ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई यंत्र से पानी की 50 फीसदी बचत, उत्पादन बढ़ाएं

ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई यंत्र से पानी की 50 फीसदी बचत, उत्पादन बढ़ाएं

30 July, 2020

ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई यंत्र अपनाएं, पानी बचाएं, उत्पादन बढ़ाएं

वर्तमान में देश के अधिकांश राज्यों में जल स्तर बहुत नीचे जा चुका है। इससे हर तरफ पानी की कमी होने लगी है। इसका प्रभाव कृषि के क्षेत्र पर भी पड़ा है। पानी की कमी के कारण कई किसानों ने धान की खेती करना ही छोड़ दिया है और अन्य कम पानी में उगने वाली फसलों की तरफ अपना रूख कर लिया है क्योंकि धान की फसल उगाने में सबसे ज्यादा पानी खर्च होता है जो किसान के लिए बहुत महंगा पड़ रहा है। इसको देखते हुए हरियाणा सरकार ने राज्य के किसानों से धान की खेती नहीं करने का आग्रह तक कर दिया और धान की खेती छोडक़र अन्य फसल उत्पादन करने पर 7 हजार रुपए प्रति एकड़ देने की घोषणा तक की। इसके अलावा अन्य फसलों को उगाने वाले किसानों को अतिरिक्त पानी देने की पेशकश की गई।

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1

 

इन सब बातों को देखकर आज आवश्यकता ऐसे सिंचाई यंत्रों का चुनाव करने की है जो पानी की बचत के साथ ही उत्पादन को भी बढ़ाने में सहायक हो। इसके लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्राप मोर-माइक्रोइरीगेश कार्यक्रम किसानों के लिए बेहद मददगार साबित हो सकता है।

इस योजना के तहत किसानों ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई यंत्रों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके लिए सरकार इन यंत्रों को खरीदने के लिए अनुदान भी देती है। ये अनुदान हर राज्य की राज्य सरकारों के हिसाब से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हो सकता है। फिलहाल अभी यह योजना उत्तरप्रदेश में चल रही है। इस योजना के तहत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई यंत्र हेतु लक्ष्य पूरे होने तक आवेदन किए जा सकते हैं।

 

 

क्या प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना

भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना लागू की गई है जिसके उपघटक पर ड्रॉप मोर क्राप-माइक्रोइरीगेशन कार्यक्रम के अन्तर्गत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी ढंग से विभिन्न फसलों में अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस सिंचाई पद्धति को अपनाकर 40-50 प्रतिशत पानी की बचत के साथ ही 35-40 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि एवं उपज के गुणवत्ता में सुधार संभव है। 

 

ड्रिप सिंचाई यंत्र की उपयोगिता

टपक सिंचाई में पेड़ पौधों को नियमित जरुरी मात्रा में पानी मिलता रहता है ड्रिप सिंचाई विधि से उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक लाभ मिलता है। इस विधि से 60 से 70 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। इस विधि से ऊंची-नीची जमीन पर सामान्य रुप से पानी पहुंचता है। इसमें सभी पोषक तत्व सीधे पानी से पौधों के जड़ों तक पहुंचाया जाता है तो अतिरिक्त पोषक तत्व बेकार नहीं जाता, जिससे उत्पादकता में वृद्धि होती है। इस विधि में पानी सीधा जड़ों तक पहुंचाया जाता है और आस-पास की जमीन सूखी रहती है, जिससे खरपतवार भी नहीं पनपते हैं। ड्रिप सिंचाई में जड़ को छोडक़र सभी भाग सूखा रहता है, जिससे खरपतवार नहीं उगते हैं, निराई-गुड़ाई का खर्च भी बच जाता है।

 

फव्वारा ( स्प्रिंकल ) सिंचाई यंत्रों की उपयोगिता

स्प्रिंकल विधि से सिंचाई में पानी को छिडक़ाव के रूप में किया जाता है, जिससे पानी पौधों पर बारिश की बूंदों की तरह पड़ता है। पानी की बचत और उत्पादकता के हिसाब से स्प्रिंकल विधि ज्यादा उपयोगी मानी जाती है। ये सिंचाई तकनीक ज्यादा लाभदायक साबित हो रहा है। चना, सरसों और दलहनी फसलों के लिए ये विधि उपयोगी मानी जाती है। सिंचाई के दौरान ही पानी में दवा मिला दी जाती है, जो पौधे की जड़ में जाती है। ऐसा करने पर पानी की बर्बादी नहीं होती।

विधि से लाभ इस विधि से पानी वर्षा की बूदों की तरह फसलों पर पड़ता है, जिससे खेत में जलभराव नहीं होता है। जिस जगह में खेत ऊंचे-नीचे होते हैं वहां पर सिंचाई कर सकते हैं। इस विधि से सिंचाई करने पर मिट्टी में नमी बनी रहती है और सभी पौधों को एक समान पानी मिलता रहता है। इसमें भी सिंचाई के साथ ही उर्वरक, कीटनाशक आदि को छिडक़ाव हो जाता है। पानी की कमीं वाले क्षेत्रों में विधि लाभदायक साबित हो रही है। 

 

कितना मिलता है अनुदान

अनुदान देता है विभाग टपक व फव्वारा सिंचाई के लिए लघु एवं सीमांत किसान को 90 फीसदी अनुदान सरकार की तरफ से दिया जाता है। इसमें 50 प्रतिशत केंद्रांश व 40 फीसदी राज्यांश शामिल है। दस फीसदी धनराशि किसानों को लगानी होती है। सामान्य किसानों को 75 प्रतिशत अनुदान मिलेगा। 25 प्रतिशत किसानों को अपनी पूंजी लगानी होती है। 

 

किसान अपनी कोई भी पसंदीदा कंपनी से खरीद सकता है यंत्र

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्राप मोर-माइक्रोइरीगेश कार्यक्रम के तहत लघु सीमांत किसानों को 90 प्रतिशत का और सामान्य किसानों को 80 प्रतिशत अनुदान डीबीटी के द्वारा दिया जाता है। चयनित होने के बाद किसान किसी भी अपनी पसंदीदा कंपनी से खरीददारी कर सकता है। स्प्रिंकलर पोर्टेबल और रैन गन के लिए किसान को पहले अपनी जेब से पैसा लगाना होगा। इसके बाद बिल और बाउचर विभाग में सम्मिट करने पर अनुदान की धनराशि किसान के खाते में दी जाती है।

 

प्रशिक्षण, कार्यशाला व गोष्ठी का आयोजन

योजनान्तर्गत लाभार्थी कृषकों के लिए समय-समय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण, प्रदेश से बाहर कृषक भ्रमण एवं मंडल स्तर पर कार्यशाला / गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। इस विधा के अंगीकरण हेतु लाभार्थी कृषकों के लिए तकनीकी जानकारी एवं कौशल अभिवृद्धि की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।

 

योजना का कार्यक्षेत्र

उत्तर प्रदेश के सभी जनपद योजना से आच्छादित हैं । प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अतिदोहित (111 विकास खण्ड) क्रिटिकल (68 विकास खण्ड) सेमी क्रिटिकल (82 विकास खण्ड) के अतिरिक्त पर ड्रॉप मोर क्रोप के अदर इन्टरवेन्शन में निर्मित/जीर्णोद्धार किए गए तालाबों के क्लस्टर सम्मिलित हैं।

 

योजना के लाभार्थी / पात्रता

  • योजना का लाभ सभी वर्ग के कृषकों के लिए अनुमन्य है।
  • योजना का लाभ प्राप्त करने हेतु इच्छुक कृषक के पास स्वयं की भूमि एवं जल स्रोत उपलब्ध हों।
  • योजना का लाभ सहकारी समिति के सदस्यों, सेल्फ हेल्प गु्रप, इनकार्पोरेटेड कम्पनीज, पंचायती राज संस्थाओं, गैर सहकारी संस्थाओं, ट्रस्ट्स, उत्पादक कृषकों के समूह के सदस्यों को भी अनुमन्य।
  • ऐसे लाभार्थियों / संस्थाओं को भी योजना का लाभ अनुमन्य होगा जो संविदा खेती (कान्टै्क्ट फार्मिंग) अथवा न्यूनतम 7 वर्ष के लीज एग्रीमेन्ट की भूमि पर बागवानी/खेती करते हैं।
  • एक लाभार्थी कृषक/संस्था को उसी भू-भाग पर दूसरी बार 7 वर्ष के पश्चात् ही योजना का लाभ अनुमन्य होगा।
  • लाभार्थी कृषक अनुदान के अतिरिक्त अवशेष धनराशि स्वयं के स्रोत से अथवा ऋण प्राप्त कर वहन करने हेतु सक्षम व सहमत हों।

 

योजना के लिए कैसे कराएं पंजीकरण

  • इच्छुक लाभार्थी कृषक किसान पारदर्शी योजना के पोर्टल http://upagriculture.com/ पर अपना पंजीकरण कराकर प्रथम आवक प्रथम पावक के सिंद्धात पर योजना का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
  • पंजीकरण हेतु किसान के पहचान हेतु आधार कार्ड, भूमि की पहचान हेतु खतौनी एवं अनुदान की धनराशि के अन्तरण हेतु बैंक पासबुक के प्रथम पृष्ठ की छाया प्रति अनिवार्य है।

 

निर्माता फर्मों का चयन

  • प्रदेश में ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली स्थापित करने वाली पंजीकृत निर्माता फर्मां में से किसी भी फर्म से कृषक अपनी इच्छानुसार आपूर्ति/स्थापना का कार्य कराने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • निर्माता फर्मों अथवा उनके अधीकृत डीलर/डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा बी.आई.एस. मानकों के अनुरूप विभिन्न घटकों की आपूर्ति करना अनिवार्य होगा और न्यूनतम 3 वर्ष तक फ्री ऑफ्टर सेल्स सर्विस की सुविधा की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।

 

भौतिक सत्यापन के बाद होगा अनुदान का भुगतान

निर्माता फर्मां के स्वयं मूल्य प्रणाली के आधार पर भारत सरकार द्वारा निर्धारित इकाई लागत के सापेक्ष जनपद स्तरीय समिति द्वारा भौतिक सत्यापन के उपरान्त अनुदान की धनराशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांस्फर (डी.वी.टी.) द्वारा सीधे लाभार्थी के खाते में अन्तरित की जाएगी।

विशेष - हालांकि हमने आपको योजना के संबंध में पूर्ण जानकारी देने का प्रयास किया है। यदि आप इस योजना के संबंध में ओर अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो http://upagriculture.com/ पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं। 

 

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पपीते की खेती : एक सीजन में कमाएं 10 लाख रुपए, इन किस्मों का करें चयन

पपीते की खेती : एक सीजन में कमाएं 10 लाख रुपए, इन किस्मों का करें चयन

जानें कैसे करें पपीते की उन्‍नत खेती ( Papita ki Kheti ) फलों में पपीते का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह फल कच्चा और पकाकर दोनों तरीके से उपयोग में लाया जाता है। भारत में अधिकांश हिस्सों में इसकी खेती की जाती है। पपीते में भरपूर मात्रा में विटामिन ए पाया जाता है। जिन लोगों को अपच की समस्या है उनके लिए तो पपीता रामबाण इलाज है। इसके सेवन से अपच की समस्या खत्म हो जाती है। ये फल पित्त का शमन तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है। इसलिए जब हम बीमार हो जाते हैं तो डाक्टर भी हमें पपीता खाने की सलाह देता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में पानी होता है जो त्वचा को नम रखने में सहायक होता है। इसके अलावा पपीते का इस्तेमाल घरेलू सौंदर्य प्रसाधन में भी किया जाता है। कई लोग पपीते के गूदे को चहरे पर लगाते हैं जिससे चहरे पर निखार आता है और त्वचा में नमी बनी रहती है। पपीते का सौंदर्य जगत तथा उद्योग जगत में व्यापक प्रयोग किया जाता है। यदि इसकी उन्नत तरीके की खेती की जाए तो कम लागत पर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। यही नहीं इसकी खेती के साथ ही इसकी अंत:वर्तीय फसलों को भी बोया जा सकता है। इनमें दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि की फसल इसके साथ ली जा सकती है लेकिन ध्यान रखें इसके साथ मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिंडी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंत:वर्तीय फसलों के रूप में नहीं उगाना चाहिए। इससे पपीते के पौधे को हानि होती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 पपीते में पाए जाने वाले पोषक तत्व पपीते का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है। पपीता कैरिकेसी परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य है। पपीता एक बहुलिडीस पौधा है तथा मुरकरटय से तीन प्रकार के लिंग नर, मादा तथा नर व मादा दोनों लिंग एक पेड़ पर होते हैं। इसमें विटामिन ए पाया जाता है। कच्चे फल से पपेन बनाया जाता है। इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है। भारत में कहां - कहां होती है इसकी खेती देश की विभिन्न राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिज़ोरम में इसकी खेती की जाती है। अब तो पूरे भारत में इसकी खेती की जाने लगी है। पपीते की उन्नत किस्में पूसा डोलसियरा यह अधिक ऊपज देने वाली पपीते की गाइनोडाइसियश प्रजाति है। जिसमें मादा तथा नर-मादा दो प्रकार के फूल एक ही पौधे पर आते हैं पके फल का स्वाद मीठा तथा आकर्षक सुगंध लिये होता है। इस किस्म से करीब 40-45 किग्रा प्रति पेड़ उपज प्राप्त की जा सकती है। पूसा मेजेस्टी यह भी एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है। इसकी उत्पादकता अधिक है, तथा भंडारण क्षमता भी अधिक होती है। यह पूरे भारत वर्ष में उगाई जा सकती है। इसकी उपज की बात करें तो इसकी उपज 35-40 किग्रा प्रति पेड़ प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा इसकी अन्य किस्मों में पूसा जॉयंट जिससे प्रति पेड़ 30-35 किग्रा उपज प्रति पेड़, पूजा ड्वार्फ़ किस्म जिससे 40-45 किग्रा उपज प्रति पेड़ तथा पूसा नन्हा किस्म जिससे 25-30 किलोग्राम उपज प्रति पेड़ प्राप्त की जा सकती है। पपीते की संकर किस्म- रेड लेडी 786 पपीते की एक नई किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा विकसित की गई है, जिसे रेड लेडी 786 नाम दिया है। यह एक संकर किस्म है। इस किस्म की खासियत यह है कि नर व मादा फूल ही पौधे पर होते हैं, लिहाजा हर पौधे से फल मिलने की गारंटी होती है। पपीते की अन्य किस्मों में नर व मादा फूल अलग-अलग पौधे पर लगते हैं, ऐसे में फूल निकलने तक यह पहचानना कठिन होता है कि कौन सा पौधे नर है और कौन सा मादा। इस नई किस्म की एक ख़ासियत यह है कि इसमें साधारण पपीते में लगने वाली पपायरिक स्काट वायरस नहीं लगता है। यह किस्म सिर्फ 9 महीने में तैयार हो जाती है। इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी ज्यादा होती है। पपीते में एंटी आक्सीडेंट पोषक तत्व कैरोटिन,पोटैशियम,मैग्नीशियम, रेशा और विटामिन ए, बी, सी सहित कई अन्य गुणकारी तत्व भी पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। इसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, झारखंड और राजस्थान में भी उगाया जा रहा है। पपीते की खेती का उचित समय वैसे तो इसकी खेती साल के बारहों महीने की जा सकती है लेकिन इसकी खेती का उचित समय फरवरी और मार्च एवं अक्टूबर के मध्य का माना जाता है, क्योंकि इस महीनों में उगाए गए पपीते की बढ़वार काफी अच्छी होती है। पपीते की खेती के लिए जलवायु व भूमि पपीते की अच्छी खेती गर्म नमी युक्त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है, न्यूनतम 5 डिग्री सेल्सियस से कम नही होना चाहिए लू तथा पाले से पपीते को बहुत नुकसान होता है। पपीता बहुत ही जल्दी बढऩे वाला पेड़ है। साधारण ज़मीन, थोड़ी गर्मी और अच्छी धूप मिले तो यह पेड़ अच्छा पनपता है, पर इसे अधिक पानी या ज़मीन में क्षार की ज़्यादा मात्रा रास नहीं आता है। वहीं पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी. एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है। पपीता की नर्सरी कैसे तैयार करें / पौधे तैयार करना पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम पर्याप्त होती है। बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे की जार या बोतल में रखा हो जिसका मुंह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है। बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को उपचारित करना चाहिए। बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊंची उठी हुई संकरी होनी चाहिए इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं। इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू, तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्र में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं। जिस स्थान पर नर्सरी हो उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ़ कर देना चाहिए तथा जमीन को 2 प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए। वह स्थान जहां तेज धूप तथा अधिक छाया न आए चुनना चाहिए। एक एकड़ के लिए 4059 मीटर जमीन में उगाए गए पौधे काफी होते हैं। इसमें 2.5 * 10 * 0.5 आकार की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें, और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें। इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2' गहराई पर 3' * 6' के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दे और फिर 1/2' गोबर की खाद के मिश्रण से ढक कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाए। यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें तो इनमें भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें। बोई गई क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह शाम होज द्वारा पानी दें। बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं। जब इन पौधों में 4-5 पत्तियां और ऊंचाई 25 से.मी. हो जाए तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सडऩ और उकठा रोग लग जाता है। उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल, जून-अगस्त में उगाने चाहिए। खेत की तैयारी पौधे लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ताकि पानी न भर सकें। फिर पपीता के लिए 50*50*50 सेमी आकार के गड्ढे 1.5*1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बी.एच.सी. 10 प्रतिशत डस्ट मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए। ऊंची बढऩे वाली किस्मों के लिए 1.8*1.8 मीटर फासला रखना चाहिए। पौधे 20-25 सेमी के फासले पर लगाने चाहिए। पपीते के रोपण आपने जो खेत में 2 *2 मीटर की दूरी पर 50*50*50 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदें थे उन्हें 15 दिनों के लिए खुले छोड़ दें ताकि ताकि गड्ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े - मकोड़े व रोगाणु आदि नष्ट हो जाएं। इसके बाद पौधे का रोपण करना चाहिए। पौधे लगाने के बाद गड्ढे को मिट्टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊंचा रहे। गड्ढे की भराई के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाए। पौधे लगाते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए जिससे पानी तने से न लगे। खाद व उर्वरक पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है। इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरुरत है। अत: अच्छी फ़सल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फ़ॉस्फऱस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधे 20-25 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, एक किलोग्राम बोनमील और एक किलोग्राम नीम की खली की जरुरत पड़ती है। खाद की यह मात्र तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्टूबर महीनों में देनी चाहिए। पपीता जल्दी बढऩे व फल देने वाला पौधा है, जिसके कारण भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्व निकल जाते हैं। लिहाजा अच्छी उपज हासिल करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे हर साल देना चाहिए। नाइट्रोजन की मात्रा को 6 भागों में बांट कर पौधा रोपण के 2 महीने बाद से हर दूसरे महीने डालना चाहिए। फास्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए। उर्वरकों को तने से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधे के चारों ओर बिखेर कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा फरवरी-मार्च और आधी जुलाई-अगस्त में देनी चाहिए। उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। सिंचाई व अन्य क्रियाएं पपीता के पौधों की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिट्टी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्यत: शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीक अपना सकते हैं। इसके अलावा समय-समय पर इसके पौधों के आसपास उगने वाली खरपतवार को भी हटाते रहे। वैसे तो इसमें यह समस्या कम ही रहती है पर बारिश के दिनों में खरपतवार का उग जाती है इसे हटा देना चाहिए। इसके अलावा शीत ऋतु में पाले से बचाने के लिए खेत में धुआँ करना चाहिए तथा खेत में नमी बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। पपीते के कीट व नियंत्रण के उपाय एफिड - कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस गोसीपाई, माइजस परसिकी है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। तथा पौधे में मौजेक रोग के वाहक का कार्य करते है। नियंत्रण का उपाय - मिथाइल डेमेटान या डायमिथोएट की 2 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर पौधरोपण के बाद आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतर से पत्तियों पर छिडक़ाव करना चाहिए। लाल मकड़ी - इसे वैज्ञानिक भाषा में ट्रेट्रानायचस सिनोवेरिनस कहते है। यह पपीते का प्रमुख कीट है जिसके आक्रमण से फल खुरदुरे और काले रंग के हो जाते है। तथा पत्तियां पर आक्रमण की स्थिति में फफूंद पीली पड़ जाती है। नियंत्रण का उपाय - पौधे पर आक्रमण दिखते ही प्रभावित पत्तियों को तोडक़र दूर गड्ढे में दबा देना चाहिए। वेटेबल सल्फर 2.5 ग्राम/ ली. या डाइकोफॉल 18.5 ईसी की 2.5 मिली या ओमाइट 1.5 मिली मात्रा / ली. पानी में मिलाकर छिडक़ाव करना चाहिए। पपीते की तुड़ाई कब करें पपीत के पूर्ण रूप से परिपक्व फलों को जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डंठल सहित इसकी तुड़ाई करनी चाहिए। तुड़ाई के बाद स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लेना चाहिए तथा सड़े-गले फलों को अलग हटा देना चाहिए। पपीते के फलों से पपेन निकालने की विधि व उत्पादन साधारणत: पपेन को पपीते के कच्चे फलों से निकला जाता है। पपेन के लिए 90-100 दिन विकसित कच्चे फलों का चुनाव करना चाहिए। कच्चे चुने हुए फलों से सुबह 3 मि.मी. गहराई के 3-4 चीरे गोलाई आकार में लगाने चाहिए। इसके पूर्व पौधों पर फलों से निकलने वाले दूध को एकत्रित करने के लिए प्लास्टिक के बर्तन को तैयार रखना चाहिए। फलों पर प्रथम बार के ( चीरा लगाने के बाद ) 3-4 दिनों बाद पुन: चीरा लगाकर पपेन एकत्रित करना चाहिए। पपेन (दूध) प्राप्त होने के बाद उसमे 0.5 प्रतिशत पोटेशियम मेन्टाबाई सल्फेट परिरक्षक के रूप में मिलाना चाहिए ताकि पपेन को 3-4 दिन तक सुरक्षित रखा जा सके। पपेन को अच्छी तरह सुखाकर पपेन को प्रसंस्करण केंद्र को भेजा जा सकता है। इस प्रकार पपीते की पपेन के लिए उपयुक्त किस्मों सी ओ -2 एवं सी ओ - 5 के पौधों से 100 - 150 ग्राम पपेन प्रति पौधा प्रति वर्ष प्राप्त हो जाता है। इस पपेन को अच्छी तरह सूखाकर पैंकिंग किया जाता है। इस पपेन को अच्छी तरह सुखाकर प्राप्त पपेन को प्रसंस्करण के लिए संयंत्र महाराष्ट्र के जलगाँव तथा येवला ( नासिक ) को भेज जा सकता है। इससे आपको कमाई अच्छी कमाई होगी। इसके अलावा इन फलों से पपेन निकालने के बाद उनसे अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे टूटी फ्रूटी, मुरब्बा बनाया जा सकता है तथा चीरा लगे पके फलों का जैम जेली मुरब्बा रास या गुदा जिसे प्यूरी कहते है बनाकर डिब्बाबंद किया जा सकता है। बता दें कि भारत पपीता प्यूरी का एक बड़ा निर्यातक है। पपीते की प्राप्त उपज / पपीते की खेती से कमाई आमतौर पर पपीते की उन्नत किस्मों से प्रति पौधे 35-50 किलोग्राम उपज मिल जाती है, जबकि इस नई किस्म से 2-3 गुणा ज्यादा उपज मिल सकती है। वहीं पपीते की प्रति हेक्टेयर राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता 317 क्विंटल / हेक्टेयर है। पपीते का एक स्वस्थ पेड़ आपको एक सीजन में करीब 40 किलो तक फल देता है। यदि आप दो पड़ों के बीच करीब 6 फिट का गैप रख सकते हैं और इस हिसाब से आप एक हेक्टेयर में करीब 2250 पेड़ तैयार कर सकते हैं। इस हिसाब से आप एक सीजन में एक हेक्टेयर पपीते की फसल से 900 क्विंटल पपीता पैदा कर सकते हैं। यदि आप संकर पपीते उगाते हैं तो आपको इस प्रकार कमाई प्राप्त हो सकती है- कुल लागत= 165,400 रुपए आती है। कुल उत्पादन ( क्विंटल / हेक्टेयर)= 900 विक्रय से प्राप्त राशि = 405,000 रुपए लाभ लागत अनुपात = 2.44 पपीता की खेती से मुनाफा / शुद्ध लाभ= 1,94,600 इस तरह आप यदि 5 हैक्टेयर में पपीते का उत्पादन करते हैं तो आपको 194600*5 = 9,73,000 रुपए प्राप्त होते हैं। इसके अलावा पपीते का पपेन बेचने से से होने वाली कमाई अलग है। इस प्रकार आप एक सीजन में 10 लाख रुपए तक की कमाई कर सकते हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

रबी की फसल : गेहूं, चना सहित अन्य फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाया

रबी की फसल : गेहूं, चना सहित अन्य फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाया

जानें काली रबी की फसल से जुड़ी संपूर्ण जानकारी कृषि बिलों के विरोध में चारों ओर हो रहे विरोध के बीच कृषि लागत व मूल्य आयोग की सिफारिशों को मानते हुए केंद्र सरकार ने रबी विपणन वर्ष 2021-22 के लिए रबी की फसल का नया एमएसपी घोषित कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों की अनुसार रबी की फसल की बुवाई शुरू होने से पहले से ही एमएसपी घोषित करने के पीछे सरकार किसानों को विश्वास में लेना चाहती है ताकि समर्थन मूल्य पर खरीद को बंद करने जैसी उनकी गलगफहमी दूर हो सके। इसी के साथ सरकार ने यह भी कहा है कि सरकार का समर्थन मूल्य पर किसानों ने उपज खरीदना जारी रहेगा। कृषि बिलों के लागू होने के बाद भी एमएसपी यानि समर्थन मूल्य पर उपजों की खरीद जारी रहेगी। इधर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि सरकार ने रबी की 6 फसलों के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की गई है और अब इसी समर्थन मूल्य पर इस वित्तीय वर्ष रबी उपजों की खरीद की जाएगी। आइए जानते हैं सरकार ने रबी की किस-किस फसल का एमएसपी कितना बढ़ाया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 गेहूं में की 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में सोमवार शाम एमएसपी में वृद्धि के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि गेहूं, चना, मसूर, सरसों, जौ और कुसुम का एमएसपी बढ़ा दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में एमएसपी बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसमें गेहूं का एमएसपी 50 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाकर 1975 रुपए कर दिया गया है। इससे गेहूं किसानों को लागत पर 106 फीसदी तक लाभ मिलेगा। चना के समर्थन मूल्य में 225 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी केंद्रीय कृषि मंत्री तोमर ने सदन को बताया कि सीसीईए ने चना के समर्थन मूल्य में 4.6 फीसदी यानी 225 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी का फैसला किया है. इससे चने का एमएसपी 5,100 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। इससे किसानों को लागत के मुकाबले 78 फीसदी का मुनाफा होगा। वहीं, मोटे अनाज में जौं के समर्थन मूल्य में 4.9 फीसदी या 75 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़त की गई है और इसका एमएसपी 1,600 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। इससे किसानों को लागत पर 65 फीसदी का मुनाफा होगा। मसूर में 300 व सरसों 225 रुपए बढ़ाए संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्रीय मंत्री तोमर ने बताया कि सीसीईए ने मसूर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,100 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया है। इसके एमएसपी में 6.3 फीसदी यानी 300 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। इससे किसानों को लागत पर 78 फीसदी मुनाफा होगा। वहीं, सरसों व रेपसीड का समर्थन मूल्य 5.1 फीसदी यानी 225 रुपए बढ़ाकर 4,650 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। कुसुम, धान, उड़द, मूंग व मूंगफली का एमएसपी भी बढ़ाया कुसुम का एमएसपी 112 रुपए बढ़ाकर 5,327 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। इसके अलावा धान का एमएसपी बढ़ाकर 1868 रुपए, उड़द का 6,000 रुपए, मूंग का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर 7,196 रुपए और मूंगफली का एमएसपी 5,275 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। पिछले साल व इस साल के एमएसपी का तुलानात्मक अध्ययन एक दृष्टि में - उपज वर्ष 2019-20 वर्ष 2020-21 मूल्य में अंतर गेहूं 1925 रुपए 1975 रुपए +50 रुपए चना 4875 रुपए 5,100 रुपए +225 रुपए मसूर 4,800 रुपए 5,100 रुपए +300 रुपए कुसुम 5215 रुपए 5,327 रुपए +112 रुपए सरसों 4425 रुपए 4,650 रुपए +225 रुपए जौ 1525 रुपए 1600 रुपए +75 रुपए (उपरोक्त भाव प्रति क्विंटल में दिए गए हैं। (+) का अर्थ एमएसपी में हुई बढ़ोतरी से है।) अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

काली मिर्च की खेती  : एक एकड़ से सालाना चालीस लाख तक की कमाई

काली मिर्च की खेती : एक एकड़ से सालाना चालीस लाख तक की कमाई

जानें काली मिर्च की खेती से जुड़ी संपूर्ण जानकारी काली मिर्च की विश्व बाजार में बढ़ती मांग के कारण इसकी खेती मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। किसान इसकी खेती करके अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। भारत में प्रतिवर्ष 20 करोड़ रुपए की कालीमिर्च का निर्यात विदेशों को किया जाता है। इसे देखते हुए इसकी खेती किसी भी प्रकार से घाटा नहीं है। भारत में अधिकांशत: इसकी खेती दक्षिणी भारत में की जाती है। छत्तीसगढ़ में किसान इसकी खेती करके अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। यदि इसकी जैविक तरीके से खेती की जाए तो काफी अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। आइए जानते हैं कि किस प्रकार काली मिर्च की खेती कर अच्छी कमाई की जा सकती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 काली मिर्च का परिचय वनस्पति जगत में पिप्पली कुल के मरिचपिप्पली नामक लता जैसे दिखाई देने वाले बारहमासी पौधे के अधपके और सूखे फलों का नाम काली मिर्च है। पके हुए सूखे फलों को छिलकों से बिलगाकर सफेद गोल मिर्च बनाई जाती है जिसका व्यास लगभग 5 मिमी होता है। यह मसाले के रूप में प्रयुक्त होती है। कैसा होता है काली मिर्च का पौधा काली मिर्च के पौधे की पत्तियां आयताकार होती है। इसकी पत्तियों की लम्बाई 12 से 18 सेंटीमीटर की होती है और 5 से 10 सेंटीमीटर की चौड़ाई होती है। इसकी जड़ उथली हुई होती हैं। इसके पौधे की जड़ दो मीटर की गहराई में होती है। ये झाड़ के रूप में विकसीत होता है। कहां - कहां होती है काली मिर्च की खेती काली मिर्च के पौधे का मूल स्थान दक्षिण भारत ही माना जाता है। इसके अलावा त्रावणकोर, कोचीन, मलाबार, मैसूर, कुर्ग, महाराष्ट्र तथा असम के सिलहट और खासी के पहाड़ी इलाकों में भी इसे उपजाया जाता है। अब इसकी खेती छत्तीसगढ़ में भी काफी की जाने लगी है। भारत के अलावा इंडोनेशिया, बोर्नियो, इंडोचीन, मलय, लंका और स्याम इत्यादि देशों में भी इसकी खेती की जाती है। काली मिर्च के गुण व उपयोग आयुर्वेद के अनुसार काली मिर्च की तासीर गर्म होती है। इसके दानों में 5 से 9 प्रतिशत तक पिपेरीन, पिपेरिडीन और चैविसीन नामक ऐल्केलायडों के अतिरिक्त एक सुगंधित तेल 1 से 2.6 प्रतिशत तक, 6 से 14 प्रति शत हरे रंग का तेज सुगंधित गंधाशेष, 30 प्रति शत स्टार्च इत्यादि पाए जाते हैं। काली मिर्च सुगंधित, उत्तेजक और स्फूर्तिदायक वस्तु है। आयुर्वेद और यूनानी चिकित्साशास्त्रों में इसका उपयोग कफ, वात, श्वास, अग्निमांद्य उन्निद्र इत्यादि रोगों में बताया गया है। भूख बढ़ाने और ज्वर की शांति के लिए दक्षिण में तो इसका विशेष प्रकार का रसम भोजन के साथ पिया जाता है। भारतीय भोजन में मसाले के रूप में इसका न्यूनाधिक उपयोग सर्वत्र होता है। पाश्चात्य देशों में इसका विशिष्ट उपयोग विविध प्रकार के मांसों की डिब्बाबंदी में, खाद्य पदार्थो के परिरक्षण के लिए और मसाले के रूप में भी किया जाता है। सफेद मिर्च और काली मिर्च में अंतर सफेद मिर्च, काली मिर्च की एक विशेष किस्म है जिसकी कटाई फसल पकने से पहले ही हो जाती है। सफेद और काली मिर्च दोनों एक ही पौधे के फल हैं; बस अपने रंग की वजह से उनका इस्तेमाल अलग हो जाता है। सफेद काली मिर्च का उपयोग सफेद मिर्च का प्रयोग आमतौर हल्के रंग के व्यंजनों जैसे कि सूप, सलाद, ठंडाई, बेक्ड रेसिपी इत्यादि में किया जाता है। काली मिर्च की खेती कैसे करें काली मिर्च की खेती करना आसान है। इसके लिए कोई विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। कोई भी किसान इसकी खेती कर सकता है। यदि इसकी जैविक तरीके से खेती की जाए तो काफी अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। काली मिर्च की बुवाई के लिए भूमि व जलवायु व तापमान काली मिर्च की खेती के लिए लाल लेटेराइट मिट्टी और लाल मिट्टी उत्तम मानी जाती है। जिस भूमि में काली मिर्च की खेती की जाती है उस खेत की मिट्टी में जल धारण करने की क्षमता होनी चाहिए। भूमि का पी. एच. मान 5 से 6 के बीच होना चाहिए। इसके लिए हल्की ठंड वाली जलवायु उत्तम होती है। इसके लिए न्यूनतम तापमान 10 से 12 डिग्री सेल्सियस होना आवश्यक है। इससे नीचे के तापमान में इसका पौधा बढ़ोतरी नहीं कर पाता है। काली मिर्च के रोपण का उचित समय कलम द्वारा इसका रोपण सितंबर माह के मध्य में किया जाता है। रोपण करने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। काली मिर्च का रोपण कैसे करें काली मिर्च के पौधे के विस्तार करने के लिए कलमों का उपयोग किया जाता है। इसकी एक या दो कलमों को काटकर रोपित किया जाता है। काली मिर्च के कलमों को एक कतार में लगाना चाहिए। कलमों को लगाते समय इनके बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए ताकि इसे फैलने के लिए उचित स्थान मिल सके। एक हेक्टेयर भूमि पर 1666 पौधे होने चाहिए। काली मिर्च की बेल चढ़ाई जाती है। यह ऊंचे पर ये 30 से 45 मीटर तक की ऊंचाई पर चढ़ जाते है। लेकिन इसके फलों को आसानी से लेने के लिए इसकी बेल को केवल 8 से 9 मीटर की ऊंचाई तक ही बढऩे दिया जाता है। काली मिर्च का एक पौधा कम से कम 25 से 30 साल तक फलता-फूलता है। इसकी फसल को कोई छाया की जरूरत नहीं होती है। खाद व उर्वरक खाद की 5 किलोग्राम की मात्रा को मिलाना चाहिए। भूमि में पी. एच. मान के अनुसार अमोनिया सल्फेट और नाइट्रोजन को मिलना चाहिए। इसकी फसल में 100 ग्राम पोटाशियम, 750 ग्राम मैग्नीशियम सल्फेट की मात्रा को भूमि में मिलाना चाहिए। जिस भूमि एम एसिड होता है। उसमें 500 ग्राम डोलोमिटिक चूना को 2 साल में एक बार जरूर प्रयोग करना चाहिए। काली मिर्च की जैविक खेती में परंपरागत प्रजातियों का इस्तेमाल होता है। जो फसल को कीटों, सूत्रकृमियों तथा रोगों से बचाव करने में समर्थ होती हैं। क्योंकि जैविक खेती में किसी भी प्रकार का कृत्रिम रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक या कवकनाशक का उपयोग नहीं होता है। इसलिए उर्वरकों की कमी को पूरा करने के लिए फार्म की सभी फसलों के अवशेष, हरी घास, हरी पत्तियां, गोबर, तथा मुर्गी लीद आदि को कंपोस्ट के रूप में उपयोग करके मृदा की उर्वरता उच्च स्तर की बनाते हैं। इन पौधों की आयु के अनुसार इनमें एफ.वाई.एम. 5-10 कि. ग्राम में प्रति पौधा केंचुआ खाद या पत्तियों के अवशेष (5-10 कि.ग्राम प्रति पौधा) को छिडक़ा जाता है। मृदापरीक्षण के आधार पर फॉस्फोरस और पोटैशियम की न्यूनतम पूर्ति करने के लिए पर्याप्त मात्रा में चूना, रॉक फॉस्फेट और राख का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त उर्वरता और उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए ऑयल केक जैसे नीम केक (1 कि.ग्राम / पौधा ), कंपोस्ट कोयर पिथ (2.5 कि. ग्राम/पौधा) या कंपोस्ट कॉफी का पल्प ( पोटैशियम की अत्यधिक मात्रा ), अजोस्पाइरियलम तथा फॉस्फेट सोलुबिलाइसिंग जीवाणु का उपयोग किया जाता है। पोषक तत्वों के अभाव में फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है। मानकता सीमा या संगठनों के प्रमाण के आधार पर पोषक तत्वों के स्त्रोत खनिज / रसायनों को मृदा या पत्तियों पर उपयोग कर सकते हैं। कब- कब करें सिंचाई इसकी खेती वर्षा पर आधारित है। बारिश नहीं होने की अवस्था में इसकी हल्की सिंचाई करनी चाहिए व आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। इसके रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। उसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई की जा सकती है। कीट व रोग प्रबंधन जैविक खेती में रोगों कीटों, सूत्रकृमियों का प्रबंधन और जैव कीटनाशक, जैव नियंत्रण कारक, आकर्षण और फाइटोसेनीटरी उपायों का उपयोग करके किया जाता है। 21 दिनों के अंतराल में नीम गोल्ड (0.6 प्रतिश ) को छिडक़ा जाता है, यह जुलाई से अक्टूबर के मध्य छिडक़ना चाहिए। इससे पोल्लू बीट को भी नियंत्रण किया जा सकता है। शल्क कीटों को नियंत्रण करने के लिए अत्यधिक बाधित शाखाओं को उखाड़ कर नष्ट कर देना तथा नीम गोल्ड (0.6 प्रतिश) या मछली के तेल की गंधराल (3 प्रतिशत) का छिडक़ाव करना चाहिए। कवक द्वारा उत्पन्न रोगों का नियंत्रण ट्राइकोडरमा या प्सयूडोमोनस जैव नियंत्रण कारकों को मिट्टी में उचित वाहक मीडिया जैसे कोयरपिथ कंपोस्ट, सूखा हुआ गोबर या नीम केक के साथ उपचारित करके किया जा सकता है। साथ ही अन्य रोगों को नियंत्रित 1 त्न बोर्डियो मिश्रण तथा प्रति वर्ष 8 कि.ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से कॉपर का छिडक़ाव करके कर सकते हैं। काली मिर्च के पकने का समय व उत्पादन काली मिर्च के गहरे रंग के घने पौधे पर जुलाई महीने के बीच सफेद और हल्के पीले फूल निकलते है। जनवरी से मार्च के बीच में फल पककर तैयार हो जाते है। फल गोल आकार में 3 से 6 मिमी व्यास के होते है। सूखने पर हर एक पौधे में से 4 से 6 किलोग्राम गोल काली मिर्च प्राप्त हो जाती है। इसके हर एक गुच्छे में 50 से 60 दाने रहते है। पकने के बाद इन गुच्छों को उतारकर भूमि में या चटाईयां बिछाकर रख दिया जाता है। इसके बाद हथेलियों से दानों को रगडक़र इलाज किया जाता है। दानों को अलग करने के बाद इन्हें 5 या 7 दिन तक धूप में सुखा दिया जाता है। जब काली मिर्च के दाने पूरी तरह से सूख जाते है तो इन पर सिकुड़ जाती है और इस पर झुरियां पड़ जाती है। इन दानों का रंग गहरा काला हो जाता है। इस अवस्था में यह काली मिर्च बाजार में बेचने के लिए तैयार हो जाती है। सफेद काली मिर्च बनाना सफेद काली मिर्च तैयार करने के लिए पकी हुई लाल काली मिर्च को 7 से 8 दिनों के लिए पानी मे भिगोकर रख दिया जाता है, जिसके बाद उसका बाहरी कवर हट जाता है, और को अंदर से सफेद रंग की निकलती है इसके बाद उसे सूखा लिया जाता है। काली मिर्च और सफेद मिर्च की अलग अलग पैकिंग की जाती है। इसकी पैकिंग के लिए साफ सुथरा मटेरियल इस्तेमाल करना चाहिए और प्लासिटक के बैग का इस्तेमाल काम करना चाहिए। काली मिर्ची खराब न हो इसके लिए इसे पूर्णत: सूखा कर ही इसका भंडारण करना चाहिए। काली मिर्च के उत्पादन में ध्यान देने वाली आवश्यकत बातें काली मिर्च के फल को तोडऩे के बाद विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाएं जैसे थ्रेसिंग, उबालना, सुखाना, सफाई, ग्रेडिंग तथा पैकिंग की जाती है। यह सभी बहुत ध्यान से की जानी चाहिए। काली मिर्च की गुणवत्ता बनी रहे इसके लिए काफी सावधानी बरतनी चाहिए। सभी प्रक्रिया अच्छे से होगी तो ही मिर्ची की गुणवत्ता सही बनी रहेगी। थ्रेसिंग- इसमें परंपरागत विधि द्वारा काली मिर्च की बोरियों को स्पाइक से किसान अपने पैरों से कुचलकर अलग करते हैं। यह बहुत ही अंशोधित, धीमी तथा अस्वस्थ्यकर विधि है। परन्तु आज कल काली मिर्ची को स्पाइक से अलग करने के लिए 50 किलो ग्राम प्रति घंटा से 2500 किलोग्राम प्रति घंटा की क्षमता वाले थ्रेसर का प्रयोग किया जाता है। काली मिर्च की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए करें ये उपाय मिर्च की गुणवत्ता को बढ़ाने के किए इसे एक मिनट तक उबले पानी मे डालकर निकल लिया जाता है। जिससे सूखने के बाद सभी काली मिर्ची के एक जैसे रंग की हो जाती है। इससे सूक्ष्मजीवों का भी नाश होता है। 3 से 4 दिन बाद जब काली मिर्ची सूखती है, इसके बाद इसका बाहरी कवर हट जाता है, और गंदगी भी दूर हो जाती है। काली मिर्च को सुखाना जब काली मिर्ची को तोड़ते है तो इसमें 65 से 70 प्रतिशत तक पानी होता है। और इसे सुखाने के बाद 10 प्रतिशत तक रह जाता है। इसे सुखाते समय फनोलेस एन्जाइम का उपयोग करने से वातावरणीय ऑक्सीजन द्वारा एन्जाइम और फिनोलिक यौगिकों का ऑक्सीकरण के कारण हरी काली मिर्च का रंग काला हो जाता है। पहले इसे सूरज की धूप में ही सुखाया जाता था। यदि इसमें 12 प्रतिशत से अधिक पानी रह जाता है तो इसके सडऩे की समस्या रहती है। जो कि मानव शरीर को नुकसान पहुंचाती है। काली मिर्च की लगभग 33-37 प्रतिशत सूखी उपज प्राप्त होती है। मिर्च को सुखाने के लिए यांत्रिक ड्रायर भी मिलते हैं जो बिजली चलते हैं। इसका भी उपयोग किया जा सकता है। ग्रेडिंग - इसके बाद ग्रेडिंग की प्रकिया होती है जिसमें काली मिर्च को फटकर साफ किया जाता है । जिससे सारी गंदगी उड़ कर बाहर चली जाती है। और काली मिर्च अच्छे से साफ हो जाती है। पैकिंग - ग्रेडिंग की प्रकिया के बाद काली मिर्च की पैकिंग की जाती है जिसमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिसमें भंडारण या पैकिंग किया जाना है वह वायुरोधी होना चाहिए ताकि काली मिर्च की गुणवत्ता बनी रहे। कितनी होती है पैदावार और कितनी होगी कमाई काली मिर्च की एक झाड़ से लगभग दस हजार रुपए की आमदनी कर सकते है और इसकी खेती में किसानों को ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है। गत वर्ष में घरेलू बाजार में काली मिर्च के दाम 400 रुपए प्रति-किलोग्राम के आसपास था। अब यह बाजार में 420 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रही है। हम यदि काली मिर्च के 400 झाड़ लगाते हैं तो हमें सालाना 40 से 50 लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

ड्रिप व स्प्रिंकलर सिस्टम : पानी की बर्बादी रूकेगी, सरकार से मिलेगा अनुदान

ड्रिप व स्प्रिंकलर सिस्टम : पानी की बर्बादी रूकेगी, सरकार से मिलेगा अनुदान

अब प्रदेश में केवल ड्रिप सिस्टम व स्प्रिंकलर से होगी सिंचाई राजस्थान सरकार ने पानी की बर्बादी को रोकने के लिए एक अहम फैसला किया है। इसके तहत अब प्रदेश में नई परियोजनाओं से जिन इलाकों नहर से पानी दिया जाएगा वहां पर खुली सिंचाई पर पाबंदी रहेगी। नई सिंचाई परियोजनाओं के तहत अब बनने वाले नहरी सिंचाई क्षेत्र में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम और स्प्रिंकलर से ही सिंचाई करना अनिवार्य होगा। सीएम अशोक गहलोत ने जल संसाधन विभाग की समीक्षा बैठक में नए कमांड क्षेत्रों में केवल ड्रिप और स्प्रिंकलर से ही सिंचाई करने की अनिवार्यता लागू करने के निर्देश दिए है। खुली सिंचाई पर रोक लगाने के पीछे सरकार मकसद पानी की बर्बादी को रोकना है। खुली सिंचाई करने पर पानी काफी लगता है और नहरों से वितरिकाओं तक आने में बीच काफी पानी व्यर्थ ही बह जाता है जिससे पानी की बर्बादी होती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 नई परियोजना में केवल ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई होगी लागू राजस्थान सरकार के निर्देश के बाद नई परियोजना के तहत अब प्रदेश में केवल ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति से ही सिंचाई करना अनिवार्य होगा। राजस्थान सरकार यहां पूर्णतय सांचौर मंडल को लागू कर रही है। बता दें कि जालौर जिले में सांचौर के नर्मदा सिंचाई प्रोजेक्ट के कमांड क्षेत्र में केवल ड्रिप और स्प्रिंकलर से ही सिंचाई का प्रावधान है। सांचौर नहर में परंपरागत नहरी सिस्टम की तरह फ्लड इरिगेशन नहीं है। राजस्थान की यह पहली सिंचाई परियोजना है जिसमें फ्लड इरिगेशन बंद किया गया था। अब सांचौर मॉडल को हर नई सिंचाई परियोजना में लागू किया जाएगा। नए सिस्टम से कैसे होगी पानी की बचत परंपरागत नहरी सिंचाई से पानी की बर्बादी ज्यादा होती है। इस प्रक्रिया में नहर से पानी वितरिकाओं से होता हुआ किसान के खेत में जाता है। इसमें काफी पानी की बर्बादी होती है जबकि नए जबकि नए सिस्टम में नहर की वितरिका से पाइप से पानी दिया जाएगा। इसमें पानी की बचत होगी। क्या है ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति इस विधि से पानी वर्षा की बूदों की तरह फसलों पर पड़ता है, जिससे खेत में जलभराव नहीं होता है। जिस जगह में खेत ऊंचे - नीचे होते हैं वहां पर सिंचाई कर सकते हैं। इस विधि से सिंचाई करने पर मिट्टी में नमी बनी रहती है और सभी पौधों को एक समान पानी मिलता रहता है। इसमें भी सिंचाई के साथ ही उर्वरक, कीटनाशक आदि को छिडक़ाव हो जाता है। ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए सरकार से मिलता है अनुदान पानी की बचत के लिए ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई पद्यतियों का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार भी इस पद्धति को प्रोत्साहित कर रही है। इसके लिए सरकार की ओर से किसानों को अनुदान भी दिया जाता है। अलग-अलग राज्य में वहां के नियमानुसार इस पर अनुदान की व्यवस्था अलग-अलग हो सकती है। साधारणत: ड्रिप व फव्वारा सिंचाई के लिए लघु एवं सीमांत किसान को 90 फीसदी अनुदान सरकार की तरफ से दिया जाता है। इसमें 50 प्रतिशत केंद्रांश व 40 फीसदी राज्यांश शामिल है। दस फीसदी धनराशि किसानों को लगानी होती है। सामान्य किसानों को 75 प्रतिशत अनुदान मिलता है। ड्रिप व स्प्रिंकलर से सिंचाई से होते हैं ये लाभ ड्रिप व स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर पानी सीधे पौधों की पत्तियों व जड़ों तक पहुँचता है। इससे पौधे को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है। जबकि परंपरागत नहरी खुली सिंचाई में पानी पौधों तक पहुंचते के दरम्यान काफी बर्बाद हो जाता है। ड्रिप व स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर कम पानी में अधिक क्षेत्र में सिंचाई संभव हो पाती है जिससे उत्पादन अधिक प्राप्त होता है। ड्रिप व स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर पौधे में कीटों व खरपतवार पर नियंत्रण होता है। क्योंकि पानी पौधे के आसपास न गिरकर सीधा पौधे की जड़ तक जाता है जिससे पौधे के आसपास अनावश्यक पौधे नहीं उग पाते जिससे कीटों से भी बचाव होता है। ड्रिप व स्प्रिंकलर से सिंचाई का लाभ एक यह भी है कि इससे भूगर्भ जलस्तर में जो गिरावट हो आ रही है वे भी रूकेगी। क्योंकि इसमें पानी पौधे की जड़ों में जाकर भूमि तक पहुँचाता है जिससे जलस्तर को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा इस पद्धति से सिंचाई करने पर उबड़-खाबड़ भूमि पर भी फसल उगाई जा सकेगी। ड्रिप व स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर पानी का खर्चा खुली सिंचाई के मुकाबले काफी कम आता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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