ट्राइकोडर्मा : फंफूद से भूमि में आए रोग मिटाएं

ट्राइकोडर्मा : फंफूद से भूमि में आए रोग मिटाएं

Posted On - 30 Apr 2020

किसानों का सच्चा मित्र ट्राइकोडर्मा

ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं किसानों के सच्चे मित्र ट्राइकोडर्मा के बारे में। खेत की मिट्टी में फफूंद की अनेक प्रजातियां पायी जाती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ प्रजातियां लाभदायक होती हैं जैसे ट्राइकोडर्मा। ट्राइकोडर्मा एक प्रकार का मित्र फफूंद है, जो विभिन्न प्रकार की दालों, तिलहनी फसलों, कपास, सब्जियों एवं कुछ फल जैसे अमरूद आदि फसलों में पाया जाता है। यह मृदाजनित रोग उकठा, आद्र्रपतन, कंद विगलन और जडग़लन आदि को नियंत्रित करने में एक महत्वपूर्ण योगदान देता है। यह फसलों में रोग उत्पन्न करने वाले फफूंद को रोकता है। ट्राइकोडर्मा, स्वयं मृदाजनित फफूंद है इसलिए यह उचित वातावरण पाकर मृदा में भली-भांति फैलता एवं पनपता है तथा नर्सरी की अवस्था में पौधे को सुरक्षा प्रदान करता है।

 

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जानिए क्या है ट्राइकोडर्मा

ट्राइकोडर्मा एक फफूंद है, जो सामान्यत: मृदा में पायी जाती है। इसकी कई प्रजातियां हैं, परंतु उनमें ट्राइकोडर्मा विरडी,  ट्राइकोडर्मा हारजिएनम, ट्राइकोडर्मा वाइरेन्स अधिक उपयोगी प्रजातियां हैं। यह फफूंद हरे रंग की होती है। ट्राइकोडर्मा, बीजाणुओं के रूप में कोनिडिया तथा क्लेमाइडोस्पोर उत्पन्न करता है। इनमें से क्लेमाइडोस्पोर विपरीत वातावरण में लंबे समय तक जमीन में पड़े रहते हैं। अनुकूल वातावरण मिलने पर यह क्लेमाइडोस्पोर फफूंद तंतु बनाकर वृद्धि करते हैं तथा अधिक संख्या में कोनेडिया (बीजाणु) बनाते हैं।
ट्राइकोडर्मा को यीस्ट या मोलेसेस माध्यम से उगाकर इसका कल्चर तैयार किया जाता है। इस कल्चर को कैल्शियम या चाक पाउडर में 1:2 के अनुपात में मिलाकर वैटेबल पाउडर के रूप में उन्नत कल्चर तैयार किया जाता है। इसे 100 ग्राम, 250 ग्राम, 500 ग्राम या 1 कि.ग्रा. मात्रा को कम घनत्व वाली पॉलीथीन की थैलियों में भरकर विक्रय के लिए तैयार किया जाता है। इन पैकिंगों का मानक इस प्रकार रखा जाता है कि प्रति ग्राम कल्चर में कम से कम 2/108 या इससे अधिक कॉलोनी फार्मिंग यूनिट (सीएफयू) हों। 

 

 

ट्राइकोडर्मा की कार्य विधि

ट्राइकोडर्मा व रोगजनकों जैसे फ्रयूजेरियम, पिथियम, राइजक्टोनिया आदि में स्थान व पोषण के लिए स्पर्धा  प्रतियोगिता होती है, जिससे रोगजनकों की वृद्धि व विकास अवरूद्ध हो जाता है। ट्राइकोडर्मा के फफूंद तंतु (एप्रिसोरिया), रोगजनकों के फफूंद के तंतुओं के संपर्क में आते ही उन्हें जकड़ लेते हैं। इसके फलस्वरूप रोगजनकों का विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके  उपरांत ट्राइकोडर्मा अपने चूषकों (हास्टोरिया) को रोगजनकों के फफूंद तंतुओं में प्रवेश करवाकर उन पर अपनी वृद्धि करने लगता है। इतना ही नहीं साथ ही साथ रोगजनकों के अंदर कई प्रकार के एंजाइम जैसे- काइटिनेज, बीटा 1, 3-ग्ल ूकाइनेज, प्रोटिएज आदि छोड़ देता है। रोगजनक की कोशिका भित्ति नष्ट हो जाती है व रोगजनक मर जाता है। ट्राइकोडर्मा विभिन्न प्रकार के प्रतिजैविक एवं अन्य पदार्थ  जैसे-ग्लियोविरिडिन, ग्लियोटाक्सिन, अल्काइल पाइरोल्स आदि भी उत्पन्न करता है, जो रोगजनकों की वृद्धि पर विपरीत असर डालते हैं। ट्राइकोडर्मा द्वारा काइटिनेज पर आक्साइड जैसे पदार्थ उत्पन्न होते हैं जिस कारण पौधों में रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है।

ट्राइकोडर्मा की मृदा में उपस्थिति अघुलनशील रॉक फास्फेट को घुलनशील बनाती है। इसके साथ ही वह जिंक, मैग्नीशियम, लोहा जैसे सूक्ष्म तत्वों की सक्रियता को बढ़ाती है। इस प्रकार पौधे को सकल पोषक पदार्थ उपलब्ध होते हैं। फलस्वरूप पौधों की वृद्धि और विकास अच्छा होता है। इसके अलावा उनमें रोगजनकों के प्रति लडऩे की क्षमता में वृद्धि होती है। 

 

ट्राइकोडर्मा की प्रयोग विधि

बीज उपचार : बीज उपचार के लिए 6-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा की मात्रा का प्रति किग्रा बीज की दर से प्रयोग करते हैं, लेकिन ध्यान यह देते हैं कि यह पाउडर सभी बीजों में समान रूप से चिपक जाये। यदि बीज की मात्रा अधिक है तो सीड ट्रीटिंग ड्रम में और यदि बीज की मात्रा कम है तो किसी डिब्बे या पीपे में बीज को ले लें। इसके बाद इसमें निर्धारित मात्रा में ट्राइकोडर्मा पाउडर मिलाकर अच्छी तरह हिलायें। यदि आवश्यक हो तो बीज पर 5-10 मि.ली. पानी का छींटा दें फिर उसे 2-3 घंटे तक छाया में सुखाने के बाद बुआई करें। 

पौध/पौधे के अन्य वानस्पतिक भागों का उपचार : इसका उपयोग उप फसलों, जिनमें पौध रोपण किया जाता है, जैसे-टमाटर, बैंगन, मिर्च और प्याज आदि या बीज के रूप में पौधे के वानस्पतिक भाग का उपयोग जैसे गन्ना, आलू और अदरक आदि में किया जाता है। इस विधि में ट्राइकोडर्मा की 10 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल लें। फिर इसमें रोपण के लिए तैयार पौधों की जड़ों को या पौधों के वानस्पतिक भागों को जैसे कंद, प्रकंद, बल्ब आदि को 10-15 मिनट तक डूबोने के बाद रोपण वाली फसलों को तुरंत रोपित करें। वानस्पतिक भागों को थोड़ी देर छाया में सुखाने के बाद ही खेत में बुआई करें। पौध उपचार के लिए 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को एक लीटर पानी में मिलाकर इस घोल से पौधे की जड़ों को नम करें।

नर्सरी उपचार : इस विधि का उपयोग मुख्यत: सब्जी वाली फसलों के लिए किया जाता है, जिनकी पहले हम नर्सरी तैयार करते हैं। फिर इनका रोपण खेत में करते हैं। पौधशाला उपचार के लिए 250 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 50 लीटर पानी में घोलें व इस घोल से 400 वर्गमीटर क्षेत्रा की पौधशाला की क्यारी को झारा या फव्वारा के माध्यम से तर कर दें या 250 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 2-2.5 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर 400 वर्गमीटर क्षेत्रा की पौधशाला (क्यारी) में छिडक़कर इसकी हल्की गुड़ाई कर मिट्टी में मिला दें।

मृदा उपचार: मृदा उपचार के लिए 2.0-2.5 किग्रा ट्राइकोडर्मा पाउडर को 75-80 किग्रा पकी हुई गोबर की खाद में मिलाकर 10-15 दिनों के लिए किसी छायादार स्थान में रखकर उसे जूट के बोरे से ढक दें। ध्यान रखें कि उसमें पर्याप्त नमी बनी रहे। बुवाई की अंतिम बखरनी के समय उपरोक्त मात्रा को प्रति हैक्टर की दर से बुरकाव करें। 

 

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खड़ी फसल में छिडक़ाव

खड़ी फसल में फफूंदजनित रोगों के लक्षण प्रकट होने पर इनके प्रबंधन के लिए 6-8 ग्राम ट्राइकोडर्मा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करें।

प्रयोग में सावधानियां

यह क्षारीय भूमि में कम असरकारक है। इसके प्रयोग के समय मृदा में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। इसके उत्पादों को विश्वसनीय स्त्रोतों से ही खरीदें। इसके उत्पाद प्राप्त करने से पूर्व सुनिश्चित कर लें कि इसे धूप एवं अधिक तापमान में तो भंडारित नहीं किया गया। इसे खरीदने के पश्चात तुरंत इस्तेमाल करें। परंतु यदि भंडारण की आवश्यकता हो तो इसे नम व छायादार स्थान पर ही थोड़े समय के लिए भंडारित करें। वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए उचित सांद्रण का प्रयोग करें। प्रयोग से पूर्व पैकेट में अंकित सभी जानकारियां भलीभंाति पढ़ लें। 

इन फसलों में होता है ट्राइकोडर्मा का प्रयोग

ट्राइकोडर्मा का उपयोग सभी प्रकार की फसलों व सब्जियों जैसे कपास, तंबाकू, सोयाबीन, गन्ना, शकरकंद, बैंगन, चना, अरहर, मूंगफली, मटर, टमाटर, मिर्च, गोभी, आलू, प्याज, लहसुन, बैंगन, अदरक और हल्दी आदि पर किया जाता है। 

ट्राइकोडर्मा के प्रयोग की सीमाएं

इसके उपयोग के बाद 4-5 दिनों तक रासायनिक कवकनाशी का उपयोग न करें। सूखी मृदा में ट्राइकोडर्मा का प्रयोग न करें, क्योंकि इसकी बढ़वार व जीवित रहने के लिए नमी बहुत आवश्यक है। ट्राइकोडर्मा उपचारित बीज को धूप में न रखें। इससे उपचारित गोबर की खाद को ज्यादा समय तक न रखें। 

 

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ट्राइकोडर्मा के प्रयोग में ध्यान देने योग्य बिंदु

  • कल्चर में पर्याप्त मात्रा में सी.एफ.यू. (कॉलोनी फार्मिंग यूनिट) होनी चाहिए।
  • सही समय पर ट्राइकोडर्मा का उपयोग करें, जिससे हानिकारक फफूंद को यह समय से रोक सके।
  • कल्चर का फसल पर सही असर कल्चर उत्पादन तिथि से छह महीने के अंदर उपयोग करने पर होता है।
  • आधुनिक कृषि पद्धति में किसान फसलों में मृदाजनित व बीजजनित रोगों की रोकथाम के लिए केवल रासायनिक फफूंदनाशक दवाओं पर ही निर्भर है। 
  • विभिन्न प्रकार की समस्याएं जैसे प्रदूषण इससे लगातार एक ही फफूंदनाशक दवा के उपयोग से रोगनाशकों में उसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादन लागत मेंं वृद्धि आदि उत्पन्न होती है। 
  • फसलों में होने वाले रोगों की रोकथाम के लिए रासायनिक फफूंदनाशकों के साथ-साथ जैव फफूंदनाशकों का भी उपयोग करें जो न केवल हमारे स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए सुरक्षित है बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी लाभदायक है।

ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से लाभ

  • यह आसानी से बाजार में उपलब्ध है।
  • यह समन्वित रोग प्रबंधन के लिए आदर्श साधन है।
  • इसकी प्रयोग विधि आसान है।
  • यह पौधों में विषाक्त अवशेष नहीं छोड़ता है। इसलिए मनुष्य के लिए सुरक्षित है।
  • यह पर्यावरण मित्र है।
  • इसका प्रयोग जैविक खाद के साथ किया जा सकता है।
  • फफूंदीनाशक रसायनों की तुलना में इस पर कम खर्च आता है।
  • यह पौधे की बढ़वार में सहायक है, जिससे उत्पादन में भी वृद्धि होती है।
  • एक बार प्रयोग करने पर काफी लंबे समय तक इसका प्रभाव रहता है।
  • यह कई फफूंदजनित रोगजनकों के खिलाफ कार्य करता है।
  • यह सभी जगह में पाया जाता है।

 

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