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सब्जियों की खेती : अक्टूबर माह में सब्जियों की ये किस्में देगी भरपूर मुनाफा

सब्जियों की खेती : अक्टूबर माह में सब्जियों की ये किस्में देगी भरपूर मुनाफा

26 September, 2020

किसान कम जगह में कई सब्जियां उगाकर कर सकते हैं अच्छी कमाई

किसानों के लिए कम समय में अधिक मुनाफा कमाने के लिए सब्जियों की खेती करना काफी फायदेमंद रहता है। इसमें कम जगह पर कई तरह की सब्जियों की खेती करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। देश में सब्जी उत्पाद को बढऩे के लिए भारतीय सब्जी अनुसन्धान केंद्र की भी स्थापना की गई है। इसके अंतर्गत उद्यानिकी फसलों में सब्जियों का बढ़ावा दिया जा रहा है। किसान अक्टूबर माह में कई सब्जियों की खेती करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। आज हम आपको बताएंगे कि आप इस माह कौन-कौनसी सब्जियों की बुवाई करके अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के साथ ही भरपूर मुनाफा भी कमा सकते हैं। 

 

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अक्टूबर माह में करें इन सब्जियों की खेती / अक्टूबर माह में सब्जियों की खेती

इस माह में ब्रोकोली, फूलगोभी, आलू, टमाटर, मटर, मूली, पालक, पत्ता गोभी, धनिया, आलू , सौंफ के बीज, गाजर, शलगम आदि की खेती की जा सकती है। इस समय इन सब्जियों की खेती करने से अच्छा उत्पादन मिलने के साथ ही बेहतर मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। हम यहां इसमें से उन प्रमुख फसलों के बारें में जानकारी देंगे जो आपकी कमाई बढ़ा सकें। 


1. ब्रोकोली की इन किस्मों से मिलेगा भरपूर मुनाफा

ब्रोकली गोभीय वर्गीय सब्जियों के अंतर्गत एक प्रमुख सब्जी है। यह एक पौष्टिक इटालियन गोभी है। जिसे मूलत: सलाद, सूप, व सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। ब्रोकली दो तरह की होती है – स्प्राउटिंग ब्रोकली एवं हेडिंग ब्रोकली। इसमें से स्प्राउटिंग ब्रोकली का प्रचलन अधिक है।

हेडिंग ब्रोकली बिलकुल फूलगोभी की तरह होती है, इसका रंग हरा, पीला अथवा बैंगनी होता है। हरे रंग की किस्म ज्यादा लोकप्रिय है। इसमें विटामिन, खनिज लवन (कैल्शियम, फास्फोरस एवं लौह तत्व) प्रचुरता में पाये जाते हैं। ब्रोकोली की सितंबर मध्य से नवंबर के शुरू तक पौध तैयारी की जा सकती है बीज बोने के लगभग 4 से 5 सप्ताह में इसकी पौध खेत में इसकी रोपाई की जा सकती हैं। इसकी नर्सरी ठीक फूल गोभी की नर्सरी की तरह तैयार की जाती है। ये खाने में काफी स्वादिष्ट होने के साथ ही कई पौष्टिक गुणों से भरपूर होती है। 

 


ब्रोकोली की अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत किस्में

के.टी.एस.-1 :  इस किस्म के शीर्ष हरे रंग के कोमल डंठल युक्त होते हैं, जिनका औसत वजन 200-300 ग्राम होता है और रोपाई के लगभग 80-90 दिनों बाद काटने योग्य हो जाता है। मुख्य शीर्ष काटने के कुछ दिनों बाद छोटे- छोटे शीर्ष शाखाओं की तरह मुख्य भाग के रूप में पत्तियों के कक्षों से निकलते हैं उन्हें भी काटकर उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। 

पालक समृद्धि :  यह किस्म भी हरे शीर्ष वाली स्प्राउटिंग ब्रोकोली किस्म है। जिसका शीर्ष भाग बड़ा एवं लम्बे कोमल डंठल युक्त होता है। प्रत्येक शीर्ष का औसत वजन 25-300 ग्राम होता है। मुख्य शीर्ष को काटने के बाद छोटे-छोटे शीर्ष पत्तों के कक्षों से निकलते हैं। यह किस्म 85-90 दिनों में रोपाई के बाद कटाई योग्य हो जाती है। इसमें येलो आई रोग एवं ब्रैक्टिंग विकार के लिए प्रतिरोधिता पाई जाती है। एन.एस.- 50- यह मध्यम अवधि में तैयार होने वाली संकर किस्म है। इनके हेड गठीले, समरूप एवं गुम्बदाकार होते हैं। यह किस्म कैट आई से रहित है। इसके पौधे मृदुरोमिल आसिता एवं काला सडऩ रोग के प्रति सहनशील है। इसका बीज नामधारी मार्क से बाजार में मिलता है। 

ब्रोकोली संकर - 1 :  इसकी परिपक्वता रोपाई के 60- 65 दिन बाद होती है। इसके शीर्ष हरे रंग के गठीले होते हैं, जिसका औसत वजन 600- 800 ग्राम होता है। इसके बीज राष्ट्रीय बीज निगम द्वारा किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं।

टी.डी.सी. -6 :  इसके शीर्ष हरे रंग के होते हैं, जिसका औसत वजन 600-800 ग्राम होता है। इसकी फसल रोपाई के 65- 70 दिन बाद तैयार हो जाती है। इसकी बीज दर 300- 350 ग्राम प्रति हैक्टेयर अनुमोदित की गई है। इस प्रजाति के बीज उत्तराखंड तराई बीज निगम, पंतनगर द्वारा किसानों को उपलब्ध कराये जाते है। 


2. फूलगोभी की लगाएं ये उन्नत किस्में

यह समय मध्यकालीन फूलगोभी की उन्नत प्रजातियां जैसे- इम्प्रूव्ड जापानीज, पूसा दिवाली, पूसा कातकी, पंता सुभरा की रोपाई का उचित समय है। इसके लिए खेत की आखिरी जुताई पर 120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 100 कि.ग्रा. फास्फोरस, 60 कि.ग्रा. पोटाश एवं 10 कि.ग्रा. बोरेक्स प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। इससे अच्छा उत्पादन मिलता है। 50 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में प्रयोग करना चाहिए।


3. बंदगोभी की इन किस्मों की रोपाई करना होगा लाभदायक

गांठगोभी, बंदगोभी एवं पछेती फूलगोभी की रोपाई अक्टूबर में की सकती है। इसके लिए पत्तागोभी की मुक्त परागित किस्में गोल्डेन एकर, प्राइड ऑफ इंडिया, पूसा मुक्ता एवं संकर किस्में के.जी.एम.आर-1, क्विस्तो, श्री गणेश गोल, हरी रानी गोल, क्रांति आदि हैं। इनकी रोपाई करना लाभदायक रहेगा। ध्यान रहे इसकी रोपाई से पूर्व 200-250 क्विंटल खड़ी गोबर की खाद या 80 क्विंटल नाडेप कम्पोस्ट, 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 60 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टेर की दर से खेत में अंतिम जुताई के समय मिला देना चाहिए। इससे अच्छा उत्पादन मिलता है।


4. पालक की इन किस्मों का करें चयन

पालक की खेती के लिए आल्ग्रीन, पूसा ज्योति, पूसा हरित, पालक नं. 51-16, वर्जीनिया सेवोय, अर्ली स्मूथ लीफ आदि उन्नत किस्मों की रोपाई की जा सकती है। पालक का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए 25 से 30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बीज की मात्रा पर्याप्त होती है। पालक की खेती से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए खाद व उर्वरक की संतुलित मात्रा का ध्यान रखना अति आवश्यक है। भूमि में खाद व उर्वरक की मात्रा का निर्धारण करने के लिए सबसे पहले खेत की मृदा का परीक्षण करवा लेना चाहिए। यदि किसी कारण से मिट्टी का परीक्षण समय पर न हो सके तो 25-30 टन प्रति हैक्टर गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद, 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 60 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। 


5. मेथी की इन किस्मों से मिलेगा अच्छा उत्पादन

मेथी एक औषधीय गुणों से भरपूर फसल है। इसके सूखे दाने का उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है। वहीं आयुर्वेद की दवाओं में भी इसका उपयोग किया जाता है। मेथी की खेती के लिए उन्नत किस्में जैसे-पूसा अर्ली बन्चिंग, मेथी कसूरी व हिसार सोनाली किस्में 6-7 कटाई देती हैं। मेथी की खेती के लिए जीवांशयुक्त अच्छे जल निकास वाली दोमट चिकनी मिट्टी सर्वोतम होती है। खेत तैयार करते समय 17 टन प्रति हैक्टर गोबर की अच्छी सड़ी हुई देशी खाद के साथ 2.7 बोरे सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा आधा बोरा यूरिया डालें 7 पालक, मेथी, कसूरी मेथी के लिये पंक्ति से पंक्ति एवं पौधें से पौधें की दूरी 30*4-5 से.मी. पर बुआई करनी चाहिए। हर कराई के बाद पालक तथा मेथी में आधा बोरा यूरिया का प्रयोग करें। मेेथी के लिए 15-20 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। 


6. मूली के उत्पादन के लिए ये किस्में रहेगी अच्छी

इस माह मूली की एशियाई किस्मों जैसें-जापानी, व्हाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली-1, कल्याणपुर- की बुआई करना फायदेमंद है। मूली का एक हैक्टर में बुआई के लिए 6-8 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। अगेती मूली की एशियाई किस्मों जैसे-पूसा देसी, पालक ह्रदय, जापानी, व्हाइट, पूसा चेतकी, हिसार मूली-1, कल्याणपुर-1 की बुआई कर सकते हैं। मूली का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए इन किस्मों का 8-10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है। भूमि में खाद व उर्वरक की मात्रा का निर्धारण करने के लिए मृदा का परीक्षण समय पर नहीं हो सके तो 10-15 टन गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद, 80 कि.ग्रा. नाईट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। 


7. अच्छी पैदावार के लिए लगाएं टमाटर की ये किस्में

टमाटर की अच्छी पैदावार के लिये इसकी उन्नत और संकर प्रजातियों के बीच की बुआई नर्सरी में करें। अगेती किस्मों जैसे-गोल्डन, पूसा हाइब्रिड-2, पूसा सदाबाहर, पूसा रोहिणी , पूसा-120, पूसा गौरव, काशी अभिमान, काशी अमृत, काशी विशेष, पीएच-8, पीएच-4 की बुआई 15 सितंबर तक व पछेती किस्मों/संकर किस्मों की बुआई 15 सितंबर के बाद प्रारंभ करें। अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए करने के लिए संकर और उन्नत प्रजातियों के लिये 250-300 ग्राम और 500-600 ग्राम प्रति हैक्टर बीज पर्याप्त होता है। टमाटर की बौनी किस्मों की रोपाई 60*60 सें.मी. तथा अधिक बढऩे वाली किस्मों की रोपाई 75*60 सें.मी. पर करें। किसान टमाटर की रोपाई के समय प्रति हेक्टयर 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद अथवा 80 क्विंटल नाडेप कम्पोस्ट के साथ 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फास्फोरस, 80 कि.ग्रा. पोटाश, 20 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट व 8 कि.ग्रा. बोरेक्स का प्रयोग करें। खरपतवार टमाटर की फसल में शुरुआती 4-6 सप्ताह तक अधिक नुकसान करते हैं। इसके लिए सिंचाई के बाद हल्की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडीमिथेलीन  (30 ई.सी.) 400 मि.ली. की मात्रा/एकड़ को 200 लीटर पानी में रोपाई से पहले छिडक़ाव करना चाहिए। 


8. धनिया उत्पादन के लिए लगाएं ये किस्में

धनिया की उन्नत प्रजाति पंत धनिया-1, पंत हरितिमा, आजाद धनिया-1, मोरक्कन, गुजरात धनिया-1, गुजरात धनिया-2, जवाहर धनिया-1, सी.एस.-6, आर.सी.आर.-4, सिंधु की बुआई सितंबर में वर्षा सप्ताह होने पर कर सकते हैं। इसके लिए 15-20 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर के लिए पर्याप्त होता है। 

9. आलू की अगेती फसल के लिए इन किस्मों का करें चुनाव

आलू की अगेती फसल के लिए सितंबर के आखिरी सप्ताह से लेकर अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक बुआई की जा सकती है। अगेती आलू की बुआई के लिए कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी कुबेर, कुफरी बहार, कुफरी सूर्या, कुफरी अशोका तथा अल्टीमेटम किस्में मुख्य हैं।  आलू की खेती के लिए दोमट और बलुई दोमट मृदा, जिसमें जैविक पदार्थ की बहुलता हो, उपयुक्त है। खेती की तैयारी करते समय खेत की आखिरी जुताई पर 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 80 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 80 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय प्रयोग करना चाहिए।


10. मटर की अगेती प्रजातियों की करें बुवाई

मटर की अगेती प्रजातियों की बुआई सितंबर से अंतिम सप्ताह से लेकर अक्टूबर के मध्य तक की जा सकती हैं। मटर की अगेती प्रजातियों में जैसे-आजाद मटर-3, काशी नंदिनी, काशी मुक्ति, काशी उदय और अगेती प्रमुख हैं।  मटर की इन प्रजातियों की सबसे खास बात यह है कि यह 50 से लेकर 60 दिनों में तैयार हो जाती हैं, जिससे खेत जल्दी खाली हो जाता है और किसान दूसरी फसलों की बुआई भी कर सकता है।

बुआई के लिए प्रति हैक्टर 80 से लेकर 100 कि.ग्रा. बीज की जरुरत पड़ती है। मटर को बीजजनित रोगों से बचाने के लिए मैंकोजेब 3 ग्राम या थीरम 2 ग्राम को प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। अगेती प्रजातियों के लिए पक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे की दूरी 30*6-8 सें.मी. रखनी चाहिए। खेत की तैयारी के समय प्रति हैक्टर 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद के साथ 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस, 50 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। मटर की खेती के लिए दोमट और हल्की दोमट मिट्टी दोनों उपयुक्त होती हैं।

 

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किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

किसानों की पहुंच से बाहर हुए आलू के बीज, रकबा घटने की आशंका

आलू के बीज (Potato seeds) : महंगे भावों के चलते किसानों ने दूसरी खेती करने का मन बनाया आलू के भावों में जोरदार तेजी ने स्टॉकिस्टों को मालामाल कर दिया है। कोल्ड स्टोरेज में आलू भरने वाले किसानों ने भी अच्छी कमाई की है लेकिन यह प्रतिशत बहुत कम है। आलू की तेजी ने किसानों के सामने आलू की नई फसल बोने को लेकर एक चुनौती खड़ी कर दी है। अब किसान असमंजस मेंं है कि महंगे भावों पर आलू के बीज खरीदकर बुवाई करें या ना करें। अगले साल नई फसल के दाम अच्छे मिलेंगे या नहीं। आपको बता दें कि आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडक़र सारे देश में आलू उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है जो विश्व औसत से काफी कम है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 आलू की कीमतों में उछाल / आलू के भावों में तेजी आलू की अच्छी कीमतों के कारण इस बार भी किसानों ने ज्यादा खेती करने का मन बना रखा है लेकिन आलू के बीज के भाव किसानों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। खुले बाजार में आलू का बीज 60 रुपए किलो तक मिल रहा है। वहीं सरकार कोल्ड स्टोरों में ३२ रुपए किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। आलू बीजों की ज्याद कीमत की वजह से किसानों ने इस बार फसल बदलने का मन बना लिया है। इससे आलू की फसल का रकबा घटने का अंदेशा जताया जा रहा है। आलू की बुवाई सीजन में सबसे ज्यादा मंग कुफरी लालिमा, चंद्रमुखी, चिप्सोना और कुफरी बादशाह प्रजाति के बीजों की होती है। इन बीजों की कीमत बाजार में 55 से 60 रुपए प्रतिकिलो है। जबकि पिछले साल बीजों के भाव 10-12 रुपए किलो थे। किसानों का कहना है कि इस बार करीब 500-600 प्रतिशत तक बीजों के दाम बढ़ गए हैं। खेती की लागत भी बहुत बढ़ जाएगी। सामान्यत: देखा गया है कि जिस वर्ष आलू का बीज महंगा होता है उस साल फसल के दाम अच्छे नहीं मिलते हैं। किसानों के अनुसार इस साल आलू की पैदावार की लागत खासी ज्यादा हो जाएगी जबकि उस हिसाब से दाम नहीं मिलेंगे। उत्तर प्रदेश में होता है आलू का बंपर उत्पादन उत्तरप्रदेश में पिछले तीन सालों से आलू का बंपर उत्पादन हो रहा है। उत्तरप्रदेश में पिछले साल ही आलू की पैदावार 165 लाख टन से ज्यादा थी। फसल के बाजार में आने के बाद दाम गिरने पर प्रदेश सरकार ने आलू की सरकारी खरीदन शुरू की थी। प्रदेश सरकार ने खरीद केंद्र खोल कर दो लाख क्विंटल आलू की खरीद सीधी खरीद की थी। वहीं बाहरी प्रदेशों को माल भेजने वाले किसानों को भाड़े में सब्सिडी भी दी गई थी। देश में आलू का रकबा घटना तय कृषि विशेषज्ञों के अनुसार एक बीघा आलू की बुआई के लिए कम से कम चार क्विंटल बीज की जरूरत होती है। इसके बाद मजदूरी, खाद व सिंचाई की लागत को जोड़ दें तो पैदावार खासी महंगी हो जाती है। इस बार नयी फसल के बाजार में आने के बाद किसान को क्या कीमत मिलेगी यह कहा नहीं जा सकता है। इन आशंकाओं के चलते इस बार देश में आलू की खेती का रकबा घटना तय है। । लघु और सीमांत किसान आलू की बजाए सरसों प्याज और लहसुन की खेती करने का मन बना रहे हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

बैंगन की खेती से करें सालभर कमाई, अक्टूबर-नवंबर बुवाई का सबसे सही समय

जानिए बैंगन की खेती ( brinjal cultivation ) की बुवाई का सही समय और उन्नत किस्म के बारे में अक्टूबर व नवंबर का महीना किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है। इन दो महीनों में किसान रबी की फसल की बुवाई करते हैं। रबी के सीजन में किसानों के पास गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू व गन्ना आदि की फसल बोने का विकल्प होता है। इसके अलावा किसान इन दिनों में बैंगन की खेती करके भी लाखों रुपए कमा सकता है। बैंगन की खेती दो महीने में तैयार हो जाती है। बैंगन की सब्जी भारतीय जनसमुदाय में बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन को भर्ता, आलू-बैंगन की सब्जी, भरवा बैंगन, फ्राई बैंगन सहित कई तरीकों से पकाया जा सकता है। उत्तर भारत के इलाकों में बैंगन का चोखा बहुत प्रसिद्ध है। बैंगन की उत्पत्ति भारत में ही हुई है। विश्व में सबसे ज्यादा बैंगन चीन में 54 फीसदी उगाया जाता है। बैंगन उगाने के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। बैंगन विटामिन और खनिजों का अच्छा स्त्रोत है। इसकी खेती सारा साल की जा सकती है। बैंगन की फसल बाकी फसलों से ज्यादा सख्त होती है। इसके सख्त होने के कारण इसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बैंगन की उन्नत किस्में / बैंगन की प्रजाति बैंगन की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकता है। बैंगन की उन्नत किस्मों में पूसा पर्पर लोंग, पूसा पर्पर कलस्टर, पूर्सा हायब्रिड 5, पूसा पर्पर राउंड, पंत रितूराज, पूसा हाईब्रिड-6, पूसा अनमोल आदि शामिल है। एक हेक्टेयर में करीब 450 से 500 ग्राम बीज डालने पर करीब 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक का उत्पादन मिल जाता है। बैंगन की फसल के लिए मिट्टी / बैंगन की फसल के लिए भूमि बैंगन एक लंबे समय की फसल है, इसलिए अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ रेतली दोमट मिट्टी उचित होती है और अच्छी पैदावार देती है। अगेती फसल के लिए हल्की मिट्टी और अधिक पैदावार के लिए चिकनी और नमी या गारे वाली मिट्टी उचित होती है। फसल की वृद्धि के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.6 के बीच में होनी चाहिए। सिंचाई का उचित प्रबंधन भी होना चाहिए। बैंगन की फसल सख्त होने के कारण इसे अलग अलग तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है। खेत में बैंगन की बिजाई का तरीका / बैंगन के बीज बैंगन का अधिक उत्पादन पाने के लिए बैंगन के बीजों का सही रोपण होना चाहिए। दो पौधों के बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए। दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। बीज रोपण करने से पहले खेत की अच्छे तरीके से 4 से 5 बार जुताई करके खेत को समतल करना चाहिए। फिर खेत में आवश्यकतानुसार आकार के बैड बनाने चाहिए। बैंगन की खेती में प्रति एकड़ 300 से 400 ग्राम बीजों को डालना चाहिए। बीजों को 1 सेंटीमीटर की गहराई तक बोने के बाद मिट्टी से ढक देना चाहिए। बैंगन बिजाई का सही समय / बैंगन की वैज्ञानिक खेती बैंगन की फसल पूरे सालभर की जा सकती है लेकिन अक्टूबर और नवंबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। किसान पहली फसल के लिए अक्टूबर में पनीरी बो सकते हैं जिससे नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। दूसरे फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोनी चाहिए जिससे फरवरी के पहले पखवाड़ तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। तीसरी फसल के लिए फरवरी के आखिरी पखवाड़़े और मार्च के पहले पखवाड़े में पनीरी बोनी चाहिए जिससे अप्रैल के आखिरी सप्ताह में पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोनी चाहिए ताकि अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाए। बैंगन की खेती में खाद और उर्वरक बैंगन की खेती में मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरक डालनी चाहिए। अगर मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है तो खेत तैयार करने समय 20-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में मिला देनी चाहिए। इसके बाद 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फॉस्फेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए। बैंगन की खेती में सिंचाई बैंगन की खेती में अधिक पैदावार लेने के लिए सही समय पर पानी देना बहुत जरूरी है। गर्मी के मौसम में हर 3-4 दिन बाद पानी देना चाहिए और सर्दियों में 12 से 15 के अंतराल में पानी देना चाहिए। कोहरे वाले दिनों में फसल को बचाने के लिए मिट्टी में नमी बनाए रखें और लगातार पानी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बैंगन की फसल में पानी खड़ा न हो, क्योंकि बैंगन की फसल खड़े पानी को सहन नहीं कर सकती है। बैंगन की फसल की तुड़ाई खेत में बैंगन की पैदावार होने पर फलों की तुड़ाई पकने से पहले करनी चाहिए। तुड़ाई के समय रंग और आकार का विशेष ध्यान रखना चाहिए। बैंगन का मंडी में अच्छा रेट मिले इसके लिए फल का चिकना और आकर्षक रंग का होना चाहिए। बैंगन का स्टोरेज / बैंगन का भंडारण बैंगन को लंबे समय के लिए स्टोर नहीं किया जा सकता है। बैंगन को आम कमरे के सामान्य तापमान में भी ज्यादा देर नहीं रख सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से इसकी नमी खत्म हो जाती है। हालांकि बैंगन को 2 से 3 सप्ताह के लिए 10-11 डिग्री सेल्सियस तापमान और 9२ प्रशित नमी में रखा जा सकता है। किसान भाई बैंगन को कटाई के बाद इसे सुपर, फैंसी और व्यापारिक आकार के हिसाब से छांट लें और पैकिंग के लिए, बोरियों या टोकरियों का प्रयोग करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सरसों के भाव 6500 रुपए प्रति क्विंटल!, अब आगे क्या?

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जानिएं त्योहारी मांग के कारण सरसों सहित अन्य तिलहनों में आई कितनी तेजी सरसों में तेजी रोजाना नए रिकॉर्ड बना रही है। पिछले साल 2019 में 25 अक्टूबर के आसपास सरसों के भाव 4500 रुपए प्रति क्विंटल था। इस बार अक्टूबर 2020 में सरसों के भाव जयपुर मंडी में 6000-6100 के आसपास चल रहे हैं। आगरा की कई बड़ी तेल कंपनियों द्वारा सरसों 6500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से खरीदने के समाचार भी हैं। सरसों के अलावा अन्य तिलहनों में भी तेजी बनी हुई। त्योहारी मांग के कारण सरसों का तेल 120 से 130 रुपए किलो बिक रहा है। अन्य तेलों के भावों में भी तेजी है। सरसों की नई फसल आने में अभी 5-6 महीने का समय है। इस बार सरसों उत्पादक क्षेत्रों में बारिश भी कम हुई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सरसों का स्टॉक कम है इसलिए भविष्य में सरसों में मंदी की संभावना कम है। सरसों सहित अन्य तिलहनों के भावों में कमी सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सरसों के भाव त्योहारी मौसम में विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सरसों की मांग वृद्धि होने से भी सरसों दाना सहित इसके तेल-तिलहन कीमतों में सुधार आया। जम्मू-कश्मीर में सरसों दाना (तिलहन फसल) की मांग में काफी वृद्धि हुई है, जहां की मंडियों में हरियाणा से खरीदी गई सरसों 6250 रुपये क्विन्टल के भाव से बिक रही है। जयपुर की हाजिर मंडी में सरसों दाना का हाजिर भाव बढक़र 6000-6100 रुपए क्विंटल हो गया है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार नफैड को अब सोच-समझ के साथ सीमित मात्रा में सरसों की बिकवाली करनी होगी, क्योंकि अगली पैदावार आने में अभी पांच-छह महीने का समय है और त्योहारों के साथ साथ सर्दियों की मांग और भी बढऩे वाली है। मूंगफली का भाव त्योहारी मांग के कारण तेल-तिलहन बाजार में तेजी बनी हुई है और भविष्य में भी तेजी की धारणा है। विदेशी बाजारों में मूंगफली दाना के साथ-साथ मूंगफली तेलों की भारी मांग ने भावों में तेजी को बल दिया है। नंबर एक गुणवत्ता वाले मूंगफली दाने की निर्यात मांग में भारी तेजी के कारण मूंगफली तेल-तिलहन कीमतों में तेजी बनी है। मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत व चीन में होता है। नंबर वन मूंगफली दाने की कीमत 70 रुपए किलो तक पहुंच गई है। सबसे सस्ते तेल सोयाबीन में तेजी / सोयाबीन का भाव हल्के तेलों में शामिल सोयाबीन इस समय सबसे सस्ता है। इस साल सोयाबीन की खपत में पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। सूरजमुखी फसल के कम उत्पादन होने, सरसों जैसे हल्के तेल में 'ब्लेंडिंग' (सम्मिश्रण) की मांग बढऩे तथा उत्तर भारत के मौसम की वजह से सोयाबीन तेल मांग के बढऩे से इसके तेल कीमतों में तेजी आई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार अगस्त में कम बारिश के कारण मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल और इसकी उपज प्रभावित हुई है। वहीं महाराष्ट्र में अधिक बारिश के कारण इसकी फसल प्रभावित हुई है, जिससे सोयाबीन किसानों की हालत पतली है और उनके लिए अपनी लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। त्योहारी मांग होने और फसल को पहुंचे नुकसान से समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान सोयाबीन दाना और लूज की कीमतें 105-105 रुपये सुधरकर 4300-4325 रुपये और 4170-4200 रुपये प्रति क्विन्टल के आसपास चल रही हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अब कृषि विभाग वाट्सएप पर देगा किसानों को खेती की जानकारी

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राजस्थान सरकार की नई पहल : अब तक 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है ग्रुप में राजस्थान सरकार ने किसानों को सरकारी योजनाओं सहित खेती- बाड़ी की जानकारी पहुंचाने के लिए अब सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का सहारा लिया है। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार अब प्रदेश सरकार सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन का उपयोग खेती में करना चाह रही है। इसके लिए सरकार की ओर से कृषि अधिकारियों को निर्देश भी दिए जा चुके है। इस निर्देश के बाद प्रदेश के कृषि विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत खेती-बाड़ी की जानकारी देने के लिए प्रदेशभर में किसानों के करीब पांच हजार वॉट्सएप गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनसे करीब पांच लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। अगर सरकार की ये योजना रंग लाई तो प्रदेश के किसानों को कृषि से जुड़ी जानकरियां उनको घर बैठे-बैठे आसानी से मिलेंगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसानों को मिलेंगी ये जानकारियां मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार कृषि मंत्री लालचंद कटारिया के मुताबिक प्रदेश के किसानों को अब विभागीय योजनाओं की जानकारी के साथ ही खेती के उन्नत तरीकों और नवाचारों की जानकारी वॉट्सएप गु्रप के जरिए मिलेगी। इन गु्रप पर कृषि पर्यवेक्षक सफलता की कहानियां और खेती से जुड़ी डॉक्युमेंट्री समेत विभागीय सूचनाएं साझा करेंगे। यह प्रयोग फसल में रोग और टिड्डी प्रकोप जैसी समस्याओं से निपटने में भी मदद करेगा। कृषि पर्यवेक्षकों दिए गए थे 250-250 किसानों को जोडऩे के निर्देश प्रदेश में कार्यरत सभी कृषि पर्यवेक्षकों को वॉट्सएप गु्रप बनाकर अपने-अपने क्षेत्र के 250-250 किसानों को इससे जोडऩे के निर्देश कृषि विभाग द्वारा दिए गए थे। बता दें कि प्रदेश में करीब साढ़े 5 हजार कृषि पर्यवेक्षक कार्यरत हैं और इनके द्वारा अब तक 4 हजार 786 गु्रप बनाए जा चुके हैं। इनके जरिये लगभग 5 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है। जयपुर जिले में सबसे ज्यादा 53 हजार किसानों को व्हाट्सएप गु्रप से जोड़ा गया है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो विभाग को अपनी योजनाओं का प्रचार प्रसार करने में काफी आसानी हो जाएगी और किसानों तक विभाग की पहुंच भी आसान हो होगी। क्या कहते हैं अधिकारी कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आजकल काफी बड़ी संख्या में किसान स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं। वे अब पंरपरागत खेती की बजाय आधुनिक तकनीक का अपनाने में भी खासा रुझान दिखा रहे हैं। खेती की जानकारी साझा करने में किसान भी सोशल मीडिया का फायदा उठाने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। इधर 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी के लिए मोबाइल ऐप्लीकेशन लांन्च केंद्रीय जल शक्ति एवं सामाजिक न्याय तथा अधिकारिता राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत किए जाने वाले कामों की जानकारी प्राप्त करने कि लिए एक मोबाइल ऐप्लीकेशन लांच किया है। यह ऐप्लीकेशन परियोजनाओं की जियो टैगिंग करेगा। जिससे परियोजनाओं की निगरानी करने और उनकी प्रगति तथा उनके विकास में आने वाली बाधाओं का पता लगाया जा सकेंगा। इस एप्लीकेशन का विकास भास्कराचार्य नेशनल इंस्टीच्यूट आफ स्पेस ऐप्लीकेशंस एंड जियो-इंफार्मेटिक्स (बीआईएसएजी-एन) की सहायता से किया है। इससे 99 कृषि सिंचाई परियोजना की निगरानी की जाएगी। राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने मीडिया को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों के लाभ हेतु कृषि सिंचाई परियोजना की शुरुआत की थी। जिसमें 99 परियोजनाओं की शुरुआत की गई थी। जो कि देश में 34.64 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमी की सिंचाई करने में सहायक होगी। वहीं इन परियोजनाओं में से अभी तक 44 सिंचाई परियोजनाओं का काम पूरा किया जा चुका है। जिससे देश की 21.33 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि की सिंचाई की जा रही है। मोबाइल एप्लीकेशन से इन सभी परियोजनाओं की सतत निगरानी आसानी से की जा सकेगी। किसानों को होगा फायदा इस एप्लीकेशन का उपयोग स्थान, नहर के प्रकार/संरचना, पूर्णता स्थिति आदि जैसे अन्य विवरणों के साथ परियोजना घटक की छवि लेने के लिए निगरानी टीम/परियोजना प्राधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। इसके द्वारा एकत्रित की गई सूचना को जीआईएस पोर्टल पर प्रदर्शित करके किसानों को लाभ पहुंचाया जाएगा। मोबाइल ऐप्लीकेशन को क्षेत्र में उपलब्ध नेटवर्क को देखते हुए आनलाइन एवं आफलाइन दोनों ही तरीके से आपरेट किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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