खरीफ की बुवाई से पहले किसान करें इस फसल की खेती, प्रति हेक्टेयर होगी 3 बोरी यूरिया की बचत
प्रकाशित - 06 Jun 2026
by Vivek Tailang
कृषि विभाग से मिलेगी 50% सब्सिडी, खेत भी होगा अधिक उपजाऊ
खेती में बढ़ती लागत और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में कृषि विभाग किसानों को एक ऐसी फसल अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे न केवल उर्वरकों पर खर्च कम होगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बेहतर होगी। विभाग हरी खाद के रूप में ढैंचा (सेसबेनिया) की खेती को बढ़ावा दे रहा है और इसके लिए किसानों को बीज पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी भी उपलब्ध कराई जा रही है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ढैंचा की खेती धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी और सोयाबीन आधारित फसल चक्र अपनाने वाले किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। यह फसल मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाती है, जिससे अगली फसल में रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
प्रति हेक्टेयर 3 बोरी तक यूरिया की बचत
ढैंचा एक दलहनी हरी खाद फसल है, जो वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी में स्थिर करने का काम करती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, खेत में ढैंचा को मिट्टी में मिलाने पर प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो जाती है। इतनी मात्रा में नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए किसानों को सामान्य परिस्थितियों में 90 से 130 किलोग्राम तक यूरिया का उपयोग करना पड़ता है। इस प्रकार ढैंचा का उपयोग करने पर अगली फसल में प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत संभव है। इससे खेती की लागत कम होती है और किसानों को आर्थिक लाभ मिलता है।
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ढैंचा की बुवाई का सही तरीका
कृषि विभाग के अनुसार ढैंचा की बुवाई मानसून की शुरुआत के साथ करनी चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए लगभग 25 से 30 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता है। बुवाई के 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे लगभग 1 से 1.5 मीटर ऊंचाई तक पहुंच जाएं और उनमें फूल आने से पहले की अवस्था हो, तब इन्हें खेत में पलट देना चाहिए। पौधों को मिट्टी में दबाने के लिए किसान डिस्क हैरो, रोटावेटर या मिट्टी पलटने वाले हल का उपयोग कर सकते हैं। इसके बाद खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी होता है, ताकि ढैंचा अच्छी तरह गल सके। सामान्यतः 15 से 20 दिनों में यह पूरी तरह सड़कर जैविक खाद में बदल जाता है। इसके बाद धान या अन्य मुख्य फसल की बुआई अथवा रोपाई की जा सकती है।
मिट्टी की सेहत सुधारने में मददगार
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। ढैंचा जैसी हरी खाद फसलें मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ढैंचा के विघटन से मिट्टी में जैविक कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। इसके अलावा मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और उसकी जलधारण क्षमता भी बढ़ जाती है। खेत में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां तेज होती हैं, जिससे पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक यूरिया का अत्यधिक और असंतुलित उपयोग लंबे समय में मिट्टी को कमजोर बना सकता है। वहीं ढैंचा का नियमित उपयोग टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देता है।
बीज पर मिलेगा 50 प्रतिशत अनुदान
ढैंचा की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग किसानों को बीज की लागत पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी प्रदान कर रहा है। किसान बीज प्रक्रिया केंद्रों, बीज निगम कार्यालयों या संबंधित कृषि विभाग के कार्यालयों से संपर्क कर रियायती दरों पर उन्नत बीज प्राप्त कर सकते हैं।
मानसून से पहले ढैंचा की बुवाई करें किसान
कृषि विभाग छत्तीसगढ़ ने राज्य के किसानों से अपील की है कि वे मानसून शुरू होते ही ढैंचा की बुवाई करें और हरी खाद तकनीक को अपनाएं। इससे न केवल उर्वरकों पर खर्च कम होगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ने के कारण भविष्य की फसलों का उत्पादन और गुणवत्ता भी बेहतर हो सकेगी। कृषि विभाग का मानना है कि यह पहल किसानों की आय बढ़ाने, लागत घटाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
“ढैंचा की खेती से यूरिया की बचत” के संबंध में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब (FAQs):
प्रश्न 1. ढैंचा की खेती करने से किसानों को क्या फायदा होता है?
उत्तर: ढैंचा एक हरी खाद फसल है, जो मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाती है। इससे अगली फसल में यूरिया की जरूरत कम होती है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और खेती की लागत घटती है।
प्रश्न 2. ढैंचा का उपयोग करने पर कितनी यूरिया की बचत हो सकती है?
उत्तर: कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा को खेत में मिलाने से प्रति हेक्टेयर 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राप्त होती है, जिससे अगली फसल में लगभग 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत हो सकती है।
प्रश्न 3. ढैंचा के बीज पर कितनी सब्सिडी मिलती है?
उत्तर: कृषि विभाग ढैंचा के बीज की लागत पर 50 प्रतिशत तक अनुदान (सब्सिडी) उपलब्ध करा रहा है, जिससे किसान रियायती दर पर बीज प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न 4. ढैंचा की बुवाई कब और कैसे करनी चाहिए?
उत्तर: ढैंचा की बुवाई मानसून की शुरुआत में करनी चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 25 से 30 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बुवाई के 35 से 40 दिन बाद फसल को मिट्टी में पलट देना चाहिए।
प्रश्न 5. ढैंचा की खेती किन फसल चक्रों के लिए लाभकारी है?
उत्तर: ढैंचा की खेती धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी और सोयाबीन आधारित फसल चक्र अपनाने वाले किसानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है, क्योंकि यह अगली फसल के लिए मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती है।
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