वैज्ञानिकों ने विकसित की अधिक चारा उत्पादन देने वाली 3 नई मक्का किस्में, पशुपालकों को होगा लाभ

Share Product प्रकाशित - 06 Nov 2026 by Vivek Tailang

वैज्ञानिकों ने विकसित की अधिक चारा उत्पादन देने वाली 3 नई मक्का किस्में, पशुपालकों को होगा लाभ

पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा मिलेगा और पशुपालकों की घटेगी लागत, जानें कौन-सी हैं ये किस्में

पशुपालन करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। अब उन्हें पशुओं के लिए पौष्टिक और गुणवत्तायुक्त हरे चारे के नए विकल्प मिल सकेंगे। गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों ने जंगली मक्का और टियोसिंटे (Teosinte) के आनुवंशिक गुणों का उपयोग करके चारा मक्का की तीन उन्नत संकर प्रजातियां विकसित की हैं। इनमें पंत संकर चारा मक्का-1, पंत संकर चारा मक्का-2 और पंत संकर चारा मक्का-3 शामिल हैं। इन प्रजातियों के विकास से किसानों को चारा उत्पादन के नए विकल्प मिलने की उम्मीद है। वहीं, पशुपालकों को पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऐसी चारा मक्का प्रजातियां विकसित करने पर काम किया है, जो अधिक चारा उत्पादन देने के साथ लंबे समय तक हरी रह सकें और पशुओं को बेहतर पोषण देने में सहायक हों। हरे चारे की उपलब्धता पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी उत्पादन क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में इन नई प्रजातियों को पशुपालन क्षेत्र के लिए उपयोगी उपलब्धि माना जा रहा है।

पंत संकर चारा मक्का की ये हैं तीन नई किस्में

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तीनों प्रजातियों के नाम पंत संकर चारा मक्का-1, पंत संकर चारा मक्का-2 और पंत संकर चारा मक्का-3 हैं। इनमें से पहली दो प्रजातियों को विमोचित किया जा चुका है। साथ ही, पंत संकर चारा मक्का-1 और पंत संकर चारा मक्का-2 को भारत सरकार के राजपत्र में अधिसूचित भी किया जा चुका है। वहीं, तीसरी प्रजाति पंत संकर चारा मक्का-3 को अधिसूचित कराने की प्रक्रिया अभी जारी है। इस तरह विश्वविद्यालय ने चारा मक्का की तीन उन्नत संकर प्रजातियां विकसित की हैं, जिनमें से दो को सरकारी स्तर पर अधिसूचना मिल चुकी है। तीसरी किस्म को भी अधिसूचित कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।

जंगली मक्का और टियोसिंटे के गुणों से किया विकास

इन उन्नत चारा मक्का प्रजातियों को विकसित करने में वैज्ञानिकों ने जंगली मक्का और टियोसिंटे के आनुवंशिक गुणों का उपयोग किया है। टियोसिंटे मक्का का जंगली संबंधी पौधा है, जिसके आनुवंशिक गुणों का उपयोग फसल सुधार के अनुसंधान में किया जाता है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का प्रयास ऐसी प्रजातियां तैयार करना रहा है, जो चारा उत्पादन के लिहाज से बेहतर विकल्प बन सकें। इन प्रजातियों के माध्यम से किसानों को गुणवत्तायुक्त पशुचारा उत्पादन के लिए नई संभावनाएं मिल सकती हैं। हालांकि, इनके उत्पादन और खेती से जुड़े व्यावहारिक परिणाम स्थानीय जलवायु, मिट्टी और कृषि प्रबंधन पर भी निर्भर करेंगे।

संकर बीज उत्पादन तकनीक विकसित करने पर काम

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अब इन प्रजातियों के संकर बीज उत्पादन की तकनीक विकसित करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। इसके साथ ही विकसित प्रजातियों को किसानों तक पहुंचाने और इनसे जुड़ी तकनीक के व्यावसायीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं। संकर बीज उत्पादन की तकनीक विकसित होने और इसके व्यावसायीकरण से इन प्रजातियों के बीज किसानों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। इससे विश्वविद्यालय में हुए अनुसंधान का लाभ खेतों तक पहुंचाने का रास्ता तैयार होगा। पशुपालक किसान अपनी जरूरत और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार इन प्रजातियों को चारा उत्पादन के विकल्प के रूप में अपना सकेंगे।

कुलपति ने मक्का अनुसंधान प्रक्षेत्र का किया निरीक्षण

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शिवेन्द्र कुमार कश्यप ने फसल अनुसंधान केन्द्र स्थित मक्का प्रजनन एवं बीज उत्पादन प्रायोगिक प्रक्षेत्र का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने वैज्ञानिकों से विकसित चारा मक्का प्रजातियों और अनुसंधान की प्रगति के बारे में जानकारी ली। उन्होंने संकर बीज उत्पादन तकनीक विकसित करने और इन प्रजातियों की तकनीक के व्यावसायीकरण से जुड़े पहलुओं पर भी वैज्ञानिकों के साथ चर्चा की। कुलपति ने शोध टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए अनुसंधान कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन दिया। साथ ही, विकसित प्रजातियों और तकनीकों को अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया।

चारा उत्पादन और पशुपालन को मिल सकता है बढ़ावा

पंतनगर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि चारा उत्पादन और पशुपालन के क्षेत्र में नए विकल्प विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हरे चारे की बेहतर उपलब्धता पशुपालकों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। इससे उन्हें पशुओं के आहार प्रबंधन में मदद मिलने के साथ चारे की व्यवस्था पर होने वाला खर्च कम करने की संभावना भी बन सकती है। हालांकि, इन किस्मों से मिलने वाले वास्तविक लाभ के लिए बीजों की उपलब्धता, क्षेत्र के अनुसार उनकी उपयुक्तता और खेती की तकनीक की जानकारी जरूरी होगी। विश्वविद्यालय की ओर से संकर बीज उत्पादन और व्यावसायीकरण पर किए जा रहे प्रयास सफल होते हैं, तो आने वाले समय में इन तीनों प्रजातियों का लाभ अधिक किसानों और पशुपालकों तक पहुंच सकता है।

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