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Queen Of Indian Tractor Industry Mallika Srinivasan (CEO TAFE)

Queen Of Indian Tractor Industry Mallika Srinivasan (CEO TAFE)

01 November, 2016 Total Views 2450

Mallika Srinivasan, chairman and CEO of TAFE tractors in India is known as the Queen of Tractor industry in India.

 The 27-year-old took over the reins of the company -tractor and Farm Equipment (TAFE) is South India Amlgemeshn Group company. -chennai The introduction of the group in 1945 was S Ramakrishnann. A son of the daughter of Shivaselm -mallika Srinivasan Ramakrishnan. Mallika-e in 1984 at the behest of Shivaselm steered TAFE. -us Time for TAFE Fergusn Massey of England assembled in India and used to sell only one model

Customer Care at TAFE combat -us first company to run the Ford of England, Poland was Usrs and Indian giants like HMT. - The companies of every segment manufactures and TAFE Tractors used to sell only one model in India. Mallika summon the priority service in its brand. TAFE customer care center opened in the country. - At that time it was not so comfortable, but at the present time, the company did better Response .

In 1991 saved per Prodktsn dealers in India in the early 90s, M & M, Punjab Tractors and its model series were already emerged as the big brands. -1990-91 Tractor industry in the recession could also not escape the arrest. However, this change was round .

-All Companies selling tractor began to put pressure on their dealers, but Mallika TAFE or stream it went in reverse. -They Prodktsn saving by reducing dealers face this downturn. -The Move the dealer shift came at TAFE as big market penetration of TAFE in northern India became known .

Is today the world's third largest tractor company TAFE -2000 approached 39 to 59 horsepower segment in Tractors was the big name. But now the landscape was changing. -per Peasant farmers from agricultural land decreases emphasis on small, low powered Tactors was thought to be. But, In 2005, the owner Siddharth Mallika Oyashr selling red tractor unit taking slammed bought it. That it was the experience of making small tractors to TAFE and Germany and deeper penetration into the core of the company, became Europe Nathe. -iske Agko of the US company to invest heavily after the company became the world's third largest tractor company .

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मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में.

मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में.

जायद फसल मूंग की जानकारी ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का स्वागत है। सभी किसान भाई जानते हैं कि देश में इस समय रबी फसल की कटाई चल रही है। नवसवंत् से पहले सभी खेतों में रबी की फसल काटी जा चुकी होगी। रबी की फसल की कटाई के तुरंत बाद किसान भाई खेत में ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल उगाकर कमाई कर सकते हैं। रबी की फसल के तुरंत बाद खेत में दलहनी फसल मूंग की बुवाई करने से मिट्टी की उर्वरा क्षमता में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में स्थित ग्रंथियों में वातावरण से नाइट्रोजन को मृदा में स्थापित करने वाले सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं। इस नाइट्रोजन का प्रयोग मूंग के बाद बोई जाने वाली फसल द्वारा किया जाता है। यह भी पढ़ें : जानें चंदन की खेती कैसे करें भारत मे खरीफ मूंग की खेती / ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती भारत में मूंग एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दालों में से एक है। मूंग गर्मी और खरीफ दोनों मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। ग्रीष्म मूंग की खेती गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू, जौ, अलसी आदि फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में की जा सकती है। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान प्रमुख ग्रीष्म मूंग उत्पादक राज्य है। गेहूं-धान फसल चक्र वाले क्षेत्रों में जायद मूंग की खेती द्वारा मिट्टी उर्वरता को उच्च स्तर पर बनाए रखा जा सकता है। मूंग से नमकीन, पापड़ तथा मंगौड़ी जैसे स्वादिष्ट उत्पाद भी बनाए जाते हैं। इसके अलावा मूंग की हरी फलियों को सब्जी के रूप में बेचकर किसान अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। किसान भाई इसकी एक एकड़ जमीन से 30 हजार रुपए तक की कमाई कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ मूंग की बुवाई का समय/जुताई ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई 15 मार्च से 15 अप्रैल तक करनी चाहिए। जिन किसान भाइयों के पास सिंचाई की सुविधा है वे फरवरी के अंतिम सप्ताह से भी बुवाई शुरू कर सकते हैं। बसंतकालीन मूंग बुवाई मार्च के प्रथम पखवाड़े में करनी चाहिए। खरीफ मूंग की बुवाई का उपयुक्त समय जून के द्वितीय पखवाड़े से जुलाई के प्रथम पखवाड़े के मध्य है। बोनी में देरी होने पर फूल आते समय तापमान में वृद्धि के कारण फलियां कम बनती है या बनती ही नहीं है,इससे इसकी पैदावार प्रभावित होती है। मूंग की फसल के लिए खेत तैयार करना रबी फसल की कटाई के तुरंत मूंग की बुआई करनी है तो पहले खेतों की गहरी जुताई करें। इसके बाद एक जुताई कल्टीवेटर तथा देशी हल से कर भलीभांति पाटा लगा देना चाहिए, ताकि खेत समतल हो जाए और नमी बनी रहे। दीमक को रोकने के लिए 2 प्रतिशत क्लोरोपाइरीफॉस की धूल 8-10 कि.ग्रा./एकड़ की दर से खेत की अंतिम जुताई से पूर्व खेत में मिलानी चाहिए। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती मूंग की खेती में बीज जायद के सीजन में अधिक गर्मी व तेज हवाओं के कारण पौधों की मृत्युदर अधिक रहती है। अत: खरीफ की अपेक्षा ग्रीष्मकालीन मूंग में बीज की मात्रा 10-12 किग्रा/एकड़ रखें। मूंग की खेती में बीजोपचार बुवाई के समय फफूंदनाशक दवा (थीरम या कार्बेन्डाजिम) से 2 ग्राम/कि.ग्रा. की दर से बीजों को शोधित करें। इसके अलावा राइजोबियम और पी.एस.बी. कल्चर से (250 ग्राम) बीज शोधन अवश्य करें। 10-12 किलोग्राम बीज के लिए यह पर्याप्त है। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम मूंग की प्रमुख प्रजातियां/ मूंग की नई किस्म मूंग की प्रमुख प्रजातियों में सम्राट, एचएमयू 16, पंत मूंग-1, पूजा वैशाखी, टाइप-44, पी.डी.एम.-11, पी.डी.एम.-5, पी.डी.एम.-8, मेहा, के. 851 आदि है। मूंग की खेती में खाद एवं उर्वरक दलहनी फसल होने के कारण मूंग को अन्य खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा नाइट्रोजन की कम आवश्यकता होती है। जड़ों के विकास के लिए 20 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फास्फोरस तथा 20 किग्रा पोटाश प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए। मूंग की फसल में सिंचाई / मूंग का पौधा में सिंचाई जायद ऋतु में मूंग के लिए गहरा पलेवा करके अच्छी नमी में बुवाई करें। पहली सिंचाई 10-15 दिनों में करें। इसके बाद 10-12 दिनों के अंतराल में सिंचाई करें। इस प्रकारकुल 3 से 5 सिंचाइयां करें। यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शाखा निकलते समय, फूल आने की अवस्था तथा फलियां बनने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले मूंग की फलियों की तुड़ाई और कटाई मूंग की फलियां जब 50 प्रतिशत तक पक जाएं तो फलियों की तुड़ाई करनी चाहिए। दूसरी बार संपूर्ण फलियों को पकने पर तोडऩा चाहिए। फसल अवशेष पर रोटावेटर चलाकर भूमि में मिला दें ताकि पौधे हरी खाद का काम करें। इससे मृदा में 25 से 30 किग्राम प्रति हैक्टेयर नाइट्रोजन की पूर्ति आगामी फसल के लिए हो जाती है। मूंग की खेती में खरपतवार नियंत्रण निराई-गुड़ाई Ñ मूंग के पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए खेत को खरपतवार रहित रखना अति आवश्यक है। इसके लिए पहली सिंचाई के बाद खुरपी द्वारा निराई आवश्यक है। रासायनिनक विधि द्वारा 300 मिली प्रति एकड़ इमाजाथाईपर 10 प्रतिशत एसएल की दर से बुआई के 15-20 दिनों बाद पानी में घोलकर खेत में छिडक़ाव करें। मूंग की फसल में रोग एवं कीटों का प्रकोप ग्रीष्मकाल में कड़ी धूप व अधिक तापमान रहने से मूंग की फसल में रोगों व कीटों का प्रकोप कम होता है। फिर भी मुख्य कीट जैसे माहू, जैडिस, सफेद मक्खी, टिड्डे आदि से फसल को बचाने के लिए 15-20 दिनों बाद 8-10 किग्रा प्रति एकड़ क्लोरोपाइरीफॉस 2 प्रतिशत या मैथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत की धूल का पौधों पर बुरकाव करें। पीले पत्ते के रोग से प्रभावित पौधों को उखाडक़र जला दें या रासाायनिक विधि के अंतर्गत 100 ग्राम थियोमेथाक्सास का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर रखे में छिडक़ाव करें। मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए क्या करें? स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें। सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर पैदावार कम हो जाती है। किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें। बीज उपचार अवश्य करें जिससे पौधो को बीज और मिटटी जनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में प्रभावित होने से बचाया जा सके। मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वराशक्ति बनी रहती है, जो अधिक उत्पादन के लिए जरूरी है। खरीफ मौसम में मेड नाली पद्धति से बुवाई करें समय पर खरपतवारों नियंत्रण और कीट और रोग रोकथाम करें। पीला मोजेक रोग रोधी किस्मों का चुनाव क्षेत्र की अनुकूलता के अनुसार करें। पौध संरक्षण के लिये एकीकृत पौध संरक्षण के उपायों को अपनाना चाहिए। यह भी पढ़ें : हरियाणा पशु किसान क्रेडिट कार्ड योजना 2020 मूंग की फसल में सरकारी सहायता भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा फसल उत्पादन (जुताई, खाद, बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशी, सिंचाई के साधनों), कृषि यंत्रों, भंडारण इत्यादि हेतु दी जाने वाली सुविधाओं/अनुदान सहायता /लाभ की जानकारी के लिए संबधित राज्य/जिला/विकास/खंड स्थित कृषि विभाग से संपर्क करें। मूंग की जैविक खेती बहुत से जागरूक किसान भाई अब जैविक खेती को अपना रहे हैं। जैविक खेती में शुरुआत के दो सालों में पैदावार रसायनिक खेती की तुलना में 5 से 15 फीसदी तक कम रहती है। लेकिन दो वर्ष बाद यह धीरे-धीरे सामान्य की तुलना में अधिक पहुंच जाती है। जैविक विधि से मूंग की खेती करने पर खरीफ सीजन में 8 से 12 क्विंटल और जायद में 6 से 9 क्विंटल पैदावार प्राप्त होती है। यह भी पढ़ें : यूरिया खाद रेट 2020 : इफको नैनो यूरिया, एक बोतल की कीमत रु.240 अधिक जानकारी के लिए देखें एम-किसान पोर्टल - https://mkisan.gov.in फार्मर पोर्टल - https://farmer.gov.in/ मूंग की खेती में उपज और आमदनी मूंग की खेती अच्छी तरह से करने पर 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ आसानी से उपज प्राप्त कर सकते हैं। कुल मिलाकर यदि आमदनी की बात करें तो 25-30 हजार प्राप्त कर सकते हैं। देश के जागरूक किसान देश की प्रमुख कंपनियों के नए व पुराने ट्रैक्टर उचित मूल्य पर खरीदने, लोन, इंश्योरेंस, अपने क्षेत्र के डीलरों के नाम जानने, आकर्षक ऑफर व कृषि क्षेत्र की नवीनतम अपडेट जानने के लिए ट्रैक्टर जंक्शन के साथ बनें रहिए।

जानें चंदन की खेती कैसे करें ( Indian Sandalwood Plantation )

जानें चंदन की खेती कैसे करें ( Indian Sandalwood Plantation )

चंदन की खेती : कम जमीन में ज्यादा कमाई देशभर के किसान भाइयों का ट्रैक्टर जंक्शन पर एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं करोड़पति बनने की। चंदन की खेती से जुडक़र किसान करोड़पति बन सकते हैं। बशर्तें उन्हें धैर्य के साथ चंदन की खेती करनी होगी। अगर किसान आज चंदन के पौधे लगाते हैं तो 15 साल बाद किसान अपने उत्पादन को बाजार में बेचकर करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। देश में लद्दाख और राजस्थान के जैसलमेर को छोडक़र सभी भू-भाग में चंदन की खेती की जा सकती है। चंदन के बीज/ पौधे/मिट्टी चंदन की खेती के लिए किसानों को सबसे पहले चंदन के बीज या फिर छोटा सा पौधा या लाल चंदन के बीज लेने होंगे जो कि बाजार में उपलब्ध है। चंदन का पेड़ लाल मिट्टी में अच्छी तरह से उगता है। इसके अलावा चट्टानी मिट्टी, पथरीली मिट्टी और चूनेदार मिट्टी में भी ये पेड़ उगाया जाता है। हालांकि गीली मिट्टी और ज्यादा मिनरल्स वाली मिट्टी में ये पेड़ तेजी से नहीं उग पाता। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ चंदन खेती : बुवाई का समय/जलवायु अप्रैल और मई का महीना चंदन की बुवाई के लिए सबसे अच्छा होता है। पौधे बोने से पहले 2 से 3 बार अच्छी और गहरी जुताई करना जरूरी होता है। जुताई होने के बाद 2x2x2 फीट का गहरा गड्ढ़ा खोदकर उसे कुछ दिनों के लिए सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर आपके पास काफी जगह है तो एक खेत में 30 से 40 सेमी की दूरी पर चंदन के बीजों को बो दें। मानसून के पेड़ में ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें सिंचाई की जरूरत होती है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इसके लिए 7 से 8.5 एचपी वाली मिट्टी उत्तम होती है। एक एकड़ भूमि में औसतन 400 पेड़ लगाए जाते हैं। इसकी खेती के लिए 500 से 625 मिमी वार्षिक औसम बारिश की आवश्यकता होती है। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती चंदन की खेती में पौधरोपण चंदन का पौधा अद्र्धजीवी होता है। इस कारण चंदन का पेड़ आधा जीवन अपनी जरुरत खुद पूरी करता है और आधी जरूरत के लिए दूसरे पेड़ की जड़ों पर निर्भर रहता है। इसलिए चंदन का पेड़ अकेले नहीं पनपता है। अगर चंदन का पेड़ अकेला लगाया जाएगा तो यह सूख जाएगा। जब भी चंदन का पेड़ लगाएं तो उसके साथ दूसरे पेड़ भी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि चंदन के कुछ खास पौधे जैसे नीम, मीठी नीम, सहजन, लाल चंदा लगाने चाहिए जिससे उसका विकास हो सके। यह भी पढ़ें : राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना चंदन की खेती में खाद प्रबंधन चंदन की खेती में जैविक खादकी अधिक आवश्यकता नहीं होती है। शुरू में फसल की वृद्धि के समय खाद की जरुरत पड़ती है। लाल मिट्टी के 2 भाग, खाद के 1 भाग और बालू के 1 भाग को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गाद भी पौधों को बहुत अच्छा पोषण प्रदान करता है। चंदन की खेती में सिंचाई प्रबंधन बारिश के समय में चंदन के पेड़ों का तेजी से विकास होता है लेकिन गर्मी के मौसम में इसकी सिंचाई अधिक करनी होती है। सिंचाई मिट्टी में नमी और मौसम पर निर्भर करती है। शुरुआत में बरसात के बाद दिसंबरसे मई तक सिंचाई करना चाहिए। रोपण के बाद जब तक बीज का 6 से 7 सप्ताह में अंकुरण शुरू ना हो जाए तब तक सिंचाई को रोकना नहीं चाहिए। चंदन की खेती में पौधों के विकास के लिए मिट्टी का हमेशा नम और जल भराव होना चाहिए। अंकुरित होने के बाद एक दिन छोडक़र सिंचाई करें। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू चंदन की खेती में खरपतवार चंदन की खेती करते समय, चंदन के पौधे को पहले साल में सबसे अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। पहले साल में पौधों के इर्द-गिर्द की खरपतवारको हटाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो दूसरे साल भी साफ-सफाई करनी चाहिए। किसी भी तरह का पर्वतारोही या जंगली छोटा कोमला पौधा हो तो उसे भी हटा देना चाहिए। चंदन की खेती में कीट एवं रोग नियंत्रण चंदन की खेती में सैंडल स्पाइक नाम का रोग चंदन के पेड़ का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। इस रोग के लगने से चंदन के पेड़ सभी पत्ते ऐंठाकर छोटे हो जाते हैं। साथ ही पेड़ टेड़े-मेढ़े हो जाते हैं। इस रोग से बचाव के लिए चंदन के पेड़ से 5 से 7 फीट की दूरी पर एक नीम का पौधा लगा सकते हैं जिससे कई तरह के कीट-पंतगों से चंदन के पेड़ की सुरक्षा हो सकेगी। चंदन के 3 पेड़ के बाद एक नीम का पौधा लगाना भी कीट प्रबंधन का बेहतर प्रयोग है चंदन की फसल की कटाई चंदन का पेड़ जब 15 साल का हो जाता है तब इसकी लकड़ी प्राप्त की जाती है। चंदन के पेड़ की जड़े बहुत खुशबूदार होती है। इसलिए इसके पेड़ को काटने की बजाय जड़ सहित उखाड़ लिया जाता है। पौधे को रोपने के पांच साल बाद से चंदन की रसदार लकड़ी बनना शुरू हो जाता है। चंदन के पेड़ को काटने पर उसे दो भाग निकलते हैं। एक रसदार लकड़ी होती है और दूसरी सूखी लकड़ी होती है। दोनों ही लकडिय़ों का मूल्य अलग-अलग होता है। चंदन का बाजार भाव देश में चंदन की मांग इतनी है कि इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती है। देश में चंदन की मांग 300 प्रतिशत है जबकि आपूर्ति मात्र 30 प्रतिशत है। देश के अलावा चंदन की लकड़ी की मांग चाइना, अमेरिका, इंडोनेशिया आदि देशों में भी है। वर्तमान में मैसूर की चंदन लडक़ी के भाव 25 हजार रुपए प्रति किलो के आसपास है। इसके अलावा बाजार में कई कंपनियां चंदन की लडक़ी को 5 हजार से 15 हजार रुपए किलो के भाव से बेच रही है। एक चंदन के पेड़ का वजन 20 से 40 किलो तक हो सकता है। इस अनुमान से पेड़ की कटाई-छंटाई के बाद भी एक पेड़ से 2 लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले चंदन के पेड़ से करोड़पति बनने की राह आसान अगर कोई किसान चंदन के सौ पेड़ रोपता है और उसमें से अगर 70 पेड़ भी बड़े हो जाते हैं तो किसान 15 साल बाद पेड़ों को काटकर और बाजार में भेजकर एक करोड़ रुपए आसानी से प्राप्त कर सकता है। यह किसी भी बैंक में एफडी और प्रॉपर्टी में निवेश से भी कई गुना ज्यादा आपको लाभ दे सकता है। चंदन की खेती के लिए लोन देश में अब कई राष्ट्रीयकृत बैंक और को-ऑपरेटिव बैंक भी चंदन की खेती के लिए बैंक लोन उपलब्ध करा रही है। चंदन की खेती के नियम देश में साल 2000 से पहले आम लोगों को चंदन को उगाने और काटने की मनाही थी। सात 2000 के बाद सरकार ने अब चंदन की खेती को आसान बना दिया है। अगर कोई किसान चंदन की खेती करना चाहता है तो इसके लिए वह वन विभाग से संपर्क कर सकता है। चंदन की खेती के लिए किसी भी तरह के लाइसेंस की जरूरत नहीं होती है। केवल पेड़ की कटाई के समय वन विभाग से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है जो आसानी से मिल जाता है। जानकारी : चंदन / चंद की प्रजाति / रक्तचंदन औषधी वनस्पती पूरे विश्व में चंदन की 16 प्रजातियां है। जिसमें सेंलम एल्बम प्रजातियां सबसे सुगंधित और औषधीय मानी जाती है। इसके अलावा लाल चंदन, सफेद चंदन, सेंडल, अबेयाद, श्रीखंड, सुखद संडालो प्रजाति की चंदन पाई जाती है। यह भी पढ़ें : अनुबंध खेती जानकारी : जानिए क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती / संविदा खेती चंदन के बीज तथा पौधे कहां पर मिलते हैं? चंदन की खेती के लिए बीज तथा पौधे दोनों खरीदे जा सकते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार की लकड़ी विज्ञान तथा तकनीक (Institute of wood science & technology) संस्थान बैंगलोर में है। यहां से आप चंदन की पौध प्राप्त कर सकते हैं। पता इस प्रकार है : Tree improvement and genetics division Institute of wood science and technology o.p. Malleshwaram Bangalore – 506003 (India) E-mail – [email protected] tel no. – 00 91-80 – 22-190155 fax number – 0091-80-23340529 किसान भाई अधिकारी जानकारी के लिए Institute of Wood Science and Technology – ICFRE की वेबसाइट iwst.icfre.gov.in पर संपर्क कर सकते हैं। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना

क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती : मध्यप्रदेश के 15 जिलों के लिए सरकार की सौगात ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती की। इन दिनों उद्यानिकी विभाग का फोकस क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती पर है। इसका लाभ देने के लिए किसानों से समय-समय पर आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। मध्यप्रदेश में क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती की आवेदन प्रक्रिया शुरू की गई है जो लक्ष्य पूर्ति तक जारी रहेगी। मध्यप्रदेश उद्यानिकी योजना/क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती के आवेदन केंद्र की मोदी सरकार उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा देने के लिए बहुत सी योजनाएं संचालित कर रही है। किसानों को इसका लाभ देने के लिए समय-समय पर आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। फरवरी 2020 में एक बार फिर मध्यप्रदेश उद्यानकी विभाग ने विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत आवेदन मांगे है। इस बार आवेदन ऑनलाइन न होकर ऑफलाइन है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती के विभिन्न घटकों के लिए मध्यप्रदेश के किसानों से आवेदन मांगे गए हैं। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ ग्रीन हाउस ढांचा और शेड नेट हाउस योजना/सब्सिडी मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत क्लस्टर आधरित संरक्षित खेती के घटक ग्रीन हाउस ढांचा (ट्यूबलर स्ट्रक्चर) व शेड नेट हाउस (टयूब्लर स्ट्रक्चर) के लिए आवेदन मांगे गए हैं। इस योजना में किसान जरबेरा, उच्च कोटि की सब्जियों की खेती पाली हाउस/शेड नेट हाउस में करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। साथ ही किसान ग्रीन हाउस ढांचा (ट्यूबलर स्ट्रक्चर) 2080 से 4000 वर्ग मीटर तक में संरक्षित खेती करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। सरकार की ओर से 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी का प्रावधान है। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम पुष्प क्षेत्र विस्तार व काजू क्षेत्र विस्तार योजना मध्यप्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत पुष्प क्षेत्र विस्तार के अंतर्गत खुले फूल तथा काजू क्षेत्र विस्तार के अंतर्गत काजू सामान्य दूरी (7 मीटर x 7 मीटर) के लिए आवेदन मांगा है। क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती में आवेदन क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती योजना की विभिन्न घटक योजनाओं के लिए अलग-अलग जिलों के किसान आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए अलग-अलग घटक योजना के लिए अलग-अलग वर्ग के िकसान आवेदन कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : जानें क्या है, किसान कर्ज माफी योजना शेड नेट हाउस (ट्यूबलर स्ट्रक्चर) इस योजना में भोपाल, सीहोर, खंडवा, शाजापुर, इंदौर व बैतूल जिले के सामान्य वर्ग के किसानों से आवेदन मांगे गए हैं। वहीं देवास जिले में सभी वर्ग के किसानों से आवेदन मांगे गए हैं। ग्रीन हाउस ढांचा (ट्यूबलर स्ट्रक्चर)-2080 से 4000 वर्ग मीटर तक इस योजना के लिए छिंदवाड़ा जिले के सभी वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। ग्रीन हाउस ढांचा (जरबेरा) इस योजना के लिए छिंदवाड़ा जिले के सामान्य वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। पाली हाउस/शेड नेट हाउस (उच्च कोटि की सब्जियों की खेती) इस योजना के लिए छिंदवाड़ा जिले के सामान्य वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा अलीराजपुर जिले के अनुसूचित जनजाति के किसान आवेदन कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें पुष्प क्षेत्र विस्तार योजना इस योजना में मध्यप्रदेश में फूलों की खेती करने के लिए छोटे तथा मझोले किसान आवेदन कर सकते हैं। छतरपुर और टीकमगढ़ जिले के सभी वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। काजू क्षेत्र विस्तार योजना/सब्सिडी काजू क्षेत्र विस्तार योजना के तहत काजू सामान्य दूरी (7 मीटर x 7 मीटर) ड्रिप रहित योजना के लिए मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के किसान आवेदन कर सकते हैं। इस योजना में बैतूल, छिंदवाड़ा, बालाघाट तथा सिवनी जिलों के सभी वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। वहीं मंडला तथा डिंडोरी जिलों के सामान्य एवं अनुसूचित जनजाति के किसान आवेदन कर सकते हैं। इसके तहत किसानों को प्रथम वर्ष 40 प्रतिशत 20,000 प्रति हेक्टेयर एवं द्वितीय वर्ष 75 प्रतिशत एवं तृतीय वर्ष 90 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाता है यदि फसल बची रहे तो। यह भी पढ़ें : जानें डेयरी लोन कैसे ले आवेदन शुरू मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती के लिए आवेदन शुरू हो चुका है। जो लक्ष्य की पूर्ति तक चलेगा। आवेदन 19 फरवरी से शुरू हो गया है। किसानों से आवेदन लक्ष्य से दस प्रतिशत अधिक लिया जाएगा। आवेदन की प्रक्रिया इस योजना में अब तक आवेदन ऑनलाइन होता था। इस बार कलस्टर आधारित संरक्षित खेती के लिए आवेदन ऑफलाइन मांगे गए हैं। वर्तमान में संचालनालय के निर्देश के अनुसार राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के घटकों में आवेदन जिला उप/सहायक स्तर पर लिए जाएंगे न की कृषक स्तर से। इसलिए आवेदक आवेदन के लिए संबंधित जिला कार्यालय उद्यानिकी पर संपर्क करें। किसान अधिक जानकार के लिए https://mpfsts.mp.gov.in/mphd/#/ पर संपर्क कर सकता है। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 में नए प्रावधान केंद्रीय मंत्रीमंडल ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) में बड़े बदलावों को मंजूरी दी है। इसके तहत अब किसान खुद तय कर पाएंगे कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ लें या नहीं। अब सीधे किसानों के केसीसी से पैसा नहीं कटेगा। सरकार ने इस योजना को अब स्वैच्छिक बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनवरी 2016 में इस योजना की शुरुआत की थी तथा इस बारे में कुछ शिकायतों के बाद केबिनेट की बैठक में यह निर्णय लिया गया। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में संशोधन से किसानों को होगा फायदा इस फसल बीमा योजना के तहत ऋण लेने वाले किसानों के लिए यह बीमा कवर लेना अनिवार्य था। मौजूदा समय में कुल किसानों में से 58 फीसदी किसान ऋण लेते हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की उपलब्धियों के बारे में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि बीमा में 30 फीसदी खेती योग्य क्षेत्र को शामिल किया गया है। तोमर ने बताया कि फसल बीमा योजना को लेकर मिल रही लगातार शिकायतों के बाद सरकार ने ये कदम उठाए हैं। केंद्रीय केबिनेट ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मौसम आधारित फसल बीमा योजना में कई संशोधन करके इसे किसानों के लिए फायदेमंद बनाने की कोशिश की है। तोमर ने बताया कि 60 हजार करोड़ रुपए के बीमा दावे को स्वीकृति दे दी गई है जबकि 13 हजार करोड़ रुपए का प्रीमियम एकत्रित किया गया है। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 में नए प्रावधान प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ये बदलाव खरीफ-2020 से लागू होंगे। किसान खुद तय कर पाएंगे कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का हिस्सा बनना है या नहीं। अभी तक बीमा कंपनियां उन किसानों के खाते से प्रीमियम का पैसा पहले ही काट लेती थीं, जिन्होंने या तो फसल ऋण लिया होता था या किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज लेते थे। ऐसे में किसानों को पता ही नहीं चल पाता था कि उनकी फसल का बीमा हो चुका है और उसका प्रीमियम बैंक से पहले ही बीमा कंपनी के पास जमा हो चुका है। नए संशोधनों के बाद बीमा कंपनियों को व्यवसाय का आवंटन तीन साल तक के लिए किया जाएगा। जिन जिलों में 50 प्रतिशत से अधिक सिंचित क्षेत्र होगा उस पूरे जिले को सिंचित माना जाएगा। राज्यों और केंद्र की हिस्सेदारी में बदलाव किए गए हैं। इसके तहत पूर्वाेत्तर राज्यों में योजना में आने वाले खर्च का 90 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी। जबकि राज्यों को केवल 10 फीसदी भार वहन करना होगा। देश के बाकि राज्यों में यह योजना 50:50 फीसदी के आधार पर लागू की जाएगी। योजना में पहले प्रशासनिक खर्चे का प्रावधान नहीं था, जिसे अब जोड़ दिया गया है। इसके तहत प्रशासनिक खर्च के लिए तीन फीसदी का प्रावधान किया गया है। किसानों को उनकी फसल के नुकसान का आकलन करने वाली प्रणाली को स्मार्ट किया जाएगा। इसमें आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग होगा। अब योजना में राज्यों को सीजन के अनुसार 31 मार्च और 30 सितंबर तक अपना हिस्सा जमा कराना होगा। ऐसा नहीं करने वाले राज्य इसका फायदा नहीं ले सकेंगे। इसके साथ ही अन्य फसलों के लिए जिनका एमएसपी (समर्थन मूल्य) घोषित नहीं किया गया है। उनके गेट (फसल की लागत) पर विचार किया जाएगा। राज्यों को अतिरिक्त जोखिम कवर जैसे बुवाई, स्थानीय आपदा, मध्य मौसम प्रतिकूलता और फसल के बाद नुकसान होने पर किसी भी विकल्प का चयन करने की ढील दी जाएगी। इसके अलावा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत विशिष्ट जोखिम जैसे ओला से फसल को नुकसान होने की भी भरपाई कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : जानें क्या है, किसान कर्ज माफी योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में प्रीमियम दर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को खरीफ की फसल के लिए 2 फीसदी प्रीमियम और रबी की फसल के लिए 1.5 फीसदी प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है। इसके अलावा यह योजना वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिए भी बीमा सुरक्षा प्रदान करती है। बागवानी फसलों के लिए किसानों को पांच फीसदी प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता है। फसल की बुवाई के 10 दिनों के अंदर किसान को पीएमएफबीआई का फार्म भरना जरूरी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उद्देश्य/प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पात्रता प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उद्देश्य किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में किसानों को फसल के नुकसान की भरपाई करना है। यह स्कीम जलवायु परिवर्तन और अन्य जोखिम से खेती को नुकसान से बचाने का एक बड़ा माध्यम है। योजना के तहत कर्ज लेकर खेती करने वाले किसान को कम दर पर बीमा कवर दिया जाता है, जिन किसानों ने खेती के लिए ऋण नहीं लिया है वे भी इसका लाभ ले सकते हैं। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के ऑनलाइन और ऑफलाइन फार्म प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के लिए ऑफलाइन (बैंक जाकर) और दूसरा ऑनलाइन, दोनों तरीके से फॉर्म लिए जा सकते हैं। फॉर्म ऑनलाइन भरने के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं - http://pmfby.gov.in/ अगर आप फॉर्म ऑफलाइन लेना चाहते हैं तो नजदीकी बैंक की शाखा में जाकर फसल बीमा योजना (PMFBY) का फॉर्म भर सकते हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लिस्ट/प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना क्लेम/प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ/प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऑनलाइन फॉर्म/प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना फॉर्म पीडीएफ/प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऑनलाइन फॉर्म की जानकारी http://pmfby.gov.in/ से ले सकते हैं केंद्रीय केबिनेट बैठक 2020 के प्रमुख निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 19 फरवरी 2020 को आयोजित केंद्रीय केबिनेट की बैठक में कई महत्वपूर्ण निणर्य लिए गए। इसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को स्वैच्छिक बनाने के साथ ही देश में 10 हजार कृषि उत्पाद संगठन (एफपीओ) बनाने का निर्णय लिया गया। इसके अलावा डेयरी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए 4558 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी। देश में 10 हजार एफपीओ का गठन करेगी सरकार केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) का प्रयोग देश में बहुत सफल रहा है। एफपीओ के विनिर्माण और संवर्धन स्कीम के तहत 6865 करोड़ रुपए के कुल बजटीय प्रावधान के साथ 10 हजार नए एफपीओ बनाए जाएंगे। यह भी पढ़ें : जानें डेयरी लोन कैसे ले डेयरी क्षेत्र के लिए 4558 करोड़ रुपए की योजना मंजूर केंद्रीय केबिनेट की बैठक में सरकार ने डेयरी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए 4 हजार 558 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी। इससे करीब 95 लाख किसानों को फायदा होगा। बैठक के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि इससे देश में दुग्ध क्रांति में नए आयाम जुड़ेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि मंत्रिमंडल ने ब्याज सहायता योजना में लाभ को दो फीसदी से बढ़ाकर ढाई फीसदी करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है। जावड़ेकर ने कहा कि सरकार ने यह फैसला किसान समुदाय के हित के लिए किए हैं। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

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