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वर्टिकल फार्मिंग या खड़ी खेती कैसे करें | क्या है खड़ी खेती के फायदे ?

वर्टिकल फार्मिंग या खड़ी खेती कैसे करें | क्या है खड़ी खेती के फायदे ?

ट्रैक्टर जंक्शन पर देश के किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं वर्टिकल/खड़ी खेती के बारे में। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में कृषि योग्य भूमि लगातार कम हो रही है। वर्ष 2016 में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार कृषि योग्य भूमि में करीब 50 प्रतिशत तक की कमी आई है जो भविष्य में और बढ़ सकती है। ऐसे में अब कम जमीन पर ज्यादा पैदावार देने वाली खेती तकनीकों की जरूरत है। इसी को देखते हुए अब वर्टिकल खेती की ओर रूझान बढ़ रहा है। वर्टिकल खेती को भविष्य की शहरी खेती भी कह सकते हैं।

कैसे होती है वर्टिकल खेती या वर्टिकल खेती के प्रकार

वर्टिकल खेती को सामान्य भाषा में खड़ी खेती भी कह सकते हैं। यह खुले में हो सकती है और इमारतों व अपार्टमेंट की दीवारों का उपयोग भी छोटी-मोटी फसल उगाने के लिए किया जा सकता है। वर्टिकल फार्मिंग एक मल्टी लेवल प्रणाली है। इसके तहत कमरों में बहु-सतही ढांचा खड़ा किया जाता है, जो कमरे की ऊंचाई के बराबर भी हो सकता है। वर्टिकल ढांचे के सबसे निचले खाने में पानी से भरा टैंक रख दिया जाता है। टैंक के ऊपरी खानों में पौधों के छोटे-छोटे गमले रखे जाते हैं। पंप के जरिए इन तक काफी कम मात्रा में पानी पहुंचाया जाता है। इस पानी में पोषक तत्व पहले ही मिला दिए जाते हैं। इससे पौधे जल्दी-जल्दी बढ़ते हैं। एलइडी बल्बों से कमरे में बनावटी प्रकाश उत्पन्न किया जाता है। इस प्रणाली में मिट्टी की जरूरत नहीं होती। इस तरह उगाई गई सब्जियां और फल खेतों की तुलना में ज्यादा पोषक और ताजे होते हैं। अगर ये खेती छत पर की जाती है तो इसके लिए तापमान को नियंत्रित करना होगा। वर्टिकल तकनीक में मिट्टी के बजाय एरोपोनिक, एक्वापोनिक या हाइड्रोपोनिक बढ़ते माध्यमों का उपयोग किया जाता है। वास्तव में वर्टिकल खेती 95 प्रतिशत कम पानी का उपयोग करती है। छतों, बालकनी और शहरों में बहुमंजिला इमारतों के कुछ हिस्सों में फसली पौधे उगाने को भी वर्टिकल कृषि के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाता है।

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : 

हाइड्रोपोनिक्स में पौधों को पानी में उगाया जाता है। इस पानी में आवश्यक पादप पोषक मिले होते हैं। केवल पानी में या बालू अथवा कंकड़ों के बीच नियंत्रित जलवायु में बिना मिट्टे के पौधे उगाने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक्स कहते हैं। हाइड्रोपोनिक्स शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों हाइड्रो तथा पोनोस से मिलकर हुई है। हाइड्रो का मतलब पानी जबकि पोनोस का मतलब कार्य है। हाइड्रोपोनिक्स में पौधों और चारे वाली फसलों को नियंत्रित परिस्थितियों में 15 से 30 डिग्री सेल्सियस ताप पर लगभग 80 से 85 प्रतिशत आर्द्रता में उगाया जाता है।

एयरोपोनिक्स फार्मिंग : 

एयरोपोनिक्स  में पौधों की जड़ों पर केवल मिश्रित पोषक तत्त्वों का छिडक़ाव किया जाता है। गमले में लगे पौधों के मामले में आम तौर पर मिट्टी की जगह पर्लाइट, नारियल के रेशे, कोको पीट, फसलों का फूस या बजरी का इस्तेमाल किया जाता है।

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वर्टिकल खेती : बेल या छोटे पौधों वाली फसलों से कमाई

वर्टिकल खेती के ज्यादा भूमि की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इस तकनीक में एक गमले से लेकर एक एकड़ भूमि में फसलों का उत्पादन लिया जा सकता है। वर्टिकल खेती में मुख्य रूप से बेल या छोटे पौधों वाली फसलें ही ज्यादा उगाई जा सकती है। इनमें घीया, लोकी, टमाटर, मिर्च, धनिया, खीरा, पत्तेदार सब्जियां शामिल है। परंपरागत खेती में जहां बेल वाली फसल का उत्पादन कम होता है और बारिश के समय फसल खराब होने का भी अंदेशा बना रहता है। वहीं वर्टिकल खेती में फसल आसमान की दिशा में बांस के सहारे रस्सी की सहायता से बढ़ती है। जिस कारण खेत में पानी देते समय पौधा व फसल खराब नहीं होते हैं। जबकि परंपरागत तरीके से खेत में पानी देते समय बेल पर लगे फल और पौधे कई बार खराब हो जाते हैं। इसकी खास बात यह है कि इसमें रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल नहीं होता है, यह उत्पादन पूरी तरह से आर्गेनिक होता है।

वर्टिकल खेती के फायदे/लाभ

  • वर्टिकल खेती के माध्यम से कम जमीन में अधिक उत्पादन किया जा सकता है।
  • वर्टिकल खेती में कृत्रिम प्रकाश और पर्यावरण का निर्माण किया जाता है, जिसके कारण मौसम का कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है और फसल खराब होने का खतरा नहीं होता है।
  • परंपरागत खेती में कई तरह के रासायनिक  खाद और खतरनाक कीटनाशक दवाओं का उपयोग किया जाता है जिससे तरह-तरह की बीमारियां फैलती है। वर्टिकल खेती में रासायनिनक खाद और कीटनाशक दवाओं का उपयोग नहीं होता है।
  • वर्टिकल खेती में पानी की बहुत कम आवश्यकता होती है।
  • जहां इसकी खपत हो उसी के पास उगाया जा सकता है। जिससे लंबी दूरी के परिवहन की आवश्यकता नहीं होगी।
  • बढ़ती जनसंख्या और कम होती कृषि योग्य भूमि की समस्या के लिए भविष्य का श्रेष्ठ विकल्प है।
  • वर्टिकल खेती से किसानों की आय कई गुना तक बढ़ जाएगी। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार होगा।
  • वर्टिकल खेती में मजदूरों की आवश्यकता कम होत है क्योंकि ये ऑटोमेटेड तकनीक पर आधारित होती है।

मशरूम की वाणिज्यिक खेती वर्टिकल खेती का सबसे आम उदाहरण

वर्टिकल खेती करने वाले ज्यादातर उद्यमी लेटिस, ब्रोकली, औषधीय एवं सुगंधित जड़ी-बूटियां, फूल और साज-सज्जा के पौधे, टमाटर, बैगन जैसी मझोली आकार की फसलें और स्ट्रॉबेरी जैसे फल उगाते हैं। संरक्षित पर्यावरण में अलमारियों में ट्रे में मशरूम की वाणिज्यिक खेती वर्टिकल खेती का सबसे आम उदाहरण है। उच्च तकनीक वाली वर्टिकल खेती का एक अन्य सामान्य उदाहरण टिश्यू कल्चर है। इसमें पौधों के बीजों को टेस्ट ट्यूब में सिंथेटिक माध्यम में उगाया जाता है और कृत्रिम प्रकाश और पर्यावरण मुहैया कराया जाता है। वर्टिकल फार्म में उगाए जाने वाले उत्पाद बीमारियों, कीटों और कीटनाशकों से मुक्त होते हैं। आम तौर पर इनकी गुणवत्ता बहुत बेहतर होती है, इससे उनके दाम भी ज्यादा होते हैं।

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भारत में वर्टिकल खेती का भविष्य

वर्टिकल खेती या खड़ी खेती का विचार भारत में अभी नया है। कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में इन पर शोध चल रहा है। इस समय वर्टिकल कृषि मुख्य रूप से मेट्रो सिटी बेंगलूरु, हैदराबाद ,दिल्ली और कुछ अन्य शहरों में होती है। यहां उद्यमियों ने शौकिया तौर पर वर्टिकल खेती की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में व्यावसायिक उद्यम का रूप दे दिया। इन शहरों में बहुत से उद्यमी हाइड्रोपोनिक्स और एयरोपोनिक्स जैसे जानी-मानी प्रणालियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह की खेती करने के लिए वर्टिकल खेती की तकनीकी ज्ञान का होना जरूरी हैं। अमेरिका, चीन, सिंगापुर और मलेशिया जैसे कई देशों में वर्टिकल फार्मिंग पहले से हो रही है। इसमें एक बहुमंजिला इमारत में नियंत्रित परिस्थितियों में फल-सब्जियां उगाए जाते हैं।

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अभी सरकार से नहीं मिल रही सहायता

वर्टिकल फॉर्मिंग के कम लोकप्रिय होने की मुख्य वजहों में से एक शोध एवं विकास में  मदद का अभाव है। वर्टिकल खेती की तकनीक को बेहतर बनाने और लागत कम करने के लिए मुश्किल से ही कोई संस्थागत शोध चल रहा है। खेती की इस प्रणाली को लोकप्रिय बनाने के लिए ऐसे शोध की तत्काल जरूरत है।  सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों को शोध एवं विकास केंद्र स्थापित करने के बारे में विचार करना चाहिए ताकि वर्टिकल खेती को प्रोत्साहित किया जा सके। सरकार को वर्टिकल कृषि को बढ़ावा देने के लिए नीतियां लानी चाहिए। अभी वर्टिकल खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र व राज्य सरकार की ओर से कोई प्रोत्साहन व सब्सिडी नहीं दी जा रही है।

बाजार में दो लाख से ढाई करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट

वर्टिकल फार्मिंग में अभी सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिल रही है। भारत में यह कृषि की नवीनतम तकनीक है और इसकी प्रारंभिक लागत बहुत ज्यादा है। लेकिन बाजार में कई निजी क्षेत्र की कंपनियां इस दिशा में काम कर रही है। ये प्रोजेक्ट दो लाख रुपए से लेकर ढाई करोड़ रुपए तक के हैं जोकि 5 हजार स्क्वायर फीट से लेकर एक एकड़ यानि 40 हजार स्क्वायर फीट तक हो सकते हैं।

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हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

जानें, क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग / बिना मिट्टी के खेती की तकनीक कोरोना संक्रमण के दौर में सरकार का सबसे अधिक ध्यान कृषि की ओर गया है। इस दौरान जहां सभी व्यवसाय ठप हो गए, वहीं कृषि व्यवसाय ने लोगों को काफी राहत पहुंचाई। किसान ने अन्नदाता बनकर देश के लोगों की खाद्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया। कोरोना संक्रमण के दौर में बंपर फसल का उत्पादन हुआ जो अन्य वर्षों की तुलना में काफी अधिक रहा। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक बजट का उपयोग कृषि क्षेत्र में करने का मन बनाया हुआ है। सरकार का फोकस कृषि पर होने से लोगों की रूचि भी खेतीबाड़ी के काम की ओर होने लगी है। इस दौरान खेती में कई नवाचार भी किए जा रहे हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बिना मिट्टी के खेती आज कई पढ़े-लिखे युवक खेती को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं जिसके उन्हें काफी सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। इसी कड़ी में हाल ही में उदयपुर के चार दोस्तों ने खेती में एक नवाचार किया है जो काफी सराहनीय है। मीडिया में प्रसारित जानकारी के अनुसार कोरोना काल में ट्यूरिज्म व्यवसाय ठप होने के बाद उदयपुर के इन चार दोस्तों दिव्य जैन, भूपेन्द्र जैन, रौनक और विक्रम ने खेती में नई तकनीक के साथ भाग्य आजमाया है। यह नई तकनीक इसलिए खास है जिसकी चर्चा चारों ओर हो रही है। दरअसल उदयपुर शहर के इन चारों दोस्तों ने बिना मिट्टी के खेती करने की शुरुआत की है जो काफी दिलचस्प होने के साथ आश्चर्यचकित करने वाली भी है। भला बिना मिट्टी के खेती कैसे हो सकती है। पर ऐसा संभव कर दिखाया है उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने। क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming at home) हाइड्रोपोनिक्स का मतलब होता है जलीय कृषि। यानि इस खेती में फसल पानी में उगाई जाती है और इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता। खेती की इस आधुनिक तकनीक में फसल पानी और उसके पोषण स्तर के जरिए बढ़ती है। भारत के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पानी की कमी रहती है लेकिन इस तकनीक से सामान्य तकनीक की अपेक्षा सिर्फ 10 प्रतिशत पानी की जरूरत पड़ती है, साथ ही मिट्टी की भी कोई जरूरत नहीं होती। बस सूर्य का प्रकाश फसल को मिलता रहना चाहिए। लेकिन जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती वहां कस्टमाइज्ड तरीके से रोशनी की व्यवस्था की जाती है। इन चारों दोस्तों ने इसी तकनीक को आधार बनाकर उदयपुर शहर से 12 किमी दूर दस हजार वर्गफीट की जमीन पर ऑटोमेटेड फार्म बैंक टू रूट्स तैयार की और बिना मिट्टी के खेती करने लगे। इसके माध्यम से ये ओक लेट्यूस, ब्रॉकली, पाक चाय, चैरी-टोमेटो, बेल पेपर और बेसिल की खेती कर रहे हैं। इन सब्जियों की सबसे ज्यादा मांग पांच सितारा होटल्स में होती है और पर्यटक इन्हें पसंद भी करते हैं। कैसे की जाती है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming) बिना मिट्टी के पानी से होने वाली इस फार्मिंग को करने के लिए उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने रिसर्च किया और फिर उदयपुर में पॉली हाउस बनाकर उसमें खेती शुरू कर दी। इस खेती में मिट्टी का कहीं भी उपयोग नहीं किया गया है। इसमें तापमान को स्थिर रखते हुए पौधों की जड़ तक पाइप से पानी पहुंचाया जाता है और उसी से पोषक सब्जियों की पैदावार होती है। हाइड्रोपोनिक खेती में बीज बोने से लेकर बढऩे तक की एक अलग प्रक्रिया होती है। ये पौधे छोटे प्लास्टिक के कप- ए आकार की फ्रेम में कतार में रखे जाते हैं। इससे पौधों की जड़ में जरूरत के अनुसार पानी चलता रहता है। इस पानी में न्यू्ट्रेंट सोल्यूशन मिलाए जाते हैं ताकि पौधों को जरूरी पोषक तत्व मिलते रहें। पॉली हाउस में तैयार किए जाने वाले इन पौधों को पानी के पाइप से पहुंचाया जाता है। पौधे पॉली हाउस में 27 से 30 डिग्री तक तापमान मेंटेन करके रखा जाता है। पेस्ट्रीसाइड्स का इस्तेमाल नहीं होने से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन / हाइड्रोपोनिक उर्वरक यह खेती इसलिए भी लोगों के लिए चर्चा का विषय बन चुकी है कि इस तकनीक से खेती में पेस्ट्रीसाइड्स का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल रहा है। इस फार्मिंग के सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं। इससे दो माह की अवधि के दौरान ऐसी फसल तैयार हो चुकी है। इस सब्जी से बनने वाली चीजें स्वादिष्ट होने के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद है, जिसे पांच सितारा होटल्स में नाश्ते और फास्ट फू्रड में सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गेहूं : पछेती किस्मों की बुवाई में अपनाएं ये तकनीक, होगा भरपूर मुनाफा

गेहूं : पछेती किस्मों की बुवाई में अपनाएं ये तकनीक, होगा भरपूर मुनाफा

गेहूं की खेती : जानें, कौनसी है ये तकनीक और इससे कैसे मिल सकता है बेहतर उत्पादन अधिकांशत: हमारे देश में गेहूं की पछेती किस्म की बुवाई 20 नबंवर के बाद से शुरू हो जाती है। पछेती किस्म की बुवाई का एक फायदा ये है कि ये किस्म जल्दी पककर तैयार हो जाती है। अगर किसान उन्नत तकनीक से पछेती किस्मों की बुवाई करें, तो ज्यादा पैदावार के साथ अच्छी आमदनी मिल सकती है। गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई मध्य नबंवर के बाद करना सही रहता है। यह किस्में कम समय में पकने वाली होती हैं, साथ ही गर्मी व तापमान को सहन करने की क्षमता भी इसमें अन्य किस्मों की तुलना में अधिक होती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 गेहूं की पछेती उन्नत किस्में व उनकी विशेषताएं एच.डी.-3059 (पूसा पछेती) : यह किस्म वर्ष 2013 में जारी की गई है। इस किस्म की उत्पादकता 39.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसे पकने में 157 दिन लगते हैं। इस किस्म के पौधें की ऊंचाई 93 सेमी. होती है। यह किस्म रस्ट अवरोधी होने के साथ ही अधिक तापमान सहन करने की क्षमता रखती है। इसमें उच्च प्रोटीन होने के कारण इसका उपयोग ब्रेड, बिस्किट, चपाती बनाने में किया जाता है। एच.डी.-2985 (पूसा बसन्त ) : यह किस्म वर्ष 2011 में जारी की गई है। इस किस्म की उत्पादकता 37.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म को पकने में 105-110 दिन का समय लगता है। यह किस्म लीफ रस्ट एवं फोलियर ब्लाइट अवरोधी है। इस किस्म का उपयोग बिस्किट एवं चपाती बनाने में किया जाता है। पी.बी.डब्लू.-590 : यह किस्म 2009 में जारी की गई है। यह किस्म दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के लिए उपयुक्त पाई गई है। इसकी उत्पादन क्षमता 42.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म को पकने में 121 दिन का समय लगता है। यह किस्म ताप सहिष्णु, लीफ रस्ट अवरोधी है। इस किस्म में उच्च प्रोटीन होने से इसका उपयोग चपाती बनाने के लिए किया जाता है। डी.बी.डब्लू.-173 : यह किस्म वर्ष 2018 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 47.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके पकने की अवधि 122 दिन है। यह किस्म पीला एवं भूरा रस्ट अवरोधी है। यह किस्म ताप सहिष्णु है। इसमें प्रोटीन एवं आयरन में अधिकता है। इसमें बायो- फोर्टीफाईड प्रजाति-प्रोटीन 125 प्रतिशत, आयरन 40.7 पीपीएम होता है। डी.बी.डब्लू.-90 : यह किस्म वर्ष 2014 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 42.80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म 121 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसके पौधें की ऊंचाई - 76 से 105 सेमी तक होती है। यह स्ट्रिप एवं लीफ रस्ट अवरोधी है और उच्च तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। डब्लू.एच. 1124 : यह किस्म वर्ष 2015 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 42.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसके पकने की अवधि 123 दिन की है। यह पीला एवं भूरा रस्ट रोग के प्रति अवरोधी है। यह भी उच्च तापमान को सहन कर सकती है। डब्लूएच 1021 : यह किस्म भी देरी से बुवाई के लिए अच्छी मानी जाती है। इस किस्म से 39.1 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। ये भी अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। राज 3765 : यह किस्म 1996 जारी की गई है। इस किस्म के पौधे 85-95 सेंटीमीटर ऊंची अधिक फुटान वाली, रोली रोधक किस्म है। तना मजबूत होने के कारण यह आड़ी नहीं गिरती है। इसकी पत्तियां हरे रंग की होती हैं। पत्तियों पर सफेद पाउडर नहीं होता है। यह किस्म सामान्य बुवाई, सिंचाई व पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। सामान्य बुवाई में इसके पकने का समय 120 से 125 दिन है, जबकि पिछेती बुवाई में यह किस्म 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है। दाने शरबती चमकीले आभा लिए सख्त व बड़े आकार के होते हैं। यह किस्म पिछेती बुवाई में औसतन 38 से 42 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज दे सकती है। गेहूं की पछेती किस्म की बुवाई का समय गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई 20 नवंबर से लेकर 25 दिसंबर तक की जा सकती है। 15 दिसंबर तक बुवाई कर लेने पर पैदावार ज्यादा मिलती है। हर हाल में पछेती किस्म की बुवाई 25 दिसंबर तक पूरी कर लेनी चाहिए। इसके बाद बुवाई करने पर उत्पादन में कमी आ जाती है। पछेती किस्म की बुवाई के लिए बीज की मात्रा पछेती किस्म की बुवाई के लिए 55 से 60 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए। सबसे पहले पछेती किस्मों की बुवाई के लिए बीज को करीब 12 घंटे पानी में भिगोकर रखना चाहिए। इससे बीज का जल्दी व ज्यादा जमाव होता है। इसके बाद बीज को पानी से निकाल कर उसे दो घंटे फर्श पर छाया में सुखाना चाहिए। पछेती किस्मों का बीजोपचार पछेती किस्मों की बुवाई से पहले बीजों उपचारित करना बेहद जरूरी है। दीमक से बचाव के लिए 150 मिली क्लोरोपाइरीफोस 20 फीसद का साढ़े चार लीटर पानी में घोल बनाकर एक कुंतल बीज को उपचारित करें। अगले दिन कंडुआ व करनाल बंट रोग से बचाव के लिए एक ग्राम रेक्सिल फफूंदनाशक दवा प्रति किलो बीज की दर से सूखा उपचार करें। अंत में बिजाई से थोड़ा पहले जीवाणु खाद एजोटोवेक्टर तथा फोसफोटीका से उपचारित कर लेना चाहिए। गेहूं की पछेती फसल कैसे करें/पछेती किस्मों की बुवाई का तरीका बीज को उपचारित करने के बाद बीज की बुवाई उर्वरक ड्रिल से करें और पछेती बुवाई में खूड़ से खूड़ की दूरी करीब 20 सेंटीमीटर की जगह करीब 18 सेंटीमीटर रखें। किसान जीरो सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल से भी बुवाई कर सकते हैं। खाद्य व उर्वरक विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को बुवाई से पहले गली सड़ी गोबर की खाद प्रति एकड़ डालना चाहिए। अगर 6 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट प्रति एकड़ खेत में डालें, तो फास्फोरस खाद की मात्रा आधी कर दें। इसके साथ ही बुवाई के समय 50 किलोग्राम डीएपी या 75 किलोग्राम एनपीके 12:32:16 तथा 45 किलोग्राम यूरिया व 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत डाल दें। ध्यान दें कि एनपीके या डीएपी उर्वरकों को ड्रिल से दें। इसके अलावा जिंक और यूरिया को आखिरी जुताई के दौरान डालें। वहीं पहली सिंचाई पर 60 से 65 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डालना चाहिए। अगर रेतीली भूमि है, तो यूरिया दो बार पहली और दूसरी सिंचाई पर डालना चाहिए। पीला रतवा रोग से बचाव के लिए ये करें गेहूं में पीला रतवा रोग का प्रकोप अधिक रहता है। इसकी रोकथाम के लिए करीब 200 मिलीलीटर प्रापिकानाजोल 25 ईसी दवा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छडक़ देना चाहिए। अगर इस तकनीक से गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई की जाए तो फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कब-कब करें सिंचाई गेहूं की पहली सिंचाई 3 सप्ताह की जगह 4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। इसके बाद की सिंचाई मध्य फरवरी तथा 25 से 30 दिनों के बाद करनी चाहिए। फिर 20 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। वहीं फुटाव के समय, गांठें बनते समय, बालियां निकलने से पहले, दूधिया दशा में और दाना पकते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई व खरपतवार नाशक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। कनकी, मंडूसी व जंगली जई खरपतवार की रोकथाम के लिए क्लोडिनाफाप 15 प्रतिशत 160 ग्राम प्रति एकड़ बुवाई के 30 से 35 दिन बाद 250 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ना चाहिए। दीमक से बचाव के लिए बुवाई से एक दिन पहले 150 मिली क्लोरोपायरीफोस 20 ईसी दवा को 5 लीटर पानी में घोलकर बनाएं और इसे 100 किलो बीज के ऊपर छिडक़ दें। जंगली मटर, बथुआ, हिरनखुरी आदि की रोकथाम के लिए 500 ग्राम 2,4 डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत को 250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ बिजाई के 30-35 दिन बाद छिडक़ाव करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

कपास : समर्थन मूल्य पर खरीद जारी

कपास : समर्थन मूल्य पर खरीद जारी

किसानों को कपास बेचने में आ रही है परेशानी तो यहां करें फोन, होगा समाधान देश भर में खरीफ की फसल की समर्थन मूल्य पर खरीद जारी है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब देखें तो इस साल खरीफ फसलों की बंपर सरकारी खरीद की जा रही है। इसमें सबसे ज्यादा धान की खरीद हुई है। इसी के साथ सीसीआई द्वारा कपास की खरीद का काम भी जारी है। जानकारी के अनुसार सीसीआई ने मध्यप्रदेश के किसानों से बीते दिनों 6 लाख 29 हजार क्विंटल कपास खरीदा है। मीडिया से मिली जानकारी के आधार पर सीसीआई द्वारा गुरुवार तक 6 लाख क्विंटल कपास की खरीदी की जा चुकी है। बता दें कि सीसीआई द्वारा प्रति वर्ष कपास की खरीदी की जाती है। इस वर्ष भी इंदौर संभाग में 19 खरीदी केंद्र बनाए हैं, जहां किसान अपनी कपास की उपज निर्धारित मापदंडों की होने पर सीसीआई को बेच सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या है कपास का समर्थन मूल्य / कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र सरकार ने चालू कपास सीजन 2020-21 के लिए कपास (लंबा रेशा) का एमएसपी 5,825 रुपए प्रति क्विंटल जबकि कपास (मध्यम रेशा) का 5,515 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। कितनी कपास खरीदने का है सरकार का लक्ष्य सरकारी आंकड़ों के अनुसार सीसीआई ने बीते सीजन 2019-20 में रिकॉर्ड 105.14 लाख गांठ कपास की खरीद की गई और चालू सीजन 2020-21 में एजेंसी ने 125 लाख गांठ कपास खरीदने का लक्ष्य रखा है। बीते सीजन में सरकार ने किसानों से 28,500 करोड़ रुपए मूल्य की कपास खरीदी थी, जबकि इस साल 35,000 करोड़ मूल्य की कपास खरीदने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार के अनुमान के अनुसार, पिछले साल देश में कपास का उत्पादन 357 लाख गांठ था जबकि इस साल 360 लाख गांठ होने का अनुमान है। क्या है कपास खरीद के सरकारी मापदंड कृषि मंत्रालय के दिशा निर्देश के अनुसार, एफएक्यू (फेयर एवरेज क्वालिटी) तय किया गया। कपास में एफएक्यू के तहत 12 फीसदी तक नमी स्वीकार्य है। कोई किसान यह नहीं कह सकता है कि 12 फीसदी से कम नमी पर सीसीआई ने कॉटन नहीं खरीदा। अगर 12 फीसदी से कम नमी पर एजेंसी द्वारा खरीद से मना करने की कोई शिकायत है तो उनके संज्ञान में लाया जाए। बता दें कि हरियाणा में कपास की खरीद के लिए 17 सेंटर हैं जबकि पंजाब में 21 सेंटर हैं। 8 प्रतिशत से अधिक नमी पर होती है समर्थन मूल्य में कटौती सीसीआई की खरीद में आठ फीसदी ही मानक तय किया गया है, जिस पर होने वाली खरीद के लिए किसानों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलता है, लेकिन उससे अधिक नमी होने पर हरेक फीसदी पर एमएसपी में कटौती की जाती है और इसकी भी अनुमति 12 फीसदी तक ही है। इससे ऊपर नमी होने पर सीसीआई कपास नहीं खरीदती है। इधर मध्यप्रदेश के किसानों का आरोप, नहीं खरीदी जा रहा पूरा कपास मीडिया में प्रकाशित जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के सनावद क्षेत्र के किसानों ने सीसीआई द्वारा उनका कपास नहीं खरीदने और मापदंड का पालन नहीं करने की शिकायत की है। उधर, सनावद क्षेत्र के किसानों ने सीसीआई पर उनका कपास नहीं खरीदने के आरोप लगाए हैं। किसान विक्रम मंडलोई ग्राम मर्दाना का कहना है कि कपास की 100 गाड़ी में से करीब 20 गाड़ी कपास ही सीसीआई द्वारा खरीदा जा रहा है, शेष 80 गाड़ी कपास वाले किसानों के माल में कोई न कोई कमी बताकर खरीदने से इंकार किया जा रहा है। बता दें कि इसे लेकर सनावद और भीकन गांव मंडी में किसान पूर्व में हंगामा भी कर चुके हैं। इस कारण कुछ घंटे कपास की खरीदी भी बंद रही थी। प्रशासनिक अधिकारियों की समझाइश पर खरीदी फिर शुरू हो सकी थी। किसान सीसीआई अधिकारियों और व्यापारियों के बीच सांठ -गांठ के आरोप भी लगा चुके हैं। जबकि सीसीआई वाले निर्धारित मापदंडों के अनुसार कपास खरीदी करने की बात कर रहे हैं। सीसीआई : यदि नहीं खरीदा जा रहा है कपास, तो करें शिकायत मध्यप्रदेश के इंदौर में किसानों से कपास की खरीद नहीं करने के आरोप को लेकर सीसीआई के महाप्रबंधक श्री मनोज बजाज (इंदौर) का कहना है कि लाख 29 हजार क्विंटल कपास की खरीदी की जा चुकी है। भारत सरकार के मापदंडों के अनुसार सीसीआई द्वारा 8-12 प्रतिशत नमी के साथ एफएक्यू वाला कपास खरीदा जाता है। कपास की नमी जांचने के लिए उपकरण भी दिए गए हैं, जिनका इस्तेमाल होते देखा जा सकता है। यदि किसी किसान को कोई शिकायत है तो वह अपने नाम, मोबाईल नंबर, गाड़ी नंबर (जिसमें कपास लाया) और मंडी में आने की तारीख के साथ मुझे शिकायत करें। संबंधित मंडी में इसके विवरण का रजिस्टर रखा जाता है। मंडी सचिव से पुष्टि के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। किसान यहां करें शिकायत, होगा समाधान दरअसल जिन किसानों का कपास नहीं खरीदा जा रहा है, वे अपनी शिकायत महाप्रबंधक, भारतीय कपास निगम, कपास भवन, रेसकोर्स रोड, इंदौर स्थित कार्यालय में व्यक्तिगत मिलकर या फोन नंबर 0731-2532703 पर कर सकते हैं। उनकी समस्या का समाधान किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

ई-चौपाल :  बिहार में अब किसान चौपाल होंगे वर्चुअल

ई-चौपाल : बिहार में अब किसान चौपाल होंगे वर्चुअल

किसान सीधा कर सकेंगे संवाद, दिसंबर में इन तारीखों को होगा ई-चौपाल का आयोजन कोरोना काल में लगने वाली एक्चुअल चौपालों में किसानों की उपस्थिति कम होने को लेकर बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने राज्य में नई व्यवस्था शुरू की है। इसके तहत बिहार में अब किसान चौपाल भी वर्चुअल होंगे। यह व्यवस्था 9 नवंबर से लागू कर दी गई है। इसके तहत अब हर महीने चार चौपाल लेगेंगी। सभी चौपालों में अलग-अलग विषय पर किसानों से बात होगी। इसके लिए बीएयू ने कैलेंडर तैयार कर लिया है। हर चौपाल दिन के तीन से पांच बजे तक लगेगी। इन चौपालों के माध्यम से अधिकारी और वैज्ञानिक सप्ताह में एक दिन किसानों से सीधे जुड़ जाते हैं। किसानों की समस्या का निराकरण मौके पर ही हो जाता है तो अधिकारियों को किसानों का फीडबैक मिल जाता है। लेकिन कारोना काल में किसानों की अनुपस्थिति से ये चौपाल लगभग बंद थे। लिहाजा अब बीएयू ने ई-किसान चौपाल की शुरुआत की है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 महीने में चार बार लगेंगी ई-चौपाल मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के अनुसार ई- किसान चौपाल में महीने में चार बार लगेंगी। कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन और उद्यान विषयों पर ये चौपाल होंगी। चौपाल का जो भी विषय होगा इसकी जानकारी पहले किसानों को दे दी जाएगी। उसी हिसाब से किसानों को जुडऩे की सलाह दी जाएगी। साथ ही संबंधित विषय से अलग प्रश्न नहीं लिए जाएंगे। क्योंकि दूसरे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वैज्ञानिक उस दिन उपस्थित नहीं रहेंगे। बीएयू के यू-ट्यूब से सीधे जुड़ सकते हैं 3.17 लाख किसान चौपाल की नई व्यवस्था में बीएयू के यूट्यूब से जुड़े 3.17 लाख किसान सीधे जुड़ सकते हैं। अन्य किसानों को विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) के माध्यम से लिंक भेजेगा। नौ नवम्बर को पहली ई किसान चौपाल की जानकारी बहुत किसानों को नहीं हो पाई। लिहाजा उसमें 18 हजार किसान ही जुड़ पाये थे, लेकिन अब केवीके इसका पहले से भी प्रचार करेंगे साथ विषय की जानकारी भी देंगे। हर सप्ताह के लिए किया गया है कैलेंडर तैयार बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के निदेशक डॉ. आरके सोहाने के अनुसार किसानों के लिए यह ई-चौपाल बहुत ही लाभकारी है। हर सप्ताह के लिए कैलेंडर तैयार है। कैलेंडर सभी जिलों के केवीके को भेज दिया गया है। उसी हिसाब से वह किसानों को जानकारी दी जाएगी। क्या रहेगी ई-किसान चौपाल की व्यवस्था 04 चौपाल लगेंगी हर महीने 02 घंटे की होगी ई किसान चौपाल 3.17 लाख किसान अभी जुडें हैं यूट्यब से 1.5 लाख किसानों को भेजा जाएगा लिंक 18 हजार किसान जुडे थे पहले चौपाल में दिसंबर में इन चार दिनों होगा ई-चौपाल का प्रसारण बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) किसानों के लिए दिसंबर माह में चार दिनों का ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम ई-चौपाल प्रसारित करेगा। बीएयू के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. आरके सोहाने के अनुसार दिसंबर माह में पांच, 11, 19 और 28 को भी ई-चौपाल कार्यक्रम होगा। इसमें किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती के गुर सीखाएं जाएंगे। इस दौरान किसान अगर कुछ सवाल करना चाहेंगे तो उसका भी जवाब दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि किसानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किसानी की बारीकी से अवगत कराया जा रहा है। इसके लिए बीएयू के वैज्ञानिक अपने-अपने विभाग की ओर से डिजिटल मटेरियल तैयार करके विभिन्न माध्यमों द्वारा किसानों तक पहुंचा रहे हैं। ताकि कोरोना संक्रमण के दौरान उनकी खेती और कारोबार में किसी भी तरह का नुकसान न हो। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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