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Escorts Tractor's Q1FY19 profit rises 91% yoy to 120 cr

Escorts Tractor's Q1FY19  profit rises 91% yoy to 120 cr

01 August, 2018 Total Views 1088

Escorts Ltd Q1FY19

Standalone Results Q1FY19: (in Rs cr)

  Q1FY19 YoY (%)
Revenue 1,511.29 32.3
EBITDA 185.54 90.2
EBITDA Margin (%) 12.3 374
Net Profit (adjusted) 119.56 90.8

***EBITDA margin change is bps

Escorts Limited reported in-line numbers for Q1FY19. The company reported a standalone revenue of Rs1,511cr, up 32% yoy (5% qoq), exactly meeting the consensus estimate. EBITDA was up 90% yoy (7% qoq) at Rs186cr, while EBITDA margin expanded 374bps yoy (18bps qoq) to 12.3%. EBITDA and EBITDA margin was higher than the consensus estimate of Rs167cr and 11.1%, respectively. 

Other Highlights

  • Within segments, revenue for the largest segment (agri-machinery products) grew 25% yoy (8% qoq), while the second-largest segment (construction equipment), grew 49% yoy. Railway business revenue was up 35% yoy. In short, top-line performance for Q1FY19 was powered by all three segments.
  • Operating performance was led by strict control on costs and lower input expenses (as % of sales). Within segments, the agri-machinery products segment saw 64% yoy (1% qoq) growth in EBIT. The segment has been performing very strongly owing to robust rural cues and tractor sales. The railway segment has seen a steady improvement in operating performance over the past four quarters. EBIT for the railway segment tripled (yoy) in Q1FY19 to Rs22cr.

Highlights from the Q1FY19 presentation

  • The tractor sector is expected to grow (in volume terms) by 12-15% in FY19.
  • The construction equipment sector is expected to grow (in volume terms) by 16-18% in FY19.
  • Escorts sold 24,494 tractors in Q1FY19, a growth of 39.5% yoy (4% qoq). It sold 1,345 construction equipment in Q1FY19, a growth of 52% yoy (down 13% qoq).
  • Term loan declined from Rs50cr as of March 31, 2018, to Rs35cr as of June 30, 2018.
  • Railway order book stood at Rs300cr as of June 30, 2018, double the value from the year-ago period.


Highlights from post result conference call


Agri Machinery segment:

  • Company gained 100bps market share in Q1FY19.
  • Tractor industry grew 18% yoy in North and Central India and 32% yoy in South and Western India
  • New products such as “Atom” compact tractors and paddy specialist tractors was monthly sales run-rate of 60-70 units. This is likely to increase to 250-300 units from October 2018 onwards.
  • Industry will grow between 0-2% in Q2FY19 due to timing of festive season.
  • Escorts credit is financing nearly 1,000 units/month. Coverage has been increasing, and is expected to reach 70-80% of dealerships by December 2018.
  • Company to expand capacity by 50,000 units from current capacity of 1– 1.1 lakhs. It will spend Rs100cr for the same.
  • Emission norms to change for 50HP+ tractors in October 2020, which would increase vehicle price by Rs1,00,000/unit. Emission norm changes for other segments expected from CY2022 or CY2023.

Source- https://www.indiainfoline.com

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बेबी कॉर्न की खेती की जानकारी - जानें बेबी कॉर्न मक्का की खेती कैसे करें.

बेबी कॉर्न की खेती की जानकारी - जानें बेबी कॉर्न मक्का की खेती कैसे करें.

बेबी कॉर्न की खेती : कम इनवेस्टमेंट में ज्यादा कमाई ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं बेबी कॉर्न की खेती से मोटी कमाई की। बेबी कॉर्न दोहरे उद्देश्यों वाली महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। यह अधिक तेजी से विकास करने वाली फसल है। आजकल अपरिपक्व मक्के के भुट्टे को सब्जी के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिसको बेबी कॉर्न कहा जाता है। पहले बेबीकॉर्न के व्यजंन सिर्फ बड़े शहरों के होटलों में मिलते थे लेकिन अब यह आमजन के बीच काफी लोकप्रिय हो गया है। बेबी कॉर्न उद्योग उच्च आय के अवसर प्रदान करता है तथा किसानों के लिए रोजगार और निर्यात की संभावनाएं पैदा करता है। बेबी कॉर्न (मक्का) एक स्वादिष्ट आहार बेबी कॉर्न एक स्वादिष्ट, पौष्टिक तथा बिना कोलेस्ट्रोल का खाद्य आहार है। इसके साथ ही इसमें फाइबर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसमें खनिज की मात्रा एक अंडे में पाए जाने वाले खनिज की मात्रा के बराबर होती है। बेबी कॉर्न के भुट्टे, पत्तों में लिपटे होने के कारण कीटनाशक रसायन से मुक्त होते हैं। स्वादिष्ट एवं सुपाच्य होने के कारण इसे एक आदर्श पशु चारा फसल भी माना जाता है। हरा चारा, विशेष रूप से दुधारू मवेशियों के लिए अनुकूल है जो एक लैक्टोजेनिक गुण है। यह भी पढ़ें : मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में. बेबी कॉर्न की फसल से कमाई / Baby Corn Cultivation मक्का के अपरिपक्व भुट्टे को बेबी कॉर्न कहा जाता है, जो सिल्क की 1-3 सेमी लंबाई वाली अवस्था तथा सिल्क आने के 1-3 दिनों के अंदर तोड़ लिया जाता है। इसकी खेती एक वर्ष में तीन से चार बाज की जा सकती है। बेबी कॉर्न की फसल रबी में 110-120 दिनों में, जायद में 70-80 दिनों में तथा खरीफ के मौसम में 55-65 दिनों में तैयार हो जाती है। एक एकड़ जमीन में बेबीकॉर्न फसल में 15 हजार रुपए का खर्च आता है जबकि कमाई एक लाख रुपए तक हो सकती है। साल में चार बार फसल लेकर किसान चार लाख रुपए तक कमा सकता है। यह भी पढ़ें : जानें चंदन की खेती कैसे करें विश्व और भारत में बेबी कॉर्न की वैज्ञानिक खेती / भारतीय बेबी कॉर्न की माँग विदेश में वर्तमान समय में बेबी कॉर्न की खेती विश्व में सबसे अधिक थाईलैंड एवं चीन में की जा रही है। विकासशील देशों जैसे एशिया-प्रशांत क्षेत्रों में बेबीकॉर्न खेती की तकनीक को बढ़ावा देने की काफी गुंजाइश है। भारत में बेबी कॉर्न की खेती उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मेघालय तथा आंधप्रदेश में की जा रही है। बिहार राज्य के लघु एवं सीमांत किसानों के लिए इसकी खेती काफी फायदेमंद हो सकती है। आमतौर पर धान और गेहूं कृषि प्रणाली में जायद की फसल के रूप में गरमा मूंग लिया जाता है। जिसका आर्थिक लाभ किसान नहीं उठा पाते हैं। गरमा मूंग की खेती अगर किसान 15 मार्च के बाद करते हैं तो लाभांश की दृष्टि से यह किसान के लिए फायदेमंद नहीं होती है। उस परिस्थिति में अगर किसान बेबीकॉर्न की वैज्ञानिक खेती करते हैं तो काफी लाभ की संभावना है। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती बेबी कॉर्न भुट्टे का उपयोग बेबी कॉर्न का पूरा भुट्टा खाया जाता है। इसे कच्चा या पकाकर खाया जाता है। कई प्रकार के व्यंजनों में इसका उपयोग किया जाता है। जैसे पास्ता, चटनी, कटलेट, क्रोफ्ता, कढ़ी, मंचूरियन, रायता, सलाद, सूप, अचार, पकौड़ा, सब्जी, बिरयानी, जैम, मुरब्बा, बर्फी, हलवा, खीर आदि। इसके अलावा पौधे का उपयोग चारे के लिए किया जाता है जो कि बहुत पौष्टिक है। इसके सूखे पत्ते एवं भुट्टे को अच्छे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ बेबी कॉर्न की श्रेष्ठ प्रभेद/प्रजाति का चयन बेबी कॉर्न की प्रजाति का चयन करते समय भुट्टे की गुणवत्ता को ध्यान में रखना चाहिए। भुट्टे के दानों का आकार और दानों का सीधी पंक्ति में होना चयन में एक समान भुट्टे पकने वाली प्रजाति जो मध्यम ऊंचाई की अगेती परिपक्व (55 दिन) हों, उनको प्राथमिकता देनी चाहिए। भारत में पहला बेबी कॉर्न प्रजाति वीएल-78 है। इसके अलावा एकल क्रॉस हाईब्रिज एचएम-4 देश का सबसे अच्छा बेबी कॉर्न हाइब्रिड है। वीएन-42, एचए एम-129, गोल्डन बेबी (प्रो-एग्रो) बेबी कॉर्न का भी चयन कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम बेबी कॉर्न खेती : उत्पादन तकनीक और मृदा की तैयारी स्वीटकॉर्न और पॉपकॉर्न की तरह ही बेबी कॉर्न की खेती के लिए मृदा की तैयारी और फसल प्रबंधन किया जाता है। इसकी खेती की अवधि केवल 60-62 दिनों की होती है जबकि अनाज की फसल के लिए यह 110-120 दिनों की होती है। इसके अलावा कुछ और विभिन्नताएं हैं जैसे झंडों (नर फूल) को तोडऩा, भुट्टों में सिल्क (मोचा) आने के 1-3 दिन में तोडऩा। बेबी कॉर्न के लिए खेत की तैयारी और बुवाई का तरीका (baby corn plant) बेबी कॉर्न की खेती के लिए खेत की तीन से चार बार जुताई करने के बाद 2 बार सुहागा चलाना चाहिए, जिससे सरपतवार मर जाते हैं और मृदा भुरभुरी हो जाती है। इस फसल में बीज दर लगभग 25-25 किग्रा प्रति हैक्टेयर होती है। बेबी कॉर्न की खेती में पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी और पौधे की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी होनी चाहिए। इसके साथ ही बीज को 3-4 सेमी गहराई में बोना चाहिए। मेड़ों पर बीज की बुवाई करनी चाहिए और मेड़ों को पूरब से पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए। बेबी कॉर्न में बीजोपचार/बेबीकॉर्न में रोग से बचाव बेबी कॉर्न के बीजों को बीज और मृदा से होने वाले रोगों से बचाना होता है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना सबसे अच्छा तरीका है। एहतियात के तौर पर बीज और मृदा से होने वाले रोगों एवं कीटों से बचाने के लिए उन्हें फफूंदनाशकों और कीटनाशकों से उपचारित करना चाहिए। बाविस्टिन : इसका प्रयोग 1:1 में 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से पत्ती अंगमारी से बचाने के लिए किया जाता है। थीरम : इसका प्रयोग 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज दर से बीज को डाउनी मिल्ड्यू से बचाने के लिए किया जाता है। कार्बेन्डाजिम : इसका प्रयोग 3 ग्राम प्रति किग्रा बीज दर से पौधों को अंगमारी से बचाने के लिए किया जाता है। फ्रिपोनिल : इसका प्रयोग 44 मिली प्रति किग्रा बीज की दर से दीमक को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा बुवाई से पहले जैविक खाद एजोस्पिरिलम के 3-4 पैकेट से उपचार करने से बेबीकॉर्न की गुणवत्ता और उपज में वृद्धि होती है। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले बुवाई का समय बेबी कॉर्न की खेती पूरे वर्ष की जा सकती है। बेबी कॉर्न को नमी और सिंचित स्थितियों के आधार पर जनवरी से अक्टूबर तक बोया जा सकता है। मार्च के दूसरे सप्ताह में बुवाई के बाद अप्रैल के तीसरे सप्ताह में सबसे अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। बेबी कॉर्न की खेती में खाद और उर्वरक प्रबंधन बेबी कॉर्न की खेती में भूमि की तैयारी के समय 15 टन कम्पोस्ट या गोबर प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। बेसल ड्रेसिंग उर्वरकों के रूप में 75:60:20 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से एनपीके एवं बुवाई के तीन सप्ताह बाद शीर्ष ड्रेसिंग उर्वरकों के रूप में 80 किग्रा नाइट्रोजन और 20 किग्राम पोटाश देना चाहिए। यह भी पढ़ें : हरियाणा पशु किसान क्रेडिट कार्ड योजना 2020 बेबी कॉर्न की खेती में सिंचाई प्रबंधन बेबी कॉर्न की फसल जल जमाव एवं ठहराव को सहन नहीं करती है। इसलिए खेत में अच्छी आतंरिक जल निकासी होनी चाहिए। आमतौर पर पौध एवं फल आने की अवस्था में, बेहतर उपज के लिए सिंचाई करनी चाहिए। अत्यधिक पानी, फसल को नुकसान पहुंचाता है। बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, जब तक कि लंबे समय तक सूखा न रहें। बेबी कॉर्न की खेती में खरपतवार नियंत्रण बेबी कॉर्न की खेती में खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए 2-3 बार हाथ से खुरपी द्वारा निराई पर्याप्त होती है। खरीफ के मौसम में और जब मृदा गीली होती है तो किसी भी किसी कृषि कार्य को करना मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति में खरपतवारनाशक दवाइयों के प्रयोग से खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। बुवाई के तुरंत बाद सिमाजीन या एट्राजीन दवाइयों का उपयोग करना चाहिए। औसतन 1-1.5 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से 500-650 लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए। पहली निराई बुआई के दो सप्ताह बाद करनी चाहिए। मिट्टी चढ़ाना या टॉपड्रेसिंग बुवाई के 3-4 सप्ताह के बाद करनी चाहिए। बुवाई के 40-45 दिनों के बाद झंडों या नर फूलों को तोडऩा चाहिए। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू कीट और रोग प्रबंधन बेबी कॉर्न फसल में शूट फ्रलाई, पिंक बोरर और तनाछेदक कीट प्रमुख रूप से लगते हैं। कार्बेरिल 700 ग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से 700 लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करने से इन कीटों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। बेबी कॉर्न के साथ अंतर्वर्ती फसल बेबी कॉर्न के साथ अंतर्वर्ती फसल किसानों को और अधिक लाभ प्रदान करती है। ये फसलें दूसरी फसल पर कोई बुरा प्रभाव नहीं डालती है और मृदा की उर्वराशक्ति को भी बढ़ाती है। अत: फसली खेती में बेबी कॉर्न की फसल आलू, मटर, राजमा, चुकंदर, प्याज, लहसुन, पालक, मेथी, फूल गोभी, ब्रोकली, मूली, गाजर के साथ खरीफ के मौसम में लोबिया, उड़द, मंूग आदि के साथ उगाई जा सकती है। यह भी पढ़ें : अनुबंध खेती जानकारी : जानिए क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती / संविदा खेती बेबी कॉर्न की कटाई / तुड़ाई / बेबी कॉर्न का उत्पादन बेबी कॉर्न को आमतौर पर रेशम उद्भव अवस्था में बुवाई के लगभग 50-60 दिनों के बाद हाथ से काटा जाता है। इसकी तुड़ाई के समय भुट्टे का आकार लगभग 8-10 सेमी लंबा, भुट्टे के आधार के पास व्यास 1-1.5 सेमी एवं वजन 7-8 ग्राम होना चाहिए। भुट्टे को 1-3 सेमी सिल्क आने पर तोड़ लेना चाहिए। इसको तोड़ते समय इसके ऊपर की पत्तियों को नहीं हटाना चाहिए। नहीं तो ये जल्दी खराब हो जाता है। खरीफ के मौसम में प्रतिदिन एवं रबी के मौसम में एक दिन के अंतराल पर सिल्क आने के 1-3 दिनों के अंदर भुट्टों की तुड़ाई कर लेनी चाहिए नहीं तो अंडाशय का आकार, भुट््टे की लंबाई एवं भुट्टा लकड़ी की तरह हो जाता है। जब बेबी कॉर्न को एक माध्यमिक फसल के रूप में उगाया जाता है तो पौधों के शीर्ष के भुट्टों को छोडक़र दूसरे भुट्टों की बेबी कॉर्न के लिए तुड़ाई की जाती है और शीर्ष भुट्टों को स्वीट कॉर्न या पॉपकार्न के लिए परिपक्त होने के लिए छोड़ दिया जाता है। कटाई के बाद बेबी कॉर्न का प्रबंधन तुड़ाई के बाद बेबीकॉर्न की ताजगी लंब समय तक बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है। तुड़ाई के बाद भुट्टों को छायादार जगह में रखकर उसके छिलके को हटाना चाहिए। इसका भंडारण रेफ्रीजरेटर या किसी ठंडी जगह में किसी टोकरी या प्लास्टिक थैले में करना चाहिए। बेबी कॉर्न खेती के लिए सरकारी सहायता मक्का अनुसंधान निदेशालय, भारत सरकार देशभर में बेबीकॉर्न की खेती के लिए किसानों के बीच जागरूकता अभियान चला रहा है। अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट https://iimr.icar.gov.in पर लॉगिन कर सकते हैं। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में.

मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में.

जायद फसल मूंग की जानकारी ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का स्वागत है। सभी किसान भाई जानते हैं कि देश में इस समय रबी फसल की कटाई चल रही है। नवसवंत् से पहले सभी खेतों में रबी की फसल काटी जा चुकी होगी। रबी की फसल की कटाई के तुरंत बाद किसान भाई खेत में ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल उगाकर कमाई कर सकते हैं। रबी की फसल के तुरंत बाद खेत में दलहनी फसल मूंग की बुवाई करने से मिट्टी की उर्वरा क्षमता में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में स्थित ग्रंथियों में वातावरण से नाइट्रोजन को मृदा में स्थापित करने वाले सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं। इस नाइट्रोजन का प्रयोग मूंग के बाद बोई जाने वाली फसल द्वारा किया जाता है। यह भी पढ़ें : जानें चंदन की खेती कैसे करें भारत मे खरीफ मूंग की खेती / ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती भारत में मूंग एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दालों में से एक है। मूंग गर्मी और खरीफ दोनों मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। ग्रीष्म मूंग की खेती गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू, जौ, अलसी आदि फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में की जा सकती है। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान प्रमुख ग्रीष्म मूंग उत्पादक राज्य है। गेहूं-धान फसल चक्र वाले क्षेत्रों में जायद मूंग की खेती द्वारा मिट्टी उर्वरता को उच्च स्तर पर बनाए रखा जा सकता है। मूंग से नमकीन, पापड़ तथा मंगौड़ी जैसे स्वादिष्ट उत्पाद भी बनाए जाते हैं। इसके अलावा मूंग की हरी फलियों को सब्जी के रूप में बेचकर किसान अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। किसान भाई इसकी एक एकड़ जमीन से 30 हजार रुपए तक की कमाई कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ मूंग की बुवाई का समय/जुताई ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई 15 मार्च से 15 अप्रैल तक करनी चाहिए। जिन किसान भाइयों के पास सिंचाई की सुविधा है वे फरवरी के अंतिम सप्ताह से भी बुवाई शुरू कर सकते हैं। बसंतकालीन मूंग बुवाई मार्च के प्रथम पखवाड़े में करनी चाहिए। खरीफ मूंग की बुवाई का उपयुक्त समय जून के द्वितीय पखवाड़े से जुलाई के प्रथम पखवाड़े के मध्य है। बोनी में देरी होने पर फूल आते समय तापमान में वृद्धि के कारण फलियां कम बनती है या बनती ही नहीं है,इससे इसकी पैदावार प्रभावित होती है। मूंग की फसल के लिए खेत तैयार करना रबी फसल की कटाई के तुरंत मूंग की बुआई करनी है तो पहले खेतों की गहरी जुताई करें। इसके बाद एक जुताई कल्टीवेटर तथा देशी हल से कर भलीभांति पाटा लगा देना चाहिए, ताकि खेत समतल हो जाए और नमी बनी रहे। दीमक को रोकने के लिए 2 प्रतिशत क्लोरोपाइरीफॉस की धूल 8-10 कि.ग्रा./एकड़ की दर से खेत की अंतिम जुताई से पूर्व खेत में मिलानी चाहिए। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती मूंग की खेती में बीज जायद के सीजन में अधिक गर्मी व तेज हवाओं के कारण पौधों की मृत्युदर अधिक रहती है। अत: खरीफ की अपेक्षा ग्रीष्मकालीन मूंग में बीज की मात्रा 10-12 किग्रा/एकड़ रखें। मूंग की खेती में बीजोपचार बुवाई के समय फफूंदनाशक दवा (थीरम या कार्बेन्डाजिम) से 2 ग्राम/कि.ग्रा. की दर से बीजों को शोधित करें। इसके अलावा राइजोबियम और पी.एस.बी. कल्चर से (250 ग्राम) बीज शोधन अवश्य करें। 10-12 किलोग्राम बीज के लिए यह पर्याप्त है। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम मूंग की प्रमुख प्रजातियां/ मूंग की नई किस्म मूंग की प्रमुख प्रजातियों में सम्राट, एचएमयू 16, पंत मूंग-1, पूजा वैशाखी, टाइप-44, पी.डी.एम.-11, पी.डी.एम.-5, पी.डी.एम.-8, मेहा, के. 851 आदि है। मूंग की खेती में खाद एवं उर्वरक दलहनी फसल होने के कारण मूंग को अन्य खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा नाइट्रोजन की कम आवश्यकता होती है। जड़ों के विकास के लिए 20 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फास्फोरस तथा 20 किग्रा पोटाश प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए। मूंग की फसल में सिंचाई / मूंग का पौधा में सिंचाई जायद ऋतु में मूंग के लिए गहरा पलेवा करके अच्छी नमी में बुवाई करें। पहली सिंचाई 10-15 दिनों में करें। इसके बाद 10-12 दिनों के अंतराल में सिंचाई करें। इस प्रकारकुल 3 से 5 सिंचाइयां करें। यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शाखा निकलते समय, फूल आने की अवस्था तथा फलियां बनने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले मूंग की फलियों की तुड़ाई और कटाई मूंग की फलियां जब 50 प्रतिशत तक पक जाएं तो फलियों की तुड़ाई करनी चाहिए। दूसरी बार संपूर्ण फलियों को पकने पर तोडऩा चाहिए। फसल अवशेष पर रोटावेटर चलाकर भूमि में मिला दें ताकि पौधे हरी खाद का काम करें। इससे मृदा में 25 से 30 किग्राम प्रति हैक्टेयर नाइट्रोजन की पूर्ति आगामी फसल के लिए हो जाती है। मूंग की खेती में खरपतवार नियंत्रण निराई-गुड़ाई Ñ मूंग के पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए खेत को खरपतवार रहित रखना अति आवश्यक है। इसके लिए पहली सिंचाई के बाद खुरपी द्वारा निराई आवश्यक है। रासायनिनक विधि द्वारा 300 मिली प्रति एकड़ इमाजाथाईपर 10 प्रतिशत एसएल की दर से बुआई के 15-20 दिनों बाद पानी में घोलकर खेत में छिडक़ाव करें। मूंग की फसल में रोग एवं कीटों का प्रकोप ग्रीष्मकाल में कड़ी धूप व अधिक तापमान रहने से मूंग की फसल में रोगों व कीटों का प्रकोप कम होता है। फिर भी मुख्य कीट जैसे माहू, जैडिस, सफेद मक्खी, टिड्डे आदि से फसल को बचाने के लिए 15-20 दिनों बाद 8-10 किग्रा प्रति एकड़ क्लोरोपाइरीफॉस 2 प्रतिशत या मैथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत की धूल का पौधों पर बुरकाव करें। पीले पत्ते के रोग से प्रभावित पौधों को उखाडक़र जला दें या रासाायनिक विधि के अंतर्गत 100 ग्राम थियोमेथाक्सास का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर रखे में छिडक़ाव करें। मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए क्या करें? स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें। सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर पैदावार कम हो जाती है। किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें। बीज उपचार अवश्य करें जिससे पौधो को बीज और मिटटी जनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में प्रभावित होने से बचाया जा सके। मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वराशक्ति बनी रहती है, जो अधिक उत्पादन के लिए जरूरी है। खरीफ मौसम में मेड नाली पद्धति से बुवाई करें समय पर खरपतवारों नियंत्रण और कीट और रोग रोकथाम करें। पीला मोजेक रोग रोधी किस्मों का चुनाव क्षेत्र की अनुकूलता के अनुसार करें। पौध संरक्षण के लिये एकीकृत पौध संरक्षण के उपायों को अपनाना चाहिए। यह भी पढ़ें : हरियाणा पशु किसान क्रेडिट कार्ड योजना 2020 मूंग की फसल में सरकारी सहायता भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा फसल उत्पादन (जुताई, खाद, बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशी, सिंचाई के साधनों), कृषि यंत्रों, भंडारण इत्यादि हेतु दी जाने वाली सुविधाओं/अनुदान सहायता /लाभ की जानकारी के लिए संबधित राज्य/जिला/विकास/खंड स्थित कृषि विभाग से संपर्क करें। मूंग की जैविक खेती बहुत से जागरूक किसान भाई अब जैविक खेती को अपना रहे हैं। जैविक खेती में शुरुआत के दो सालों में पैदावार रसायनिक खेती की तुलना में 5 से 15 फीसदी तक कम रहती है। लेकिन दो वर्ष बाद यह धीरे-धीरे सामान्य की तुलना में अधिक पहुंच जाती है। जैविक विधि से मूंग की खेती करने पर खरीफ सीजन में 8 से 12 क्विंटल और जायद में 6 से 9 क्विंटल पैदावार प्राप्त होती है। यह भी पढ़ें : यूरिया खाद रेट 2020 : इफको नैनो यूरिया, एक बोतल की कीमत रु.240 अधिक जानकारी के लिए देखें एम-किसान पोर्टल - https://mkisan.gov.in फार्मर पोर्टल - https://farmer.gov.in/ मूंग की खेती में उपज और आमदनी मूंग की खेती अच्छी तरह से करने पर 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ आसानी से उपज प्राप्त कर सकते हैं। कुल मिलाकर यदि आमदनी की बात करें तो 25-30 हजार प्राप्त कर सकते हैं। देश के जागरूक किसान देश की प्रमुख कंपनियों के नए व पुराने ट्रैक्टर उचित मूल्य पर खरीदने, लोन, इंश्योरेंस, अपने क्षेत्र के डीलरों के नाम जानने, आकर्षक ऑफर व कृषि क्षेत्र की नवीनतम अपडेट जानने के लिए ट्रैक्टर जंक्शन के साथ बनें रहिए।

जानें चंदन की खेती कैसे करें ( Indian Sandalwood Plantation )

जानें चंदन की खेती कैसे करें ( Indian Sandalwood Plantation )

चंदन की खेती : कम जमीन में ज्यादा कमाई देशभर के किसान भाइयों का ट्रैक्टर जंक्शन पर एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं करोड़पति बनने की। चंदन की खेती से जुडक़र किसान करोड़पति बन सकते हैं। बशर्तें उन्हें धैर्य के साथ चंदन की खेती करनी होगी। अगर किसान आज चंदन के पौधे लगाते हैं तो 15 साल बाद किसान अपने उत्पादन को बाजार में बेचकर करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। देश में लद्दाख और राजस्थान के जैसलमेर को छोडक़र सभी भू-भाग में चंदन की खेती की जा सकती है। चंदन के बीज/ पौधे/मिट्टी चंदन की खेती के लिए किसानों को सबसे पहले चंदन के बीज या फिर छोटा सा पौधा या लाल चंदन के बीज लेने होंगे जो कि बाजार में उपलब्ध है। चंदन का पेड़ लाल मिट्टी में अच्छी तरह से उगता है। इसके अलावा चट्टानी मिट्टी, पथरीली मिट्टी और चूनेदार मिट्टी में भी ये पेड़ उगाया जाता है। हालांकि गीली मिट्टी और ज्यादा मिनरल्स वाली मिट्टी में ये पेड़ तेजी से नहीं उग पाता। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ चंदन खेती : बुवाई का समय/जलवायु अप्रैल और मई का महीना चंदन की बुवाई के लिए सबसे अच्छा होता है। पौधे बोने से पहले 2 से 3 बार अच्छी और गहरी जुताई करना जरूरी होता है। जुताई होने के बाद 2x2x2 फीट का गहरा गड्ढ़ा खोदकर उसे कुछ दिनों के लिए सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर आपके पास काफी जगह है तो एक खेत में 30 से 40 सेमी की दूरी पर चंदन के बीजों को बो दें। मानसून के पेड़ में ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें सिंचाई की जरूरत होती है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इसके लिए 7 से 8.5 एचपी वाली मिट्टी उत्तम होती है। एक एकड़ भूमि में औसतन 400 पेड़ लगाए जाते हैं। इसकी खेती के लिए 500 से 625 मिमी वार्षिक औसम बारिश की आवश्यकता होती है। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती चंदन की खेती में पौधरोपण चंदन का पौधा अद्र्धजीवी होता है। इस कारण चंदन का पेड़ आधा जीवन अपनी जरुरत खुद पूरी करता है और आधी जरूरत के लिए दूसरे पेड़ की जड़ों पर निर्भर रहता है। इसलिए चंदन का पेड़ अकेले नहीं पनपता है। अगर चंदन का पेड़ अकेला लगाया जाएगा तो यह सूख जाएगा। जब भी चंदन का पेड़ लगाएं तो उसके साथ दूसरे पेड़ भी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि चंदन के कुछ खास पौधे जैसे नीम, मीठी नीम, सहजन, लाल चंदा लगाने चाहिए जिससे उसका विकास हो सके। यह भी पढ़ें : राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना चंदन की खेती में खाद प्रबंधन चंदन की खेती में जैविक खादकी अधिक आवश्यकता नहीं होती है। शुरू में फसल की वृद्धि के समय खाद की जरुरत पड़ती है। लाल मिट्टी के 2 भाग, खाद के 1 भाग और बालू के 1 भाग को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गाद भी पौधों को बहुत अच्छा पोषण प्रदान करता है। चंदन की खेती में सिंचाई प्रबंधन बारिश के समय में चंदन के पेड़ों का तेजी से विकास होता है लेकिन गर्मी के मौसम में इसकी सिंचाई अधिक करनी होती है। सिंचाई मिट्टी में नमी और मौसम पर निर्भर करती है। शुरुआत में बरसात के बाद दिसंबरसे मई तक सिंचाई करना चाहिए। रोपण के बाद जब तक बीज का 6 से 7 सप्ताह में अंकुरण शुरू ना हो जाए तब तक सिंचाई को रोकना नहीं चाहिए। चंदन की खेती में पौधों के विकास के लिए मिट्टी का हमेशा नम और जल भराव होना चाहिए। अंकुरित होने के बाद एक दिन छोडक़र सिंचाई करें। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू चंदन की खेती में खरपतवार चंदन की खेती करते समय, चंदन के पौधे को पहले साल में सबसे अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। पहले साल में पौधों के इर्द-गिर्द की खरपतवारको हटाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो दूसरे साल भी साफ-सफाई करनी चाहिए। किसी भी तरह का पर्वतारोही या जंगली छोटा कोमला पौधा हो तो उसे भी हटा देना चाहिए। चंदन की खेती में कीट एवं रोग नियंत्रण चंदन की खेती में सैंडल स्पाइक नाम का रोग चंदन के पेड़ का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। इस रोग के लगने से चंदन के पेड़ सभी पत्ते ऐंठाकर छोटे हो जाते हैं। साथ ही पेड़ टेड़े-मेढ़े हो जाते हैं। इस रोग से बचाव के लिए चंदन के पेड़ से 5 से 7 फीट की दूरी पर एक नीम का पौधा लगा सकते हैं जिससे कई तरह के कीट-पंतगों से चंदन के पेड़ की सुरक्षा हो सकेगी। चंदन के 3 पेड़ के बाद एक नीम का पौधा लगाना भी कीट प्रबंधन का बेहतर प्रयोग है चंदन की फसल की कटाई चंदन का पेड़ जब 15 साल का हो जाता है तब इसकी लकड़ी प्राप्त की जाती है। चंदन के पेड़ की जड़े बहुत खुशबूदार होती है। इसलिए इसके पेड़ को काटने की बजाय जड़ सहित उखाड़ लिया जाता है। पौधे को रोपने के पांच साल बाद से चंदन की रसदार लकड़ी बनना शुरू हो जाता है। चंदन के पेड़ को काटने पर उसे दो भाग निकलते हैं। एक रसदार लकड़ी होती है और दूसरी सूखी लकड़ी होती है। दोनों ही लकडिय़ों का मूल्य अलग-अलग होता है। चंदन का बाजार भाव देश में चंदन की मांग इतनी है कि इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती है। देश में चंदन की मांग 300 प्रतिशत है जबकि आपूर्ति मात्र 30 प्रतिशत है। देश के अलावा चंदन की लकड़ी की मांग चाइना, अमेरिका, इंडोनेशिया आदि देशों में भी है। वर्तमान में मैसूर की चंदन लडक़ी के भाव 25 हजार रुपए प्रति किलो के आसपास है। इसके अलावा बाजार में कई कंपनियां चंदन की लडक़ी को 5 हजार से 15 हजार रुपए किलो के भाव से बेच रही है। एक चंदन के पेड़ का वजन 20 से 40 किलो तक हो सकता है। इस अनुमान से पेड़ की कटाई-छंटाई के बाद भी एक पेड़ से 2 लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले चंदन के पेड़ से करोड़पति बनने की राह आसान अगर कोई किसान चंदन के सौ पेड़ रोपता है और उसमें से अगर 70 पेड़ भी बड़े हो जाते हैं तो किसान 15 साल बाद पेड़ों को काटकर और बाजार में भेजकर एक करोड़ रुपए आसानी से प्राप्त कर सकता है। यह किसी भी बैंक में एफडी और प्रॉपर्टी में निवेश से भी कई गुना ज्यादा आपको लाभ दे सकता है। चंदन की खेती के लिए लोन देश में अब कई राष्ट्रीयकृत बैंक और को-ऑपरेटिव बैंक भी चंदन की खेती के लिए बैंक लोन उपलब्ध करा रही है। चंदन की खेती के नियम देश में साल 2000 से पहले आम लोगों को चंदन को उगाने और काटने की मनाही थी। सात 2000 के बाद सरकार ने अब चंदन की खेती को आसान बना दिया है। अगर कोई किसान चंदन की खेती करना चाहता है तो इसके लिए वह वन विभाग से संपर्क कर सकता है। चंदन की खेती के लिए किसी भी तरह के लाइसेंस की जरूरत नहीं होती है। केवल पेड़ की कटाई के समय वन विभाग से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है जो आसानी से मिल जाता है। जानकारी : चंदन / चंद की प्रजाति / रक्तचंदन औषधी वनस्पती पूरे विश्व में चंदन की 16 प्रजातियां है। जिसमें सेंलम एल्बम प्रजातियां सबसे सुगंधित और औषधीय मानी जाती है। इसके अलावा लाल चंदन, सफेद चंदन, सेंडल, अबेयाद, श्रीखंड, सुखद संडालो प्रजाति की चंदन पाई जाती है। यह भी पढ़ें : अनुबंध खेती जानकारी : जानिए क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती / संविदा खेती चंदन के बीज तथा पौधे कहां पर मिलते हैं? चंदन की खेती के लिए बीज तथा पौधे दोनों खरीदे जा सकते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार की लकड़ी विज्ञान तथा तकनीक (Institute of wood science & technology) संस्थान बैंगलोर में है। यहां से आप चंदन की पौध प्राप्त कर सकते हैं। पता इस प्रकार है : Tree improvement and genetics division Institute of wood science and technology o.p. Malleshwaram Bangalore – 506003 (India) E-mail – [email protected] tel no. – 00 91-80 – 22-190155 fax number – 0091-80-23340529 किसान भाई अधिकारी जानकारी के लिए Institute of Wood Science and Technology – ICFRE की वेबसाइट iwst.icfre.gov.in पर संपर्क कर सकते हैं। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना

क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती : मध्यप्रदेश के 15 जिलों के लिए सरकार की सौगात ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती की। इन दिनों उद्यानिकी विभाग का फोकस क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती पर है। इसका लाभ देने के लिए किसानों से समय-समय पर आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। मध्यप्रदेश में क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती की आवेदन प्रक्रिया शुरू की गई है जो लक्ष्य पूर्ति तक जारी रहेगी। मध्यप्रदेश उद्यानिकी योजना/क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती के आवेदन केंद्र की मोदी सरकार उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा देने के लिए बहुत सी योजनाएं संचालित कर रही है। किसानों को इसका लाभ देने के लिए समय-समय पर आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। फरवरी 2020 में एक बार फिर मध्यप्रदेश उद्यानकी विभाग ने विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत आवेदन मांगे है। इस बार आवेदन ऑनलाइन न होकर ऑफलाइन है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती के विभिन्न घटकों के लिए मध्यप्रदेश के किसानों से आवेदन मांगे गए हैं। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ ग्रीन हाउस ढांचा और शेड नेट हाउस योजना/सब्सिडी मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत क्लस्टर आधरित संरक्षित खेती के घटक ग्रीन हाउस ढांचा (ट्यूबलर स्ट्रक्चर) व शेड नेट हाउस (टयूब्लर स्ट्रक्चर) के लिए आवेदन मांगे गए हैं। इस योजना में किसान जरबेरा, उच्च कोटि की सब्जियों की खेती पाली हाउस/शेड नेट हाउस में करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। साथ ही किसान ग्रीन हाउस ढांचा (ट्यूबलर स्ट्रक्चर) 2080 से 4000 वर्ग मीटर तक में संरक्षित खेती करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। सरकार की ओर से 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी का प्रावधान है। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम पुष्प क्षेत्र विस्तार व काजू क्षेत्र विस्तार योजना मध्यप्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत पुष्प क्षेत्र विस्तार के अंतर्गत खुले फूल तथा काजू क्षेत्र विस्तार के अंतर्गत काजू सामान्य दूरी (7 मीटर x 7 मीटर) के लिए आवेदन मांगा है। क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती में आवेदन क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती योजना की विभिन्न घटक योजनाओं के लिए अलग-अलग जिलों के किसान आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए अलग-अलग घटक योजना के लिए अलग-अलग वर्ग के िकसान आवेदन कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : जानें क्या है, किसान कर्ज माफी योजना शेड नेट हाउस (ट्यूबलर स्ट्रक्चर) इस योजना में भोपाल, सीहोर, खंडवा, शाजापुर, इंदौर व बैतूल जिले के सामान्य वर्ग के किसानों से आवेदन मांगे गए हैं। वहीं देवास जिले में सभी वर्ग के किसानों से आवेदन मांगे गए हैं। ग्रीन हाउस ढांचा (ट्यूबलर स्ट्रक्चर)-2080 से 4000 वर्ग मीटर तक इस योजना के लिए छिंदवाड़ा जिले के सभी वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। ग्रीन हाउस ढांचा (जरबेरा) इस योजना के लिए छिंदवाड़ा जिले के सामान्य वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। पाली हाउस/शेड नेट हाउस (उच्च कोटि की सब्जियों की खेती) इस योजना के लिए छिंदवाड़ा जिले के सामान्य वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा अलीराजपुर जिले के अनुसूचित जनजाति के किसान आवेदन कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें पुष्प क्षेत्र विस्तार योजना इस योजना में मध्यप्रदेश में फूलों की खेती करने के लिए छोटे तथा मझोले किसान आवेदन कर सकते हैं। छतरपुर और टीकमगढ़ जिले के सभी वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। काजू क्षेत्र विस्तार योजना/सब्सिडी काजू क्षेत्र विस्तार योजना के तहत काजू सामान्य दूरी (7 मीटर x 7 मीटर) ड्रिप रहित योजना के लिए मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के किसान आवेदन कर सकते हैं। इस योजना में बैतूल, छिंदवाड़ा, बालाघाट तथा सिवनी जिलों के सभी वर्ग के किसान आवेदन कर सकते हैं। वहीं मंडला तथा डिंडोरी जिलों के सामान्य एवं अनुसूचित जनजाति के किसान आवेदन कर सकते हैं। इसके तहत किसानों को प्रथम वर्ष 40 प्रतिशत 20,000 प्रति हेक्टेयर एवं द्वितीय वर्ष 75 प्रतिशत एवं तृतीय वर्ष 90 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाता है यदि फसल बची रहे तो। यह भी पढ़ें : जानें डेयरी लोन कैसे ले आवेदन शुरू मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत क्लस्टर आधारित संरक्षित खेती के लिए आवेदन शुरू हो चुका है। जो लक्ष्य की पूर्ति तक चलेगा। आवेदन 19 फरवरी से शुरू हो गया है। किसानों से आवेदन लक्ष्य से दस प्रतिशत अधिक लिया जाएगा। आवेदन की प्रक्रिया इस योजना में अब तक आवेदन ऑनलाइन होता था। इस बार कलस्टर आधारित संरक्षित खेती के लिए आवेदन ऑफलाइन मांगे गए हैं। वर्तमान में संचालनालय के निर्देश के अनुसार राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के घटकों में आवेदन जिला उप/सहायक स्तर पर लिए जाएंगे न की कृषक स्तर से। इसलिए आवेदक आवेदन के लिए संबंधित जिला कार्यालय उद्यानिकी पर संपर्क करें। किसान अधिक जानकार के लिए https://mpfsts.mp.gov.in/mphd/#/ पर संपर्क कर सकता है। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

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