बाजरा एक प्रमुख मोटा अनाज है जिसे भारत में प्राचीन काल से उगाया जाता है। यह मुख्यतः खरीफ मौसम की फसल है, जिसे कम पानी और शुष्क जलवायु में भी सफलता से उगाया जा सकता है। बाजरे की खेती कैसे करें?
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यह जानना उन किसानों के लिए जरूरी है जो कम लागत में अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं। भारत में बाजरा की खेती विशेष रूप से राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और तमिलनाडु राज्यों में की जाती है। इनमें से राजस्थान देश में सबसे अधिक बाजरा उत्पादन करने वाला राज्य है।
कम पढ़ें
पानी की मात्रा
अधिक
उर्वरक
90 - 110 किग्रा/एकड़ नाइट्रोजन
तापमान
14 - 16 °C
पीएच वैल्यू
5.6 - 6.2
धूप की मात्रा
मध्यम
श्रम की मात्रा
कम
कटाई
मशीन और हाथ से
खेती
हाथ से
कृषि समाचार
बाजरा एक पोषक अनाज है, जिसमें प्रोटीन, फाइबर, लोहा, कैल्शियम, जिंक और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यह न केवल पोषण के लिहाज से उपयोगी है, बल्कि सूखा सहनशील फसल और कम इनपुट वाली खेती के लिए भी उपयुक्त है। बाजरा मानव आहार के साथ-साथ पशुओं के चारे और औद्योगिक उपयोग जैसे शराब और बीयर निर्माण में भी प्रयुक्त होता है। बाजरे की खेती की लागत कम आती है और मुनाफा अपेक्षाकृत अधिक होता है। वैज्ञानिक विधियों से खेती करने पर इसकी उपज में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है।
बाजरे की बुवाई का समय मुख्यतः मानसून की शुरुआत के साथ जुड़ा होता है। बाजरे की बुवाई कब करनी चाहिए, इस पर मौसम और क्षेत्र आधारित निर्णय लिया जाना चाहिए। असिंचित क्षेत्रों में बुवाई जून के अंत से लेकर जुलाई के मध्य तक करनी चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में बुवाई का उपयुक्त समय जून से अगस्त के बीच होता है। देरी से बुवाई की स्थिति में जुलाई के अंतिम सप्ताह तक बुवाई की जा सकती है, लेकिन इससे बाजरे की फसल की उपज पर असर पड़ सकता है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में रबी मौसम में भी बाजरा उगाया जाता है, जिसकी बुवाई सितंबर से अक्टूबर तक की जाती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा कई बाजरे की उन्नत किस्में विकसित की गई हैं जो सूखा सहनशील, कम अवधि में पकने वाली और रोग प्रतिरोधक किस्में हैं, जो देश के अलग– अलग क्षेत्रों में बोई जाती हैं।
बाजरे की खेती में बीज की मात्रा कितनी होनी चाहिए यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी किस्म बोई जा रही है। हाइब्रिड किस्मों में प्रति हेक्टेयर 4 से 5 किलो बीज की आवश्यकता होती है, वहीं खुले परागण वाली किस्मों के लिए यह मात्रा 8 से 10 किलो प्रति हेक्टेयर रखनी चाहिए। यदि छिटकवां विधि से बुवाई की जा रही हो, तो बीज की मात्रा 10 से 12 किलो प्रति हेक्टेयर तक रखनी चाहिए। देरी से बुवाई की स्थिति में बीज की मात्रा में 10 प्रतिशत की वृद्धि करनी चाहिए। बुवाई से पहले बीज को थिरम या कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए ताकि बीज जनित रोगों से सुरक्षा मिल सके।
बाजरे की बुवाई कैसे करें यह जानना अच्छे फसल प्रबंधन के लिए जरूरी है। बाजरे की बुवाई कतारों में करनी चाहिए ताकि फसल प्रबंधन कार्य जैसे निराई-गुड़ाई और सिंचाई आसानी से हो सके। कतार से कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 से 12 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। बीज को 3 से 5 सेंटीमीटर गहराई तक बोना चाहिए। बुवाई के लिए सीड ड्रिल, मल्टी क्रॉप प्लांटर, जीरो टिलेज मशीन या पारंपरिक हल का उपयोग किया जा सकता है। बाजरा उत्पादन कैसे बढ़ाएं, इसका जवाब अच्छी बुवाई पद्धति में छिपा है।
बाजरा की अच्छी उपज के लिए संतुलित खाद और उर्वरकों का प्रयोग बेहद आवश्यक है। बुवाई से पहले खेत में गोबर की खाद या कंपोस्ट 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों के रूप में नाइट्रोजन 60 किलोग्राम, फॉस्फोरस 40 किलोग्राम और पोटाश 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। यह जानकारी उन किसानों के लिए उपयोगी है जो बाजरे की खेती में खाद और उर्वरक की सटीक मात्रा जानना चाहते हैं।
बाजरे की फसल वर्षा आधारित होने के कारण सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। लेकिन जहां सुविधा हो वहां सिंचाई से उपज में बढ़ोतरी देखी गई है। पहली सिंचाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद कल्ले निकलने की अवस्था में करनी चाहिए। दूसरी सिंचाई फूल निकलने की अवस्था (40–45 दिन) और तीसरी सिंचाई दाना भरने की अवस्था (60–65 दिन) पर करनी चाहिए। सिंचाई करते समय जल जमाव से बचाव जरूरी होता है। यह जानकारी बाजरे की सिंचाई विधि जानने वालों के लिए काफी महत्वपूर्ण है।
बाजरे की फसल की प्रारंभिक अवस्था में खरपतवारों का नियंत्रण आवश्यक होता है। फसल बोने के 15 से 20 दिन बाद और फिर 30 से 35 दिन बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के लिए Atrazine 50 WP की 500 ग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद छिड़काव करना चाहिए। इससे चौड़ी व संकरी दोनों प्रकार की खरपतवारों पर प्रभावी नियंत्रण होता है। बाजरे की खेती में खरपतवार नियंत्रण अच्छी उपज के लिए जरूरी है।
बाजरे की फसल 75 से 90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। जब बालियां पीली पड़ जाएं और दाने कठोर हो जाएं, तब कटाई करनी चाहिए। फसल की कटाई के बाद बालियों को 4 से 5 दिन तक धूप में अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करनी चाहिए। बाजरे की कटाई कब करें यह जानना उपज को सुरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण है। बाजरे की उपज कितनी होती है तो बता दें कि सिंचित क्षेत्रों में बाजरे की उपज 25 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और असिंचित क्षेत्रों में 12 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है। बाजरा उत्पादन कैसे बढ़ाएं तो इसका जवाब है कि किसान उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक तरीकों से खेती करें, इनसे यह उपज 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक भी पहुंच सकती है।
बाजरे के दाने कैसे स्टोर करें यह किसानों के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न है। बाजरे के दानों को पूरी तरह सुखाकर ही भंडारण करना चाहिए। भंडारण से पहले अनाज में नमी की मात्रा 10 से 12% से अधिक नहीं होनी चाहिए। बाजरा भंडारण विधि में यह जरूरी है कि भंडारण स्थान को साफ करके मैलाथियान 50 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर की दर से किया जाए। अनाज को बोरियों में भरकर सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए और प्रत्येक टन अनाज पर एल्युमिनियम फास्फाइड की 2 गोलियां रखकर सील कर देना चाहिए। भंडारण के दौरान समय-समय पर अनाज का निरीक्षण करते रहना चाहिए ताकि बाजरे में कीट संक्रमण से बचा जा सके।
बाजरे की खेती के लिए कौन-कौन से कृषि यंत्र जरूरी हैं, यह सवाल अक्सर किसान पूछते हैं। बाजरे की खेती में खेत की गहरी जुताई, बुवाई, निराई-गुड़ाई, सिंचाई, कटाई और मड़ाई के लिए अलग-अलग यंत्रों का उपयोग होता है। इसके लिए ट्रैक्टर, हल, डिस्क हैरो, कल्टीवेटर, रोटावेटर, सीड ड्रिल, डिब्बलर, स्प्रिंकलर सिस्टम, ड्रिप इरिगेशन, हैंड हो, पावर वीडर, रीपर, थ्रेसर, कंबाइन हार्वेस्टर आदि बाजरा खेती के यंत्र के रूप में काम में लिए जाते हैं। ये उपकरण कम समय में अधिक कार्य क्षमता और श्रम की बचत के लिहाज से बेहद उपयोगी हैं।
बाजरा फसल के लिए ट्रैक्टर का चुनाव, किसान की जमीन, फसल क्षेत्र और बजट पर निर्भर करता है। बाजरे की खेती में महिंद्रा 575 डीआई एक्सपी प्लस, स्वराज 744 एफई, जॉन डियर 5045D 4WD, न्यू हॉलैंड 3032 एक्सटी, सोनालीका डीआई 35 जैसे ट्रैक्टर अधिक इस्तेमाल किए जाते हैं।