उपाय नर्सरी के पौधों एवं सब्जी वाली फसलों को टाट, पॉलिथीन अथवा भूसे से ढक देना चाहिए। वायुरोधी टाटियां को हवा आने वाली दिशा की तरफ से बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगाने से पाले और शीतलहर से फसलों को बचाया जा सकता है। पाला पडऩे की संभावना को देखते हुए जरूरत के हिसाब से खेत में सिंचाई करते रहना चाहिए। इससे मिट्टी का तापमान कम नहीं होता है। सरसों, गेहूं, चावल, आलू, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने के लिए गंधक के तेजाब का छिडक़ाव करने से रासायनिक सक्रियता बढ़ जाती है और पाले से बचाव के अलावा पौधे को लौह तत्व भी मिल जाता है। गंधक का तेजाब पौधों में रोगरोधिता बढ़ाने में और फसल को जल्दी पकाने में भी सहायक होता है। दीर्घकालीन उपाय के रूप में फसलों को बचाने के लिए खेत की मेड़ों पर वायु अवरोधक पेड़ जैसे शहतूत, शीशम, बबूल, खेजड़ी और जामुन आदि लगा देने चाहिए जिससे पाले और शीतलहर से फसल का बचाव होता है। थोयोयूरिया की 500 ग्राम 1000 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव कर सकते हैं, और 15 दिनों के बाद छिडक़ाव को दोहराना चाहिए। चूंकि सल्फर (गंधक) से पौधे में गर्मी बनती है अत: 8-10 किग्रा सल्फर डस्ट प्रति एकड़ के हिसाब से डाल सकते हैं। या घुलनशील सल्फर 600 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिडक़ाव करने से पाले के असर को कम किया जा सकता है। पाला पडऩे की संभावना वाले दिनों में मिट्टी की गुड़ाई या जुताई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से मिट्टी का तापमान कम हो जाता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

दिसंबर माह में करें इन फसलों की खेती, होगा भरपूर मुनाफा

दिसंबर माह में करें इन फसलों की खेती, होगा भरपूर मुनाफा

दिसंबर माह में बोई जाने वाली फसलें, जानें, कौनसी हैं वे फसलें जो दे सकती है भरपूर कमाई हर फसल की बुवाई का अपना समय होता है। यदि उचित समय पर फसलों की बुवाई की जाएं तो अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। इसलिए हमें इस बात की जानकारी होना बेहद जरूरी है कि किस माह कौनसी खेती करें ताकि भरपूर उत्पादन के साथ ही अच्छा मुनाफा कमाया जा सके। वैसे तो आजकल अधिकतर सब्जियों की खेती बारहों माह होने लगी है। पर बेमौसमी फसल लेने से उत्पादन में कमी तो आती ही साथ ही फसल की गुणवत्ता भी कम होती है जिससे उसके बाजार में अच्छे भाव नहीं मिल पाते जबकि सही समय पर फसल लेने से बेहतर उत्पादन के साथ भरपूर कमाई की जा सकती है। तो आइए जानते हैं दिसंबर माह में कौन-कौनसी फसल की खेती करें ताकि भरपूर कमाई हो सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 टमाटर की खेती दिसंबर माह में टमाटर की खेती की जा सकती है। इसके लिए इसकी उन्नत किस्मों का चयन किया जाना चाहिए। इसकी उन्नत किस्मों में अर्का विकास, सर्वोदय, सिलेक्शन -4, 5-18 स्मिथ, समय किंग, टमाटर 108, अंकुश, विकरंक, विपुलन, विशाल, अदिति, अजय, अमर, करीना, अजित, जयश्री, रीटा, बी.एस.एस. 103, 39 आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं। ऐसे करें नर्सरी तैयार : टमाटर की नर्सरी में दो तरह की क्यारियां बनाई जाती हैं। पहली उपर उठी हुई क्यारियां तथा दूसरी समतल क्यारियां। गर्मी के मौसम पौधे तैयार करने हेतु समतल क्यारियां बनाते हैं, और अन्य मौसम जैसे वर्षा एवं ठंड के लिए उपर उठी हुई क्यारियां बननी चाहिए। ओपन पोलिनेटेड किस्मों में 400 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर एवं संकर जातियों में 150 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है। रोपाई की विधि : टमाटर के पौधे 25-30 दिन में अक्सर रोपाई योग्य हो जाते है, यदि तापमान में कमी हो तो बोवाई के बाद 5-6 सप्ताह भी लग जाते हैं। लाइन से लाइन की दूरी 60 से. मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 45 से. मी. रहे। पौधों के पास की मिट्टी अच्छी तरह उंगलियों से दबा दें एवं रोपाई के तुरंत बाद पौधों को पानी देना ने भूलें। शाम के समय ही रोपाई करें, ताकि पौधों को तेज धूप से शुरू की अवस्था में बचाया जा सके। मूली की खेती मूली की फसल के लिए ठंडी जलवायु अच्छी रहती है। मूली का अच्छा उत्पादन लेने के लिए जीवांशयुक्त दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है। इसकी उन्नत किस्में जापानी सफ़ेद, पूसा देशी, पूसा चेतकी, अर्का निशांत, जौनपुरी, बॉम्बे रेड, पूसा रेशमी, पंजाब अगेती, पंजाब सफ़ेद, आई.एच. आर1-1 एवं कल्याणपुर सफ़ेद है। शीतोषण प्रदेशो के लिए रैपिड रेड, ह्वाइट टिप्स, स्कारलेट ग्लोब तथा पूसा हिमानी अच्छी प्रजातियां है। बुवाई का तरीका : मूली की बुवाई मेड़ों तथा समतल क्यारियों में भी की जाती है। लाइन से लाइन या मेड़ों से मेंड़ों की दूरी 45 से 50 सेंटीमीटर तथा उचाई 20 से 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। वहीं पौधे से पौधे की दूरी 5 से 8 सेंटीमीटर होनी चाहिए। मूली की बुवाई के लिए मूली का बीज 10 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। मूली के बीज का शोधन 2.5 ग्राम थीरम से एक किलोग्राम बीज की दर से उप शोधित करना चाहिए या फिर 5 लीटर गौमूत्र प्रतिकिलो बीज के हिसाब से बीजोपचार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद उपचारित बीज को 3 से 4 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए। पालक की खेती पालक को ठंडे मौसम की जरूरत होती पालक की बुवाई करते समय वातावरण का विशेष ध्यान देना चाहिए। उपयुक्त वातावरण में पालक की बुवाई वर्ष भर की जा सकती है। पालक की उन्नत किस्मों में प्रमुख रूप से पंजाब ग्रीन व पंजाब सलेक्शन अधिक पैदावार देने वाली किस्में मानी जाती हैं। इसके अलावा पालक की अन्य उन्नत किस्मों में पूजा ज्योति, पूसा पालक, पूसा हरित, पूसा भारती आदि शामिल हैं। बुवाई का तरीका : अधिकतर पालक सीधे खेत में बोया जाता है। किसान सीधे जमीन पर पंक्तियों में पालक के बीज (ज्यादातर संकर) लगा सकते हैं या उन्हें खेत में फैला सकते हैं। पौधों को बढऩे के लिए बीच में पर्याप्त जगह की आवश्यकता होती है। सीधे बीज बोने पर, हम 1-1,18 इंच (2,5-3 सेमी) की गहराई में पंक्तियों में बीज लगाते हैं। निरंतर उत्पादन के लिए, हम हर 10-15 दिनों में बीज बो सकते हैं। पत्ता गोभी की खेती इसे हर तरह की भूमि पर उगाया जा सकता है पर अच्छे जल निकास वाली हल्की भूमि इसके लिए सबसे अच्छी हैं मिट्टी की पी एच 5.5-6.5 होनी चाहिए। यह अत्याधिक अम्लीय मिट्टी में वृद्धि नहीं कर सकती। किसकी उन्नत किस्मों में गोल्डन एकर, पूसा मुक्त, पूसा ड्रमहेड, के-वी, प्राइड ऑफ इंडिया, कोपन हगें, गंगा, पूसा सिंथेटिक, श्रीगणेश गोल, हरयाणा, कावेरी, बजरंग आदि हैं। इन किस्मों की औसतन पैदावार 75-80 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। बुवाई का तरीका : इसकी बीजों की बुवाई 1-2 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए। जल्दी बोई जाने वाली फसल में फासला 45&45 सेंटीमीटर और देर से बोई जाने वाली फसल के लिए 60&45 सेंटीमीटर होना चाहिए। एक एकड़ में बुवाइ के लिए इसके 200-250 ग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त होती है। बीजों को बुवाई से पहले उपचारित कर लेना चाहिए। इसके लिए पहले बीज को गर्म पानी में 50 डिग्री सेल्सियस 30 मिनट के लिए या स्ट्रैपटोसाइकलिन 0.01 ग्राम प्रति लीटर में दो घंटों के लिए भिगो दें । बीज उपचार के बाद उन्हें छांव में सुखाएं और बैडों पर बीज दें। रबी की फसल में गलने की बीमारी बहुत पाई जाती है और इससे बचाव के लिए बीज को मरकरी कलोराईड के साथ उपचार करें। इसके लिए बीज को मरकरी कलोराइड 1 ग्राम प्रति लीटर घोल में 30 मिनट के लिए डालें और छांव में सुखाएं। रेतली जमीनों में बोई फसल पर तने का गलना बहुत पाया जाता है। इसको रोकने के लिए बीज को कार्बेनडाजिम 50 प्रतिशत डब्लयू पी 3 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। इसकी बिजाई दो तरीके से की जा सकती है। पहली गड्ढा खोदकर व दूसरा खेत में रोपाई करके। नर्सरी में सबसे पहले बिजाई करें और खादों का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार करें। बिजाई के 25-30 दिनों के बाद नए पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। खेत में पौध की रोपाई के लिए 3-4 सप्ताह पुराने पौधों का प्रयोग करें। बैंगन की खेती बैंगन की खेती के लिए जैविक पदार्थों से भरपूर दोमट एवं बलुआही दोमट मिट्टी बैंगन के लिए उपयुक्त होती है। इसकी उन्नत किस्मों में पूसा पर्पल लौंग, पूसा पर्पल राउंड, पूसा पर्पल क्लस्टर, पूजा क्रांति, पूसा अनमोल, मुक्तकेशी अन्नामलाई, बनारस जैट आदि है। बुवाई का तरीका : बैंगन लगाने के लिए बीज को पौध-शाला में छोटी-छोटी क्यारियों में बोकर बिचड़ा तैयार करते हैं। जब ये बिचड़े चार- पांच सप्ताह के हो जाते हैं तो उन्हें तैयार किए गए उर्वर खेतों में लगाते हैं। इसकी बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 500-700 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। इसकी बुवाई करते समय लंबे लम्बे फलवाली किस्मों में कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर तथा गोल फलवाली किस्में कतार से कतार की दूरी 75 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे के बीच 60 सेंटीमीटर की दूरी रखी जानी चाहिए। सलाद की खेती सलाद एक मुख्य विदेशी फसल है। दूसरी सब्जियों की तरह यह भी पूरे भारत में पैदा की जाती है। इस की कच्ची पत्तियों को गाजर, मूली, चुकंदर व प्याज की तरह सलाद और सब्जी के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है। इस फसल को ज्यादातर व्यावसायिक रूप से पैदा करते हैं और फसल की कच्ची व बड़ी पत्तियों को बड़े-बड़े होटलों और घरों में मुख्य सलाद के रूप में इस्तेमाल करते है। इसकी खेती के लिए 12 -15 डिग्री सेंटीगे्रड तापमान उपयुक्त होता है। सलाद की फसल के लिए हल्की बलुई दोमट व मटियार दोमट भूमि उपयुक्त होती है। भूमि में पानी रोकने की क्षमता होनी चाहिए ताकि नमी लगातार बनी रहे। पी.एच. मान 5.8-6.5 के बीच की भूमि में अच्छा उत्पादन होता है। इसकी उन्नत किस्मों में ग्रेट लेकस, चाइनेज यलो तथा स्लोवाल्ट मुख्य जातियां हैं। बुवाई का तरीका : सलाद की बुवाई के पहले पौधशाला में पौध तैयार करते है। इसकी बुवाई के लिए 500-600 ग्राम प्रति हेक्टर पर्याप्त होता है। बीज को पौधशाला में क्यारियां बनाकर पौध तैयार करना चाहिए। जब पौध 5-6 सप्ताह की हो जाए तब उसे खेत में रोपा जाना चाहिए। पौधों की रोपाई करते लगाते समय कतारों की दूरी 30 सेमीमीटर तथा पौधे से पौधे की 25 सेमीमीटर रखनी चाहिए। प्याज की खेती प्याज रबी और खरीफ दोनों की मौसम में होता है। प्याज की बुवाई आमतौर पर नवंबर के अंतिम सप्ताह में की जाती है लेकिन किसान इसकी बुवाई दिसंबर तक कर सकते हैं। रबी के प्याज के लिए अच्छी किस्मों का चयन करना होगा। इसकी उन्नत किस्मों में प्रमुख रूप से आर.ओ.-1, आर.ओ.59, आर.ओ. 252 और आर.ओ. 282 व एग्रीफाउंड लाइट रेड है। बुवाई का तरीका : प्याज की बुवाई नर्सरी में की जाती है। एक हैक्टेयर खेत के लिए पौध तैयार करने के लिए 1000 से 1200 वर्ग मीटर में बुवाई की जानी चाहिए। एक हैक्टेयर खेत के लिए 8 से 10 किलो बीज की जरूरत होती है। अनुमानत- एक वर्ग मीटर में 10 ग्राम बीज डालना चाहिए। बुवाई के बीजों को कतार में डालना चाहिए। इसमें कतार से कतार की दूरी 4 से 5 सेमी और बीज से बीज की दूरी दो तीन सेमी गहराई दो से ढाई सेमी होनी चाहिए। इसे मिट्टी से ढका जा सकता है। बुवाई के तत्काल बाद में या एक-दो दिन बाद फव्वारा से ड्रिप से सिंचाई की जा सकती है। बुवाई वाले स्थान को नेट की जाली या घास फूस डालकर ढक दें, जिससे पक्षी इन बीजों को खा सकें। अंकुरण के बाद पौध के सीधा खड़ा होने पर नेट हटा दें। बुवाई वाले स्थान पर सड़े हुए गोबर की खाद को ट्राइको डर्मा और एजेटोबेक्टर के 200 ग्राम के एक-एक पैकेट मिलाकर बुवाई वाले स्थान पर डाल दें। इससे फफूंद नहीं होगी और बढ़वार भी ठीक होगी। अच्छी बढ़वार के लिए केल्शियम, अमोनिया नाइट्रेट 25 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से भुरकाव किया जा सकता है। नर्सरी में इसकी पौध 7 या 8 सप्ताह में तैयार हो जाती है। बुवाई से पहले बीजों को 2 ग्राम थाइरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लें। ऐसे करें रोपाई : नर्सरी में पौध तैयार होने के बाद 20 से 25 दिसंबर के दौरान पौध की रोपाई शुरू कर देनी चाहिए और यह काम 15 जनवरी से पहले पूरा हो जाना चाहिए। नर्सरी के पौध के उखाडऩे से पहले हल्की सिंचाई करनी चाहिए, ताकि पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सके। उखाडऩे के बाद पौधे की एक तिहाई पत्तियों को काट लेना चाहिए। साथ ही गुलाबी जड़ सडऩ रोग से बचाने के लिए पौधों को बावस्टीन या कार्बनडेजिम एक ग्राम एक लीटर की दर से टब में भरकर रखे और उसमें पौधों को डुबो कर रोपते जाएं। रोपाई कतार में करनी चाहिए और एक कतार से दूसरी के बीच में 15 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी होनी चाहिए। सरसों की खेती सरसों की फसल के लिए दोमट भूमि सर्वोतम होती है, जिसमें की जल निकास उचित प्रबन्ध होना चाहिए। राई या सरसों के लिए बोई जाने वाली उन्नतशील प्रजातियां जैसे क्रांति, माया, वरुणा, इसे हम टी-59 भी कहते हैं, पूसा बोल्ड उर्वशी, तथा नरेन्द्र राई प्रजातियां की बुवाई सिंचित दशा में की जाती है तथा असिंचित दशा में बोई जाने वाली सरसों की प्रजातियां जैसे की वरुणा, वैभव तथा वरदान, इत्यादि प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिए। बुवाई का तरीका : सिंचित क्षेत्रों में सरसों की फसल की बुवाई के लिए 5 से 6 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टर के दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई से बीजों को 2 से 5 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए और इसके बाद देशी हल के पीछे 5-6 सेंटीमीटर गहरे कूडों में 45 सेंटीमीटर की दूरी पर इसकी बुवाई करनी चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

मक्का फसल के अवशेषों से पशुओं के खाने के लिए बनाया साइलेज

मक्का फसल के अवशेषों से पशुओं के खाने के लिए बनाया साइलेज

जानें, कैसे तैयार होता है पशुओं के लिए साइलेज और क्या है इसके फायदें पराली जलाने की समस्या से देश के कई राज्य जूझ रहे हैं। पराली जलाने से वातावरण में फैलता धुआं हमारे सांस लेने के लिए काम में आने वाली प्राणवायु आक्सीजन को दूषित करता जा रहा है। पराली जलाने से वातावरण में कार्बन की मात्रा अधिक होती जा रही है ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा है। इसका परिणाम ये हो रहा है कि ऐसे इलाकों के आसपास के लोग अस्थमा, एलर्जी सहित अन्य बीमारियों का शिकार होते जा रहे हैं। हवा में मिलता जहर हमारी सांसों के द्वारा शरीर में पहुंच रहा है जो कई बीमारियों को न्योता दे रहा है। इन सबके बीच होशंगाबाद के एक किसान ने पराली की समस्या का समाधान खोज कर प्रदेश का मान बढ़ाया है। इन्होंने मक्का फसल के अवशेषों का उपयोग पशुओं के खाने के लिए साइलेज बनाने के काम में लिया जिससे उन्हें काफी मुनाफा हो रहा है। हम आज बात करेंगे होशंगाबाद जिले के उन्नत कृषक शरद वर्मा की जिन्होंने मक्का फसल के अवशेषों को लेकर जो नवाचार किया ह, वह सम्भवत: मध्यप्रदेश में पहला है। इसमें फसल अवशेष से साइलेज बनाया जाता है, जिससे किसानों को जहां ज़्यादा मुनाफा मिलता है, वहीं पशुओं के दूध में फेट की मात्रा भी बढ़ती है। शरद वर्मा के इस नवाचार ने प्रदेश की शान बढ़ा दी है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 साइलेज बनाने की मशीन सबसे पहले खरीदी मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार मूलत: ग्राम घाटली ( इटारसी ) जिला होशंगाबाद के उन्नत कृषक शरद वर्मा ने मीडिया को बताया कि 2016 में वे आस्ट्रेलिया /न्यूजीलैंड के दौरे पर गए थे। वहां इसका प्रयोग होते देखा था, तभी विचार किया था कि इस मशीन की अपने देश में भी जरूरत है। आखिरकार मैंने इसे खरीदने के लिए ब्राजील की एक कंपनी, जो इसे भारत में बनाती है, से संपर्क किया और इसे 4 लाख रुपए में खरीदा लिया। इस स्वचालित मशीन से मक्का के फसल अवशेष से साइलेज बनाया जाता है। एयरटाइट एक बोरी में 50 किलो साइलेज आ जाता है। इसकी 20 बोरियों को घर में रखना आसान है। पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। दूध भरे हरे भुट्टे के साइलेज से पशुओं के दूध में फेट की मात्रा भी बढ़ती है। वर्मा ने कहा कि फिलहाल मक्का 8 रुपए किलो बिक रही है, जबकि यह साइलेज डेयरी वाले 500 रुपए क्विंटल में खरीद रहे हैं। अब तक 200 क्विंटल से अधिक साइलेज बना लिया है। इसकी अच्छी मांग निकल रही है। इससे पराली की समस्या के समाधान के साथ ही प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। बता दें कि वर्मा की पत्नी कंचन वर्मा को कृषि कर्मण अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। मशीन से कैसे बनाया जाता है मक्का अवशेष से साइलेज इस बारे में डॉ. के.के. मिश्रा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, क्षेत्रीय कृषि अनुसन्धान केंद्र , पंवारखेडा के अनुसार श्री वर्मा का यह नवाचार हर दृष्टि फायदेमंद है। पर्यावरण प्रदूषण के बचाव के साथ ही डेयरी वालों को 5 रुपए किलो में पशुओं के लिए पौष्टिक आहार मिल रहा है, जबकि, श्री दीपक वासवानी, सहायक यंत्री कृषि के अनुसार मध्यप्रदेश में यह पहली मशीन है जिसे लखनऊ से लाया गया है। इनमें बने 4 ड्रम में मक्के की पराली की कटिंग, थ्रेशिंग और कॉम्प्रेस कर साइलेज बनाती है, जिसे 50 किलो के एयरटाइट बैग में रखा जाता है। 3-4 दिन सेट होने के लिए रखा जाता है। यह पशुओं के लिए बढिय़ा आहार है। वहीं श्री जितेन्द्र सिंह, उप संचालक कृषि , होशंगाबाद के अनुसार श्री शरद वर्मा का मक्का के अपशिष्ट का यह नवाचार आम के आम , गुठलियों के दाम जैसा है। इससे पराली की समस्या भी रुकेगी और किसान को अतिरिक्त आय भी होगी। मशीन को एक जगह से दूसरी जगह लाना ले जाना भी आसान यह मशीन पोर्टेबल है , जिसे किसानों के खेत तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। अभी इस मशीन पर अनुदान नहीं मिलता है। इसे लेकर शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा, वहां से स्वीकृति मिलने पर अनुदान दिया जाएगा। इससे किसानों को लाभ होगा। बिना मशीन भी इस तरह बनाया जाता है साइलेज साइलेज बनाने के लिए दाने वाली फसलें जैसे- मक्का, ज्वार, जई, बाजरा आदि का उपयोग किया जाता है। क्योंकि इनमें कार्बोहाईड्रेट की मात्रा अधिक होती है। इससे दबे चारे में किण्वन क्रिया तेज होती है। दलहनीय फसलों का साइलेज अच्छा नहीं रहता है, लेकिन दहलनीय फसलों को दाने वाली फसलों के साथ मिलकार साइलेज बनाया जा सकता है। शीरा या गुड़ के घोल का उपयोग किया जाए, जिससे अम्ल की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। साइलेज क्या होता है / साइलेज बनाने का तरीका जिस चारे से साइलेेज बनाना है उसे काट कर थोड़ी देर के लिए खेत में सुखाने के लिए छोड़ देना चाहिए, जब चारे में नमी 70 प्रतिशत के लगभग रह जाए, उसे कुट्टी काटने वाले मशीन से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर गड्ढों में अच्छी तरह से दबाकर भर देना चाहिए। छोटे गड्ढों को आदमी पैरों से दबा सकते हैं, जबकि बड़े गड्ढें ट्रैक्टर चलाकर कर दबा देने चाहिए। जब तक जमीन की तह से लगभग एक मीटर ऊंची ढेर न लग जाएं, तब तक भराई करते रहना चाहिए। भराई के बाद उपर से गुंबदकार बना दें तथा पोलिथीन या सूखे घास से ढक कर मिट्टी अच्छी तरह से दबा दें। साइलेज बनाने के लिए गड्ढे हमेशा ऊंचे स्थान पर बनाने चाहिए, जहां से बारिश के पानी का निकासी अच्छी तरह से हो सके। भूमि में पानी का स्तर नीचे हो। इसके अलावा गड्ढे का आकार चारे व पशुओं की संख्या पर निर्भर करता है। गड्ढों के धरातल में ईंटों से तथा चारों ओर से सीमेंट एवं ईटों से भली भांति भराई कर देनी चाहिए। गड्ढे को भरने के तीन महीने बाद उसे खोलना चाहिए। खोलते वक्त एक बात का विशेष ध्यान रखें कि साइलेज एक तरफ से परतों में निकाला जाए। ध्यान रहे गड्ढे के उपरी भागों और दीवारों के पास में कुछ फफूंदी लग जाती है, जिसे पशु को खिलाना नहीं चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

धनिया की फसल : 2 बीघा में होगा 3 लाख रुपए का मुनाफा

धनिया की फसल : 2 बीघा में होगा 3 लाख रुपए का मुनाफा

जानें, धनिया की वैज्ञानिक खेती और उससे होने वाले लाभ मसाला फसलों में धनिये का विशेष स्थान है। धनिया सूखा पाउडर हो या हरा पत्तियों के रूप में इसका प्रयोग भोजन का स्वाद बढ़ा देता है। धनिये का उपयोग सब्जी में सुगंध या खुशबू के लिए किया जाता है। धनिया हर सब्जी का स्वाद और उसकी रंगत बढ़ाने का काम करता है। इसकी खुशबू इतनी मनमोहक होती है कि दूर से ही किसी भी व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। इसके अलावा धनिये में कई स्वास्थ्यवर्धक गुण होते हैं जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण बाजार में धनिये की मांग के साथ ही इसके भावों में भी बढ़ोतरी हो रही है। इसलिए इस बहुमूल्य और गुणकारी फसल की खेती करने से बहुत आर्थिक लाभ कमाया जा सकता है। भारत और विश्वभर में धनिये की मांग बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, भारत धनिये का मुख्य निर्यातक देश भी है। यदि किसान सही तरीके से इसकी खेती करे तो विदेशी मुद्रा में भी कमाई हो सकती है। धनिये की खेती की खास बात ये है कि इसे बारहों महीने उगाया जा सकता है। बात करें धनिये की खेती से होने वाली कमाई की तो यदि वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती की जाए तो 2 बीघा में करीब 3 लाख रुपए की कमाई हर साल की जा सकती है। इसकी निरंतर बढ़ती बाजार मांग के कारण धनिये की खेती मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। आइए जानते हैं इसकी खेती का सही तरीका जिससे अधिक उत्पादन मिलने के साथ ही अच्छा मुनाफा मिल सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 भारत में कहां-कहां होती है धनिये की खेती वैसे तो भारत में सभी जगह धनिये की खेती की जाती है। लेकिन सबसे अधिक धनिया का उत्पादन राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में की जाती है। मध्यप्रदेश में करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है जिससे 2 लाख टन का धनिये का उत्पादन किया जाता है। इस तरह भारत में दुनिया का 80 प्रतिशत धनिये का उत्पादन किया जाता है। धनिये में पाए जाने वाले विटामिन व पोषक तत्व धनिये में काफी मात्रा में पोषक तत्व व विटामिन पाया जाता है। इसमें मुख्यत: कैरोटीन, कैल्शियम, मिनरल्स्, आयरन, पोटेशियम, विटामिन सी, फास्फोरस आदि तत्व पाएं जाते हैं जो शरीर को स्वस्थ रखने में काफी मदद करते हैं। इसका सेवन स्वास्थ की दृष्टि से फायदेमंद है। धनिया सूखा पाउडर हो या हरा इसका सेवन दोनों रूपों फायदा पहुंचाता है। धनिये से स्वास्थ्य को होने वाले लाभ धनिये का उपयोग स्वाद को बढ़ाने के लिए ही नहीं किया जाता है बल्कि ये कई रोगों में दवा के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। धनिये के सेवन से पाचन शक्ति मजबूत होती है। यह हमारे डाइजेस्टिव सिस्टम के लिए काफी फायदेमंद है। इसका सेवन करने से पेट से संबंधित समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। अगर आपके पेट में दर्द हो रहा हो तो पानी में धनिया पाउडर मिलाकर पीने से आराम मिलता है। आंखों की रोशनी बढ़ाने में विटामिन-ए बहुत जरूरी है और धनिये में विटामिन-ए मौजूद होता है। इसी लिए जो लोग नियमित रूप से धनिये का उपयोग करते हैं उनकी आंखों की रोशनी सही करती है। यदि आपके शरीर में खून की कमी है मतलब आप एनीमिया की समस्या से ग्रसित है तो आपके लिए धनिये का सेवन काफा लाभकारी साबित हो सकता है। धनिये में आयरन, एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन-ए, विटामिन-सी और मिनरल जैसे तत्व पाये जाते हैं जो हमारे शरीर में खून की कमी को पूरा करने में सहायक हैं। इतना ही नहीं धनिये का सेवन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से भी हमें दूर रखने में मददगार है। धनिये आपके शरीर में कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल में रखने में सहायक होता है। धनिये में भरपूर मात्रा में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जिनसे कोलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। यदि किसी व्यक्ति को कालेस्ट्रॉल की समस्या है तो उसे धनिये के बीजों को गर्म करके उसके पानी का सेवन करना चाहिए। इससे कुछ ही दिनों में आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल सही होने लगेगा। धनिये का नियमित सेवन करने वालों को किडनी से संबंधित समस्या कम होती है। जिन लोगों को किडनी की समस्या रहती है उनके लिए भी धनिये का उपयोग काफी फायदेमंद है। धनिया के पानी के सेवन से किडनी की सफाई होती है जिससे किडनी में स्वस्थ्य करती है। धनिया का सेवन डायबिटीज के रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद साबित हुआ है। हरे धनिये के सेवन शुगर लेवल को बढऩे से रोकता है। इसके सेवन से डायबिटीज के मरीजों को ब्लड में इंसुलिन की मात्रा को संतुलित करने में मदद मिलती है। धनिये का अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए इन बातों का रखें ध्यान- धनिये की खेती के लिए ठंडी व शुष्क जलवायु सबसे ज्यादा अच्छी रहती है। बीजों के विकास के लिए 25 से 26 सेंटीग्रेट तक का तापमान इसके लिए सबसे अनुकूल रहता है। धनिया एक शीतोष्ण जलवायु वाली फसल होती है जब इस फसल पर फूल और दानों का बनना शुरू हो जाता है तब पाला रहित मौसम की जरूरत होती है। धनिये का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए इसकी भूमि या मिट्टी पर भी विचार किया जाना चाहिए। धनिये की खेती के लिए धनिया के बीज की बेहतर गुणवत्ता के लिए तेज धूप, ठंडी जलवायु और समुद्र से ज्यादा ऊंचाई वाली भूमि ठीक रहती है। धनिये की उत्तम सिंचित फसल के लिए उर्वरा शक्ति और अच्छी जल निकास वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त रहती है। इसके अलावा धनिये को काली भारी मिट्टी में भी धनिये की सिंचित फसल उगाई जा सकती है, लेकिन धनिये की फसल के लिए क्षारीय और लवणीय मिट्टी सही नहीं रहती है। बुवाई का समय धनिया की फसल के लिए अक्टूबर से नवंबर तक बुवाई का उचित समय रहता है। बुवाई के समय अधिक तापमान रहने पर अंकुरण कम हो सकता है। यदि आपके क्षेत्र में पला अधिक पड़ता है तो वहां धनिया की बुवाई ऐसे समय में नहीं करें। इस समय बुवाई करने से फसल को काफी नुकसान हो सकता है। धनिये की बुवाई का तरीका धनिये की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए अच्छे तरीके से बुवाई से पहले पलेवा लगाकर भूमि की तैयारी करनी चाहिए। जुताई से पहले 5-10 टन प्रति हेक्टेयर पक्की हुई गोबर की खाद मिलाएं। धनिया की सिंचित फसल के लिए 5-5 मीटर की क्यारियां बना लें, जिससे पानी देने में और निराई-गुडाई का काम करने में आसानी होती है। अच्छे उत्पादन के लिए धनिया का 15 से 20 किग्रा प्रति बीज पर्याप्त होता है। बीजोपचार के लिए दो ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। बुवाई से पहले दाने को दो भागों में तोड़ देना चाहिए। ऐसा करते समय ध्यान दे अंकुरण भाग नष्ट न होने पाए और अच्छे अंकुरण के लिए बीज को 12 से 24 घंटे पानी में भिगो कर हल्का सूखने पर बीज उपचार करके बोए। धनिये की बुवाई करते समय इस बात कर ध्यान रखें कि कतार से कतार की दूरी करीब 25 से 30 सेमी. हो और पौधे से पौधे की दूरी 5 से 10 सेमी. रखी जानी चाहिए। असिंचित फसल से बीजों को 6 से 7 सेमी. गहरा बोना चाहिए और सिंचित फसल में बीजों को 1.5 से 2 सेमी. गहराई पर बोना चाहिए, क्योंकि ज्यादा गहरा बोने से सिंचाई करने पर बीज पर मोटी परत जम जाती हैं, जिससे बीजों का अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता हैं। कमाई का गणित अधिकतर किसान धनिये को मसाले के रूप में बाजार में बेचते हैं। इसके अलावा हरे धनिये को भी बाजार में बेचा जाता है। धनिये को दोनों रूपों में बाजार में बेचने से काफी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। अगर आप 2 बीघा जमीन पर धनिये की खेती करते हैं तो हर साल करीब 3 लाख रुपए का मुनाफा कमा सकते हैं। धनिये की बुवाई के बाद करीब 40 से 50 दिनों में ये बेचने के लायक हो जाता है। बाजार के भाव से धनिया बेचकर आप हर दिन 2 हजार रुपए तक कमा सकते हैं। एक एकड़ जमीन पर 40 हजार की लागत आती है। यदि वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती की जाए तो इसकी 50 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है। बाजार के भाव के हिसाब से आपको एक क्विंटल पर हजार रुपए मिल जाते हैं। 40 हजार रुपए की लागत के बाद आपको एक एकड़ पर धनिये की खेती करने से एक लाख तक का शुद्ध मुनाफा मिलता है। आप जैसे-जैसे मुनाफा कमाते जाएं इसका क्षेत्र बढ़ाते जाएं। जितना क्षेत्र बढ़ेगा उतनी ही अधिक कमाई होगी। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

close Icon

Find Your Right Tractor and Implements

New Tractors

Used Tractors

Implements

Certified Dealer Buy Used Tractor