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जीरे की खेती कैसे करें : जानें जीरे की किस्में और खेती का तरीका

जीरे की खेती कैसे करें : जानें जीरे की किस्में और खेती का तरीका

जीरे की बुवाई का उचित समय, इन किस्मों की करें बुवाई, होगी अच्छी पैदावार

मसाला फसलों में जीरे का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। कोई भी सब्जी बनानी हो या दाल या अन्य कोई डिश सभी में जीरे का प्रयोग किया जाता है। बिना इसके सारे मसालों का स्वाद फीका सा लगता है। जीरे को भूनकर छाछ, दही आदि में डालकर खाया जाता है। जीरा न केवल आपके स्वाद को बढ़ता है बल्कि स्वास्थ की दृष्टि से भी इसका सेवन काफी फायदेमंद है। इसका पौधा दिखने में सौंफ की तरह होता है। संस्कृत में इसे जीरक कहा जाता है, जिसका अर्थ है, अन्न के जीर्ण होने में (पचने में) सहायता करने वाला। यदि इसकी उन्नत तरीके से खेती की जाए तो इसका बेहतर उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। आइए जानते हैं जीरे की उन्नत खेती का तरीका और इस दौरान ध्यान रखने वाली बातों के बारें में ताकि किसान भाइयों को इसकी खेती से लाभ मिल सके।

 

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जीरे का वानस्पतिक नाम व पौधे की विशेषता

जीरा (वानस्पतिक नाम- क्यूमिनम सायमिनम) एपियेशी परिवार का एक पुष्पीय पौधा है। जीरा इसी नाम (जैविक नाम- क्युमिनम सायमिनम) के जैविक पौधे के बीज को कहा जाता है। यह पौधा पार्स्ले परिवार का सदस्य है। इसका पौधा 30-50 सेमी (0.98-1.64 फीट) की ऊंचाई तक बढ़ता है और इसके फ़लों को हाथ से ही तोड़ा जाता है। यह वार्षिक फसल वाला मुलायम एवं चिकनी त्वचा वाला हर्बेशियस पौधा है। इसके तने में कई शाखाएं होती हैं एवं पौधा 20-30 सेंमी ऊंचा होता है। प्रत्येक शाखा की 2-3 उपशाखाएं होती हैं एवं सभी शाखाएं समान ऊंचाई लेती हैं जिनसे ये छतरीनुमा आकार ले लेता है। इसका तना गहरे हरे रंग का सलेटी आभा लिए हुए होता है। इन पर 5-10 सेमी. की धागे जैसे आकार की मुलायम पत्तियां होती हैं। इनके आगे श्वेत या हल्के गुलाबी वर्ण के छोटे-छोटे पुष्प अम्बेल आकार के होते हैं। प्रत्येक अम्बेल में 5-7 अम्ब्लेट होती हैं।

 


भारत में कहां-कहां होता है जीरे का उत्पादन / जीरे की फसल

देश का 80 प्रतिशत से अधिक जीरा गुजरात व राजस्थान राज्य में उगाया जाता है। राजस्थान में देश के कुल उत्पादन का लगभग 28 प्रतिशत जीरे का उत्पादन किया जाता है तथा राज्य के पश्चिमी क्षेत्र में कुल राज्य का 80 प्रतिशत जीरा पैदा होता है लेकिन इसकी औसत उपज (380 कि.ग्रा.प्रति हे.) पडौसी राज्य गुजरात (550 कि.ग्रा.प्रति हेक्टेयर) के अपेक्षा काफी कम है।


जीरे में पाएं जाने वाले विटामिन व अन्य पोषक तत्व

जीरा एक बेहतरीन एंटी-ऑक्सिडेंट है और साथ ही यह सूजन को करने और मांसपेशियों को आराम पहुचांने में कारगर है। इसमें फाइबर भी पाया जाता है और यह आयरन, कॉपर, कैल्शियम, पोटैशियम, मैगनीज, जिंक व मैगनीशियम जैसे मिनरल्स का अच्छा सोर्स भी है। इसमें विटामिन ई, ए, सी और बी-कॉम्प्लैक्स जैसे विटामिन भी खासी मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए इसका उपयोग आयुर्वेद में स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम बताया गया है।


जीरे की उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं

  • आर जेड-19 : जीरे की यह किस्म 120-125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इससे 9-11 क्विंटल तक प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त होता है। इस किस्म में उखटा, छाछिया व झुलसा रोग कम लगता है।
  • आर जेड- 209 : यह भी किस्म 120-125 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसके दाने मोटे होते हैं। इस किस्म से 7-8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त होती है। इस किस्म में भी छाछिया व झुलसा रोग कम लगता है।
  • जी सी- 4 : जीरे की ये किस्म 105-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसके बीज बड़े आकार के होते हैं। इससे 7-9 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। यह किस्म उखटा रोग के प्रति संवेदशील है।
  • आर जेड- 223 : यह किस्म 110-115 दिन में पककर तैयार हो जाती है। जीरे की इस किस्म से 6-8 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। ये किस्म उखटा रोग के प्रति रोधक है। इसमें बीज में तेल की मात्रा 3.25 प्रतिशत होती है।


जीरे की खेती से पूर्व जानने वाली महत्वपूर्ण बातें

  • जीरे की खेती के लिए उपयुक्त समय नवंबर माह के मध्य का होता है। इस हिसाब से जीरे की बुवाई 1 से लेकर 25 नवंबर के बीच कर देनी चाहिए।
  • जीरे की बुवाई छिडक़ाव विधि से नहीं करते हुए कल्टीवेटर से 30 सेमी. के अंतराल में पंक्तियां बनाकर करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से जीरे की फसल में सिंचाई करने व खरपतवार निकालने में समस्या नहीं होती है।
  • जीरे की खेती के लिए शुष्क एवं साधारण ठंडी जलवायु सबसे उपयुक्त होती है। बीज पकने की अवस्था पर अपेक्षाकृत गर्म एवं शुष्क मौसम जीरे की अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक होता है।
  • जीरे की फसल के लिए वातावरण का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक व 10 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर जीरे के अंकुरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  • अधिक नमी के कारण फसल पर छाछ्या तथा झुलसा रोगों का प्रकोप होने के कारण अधिक वायुमण्डलीय नमी वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए अनुपयुक्त रहते हैं।
  • अधिक पालाग्रस्त क्षेत्रों में जीरे की फसल अच्छी नहीं होती है।
  • वैसे तो जीरे की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन रेतीली चिकनी बलुई या दोमट मिट्टी जिसमें कार्बनिक पदार्थो की अधिकता व उचित जल निकास हो, इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त होती है।
  • जीरे की सिंचाई में फव्वारा विधि का उपयोग सबसे अच्छा रहता है। इससे जीरे की फसल को आवश्यकतानुसार समान मात्रा में पानी पहुंचाता है।
  • दाना पकने के समय जीरे में सिंचाई नहीं करनी चाहिए ऐसा करने से बीज हल्का बनता है।
  • गत वर्ष जिस खेत में जीरे की बुवाई की गई हो, उस खेत में जीरा नहीं बोए अन्यथा रोगों का प्रकोप अधिक होगा।


जीरे की खेती का तरीका / जीरे की खेती कैसे करें?

जीरे की खेती के लिए सबसे पहले खेत की तैयारी करें। इसके लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई तथा देशी हल या हैरो से दो या तीन उथली जुताई करके पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। इसके बाद 5 से 8 फीट की क्यारी बनाएं। ध्यान रहे समान आकार की क्यारियां बनानी चाहिए जिससे बुवाई एवं सिंचाई करने में आसानी रहे। इसके बाद 2 किलो बीज प्रति बीघा के हिसाब से लेकर 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम नामक दवा से प्रति किलो बीज को उपचारित करके ही बुवाई करें। बुवाई हमेशा 30 सेमी दूरी से कतारों में करें। कतारों में बुवाई सीड ड्रिल से आसानी से की जा सकती है।


खाद व उर्वरक

बुवाई के 2 से 3 सप्ताह पहले गोबर खाद को भूमि में मिलाना लाभदायक रहता है। यदि खेत में कीटों की समस्या है, तो फसल की बुवाई के पहले इनके रोकथाम हेतु अन्तिम जुताई के समय क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत, 20 से 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में डालकर अच्छी तरह से मिला लेना लाभदायक रहता है। ध्यान रहे यदि खरीफ की फसल में 10-15 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डाली गयी हो तो जीरे की फसल के लिए अतिरिक्त खाद की आवश्यकता नहीं है। अन्यथा 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुताई से पहले गोबर की खाद खेत में बिखेर कर मिला देनी चाहिए। इसके अतिरिक्त जीरे की फसल को 30 किलो नत्रजन 20 किलो फॉस्फोरस एवं 15 किलो पोटाश उर्वरक प्रति हेक्टेयर की दर से दें। फॉस्फोरस पोटाश की पूरी मात्रा एवं आधी नत्रजन की मात्रा बुवाई के पूर्व आखिरी जुलाई के समय भूमि में मिला देनी चाहिए। शेष नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 30 से 35 दिन बाद सिंचाई के साथ दें।


कब-कब करें सिंचाई

जीरे की बुवाई के तुरन्त बाद एक हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। जीरे की बुवाई के 8 से 10 दिन बाद दूसरी एक हल्की सिंचाई दे जिससे जीरे का पूर्ण रूप से अंकुरण हो पाए। इसके बाद आवश्यकता हो तो 8-10 दिन बाद फिर हल्की सिंचाई की जा सकती है। इसके बाद 20 दिन के अंतराल पर दाना बनने तक तीन और सिंचाई करनी चाहिए। ध्यान रहे दाना पकने के समय जीरे में सिंचाई नहीं करनी चाहिए ऐसा करने से बीज हल्का बनता है।


खरपतवार नियंत्रण के उपाय

जीरे की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के बाद सिंचाई करने के दूसरे दिन पेडिंमिथेलीन खरतपतवार नाशक दवा 1.0 किलो सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिडक़ाव करना चाहिए। इसके 20 दिन बाद जब फसल 25 -30 दिन की हो जाये तो एक गुड़ाई कर देनी चाहिए।


फसल चक्र अपनाना है जरूरी

जीरे के बेहतर उत्पादन के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। इसके लिए यदि एक ही खेत में बार-बार जीरे की फसल नहीं बोनी चाहिए इससे उखटा रोग का अधिक प्रकोप होता है। इसके लिए उचित फसल चक्र अपनाना को अपनाना चाहिए। इसके लिए बाजरा-जीरा-मूंग-गेहूं -बाजरा- जीरा तीन वर्षीय फसल चक्र को अपनाया जा सकता है।


कब करें कटाई

जब बीज एवं पौधा भूरे रंग का हो जाएं तथा फसल पूरी पक जाए तो तुरंत इसकी कटाई कर लेनी चाहिए। पौधों को अच्छी प्रकार से सुखाकर थ्रेसर से मंढाई कर दाना अलग कर लेना चाहिए। दाने को अच्छे प्रकार से सुखाकर ही साफ बोरों में इसका भंडारण करना चाहिए।


प्राप्त उपज और लाभ

बात करें इससे प्राप्त उपज की तो जीरे की औसत उपज 7-8 क्विंटल बीज प्रति हेक्टयर प्राप्त हो जाती है। जीरे की खेती में लगभग 30 से 35 हजार रुपए प्रति हेक्टयर का खर्च आता है। जीरे के दाने का 100 रुपए प्रति किलो भाव रहना पर 40 से 45 हजार रुपए प्रति हेक्टयर का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

 

 

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काले गेहूं की खेती से किसान मालामाल

काले गेहूं की खेती से किसान मालामाल

जानें, कैसे की जाती है काले गेहूं की खेती (Black wheat farming ) और क्या रखनी होती हैं सावधानियां? किसानों का रूझान अब सामान्य गेहूं की तुलना में काले गेहूं के प्रति बढ़ता ही जा रहा है। इसके पीछे कारण यह है कि इस किस्म के गेहूं की बाजार मांग अधिक है और पिछले कुछ समय से इसका निर्यात भी काफी बढ़ा है। इससे किसानों का ध्यान अब काले गेहूं की खेती पर ज्यादा है। उत्तरप्रदेश में कई किसान काला गेहूं की खेती कर बंपर कमाई कर रहे हैं। कृषि अधिकारी मानते हैं कि ये गेहूं डायबिटीज वाले लोगों के लिए बहुत ही फायदेमंद है। मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के कई जिलों में धीरे-धीरे काला गेहूं की फसल की बुवाई का रकबा बढ़ रहा है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 काले गेहूं के औषधीय गुण इसमें पाए जाने वाला एंथ्रोसाइनीन एक नेचुरल एंटी ऑक्सीडेंट व एंटीबायोटिक है, जो हार्ट अटैक, कैंसर, शुगर, मानसिक तनाव, घुटनों का दर्द, एनीमिया जैसे रोगों में काफी कारगर सिद्ध होता है। काले गेहूं रंग व स्वाद में सामान्य गेहूं से थोड़ा अलग होते हैं, लेकिन बेहद पौष्टिक होते हैं। नाबी ने विकसित की काले गेहूं की नई किस्में सात बरसों के रिसर्च के बाद काले गेहूं की इस नई किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नॉलजी इंस्टीट्यूट या नाबी ने विकसित किया है। नाबी के पास इसका पेटेंट भी है। इस गेहूं की खास बात यह है कि इसका रंग काला है। इसकी बालियां भी आम गेहूं जैसी हरी होती हैं, पकने पर दानों का रंग काला हो जाता है। नाबी की साइंटिस्ट और काले गेहूं की प्रोजेक्ट हेड डॉ. मोनिका गर्ग के अनुसार नाबी ने काले के अलावा नीले और जामुनी रंग के गेहूं की किस्म भी विकसित की है। काले गेहूं की तरह काला चावल भी होता है काले गेहूं की तरह ही काला चावल भी होता है। इंडोनेशिअन ब्लैक राइस और थाई जैसमिन ब्लैक राइस इसकी दो जानीमानी वैरायटी हैं। म्यामांर और मणिपुर के बॉर्डर पर भी ब्लैक राइस या काला चावल उगाया जाता है। इसका नाम है चाक-हाओ। इसमें भी एंथोसाएनिन की मात्रा ज्यादा होती है। अच्छी पैदावार के लिए 30 नवंबर से पहले करें बुवाई कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा समय काला गेहूं खेती के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसकी खेती के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। किसान 30 नवंबर तक की इस गेहूं की बुवाई आसानी से कर सकते हैं। अगर इसकी बुवाई देर से की जाए, तो फसल की पैदावार में कमी आ जाती है। जैसे-जैसे बुवाई में देरी होती है, वैसे-वैसे गेहूं की पैदावार में गिरावट आ जाती है। काले गेहूं का बीज : काले गेहूं की खेती कैसे करें/बुवाई का तरीका गेहूं की बुवाई सीडड्रिल से करने पर उर्वरक एवं बीज की बचत की जा सकती है। काले गेहूं की उत्पादन सामान्य गेहूं की तरह ही होता है। किसान भाई बाजार से इसके बीज खरीद कर बुवाई कर सकते हैं। पंक्तियों में बुवाई करने पर सामान्य दशा में 100 किलोग्राम तथा मोटा दाना 125 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। वहीं छिटकाव विधि से बुवाई में सामान्य दाना 125 किलोग्राम, मोटा-दाना 150 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई से पहले जमाव प्रतिशत अवश्य देख ले। राजकीय अनुसंधान केन्द्रों पर यह सुविधा नि:शुल्क उपलबध है। यदि बीज अंकुरण क्षमता कम हो तो उसी के अनुसार बीज दर बढ़ा ले तथा यदि बीज प्रमाणित न हो तो उसका शोधन अवश्य करें। इसके लिए बीजों का कार्बाक्सिन, एजेटौवैक्टर व पी.एस.वी. से उपचारित कर बुवाई कर लेना चाहिए। सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में रेज्ड वेड विधि से बुवाई करने पर सामान्य दशा में 75 किलोग्राम तथा मोटा दाना 100 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। खाद व उर्वरक खेत की तैयारी के समय जिंक व यूरिया खेत में डालें तथा डीएपी खाद को ड्रिल से दें। बोते समय 50 किलो डीएपी, 45 किलो यूरिया, 20 किलो म्यूरेट पोटाश तथा 10 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़ देना चाहिए। वहीं पहली सिंचाई के समय 60 किलो यूरिया दें। सिंचाई काले गेहूं की फसल की पहली सिंचाई तीन हफ्ते बाद करें। इसके बाद फुटाव के समय, गांठें बनते समय, बालियां निकलने से पहले, दूधिया दशा में और दाना पकते समय सिंचाई अवश्य करें। खरपतवार नियंत्रण गेहूं के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार उग जाते हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो गेहूं की उपज में 10-40 प्रतिशत हानि पहुंचने की संभावना होती है। गेहूं के खेत में चौड़ी पत्ती वाले और घास कुल के खरपतावारों का प्रकोप होता है। कृष्णनील, बथुआ, हिरनखुरी, सैंजी, चटरी-मटरी, जंगली गाजर आदि खरपतवारों पर के नियंत्रण के लिए 2,4-डी इथाइल ईस्टर 36 प्रतिशत (ब्लाडेक्स सी, वीडान) की 1.4 किग्रा. मात्रा अथवा 2,4-डी लवण 80 प्रतिशत (फारनेक्सान, टाफाइसाड) की 0.625 किग्रा. मात्रा को 700-800 लीटर पानी मे घोलकर एक हेक्टर में बोनी के 25-30 दिन के अन्दर छिडक़ाव करना चाहिए। वहीं संकरी पत्ती वाले खरपतवारों में जंगली जई व गेहूंसा का प्रकोप अधिक देखा गया है। यदि इनका प्रकोप अधिक हो तब उस खेत में गेहूं न बोकर बरसीम या रिजका की फसल लेनी लेना फायदेमंद रहता है। इनके नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथेलिन 30 ईसी (स्टाम्प) 800-1000 ग्रा. प्रति हेक्टर अथवा आइसोप्रोटयूरॉन 50 डब्लू.पी. 1.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को बोआई के 2-3 दिन बाद 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव करना चाहिए। इकसे बाद खड़ी फसल में बोआई के 30-35 दिन बाद मेटाक्सुरान की 1.5 किग्रा. मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिडक़ाव करना चाहिए। मिश्रित खरपतवार की समस्या होने पर आइसोप्रोट्यूरान 800 ग्रा. और 2,4-डी 0.4 किग्रा. प्रति हे. को मिलाकर छिडक़ाव करना चाहिए। गेहूं व सरसों की मिश्रित खेती में खरपतवार नियंत्रणके लिए पेन्डीमिथालिन का छिडक़ाव किया जा सकता है। कटाई व प्राप्त उपज जब गेहूं के दाने पक कर सख्त हो जाएं और उनमें नमी का अंश 20-25 प्रतिशत तक आ जाए तब इसकी फसल की कटाई करनी चाहिए। बात करें इसकी प्राप्त उपज की तो इसकी 10 से 12 क्विंटल तक प्रति बीघे उपज प्राप्त की जा सकती है। कितनी हो सकती है कमाई काले गेहूं की मार्केट में 4,000 से 6,000 हजार रुपए प्रति क्विंटल की कीमत पर बिकता है, जो कि अन्य गेहूं की फसल से दोगुना है। इसी साल सरकार ने गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,975 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। इस हिसाब से देखें तो काला गेहूं की खेती से किसानों की कमाई तीन गुना तक बढ़ सकती है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

खुरपका-मुंहपका रोग : सरकार ने पशुओं के टीकाकरण पर लगाई रोक

खुरपका-मुंहपका रोग : सरकार ने पशुओं के टीकाकरण पर लगाई रोक

पशुओं का टीकाकरण रोका : जानें, क्या है कारण और किन राज्यों में लगाई गई हैं रोक सरकार ने पशुओं में होने वाले खुरपका-मुंहपका रोग के टीकाकरण पर रोक लगा दी है। अब पशुओं को इस रोग का टीका नहीं लगाया जाएगा। दरअसल इस रोग के टीकाकरण के प्रयोग में आने वाली वैक्सिन की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं होने के कारण केंद्र सरकार ने झारखंड सहित कोई आधा दर्जन राज्यों को इसका इस्तेमाल न करने की सलाह दी थी। केंद्र के निर्देश के बाद झारखंड राज्य सरकार ने जिला पशुपालन अधिकारियों को रोक का आदेश जारी कर दिया है। हैदराबाद की एक कंपनी ने दवा की आपूर्ति की थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की इकाई आरवीआरआइ से वैक्सिन की जांच कराई गई थी जिसमें गुणवत्ता मानक के अनुसार नहीं पाया गया था। बता दें कि बीते साल झारखंड के टंडवा व करीबी इलाके में इस रोग से अनेक जानवरों की मौत हो गई थी। केंद्र से समय पर निर्देश व दवा का इंतजाम नहीं होता है तो बीमारी फैलने पर पशुपालकों का बड़ा नुकसान हो सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किन राज्यों में लगाई पशुओं के टीकाकरण पर रोक / खुरपका-मुंहपका रोग का टीकाकरण झारखंड सहित जिन अन्य प्रदेशों में टीकाकरण पर रोक लगाई गई है वे हैं पंजाब, राजस्थान, असम, दमन व जम्मू कश्मीर। सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रदेश में करीब 30 लाख जानवरों का टीकाकरण किया जाना है। राज्य के 24 में 22 जिलों में टीकाकरण का काम प्रारंभ हो गया था। करीब 70 हजार जानवरों को टीके लगाये जा चुके थे इसी बीच रोक का आदेश आ गया है। कृषि एवं पशुपालन सचिव अबु बकर सिद्दीकी का कहना है कि केंद्र से पुन: निर्देश के अनुसार टीकाकरण का काम शुरू होगा। क्या है खुरपका-मुंहपका रोग खुरपका-मुंहपका रोग जिसे झारखंड की स्थानीय भाषा में खुरहा-चपका रोग भी कहते हैं, मूलत: दो खुर वाले गाय, भैंस, बैल, सांड, भेंड, बकरियों में होता है। ऐसे में इनका चलना और खड़े होना और खाना मुश्किल होता है। तेज बुखार होने के कारण जानवर खाना-पीना और जुगाली करना भी बंद कर देते हैं। बच्चों पर ज्यादा बुरा असर होता है। यह अति संक्रामक रोग है। वयस्क पशुओं की क्षमता कम कर देता है और इसके विषाणु लंबे समय तक जीवित रहते हैं। पशुओं में कैसे फैलता है ये रोग चिकित्सकों के अनुसार रोग अत्यन्त सूक्ष्म विषाणु से फैलता है। जिसमें ओ, ओ, ए, सी, एशिया-1, एशिया-2, एशिया-3, सैट-1, सैट-3 और इनकी 14 उप-किस्में मुख्य है। देश में यह रोग मुख्यत: ओ, ए, सी तथा एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा अपने पांव पसारता है। पशुओं में रोग फैलने का एक अन्य कारण नम-वातावरण, पशु की आंतरिक कमजोरी, पशुओं का स्थान बदलने क्षेत्र में रोग का प्रकोप भी इस बीमारी को फैलाने में सहायक हैं। खुरपका मुहंपका रोग ग्रसित पशु की कैसे करें देखभाल बीमारी हो जाने पर रोग ग्रस्त पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग करके रखें। बीमार पशुओं की देख-भाल करने वाले व्यक्ति भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहे। बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा दे। पशु बाड़े की समय-समय पर सफाई करें। इस बीमारी से मरे पशु के शव को खुला छोडक़र गाड़ दें ताकि वायरस ना फैले। टीका नहीं लग रहा तो कैसे कर सकते हैं रोग ग्रसित पशु का उपचार / खुरपका - मुंहपका रोग का इलाज जिन राज्यों में पशुओं के टीकाकरण पर रोक लगाई गई है वहां के पशुपालक चिकित्सक की सलाह लेकर उपचार करवा सकते हैं। चिकित्सकों के अनुसार मुंह खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते है। मुंह में बोरो-ग्लिसरीन तथा खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

जानें, क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग / बिना मिट्टी के खेती की तकनीक कोरोना संक्रमण के दौर में सरकार का सबसे अधिक ध्यान कृषि की ओर गया है। इस दौरान जहां सभी व्यवसाय ठप हो गए, वहीं कृषि व्यवसाय ने लोगों को काफी राहत पहुंचाई। किसान ने अन्नदाता बनकर देश के लोगों की खाद्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया। कोरोना संक्रमण के दौर में बंपर फसल का उत्पादन हुआ जो अन्य वर्षों की तुलना में काफी अधिक रहा। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक बजट का उपयोग कृषि क्षेत्र में करने का मन बनाया हुआ है। सरकार का फोकस कृषि पर होने से लोगों की रूचि भी खेतीबाड़ी के काम की ओर होने लगी है। इस दौरान खेती में कई नवाचार भी किए जा रहे हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बिना मिट्टी के खेती आज कई पढ़े-लिखे युवक खेती को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं जिसके उन्हें काफी सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। इसी कड़ी में हाल ही में उदयपुर के चार दोस्तों ने खेती में एक नवाचार किया है जो काफी सराहनीय है। मीडिया में प्रसारित जानकारी के अनुसार कोरोना काल में ट्यूरिज्म व्यवसाय ठप होने के बाद उदयपुर के इन चार दोस्तों दिव्य जैन, भूपेन्द्र जैन, रौनक और विक्रम ने खेती में नई तकनीक के साथ भाग्य आजमाया है। यह नई तकनीक इसलिए खास है जिसकी चर्चा चारों ओर हो रही है। दरअसल उदयपुर शहर के इन चारों दोस्तों ने बिना मिट्टी के खेती करने की शुरुआत की है जो काफी दिलचस्प होने के साथ आश्चर्यचकित करने वाली भी है। भला बिना मिट्टी के खेती कैसे हो सकती है। पर ऐसा संभव कर दिखाया है उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने। क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming at home) हाइड्रोपोनिक्स का मतलब होता है जलीय कृषि। यानि इस खेती में फसल पानी में उगाई जाती है और इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता। खेती की इस आधुनिक तकनीक में फसल पानी और उसके पोषण स्तर के जरिए बढ़ती है। भारत के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पानी की कमी रहती है लेकिन इस तकनीक से सामान्य तकनीक की अपेक्षा सिर्फ 10 प्रतिशत पानी की जरूरत पड़ती है, साथ ही मिट्टी की भी कोई जरूरत नहीं होती। बस सूर्य का प्रकाश फसल को मिलता रहना चाहिए। लेकिन जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती वहां कस्टमाइज्ड तरीके से रोशनी की व्यवस्था की जाती है। इन चारों दोस्तों ने इसी तकनीक को आधार बनाकर उदयपुर शहर से 12 किमी दूर दस हजार वर्गफीट की जमीन पर ऑटोमेटेड फार्म बैंक टू रूट्स तैयार की और बिना मिट्टी के खेती करने लगे। इसके माध्यम से ये ओक लेट्यूस, ब्रॉकली, पाक चाय, चैरी-टोमेटो, बेल पेपर और बेसिल की खेती कर रहे हैं। इन सब्जियों की सबसे ज्यादा मांग पांच सितारा होटल्स में होती है और पर्यटक इन्हें पसंद भी करते हैं। कैसे की जाती है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming) बिना मिट्टी के पानी से होने वाली इस फार्मिंग को करने के लिए उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने रिसर्च किया और फिर उदयपुर में पॉली हाउस बनाकर उसमें खेती शुरू कर दी। इस खेती में मिट्टी का कहीं भी उपयोग नहीं किया गया है। इसमें तापमान को स्थिर रखते हुए पौधों की जड़ तक पाइप से पानी पहुंचाया जाता है और उसी से पोषक सब्जियों की पैदावार होती है। हाइड्रोपोनिक खेती में बीज बोने से लेकर बढऩे तक की एक अलग प्रक्रिया होती है। ये पौधे छोटे प्लास्टिक के कप- ए आकार की फ्रेम में कतार में रखे जाते हैं। इससे पौधों की जड़ में जरूरत के अनुसार पानी चलता रहता है। इस पानी में न्यू्ट्रेंट सोल्यूशन मिलाए जाते हैं ताकि पौधों को जरूरी पोषक तत्व मिलते रहें। पॉली हाउस में तैयार किए जाने वाले इन पौधों को पानी के पाइप से पहुंचाया जाता है। पौधे पॉली हाउस में 27 से 30 डिग्री तक तापमान मेंटेन करके रखा जाता है। पेस्ट्रीसाइड्स का इस्तेमाल नहीं होने से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन / हाइड्रोपोनिक उर्वरक यह खेती इसलिए भी लोगों के लिए चर्चा का विषय बन चुकी है कि इस तकनीक से खेती में पेस्ट्रीसाइड्स का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल रहा है। इस फार्मिंग के सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं। इससे दो माह की अवधि के दौरान ऐसी फसल तैयार हो चुकी है। इस सब्जी से बनने वाली चीजें स्वादिष्ट होने के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद है, जिसे पांच सितारा होटल्स में नाश्ते और फास्ट फू्रड में सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गेहूं : पछेती किस्मों की बुवाई में अपनाएं ये तकनीक, होगा भरपूर मुनाफा

गेहूं : पछेती किस्मों की बुवाई में अपनाएं ये तकनीक, होगा भरपूर मुनाफा

गेहूं की खेती : जानें, कौनसी है ये तकनीक और इससे कैसे मिल सकता है बेहतर उत्पादन अधिकांशत: हमारे देश में गेहूं की पछेती किस्म की बुवाई 20 नबंवर के बाद से शुरू हो जाती है। पछेती किस्म की बुवाई का एक फायदा ये है कि ये किस्म जल्दी पककर तैयार हो जाती है। अगर किसान उन्नत तकनीक से पछेती किस्मों की बुवाई करें, तो ज्यादा पैदावार के साथ अच्छी आमदनी मिल सकती है। गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई मध्य नबंवर के बाद करना सही रहता है। यह किस्में कम समय में पकने वाली होती हैं, साथ ही गर्मी व तापमान को सहन करने की क्षमता भी इसमें अन्य किस्मों की तुलना में अधिक होती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 गेहूं की पछेती उन्नत किस्में व उनकी विशेषताएं एच.डी.-3059 (पूसा पछेती) : यह किस्म वर्ष 2013 में जारी की गई है। इस किस्म की उत्पादकता 39.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसे पकने में 157 दिन लगते हैं। इस किस्म के पौधें की ऊंचाई 93 सेमी. होती है। यह किस्म रस्ट अवरोधी होने के साथ ही अधिक तापमान सहन करने की क्षमता रखती है। इसमें उच्च प्रोटीन होने के कारण इसका उपयोग ब्रेड, बिस्किट, चपाती बनाने में किया जाता है। एच.डी.-2985 (पूसा बसन्त ) : यह किस्म वर्ष 2011 में जारी की गई है। इस किस्म की उत्पादकता 37.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म को पकने में 105-110 दिन का समय लगता है। यह किस्म लीफ रस्ट एवं फोलियर ब्लाइट अवरोधी है। इस किस्म का उपयोग बिस्किट एवं चपाती बनाने में किया जाता है। पी.बी.डब्लू.-590 : यह किस्म 2009 में जारी की गई है। यह किस्म दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के लिए उपयुक्त पाई गई है। इसकी उत्पादन क्षमता 42.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म को पकने में 121 दिन का समय लगता है। यह किस्म ताप सहिष्णु, लीफ रस्ट अवरोधी है। इस किस्म में उच्च प्रोटीन होने से इसका उपयोग चपाती बनाने के लिए किया जाता है। डी.बी.डब्लू.-173 : यह किस्म वर्ष 2018 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 47.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके पकने की अवधि 122 दिन है। यह किस्म पीला एवं भूरा रस्ट अवरोधी है। यह किस्म ताप सहिष्णु है। इसमें प्रोटीन एवं आयरन में अधिकता है। इसमें बायो- फोर्टीफाईड प्रजाति-प्रोटीन 125 प्रतिशत, आयरन 40.7 पीपीएम होता है। डी.बी.डब्लू.-90 : यह किस्म वर्ष 2014 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 42.80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म 121 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसके पौधें की ऊंचाई - 76 से 105 सेमी तक होती है। यह स्ट्रिप एवं लीफ रस्ट अवरोधी है और उच्च तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। डब्लू.एच. 1124 : यह किस्म वर्ष 2015 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 42.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसके पकने की अवधि 123 दिन की है। यह पीला एवं भूरा रस्ट रोग के प्रति अवरोधी है। यह भी उच्च तापमान को सहन कर सकती है। डब्लूएच 1021 : यह किस्म भी देरी से बुवाई के लिए अच्छी मानी जाती है। इस किस्म से 39.1 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। ये भी अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। राज 3765 : यह किस्म 1996 जारी की गई है। इस किस्म के पौधे 85-95 सेंटीमीटर ऊंची अधिक फुटान वाली, रोली रोधक किस्म है। तना मजबूत होने के कारण यह आड़ी नहीं गिरती है। इसकी पत्तियां हरे रंग की होती हैं। पत्तियों पर सफेद पाउडर नहीं होता है। यह किस्म सामान्य बुवाई, सिंचाई व पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। सामान्य बुवाई में इसके पकने का समय 120 से 125 दिन है, जबकि पिछेती बुवाई में यह किस्म 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है। दाने शरबती चमकीले आभा लिए सख्त व बड़े आकार के होते हैं। यह किस्म पिछेती बुवाई में औसतन 38 से 42 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज दे सकती है। गेहूं की पछेती किस्म की बुवाई का समय गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई 20 नवंबर से लेकर 25 दिसंबर तक की जा सकती है। 15 दिसंबर तक बुवाई कर लेने पर पैदावार ज्यादा मिलती है। हर हाल में पछेती किस्म की बुवाई 25 दिसंबर तक पूरी कर लेनी चाहिए। इसके बाद बुवाई करने पर उत्पादन में कमी आ जाती है। पछेती किस्म की बुवाई के लिए बीज की मात्रा पछेती किस्म की बुवाई के लिए 55 से 60 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए। सबसे पहले पछेती किस्मों की बुवाई के लिए बीज को करीब 12 घंटे पानी में भिगोकर रखना चाहिए। इससे बीज का जल्दी व ज्यादा जमाव होता है। इसके बाद बीज को पानी से निकाल कर उसे दो घंटे फर्श पर छाया में सुखाना चाहिए। पछेती किस्मों का बीजोपचार पछेती किस्मों की बुवाई से पहले बीजों उपचारित करना बेहद जरूरी है। दीमक से बचाव के लिए 150 मिली क्लोरोपाइरीफोस 20 फीसद का साढ़े चार लीटर पानी में घोल बनाकर एक कुंतल बीज को उपचारित करें। अगले दिन कंडुआ व करनाल बंट रोग से बचाव के लिए एक ग्राम रेक्सिल फफूंदनाशक दवा प्रति किलो बीज की दर से सूखा उपचार करें। अंत में बिजाई से थोड़ा पहले जीवाणु खाद एजोटोवेक्टर तथा फोसफोटीका से उपचारित कर लेना चाहिए। गेहूं की पछेती फसल कैसे करें/पछेती किस्मों की बुवाई का तरीका बीज को उपचारित करने के बाद बीज की बुवाई उर्वरक ड्रिल से करें और पछेती बुवाई में खूड़ से खूड़ की दूरी करीब 20 सेंटीमीटर की जगह करीब 18 सेंटीमीटर रखें। किसान जीरो सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल से भी बुवाई कर सकते हैं। खाद्य व उर्वरक विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को बुवाई से पहले गली सड़ी गोबर की खाद प्रति एकड़ डालना चाहिए। अगर 6 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट प्रति एकड़ खेत में डालें, तो फास्फोरस खाद की मात्रा आधी कर दें। इसके साथ ही बुवाई के समय 50 किलोग्राम डीएपी या 75 किलोग्राम एनपीके 12:32:16 तथा 45 किलोग्राम यूरिया व 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत डाल दें। ध्यान दें कि एनपीके या डीएपी उर्वरकों को ड्रिल से दें। इसके अलावा जिंक और यूरिया को आखिरी जुताई के दौरान डालें। वहीं पहली सिंचाई पर 60 से 65 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डालना चाहिए। अगर रेतीली भूमि है, तो यूरिया दो बार पहली और दूसरी सिंचाई पर डालना चाहिए। पीला रतवा रोग से बचाव के लिए ये करें गेहूं में पीला रतवा रोग का प्रकोप अधिक रहता है। इसकी रोकथाम के लिए करीब 200 मिलीलीटर प्रापिकानाजोल 25 ईसी दवा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छडक़ देना चाहिए। अगर इस तकनीक से गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई की जाए तो फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कब-कब करें सिंचाई गेहूं की पहली सिंचाई 3 सप्ताह की जगह 4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। इसके बाद की सिंचाई मध्य फरवरी तथा 25 से 30 दिनों के बाद करनी चाहिए। फिर 20 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। वहीं फुटाव के समय, गांठें बनते समय, बालियां निकलने से पहले, दूधिया दशा में और दाना पकते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई व खरपतवार नाशक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। कनकी, मंडूसी व जंगली जई खरपतवार की रोकथाम के लिए क्लोडिनाफाप 15 प्रतिशत 160 ग्राम प्रति एकड़ बुवाई के 30 से 35 दिन बाद 250 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ना चाहिए। दीमक से बचाव के लिए बुवाई से एक दिन पहले 150 मिली क्लोरोपायरीफोस 20 ईसी दवा को 5 लीटर पानी में घोलकर बनाएं और इसे 100 किलो बीज के ऊपर छिडक़ दें। जंगली मटर, बथुआ, हिरनखुरी आदि की रोकथाम के लिए 500 ग्राम 2,4 डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत को 250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ बिजाई के 30-35 दिन बाद छिडक़ाव करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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