गिर ने 27 तो साहीवाल गाय ने 23 किलो दूध देकर बनाया रिकॉर्ड
प्रकाशित - 09 Mar 2026 by Vivek Tailang
लुधियाना में मिल्किंग कॉम्पिटिशन का आयोजन, जानें गिर व साहीवाल गाय की खासियत और कीमत
आमतौर पर यह माना जाता है कि देसी नस्ल की गायें विदेशी नस्लों की तुलना में कम दूध देती हैं। कई पशुपालकों का मानना है कि देसी नस्ल की गायें औसतन 8 से 10 किलो तक ही दूध देती हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में पशुपालक जर्सी और होल्स्टीन फ्रिजियन (HF) जैसी विदेशी नस्ल की गायों को पालना ज्यादा पसंद करते हैं।
लेकिन हाल ही में आयोजित एक मिल्किंग कॉम्पिटिशन में देसी नस्ल की गायों ने इस धारणा को बदल दिया है। प्रतियोगिता में गिर और साहीवाल नस्ल की गायों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 20 किलो से अधिक दूध उत्पादन कर नया रिकॉर्ड बनाया है। इससे यह साबित हुआ है कि सही देखभाल, पोषण और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए देसी नस्ल की गायें भी उच्च दूध उत्पादन करने में सक्षम हैं।
मिल्किंग कॉम्पिटिशन का आयोजन
हाल ही में NDDB डेयरी सर्विसेज की ओर से “रंगीलो मिल्किंग कॉम्पिटिशन” का आयोजन किया गया। यह संस्था नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के स्वामित्व वाली इकाई है। यह प्रतियोगिता श्री करण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर (राजस्थान) में आयोजित की गई, जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से पशुपालकों ने भाग लिया। दो दिन तक चले इस कार्यक्रम में विभिन्न नस्लों की गायों और भैंसों के दूध उत्पादन को वैज्ञानिक तरीके से मापा गया। इस प्रतियोगिता में होल्स्टीन फ्रिजियन (HF) नस्ल की गाय ने सबसे अधिक 65 किलो दूध देकर नया रिकॉर्ड बनाया।
देसी नस्ल की गायों ने भी किया शानदार प्रदर्शन
मिल्किंग कॉम्पिटिशन में देसी नस्ल की कई गायों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। खास तौर पर राजस्थान के अजमेर जिले के डेयरी किसान मुकेश कुमार चौधरी की गिर नस्ल की गाय ने 26.78 किलो दूध देकर नया बेंचमार्क स्थापित किया। इसके अलावा साहीवाल नस्ल की गाय ने करीब 23 किलो दूध उत्पादन किया। अन्य नस्लों की बात करें तो थारपारकर गाय ने 14 किलो, राठी गाय ने 18 किलो और जर्सी गाय ने 37 किलो दूध देकर अच्छा प्रदर्शन किया। भैंसों की श्रेणी में मुर्रा भैंस ने करीब 23 किलो दूध उत्पादन कर सबसे अधिक दूध देने का रिकॉर्ड बनाया।
वैज्ञानिक तरीके से की गई रिकॉर्डिंग
इस प्रतियोगिता की खास बात यह रही कि दूध उत्पादन की रिकॉर्डिंग पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से की गई। आयोजकों ने दूध मापने की प्रक्रिया को तीन अलग-अलग वैज्ञानिक चरणों में पूरा किया। इससे दूध उत्पादन के आंकड़ों में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रही। इस प्रक्रिया से पशुपालकों को अपने पशुओं की वास्तविक उत्पादन क्षमता को समझने का मौका मिला।
किसानों का बढ़ता है आत्मविश्वास
इस मौके पर एनडीडीबी (NDDB) के चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह ने कहा कि “रंगीलो सिर्फ एक प्रतियोगिता या प्रदर्शनी नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक पहल है।” उन्होंने बताया कि जब दूध उत्पादन को पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से रिकॉर्ड किया जाता है, तो इससे किसानों का आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही पशुपालक अपने पशुओं की असली क्षमता को समझकर बेहतर प्रबंधन और पोषण की योजना बना सकते हैं।
देसी नस्लों को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की प्रतियोगिताओं से देसी नस्ल की गायों को बढ़ावा मिलेगा। भारत में गिर, साहीवाल, राठी और थारपारकर जैसी कई उत्कृष्ट देसी नस्लें मौजूद हैं, जो सही देखभाल और पोषण मिलने पर अच्छा दूध उत्पादन कर सकती हैं। इन नस्लों की एक खासियत यह भी है कि ये भारतीय जलवायु में आसानी से ढल जाती हैं और इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी काफी अच्छी होती है। ऐसे में मिल्किंग कॉम्पिटिशन जैसे आयोजन पशुपालकों को नई जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें बेहतर नस्लों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करते हैं। इससे डेयरी सेक्टर में उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों की आय में भी सुधार होने की उम्मीद है।
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