गर्मी के मौसम में पशुओं को बीमारी से बचाएं, इन उपायों को अपनाएं

Published - 21 May 2020

गर्मी के मौसम में पशुओं को बीमारी से बचाएं, इन उपायों को अपनाएं

गर्मियों के मौसम में पशुओं का स्वास्थ्य

ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का स्वागत है। इस साल कोरोना लॉकडाउन के कारण पशुओं के दूध का भाव अन्य सालों की अपेक्षा कम है। कोरोना संक्रमण के कारण डेयरी उद्योग को नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन उम्मीद कायम है कि कोरोना संक्रमण काल खत्म होने पर पशुओं का दूध फिर महंगे दामों पर बिकेगा और पशुपालकों और किसानों की आमदनी में इजाफा होगा। इस मई माह के दूसरे पखवाड़े में भीषण गर्मी का दौर शुरू हो चुका है। अब पशुपालकों को दुधारू पशुओं का विशेष ध्यान रखना होगा। पशुपालकों को यह प्रयास करना चाहिए कि उनके पशु बीमार नहीं पड़े। आज हम ट्रैक्टर जंक्शन के माध्यम से कुछ विशेष बातों को जानते हैं जिनसे पशुओं का स्वास्थ्य गर्मी के मौसम में भी बेहतर रहेगा।

 

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गर्मी के मौसम में पशुओं में होने वाली प्रमुख बीमारियां

गर्मी के मौसम में पशुओं के बीमार होने की आशंका बढ़ जाती है। लेकिन यदि देखरेख व खान-पान संबंधी कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखा जाए तो गर्मी में पशु को बीमार होने से बचाया जा सकता है। साथ ही अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। गर्मी के मौसम में पशुओं में लू, अपच व थनैला जैसे रोग हो जाते हैं।

 

 

पशुओं में लू रोग लगने के कारण

  • गर्मियों में जब तापमान बहुत अधिक हो जाता है तथा वातावरण में नमी अधिक बढ़ जाती है जिससे पशु को लू लगने का खतरा बढ़ जाता है।
  • अधिक मोटे पशु व कमजोर पशु लू के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं।
  • ज्यादा बालों वाले या गहरे रंग के पशु को लू लगने का खतरा ज्यादा होता है।
  • यदि बाड़े में बहुत सारे पशु रखे जाएं तो भी लू लगने की आशंका बढ़ जाती है।
  • यदि पशु के रहने के स्थान में हवा की निकासी की व्यवस्था ठीक न हो तो पशु लू का शिकार हो सकता है।

पशुओं में लू लगने के लक्षण

  • शरीर का तापमान बढ़ जाना।
  • पशु का बेचैन हो जाना।
  • पशु में पसीने व लार का स्त्रावण बढ़ जाता है।
  • पशु भोजन लेना कम कर देता है या बंद कर देते हैं।
  • पशु का अत्यधिक पानी पीना एवं ठंडे स्थान की तलाश।
  • पशु का दूध उत्पादन कम हो जाता है।

लू लगने पर उपचार

  • पशु को दाना कम एवं रसदार चारा अधिक देना चाहिए।
  • पशु को आराम करने देना चाहिए।
  • पशु चिकित्सक की सहायता से ग्लूकोज नसों में चढ़वाएं।
  • गर्मियों में पशु को हर्बल दवा (रेस्टोबल) की 50 मिली मात्रा दिन में दो बार उपलब्ध करवानी चाहिए।
  • पशु को बर्फ के टुकड़े चाटने के लिस उपलब्ध करवाएं।
  • पशु को हवा के सीधे संपर्क से बचाना चाहिए।
  • पशुओं को ठंडा पानी समय-समय पर पीने के लिए उपलब्ध कराना चाहिए।
  • पशुओं को दिन में नहलाना चाहिए। खासतौर पर भैंस को ठंडे पानी से नहलाना चाहिए।

 

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पशुओं में अपच रोग

गर्मियों में अधिकतर पशु चारा खाना कम कर देते हैं। खाने में अरूचि दिखाता है तो पशुओं को बदहजमी हो जाती है। इस समय पशु को पौष्टिक आहार नहीं देने पर अपच व कब्ज की संभावना होती है।

अपच रोग के कारण

अधिक गर्मी होने पर कई बार पशु मुंह खोलकर सांस लेता है जिससे उसकी लार  बाहर निकलती रहती है। साथ में जब पशु शरीर को ठंडा रखने हेतु शरीर को चाटता है जिससे शरीर की लार कम हो जाती है। एक स्वस्थ पशु में प्रतिदिन 100-150 लीटर लार का स्त्रवण होता है जो रूमेन में जाकर चारे को पचाने में मदद करती है। लार के बाहर निकल जाने पर चारे का पाचन प्रभावित होता है। जिससे गर्मियों में अधिकतर पशु अपच का शिकार हो जाता है।

अपच रोग के लक्षण

  • पशु का कम राशन लेना या बिल्कुल बंद कर देना।
  • पशु का सुस्त हो जाना। गोबर में दाने आना। उत्पादन का प्रभावित होना।

अपच रोग से बचाव के लक्षण

  • पशु को हर्बल दवा रूचामैक्स की 1.5 ग्राम मात्रा दिन में दो बार 2-3 दिनों तक देनी चाहिए।
  • पशु को उसकी इच्छानुसार स्वादिष्ट राशन उपलब्ध करवाएं।
  • यदि 1-2 दिन बाद भी पशु राशन लेना न शुरू करें तो पशु चिकित्सक की मदद लेकर उचित उपचार करवाना चाहिए।
  • आजकल पशुपालकों के पास भूसा अधिक होने से वह अपने पशुओं को भूसा बहुतायत में देते हैं। ऐसे में पशुओं का हाजमा दुरुस्त रखने एवं उत्पादन बनाए रखने के लिए पशु को रूचामैक्स की 15 ग्राम मात्रा दिन में दो बार 7 दिनों तक देनी चाहिए। इससे पशु का हाजमा दुरुस्त होगा और दुग्ध उत्पादन भी बढ़ता है।

पशुओं में थनैला रोग 

यह थनैला रोग की वह अवस्था होती है जो बिना ब्याहे पशु में हो जाती है। अक्सर बाड़े में सफाई का उचित प्रबंध न होने, ब्राह्य परजीवियों के संक्रमण, पशु के शरीर पर फोड़े-फुंसियां होने व गर्मी में होने वाले तनाव से भी थानैले की संभावना ज्यादा हो जाती है। ग्रीष्मकालीन थनैला रोग की जांच जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा होता है। अत: पशु-पालकों को दूध की जांच नियमित रूप से हर दो सप्ताह में मैस्ट्रिप से करनी चाहिए।

 

 

थनैला रोग के लक्षण

  • पशुओं के शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
  • अयन का सूज जाना या उसमें कड़ापन आ जाना।
  • थनों में गंदा बदबूदार पदार्थ निकलना।
  • कभी-कभी थनों से खून आता है।

थनैला से बचाव

ब्यांत के बाद जब पशु दूध देना बंद करता है उस समय पशु चिकित्सक की सहायता से थनों में एंटीबायोटिक दवाएं डाली जाती है जिसे ड्राई अंदर थैरेपी कहते हैं।

थनैला का उपचार

  • ग्रीष्मकालीन थनैला अपनी शुरुआती अवस्था में है तो थनों को दूध निकालने के बाद साफ पानी से धोकर दिन में दो बार मैस्ट्रिप क्रीम का लेप प्रभावित तथा अप्रभावित दोनों थनों पर जरूर करें तथा युनिसैलिट का 15 दिनों तक प्रयोग करें।
  • ग्रीष्मकालीन थनैला को अपने उग्रअवस्था में होने पर पशु चिकित्सक की परामर्श इस एंटीबायोटिक दवाओं के साथ मैस्तिलेप का उपयोग करें।
  • ग्रीष्मकालीन में पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु युनिसेलिट की 15 ग्राम मात्रा ब्यांत के 15 दिन के पहले शुरू करके लगातार 15 दिनों तक देनी चाहिए। इस प्रकार ब्यांत के बाद पशुओं में होने वाले थनैला रोग की संभावना कम हो जाती है।

 

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