ईरान में बढ़ते तनाव का वैश्विक व्यापार पर असर, बासमती चावल पर दबाव
प्रकाशित - 03 Mar 2026 by Vivek Tailang
तय कीमत वाले निर्यात अनुबंधों में नुकसान की आशंका
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक व्यापार पर साफ दिखाई देने लगा है। इसका सीधा प्रभाव भारत के चावल निर्यात क्षेत्र, विशेषकर बासमती चावल व्यापार, पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ईरान, सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और यमन जैसे देशों पर भारतीय बासमती निर्यात की बड़ी निर्भरता है। ऐसे में यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है या कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है, तो मालभाड़ा, बीमा और आपूर्ति शृंखला पर गंभीर असर पड़ सकता है।
ईरान और खाड़ी क्षेत्र में बिगड़ती स्थिति पर सतर्कता बरतने की सलाह
इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (Indian Rice Exporters Association) ने अपने सदस्यों के लिए महत्वपूर्ण परामर्श जारी किया है। महासंघ ने ईरान और खाड़ी क्षेत्र में बिगड़ती स्थिति को देखते हुए निर्यातकों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है। महासंघ का कहना है कि ईरान के इस्लामी गणराज्य और आसपास के क्षेत्रों में तनाव बढ़ने तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बाधित होने की आशंका को हल्के में नहीं लिया जा सकता। महासंघ ने स्पष्ट रूप से सलाह दी है कि प्रभावित गंतव्यों के लिए नए लागत, बीमा और भाड़ा (CIF) आधारित अनुबंध फिलहाल न किए जाएं। जहां संभव हो, निर्यातक सौदे ‘जहाज पर सुपुर्दगी’ (FOB) शर्तों पर करें, ताकि मालभाड़ा, बीमा और परिवहन से जुड़े जोखिम अंतरराष्ट्रीय खरीदार के जिम्मे रहें। इससे निर्यातकों को अचानक बढ़ने वाली लागत से बचाव मिल सकता है।
जहाजी फ्यूल की कीमतों पर पड़ सकता है असर
महासंघ के अनुसार ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की स्थिति का सीधा असर जहाजी फ्यूल की कीमतों पर पड़ सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है तो कंटेनर और थोक मालवाहक जहाजों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इससे मालभाड़ा दरों और समुद्री बीमा प्रीमियम में अचानक वृद्धि संभव है। ऐसी स्थिति में पहले से तय कीमत पर किए गए निर्यात अनुबंधों में नुकसान की आशंका बढ़ जाती है, क्योंकि बढ़ी हुई लागत का भार निर्यातकों को स्वयं वहन करना पड़ सकता है। महासंघ ने निर्यातकों को नए आदेश लेते समय संयम बरतने और बिना जोखिम सुरक्षा के खुले अनुबंधों से बचने की सलाह दी है। विशेष रूप से तय कीमत वाले दीर्घकालिक अनुबंधों को लेकर सावधानी बरतने को कहा गया है।
बासमती चावल निर्यात स्थिति
आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत का चावल निर्यात मुख्य रूप से मध्य पूर्व और अफ्रीका के देशों में केंद्रित है। अप्रैल से दिसंबर 2025 की अवधि में बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार मध्य पूर्व रहा, जहां 32,05,925 मीट्रिक टन निर्यात हुआ, जिसकी कीमत 23,771.39 करोड़ रुपये रही। इस क्षेत्र में औसत निर्यात दर 74,148 रुपये प्रति मीट्रिक टन दर्ज की गई। इसके मुकाबले अफ्रीका में 3,21,324 मीट्रिक टन बासमती निर्यात हुआ, जिसकी कीमत 2,375.35 करोड़ रुपये रही। इससे स्पष्ट है कि मात्रा के साथ-साथ मूल्य के लिहाज से भी मध्य पूर्व अत्यंत महत्वपूर्ण बाजार है। वहीं गैर-बासमती चावल के मामले में स्थिति अलग है। अप्रैल–दिसंबर 2025 के दौरान अफ्रीका में 68,34,005 मीट्रिक टन गैर-बासमती चावल का निर्यात हुआ, जो मात्रा के आधार पर सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि औसत दर मध्य पूर्व की तुलना में कम रही। कुल चावल निर्यात के आंकड़े बताते हैं कि जहां अफ्रीका मात्रा के आधार पर बड़ा बाजार है, वहीं मध्य पूर्व उच्च औसत दरों के कारण मूल्य की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है।
इन पांच देशों में होता है 50 प्रतिशत से ज्यादा बासमती का निर्यात
मध्य पूर्व के पांच प्रमुख बासमती गंतव्य सऊदी अरब, ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और यमन भारत के कुल बासमती निर्यात का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। केवल सऊदी अरब में 7,66,382 मीट्रिक टन बासमती निर्यात हुआ, जबकि ईरान में 6,81,436 मीट्रिक टन की आपूर्ति की गई। इन आंकड़ों से क्षेत्रीय निर्भरता का स्पष्ट संकेत मिलता है।
बासमती चावल की कीमतों में उतार–चढ़ाव संभव
पिछले एक माह में बासमती के थोक मूल्यों में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। ईरान जैसे प्रमुख बाजार में अनिश्चितता के कारण आने वाले समय में कीमतों में और उतार-चढ़ाव संभव है। महासंघ ने कहा है कि वह स्थिति पर लगातार निगरानी रखे हुए है और जिन निर्यातकों का माल मार्ग में है या गंतव्य बंदरगाहों पर लंबित है, उनके साथ संपर्क में है। परिस्थितियों के अनुसार आगे भी आवश्यक परामर्श जारी किए जाएंगे।
निर्यातकों के लिए सावधानी व रणनीतिक निर्णय जरूरी
इस समय जो स्थिति बन रही है उससे स्पष्ट है कि यदि क्षेत्रीय तनाव लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल बासमती व्यापार ही नहीं, बल्कि समूचे वैश्विक खाद्य व्यापार पर पड़ सकता है। ऐसे में निर्यातकों के लिए सावधानी और रणनीतिक निर्णय बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं।
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