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ब्रोकली की उन्नत खेती : ब्रोकली की खेती में रखें ये सावधानी होगा भरपूर मुनाफा

ब्रोकली की उन्नत खेती : ब्रोकली की खेती में रखें ये सावधानी होगा भरपूर मुनाफा

30 September, 2020

जाने ब्रोकली की उन्नत खेती से  कैसे मिलेगा भरपूर मुनाफा

ब्रोकली दिखने में फूलगोभी की तरह ही दिखाई देती है लेकिन इसमें पोष्टिकता फूलगोभी से ज्यादा होती है। ब्रोकली खाने का चलन पिछले कुछ सालों से बड़े शहरों और महानगरों में काफी बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे कारण इसमें पाए जाने पौष्टिक तत्व है जो कई बीमारियों से बचाव करते हैं। अभी कुछ सालों से किसानों का ध्यान इसकी खेती की ओर गया है। शहरों में बड़े-बड़े होटलों में इसकी मांग रहती है। वहीं लोग इसे बड़े-बड़े मॉल्स व बाजारों इसकी खरीदते हैं। इसकी बढ़ती मांग के कारण इसकी खेती मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। यदि इसकी व्यावसायिक रूप से खेती की जाए तो इससे अच्छा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है। आइए जानते हैं कैसे आप इसकी खेती करके भरपूर मुनाफा कमा सकते हैं।

 

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क्या है ब्रोकली ? और कितने प्रकार की होती है

ब्रोकली गोभीय वर्गीय सब्जियों के अंतर्गत एक प्रमुख सब्जी है। यह एक पौष्टिक इटालियन गोभी है, जिसे मूलत: सलाद, सूप, व सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। ब्रोकली दो तरह की होती है- स्प्राउटिंग ब्रोकली एवं हेडिंग ब्रोकली। इसमें से स्प्राउटिंग ब्रोकली का प्रचलन अधिक है। इसमें विटामिन, खनिज लवन ( कैल्शियम, फास्फोरस एवं लौह तत्व ) प्रचुरता में पाए जाते हैं। पौष्टिकता से भरपूर होने के कारण गर्भवती महिलाओं के लिए अधिक फायदेमंद है। इसके अलावा ये अपने रंगों के कारण भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। ये मुख्यत: तीन रंगों में पाई जाती है। इसमें सफेद, हरी और बैंगनी रंग की ब्रोकली है।

 


ब्रोकली के फायदे

  • फोलेट की कम मात्रा लेने से डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। ब्रोकली में फोलेट की भरपूर मात्रा पाई जाती है। इसे खाने से डिप्रेशन कम हो जाता है।
  • ब्रोकली में विटामिन सी की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। विटामिन सी शरीर में इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने और संक्रमण से बचाव में मदद करता है।
  • ब्रोकली के सेवन से कैंसर होने की आशंका भी कम हो जाती है। ब्रोकली में फिटाकेमिकल अधिक मात्रा में पाया जाता है। ब्रोकली में मौजूद तत्व शरीर से विषाक्त पदार्थों को भी बाहर निकालने का काम करते हैं।
  • ब्रोकली में कैरेटेनॉयड्स ल्यूटिन पाया जाता है। ये दिल की धमनियों को स्वस्थ बनाए रखता है। इसके सेवन से दिल का दौरा पडऩे और अन्य बीमारियों के होने की आशंका कम हो जाती है।
  • गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से ब्रोकली का सेवन करना चाहिए। इसमें मौजूद तत्व न केवल बच्चे के स्वास्थ्य और विकास के लिए फायदेमंद होते हैं बल्कि मां को भी कई प्रकार के संक्रमण से दूर रखते हैं।


ब्रोकली की उन्नत किस्में

ब्रोकली की कई किस्में पाई जाती है जिनमें प्रमुख रूप से के.टी.एस.- 1, पालक समृद्धि, एन.एस.- 50, ब्रोकोली संकर-1, टी.डी.सी. -6 शामिल है। इसके अलावा इसकी संकर किस्मों में पाईरेट पेक में, प्रिमियम क्राप, क्लीपर, क्रुसेर, स्टिक व ग्रीन सर्फ़ मुख्य है। इसके अलावा टोपर, ग्रीन कोमट, क्राईटेरीयन आदि किस्में है। ब्रोकली की लगभग सभी किस्में विदेशी हैं।
कहां से मिलेंगे ब्रोकली के बीज

कई बीज कम्पनियाँ अब ब्रोकली के संकर बीज भी बेच रहीं हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने हाल ही में पूसा ब्रोकली 1 किस्म की खेती के लिए सिफ़ारिश की है तथा इसके बीज थोड़ी मात्रा में पूसा संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, कटराइन कुल्लू घाटी , हिमाचल प्रदेश से प्राप्त किए जा सकते हैं। अभी हाल भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान क्षेत्रीय केंद्र कटराई द्वारा ब्रोकली की के.टी.एस.9 किस्म विकसित की गई है। इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने हाल ही पूसा ब्रोकली 1 किस्म की खेती के लिए सिफ़ारिश की है तथा इसके बीज थोड़ी मात्रा में पूसा संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, कटराइन कुल्लू घाटी, हिमाचल प्रदेश से प्राप्त किए जा सकते हैं।


ब्रोकोली की उन्नत खेती कैसे करें 

ब्रोकली की खेती फूलगोभी की खेती की तरह ही होती है। इसकी खेती के लिए दुमट अथवा बलुई-दुमट मिट्टी वाली भूमि सर्वोतम होती है। अधिक अम्लीय भूमि इसके लिए अच्छी नहीं होती है। भूरी मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है। लेकिन ध्यान रखें इसके लिए जल निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए। नहीं तो जल भराव से इसके पत्ते पीले पड़ कर सडऩे लगते हैं जिससे उत्पादन पर असर पड़ता है।


बुवाई का उचित समय

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में ब्रोकली उगाने का उपयुक्त समय सर्दी का मौसम होता है। इसके बीज के अंकुरण तथा पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए तापमान 20 -25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसकी नर्सरी तैयार करने का समय अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में कम उंचाई वाले क्षेत्रों में सितंबर- अक्टूबर, मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अगस्त सितंबर और अधिक उंचाई वाले क्षेत्रों में मार्च- अप्रैल में तैयार की जाती है।


ब्रोकली की नर्सरी तैयार करना

ब्रोकली की नर्सरी में बुवाई के लिए 400-500 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर (8-10 ग्राम प्रति नाली) पर्याप्त होता है। नर्सरी की तैयारी में इस बात का ध्यान रखें की नर्सरी जमीन से 15 सेमी. ऊंची हुई हो। अब नर्सरी की क्यारी में अच्छी सड़़ी हुई गोबर / कम्पोस्ट खाद तथा 50-60 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से सिंगल सुपर फास्फेट मिलाकर भूमि की तैयारी करनी चाहिए। पौधशाला में कीटों एवं व्याधियों से बचाव के लिए क्यारी में 5 ग्राम थायरम प्रति वर्गमीटर की दर से अच्छी प्रकार मिलाकर 5-7 सेमी. की दूरी पर 1.5-2 सेमी. गहरी कतारें बनाएं।

इसके बाद कवकनाशी 10 ग्राम ड्राईकोडर्मा या एक ग्राम कार्बेन्डाजिम अथवा 2.5 ग्राम थाइरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से शोधित बीज की बुवाई करें। बीज के जमने तक हल्की सिंचाई फव्वारे से हल्की सिंचाई करें ताकि नमी बनी रहे। अत्यधिक बारिश से बचाव हेतु नर्सरी की क्यारी को घासफूस की छपर अथवा पालीथीन शीट से ढकने का प्रबंध रखना चाहिए। बेमौसमी खेती हेतु पौध पालीहाउस अथवा पालिटनल के अंदर इसकी पौध तैयार करनी चाहिए। इसके लिए पालीहॉउस अथवा पालीटनल के अंदर पौधशाला में सर्दियों में तापमान आवश्यकता से कम होने पर पालीहाउस में तापमान नियंत्रित करने के लिए हीटर का प्रयोग कर सकते हैं। इससे बीजों का जमाव जल्दी हो सकेगा।


खेत की तैयारी

खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से करनी चाहिए। इसके बाद 2 से 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। अंतिम जुताई करने से पहले खेत में 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी हुई खाद डाल कर मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला देनी चाहिए। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को ढेले रहित व समतल बना लेना चाहिए।

 

ब्रोकली की रोपाई

नर्सरी में जब पौधे 10 से 12 सेंटीमीटर या 4 से 5 सप्ताह के हो जाएं तो उनकी खेत में रोपाई कर देनी चाहिए। ब्रोकली की रोपाई पंक्तियों में की जानी चाहिए। किस्मों के अनुसार पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 40 सेंटीमीटर होनी चाहिए। पौध 3 से 4 सेंटीमीटर से अधिक गहरी नहीं लगानी चाहिए। खेत में नमी होनी चाहिए जरूरी है। इसके लिए रोपाई के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। पौध की रोपाई दोपहर बाद या शाम के समय ही करनी चाहिए।

 

खरपतवार नियंत्रण एवं सिंचाई

ब्रोकली की रोपाई के शुरू के डेढ़ से दो माह तक खेत से खरपतवार निकलते रहना चाहिए जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है। बात करें सिंचाई की तो इसकी पहली हल्की सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए। इसके बाद में आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। इसकी अच्छी पैदावार के लिए 5 से 6 सिंचाइयां की जानी चाहिए।


ब्रोकली की कटाई

फसल में जब हरे रंग की कलियों का मुख्य सिरा (मन हैड) बनकर तैयार हो जाए तो इसे लगभग 12 से 15 सेंटीमीटर लंबे डंठल के साथ तेज चाकू या दराती से कटाई करनी चाहिए। मुख्य सिरा काटने के बाद पौधों के तनों से दूसरी छोटी-छोटी कलियां निकलती हैं तथा ये कलियां उप सिरा (सब हैड) के रूप में तैयार हो जाती हैं। इन उप सिरों को भी 8 से 10 सेंटीमीटर लंबे डंठल सहित उचित समय पर कलियां खिलने से पहले कटाई कर लेनी चाहिए।


कितनी मिलती है उपज

ब्रोकली की उन्नत तरीके से खेती करके अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। ब्रोकली की साधारण किस्मों से 75 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा संकर किस्मों से 120 से 180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

 


बाजार भाव / कीमत

पांच सितारा होटल तथा पर्यटक स्थानों पर इस सब्जी की मांग बहुत है तथा जो किसान इसकी खेती करके इसको सही बाजार में बेचते हैं उनको इसकी खेती से बहुत अधिक लाभ मिलता है क्योंकि इसके भाव कई बार 30 से 50 रुपए प्रति कि.ग्रा. तक या इससे भी उपर मिल जाते हैं। यहां ये बताना उचित रहेगा कि ब्रोकली की खेती करने से पहले इसको बेचने का किसान जरूर प्रबंध कर लें क्योंकि यह अभी महानगरों, बड़े होटल तथा पर्यटक स्थानों तक ही सीमित है। साधारण, मध्यम या छोटे बाजारों में अभी तक ब्रोकली की मांग कम ही है।
 

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किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

आलू के बीज (Potato seeds) : महंगे भावों के चलते किसानों ने दूसरी खेती करने का मन बनाया आलू के भावों में जोरदार तेजी ने स्टॉकिस्टों को मालामाल कर दिया है। कोल्ड स्टोरेज में आलू भरने वाले किसानों ने भी अच्छी कमाई की है लेकिन यह प्रतिशत बहुत कम है। आलू की तेजी ने किसानों के सामने आलू की नई फसल बोने को लेकर एक चुनौती खड़ी कर दी है। अब किसान असमंजस मेंं है कि महंगे भावों पर आलू के बीज खरीदकर बुवाई करें या ना करें। अगले साल नई फसल के दाम अच्छे मिलेंगे या नहीं। आपको बता दें कि आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडक़र सारे देश में आलू उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जो विश्व औसत से काफी कम है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 आलू की कीमतों में उछाल / आलू के भावों में तेजी आलू की अच्छी कीमतों के कारण इस बार भी किसानों ने ज्यादा खेती करने का मन बना रखा है लेकिन आलू के बीज के भाव किसानों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। खुले बाजार में आलू का बीज 60 रुपए किलो तक मिल रहा है। वहीं सरकार कोल्ड स्टोरों में ३२ रुपए किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। आलू बीजों की ज्याद कीमत की वजह से किसानों ने इस बार फसल बदलने का मन बना लिया है। इससे आलू की फसल का रकबा घटने का अंदेशा जताया जा रहा है। आलू की बुवाई सीजन में सबसे ज्यादा मंग कुफरी लालिमा, चंद्रमुखी, चिप्सोना और कुफरी बादशाह प्रजाति के बीजों की होती है। इन बीजों की कीमत बाजार में 55 से 60 रुपए प्रतिकिलो है। जबकि पिछले साल बीजों के भाव 10-12 रुपए किलो थे। किसानों का कहना है कि इस बार करीब 500-600 प्रतिशत तक बीजों के दाम बढ़ गए हैं। खेती की लागत भी बहुत बढ़ जाएगी। सामान्यत: देखा गया है कि जिस वर्ष आलू का बीज महंगा होता है उस साल फसल के दाम अच्छे नहीं मिलते हैं। किसानों के अनुसार इस साल आलू की पैदावार की लागत खासी ज्यादा हो जाएगी जबकि उस हिसाब से दाम नहीं मिलेंगे। उत्तर प्रदेश में होता है आलू का बंपर उत्पादन उत्तरप्रदेश में पिछले तीन सालों से आलू का बंपर उत्पादन हो रहा है। उत्तरप्रदेश में पिछले साल ही आलू की पैदावार 165 लाख टन से ज्यादा थी। फसल के बाजार में आने के बाद दाम गिरने पर प्रदेश सरकार ने आलू की सरकारी खरीदन शुरू की थी। प्रदेश सरकार ने खरीद केंद्र खोल कर दो लाख क्विंटल आलू की खरीद सीधी खरीद की थी। वहीं बाहरी प्रदेशों को माल भेजने वाले किसानों को भाड़े में सब्सिडी भी दी गई थी। देश में आलू का रकबा घटना तय कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक बीघा आलू की बुआई के लिए कम से कम चार क्विंटल बीज की जरूरत होती है। इसके बाद मजदूरी, खाद व सिंचाई की लागत को जोड़ दें तो पैदावार खासी महंगी हो जाती है। इस बार नयी फसल के बाजार में आने के बाद किसान को क्या कीमत मिलेगी यह कहा नहीं जा सकता है। इन आशंकाओं के चलते इस बार देश में आलू की खेती का रकबा घटना तय है। । लघु और सीमांत किसान आलू की बजाए सरसों प्याज और लहसुन की खेती करने का मन बना रहे हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

जानिए बैंगन की खेती ( brinjal cultivation ) की बुवाई का सही समय और उन्नत किस्म के बारे में अक्टूबर व नवंबर का महीना किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इन दो महीनों में किसान रबी की फसल की बुवाई करते हैं। रबी के सीजन में किसानों के पास गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू व गन्ना आदि की फसल बोने का विकल्प होता है। इसके अलावा किसान इन दिनों में बैंगन की खेती करके भी लाखों रुपए कमा सकता है। बैंगन की खेती दो महीने में तैयार हो जाती है। बैंगन की सब्जी भारतीय जनसमुदाय में बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन को भर्ता, आलू-बैंगन की सब्जी, भरवा बैंगन, फ्राई बैंगन सहित कई तरीकों से पकाया जा सकता है। उत्तर भारत के इलाकों में बैंगन का चोखा बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन की उत्पत्ति भारत में ही हुई है। विश्व में सबसे ज्यादा बैंगन चीन में 54 फीसदी उगाया जाता है। बैंगन उगाने के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। बैंगन विटामिन और खनिजों का अच्छा स्त्रोत है। इसकी खेती सारा साल की जा सकती है। बैंगन की फसल बाकी फसलों से ज्यादा सख्त होती है। इसके सख्त होने के कारण इसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बैंगन की उन्नत किस्में / बैंगन की प्रजाति बैंगन की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। बैंगन की उन्नत किस्मों में पूसा पर्पर लोंग, पूसा पर्पर कलस्टर, पूर्सा हायब्रिड 5, पूसा पर्पर राउंड, पंत रितूराज, पूसा हाईब्रिड-6, पूसा अनमोल आदि शामिल है। एक हेक्टेयर में करीब 450 से 500 ग्राम बीज डालने पर करीब 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन मिल जाता है। बैंगन की फसल के लिए मिट्टी / बैंगन की फसल के लिए भूमि बैंगन एक लंबे समय की फसल है, इसलिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ रेतली दोमट मिट्टी उचित होती है और अच्छी पैदावार देती है। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी और अधिक पैदावार के लिए चिकनी और नमी या गारे वाली मिट्टी उचित होती है। फसल की वृद्धि के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.6 के बीच में होनी चाहिए। सिंचाई का उचित प्रबंधन भी होना चाहिए। बैंगन की फसल सख्त होने के कारण इसे अलग अलग तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। खेत में बैंगन की बिजाई का तरीका / बैंगन के बीज बैंगन का अधिक उत्पादन पाने के लिए बैंगन के बीजों का सही रोपण होना चाहिए। दो पौधों के बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए। दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज रोपण करने से पहले खेत की अच्छे तरीके से 4 से 5 बार जुताई करके खेत को समतल करना चाहिए। फिर खेत में आवश्यकतानुसार आकार के बैड बनाने चाहिए। बैंगन की खेती में प्रति एकड़ 300 से 400 ग्राम बीजों को डालना चाहिए। बीजों को 1 सेंटीमीटर की गहराई तक बोने के बाद मिट्टी से ढक देना चाहिए। बैंगन बिजाई का सही समय / बैंगन की वैज्ञानिक खेती बैंगन की फसल पूरे सालभर की जा सकती है लेकिन अक्टूबर और नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसान पहली फसल के लिए अक्टूबर में पनीरी बो सकते हैं जिससे नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। दूसरे फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोनी चाहिए जिससे फरवरी के पहले पखवाड़ तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। तीसरी फसल के लिए फरवरी के आखिरी पखवाड़़े और मार्च के पहले पखवाड़े में पनीरी बोनी चाहिए जिससे अप्रैल के आखिरी सप्ताह में पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोनी चाहिए ताकि अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। बैंगन की खेती में खाद और उर्वरक बैंगन की खेती में मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरक डालनी चाहिए। अगर मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है तो खेत तैयार करने समय 20-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। इसके बाद 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फॉस्फेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए। बैंगन की खेती में सिंचाई बैंगन की खेती में अधिक पैदावार लेने के लिए सही समय पर पानी देना बहुत जरूरी है। गर्मी के मौसम में हर 3-4 दिन बाद पानी देना चाहिए और सर्दियों में 12 से 15 के अंतराल में पानी देना चाहिए। कोहरे वाले दिनों में फसल को बचाने के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखें और लगातार पानी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बैंगन की फसल में पानी खड़ा न हो, क्योंकि बैंगन की फसल खड़े पानी को सहन नहीं कर सकती है। बैंगन की फसल की तुड़ाई खेत में बैंगन की पैदावार होने पर फलों की तुड़ाई पकने से पहले करनी चाहिए। तुड़ाई के समय रंग और आकार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बैंगन का मंडी में अच्छा रेट मिले इसके लिए फल का चिकना और आकर्षक रंग का होना चाहिए। बैंगन का स्टोरेज / बैंगन का भंडारण बैंगन को लंबे समय के लिए स्टोर नहीं किया जा सकता है। बैंगन को आम कमरे के सामान्य तापमान में भी ज्यादा देर नहीं रख सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से इसकी नमी खत्म हो जाती है। हालांकि बैंगन को 2 से 3 सप्ताह के लिए 10-11 डिग्री सेल्सियस तापमान और 9२ प्रशित नमी में रखा जा सकता है। किसान भाई बैंगन को कटाई के बाद इसे सुपर, फैंसी और व्यापारिक आकार के हिसाब से छांट लें और पैकिंग के लिए, बोरियों या टोकरियों का प्रयोग करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

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जानिएं त्योहारी मांग के कारण सरसों सहित अन्य तिलहनों में आई कितनी तेजी सरसों में तेजी रोजाना नए रिकॉर्ड बना रही है। पिछले साल 2019 में 25 अक्टूबर के आसपास सरसों के भाव 4500 रुपए प्रति क्विंटल था। इस बार अक्टूबर 2020 में सरसों के भाव जयपुर मंडी में 6000-6100 के आसपास चल रहे हैं। आगरा की कई बड़ी तेल कंपनियों द्वारा सरसों 6500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से खरीदने के समाचार भी हैं। सरसों के अलावा अन्य तिलहनों में भी तेजी बनी हुई। त्योहारी मांग के कारण सरसों का तेल 120 से 130 रुपए किलो बिक रहा है। अन्य तेलों के भावों में भी तेजी है। सरसों की नई फसल आने में अभी 5-6 महीने का समय है। इस बार सरसों उत्पादक क्षेत्रों में बारिश भी कम हुई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सरसों का स्टॉक कम है इसलिए भविष्य में सरसों में मंदी की संभावना कम है। सरसों सहित अन्य तिलहनों के भावों में कमी सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सरसों के भाव त्योहारी मौसम में विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सरसों की मांग वृद्धि होने से भी सरसों दाना सहित इसके तेल-तिलहन कीमतों में सुधार आया। जम्मू-कश्मीर में सरसों दाना (तिलहन फसल) की मांग में काफी वृद्धि हुई है, जहां की मंडियों में हरियाणा से खरीदी गई सरसों 6250 रुपये क्विन्टल के भाव से बिक रही है। जयपुर की हाजिर मंडी में सरसों दाना का हाजिर भाव बढक़र 6000-6100 रुपए क्विंटल हो गया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार नफैड को अब सोच-समझ के साथ सीमित मात्रा में सरसों की बिकवाली करनी होगी, क्योंकि अगली पैदावार आने में अभी पांच-छह महीने का समय है और त्योहारों के साथ साथ सर्दियों की मांग और भी बढऩे वाली है। मूंगफली का भाव त्योहारी मांग के कारण तेल-तिलहन बाजार में तेजी बनी हुई है और भविष्य में भी तेजी की धारणा है। विदेशी बाजारों में मूंगफली दाना के साथ-साथ मूंगफली तेलों की भारी मांग ने भावों में तेजी को बल दिया है। नंबर एक गुणवत्ता वाले मूंगफली दाने की निर्यात मांग में भारी तेजी के कारण मूंगफली तेल-तिलहन कीमतों में तेजी बनी है। मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत व चीन में होता है। नंबर वन मूंगफली दाने की कीमत 70 रुपए किलो तक पहुंच गई है। सबसे सस्ते तेल सोयाबीन में तेजी / सोयाबीन का भाव हल्के तेलों में शामिल सोयाबीन इस समय सबसे सस्ता है। इस साल सोयाबीन की खपत में पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। सूरजमुखी फसल के कम उत्पादन होने, सरसों जैसे हल्के तेल में 'ब्लेंडिंग' (सम्मिश्रण) की मांग बढऩे तथा उत्तर भारत के मौसम की वजह से सोयाबीन तेल मांग के बढऩे से इसके तेल कीमतों में तेजी आई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त में कम बारिश के कारण मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल और इसकी उपज प्रभावित हुई है। वहीं महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण इसकी फसल प्रभावित हुई है, जिससे सोयाबीन किसानों की हालत पतली है और उनके लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। त्योहारी मांग होने और फसल को पहुंचे नुकसान से समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान सोयाबीन दाना और लूज की कीमतें 105-105 रुपये सुधरकर 4300-4325 रुपये और 4170-4200 रुपये प्रति क्विन्टल के आसपास चल रही हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब कृषि विभाग वाट्सएप पर देगा किसानों को खेती की जानकारी

अब कृषि विभाग वाट्सएप पर देगा किसानों को खेती की जानकारी

राजस्थान सरकार की नई पहल : अब तक 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है ग्रुप में राजस्थान सरकार ने किसानों को सरकारी योजनाओं सहित खेती- बाड़ी की जानकारी पहुंचाने के लिए अब सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का सहारा लिया है। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार अब प्रदेश सरकार सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का उपयोग खेती में करना चाह रही है। इसके लिए सरकार की ओर से कृषि अधिकारियों को निर्देश भी दिए जा चुके है। इस निर्देश के बाद प्रदेश के कृषि विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत खेती-बाड़ी की जानकारी देने के लिए प्रदेशभर में किसानों के करीब पांच हजार वॉट्सएप गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनसे करीब पांच लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। अगर सरकार की ये योजना रंग लाई तो प्रदेश के किसानों को कृषि से जुड़ी जानकरियां उनको घर बैठे-बैठे आसानी से मिलेंगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसानों को मिलेंगी ये जानकारियां मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार कृषि मंत्री लालचंद कटारिया के मुताबिक प्रदेश के किसानों को अब विभागीय योजनाओं की जानकारी के साथ ही खेती के उन्नत तरीकों और नवाचारों की जानकारी वॉट्सएप गु्रप के जरिए मिलेगी। इन गु्रप पर कृषि पर्यवेक्षक सफलता की कहानियां और खेती से जुड़ी डॉक्युमेंट्री समेत विभागीय सूचनाएं साझा करेंगे। यह प्रयोग फसल में रोग और टिड्डी प्रकोप जैसी समस्याओं से निपटने में भी मदद करेगा। कृषि पर्यवेक्षकों दिए गए थे 250-250 किसानों को जोडऩे के निर्देश प्रदेश में कार्यरत सभी कृषि पर्यवेक्षकों को वॉट्सएप गु्रप बनाकर अपने-अपने क्षेत्र के 250-250 किसानों को इससे जोडऩे के निर्देश कृषि विभाग द्वारा दिए गए थे। बता दें कि प्रदेश में करीब साढ़े 5 हजार कृषि पर्यवेक्षक कार्यरत हैं और इनके द्वारा अब तक 4 हजार 786 गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनके जरिये लगभग 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। जयपुर जिले में सबसे ज्यादा 53 हजार किसानों को व्हाट्सएप गु्रप से जोड़ा गया है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो विभाग को अपनी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने में काफी आसानी हो जाएगी और किसानों तक विभाग की पहुंच भी आसान हो होगी। क्या कहते हैं अधिकारी कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आजकल काफी बड़ी संख्या में किसान स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं। वे अब पंरपरागत खेती की बजाय आधुनिक तकनीक का अपनाने में भी खासा रुझान दिखा रहे हैं। खेती की जानकारी साझा करने में किसान भी सोशल मीडिया का फायदा उठाने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। इधर 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी के लिए मोबाइल ऐप्लीकेशन लांन्च केंद्रीय जल शक्ति एवं सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किए जाने वाले कामों की जानकारी प्राप्त करने कि लिए एक मोबाइल ऐप्लीकेशन लांच किया है। यह ऐप्लीकेशन परियोजनाओं की जियो टैगिंग करेगा। जिससे परियोजनाओं की निगरानी करने और उनकी प्रगति तथा उनके विकास में आने वाली बाधाओं का पता लगाया जा सकेंगा। इस एप्लीकेशन का विकास भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीच्यूट आफ स्पेस ऐप्लीकेशंस एंड जियो-इंफार्मेटिक्स (बीआईएसएजी-एन) की सहायता से किया है। इससे 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी की जाएगी। राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने मीडिया को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों के लाभ हेतु कृषि सिंचाई परियोजना की शुरुआत की थी। जिसमें 99 परियोजनाओं की शुरुआत की गई थी। जो कि देश में 34.64 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमी की सिंचाई करने में सहायक होगी। वहीं इन परियोजनाओं में से अभी तक 44 सिंचाई परियोजनाओं का काम पूरा किया जा चुका है। जिससे देश की 21.33 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि की सिंचाई की जा रही है। मोबाइल एप्लीकेशन से इन सभी परियोजनाओं की सतत निगरानी आसानी से की जा सकेगी। किसानों को होगा फायदा इस एप्लीकेशन का उपयोग स्थान, नहर के प्रकार/संरचना, पूर्णता स्थिति आदि जैसे अन्य विवरणों के साथ परियोजना घटक की छवि लेने के लिए निगरानी टीम/परियोजना प्राधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। इसके द्वारा एकत्रित की गई सूचना को जीआईएस पोर्टल पर प्रदर्शित करके किसानों को लाभ पहुंचाया जाएगा। मोबाइल ऐप्लीकेशन को क्षेत्र में उपलब्ध नेटवर्क को देखते हुए आनलाइन एवं आफलाइन दोनों ही तरीके से आपरेट किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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