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धान की खेती में श्रम व पानी बचाएं, सीधी बिजाई तकनीक अपनाएं

धान की खेती में श्रम व पानी बचाएं, सीधी बिजाई तकनीक अपनाएं

कम पानी में धान की बिजाई कैसे करें ( Paddy Farming )

किसान भाइयों का ट्रैक्टर जंक्शन में स्वागत है। आज हम चर्चा करेंगे कि किस प्रकार हम धान की खेती करें जिससे श्रम और पानी दोनों की बचत हो और उत्पादन भी अधिक मिले जिससे किसानों को मुनाफा हो सके। जैसा कि आप जानते हैं कि देश के कई राज्यों में धान की खेती की तैयारियां शुरू हो गई है और मानसून आने से पहले इसकी बुवाई की जानी है। लेकिन आज की परिस्थितियों को देखते हुए इसकी खेती के लिए श्रम और पानी दोनों की समस्या किसान के सामने आ खड़ी हुई है।

 देश में कोरोना वायरस के संक्रमण के दौरान चल रहे लॉकडाउन से इसकी खेती के लिए मजदूर मिलना मुश्किल हो गया है। क्योंकि लॉकडाउन के कारण काफी संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों को चले गए है। इससे इसकी खेती के लिए श्रम का संकट बना हुआ है। इन सब हालातों के चलते आज इसकी खेती के लिए कम श्रम और कम पानी की तकनीक पर आधारित खेती पर जोर देना समय की मांग बन चुका है। इसका एक ही विकल्प है कि हम धान की खेती में सीधी बिजाई तकनीक को अपनाएं ताकि कम श्रम व पानी में अच्छा उत्पादन हो सके और मुनाफा भी हो सके।

 

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भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत में गेहूं, मक्का के बाद दूसरे स्थान पर धान का आता है। देश में प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलांगाना, पंजाब, उड़ीसा, बिहार व छत्तीसगढ़ में इसकी खेती की जाती है। पूरे देश में 36.95 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है। पानी की कमी को देखते हुए इस वर्ष इसकी खेती का रकबा कम कर दिया गया है। धान की खेती के लिए पानी की आवश्यकता अधिक होती है। इसके लिए भारतीय किसान मानसून पर निर्भर रहता है। आज पानी का लेवल बहुत नीचे चला गया है। इससे सभी जगह पानी की किल्लत बनी रहती है। इसे लेकर हाल ही में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने राज्य के किसानों को धान की फसल नहीं उगाने पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि किसान इसकी जगह अन्य फसल बोएं जो कम पानी में उगाई जा सके।

इसके  लिए वह किसानों को अनुदान भी मुहैया कराएंगे। आज हालत ये हो गए है कि धान की खेती कराना अब सहज नहीं रहा। आज समय की मांग को देखते हुए किसान को अब परंपरागत खेती की जगह वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की आवश्यकता है। इसके लिए नई तकनीक व नवाचार को किसान द्वारा अपनाना ही होगा। धान के उत्पादन में सीधी बिजाई तकनीक अपना कर 30-35 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है।आइए जानते हैं जीरो टिल मशीन से धान की सीधी बुवाई के बारे में

क्या है धान की सीधी बुवाई / धान की खेती में खाद / धान की खेती के लिए मिट्टी

धान की सीधी बुवाई उचित नमी पर यथा संभव खेत की कम जुताई करके अथवा बिना जोते हुए खेतों में आवश्यकतानुसार नानसेलेक्टिभ खरपतवारनाशी का प्रयोग कर जीरो टिल मशीन से की जाती है। इस तकनीक से रोपाई एवं लेव की जुताई की लागत में बचत होती है एवं फसल समय से तैयार हो जाती है जिससे अगली फसल की बुवाई उचित समय से करके पूरे फसल प्रणाली की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलती है।

 

 

धान की बुवाई मानसून आने के पूर्व (15-20 जून) अवश्य कर लेना चाहिए, ताकि बाद में अधिक नमी या जल जमाव से पौधे प्रभावित न हो। इसके लिए सर्वप्रथम खेत में हल्का पानी देकर उचित नमी आने पर आवश्यकतानुसार हल्की जुताई या बिना जोते जीरो टिल मशीन से बुवाई करनी चाहिए। जुताई यथासंभव हल्की एवं डिस्क है रो से करनी चाहिए या नानसेलेक्टिव खरपवतवारनाशी (ग्लाईफोसेट / पैराक्वाट) प्रयोग करके खरपतवारों को नियंत्रित करना चाहिए। खरपतवारनाशी प्रयोग के तीसरे दिन बाद पर्याप्त नमी होने पर बुवाई करनी चाहिए। जहां वर्षा से, या पहले ही खेत में पर्याप्त नमी मौजूद हो, वहां आवश्यकतानुसार खरपतवार नियंत्रण हेतु हल्की जुताई या प्रीप्लान्ट नानेसेलेक्टिभ खरपवनारनाशी ग्लाइसेल या ग्रेमेकसोन 2.0-2.5 ली. प्रति हे. छिडक़ाव करके 2-3 दिन बाद मशीन से बुवाई कर देनी चाहिए। 

 

ऐसे करें खेत की तैयारी 

खेत को दो-तीन जुताई लगाकर तैयार करें। ड्रिल से 3-5 सेमी गहराई पर बिजाई करें। खेत की तैयारी एवं बिजाई शाम को करें। ड्रिल से 2-3 सेमी गहराई पर बिजाई करें। बिजाई के तुरंत बाद सिंचाई करें। चार-पांच दिन बाद फिर सींचे। बिजाई के तुरंत बाद व सूखी बिजाई में 0-3 दिन बाद पैंडीमैथालीन 1.3 लीटर प्रति एकड़ स्प्रे करें। वैज्ञानिकों के अनुसार सीधी बिजाई में रोपाई वाली धान की बजाए ज्यादा खरपतवार आते हैं और वे भिन्न भी होते हैं। दोनों अवस्था में 15 से 25 बाद बिस्पायरीबैक 100 एमएल प्रति एकड़ स्प्रे करें।

 

कम पानी में पैदा होने वाली धान किस्मों का चयन / धान के प्रकार

धान की कई किस्में ऐसी है जो कम पानी में भी आसानी से उगाई जा सकती है। किसान को इसका चयन अपने राज्य की भौगोलिक स्थिति व दशा को देखते हुए किया जाना चाहिए। इस आधार पर धान की प्रमुख कम पानी में उगाई जा सकने वाली किस्में इस प्रकार है-
असिंचित दशा: नरेन्द्र-118, नरेन्द्र-97, साकेत-4, बरानी दीप, शुष्क सम्राट, नरेन्द्र लालमनी।
सिंचित दशा: सिंचित क्षेत्रों के लिए जल्दी पकने वाली किस्मों में पूसा-169, नरेन्द्र-80, पंत धान-12, मालवीय धान-3022, नरेन्द्र धान-2065 और मध्यम पकने वाली किस्मों में पंत धान-10, पंत धान-4, सरजू-52, नरेन्द्र-359, नरेन्द्र-2064, नरेन्द्र धान-2064, पूसा-44, पीएनआर-381 प्रमुख किस्में हैं। 
ऊसरीली भूमि के लिए धान की किस्में: नरेन्द्र ऊसर धान-3, नरेन्द्र धान-5050, नरेन्द्र ऊसर धान-2008, नरेन्द्र ऊसर धान-2009 प्रमुख किस्में हैं।

 

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धान की बुवाई के समय ध्यान रखने योज्य आवश्यक बातें / Paddy Harvester

  • धान की बुवाई करने से पहले जीरो टिल मशीन का संशोधन कर लेना चाहिए, जिससे बीज और उर्वरक निर्धारित मात्रा और गहराई में पड़े। ज्यादा गहराई होने पर अंकुरण और कल्लों की संख्या कम होगी, जिससे धान की पैदावार पर प्रभाव पड़ेगा। 2. बुवाई के समय, ड्रिल की नली पर विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि इससे रुकने पर बुवाई ठीक प्रकार नहीं हो पाती है, जिससे कम पोधे उगेंगे और उपज कम हो जाएगी। 
  • यूरिया और म्यूरेट आफ पोटाश उर्वरकों का प्रयोग मशीन के खाद बक्से में नहीं रखना चाहिए। इन उर्वरकों का प्रयोग टाप ड्रेसिंग के रूप में धान पोधों के स्थापित होने के बाद सिंचाई के बाद करना चाहिए। 
  • बुवाई करते समय पाटा लगाने की जरूरत नहीं होती, इसलिए मशीन के पीछे पाटा नहीं बांधना चाहिए।

 

सीधी बुवाई तकनीक से ये होगा फायदा

धान की सीधी करने से धान की नर्सरी उगाने में होने वाला खर्च बच जाता है। इस विधि में जीरो टिल मशीन द्वारा 20-25 किग्रा. बीज प्रति/ हैक्टेयर बुवाई के लिए पर्याप्त होता है। खेत को जल भराव कर लेव के लिए भारी वर्षा या सिंचाई जल की जरूरत नहीं पड़ती है। नम खेत में बुवाई हो जाती है। धान की लेव और रोपनी का खर्च भी बच जाता है। समय से धान की खेती शुरू हो जाती है और समय से खेत खाली होने से रबी फसल की बुवाई सामयिक हो जाती है जिससे उपज अधिक मिलती है। लेव करने से खराब हुई भूमि की भौतिक दशा के कारण रबी फसल की उपज घटने की परिस्थिति नहीं आती है। रबी फसल की उपज अधिक मिलती है।

 

 

धान की जीरो टिलेज से बुवाई करते समय ये रखें सावधानियां

धान की जीरो टिलेज से बुवाई करते समय किसान को कुछ सावधानियां अपनानी चाहिए। बुवाई के पहले ग्लाइफोसेट की उचित मात्रा को खेत में एक समान छिडक़ना चाहिए। ग्लाइफोसेट के छिडक़ाव के दो दिनों के अंदर बरसात होने पर, या नहर का पानी आ जाने पर दवा का प्रभाव कम हो जाता है। खेत समतल तथा जल निकासयुक्त होना चाहिए अन्यथा धान की बुवाई के तीन दिनों के अंदर जल जमाव होने पर अंकुरण बुरी तरह प्रभावित होता है।

 

धान की फसल को खरपतवार से ऐसे बचाएं / चावल की फसल

धान की फसल में खरपतवार की समस्या अधिक होती है इसके लिए किसान को कुछ उपाय अपनाने चाहिए ताकि इसकी समस्या कम से कम रहे। धान की सीधी बुवाई जीरो टिलेज से खरपतवार की हो जाती है। क्योंकि लेव न होने से इनका अंकुरण सामान्य की अपेक्षा ज्यादा होता है। बुवाई के बाद लगभग 48 घंटे के अंदर पेन्डीमीथिलिन की एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 800 लीटर पानी में छिडक़ाव करना चाहिए। छिडक़ाव करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमीं होनी चाहिए और समान्य रूप से सारे खेत में छिडक़ाव करना चाहिए। ये दवाएं खरपतवार के जमने से पहले ही उन्हें मार देती हैं। बाद में चोड़ी पत्ती की घास आए तो उन्हें, 2, 4-डी 80 प्रतिशत सोडियम साल्ट 625 ग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए।

 

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