धान के बाद सरसों की खेती को मिलेगा बढ़ावा, DRMR 150-35 किस्म से बढ़ेगी किसानों की आय
प्रकाशित - 02 Nov 2026
by Vivek Tailang
वैज्ञानिकों ने 30 नवंबर से पहले बुवाई और फसल अवशेष प्रबंधन अपनाने की दी सलाह
छत्तीसगढ़ में धान की कटाई के बाद खेतों का बेहतर उपयोग करने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से सरसों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी क्रम में रायपुर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान में किसानों को सरसों की उन्नत किस्म DRMR 150-35 के बीज वितरित किए गए। ‘खेत बचाओ अभियान–रबी 2026’ के अंतर्गत आयोजित किसान जागरूकता एवं बीज वितरण कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को सरसों की खेती की उन्नत तकनीकों, समय पर बुवाई, उर्वरक प्रबंधन और धान के फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन की जानकारी दी।
संस्थान के अनुसार, अनुसूचित जाति उपयोजना और जनजातीय उपयोजना के लाभार्थी किसानों को वितरित किए गए बीजों से लगभग 270 एकड़ क्षेत्र में सरसों की खेती को प्रोत्साहन मिलेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि धान की कटाई के बाद उपलब्ध समय का उपयोग रबी सीजन में तिलहनी फसल की खेती के लिए किया जा सकता है। इससे खेतों का बेहतर उपयोग होने के साथ किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर भी मिलेगा।
छत्तीसगढ़ सहित इन राज्यों के लिए उपयुक्त है यह किस्म
भाकृअनुप-भारतीय रेपसीड-सरसों अनुसंधान संस्थान, भरतपुर के तकनीकी विवरण के अनुसार, DRMR 150-35 किस्म को जोन-V के लिए अनुशंसित किया गया है। इस जोन में छत्तीसगढ़ के साथ ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और असम शामिल हैं। यह किस्म वर्षा आधारित परिस्थितियों में खेती के लिए भी उपयुक्त बताई गई है। इसकी परिपक्वता अवधि 114 दिन, तेल की मात्रा 36.7 से 42.8 प्रतिशत और औसत उपज क्षमता 12 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज है।
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95 से 110 दिन में तैयार होती है सरसों की फसल
कार्यक्रम में संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने किसानों को DRMR 150-35 किस्म की विशेषताओं और खेती की वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस किस्म की फसल लगभग 95 से 110 दिनों में तैयार हो सकती है। वहीं, उपलब्ध किस्म संबंधी तकनीकी विवरण में इसकी परिपक्वता अवधि 114 दिन दर्ज है। यह भारतीय सरसों की अधिसूचित किस्म है, जिसे वर्ष 2020 में अधिसूचित किया गया था। इस किस्म में तेल की मात्रा लगभग 36.7 से 42.8 प्रतिशत तक बताई गई है। इसकी औसत उपज क्षमता 1200 से 1800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। इसे विशेष रूप से वर्षा आधारित खेती की परिस्थितियों के लिए भी उपयुक्त किस्म के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। छत्तीसगढ़ सहित ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और असम इसके लिए अनुशंसित जोन-V में शामिल हैं।
30 नवंबर से पहले बुवाई करने की सलाह
डॉ. शर्मा ने किसानों को सरसों की समय पर बुवाई करने, विशेष रूप से 30 नवंबर से पहले फसल की बोआई पूरी करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सही समय पर बुवाई और वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन करने पर लगभग 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए किसानों को बीज की उचित मात्रा, कतारों के बीच सही दूरी, संतुलित उर्वरक उपयोग और जरूरत के अनुसार सिंचाई का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि सरसों सीमित सिंचाई में भी उत्पादन देने वाली महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। ऐसे में धान की कटाई के बाद खेत में उपलब्ध नमी और समय का बेहतर उपयोग कर किसान रबी सीजन में इसकी खेती कर सकते हैं। हालांकि, वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, बुवाई के समय और फसल प्रबंधन पर निर्भर करेगा।
धान के अवशेष जलाने के बजाय करें उचित प्रबंधन
वैज्ञानिकों ने किसानों को धान की कटाई के बाद खेत में बचे फसल अवशेषों को जलाने से बचने की सलाह दी। डॉ. शर्मा ने कहा कि मल्चर जैसे कृषि यंत्रों की मदद से अवशेषों को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में मिलाया जा सकता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने, उसकी संरचना सुधारने और उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। उन्होंने किसानों को समय पर धान की कटाई, खेत की उचित तैयारी और रबी सीजन में दलहनी एवं तिलहनी फसलों को अपनाने के लिए भी प्रेरित किया। इससे फसल चक्र में विविधता लाने और मिट्टी की सेहत बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
मिट्टी की सेहत और खेती की लागत पर जोर
संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि खेत बचाओ अभियान का मुख्य उद्देश्य खेतों को स्वस्थ एवं उपजाऊ बनाए रखना, मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण करना और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना है। उन्होंने किसानों से फसल अवशेष प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग और प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग कर किसान खेती की लागत कम करने के साथ उत्पादन को अधिक लाभकारी बना सकते हैं। कार्यक्रम में महिला एवं पुरुष किसानों के साथ जनप्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. के.सी. शर्मा और डॉ. प्रियंका मीना ने किया।
“सरसों की DRMR 150-35 किस्म” के संबंध में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब (FAQ):
प्रश्न 1. सरसों की DRMR 150-35 किस्म कितने दिनों में पककर तैयार होती है?
उत्तर: भाकृअनुप-भारतीय रेपसीड-सरसों अनुसंधान संस्थान के तकनीकी विवरण के अनुसार, DRMR 150-35 किस्म की परिपक्वता अवधि लगभग 114 दिन है।
प्रश्न 2. DRMR 150-35 सरसों की किस्म की औसत उपज कितनी है?
उत्तर: इस किस्म की औसत उपज क्षमता 1200 से 1800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर यानी 12 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है।
प्रश्न 3. DRMR 150-35 सरसों में तेल की मात्रा कितनी होती है?
उत्तर: इस किस्म में तेल की मात्रा लगभग 36.7 से 42.8 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।
प्रश्न 4. DRMR 150-35 सरसों की किस्म किन राज्यों के लिए अनुशंसित है?
उत्तर: यह किस्म जोन-V के लिए अनुशंसित है। इसमें छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और असम शामिल हैं।
प्रश्न 5. सरसों की DRMR 150-35 किस्म की बुवाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: रायपुर में आयोजित किसान जागरूकता कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को 30 नवंबर से पहले सरसों की बुवाई पूरी करने की सलाह दी।
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