मौसमी सब्जियों की खेती से आत्मनिर्भर बनीं महिला किसान रेखा सिंह
प्रकाशित - 23 Dec 2025 by Tractor Junction
कम लागत में सब्जी उत्पादन कर हर महीने हजारों रुपये की कर रही हैं कमाई
ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण की जब भी बात होती है, तो ऐसी कहानियां सामने आती हैं जो यह साबित करती हैं कि सही मार्गदर्शन, थोड़े संसाधन और मजबूत इच्छाशक्ति से महिलाएं अपनी किस्मत खुद लिख सकती हैं। मध्यप्रदेश के विकासखण्ड रीठी के ग्राम हरद्वारा की रहने वाली महिला किसान रेखा सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिन्होंने मौसमी सब्जियों की खेती और छोटे व्यवसाय के सहारे न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारी, बल्कि आत्मनिर्भरता की एक मिसाल भी कायम की।
अक्सर रहती थी आर्थिक तंगी
रेखा सिंह अपने पति जयपाल सिंह और तीन बच्चों के साथ सामान्य ग्रामीण जीवन जी रही थीं। सीमित आय और बढ़ती पारिवारिक जरूरतों के कारण अक्सर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता था। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और भविष्य की चिंता उनके लिए बड़ी चुनौती थी। ऐसे हालात में साल 2020 में उन्होंने गांव की ‘कृष्णा स्व-सहायता समूह’ से जुड़ने का निर्णय लिया, जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
स्व–सहायता समूह से मिली नई दिशा
स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद रेखा ने केवल बचत और लेन-देन तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि कुछ अलग और बेहतर करने की ठान ली। समूह के माध्यम से उन्हें 50 हजार रुपये का ऋण मिला। इस राशि का उन्होंने बहुत ही समझदारी से उपयोग किया। रेखा ने 30 हजार रुपये से अपनी ज़मीन पर मौसमी सब्जियों की खेती शुरू की। उन्होंने भिंडी, लौकी, टमाटर, मिर्च जैसी सब्जियां उगाईं, जिनकी स्थानीय बाजार में अच्छी मांग रहती है।
बाजार में बेचनी शुरू की सब्जियां
कम लागत में सब्जी उत्पादन कर रेखा ने पास के बाजार में सब्जियां बेचनी शुरू कीं। ताजी और गुणवत्तापूर्ण सब्जियों के कारण उन्हें जल्दी ग्राहक मिलने लगे और नियमित आय का स्रोत बन गया। खेती के साथ-साथ उन्होंने शेष 20 हजार रुपये से गांव में ही एक छोटी किराना दुकान भी खोल ली। इससे न केवल गांववासियों को रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुएं पास में मिलने लगीं, बल्कि रेखा की आय में भी निरंतर वृद्धि होने लगी।
ईमानदारी व लगन का दिखा असर
रेखा सिंह की मेहनत, ईमानदारी और लगन का असर जल्द ही दिखाई देने लगा। सब्जी खेती और किराना दुकान– दोनों व्यवसाय धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने समय पर 30 हजार रुपये की ऋण राशि ब्याज सहित वापस कर दी, जिससे उन्होंने अपनी विश्वसनीयता साबित की और स्व-सहायता समूह के वित्तीय अनुशासन का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया।
गांव में बनाई अपनी पहचान
व्यवसाय में सफलता के साथ रेखा की पहचान गांव में एक जिम्मेदार और आत्मनिर्भर महिला के रूप में बनने लगी। इसी का परिणाम रहा कि उन्हें गांव की उचित मूल्य दुकान (राशन दुकान) के संचालन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। उचित मूल्य दुकान के सफल संचालन से उन्हें अतिरिक्त आय तो मिली ही, साथ ही गांव में उनका सामाजिक सम्मान भी काफी बढ़ गया। आज रेखा सिंह हर महीने करीब 11 हजार रुपए की नियमित आय अर्जित कर रही हैं। इस आय से वह अपने बच्चों की शिक्षा, घर-परिवार के खर्च और भविष्य के लिए बचत भी कर पा रही हैं। आर्थिक मजबूती के साथ-साथ अब उनमें आत्मविश्वास भी साफ झलकता है।
स्व–सहायता समूह से सीखा आत्मनिर्भरता का पाठ
रेखा सिंह का कहना है कि स्व-सहायता समूह से जुड़ने से उन्हें सिर्फ आर्थिक लाभ ही नहीं मिला, बल्कि उन्होंने आत्मनिर्भर बनना सीखा। आज वे खुद निर्णय लेती हैं, अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने की योजना बनाती हैं और अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। रेखा सिंह की यह सफलता कहानी उन सभी ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ नया करना चाहती हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि मौसमी सब्जियों की खेती, छोटे व्यवसाय और स्व-सहायता समूहों का सहयोग मिलकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का मजबूत आधार बन सकता है।
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