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कोरोना लॉकडाउन से देशभर में रुकी फसलों की सरकारी खरीद ?

कोरोना लॉकडाउन से देशभर में रुकी फसलों की सरकारी खरीद ?

27 March, 2020

जानिए कोविड-19 से फसलों के नुकसान का मुआवजा मिलेगा या नहीं

कोरोना वायरस (कोविड-19) की दहशत कम होती नहीं दिख रही है। 27 मार्च 2020 गुरुवार दोपहर तक भारत में 17 लोगों की मौत हो चुकी थी। वहीं 724 लोग संक्रमित है। इसके अलावा विश्व के अन्य देशों में हालात और भी भयावह है। विश्व के अन्य देशों में 24 हजार 57  लोगों की मौत हो चुकी है और सक्रमण के 5 लाख 31 हजार 860 मामले हैं। देश में कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए 14 अप्रैल तक 21 दिन का लॉकडाउन पीरियर चल रहा है। ऐसे में समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद बंद कर दी गई। किसानों की फसल खेत में खड़ी है और किसान उसे काटने की तैयारी कर रहा है। ट्रैक्टर जंक्शन इस पोस्ट के माध्यम से किसानों के हर सवाल का जवाब दे रहा है जो उनके मन में है।

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप -http://bit.ly/TJN50K1

 

समर्थन मूल्य पर खरीद प्रक्रिया बंद 

केंद्र सरकार ने इस वर्ष गेहूं का उत्पादन 105 मिलियन टन होने की संभावना व्यक्त की है। कोरोना लॉकडाउन की वजह से फसलों को काटने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। मजदूर खेत में जाने से डर रहे हैं। दूसरी तरफ बेमौसम बरसात का सिलसिला भी देश के उत्तरी राज्यों में जारी है जिससे किसानों को फसलों में नुकसान होने की संभावना है। देशभर में लॉक डाउन के कारण कृषि मशीनें भी एक राज्य से दूसरे राज्य नहीं जा पा रही है।

 

 

कोरोना (कोविड-19) से फसल नुकसान का मुआवजा : मिलेगा या नहीं

देशभर में लॉकडाउन के कारण ट्रांसपोर्टेशन के वाहन भी बंद है। देशवासियों से अपने-अपने घरों में रहने की अपील की गई है। जनजीवन थम गया है। लॉकडाउन का कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब देशभर के खेतों में फसलों की कटाई अंतिम चरण में चल रही है और किसानों को इसे जल्दी से जल्दी बेचना चाहते हैं। केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत मानव निर्मित जोखिम को शामिल नहीं किया गया है, जिससे देश का कोई भी किसान यह दावा नहीं कर सकता है कि कोरोना वायरस (कोविड-19) के कारण हुए नुकसान का बीमा किया जाएगा। यदि खेत में पड़ी फसल का नुकसान बारिश या ओले से होता है तो यह प्राकृतिक आपदा है। फसल कटाई के बाद खेत में सूखने के लिए छोड़ी गई फसल की क्षति होने पर भी किसानों को बीमा का लाभ दिया जाता है। किसानों को कोविड-19 जैसी महामारी से नुकसान की भरपाई के देश में फिलहाल कोई योजना नहीं है। सरकार अन्य योजनाओं के माध्यम से किसानों को फायदा पहुंचा रही है। अब किसानों की भरपाई बस सरकार के राहत पैकेज से ही हो सकती है।

 

यह भी पढ़ें : 8.69 करोड़ किसानों को अप्रैल के पहले सप्ताह में मिलेंगे 2 हजार रुपए

 

समर्थन मूल्य पर कब शुरू होगी सरकारी खरीद

देश में लॉकडाउन की घोषणा से पहले देश के कई राज्यों में एक अप्रैल व 15 अप्रैल से रबी फसलों की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद शुरू होनी थी। लेकिन लॉकडाउन के बाद हालत उलट हो गए हैं। अब फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीद कब शुरू होगी यह देश में लॉकडाउन हटने की तिथि 15 अप्रैल के बाद ही पता चलेगा। फसलों की संभावित खरीद से पहले ही पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान ने अपने राज्यों में गेहूं की खरीद अनिश्चित समय के लिए स्थगित कर दी है। लॉक डाउन के कारण मंडियां भी बंद है। ऐसे में किसानों के पास बाजार में भी बेचने का विकल्प उपलब्ध नहीं है।

ट्रैक्टर जंक्शन सभी किसान भाइयों को सलाह देना चाहता है कि किसान भाई परिवार के सहयोग से खेत में खड़ी फसलों को काटकर अपने घर व गोदामों में रखे। लॉक डाउन हटने के बाद फिर से सरकारी खरीद शुरू होगी और मंडियां भी खुल जाएंगी। इसके अलावा कई राज्यों में अभी तक समर्थन मूल्य पर पंजीकरण की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है। पंजीकरण के बाद ही किसान अपनी फसल समर्थन मूल्य पर बेच सकते हैं। 

किसान कैसे करें फसलों का सुरक्षित भंडारण

देशभर के किसान फसलों की कटाई में जुटे हैं। अब उनके सामने फसलों को बेचने की समस्या है। लेकिन लॉकडाउन के कारण 15 अप्रैल से पहले फसलों को बेचना लगभग असंभव है। अत: जिन किसानों ने अपनी फसल काट ली है वह भंडारण की व्यवस्था सुनिश्चित कर लें। 

  • भंडार में अन्न रखने से पहले मालाथियान 50 ई.सी. एक भाग एवं 300 भाग पानी में घोलकर अच्छी तरह से भंडार में छिडक़ाव करें।
  • बीज से लिए रखी अन्न की बोरियों पर भी मालाथियान धूल का भुरकाव कर दें।
  • अगर अन्न में कीड़ लगने शुरू हो जाए तो उसे शीघ्र बेच दें।
  • कीड़े लगने की दशा में प्रधुमन भी कर सकते हैं। इसके लिए वायुरोधी बर्तन में ई.डी.बी. 3 मिली प्रति क्विंटलन की दर से काम में लाएं।
  • देशी तरीके से भंडारण करने के लिए एक सौ किलोग्राम अनाज में 5 किलोग्राम सूखी नीम या सदाबहार या कनेर की पत्तियां अच्छी तरह से मिलाकर रखने से कीटों का बचाव होता है।

 

सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।
 

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सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

जानिएं त्योहारी मांग के कारण सरसों सहित अन्य तिलहनों में आई कितनी तेजी सरसों में तेजी रोजाना नए रिकॉर्ड बना रही है। पिछले साल 2019 में 25 अक्टूबर के आसपास सरसों के भाव 4500 रुपए प्रति क्विंटल था। इस बार अक्टूबर 2020 में सरसों के भाव जयपुर मंडी में 6000-6100 के आसपास चल रहे हैं। आगरा की कई बड़ी तेल कंपनियों द्वारा सरसों 6500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से खरीदने के समाचार भी हैं। सरसों के अलावा अन्य तिलहनों में भी तेजी बनी हुई। त्योहारी मांग के कारण सरसों का तेल 120 से 130 रुपए किलो बिक रहा है। अन्य तेलों के भावों में भी तेजी है। सरसों की नई फसल आने में अभी 5-6 महीने का समय है। इस बार सरसों उत्पादक क्षेत्रों में बारिश भी कम हुई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सरसों का स्टॉक कम है इसलिए भविष्य में सरसों में मंदी की संभावना कम है। सरसों सहित अन्य तिलहनों के भावों में कमी सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सरसों के भाव त्योहारी मौसम में विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सरसों की मांग वृद्धि होने से भी सरसों दाना सहित इसके तेल-तिलहन कीमतों में सुधार आया। जम्मू-कश्मीर में सरसों दाना (तिलहन फसल) की मांग में काफी वृद्धि हुई है, जहां की मंडियों में हरियाणा से खरीदी गई सरसों 6250 रुपये क्विन्टल के भाव से बिक रही है। जयपुर की हाजिर मंडी में सरसों दाना का हाजिर भाव बढक़र 6000-6100 रुपए क्विंटल हो गया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार नफैड को अब सोच-समझ के साथ सीमित मात्रा में सरसों की बिकवाली करनी होगी, क्योंकि अगली पैदावार आने में अभी पांच-छह महीने का समय है और त्योहारों के साथ साथ सर्दियों की मांग और भी बढऩे वाली है। मूंगफली का भाव त्योहारी मांग के कारण तेल-तिलहन बाजार में तेजी बनी हुई है और भविष्य में भी तेजी की धारणा है। विदेशी बाजारों में मूंगफली दाना के साथ-साथ मूंगफली तेलों की भारी मांग ने भावों में तेजी को बल दिया है। नंबर एक गुणवत्ता वाले मूंगफली दाने की निर्यात मांग में भारी तेजी के कारण मूंगफली तेल-तिलहन कीमतों में तेजी बनी है। मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत व चीन में होता है। नंबर वन मूंगफली दाने की कीमत 70 रुपए किलो तक पहुंच गई है। सबसे सस्ते तेल सोयाबीन में तेजी / सोयाबीन का भाव हल्के तेलों में शामिल सोयाबीन इस समय सबसे सस्ता है। इस साल सोयाबीन की खपत में पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। सूरजमुखी फसल के कम उत्पादन होने, सरसों जैसे हल्के तेल में 'ब्लेंडिंग' (सम्मिश्रण) की मांग बढऩे तथा उत्तर भारत के मौसम की वजह से सोयाबीन तेल मांग के बढऩे से इसके तेल कीमतों में तेजी आई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त में कम बारिश के कारण मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल और इसकी उपज प्रभावित हुई है। वहीं महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण इसकी फसल प्रभावित हुई है, जिससे सोयाबीन किसानों की हालत पतली है और उनके लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। त्योहारी मांग होने और फसल को पहुंचे नुकसान से समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान सोयाबीन दाना और लूज की कीमतें 105-105 रुपये सुधरकर 4300-4325 रुपये और 4170-4200 रुपये प्रति क्विन्टल के आसपास चल रही हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब कृषि विभाग वाट्सएप पर देगा किसानों को खेती की जानकारी

अब कृषि विभाग वाट्सएप पर देगा किसानों को खेती की जानकारी

राजस्थान सरकार की नई पहल : अब तक 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है ग्रुप में राजस्थान सरकार ने किसानों को सरकारी योजनाओं सहित खेती- बाड़ी की जानकारी पहुंचाने के लिए अब सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का सहारा लिया है। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार अब प्रदेश सरकार सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का उपयोग खेती में करना चाह रही है। इसके लिए सरकार की ओर से कृषि अधिकारियों को निर्देश भी दिए जा चुके है। इस निर्देश के बाद प्रदेश के कृषि विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत खेती-बाड़ी की जानकारी देने के लिए प्रदेशभर में किसानों के करीब पांच हजार वॉट्सएप गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनसे करीब पांच लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। अगर सरकार की ये योजना रंग लाई तो प्रदेश के किसानों को कृषि से जुड़ी जानकरियां उनको घर बैठे-बैठे आसानी से मिलेंगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसानों को मिलेंगी ये जानकारियां मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार कृषि मंत्री लालचंद कटारिया के मुताबिक प्रदेश के किसानों को अब विभागीय योजनाओं की जानकारी के साथ ही खेती के उन्नत तरीकों और नवाचारों की जानकारी वॉट्सएप गु्रप के जरिए मिलेगी। इन गु्रप पर कृषि पर्यवेक्षक सफलता की कहानियां और खेती से जुड़ी डॉक्युमेंट्री समेत विभागीय सूचनाएं साझा करेंगे। यह प्रयोग फसल में रोग और टिड्डी प्रकोप जैसी समस्याओं से निपटने में भी मदद करेगा। कृषि पर्यवेक्षकों दिए गए थे 250-250 किसानों को जोडऩे के निर्देश प्रदेश में कार्यरत सभी कृषि पर्यवेक्षकों को वॉट्सएप गु्रप बनाकर अपने-अपने क्षेत्र के 250-250 किसानों को इससे जोडऩे के निर्देश कृषि विभाग द्वारा दिए गए थे। बता दें कि प्रदेश में करीब साढ़े 5 हजार कृषि पर्यवेक्षक कार्यरत हैं और इनके द्वारा अब तक 4 हजार 786 गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनके जरिये लगभग 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। जयपुर जिले में सबसे ज्यादा 53 हजार किसानों को व्हाट्सएप गु्रप से जोड़ा गया है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो विभाग को अपनी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने में काफी आसानी हो जाएगी और किसानों तक विभाग की पहुंच भी आसान हो होगी। क्या कहते हैं अधिकारी कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आजकल काफी बड़ी संख्या में किसान स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं। वे अब पंरपरागत खेती की बजाय आधुनिक तकनीक का अपनाने में भी खासा रुझान दिखा रहे हैं। खेती की जानकारी साझा करने में किसान भी सोशल मीडिया का फायदा उठाने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। इधर 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी के लिए मोबाइल ऐप्लीकेशन लांन्च केंद्रीय जल शक्ति एवं सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किए जाने वाले कामों की जानकारी प्राप्त करने कि लिए एक मोबाइल ऐप्लीकेशन लांच किया है। यह ऐप्लीकेशन परियोजनाओं की जियो टैगिंग करेगा। जिससे परियोजनाओं की निगरानी करने और उनकी प्रगति तथा उनके विकास में आने वाली बाधाओं का पता लगाया जा सकेंगा। इस एप्लीकेशन का विकास भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीच्यूट आफ स्पेस ऐप्लीकेशंस एंड जियो-इंफार्मेटिक्स (बीआईएसएजी-एन) की सहायता से किया है। इससे 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी की जाएगी। राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने मीडिया को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों के लाभ हेतु कृषि सिंचाई परियोजना की शुरुआत की थी। जिसमें 99 परियोजनाओं की शुरुआत की गई थी। जो कि देश में 34.64 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमी की सिंचाई करने में सहायक होगी। वहीं इन परियोजनाओं में से अभी तक 44 सिंचाई परियोजनाओं का काम पूरा किया जा चुका है। जिससे देश की 21.33 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि की सिंचाई की जा रही है। मोबाइल एप्लीकेशन से इन सभी परियोजनाओं की सतत निगरानी आसानी से की जा सकेगी। किसानों को होगा फायदा इस एप्लीकेशन का उपयोग स्थान, नहर के प्रकार/संरचना, पूर्णता स्थिति आदि जैसे अन्य विवरणों के साथ परियोजना घटक की छवि लेने के लिए निगरानी टीम/परियोजना प्राधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। इसके द्वारा एकत्रित की गई सूचना को जीआईएस पोर्टल पर प्रदर्शित करके किसानों को लाभ पहुंचाया जाएगा। मोबाइल ऐप्लीकेशन को क्षेत्र में उपलब्ध नेटवर्क को देखते हुए आनलाइन एवं आफलाइन दोनों ही तरीके से आपरेट किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

पीली सरसों की खेती : इन किस्मों की करें बुवाई, होगा भरपूर लाभ

पीली सरसों की खेती : इन किस्मों की करें बुवाई, होगा भरपूर लाभ

जानें, रबी के सीजन में कैसे करें पीली सरसों की खेती ( Yellow mustard cultivation ) और क्या रखें सावधानियां पीली सरसों की खेती खरीफ के अलावा रबी के सीजन में भी की जा सकती है। वैसे तो पीली सरसों तोरिया की तरह कैच क्राप के रूप में खरीफ एवं रबी के मध्य में बोयी जाती है। इस तरह ये खरीफ व रबी दोनों की फसल मानी जाती है। किसान पीली सरसों की उन्नत किस्मों का चुनाव करने के साथ ही कुछ सावधानियां रखें तो इसकी फसल अच्छा लाभ लिया जा सकता है। आइए जानते हैं इस फसल की उन उन्नत किस्मों के बारें में जो अधिक पैदावार देने के साथ ही मुनाफा भी देती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 पीली सरसों की प्रमुख उन्नत किस्में पीताम्बरी : यह किस्म 2009 में विकसित की गई. जो 110 से 115 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 18 से 20 क्विंटल की पैदावार होती है। इस किस्म में तेल की मात्रा 42 से 43 प्रतिशत होती है। नरेन्द्र सरसों-2 : सरसों की यह 1996 में विकसित की गई. जो 125 से 130 दिनों में पक जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 16 से 20 क्विंटल की पैदावार होती है। इसमं 44 से 45 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। के 88 : यह किस्म 1978 में विकसित की गई. जो 125 से 130 दिनों में पक जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 16 से 18 क्विंटल की पैदावार होती है. इस किस्म में 42 से 43 प्रतिशत तेल होता है। पीली सरसों की खेती करते समय इन बातों का रखें ध्यान पीली सरसों की खेती के लिए खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए तथा इसके बाद 2-3 जुताइयां देशी हल, कल्टीवेटर/हैरों से करके पाटा देकर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। बीज जनित रोगों से सुरक्षा के लिए उपचारित एवं प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए। उर्वरक का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के बाद करना चाहिए। इसलिए किसान संभव हो तो अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण करा लेना चाहिए ताकि मिट्टी में पोषक तत्व की कमी का पता चल सके जिससे उसमें सुधार किया जा सके। पीली सरसों की बुवाई देशी हल से करना करनी चाहिए। इससे बीज अच्छी तरह मिट्टी में जम जाता है। फूल निकलने से पूर्व की अवस्था में इसकी सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। इससे अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। इसकी खेती के दौरान यदि खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग न किया गया हो तो खुरपी से निराई कर खरपतवारों का नियंत्रण करना चाहिए। पीली सरसों की बुवाई का तरीका पीली सरसों की खेती की रबी की फसल के लिए उपयुक्त समय सितंबर से शुरू हो जाता है। पीली सरसों की बुवाई के लिए प्रति हैक्टेयर 4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। बीजों को 2.5 ग्राम थीरम प्रति किग्रा. बीज की दर से बीज को उपचारित करके ही बोएं। यदि थीरम उपलब्ध न हो तो मैकोजेब 3 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित किया जा सकता है। मैटालेक्सिल 1.5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधन करके पर प्रारंभिक अवस्था में सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग की रोकथाम हो जाती है। बीज उपचारित करने के बाद देशी हल से 30 सेमी. की दूरी पर 3 से 4 सेमी की गहराई पर कतारों में इसकी बुवाई करनी चाहिए एवं पाटा लगाकर बीज को ढक देना चाहिए। खाद एवं उर्वरक की मात्रा उर्वरक का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के बाद करना चाहिए। यदि मिट्टी परीक्षण न हो सके तो असिंचित दशा में 40 किग्रा. नाइट्रोजन, 30 किग्रा. फास्फेट तथा 30 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में 80 किग्रा. नाइट्रोजन 40 किग्रा. फास्फेट एवं 40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। फास्फेट का प्रयोग एस.एस.पी. के रूप में अधिक लाभदायक होता है। क्योंकि इससे 12 प्रतिशत गंधक की पूर्ति हो जाती है। फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा अंतिम जुताई के समय नाई या चोगे द्वारा बीज से 2-3 सेमी. नीचे प्रयोग करनी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई टापड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए। गंधक की पूर्ति हेतु 200 किग्रा. जिप्सम का प्रयोग अवश्य करे तथा 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। कब शुरू करें निराई-गुड़ाई कार्य घने पौधो को बुआई के 12 से 15 दिन के अन्दर निकालकर पौधों की आपसी दूरी 10-15 सेमी कर देना चाहिए तथा खरपतवार नष्ट करने के लिए एक निराई गुड़ाई भी साथ कर देनी चाहिए तथा पेन्डीमेथलीन 30 ई.सी. का 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के बाद तथा जमाव से पहले छिडक़ाव करना चाहिए। किन अवस्थाओं में करें सिंचाई राई/सरसों की भांति फूल निकलने से पूर्व की अवस्था पर जल की कमी के प्रति पीली सरसो संवेदनशील है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए इस अवस्था पर सिंचाई करना आवश्यक है। इसके अलावा आवश्यकतानुसार सिंचाई की जा सकती है। खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था रखें ताकि खेत में पानी नहीं भर पाए। कीट प्रबंधन के लिए करें ये उपाय पीली सरसों की फसल में कीटों पर प्रबंधन भी जरूरी है। इसके लिए गर्मी में गहरी जुताई करनी चाहिए। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। आरा मक्खी का प्रकोप हो तो आरा मक्खी की सूडियों को सुबह काल इक्ट्टा कर नष्ट कर देना चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में झुण्ड में पाई जाने वाली बालदार सूडियों को पकडक़र नष्ट कर देना चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में माहूँ से प्रभावित फूलों, फलियों एवं शाखाओं को मोडक़र माहूँ सहित नष्ट कर देना चाहिए। यदि कीट का प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पार कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशों का प्रयोग करना चाहिए। आरा मक्खी एवं बालदार पड़ी के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 5 प्रतिशत डी.पी. की 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बुरकाव अथवा मैलाथियान 50 प्रतिशत ई.सी. की 1.50 लीटर अथवा डाईक्लोरोवास 76 प्रतिशत ई.सी. की 500 मिली. मात्रा अथवा क्युनालफास 25 प्रतिशत ई.सी की 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करना चाहिए। माहूँ चित्रित बग, एवं पत्ती सुंरगक कीट के नियंत्रण हेतु डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. अथवा मिथाइल-ओ-डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा क्लोरोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. की 1.0 लीटर अथवा मोनोकोटोफास 36 प्रतिशत एस.एल. की 500 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करना चाहिए। एजाडिरेक्टिन (नीम आयल) 0.15 प्रतिशत ई.सी. 2.5 ली. प्रति हेक्टेयर की दर से भी प्रयोग किया जा सकता है। कब करें कटाई जब फलियां 75 प्रतिशत सुनहरे रंग की हो जाय तो फसल को काटकर सूखा लेना चाहिए बाद मड़ाई करके बीज को अलग कर लें। देर से कटाई करने से बीजों के झडऩे की आशंका बनी रहती है बीज को अच्छी तरह सुखा कर ही भंडारण करें, जिससे इसका कुप्रभाव दानों पर न पड़े। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

जैविक खेती की ओर बढ़ते कदम : गोबर से खाद बनाने की मशीन से अच्छी कमाई

जैविक खेती की ओर बढ़ते कदम : गोबर से खाद बनाने की मशीन से अच्छी कमाई

जानें, कैसे बनता है इस मशीन से गोबर खाद, क्या है इसकी उपयोगिता सरकार जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए काफी प्रयास कर रही है। इसका प्रमुख कारण है कि लगातार यूरिया सहित अन्य कीटनाशकों के प्रयोग से भूमि की उर्वरक क्षमता कम होती जा रही है और खेत बंजर होते जा रहे हैं जिससे खेती योज्य भूमि का क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। इस समस्या को लेकर सरकार ये प्रयास कर रही है कि किसानों की रूचि जैविक खेती की ओर बढ़े जिससे प्राकृतिक तरीके से खेती कर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन को बढ़ाया जा सके। जैविक खेती के लिए सरकार से भी मदद मिलती है। हाल ही बिजनौर के एक किसान ने अपने स्तर पर जैविक खेती की शुरुआत भी कर दी है। इस किसान ने ऐसी मशीन लगाई है जो कुछ ही समय में गोबर को खाद में बदल देती है। मीडिया में प्रकाशित जानकारी के अनुसार बिजनौर के सिकंदरी गांव के रहने वाले किसान राजीव सिंह ने गोबर से खाद बनाने वाली मशीन लगाई है। इससे किसान गोबर के खाद की जरूरत को तुरंत पूरा कर सकते हैं। किसान राजीव सिंह के अनुसार उन्हें मशीन लगवाने में आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल सिंह योगी ने जागरूक किया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 जैविक खेती : गोबर खाद मशीन इस मशीन की सहायता से कम समय में गोबर को खाद में तब्दील किया जा सकता है। इसमें खर्चा भी कम आता है और किसानों को जब जरूरत हो वह गोबर यहां लाएं और खाद बनवाकर उसे ले जाए। इससे किसान को एक ओर अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती है और दूसरी ओर गांव के किसानों को ताजा खाद उपलब्ध हो रहा है। इससे गांव के किसानों को फायदा मिल रहा है और जैविक खेती को बढ़ावा भी। इस संबंध में आत्मा परियोजना प्रभारी योगेंद्रपाल सिंह योगी का कहना है कि राजीव सिंह की मशीन से जैविक खेती से किसानों को जुडऩे का मौका मिलेगा। किसानों की खेत की सभी पोषक तत्वों की जरूरत को मशीन से पूरा किया जा सकता है। इससे खेती की लागत घटेगी और किसान की आय भी बढ़ेगी। क्या है गोबर खाद की उपयोगिता गाय के गोबर में 86 प्रतिशत तक द्रव पाया जाता है। गोबर में खनिजों की भी मात्रा कम नहीं होती। इसमें फास्फोरस, नाइट्रोजन, चूना, पोटाश, मैंगनीज़, लोहा, सिलिकन, ऐल्यूमिनियम, गंधक आदि कुछ अधिक मात्रा में विद्यमान रहते हैं तथा आयोडीन, कोबल्ट, मोलिबडिनम आदि भी थोड़ी थोड़ी मात्रा में रहते हैं। अस्तु, गोबर खाद के रूप में, अधिकांश खनिजों के कारण, मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। पौधों की मुख्य आवश्यकता नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटासियम की होती है। वे वस्तुएं गोबर में क्रमश: 0.3- 0.4, 0.1- 0.15 तथा 0.15- 0.2 प्रतिशत तक विद्यमान रहती हैं। मिट्टी के संपर्क में आने से गोबर के विभिन्न तत्व मिट्टी के कणों को आपस में बांधते हैं, किंतु अगर ये कण एक दूसरे के अत्यधिक समीप या जुड़े होते हैं तो वे तत्व उन्हें दूर दूर कर देते हैं, जिससे मिट्टी में हवा का प्रवेश होता है और पौधों की जड़ें सरलता से उसमें सांस ले पाती हैं। गोबर का समुचित लाभ खाद के रूप में ही प्रयोग करके पाया जा सकता है। इस प्रकार दुधारू पशुओं से प्राप्त गोबर उसे पैदावार तो अच्छी होती है साथ ही स्वस्थ उत्पादन प्राप्त होता है। अब तो मशीन से गोबर खाद बनाई जाने लगी है। ऐसी ही मशीन बिजनौर के किसान ने लगाई है जो कुछ ही घंटों में गोबर को खाद बना देती है। इससे किसानों किसानों को जैविक खेती के लिए खेतों में डालने के लिए तुरंत ही ताजा खाद मिल जाएगा। कैसे तैयार की जाती है इस मशीन से गोबर खाद गांव सिकंदरी के किसान राजीव सिंह के अनुसार गोबर को गड्ढ़े में डालकर उसमें जीवाणु वाला पानी मिलाया जाता है। फास्फोरस, नाइट्रोजन आदि किसी भी तत्व की पूर्ति के लिए ये जीवाणु मिलाए जाते हैं। अगर खेत में दीमक की समस्या है तो उसे दूर करने के लिए मैटाराइजम मिलाया जाता है। इससे तैयार घोल को मशीन के अंदर ले जाया जाता है। अगर मशीन में दस क्विंटल गोबर डाला जाए तो इससे तीन क्विंटल खाद मिल जाता है। बाकी 70 प्रतिशत जीवामृत/पानी मिलेगा। यह पानी भी पोषक तत्वों से युक्त होता है। इसे भी खेत में डाला जा सकता है। एक बीघा में कितना लगता है गोबर खाद गोबर के खाद से मुख्य रूप से कार्बन मिलता है। बिना कार्बन के कोई भी खाद असर नहीं करता है। सामान्य तीन से चार महीने पुरानी कूड़ी में कार्बन कम होता है। ऐसा खाद प्रति बीघा जमीन में 50 से 60 क्विंटल डालना होता है। केंचुए से बनने वाला खाद एक बीघा जमीन में केवल छह क्विंटल ही डालना होता है। जबकि मशीन से तैयार खाद केवल 40 किलो प्रति बीघा ही डालना होता है। मशीन से बनी गोबर खाद दिलाएंगी दीमक की समस्या से मुक्ति जमीन की उपजाऊ क्षमता बनाएं रखने के लिए किसान खेतों में गोबर की खाद डालते हैं। लेकिन गोबर की खाद भी हर समय किसान के पास उपलब्ध नहीं होती है। गोबर से खाद बनने में तीन से छह महीने का समय लगता है। अगर खाद तैयार न हो तो किसान कच्चा गोबर ही खेत में डाल देते हैं। इससे खाद का पूरा लाभ खेत को नहीं मिलता है। साथ ही कच्चा खाद दीमक की खुराक भी होता है। कच्ची खाद खेत में डालने से खेत में दीमक डेरा डाल देती हैं और फिर फसलों को भी नुकसान पहुंचाती हैं। लेकिन इस मशीन द्वारा तैयार खाद दीमक की समस्या को खतम करने में सहायक है क्योंकि गोबर से खाद बनाते समय इसमें मैटाराइजम मिलाया जाता है जो दीमक के खात्में के लिए काफी असरकारक माना गया है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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