भारत में दलहनी फसलों का खास महत्व है और उड़द (उड़द दाल) इन्हीं में से एक प्रमुख फसल है।
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उड़द को काली दाल के नाम से भी जाना जाता है, जो प्रोटीन से भरपूर होने के कारण देश की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती है। कम लागत, कम समय में तैयार होने वाली और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाली यह फसल किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी मानी जाती है।
कम पढ़ें
पानी की मात्रा
मध्यम
उर्वरक
NPK @ 8:16:16 Kg/Acre
तापमान
25 to 35 °C
पीएच वैल्यू
6.5 - 7.8
धूप की मात्रा
मध्यम
श्रम
मध्यम
कटाई
मशीन और हाथ से
खेती
हाथ से
यदि सही समय, उन्नत किस्म और वैज्ञानिक तरीकों से खेती की जाए, तो उड़द की खेती से अच्छा उत्पादन और मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।
उड़द की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसकी फसल खरीफ और जायद दोनों मौसमों में ली जा सकती है। उड़द की अच्छी बढ़वार के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल रहता है। बहुत अधिक ठंड या पाले की स्थिति में फसल को नुकसान हो सकता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निकास की उचित व्यवस्था जरूरी होती है, क्योंकि जलभराव उड़द की फसल के लिए हानिकारक है। खरीफ मौसम में उड़द की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक की जाती है। जायद फसल के लिए मार्च-अप्रैल का समय उपयुक्त रहता है।
उड़द की खेती के लिए हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। मिट्टी का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। बहुत अधिक क्षारीय या जलभराव वाली मिट्टी में इसकी खेती से बचना चाहिए। खेत की तैयारी के लिए सबसे पहले गहरी जुताई करें, जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाए। इसके बाद 2–3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर खेत को समतल कर लें। अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी हुई खाद या कंपोस्ट मिलाना फायदेमंद रहता है।
अच्छे उत्पादन के लिए उन्नत और रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन बेहद जरूरी है। अलग-अलग क्षेत्रों के लिए कुछ प्रमुख किस्में टी-9 (T-9), पंत उड़द-31, PU-35, आजाद उड़द-1, IPU-02-43 व वीबीएन-8 (VBN-8) हैं। ये किस्में कम समय में तैयार होती हैं और दाना उत्पादन अच्छा देती हैं।
उड़द की बुवाई के लिए बीज दर सामान्यतः 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। बुवाई कतारों में करना अधिक लाभकारी रहता है। कतार से कतार की दूरी 30–45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी रखें। बीज को बुवाई से पहले राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ता है।
उड़द एक दलहनी फसल है, इसलिए इसे अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी संतुलित पोषण जरूरी है। इसकी प्रति एकड़ के हिसाब से मात्रा इस प्रकार से रखी जाती है।
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पोषक तत्व / खाद |
अनुशंसित मात्रा (प्रति एकड़) |
उपयोगिता |
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गोबर की सड़ी खाद |
3–4 टन |
खेत की अंतिम जुताई के समय मिलाएं |
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नाइट्रोजन (N) |
6–8 किग्रा |
शुरुआती बढ़वार के लिए |
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फॉस्फोरस (P) |
16–20 किग्रा |
जड़ों व दाना भराव के लिए |
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पोटाश (K) |
8 किग्रा |
केवल मिट्टी में कमी होने पर |
बता दें कि फॉस्फोरस उड़द की जड़ों के विकास और फूल-फल बनने में सहायता करता है, इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें।
उड़द की फसल के शुरुआती 30–35 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान 1–2 बार निराई-गुड़ाई करें। आवश्यकता होने पर पेंडिमेथालिन जैसे खरपतवारनाशी का प्रयोग बुवाई के तुरंत बाद किया जा सकता है।
उड़द की फसल को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। खरीफ मौसम में वर्षा सामान्य हो तो अलग से सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। जायद फसल में 2–3 हल्की सिंचाई पर्याप्त रहती हैं। फूल आने और दाना भरने के समय नमी का ध्यान रखना जरूरी है। जलभराव से बचाव बहुत आवश्यक है।
उड़द की फसल में पीला मोजेक रोग, पत्ती धब्बा रोग और चूर्णिल आसिता प्रमुख रोग हैं। वहीं कीटों में सफेद मक्खी, एफिड और फली छेदक का प्रकोप देखा जाता है। रोग-कीट नियंत्रण के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें, समय-समय पर फसल का निरीक्षण करें और जैविक या अनुशंसित कीटनाशकों का संतुलित उपयोग करें।
उड़द की फसल करीब 70–90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। जब फलियां काली पड़ने लगें और पत्तियां सूखने लगें, तब कटाई करनी चाहिए। देर से कटाई करने पर फलियां फट सकती हैं और दाना गिरने का नुकसान होता है।
सामान्य तौर पर उन्नत तकनीक अपनाने पर 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
उड़द की कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाना आवश्यक होता है, ताकि नमी की मात्रा 10–12 प्रतिशत से अधिक न रहे। भंडारण से पहले साफ-सफाई कर टूटे और खराब दानों को अलग कर देना चाहिए। उड़द को सूखे, हवादार और कीट-मुक्त गोदाम में रखना चाहिए। भंडारण के लिए जूट की बोरियां या एचडीपीई बैग उपयुक्त माने जाते हैं। कीट प्रकोप से बचाव के लिए नीम की पत्ती या अनुमोदित भंडारण दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है। सही भंडारण से दानों की क्वालिटी और अंकुरण क्षमता बनी रहती है।
उड़द की खेती में खेत की तैयारी के लिए हल, कल्टीवेटर और रोटावेटर का उपयोग किया जाता है। बुवाई के लिए सीड ड्रिल या जीरो टिल सीड ड्रिल उपयोगी होती है, जिससे बीज समान गहराई पर गिरते हैं। निराई-गुड़ाई के लिए व्हील हो या कल्टीवेटर का प्रयोग किया जाता है। फसल कटाई के समय रीपर या मैनुअल कटाई दोनों विकल्प अपनाए जाते हैं। उचित इम्प्लीमेंट्स के उपयोग से समय, श्रम और लागत में कमी आती है।
उड़द की खेती के लिए 20 से 35 हॉर्सपावर श्रेणी के ट्रैक्टर पर्याप्त माने जाते हैं। छोटे और मध्यम किसान महिंद्रा, स्वराज, आयशर, मैसी फर्ग्यूसन जैसे ब्रांड के ट्रैक्टर का उपयोग कर सकते हैं। हल, रोटावेटर, सीड ड्रिल और ट्रॉली जैसे कृषि यंत्र इन ट्रैक्टरों के साथ आसानी से चलाए जा सकते हैं। कम फ्यूल खपत और आसान संचालन वाले ट्रैक्टर उड़द की खेती में अधिक उपयोगी साबित होते हैं। सही क्षमता वाला ट्रैक्टर खेती की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने में सहायता करता है।
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खरीफ मौसम में उड़द की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक की जाती है। जायद फसल के लिए मार्च से अप्रैल का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।
उड़द की खेती के लिए हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए और जलभराव से बचाव जरूरी है।
उड़द की खेती के लिए 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। कतारों में बुवाई करने से बेहतर अंकुरण और उत्पादन मिलता है।
उड़द में पीला मोजेक रोग, पत्ती धब्बा रोग आम हैं। कीटों में सफेद मक्खी, एफिड और फली छेदक का प्रकोप अधिक देखा जाता है। रोग-प्रतिरोधी किस्में और समय पर नियंत्रण जरूरी है।
उड़द की फसल सामान्यतः 70 से 90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। सही समय पर कटाई करने से दाना झड़ने का नुकसान नहीं होता।
उन्नत किस्में और वैज्ञानिक खेती अपनाने पर उड़द से 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
उड़द के दानों को 10–12% नमी तक सुखाकर, साफ और सूखे गोदाम में जूट या एचडीपीई बोरियों में रखना चाहिए। इससे कीट प्रकोप से बचाव होता है और दानों की गुणवत्ता बनी रहती है।
नहीं, उड़द एक दलहनी फसल है, इसलिए अधिक नाइट्रोजन देने से पौधों की बढ़वार तो होती है लेकिन दाना उत्पादन कम हो सकता है। संतुलित मात्रा में फॉस्फोरस और आवश्यक पोषक तत्व देना अधिक लाभकारी रहता है।
राइजोबियम कल्चर का उपयोग जरूरी तो नहीं है, लेकिन इससे जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता सुधरती है और उत्पादन में वृद्धि होती है।
उड़द की खेती कम लागत, कम सिंचाई और कम समय में तैयार होने के कारण छोटे व सीमांत किसानों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है। सही तकनीक अपनाने पर इससे अच्छा मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।