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विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित

विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित

सरकार ने जारी की अधिसूचना, किसानों को जल्द उपलब्ध होंगे इन फसलों के बीज

भारत में कृषि उन्नत बनने को लेकर कृषि वैज्ञानिक फसलों की नई-नई किस्मों की पहचान करने में लगे हुए जिससे किसानों को सुरक्षित फसल का उत्पादन मिल सके और उत्पादन भी बेहतर हो। इसी कड़ी में हाल ही में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर ने विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित की है जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसी के साथ भारत सरकार की केंद्रीय बीज उपसमिति ने इन विभिन्न फसलों की नवीनतम किस्मों को व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन के लिए अधिसूचित कर दिया है। बताया जा रहा है कि आगामी वर्षों में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित इन सभी नवीन किस्मों को व्यावसायिक खेती हेतु बीजोत्पादन कार्यक्रम में लिया जाएगा, जिससे इनका बीज प्रदेश के किसानों को उपलब्ध हो सकेगा।

 

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कौन-कौनसी फसलों की है ये नई आठ किस्में

धान : भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर द्वारा विकसित चावल की तीन नवीन किस्म- छत्तीसगढ़ राइस हाइब्रिड-2, बस्तर धान-1, प्रोटेजीन धान को विश्वविद्यालय की ओर से विकसित किया गया है।

दलहन : दलहन की तीन नवीन किस्म विकसित की गई हैं। इनमें छत्तीसगढ़ मसूर-1, छत्तीसगढ़ चना-2, छत्तीसगढ़ अरहर-1 है।

तिलहन : तिलहन की दो नवीन किस्म विकसित की गई हैं। इनमें छत्तीसगढ़ कुसुम-1 तथा अलसी की आर.एल.सी.-161 किस्मों को छत्तीसगढ़ राज्य में व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन हेतु अधिसूचित किया गया है। अलसी की नवीन किस्म आर.एल.सी. 161 छत्तीसगढ़ के अलावा पंजाब, हिमाचल और जम्मू कश्मीर राज्यों के लिए अनुशंसित की गई है।

 


क्या है इन किस्मों की विशेषताएं

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय विकसित विभिन्न फसलों की यह नवीन किस्में विशेष गुणधर्मों से परिपूर्ण है। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई इन किस्मों की विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

राइस हाइब्रिड-2

ये धान की नई तीन किस्मों में से एक है। इसकी उपज क्षमता 5144 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म छत्तीसगढ़ में सिंचित क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है। इस किस्म की पकने की अवधि 120-125 दिन है। इस किस्म का चावल लंबा-पतला होता है। यह किस्म झुलसन, टुंगरो वायरस एवं नेक ब्लास्ट रोगों के लिए सहनशील तथा गंगई के लिए प्रतिरोधी व पत्तिमोड़ रोग के प्रति सहनशील पाई गई है।

बस्तर धान-1

यह विश्वविद्यालय द्वारा विकसित धान की बौनी किस्म है। इसका दाना लंबा एवं पतला होता है। इस किस्म की पकने की अवधि 105-110 दिनों की है। इसका औसत उत्पादन 4000-4800 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म हल्की एवं उच्चहन भूमि हेतु उपयुक्त है।

प्रोटेजीन धान

यह नवीन किस्म बौनी प्रजाति के धान की किस्म है जिसकी पकने की अवधि 124-128 दिनों की है। इसका दाना मध्यम लंबा व पतले आकार होता है। जिसमें जिंक की मात्रा 20.9 पी.पी.एम. तथा प्रोटीन का प्रतिशत 9.29 पाया गया है। इस किस्म की औसत उपज क्षमता 4500 किलोग्राम/हेक्टेयर है।

छत्तीसगढ़ मसूर-1

दहलन की इस किस्म की उपज क्षमता 1446 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। मसूर की यह किस्म औसत 91 दिन (88 से 95 दिन) में पक कर तैयार हो जाती है। इसके पुष्प हल्के बैगनी रंग के होते है। इस किस्म के 100 दानों का औसत वजन 3.5 ग्राम (2.7 से 3.8 ग्राम) होता है। इस किस्म में दाल रिकवरी 70 प्रतिशत तथा 24.6 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। यह किस्म मसूर के प्रमुख कीटों के लिए सहनशील है।

छत्तीसगढ़ चना-2

दलहन की नई किस्मों में चना की नवीन किस्म छत्तीसगढ़ चना-2 की उपज क्षमता छत्तीसगढ़ में 1732 किलोग्राम/हेक्टेयर पाई गई है। चने की यह किस्म औसत 97 दिनों (90-105 दिनों) में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के 100 दानों का वजन 23.5 ग्राम (22.8 ग्राम से 24.0 ग्राम) है। यह किस्म उकठा रोग हेतु आंशिक प्रतिरोधी पाई गई है।

छत्तीसगढ़ अरहर-1

दहलन की किस्मों में नई विकसित की गई छत्तीसगढ़ अरहर-1 किस्म की उपज क्षमता खरीफ में औसत उपज 1925 किलोग्राम/हेक्टेयर है तथा रबी में 1535 किलोग्राम/हेक्टेयर पाई गई है। अरहर की यह किस्म 165-175 दिन खरीफ में तथा 130-140 दिन रबी में पक कर तैयार हो जाती है। इसके सौ दानों का वजन करीब 9-10 ग्राम होता है। इस किस्म के पुष्प पीले लाल रंग के होते हैं। इस किस्म की दाल रिकवरी 65-75 प्रतिशत पाई गई है। राज्य स्तरीय परीक्षणों में यह किस्म उकठा हेतु आंशिक प्रतिरोधी है तथा इसमें फली छेदक रोग भी कम लगता है।

छत्तीसगढ़ कुसुम-1

विश्वविद्यालय द्वारा विकसित तिलहन की दो नवीन किस्मों में से छत्तीसगढ़ कुसुम-1 को जननद्रव्य जी.एम.यू. 7368 से चयन विधि द्वारा विकसित किया गया। इस किस्म में तेल की मात्रा 31-33 प्रतिशत तक पाई जाती है तथा यह किस्म 115 से 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। इस किस्म से 1677 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर औसत उपज मिलती है। यह किस्म छत्तीसगढ़ में धान आधारित फसल चक्र में रबी सीजन हेतु उपयुक्त है। कुसुम की यह किस्म अल्टेनेरिया लीफ ब्लाइट बीमारी हेतु आंशिक प्रतिरोधी है। साथ ही जल्दी पकने के कारण इसकी फसल में एफिड कीट द्वारा कम नुकसान होता है।

आर.एल.सी.-161

अलसी की यह नवीन किस्म वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त पाई गई है एवं विपुल उत्पादन देने में सक्षम है। इस किस्म को अखिल भारतीय समन्वय अलसी परियोजना के अंतर्गत विकसित किया गया है। यह किस्म देश के चार राज्यों छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू के लिए सिफारिश की गई है। विश्वविद्यालय द्वारा यह किस्म दो प्रजातियों आयोगी एवं जीस-234 से मिलाकर तैयार की गई है। जिसका औसत उत्पादन 1262 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।

 


 

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ई-चौपाल :  बिहार में अब किसान चौपाल होंगे वर्चुअल

ई-चौपाल : बिहार में अब किसान चौपाल होंगे वर्चुअल

किसान सीधा कर सकेंगे संवाद, दिसंबर में इन तारीखों को होगा ई-चौपाल का आयोजन कोरोना काल में लगने वाली एक्चुअल चौपालों में किसानों की उपस्थिति कम होने को लेकर बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने राज्य में नई व्यवस्था शुरू की है। इसके तहत बिहार में अब किसान चौपाल भी वर्चुअल होंगे। यह व्यवस्था 9 नवंबर से लागू कर दी गई है। इसके तहत अब हर महीने चार चौपाल लेगेंगी। सभी चौपालों में अलग-अलग विषय पर किसानों से बात होगी। इसके लिए बीएयू ने कैलेंडर तैयार कर लिया है। हर चौपाल दिन के तीन से पांच बजे तक लगेगी। इन चौपालों के माध्यम से अधिकारी और वैज्ञानिक सप्ताह में एक दिन किसानों से सीधे जुड़ जाते हैं। किसानों की समस्या का निराकरण मौके पर ही हो जाता है तो अधिकारियों को किसानों का फीडबैक मिल जाता है। लेकिन कारोना काल में किसानों की अनुपस्थिति से ये चौपाल लगभग बंद थे। लिहाजा अब बीएयू ने ई-किसान चौपाल की शुरुआत की है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 महीने में चार बार लगेंगी ई-चौपाल मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के अनुसार ई- किसान चौपाल में महीने में चार बार लगेंगी। कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन और उद्यान विषयों पर ये चौपाल होंगी। चौपाल का जो भी विषय होगा इसकी जानकारी पहले किसानों को दे दी जाएगी। उसी हिसाब से किसानों को जुडऩे की सलाह दी जाएगी। साथ ही संबंधित विषय से अलग प्रश्न नहीं लिए जाएंगे। क्योंकि दूसरे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वैज्ञानिक उस दिन उपस्थित नहीं रहेंगे। बीएयू के यू-ट्यूब से सीधे जुड़ सकते हैं 3.17 लाख किसान चौपाल की नई व्यवस्था में बीएयू के यूट्यूब से जुड़े 3.17 लाख किसान सीधे जुड़ सकते हैं। अन्य किसानों को विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) के माध्यम से लिंक भेजेगा। नौ नवम्बर को पहली ई किसान चौपाल की जानकारी बहुत किसानों को नहीं हो पाई। लिहाजा उसमें 18 हजार किसान ही जुड़ पाये थे, लेकिन अब केवीके इसका पहले से भी प्रचार करेंगे साथ विषय की जानकारी भी देंगे। हर सप्ताह के लिए किया गया है कैलेंडर तैयार बिहार कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के निदेशक डॉ. आरके सोहाने के अनुसार किसानों के लिए यह ई-चौपाल बहुत ही लाभकारी है। हर सप्ताह के लिए कैलेंडर तैयार है। कैलेंडर सभी जिलों के केवीके को भेज दिया गया है। उसी हिसाब से वह किसानों को जानकारी दी जाएगी। क्या रहेगी ई-किसान चौपाल की व्यवस्था 04 चौपाल लगेंगी हर महीने 02 घंटे की होगी ई किसान चौपाल 3.17 लाख किसान अभी जुडें हैं यूट्यब से 1.5 लाख किसानों को भेजा जाएगा लिंक 18 हजार किसान जुडे थे पहले चौपाल में दिसंबर में इन चार दिनों होगा ई-चौपाल का प्रसारण बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) किसानों के लिए दिसंबर माह में चार दिनों का ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम ई-चौपाल प्रसारित करेगा। बीएयू के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. आरके सोहाने के अनुसार दिसंबर माह में पांच, 11, 19 और 28 को भी ई-चौपाल कार्यक्रम होगा। इसमें किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती के गुर सीखाएं जाएंगे। इस दौरान किसान अगर कुछ सवाल करना चाहेंगे तो उसका भी जवाब दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि किसानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किसानी की बारीकी से अवगत कराया जा रहा है। इसके लिए बीएयू के वैज्ञानिक अपने-अपने विभाग की ओर से डिजिटल मटेरियल तैयार करके विभिन्न माध्यमों द्वारा किसानों तक पहुंचा रहे हैं। ताकि कोरोना संक्रमण के दौरान उनकी खेती और कारोबार में किसी भी तरह का नुकसान न हो। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सहकार प्रज्ञा : किसानों की आय दुगुनी करने के प्रयास तेज

सहकार प्रज्ञा : किसानों की आय दुगुनी करने के प्रयास तेज

5 हजार किसानों को मिलेगा रोजगार, एफपीओ ले सकते हैं 2 करोड़ तक के लोन, ब्याज पर मिलेगी सब्सिडी किसानों की आय दुगुनी करने को लेकर केंद्र सरकार के प्रयास जारी है। केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को कृषि संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ ही किसानों की आय में बढ़ोतरी करने का प्रसास कर रही है और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। केंद्र सरकार ने किसानों के लिए पीएम किसान सम्मान निधि योजनाओं के माध्यम से किसानों को प्रति वर्ष 6 हजार रुपए की सहायता तीन किश्तों में उनके खाते में सीधे ट्रांसर्फर की जाती है जिससे देश के लाखों किसानों को फायदा पहुंचा है। इसके अलावा राज्य सरकारें भी मोदी सरकार के 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने के लक्ष्य पर काम कर रही हैं। कई राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर किसानों के लिए योजनाएं चला रखी है। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों के हितार्थ मुख्यमंत्री किसान कल्याण निधि योजना शुरू की है जिसमें किसानों को प्रतिवर्ष 4 हजार रुपए दो किश्तों में उनके खाते में सीधे ट्रांसर्फर किए जा रहे हैं। इसी प्रकार अन्य राज्यों में किसानों के लिए योजनाओं की शुरुआत की जा रही है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या है सहकार प्रज्ञा / सहकार प्रज्ञा का अनावरण हाल ही किसानों की आय को दुगुना करने के लक्ष्य को आगे बढ़ते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सहकार प्रज्ञा का अनावरण किया। इसके तहत किसानों को प्रशिक्षित किया जाएगा जिससे करीब 5 हजार किसानों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। मीडिया में प्रकाशित व प्रसारित जानकारी के अनुसार सहकार प्रज्ञा के तहत एनसीडीसी लिनाक के 18 क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्रों और प्राथमिक सहकारी समितियों के लिए 45 प्रशिक्षण मॉड्यूल सम्मिलित हैं। तोमर ने एनसीडीसी को समर्पित और नवीनतम प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्राथमिक सहकारी समितियों में किसानों को सशक्त बनाने की सलाह दी है। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एनसीडीसी सहकार प्रज्ञा द्वारा प्रशिक्षण के लिए समर्पित लक्ष्मणराव इनामदार राष्ट्रीय सहकारिता अनुसंधान एवं विकास अकादमी( लिनाक ), जो कि एनसीडीसी से संबद्ध एवं वित्त पोषित है, द्वारा देश भर में 18 (अठारह) क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्रों के फैले अपने विस्तृत नेटवर्क के माध्यम से एनसीडीसी की प्रशिक्षण क्षमता को 18 (अठारह) गुना तक बढ़ाने का संकल्प करती है। उन्होंने आगे कहा कि प्राथमिक सहकारी समितियों को तैयार करने के उद्देश्य से ज्ञान, कौशल एवं संगठनात्मक क्षमताओं को अंतरण करने हेतु सहकार प्रज्ञा में 45 (पैंतालीस) प्रशिक्षण मॉड्यूल सम्मिलित हैं जिससे प्रधानमंत्री के ‘आत्म निर्भर भारत’ संकल्पना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। बता दें कि सहकार प्रज्ञा राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एन.सी.डी.सी.)वर्ष 1963 में संसद के एक अधिनियम के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा गठित एक शीर्ष स्तरीय सांविधिक स्वायत्त संस्था हैं। 5 हजार किसानों को प्रशिक्षित करने की है योजना जानकारी के अनुसार लिनाक वर्ष 1985 से अब तक सहकारी समितियों के 30,000 से अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षित कर चुका है। एनसीडीसी के प्रबंध निदेशक संदीप कुमार नायक ने कहा कि लिनाक ने एक वर्ष में सहकारी समितियों में लगभग 5000 किसानों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है। नायक द्वारा आगे कहा गया कि सहकारी समितियों को बाजार की अर्थव्यवस्था के पेशेवर व्यावसायिक शर्तों से संबधित मामलों से निपटने हेतु पैंतालीस समर्पित प्रशिक्षण मॉड्यूल से लैस करेंगे। पीएम मोदी का लक्ष्य, ग्रामीण व कृषि क्षेत्र में हो अधिक से अधिक बजट का उपयोग तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी का लक्ष्य रहा है कि ग्रामीण व कृषि क्षेत्र में अधिकाधिक काम हो व बजट का ज्यादा से ज्यादा पैसा इन क्षेत्रों में उपयोग हो, ताकि ग्रामीणों के जीवनस्तर में बदलाव आए एवं किसानों की आय दोगुनी हो सकें। कोविड संकट के दौरान जहां समूची अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, वहीं हमारी ग्रामीण तथा कृषि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था ने देश को पूरी ताकत के साथ खड़ा रखा। भारत में कृषि क्षेत्र व गांव-गरीब, ये हमारे देश की रीढ़ है। कार्यक्रमों के माध्यम से इसे जितना सशक्त करने की कोशिश की जाएगी, उतना ही चुनौतियों का सामना करते हुए हम उन पर विजय प्राप्त कर पाएंगे। किसानों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के सरकार के प्रयास जारी तोमर ने कहा कि देश में 2.53 लाख से अधिक ग्राम पंचायतें है, जिनके माध्यम से भारत सरकार ने गांवों में मौलिक सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम किया है। हर घर में शौचालय, बिजली-पानी, रसोई गैस इत्यादि सुलभ हो, यह सुनिश्चित करने का काम सरकार द्वारा किया जा रहा है। कृषि क्षेत्र की गैप्स भरी जा रही है। देश में 86 प्रतिशत छोटे किसान है, जो खुद खेती में निवेश नहीं कर सकते है, उनके लिए गांव-गांव तक कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं विकसित करने पर सरकार ध्यान दे रही है, ताकि किसान अपनी उपज कम दाम पर बेचने को विवश नहीं हो। सहकारिता रूपी ब्रिज को माध्यम बनाकर किसान जीवन को सार्थक बना सकता है, अपना जीवन स्तर ऊंचा उठा सकता है। यह प्लेटफार्म बहुत ही महत्वपूर्ण है। 6,850 करोड़ रुपए के फंड के साथ एफपीओ स्कीम भी शुरू, मिलेगा 2 करोड़ तक का लोन उन्होंने कहा कि एनसीडीसी ने 1.58 लाख करोड़ रुपए सहकारिता के माध्यम से दिए हैं। केंद्र सरकार अनेक योजनाएं लाईं हैं, जिनमें 6,850 करोड़ रुपए के फंड के साथ एफपीओ स्कीम भी शुरू की गई है। इसमें एफपीओ 2 करोड़ रुपए तक का लोन ले सकते हैं, जिस पर उन्हें ब्याज सब्सिडी भी दी जाएगी। आत्मनिर्भर भारत अभियान में घोषित विभिन्न पैकेजों पर अमल प्रारंभ हो चुका है। 1 लाख करोड़ रुपए के कृषि इंफ्रा फंड सहित अन्य पैकेजों का पैसा नीचे तक पहुंचेगा, जिससे किसानों को काफी लाभ मिलेगा, वहीं नए कानूनों से भी किसानों को फायदा होगा। इन सबके साथ ही गांव-गरीब-किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सहकारिता की इसट्रेनिंग का निश्चित रूप से बहुत योगदान रहेगा। कौन-कौन हो सकेंगे नए ट्रेनिंग माड्यूल्स में शामिल नए ट्रेनिंग मॉड्यूल्स में किसान प्रतिनिधियों, पंचायत स्तरीय अधिकारियों, सीबीबीओ कर्मचारियों, ब्लॉक व जिला स्तरीय अधिकारियों, युवाओं, महिलाओं, प्राथमिक सहकारी समितियों के कर्मचारियों आदि को प्रशिक्षित किया जाएगा। इन प्रशिक्षण मॉड्यूल्स के अंतर्गत इन क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा। व्यवसाय / उद्यम के रूप में कृषि, युवाओं के लिए सहकारी समितियों के गठन संबंधी कार्यक्रम,सहकारी उद्यमों के लिए व्यावसायिक योजनाओं का गठन, प्राथमिक स्तरीय सहकारिता हेतु व्यवसाय विकास एवं संपत्ति प्रबंधन, लेखा तथा बही खाता, कृषि उत्पाद व्यवसाय तथा पेरिशबल बिजनेस का प्रसंस्करण, सहकारिता के उत्पादों का ई-विपणन, सहकारिताओं के लिए खाद्य सुरक्षा, भंडारण अवसंरचना संचालन, शीतगृह श्रंखला अवसंरचना संचालन, फ्रशवाटरएक्वाकल्चर बिजनेस, सजावटी मछली, समुद्री खरपतवार व बत्तख पालन व्यवसाय, मधुमक्खी प्रसंस्करण, मसाला प्रसंस्करण वनारियल प्रसंस्करण व्यवसाय, कस्टम हायरिंग सेंटर का प्रबंधन आदि। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

समर्थन मूल्य : अब सब्जियों के उचित मूल्य की भी गारंटी

समर्थन मूल्य : अब सब्जियों के उचित मूल्य की भी गारंटी

केरल की तर्ज पर अब मध्यप्रदेश सरकार भी तय करेगी सब्जियों का समर्थन मूल्य केरल राज्य की तर्ज पर अब मध्यप्रदेश सरकार भी रबी व खरीफ फसल के समर्थन मूल्य की तरह ही सब्जियों का समर्थन मूल्य तय करेगी ताकि किसानों को सब्जी उत्पादन का उचित मूल्य मिल सके। इस संबंध में हाल ही में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बैठक में दिशा-निर्देश दिए है। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो जल्दी ही मध्यप्रदेश राज्य में भी सब्जियों के समर्थन मूल्य तय कर दिए जाएंगे जिससे किसानों को सब्जियों के उचित मूल्य की गांरटी मिलेगी और इससे किसानों को इसका लाभ होगा। जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि हमारा किसान दिन-रात पसीना बहाकर उत्पादन करता है परन्तु अधिक मुनाफा बिचौलिए ले जाते हैं। ऐसी बाजार व्यवस्था विकसित करें, जिससे किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिले। सब्जियों के थोक व खुदरा मूल्य में अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। सब्जियों के समर्थन मूल्य निर्धारित किए जाने के संबंध में रिपोर्ट तैयार की जाए। मुख्यमंत्री चौहान मंत्रालय में सब्जियों के दाम के संबंध में उद्यानिकी विभाग की उच्च स्तरीय बैठक ले रहे थे। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 समर्थन मूल्य निर्धारित करने संबंधी योजना पर विचार ( Minimum Support Price) मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि किसानों को उनकी सब्जियों आदि उपज का समुचित मूल्य दिलवाना हमारा लक्ष्य है। इसके लिए अन्य राज्यों की व्यवस्थाओं का अध्ययन कर सब्जियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किए जाने संबंधी रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत की जाए। औचक निरीक्षण करें मुख्यमंत्री चौहान ने निर्देश दिए कि पशुपालन व संबंधित विभागों के अधिकारी सब्जी मंडियों आदि का औचक निरीक्षण कर देखें कि किसानों से सब्जी किस मूल्य पर खरीदी जा रही है और उपभोक्ता को किस मूल्य पर मिल रही है। थोक व खुदरा मूल्य में अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। केरल में सब्जियों के समर्थन मूल्य को लेकर क्या है व्यवस्था सब्जियों का समर्थन मूल्य देश में अभी किसानों को फसलों के उचित मूल्य दिलवाने के लिए केंद्र सरकार के द्वारा रबी एवं खरीफ की 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किए जाते हैं। इन दामों पर किसानों से पंजीकरण करवाकर इन फसलों की खरीदी की जाती है। इसी तरह देश में केरल आदि राज्यों में सब्जियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किए जाने की व्यवस्था है। केरल में इसके लिए किसानों का पंजीयन किया जाता है, फिर उन दामों पर किसानों से समर्थन मूल्य पर सब्जी की खरीदी की जाती है। बैठक में बताया गया कि केरल आदि राज्यों में सब्जियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किए जाने की व्यवस्था है। केरल में इसके लिए किसानों का पंजीयन किया जा रहा है। केरल की तर्ज पर सब्जियों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी लागू करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने प्रयास तेज कर दिए हैं। मध्य प्रदेश की 25 मंडियों में खुलेंगे पेट्रोल पम्प मीडिया में प्रकाशिति खबरों में किसान कल्याण तथा कृषि विकास मंत्री कमल पटेल ने बताया है कि प्रदेश की ए-श्रेणी की 25 मंडियों में पॉयलेट प्रोजेक्ट के रूप में पेट्रोल पम्प स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि मंडियों को स्मार्ट बनाने के अनुक्रम में पेट्रोल पम्प स्थापित किया जाना प्रस्तावित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने सहमति प्रदान कर दी है। कृषि मंत्री पटेल ने गत दिवस नई दिल्ली में केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री प्रधान से मुलाकात कर प्रदेश में मंडियों को उन्नत बनाने और किसानों को लाभान्वित करने की दिशा में प्रदेश सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि प्रदेश में 259 मंडियां संचालित की जा रही हैं। इनमें से 40 मंडियां ए-श्रेणी की हैं। यदि मंडियों में पेट्रोल पम्प भी स्थापित कर दिए जाएं, तो मंडियों को स्मार्ट बनाने में यह कदम कारगर सिद्ध होगा। इससे किसान भी सीधे लाभान्वित होंगे। मंत्री पटेल ने बताया कि केन्द्रीय मंत्री प्रधान ने प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति प्रदान करते हुए पॉयलेट प्रोजेक्ट के रूप में ए-श्रेणी की 25 मंडियोंं में पेट्रोल पम्प स्थापित किए जाने के निर्देश अधीनस्थ अधिकारियों को प्रदान कर दिए हैं। कृषि मंत्री पटेल ने केन्द्रीय मंत्री प्रधान का मध्यप्रदेश के किसानों की तरफ से आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा है कि पॉयलेट प्रोजेक्ट के पूरा होते ही प्रदेश की अधिकतम मंडियों में पेट्रोल पम्प स्थापित किए जाने की कार्य-योजना बनाकर उसे मूर्त रूप प्रदान किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

पाला : फसलों को शीतलहर व पाले से बचाएं, ये उपाय अपनाएं

पाला : फसलों को शीतलहर व पाले से बचाएं, ये उपाय अपनाएं

फसल की सुरक्षा : जानें, वे कौन-कौनसे उपाय है जो फसल को सर्द मौसम के प्रकोप से रखेंगे सुरक्षित सर्दी का मौसम चल रहा है और आने वाले समय में सर्दी का प्रकोप और बढऩे वाला है। मौसम वैज्ञानिकों ने इस बार लंबे समय तक सर्दी का असर होने के साथ ही इसके अधिक पडऩे की संभावना जताई है। इसका असर दिखने भी लगा है। दिन-प्रतिदिन तापमान में कमी आ रही है। सुबह और रात के तापमान में काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। विशेषकर उत्तरभारत में सर्दी का प्रकोप कुछ अधिक ही रहता है। इसका प्रभाव इंसानों के साथ ही फसलों पर भी पड़ता है। अधिक सर्दी से फसलों की उत्पादकता पर विपरित असर पड़ता है और परिणामस्वरूप कम उत्पादन प्राप्त होता है। इसलिए सर्दी के मौसम में फसलों को विशेष देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे फसलों को शीतलहर व पाले से बचाने के लिए अपने प्रयास तेज कर दें ताकि संभावित हानि से बचा जा सके। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 पाला : क्या है कारण जब वायुमंडल का तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस या फिर इससे नीचे चला जाता है तो हवा का प्रवाह बंद हो जाता है जिसकी वजह से पौधों की कोशिकाओं के अंदर और ऊपर मौजूद पानी जम जाता है और ठोस बर्फ की पतली परत बन जाती है। इसे ही पाला पडऩा कहते हैं। पाला पडऩे से पौधों की कोशिकाओं की दीवारें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और स्टोमेटा नष्ट हो जाता है। पाला पडऩे की वजह से कार्बन डाइआक्साइड, आक्सीजन और वाष्प की विनियम प्रक्रिया भी बाधित होती है। शीतलहर व पाले से फसलों को कैसे होता है नुकसान शीतलहर व पाले से फसलों व फलदार पेड़ों की उत्पादकता पर सीधा विपरित प्रभाव पड़ता है। फसलों में फूल और बालियां/फलियां आने या उनके विकसित होते समय पाला पडऩे की सबसे ज्यादा संभावनाएं रहती हैं। पाले के प्रभाव से पौधों की पत्तियां और फूल झुलसने लगते हैं। जिसकी वजह से फसल पर असर पड़ता है। कुछ फसलें बहुत ज्यादा तापमान या पाला झेल नहीं पाती हैं जिससे उनके खराब होने का खतरा बना रहता है। पाला पडऩे के दौरान अगर फसल की देखभाल नहीं की जाए तो उस पर आने वाले फल या फूल झड़ सकते हैं। जिसकी वजह से पत्तियों का रंग मिट्टी के रंग जैसा दिखता है। अगर शीतलहर हवा के रूप में चलती रहे तो उससे कोई नुकसान नहीं होता है, लेकिन हवा रूक जाए तो पाला पड़ता है जो फसलों के लिए ज्यादा नुकसानदायक होता है। पालेे की वजह से अधिकतर पौधों के फूलों के गिरने से पैदावार में कमी हो जाती है। पत्ते, टहनियां और तने के नष्ट होने से पौधों को अधिक बीमारियां लगने का खतरा रहता है। सब्जियों, पपीता, आम, अमरूद पर पाले का प्रभाव अधिक पड़ता है। टमाटर, मिर्च, बैंगन, पपीता, मटर, चना, अलसी, सरसों, जीरा, धनिया, सौंफ, अफीम आदि फसलों पर पाला पडऩे के दिन में ज्यादा नुकसान की आशंका रहती है। जबकि अरहर, गन्ना, गेहूं व जौ पर पाले का असर कम दिखाई देता है। शीत ऋतु वाले पौधे 2 डिग्री सेंटीग्रेट तक का तापमान सहन कर सकते हैं। इससे कम तापमान होने पर पौधे की बाहर और अंदर की कोशिकाओं में बर्फ जम जाती है। शीतलहर व पाले से फसल की सुरक्षा के उपाय / फसल की सुरक्षा के उपाय नर्सरी के पौधों एवं सब्जी वाली फसलों को टाट, पॉलिथीन अथवा भूसे से ढक देना चाहिए। वायुरोधी टाटियां को हवा आने वाली दिशा की तरफ से बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगाने से पाले और शीतलहर से फसलों को बचाया जा सकता है। पाला पडऩे की संभावना को देखते हुए जरूरत के हिसाब से खेत में सिंचाई करते रहना चाहिए। इससे मिट्टी का तापमान कम नहीं होता है। सरसों, गेहूं, चावल, आलू, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने के लिए गंधक के तेजाब का छिडक़ाव करने से रासायनिक सक्रियता बढ़ जाती है और पाले से बचाव के अलावा पौधे को लौह तत्व भी मिल जाता है। गंधक का तेजाब पौधों में रोगरोधिता बढ़ाने में और फसल को जल्दी पकाने में भी सहायक होता है। दीर्घकालीन उपाय के रूप में फसलों को बचाने के लिए खेत की मेड़ों पर वायु अवरोधक पेड़ जैसे शहतूत, शीशम, बबूल, खेजड़ी और जामुन आदि लगा देने चाहिए जिससे पाले और शीतलहर से फसल का बचाव होता है। थोयोयूरिया की 500 ग्राम 1000 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव कर सकते हैं, और 15 दिनों के बाद छिडक़ाव को दोहराना चाहिए। चूंकि सल्फर (गंधक) से पौधे में गर्मी बनती है अत: 8-10 किग्रा सल्फर डस्ट प्रति एकड़ के हिसाब से डाल सकते हैं। या घुलनशील सल्फर 600 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिडक़ाव करने से पाले के असर को कम किया जा सकता है। पाला पडऩे की संभावना वाले दिनों में मिट्टी की गुड़ाई या जुताई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से मिट्टी का तापमान कम हो जाता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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