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कोरोना वायरस से दूध की खपत 25 फीसदी घटी अब सरकार से राहत की उम्मीद ?

कोरोना वायरस से दूध की खपत 25 फीसदी घटी अब सरकार से  राहत की उम्मीद ?

31 March, 2020

कोरोना वायरस का दूध उत्पादक किसानों पर असर

ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। देशभर में कोरोना का साइड इफेक्ट लगातार बढ़ता जा रहा है। कोरोना संक्रमण के कारण मृत्यु के मामले और कोरोना पॉजिटिव लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। देशभर में लॉकडाउन के चलते हर तबका मुसीबत में है, किसान भी इससे अछूते नहीं है। देश का किसान रबी फसल की कटाई में जुटा हुआ है। देश के कई प्रांतों के किसानों ने रबी फसल की कटाई का काम पूरा कर लिया है लेकिन वह अपनी उपज को बेच नहीं पा रहा है। पशुपालन से जुड़े किसानों पर भी लॉकडाउन का असर पड़ा है। देश में दूध की खपत करीब 25 फीसदी तक घट गई और किसानों को गांव में दूध कम दामों पर बेचना पड़ रहा है। ऐसे में किसानों को सरकार से उम्मीद है कि उनके लिए भी कुछ राहत भरे कदम उठाए जाएं।

 

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कोरोना से देश में दूध की खपत 25 फीसदी तक कम

कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए देश में लॉकडाउन के चलते होटल, रेस्तरां, हलवाई की दुकानें और चाय की थडिय़ां बंद है। जिससे दूध की खतप करीब 25 फीसदी तक कम हो गई है। इससे पशुपालक किसानों की कमाई में 5 से 7 रुपए प्रति लीटर तक की कमी आई है। देश में मांग की तुलना में दूध की आपूर्ति बढ़ गई है। देश के कुछ इलाकों में तो किसान आधी कीमत पर दूध बेचने को मजबूर है। देश के दूरदराज इलाकों में परिवहन सेवाएं बंद होने के कारण निजी और सरकारी कंपनियां दूध की खरीद नहीं कर पा रही हैं। देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक औ तमिलनाडू में कोविड-19 के पैर परसारने के कारण यह स्थिति पैदा हुई है।

 

किसानों को गाय के दूध के 31 और भैंस के दूध के 50 रुपए लीटर मिलता है दाम

अमूल ब्रांड से दुग्ध उत्पादक बेचने वाली देश की सबसे बड़ी दुग्ध कंपनी गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (जीसीएमएमएफ) के प्रबंध निदेशक आर.एस. सोढ़ी के हवाले छपी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में होटल, रेस्टोरेंट और चाय की दुकानें बंद होने से पिछले एक महीने के दौरान दूध की खपत में 25 फीसदी की कमी आई है। आइसक्रीम और दूध से बने उत्पादों की खुदरा दुकानें बंद होने से दूध की खपट घटी है। लेकिन घरों में घी, मक्खन और दूध की खपत बढ़ी है। सोढ़ी के अनुसार बड़ी दूध की कंपनियों को तो ऊंची कीमत चुकानी पड़ेगी क्योंकि उनका किसानों के साथ पुराना नाता है। जीसीएमएमएफ किसानों को गाय के दूध के लिए 31 रुपए प्रति लीटर और भैंस के दूध के लिए 50 रुपए प्रति लीटर का भुगतान करती है।

 

यह भी पढ़ें : 8.69 करोड़ किसानों को अप्रैल के पहले सप्ताह में मिलेंगे 2 हजार रुपए

 

अब कुछ किसान कम कीमत पर दे रहे हैं दूध

एक मीडिया रिपोर्ट्स  के अनुसार दूध की खपत में कमी के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडू और गुजरात में किसानों को सस्ती कीमत पर दूध बेचना पड़ रहा है। गांवों में दूध की मौजूदा कीमत 30 से 31 रुपए प्रति लीटर है लेकिन कुछ किसान आधी कीमत पर ही दूध कंपनियों को दूध दे रहे हैं। इससे किसानों की कमाई 5 से 7 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से कम हुई है। आपको बता दें कि निजी और छोटी सहकारी कंपनियां ज्यादा आपूर्ति की स्थिति में किसानों को कम कीमत देकर मौके का फायदा उठाती है। 

 

निर्यात प्रभावित होने से स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमतों में भी गिरावट

वहीं दुनियाभर में लॉकडाउन के कारण निर्यात प्रभावित होने से स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमतों में भी गिरावट आई है। यह स्थिति अभी कुछ हफ्ते और रहेगी। करीब एक महीने बाद गर्मियां शुरू होने के साथ ही दूध की आपूर्ति में कमी आएगी और कीमतें फिर से अपनी पुरानी स्थिति में पहुंच जाएंगी। अमूमन जब दूध की आपूर्ति खपत से अधिक होती है तो दुग्ध कंपनियां स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) बनाती हैं ताकि मांग बढऩे और आपूर्ति घटने पर इसे बेचा जा सके। निर्यात रुकने के कारण एसएमपी की कीमतों में भारी गिरावट आई है।

 

खेप रोक दी गई और कोई ऑर्डर नहीं आ रहा है। बाजार में पर्याप्त मात्रा में एसएमपी उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद अतिरिक्त दूध को एसएमपी में बदलने और ज्यादा मांग के समय आपूर्ति के लिए रखना व्यावहारिक नहीं है। कई दुग्ध कंपनियों के पास कार्यशील पूंजी नहीं है। क्योंकि उन्हें बैंक से फंड नहीं मिल रहा है। मांग कम होने से घरेलू बाजार में एसएमपी 230 रुपए प्रति किलो के भाव से मिल रहा है जबकि एक माह पहले इसकी कीमत 310 रुपए प्रतिकिलो के आसपास थी।

 

सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।
 

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अनुबंध कृषि : किसान और व्यापारी के बीच विवादों के समाधान के लिए सरकार ने जारी किए नियम

अनुबंध कृषि : किसान और व्यापारी के बीच विवादों के समाधान के लिए सरकार ने जारी किए नियम

जानें, क्या है कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से जुड़े इन नियमों में और इससे किसानों को क्या होगा फायदा अनुबंध कृषि (Contract Farming) से जुड़े विवादों के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने नियम ओर प्रक्रिया जारी की है। अधिसूचित नियमों के अनुसार, सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) दोनों पक्षों से समान प्रतिनिधित्व वाले सुलह बोर्ड का गठन करके विवाद को हल किया जाएगा। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार एक अधिकारी ने बताया कि सुलह बोर्ड की नियुक्ति की तारीख से 30 दिनों के भीतर सुलह की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। यदि सुलह बोर्ड विवाद को हल करने में विफल रहता है, तो या तो पार्टी उप-विभागीय प्राधिकरण से संपर्क कर सकती है, जिसे उचित सुनवाई के बाद आवेदन दाखिल करने के 30 दिनों के भीतर मामले का फैसला करना होगा। अधिकारी ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जहां किसानों की भूमि एक से अधिक सब डिवीजन में आती है। अधिकारी ने बताया, ऐसे मामलों में, भूमि के सबसे बड़े हिस्से पर अधिकार क्षेत्र मजिस्ट्रेट के पास निर्णय लेने का अधिकार होगा। अधिकारी ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में शामिल पक्षों को समीक्षा के लिए उच्च प्राधिकरण के पास जाने का अधिकार होगा। अधिकारी ने कहा- संबंधित जिले के कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा नामित अतिरिक्त कलेक्टर अपीलीय प्राधिकारी होंगे। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसान 30 दिनों के भीतर कर सकते हैं अपील दायर अनुबंध कृषि (Contract Farming) नियमों को लेकर अधिकारी ने कहा कि इस तरह के आदेश के तीस दिनों के भीतर, किसान खुद जाकर या इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील दायर कर सकते हैं। संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, प्राधिकरण को ऐसी अपील दायर करने की तारीख से 30 दिनों के भीतर मामले का निपटान करना होगा। अधिकारी ने कहा कि अपीलीय अधिकारी द्वारा पारित आदेश में सिविल कोर्ट के निर्णय का बल होगा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसान इस कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य किसानों को उनकी फसल खराब होने पर सुनिश्चित मूल्य की गारंटी देना है। क्या है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) और इसे लेेकर किसान में क्यूं बना हुआ है डर अनुबंध पर खेती का मतलब ये है कि किसान अपनी जमीन पर खेती तो करता है, लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए। कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान को पैसा नहीं खर्च करना पड़ता। इसमें कोई कंपनी या फिर कोई आदमी किसान के साथ अनुबंध करता है कि किसान द्वारा उगाई गई फसल विशेष को कॉन्ट्रैक्टर एक तय दाम में खरीदेगा। इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी सब खर्च कॉन्ट्रैक्टर के होते हैं। कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को खेती के तरीके बताता है। फसल की क्वालिटी, मात्रा और उसके डिलीवरी का समय फसल उगाने से पहले ही तय हो जाता है। हालांकि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। बता दें कि गुजरात में बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों में अनुबंध पर खेती की जा रही है और इस खेती के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। इसके बावजूद देश के कई राज्यों में किसान इसका विरोध कर रहे हैं, किसानों को डर है कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग कानून किसी भी विवाद के मामले में बड़े कॉर्पोरेट और कंपनियों का पक्ष लेंगे। इस आशंका को खारिज करते हुए, अधिकारी ने कहा कि किसानों के हित में कृषि कानूनों का गठन किया गया है। अधिकारी ने कहा कि एक समझौते में प्रवेश करने के बाद भी, किसानों को अपनी पसंद के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट को समाप्त करने का विकल्प होगा। हालांकि, अन्य पक्ष-किसी भी कंपनी या प्रोसेसर-को समझौते के प्रावधानों का पालन करना होगा। वे दायित्वों को पूरा किए बिना कॉन्ट्रैक्ट से बाहर नहीं निकल सकते है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

मूंगफली की सरकारी खरीद : नेफैड ने किया इनकार, पंजीयन स्थगित

मूंगफली की सरकारी खरीद : नेफैड ने किया इनकार, पंजीयन स्थगित

किसानों को समर्थन मूल्य पर मूंगफली बेचने के लिए अभी करना होगा और इंतजार भारत सरकार की नोडल एजेंसी नेफैड की ओर से समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद करने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण आगामी आदेशों तक मूंगफली के पंजीयन स्थगित कर दिए गए हैं। सरकार की ओर से मूंगफली की खरीद के लिए अगली व्यवस्था करने तक किसानों को इंतजार करना होगा। बता दें कि राजस्थान में समर्थन मूल्य पर मूंगफली खरीद के लिए 20 अक्टूबर से पंजीयन की प्रक्रिया शुरू की जानी थी लेकिन सरकारी नोडल ऐजेंसी नेफैड ने हाथ खड़े कर दिए। इससे फिलहाल राजस्थान में मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं हो पाएगी। बता दें कि इस वर्ष केंद्र सरकार द्वारा मूंगफली का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5275 रुपए तय किया गया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मूंगफली की सरकारी खरीद नहीं होने से किसानों में मायूसी राजस्थान में मूंगफली की खरीद शुरू होने को लेकर किसान काफी उत्साहित थे। लेकिन समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद के लिए पंजीयन प्रक्रिया स्थगित होने से मूंगफली उत्पादक किसानों के चहरे पर मायूसी छा गई है। बता दें कि राजस्थान में पांच लाख हैक्टेयर में मूंगफली की खेती होती है। इस वर्ष राजस्थान में केंद्र सरकार ने 3.74 लाख मीट्रिक टन मूंगफली की खरीद के लक्ष्य की स्वीकृति प्रदान की है। बता दें कि गुजरात के साथ ही राजस्थान भी मूंगफली उत्पादन में प्रमुख स्थान रखता है। अब चूंकी मूंगफली की सरकारी खरीद को स्थगित कर दिया गया जिससे किसान निजी मंडियोंं की तरफ रूख करेंगे और मजबूरन उन्हें कम कीमत पर अपनी मूंगफली की फसल बेचनी पड़ेगी। जिससे किसानों को हानि उठानी पड़ेगी। मूंगफली की खरीद नहीं करने को लेकर नेफैड ने दी सफाई समर्थन मूल्य पर किसानों से उपज खरीदने वाली सरकारी संस्था नेफैड मूंगफली की खरीद नहीं करने के कारणों को लेकर सफाई दी है। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार नेफैड अधिकारियों का कहना है कि अभी उसके गोदाम बाजरे से भरे पड़े हैं, ऐसे में जब तक रखने की जगह नहीं मिलती तब तक मूंगफली की फसल की खरीद हो ही नहीं पाएगी। राजस्थान सरकार को मंडियों में 18 नवंबर से मूंगफली खरीदनी थी और इसके लिए प्रदेश में 266 खरीद केंद्र चिह्नित भी किए गए थे, लेकिन किसान अब परेशान है क्योंकि उनकी मूंगफली की फसल सरकार नहीं खरीद रही है। राजस्थान में मूंगफली की खरीद में लगातार हो रही है देरी जानकारी के अनुसार नेफैड की ओर से मूंगफली की खरीद नहीं करने के बाद अब राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर किसानों के हित में मूंगफली की खरीद करवाने का फिर से आग्रह किया है। बहरहाल केंद्र और राज्य के अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल नहीं होने के चलते ही मूंगफली की खरीद पर संकट आने की बात कही जा रही है। वैसे राजस्थान में इन दिनों रबी की फसल की बुवाई शुरू हो चुकी है और ऐसे में मूंगफली की फसल की सरकारी खरीद नहीं होने से परेशान किसानों के मंडियों में आने के बावजूद भी वे अब घाटे में बिचौलिये के जरिये बेहद ही कम दामों पर मूंगफली बेचने को मजबूर है। आगे कब होगी मूंगफली की खरीद मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 29 सितंबर को हुई बैठक में नेफैड को दलहन/तिलहन की खरीद व्यवस्था के संबंध में अवगत करवा दिया गया था। भारत सरकार द्वारा भी 12 अक्टूबर को मूंग, उड़द एवं सोयाबीन के साथ-साथ मूंगफली के खरीद लक्ष्य भी स्वीकृत कर दिए गए थे, परन्तु नेफैड द्वारा समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद में असमर्थता व्यक्त करने के कारण विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसी के साथ आगामी आदेशों तक मूंगफली के पंजीयन स्थगित किए गए हैं। राजस्थान राज्य सरकार द्वारा किसानों के हित में कृषि मंत्रालय, भारत सरकार को नेफैड के माध्यम से मूंगफली की खरीद करवाने के लिए अनुरोध किया गया है। भारत सरकार द्वारा नेफैड अथवा अन्य नोडल एजेंसी नियुक्त करने के बाद मूंगफली खरीद हेतु पंजीयन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी जाएगी। समर्थन मूल्य पर मूंग, उड़द एवं सोयाबीन बेचने के लिए किसान करा सकते हैं पंजीकरण राज्य में मूंग, उड़द एवं सोयाबीन की उपज हेतु ऑनलाइन पंजीकरण प्रारंभ कर दिए गए हैं। किसान ई-मित्र केंद्र एवं खरीद केन्द्रों पर प्रात: 9 बजे से सायं 7 बजे तक की गई है। किसान एक जनआधार कार्ड में अंकित नाम में से जिसके नाम गिरदावरी होगी उसके नाम से एक पंजीयन करवा सकेगें। किसान इस बात का विशेष ध्यान रखे कि जिस तहसील में कृषि भूमि है उसी तहसील के कार्यक्षेत्र वाले खरीद केन्द्र पर उपज बेचान हेतु पंजीकरण कराएं। दूसरी तहसील में यदि पंजीकरण कराया जाता है तो पंजीकरण मान्य नही होगा । किसान पंजीयन कराते समय यह सुनिश्चित कर ले कि पंजीकृत मोबाईल नंबर, से जनआधार कार्ड से लिंक हो जिससे समय पर तुलाई दिनांक की सूचना मिल सके। किसान प्रचलित बैंक खाता संख्या सही दे ताकि ऑनलाइन भुगतान के समय किसी प्रकार की परेशानी किसान को नहीं हो। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

उत्तरप्रदेश में मक्का की सरकारी खरीद शुरू, खरीद केंद्र स्थापित किए

उत्तरप्रदेश में मक्का की सरकारी खरीद शुरू, खरीद केंद्र स्थापित किए

किसान फसल बेचने के लिए यहां कराएं ऑनलाइन पंजीकरण उत्तरप्रदेश सरकार ने सरकारी मंडियों में मक्का की खरीद शुरू कर दी है। मक्का खरीद के लिए सरकारी स्तर पर मंडियों में तैयारी की गई है। इस वर्ष केंद्र सरकार ने मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इसी मूल्य पर किसानों से मक्का की खरीद की जाएगी। इसको लेकर उत्तरप्रदेश सरकार ने कुछ जिले जहां मक्का उत्पादन अधिक होता है वहां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मक्का खरीदने का फैसला लिया है। उत्तरप्रदेश मंत्रीपरिषद् ने खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 में मूल्य समर्थन योजना के तहत मक्का क्रय नीति को स्वीकृति प्रदान कर दी है। उत्तरप्रदेश में समर्थन मूल्य पर 17 अक्टूबर 2020 से शुरू की गई मक्का की खरीद 15 जनवरी 2021 तक जारी रहेगी। मक्का क्रय करने का जिम्मा खाद्य एवं रसद विभाग की विपणन शाखा को सौंपा गया है। खरीद केंद्रों का निर्धारण और चयन जिलाधिकारियों द्वारा किया जाएगा। केवल उन क्षेत्रों में मक्का खरीद केंद्र स्थापित होंगे, जहां मक्का उत्पादन अधिक हो और पर्याप्त खरीद की संभावना हो। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 इन जिलों में होगी मक्का की खरीद प्रथम चरण में मक्का खरीद के लिए अलीगढ़, फीरोजाबाद, कन्नौज, एटा, मैनपुरी, कासगंज, बदायूं, बहराइच, फर्रुखाबाद, इटावा, हरदोई, कानपुर नगर, जौनपुर, कानपुर देहात, उन्नाव, गोंडा, बलिया, बुलंदशहर, ललितपुर, श्रावस्ती, देवरिया, सोनभद्र व हापुड़ में सरकारी खरीद शुरू की गई हैं। अन्य जिलों में आवक को देखकर खाद्य आयुक्त द्वारा मक्का खरीद का निर्णय लिया जाएगा। उत्तरप्रदेश में समर्थन मूल्य व निजी मंडी में मक्का के भावों में अंतर प्रदेश में 20 अक्टूबर 2020 को मक्का के सबसे कम भाव सिकंदराराहु मंडी में 1010-1135 रुपए प्रति क्विंटल और सबसे अधिक दाम कानपुर मंडी में 1200 से 1350 रुपए रहे। वहीं सरकार की ओर से मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1850 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इन भावों का अवलोकन करें तो सरकार द्वारा तय समर्थन, मूल्य निजी मंडी के भावों से अधिक हैं। इससे यहां के किसान समर्थन मूल्य पर अपनी मक्का की उपज बेचने के इच्छुक हैं। इसी को देखते हुए राज्य की योगी सरकार ने किसानों को राहत देते हुए मक्का की सरकारी खरीद शुरू की है। मक्का खरीद केंद्रों क्या है व्यवस्था खरीद केंद्र स्थापित इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि किसानों को मक्का बेचने के लिए अधिक दूरी न तय करनी पड़े। इसके लिए खरीद केंद्र ऐसे स्थान पर बनाएं जा रहे हैं जहां किसान आसानी से आ सके। इसके अलावा खरीद केंद्रों पर पर मक्का की खरीद के लिए आनलॉइन पंजीयन करना आवश्यक है। पंजीकरण कराने के बाद ही किसान से मक्का की खरीद की जाएगी। इसके अभाव में किसानों के लिए मक्का का विक्रय करना संभव नहीं होगा। वहीं मक्का क्रय केंद्र हेतु हैंडलिंग एवं परिवहन ठेकेदारों की नियुक्ति नियमानुसार ई-टेंडरिंग के माध्यम से की जाएगी। मक्का के मूल्य का भुगतान आर.टी.जी.एस/पी.एफ.एम.एस के माध्यम से मक्का क्रय के 72 घंटे के अन्दर किया जाएगा। चेक के माध्यम से भुगतान को मान्यता नहीं दी जाएगी। किसान कहां और कैसे कराएं पंजीकरण किसानों को मक्का समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण करवाना आवश्यक है। किसान ऑनलाइन पंजीकरण खाद्य एवं रसद विभाग की वेबसाइट https://fcs.up.gov.in/ से कर सकते हैं। पंजीकरण कराने के लिए किसान को जेातबही खाता नंबर अंकित कम्प्यूटराइजड खतौनी, आधार कार्ड, बैंक पासबुक के प्रथम पृष्ठ (जिसमें खाता धारक का विवरण अंकित हो) की छाया प्रति तथा एक अद्यतन पासपोर्ट साइज फोटो अपलोड करनी होगी। पंजीकरण होने के बाद किसान अपनी मक्का की उपज सरकारी मंडी में बेच सकेंगे। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सोयाबीन की खरीद से किसान खुश, समर्थन मूल्य से अधिक बाजार में दाम

सोयाबीन की खरीद से किसान खुश, समर्थन मूल्य से अधिक बाजार में दाम

समर्थन मूल्य बेहतर होने से बाजार में भी सोयाबीन के भावों में आई तेजी सोयाबीन किसानों को इस बार बाजार में फसल बेचने से अच्छे दाम मिल रहे हैं। किसानों का कहना है कि यह पांच साल में पहला मौका है जब सोयाबीन के मंडियों में बेहतर दाम मिल रहे हैं। इस समय महाराष्ट्र की मंडियों में सोयाबीन के भाव 4000 रुपए प्रति क्विंटल चल रहा है जबकि सरकार ने सोयाबीन का समर्थन मूल्य 3880 रुपए तय किया हुआ है। सरकारी समर्थन मूल्य की बेहतर होने से हाजिर वायादा भावों में भी तेजी आई है जिसका फायदा किसानों को मिल रहा है। इधर सोमवार को कमोडिटी एक्सचेंज एनसीडीईएक्स पर सोयाबीन का नवंबर वायदा 54 रुपए की तेजी के साथ 4243 रुपए प्रति क्विंटल पर कारोबार कर रहा था। महाराष्ट्र राज्य कृषि मूल्य आयोग के पूर्व चेयरमैन पाशा पटेल का कहना कि पिछले कई वर्षों बाद किसानों को उनकी उपज (सोयाबीन) का बेहतर भाव मिल रहा है। फसलों की कटाई के समय का पिछले 4-5 साल का ट्रेंड देखें तो सोयाबीन के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से काफी नीचे थे। इससे किसानों को काफी नुकसान हुआ था। कई साल बाद पहला मौका है जब भाव एमएसपी से ऊपर चल रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक देशभर की प्रमुख हाजिर मंडियों में सोयाबीन का भाव 4000 रुपए के आसपास चल रहा है। 19 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में हाजिर में बढिय़ा क्वालिटी वाली सोयाबीन का दाम 4000-4200 रुपए के बीच था। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मध्यप्रदेश में सोयाबीन के भावों को लेकर किसानों में उत्साह मध्य प्रदेश के किसानों से जुड़ी संस्था समृद्ध किसान के वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि इस साल मध्य प्रदेश के किसानों को सोयाबीन का उचित भाव मिल रहा है, जिससे में सोयाबीन बेचने वाले किसानों में उत्साह दिखाई दे रहा है। मध्य प्रदेश के ही उज्जैन जिले के बढऩगर की फॉर्मर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी के सुरेन्द्र का कहना है कि मंडियों में अच्छी क्वालिटी के सोयाबीन का दाम 4300 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। हाजिर में भाव बढऩे से वायदा में भी तेजी का रुख है। उनका कहना है कि बाजार में जितनी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी किसानों को उनकी उपज का भाव बाजिव मिलेगा। इस बार भारी बारिश से सोयाबीन की फसल में हुआ नुकसान, दाम बढऩे से हो सकेगी भरपाई इस बार कई जगह भारी बारिश की वजह से सोयाबीन की फसल को नुकसान पहुंचा है। इससे उत्पादन में कमी आई है। बात करें देश में सबसे अधिक सोयाबीन उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की तो यहां इस साल भारी बारिश के कारण 20 फीसदी नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है। इसमें मध्यप्रदेश में बारिश की कमी और महाराष्ट्र में अत्यधिक बारिश की वजह से फसल बर्बाद हुई। इससे किसानों को काफी नुकसान हुआ। अब चूंकी बाजार में किसानों को सोयाबीन के अच्छे दाम मिल रहे हैं इससे किसानों के नुकसान की भरपाई हो सकेगी। सोयाबीन का बाजार भाव व एमएसपी में कितना अंतर सोयाबीन का सरकारी एमएसपी- 3880 रुपए प्रति क्विंटल सोयाबीन के निजी मंडियों में भाव- 4000 रुपए प्रति क्विंटल (महाराष्ट्र) सोयाबीन का बाजार भाव- 4243 रुपए प्रति क्विंटल (महाराष्ट्र) भावों का अंतर देखें तो सोयाबीन का बाजार भाव, सरकार द्वारा तय किए गए भाव से काफी ज्यादा हैं। इससे किसानों को निजी मंडियों में सोयाबीन बेचने से फायदा हो रहा है। फिर भी सरकार द्वारा तय किए गए भावों से एक फायदा है कि खरीद शुरू होने पर इससे कम भाव में व्यापारी किसानों से सोयाबीन की खरीद नहीं कर पाएंगे। इसलिए एमएसपी भी किसान के लिए बेहद जरूरी हैं ताकि बाजार में भाव नीचे गिरने लगे तो किसान एमएसपी पर अपनी उपज बेचकर अपनी हानि की भरपाई कर सके। सोयाबीन की बुआई से लेकर कटाई तक आता है इतना खर्चा सोयाबीन फसल की बुआई से लेकर कटाई तक किसानों को प्रति बीघा के हिसाब से करीब ढाई हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं। किसानों के द्वारा बताया जा रहा है कि, प्रति बीघा जमीन की 02 वार की जुताई 750 रुपए, पंजी की हकाई 250 रुपए, सोयाबीन की बुवाई 250 रुपए, 1200 रुपए की बीज, थ्रेसर की कटाई 500 रुपए, दबाई 200 रुपए और मजदूरों से कटाई 1000 यानि कुल 4 हजार से 4200 रुपए का खर्चा करना पड़ता है। इस हिसाब से देखें तो सोयाबीन की फसल बेचने से किसान की लागत ही निकल पाती है। इसलिए किसानों को चाहिए कि सोयाबीन की फसल के साथ अन्य सहायक फसलें भी उगाएं ताकि एक फसल में हानि होने पर दूसरी फसल को बेचकर उसकी भरपाई की जा सके। राजस्थान में एक नवंबर से शुरू हो रही है सोयाबीन की खरीद राजस्थान में सोयाबीन और मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद की जाएगी। इसके लिए 20 अक्टूबर से पंजीयन शुरू हो जाएगा। मीडिया में प्रसारित खबरों के अनुसार सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना के मुताबिक सोयाबीन के लिए 79 खरीद केन्द्र चिह्नित किए गए हैं। ई-मित्र और खरीद केन्द्रों पर ऑनलाइन पंजीकरण सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक हो सकेगा। बिना पंजीकरण के किसानों से खरीद नहीं होगी। इस बार राजस्थान में किसानों से सोयाबीन की 2.92 लाख टन उपज खरीदने का लक्ष्य हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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