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गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

कृषि वैज्ञानिकों ने जारी की दो नई किस्में, जानें, कौनसी है ये दो किस्में और इनकी विशेषताएं

अब गन्ना किसानों की फसल रेड रॉट रोग के कारण बर्बाद नहीं होगी। हाल ही में कृषि वैज्ञानिकों ने गन्ने की दो ऐसी किस्मों को पहचाना है जिस पर इस रोग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता यानि इन किस्मों में इस रोग से लडऩे की क्षमता है और इसलिए इन किस्मों में यह रोग नहीं लगेगा। बता दें कि पिछले कुछ दिनों पूर्व रेड रॉट रोग का प्रभाव से उत्तरप्रदेश के सीतापुर, लखीमपुर खोरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर आदि जिलों में देखा गया जिससे यहां के किसानों की 80 फीसदी फसल सूख कर तबाह हो गई। पर अब किसानों को इस रोग से डरने की जरूरत नहीं है। हाल ही में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ व उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने गन्ने की नई किस्म सीओएलके-कोलख 14201 जो जल्दी तैयार हो जाती है और सामान्य किस्म सीओएस-कोशा 14233 जारी की है। प्रदेश के किसानों को गन्ने की दो नई प्रजातियां बोने के लिए अगले साल से मिलनी शुरू हो जाएंगी। यह दोनों ही प्रजाति अधिक पैदावार देने वाली हैं। इनमें कीट और रोग भी कम लगता है।

 

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अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर के डायरेक्टर डॉ. जे सिंह ने बताया कि हाल ही में आयुक्त गन्ना एवं चीनी उद्योग संजय आर भूसरेड्डी की अध्यक्षता में बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक लखनऊ में हुई थी, जिसमें गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर, सेवरही, मुजफफरनगर तथा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ के साथ-साथ चीनी मिल दौराला, अजवापुर, पलिया, बिसवांं एवं रोजा द्वारा विभिन्न होनहार जीनोटाइप के उपज एवं चीनी परता के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर विभिन्न जीनोटाइप में अगेती किस्मों में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित कोलख 14201 तथा मध्य देर से पकने वाली किस्मों में गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर द्वारा विकसित कोशा 14233 बेहतर पाई गई, जिसे सर्वसम्मति से सामान्य खेती के लिए स्वीकृत किया गया। भूसरेड्डी ने कहा कि वर्तमान में गन्ना किस्म को 0238 में लाल सडऩ रोग के आपतन के कारण किसानों को अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए, जिस कड़ी में यह दोनों किस्में सामान्य खेती के लिए बेहतर है।

 


क्या है नई किस्म कोलख 14201 व कोशा 14233 की विशेषताएं

किस्म कोलख 14201 में परीक्षण के दौरान 900-1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज प्राप्त हुई है। वहीं औसतन 13.0 प्रतिशत पोल इन केन भी प्राप्त हुआ जो को. 0238 से ज्यादा था। वहीं इस किस्म का गन्ना बिलकुल सीधा खड़ा रहता है, और इसको बंधाई की कम आवश्यकता पड़ती है। साथ ही इसका गुड़ सुनहरे रंग और उत्तम गुणवत्ता का होता है। जो ऑर्गैनिक गुड़ उत्पादन के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। कोलख 14201 और कोशा 14233 में लाल सडऩ रोग से लडऩे की क्षमता बहुत ज्यादा है, और कोलख 14201 पर बेधक कीटों का भी बेहद कम आक्रमण होता है।


गन्ने की सीओ-0239 किस्म का होगा विलोपन

गन्ने की सीओ-0239 किस्म और सीओ 0118 किस्म एक ही है। अत: स्वीकृत किस्मों की सूची में से सीओ 0239 का नाम विलोपित कर दिया जाएगा। समिति द्वारा यह भी निर्णय लिया गया कि एकल गन्ना किस्मों की बुवाई के कारण प्रदेश में रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, अत: प्रजातीय संतुलन बनाए रखने के लिए अगेती एवं मध्य देर कि किस्मों का संतुलन रखा जाना जरूरी है। वहीं सीओ 0239 किस्म के विलोपन को लेकर डॉ सिंह का कहना है कि सीओ 0238 का रकबा प्रदेश में बहुत बड़ा है इसलिए इतना आसान नहीं हैं सीओ 0238 को परिवर्तित करना।


गन्ने की सीओ - 0239 किस्म का क्यूं किया जा रहा है विलोपन

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के निदेशक डॉ. ज्योत्सेंद्र सिंह का कहना है कि परीक्षण आंकड़ों पर गहन चर्चा के बाद यह पाया गया, कि इस शीघ्र गन्ना किस्म में प्रचलित किस्म सीओ -0238 से ज्यादा उपज क्षमता के साथ-साथ ज्यादा चीनी परता भी मिला है। आज जब गन्ने की सीओ-0238 किस्म में वृहद स्तर पर लाल सडऩ रोग की समस्या बढ़ रही है। वहीं किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में सीओ 0238 पर रोक लगाने की संभावना अधिक बढ़ रही है। वहीं इसको सीओ 0238 को परिवर्तित कर के को.लख. 14201 को बढ़ावा देने आवश्यकता अब बढ़ गई है।


आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट करने का लिया निर्णय

0239 किस्म के विलोपन के साथ ही आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट कर दिया जाएगा। इस संबंध में चीनी मिल प्रतिनिधियों की ओर से लखनऊ में हुई बैठक में यह अवगत कराया गया कि गन्ना किस्म कोपीके 05191 में चीनी परता कम है तथा लाल सडऩ रोग का भी प्रकोप बढ़ रहा है। इस पर समिति द्वारा इसे आगामी सालों में फेजआउट करने का निर्णय लिया गया है।


कब तक किसानों को मिल पाएगा इन दो नई किस्मों का बीज

डॉ. सिंह के अनुसार चयनित किसानों और चीनी मिलों के माध्यम से कोलख.14201 का बीज तैयार कराया जा रहा है। अगले वर्ष किसानों को इसका बीज आसानी मिल सकेगा। अगले वर्ष 50 फीसदी तक किसानों के पास कोलख 14201 का बीज तैयार मिलेगा जिसका वे बुवाई में उपयोग कर बेहतर गन्ना का उत्पादन कर सकेंगे।


जल्द ही किसानों को मिलेंगी और नई किस्में

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार साह के अनुसार जल्द ही उत्तरी राज्यों के लिए गन्ने की चार किस्में कोलख 14204, Co15023, CoPb14185 व CoPb11453 और दक्षिणी राज्यों के लिए तीन किस्में MS13081, VSI 12121 और Co13013 को संबंधित कृषि जलवायु क्षेत्रों में खेती के लिए जारी किया जाएगा।

 

 

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किसानों के लिए खुशखबरी : 32 वनोपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किए

किसानों के लिए खुशखबरी : 32 वनोपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किए

जानें, किन नई वनोपजों का कितना तय किया समर्थन मूल्य केंद्र सरकार हर साल रबी और खरीफ की फसलों का समर्थन मूल्य जारी करती है और इसी न्यूनतम मूल्य पर किसानों से उपज की खरीद की जाती है। सरकार की ओर से जारी समर्थन मूल्य पूरे देश में लागू होता है। इस समय विभिन्न राज्यों में खरीफ की फसल की खरीद जोरों पर चल रही है। इसी तर्ज पर राज्य सरकारें भी अपने क्षेत्र में अधिक उत्पादित होने वाली वनोपजों का समर्थन मूल्य जारी करती है जिससे किसानों को फायदा हो। हाल ही में किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश शासन ने 32 वनोपजों का समर्थन मूल्य जारी किया गया है। इनमें से 18 नई वनोपजों को भी शामिल किया गया है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या होती है वनोपज लघु वनोपज (एमएफपी) का अर्थात एैसे उपज हैं जो विभिन्न वन प्रजातियों से फल, बीज, पत्ते, छाल, जड़, फूल और घास आदि के रूप में पाए जाते हैं तथा जिसमें औषधीय जड़ी बूटियां/झाडिय़ों के पूरे भाग सम्मिलित हैं। छत्तीसगढ़ के वन इन लघु वनोपज से बहुत समृद्ध हैं। राज्य में कई लघु वनोपज प्रजातियां वाणिज्यिक महत्व की हैं। यहां कुछ प्रमुख वनोपजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद जाता है। मध्यप्रदेश में भी इसी प्रकार की व्यवस्था है। पहली बार शामिल किए गिलोय, कालमेघ, गुडमार और जामुन के बीज मध्य प्रदेश शासन द्वारा 32 लघु वनोपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किए गए हैं। इनमें 18 लघु वनोपजों की प्रजातियों के समर्थन मूल्य पहली बार शामिल किए गए हैं। इसमें प्रमुख रूप से गिलोय, कालमेघ, गुडमार और जामुन बीज शामिल हैं। वहीं इस वर्ष अप्रैल माह में 14 लघु वनोपजों के न्यूनतम मूल्य में वृद्धि भी की गई है। इसमें महुआ फूल, अचार गुल्ली, शहद, पलास लाख एवं कुसुम लाख शामिल हैं। इस तरह प्रदेश में अब तक 32 लघु वनोपजों का न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया जा चुका है। लघु वनोपजों के संग्रहण मूल्य निर्धारित होने से वनवासियों को इन वनोपजों के लिए बिचौलियों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। इससे जहां के किसानों की आय बढ़ेगी। इन 18 लघु वनोपजों का निर्धारित किया है समर्थन मूल्य राज्य सरकार द्वारा जिन 18 लघु वनोपजों का प्रथम बार समर्थन मूल्य प्रति किलोग्राम निर्धारित किया गया है, उनमें जामुन बीज 42 रुपए, आंवला गूदा 52, मार्किंग नट (भिलावा) 9 रुपए, अनन्त फूल 35, अमलतास बीज 13, अर्जुन छाल 21, गिलोय 40, कोंच बीज 21, कालमेघ 35 रुपए, बायबिडंग बीज 94, धवई फूल 37, वन तुलसी पत्तियां 22, कुटज (सूखी छाल) 31, मकोय (सूखी छाल) 24, अपंग पौधा 28, इमली (बीज सहित) 36, शतावरी की सूखी जड़ 107 और गुडमार लघु वनोपज 41 रुपए प्रति किलोग्राम न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया है। अब तक केंद्र सरकार ने किसानों से खरीदी 10 हजार रुपए करोड़ की कपास इस समय खरीफ विपणन सीजन (केएमएस) 2020-21 के दौरान, कपास खरीद का काम सुचारू रूप से चल रहा है। केंद्र सरकार ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक राज्यों के किसानों से अब तक 10 हजार करोड़ से अधिक की कपास खरीदी है। जानकारीके अनुसार 3 दिसंबर को 2020 तक 34,54,429 कपास की गांठें खरीदी गईं जिनका मूल्य 10145.49 करोड़ रुपए हैं जिससे 6,89,510 किसान लाभान्वित हुए हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार किसानों से ज्यादा खरीदा गया धान खरीफ 2020-21 के लिए धान की खरीद, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, उत्तराखंड, तमिलनाडु, चंडीगढ़, जम्मू एवं कश्मीर, केरल, गुजरात, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में सुचारु रूप से चल रही है। पिछले वर्ष के 275.98 लाख मीट्रिक टन की तुलना में इस वर्ष 03 दिसंबर 2020 तक 329.86 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की खरीद की जा चुकी है और इस प्रकार पिछले वर्ष के मुकाबले धान की खरीद में 19.52 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल 329.86 लाख मीट्रिक टन की खरीद में से अकेले पंजाब सेे 202.77 लाख मीट्रिक टन की खरीदी की गई है जो कि कुल खरीद का 61.47 प्रतिशत है। कुल 62278.61 करोड़ रुपए के एमएसपी मूल्य के साथ लगभग 31.78 लाख किसान अभी तक लाभान्वित हो चुके हैं। मूंग, उड़द, मूंगफली की फली और सोयाबीन की 120626.22 मीट्रिक टन की खरीद 3 दिसंबर 2020 तक सरकार ने अपनी नोडल एजेंसियों के माध्यम से 649.50 करोड़ रुपये की एमएसपी मूल्य वाली मूंग, उड़द, मूंगफली की फली और सोयाबीन की 120626.22 मीट्रिक टन की खरीद की जिससे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के 68,978 किसान लाभान्वित हुए। इसी तरह, 3 दिसंबर 2020 तक 52.40 करोड़ रुपए के एमएसपी मूल्य पर 5089 मीट्रिक टन खोपरे (बारहमासी फसल) की खरीद की गई है, जिससे कर्नाटक और तमिलनाडु के 3,961 किसान लाभान्वित हुए हैं जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान 293.34 मीट्रिक टन खोपरे की खरीद की गई थी। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

जानें कैसे रोटावेटर के उपयोग से खेत की मिट्टी को बनाएं और ज्यादा उपजाऊ

जानें कैसे रोटावेटर के उपयोग से खेत की मिट्टी को बनाएं और ज्यादा उपजाऊ

जानें, रोटावेटर की विशेषताएं, लाभ और कीमत? बदलते वक्त के साथ आज किसान खेती में नई-नई आधुनिक मशीनों का उपयोग करने लगे है जिससे खेती का काम आसान हो गया है। अब कम श्रम और कम लागत में खेती करना संभव हो गया है। वहीं उत्पादन भी पहले की अपेक्षा अधिक होने लगा है। जिससे किसानों की आय में भी बढ़ोतरी हुई है। आज बाजार में खेत को तैयार करने के साथ ही फसल की बुवाई करने से कटाई तक की मशीनें बाजार में उपलब्ध हैं। इन्हीं में एक मशीन है रोटावेटर जो आपके खेती को आसान बनाने में आपकी सहायता करती है। खेत की तैयारी में इस मशीन का उपयोग बेहद सफल रहा है। इसमें खास बात ये है कि इसका संचालन आसान है और इसमें डीजल की खपत भी अपेक्षाकृत कम होती है। आज कई कंपनियां अलग- अलग प्रकार के रोटावेटर बना रही हैं, जो किसानों का खेती का काम आसान कर रही हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 एग्रीकल्चर मशीनरी : रोटावेटर क्या है रोटावेटर मिट्टी की तैयारी के लिए मशीनरी का एक उपयोगी टुकड़ा है। खेती के उपकरण के ये बहुमुखी टुकड़े एक मोटराइज्ड मशीन हैं जो मिट्टी को मोडऩे के लिए घूर्णन ब्लेड का उपयोग करते हैं। उनके सार में रोटावेटर पृथ्वी के उपकरण हैं जो कृषक और टिलर के समान कार्य करते हैं। सामान्य भाषा में कहे तो रोटावेटर्स शक्तिशाली बागवानी उपकरण हैं जो टै्रैैक्टर के साथ कार्य करता है। रोटावेटर्स खेत की मिट्टी को तोडऩे के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। रोटावेटर्स मशीनें घूर्णन ब्लेड के एक सेट से सुसज्जित हैं जो उनके रोटेशन के दौरान मिट्टी के ढेलों को तोडऩे के काम आते हैं। इससे मिट्टी भुरभुरी होकर खेती के तैयार हो जाती है। रोटावेटर के कार्य रोटवेटर का उपयोग मुख्य रूप से खेतों में उपयोग बीज की बुआई के समय किया जाता है। रोटावेटर मक्का, गेहूं, गन्ना आदि के अवशेष को हटाने के साथ ही इसके मिश्रण करने के काम आता है। रोटावेटर के उपयोग से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार भी आता है। इसके अलावा धन, लागत, समय और ऊर्जा आदि की भी बचत होती है। वर्तमान में बाजार में प्रचलित रोटावेटर्स की खासियतें बाजार में वर्तमान प्रचलित अधिकांश रोटावेटर्स ऐसे हैं जिन्हें इस तरह से डिजाइन किया गया है जो कठोर और मुलायम दोनों तरह की मिट्टी के इस्तेमाल किया जा सकता है। इनकी डिजाइन मजबूत होने के कारण इसमें कंपन कम होता है। अच्छी क्वालिटी होने की वजह से इसके रखरखाव पर भी कम खर्च आता है। इसका बाक्स कवर खेत में काम करते समय गीयर बाक्स को पत्थरों व दूसरी बाहरी चीजों से बचाता है। साइड स्किड असेंबली के साथ जुताई की गहराई में 4 से 8 इंच तक का फेरबदल किया जा सकता है। रोटावेटर्स में बोरान स्टील के ब्लेड लगे होते हैं इसमें एक गियर ड्राइव भी लगा होता है जिसके वजह से यह लंबे समय तक चलते हैं। अधिकांश रोटावेटर्स में ट्रेनिंग बोर्ड को एडजस्ट करने के लिए ऑटोमैटिक स्प्रिंग लगे होते हैं। जिससे इनका प्रयोग गीले और सूखे दोनों ही स्थानों पर किया जा सकता है। रोटावेटर के लाभ/ महत्व/विशेषताएं रोटावेटर को किसी भी प्रकार की मिट्टी की जुताई में प्रयोग किया जा सकता है। फिर चाहे मिट्टी दोमट, चिकनी , बलुई, बलुई दोमट, चिकनी दोमट आदि क्यों न हो। रोटावेटर का उपयोग 125 मिमी-1500 मिमी की गहराई तक की मिट्टी के जुताई के लिए किया जा सकता है। यह मिट्टी को तुरंत तैयार कर देता है जिससे पिछली फसल की मिट्टी की नमी का पूर्णतया उपयोग हो जाता है। रोटवेटर को मिट्टी की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार समायोजित किया जा सकता है। इसका उपयोग किसी भी फसल के लिए विशेष रूप से उथल-पुथल के लिए किया जा सकता है। रोटावेटर के उपयोग में अन्य यंत्रों की अपेक्षा 15 से 35 प्रतिशत तक ईंधन की बचत होती है। यह सूखे और गीले दोनों क्षेत्रों में कुशलता से कार्य कर सकता है। इससे बीज की बुआई में जल्दी होती है। जिससे समय की बचत होती है। इसका उपयोग फसलों के अवशेषों को हटाने में भी किया जा सकता है। इसको खेतों में किसी भी मोड़ पर घुमाया जा सकता है। चाहे भूमि कैसे भी हो। रॉटावेटर की सबसे बड़ी विशेषता यह है की इससे जुताई करने के बाद खेतों में पाटा लगाने की जरुरत नहीं पड़ती है। वर्तमान में इन कंपनियों के रोटावेटरों की है अधिक डिमांड भारत में विभिन्न कंपनियों के रोटावेटर उपलब्ध हैं। लेकिन वर्तमान में शक्तिमान, सोनालिका, महिंद्रा, फील्डकिंग, सॉइल मास्टर, एग्रीस्टार, मास्कीओ गैस्पर्डो, इंडो फार्म, न्यू हॉलैंड, दशमेश, लैंडफोर्स, जॉन डियर, कैप्टन, खेदूत, केएस गु्रप, बख्सिश व बुलज़ पावर कंपनियों के रोटावेटर की भारतीय बाजार में अधिक मांग है। इन कंपनियों के द्वारा बनाए गए रोटावेटरों की खूबियों व आकर्षक डिजाइन व अन्य विशेषताएं किसानों को अपनी ओर आकर्षित करती है। और दूसरी बात विश्वसनीयता। यही कारण है कि इन कंपनियों के कृषि उपकरण को किसानों द्वारा काफी पसंद किया जाता है। दशमेश का रोटावेटर जॉन डियर का रोटावेटर मास्कीओ गैस्पर्डो का रोटावेटर रोटावेटर की कितनी कीमत? विभिन्न कंपनियों के रोटावेटरों की कीमत अलग-अलग होती है। यह रोटावेटर की खूबियों पर निर्भर करता है। रोटावेटर खरीदने से पहले आपको तय करना होगा कि आपको किस ब्रांड का रोटावेटर खरीदना है। उसी के अनुसार उसकी कीमत होगी। विभिन्न कंपनियों के रोटावेटर की कीमत जानने के लिए ट्रैक्टर जंक्शन की वेबसाइट पर विजिट करें। कृषि यंत्रों पर सब्सिडी का लाभ लेने के लिए क्या करें? यदि कोई किसान नया कृषि यंत्र खरीदना चाहता है तो सबसे पहले यह सुनिश्चित करे कि उसको किस कंपनी का कृषि यंत्र खरीदना है। उसके बाद किसान उस कृषि यंत्र पर अनुदान की जानकारी के लिए अपने जिले या ब्लाक स्तर के कृषि कार्यालय पर संपर्क करें। वहां से अनुदान की पूरी प्रक्रिया को समझें। इसके अलावा किसान चाहे तो वह जिस कंपनी का यंत्र खरीद रहा है तो उस कंपनी के डीलर से संपर्क करके भी इस बारें में जानकारी ले सकते हैं। सभी प्रकार के कृषि यंत्र खरीदने के लिए यहां करें संपर्क यदि किसान किसी भी कंपनी का कृषि यंत्र खरीदना चाहता है तो ट्रैक्टर जंक्शन से संपर्क करें। हमारे यहां विभिन्न कंपनियों के नए व पुराने रोटावेटर्स उपलब्ध हैं जिन्हें आप किफायती दामों पर खरीद सकते हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

आंवला के फायदे और नुकसान : जानें, कोरोना काल में किसानों को कैसे हुआ तीन गुना ज्यादा फायदा

आंवला के फायदे और नुकसान : जानें, कोरोना काल में किसानों को कैसे हुआ तीन गुना ज्यादा फायदा

जानिएं, इस साल क्यूं बढ़ रहे हैं आंवले के दाम, क्या है वजह? कोरोना काल ने जिसने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है। इसका असर हर क्षेत्र में देखने को मिला। इससे सबसे ज्यादा उद्योगिक क्षेत्र प्रभावित हुआ और परिणाम स्वरूप लोगों के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया। वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए कोरोना काल खुशियां लेकर आया है। यह खुशियां उन किसानों के लिए हैं जो आंवला का उत्पादन करते हैं। इन दिनों बाजार में आंवले की मांग काफी तेजी से बढ़ रही है और इसके दाम भी काफी अच्छे मिल रहे हैं। इससे आंवला उत्पादकों की आमदनी इजाफा हो रहा है। इस संबंध में मुहाना मंडी में आंवले के व्यापारी सौरभ बलाला ने मीडिया को बताया कि कोरोना काल में चूंकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली इन औषधियों की डिमांड बढ़ गई है। लिहाजा आंवले की डिमांड में भी बेतहाशा बढ़ोतरी रही है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बाजार में क्या चल रहा है आंवले का भाव जो आंवला पिछले साल 6 से 7 रुपए किलो तक में बिक रहा था। वहीं आंवला इस बर 17 से 18 रुपए किलो तक में बिक रहा है। अच्छी क्वालिटी का आंवला तो थोक में 25 रुपए किलो तक बिक रहा है। मंडी व्यापारियों का कहना है कि अभी आंवले की आवक शुरू ही हुई है और भावों में इस कदर तेजी देखने को मिल रही है। आंवले की खेती : किसानों को मिल रहा है दो तरफा फायदा आंवले के भावों में इस बढ़ोतरी का फायदा सीधे तौर पर किसानों को दो तरफा मिल रहा है। एक ओर जहां उन्हें अपनी उपज के दाम ज्यादा मिल रहे हैं वहीं दूसरी ओर आयुर्वेदिक औषधियां और प्रोडक्ट बनाने वाली कम्पनियां आंवला खरीदने के लिए सीधे किसानों के खेत का रुख कर रही है। मुहाना मंडी फल-सब्जी व्यापार संघ के अध्यक्ष राहुल तंवर के मुताबिक आंवले की डिमांड इतनी ज्यादा है कि डाबर और पतंजलि जैसी बड़ी कम्पनियां आंवला खरीदने के लिए सीधे किसानों के पास सौदा करने पहुंच रही हैं। मंडियों से भी बड़ी मात्रा में आंवला फैक्ट्रियों में जा रहा है। औषधियों के साथ ही आंवला कैंडी और मुरब्बे जैसे प्रोडक्ट्स के लिए भी आंवले की खपत बढ़ गई है। आंवले की फसल : दाम अभी ओर बढऩे की उम्मीद आने वाले दिनों में आंवले के भावों में और ज्यादा तेजी आने की उम्मीद है। मुहाना मंडी में आंवले के व्यापारी सुधीर कुमार के अनुसार अभी तो आंवले की आवक शुरू ही हुई है और पीक आना अभी बाकी है। अभी कई किसान कच्चे आंवले ही मंडियों में लेकर आ रहे हैं और उनके भी अच्छे दाम मिल रहे हैं। अगले 1-2 महीनों में जब अच्छी क्वालिटी के आंवले की आवक होगी तो भाव पिछले साल के मुकाबले 4 से 5 गुना तक होंगे। क्यों बढ़ रहे हैं आंवला के दाम, यह है इसके पीछे की वजह आंवले के भावों में जिस तरह की तेजी देखने को मिल रही है उसे देखकर कहा जा सकता है कि आंवला आम लोगों की इम्यूनिटी तो बढ़ा ही रहा है किसानों की आर्थिक सेहत भी संवार रहा है। राजस्थान में आंवले का बड़े स्तर पर उत्पादन होता है। लिहाजा भावों में तेजी का फायदा भी किसानों को बड़े स्तर पर मिलेगा। बता दें कि आंवला विटामिन सी के सबसे अच्छे स्रोतों में से एक है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। च्यवनप्राश के साथ ही दूसरी आयुर्वेदिक औषधियों में आंवले का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। इसलिए आंवले का उपयोग इस कोरोना काल में सर्वाधिक हो रहा है। आंवले के फायदे (health benefits of amla) / आंवला के फायदे और नुकसान आंवले में विटामिन सी पाया जाता है जो हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है। जब हमारा इम्यून सिस्टम मजबूत होता है तो कोई रोग ज्यादा प्रभावित नहीं करता और रोग जल्दी ठीक होने लगता है। इसके अलावा आंवला हमारे शरीर में कैंसर सेल्स को बढऩे से रोकता है। यह शरीर में कोलेस्ट्रॅाल के लेवल नियंत्रित करने में सहायक है। आयुर्वेद में अस्थमा के मरीजों के लिए इसे फायदेमंद बताया गया है। यह डायबिटीज के मरीजों के लिए भी अच्छा माना जाता है। आंवले का सेवन करने से बल्ड शुगर लेवल नियंत्रण में रहता है। जिन लोगों को पाचन संबंधी समस्या होती है उनके लिए आंवले का सेवन काफी लाभकारी होता है। इसके सेवन से अपच व पेट संबंधी बीमारियों में राहत मिलती है। यही नहीं आंवले के सेवन से लीवर सुरक्षित रहता है। इसके अलावा आंवला के सेवन से बालों के झडऩे की समस्या कम रहती है और बालों की जड़े मजबूत होती है। इसके अलावा आंवला नेत्र, त्वचा संबंधी अनेक बीमारियों में उपयोग में लिया जाता है। इस प्रकार कहे तो सौ रोगों की एक दवा आंवला है। यही कारण है की आयुर्वेद में इसे अमृत समान माना गया है। नोट : (यहां दिए गए आंवले के फायदे की जानकारी विभिन्न स्त्रोतों से जुटाई गई है। यदि आप किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित है तो आंवले का उपयोग करने से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लें, क्योंकि आंवले का उपयोग हर किसी को फायदा पहुंचाए, ऐसा दावा हम नहीं करते।) अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

खेती और पशुपालन के अनूठे मॉडल से किसान की कमाई 5 करोड़

खेती और पशुपालन के अनूठे मॉडल से किसान की कमाई 5 करोड़

जानें, क्या है यह अनोखा कृषि मॉडल और इससे कैसे हो सकती है अच्छी आमदनी बिहार के एक किसान ने खेती और पशुपालन का एक अनोखा मॉडल तैयार किया है। इसे आप खेती और पशुपालन का मिश्रित मॉडल भी कह सकते हैं। हम जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अधिकांश जनसंख्या गांव में निवास करती है और गांवों के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन है। लेकिन परंपरागत तरीके से खेती करना वर्तमान समय में महंगा सौदा साबित हो रहा है। इसलिए आज आवश्यकता है कि खेती और पशुपालन का एक मिश्रित मॉडल तैयार कर इस व्यवसाय को लाभदायक बनाया जाए। और यही कर दिखाया है बिहार के एक किसान ने। जी हां, बिहार के बेगूसराय जिला के कोरैय गांव के रहने वाले 30 वर्षीय ब्रजेश कुमार ने एक ऐसा अनोखा कृषि मॉडल तैयार किया है जिससे उसे करोड़ की कमाई हो रही है। इस मॉडल की खासियत यह है कि इसमें खेती के साथ पशुपालन को जोड़ा गया है। इस मॉडल की सफलता को देखते हुए पीएम मोदी भी उनकी प्रशंसा कर चुके हैं। आइए जानते हैं किस प्रकार ब्रजेश इस मॉडल से करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। आशा करते हैं ये जानकारी हमारे किसानों के लिए काफी लाभदायक साबित होगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 यहां से शुरू हुई युवा किसान ब्रजेश कुमार की सफलता की कहानी बात उन दिनों की है जब ब्रजेश, साल 2010 में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेली कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा करने के बाद सीबीएसई में नौकरी कर रहे थे, लेकिन कुछ अलग करने की चाह में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। ब्रजेश के अनुसार सीबीएसई में काम करने के दौरान उन्होंने देखा कि बच्चे सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए कृषि कार्यों के बारे में पढ़ रहे हैं, उन्हें इससे कोई लगाव नहीं है और न ही उनके अभिभावकों का अपने बच्चों को किसान बनाने का कोई इरादा है। इससे उन्हें विचार आया कि क्यों न खेती और पशुपालन का एक ऐसा मॉडल विकसित किया जाए जिससे मानव जीवन में इसकी उपयोगिता साबित हो। बस यहां से शुरू हुई युवा किसान ब्रजेश कुमार की सफलता की कहानी। किसान ब्रजेश ने अपने विचार को धरातल पर उतारने की ठान ली और उसके लिए प्रत्यशील हो गए। उन्होंने बिहार सरकार के समग्र विकास योजना का लाभ उठाकर करीब 15 लाख रुपए का लोन लिया और बेगूसराय में चार एकड़ जमीन लीज पर लेने के साथ ही, करीब दो दर्जन फ्रीजियन साहीवाल और जर्सी नस्ल की गायों को खरीदा। धीरे-धीरे ब्रजेश का दायरा बढऩे लगा और उन्होंने पशुओं के लिए पौष्टिक आहार और वर्मी कम्पोस्ट बनाने का काम शुरू कर दिया। ब्रजेश के अनुसार साल 2015 में वे राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, आणंद (गुजरात) से जुड़े। इसके तहत उन्होंने कई किसानों को प्रशिक्षण दिया। इसके बाद उन्होंने साल 2017 में, पशुपालन के साथ-साथ किसानों को खेती की पैदावार को बढ़ाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट बनाने का काम भी शुरू कर दिया। ब्रजेश का मानना है कि अपने कार्यों को बढ़ावा देने के लिए नए नजरिए को अपनाना जरूरी है। 26 किस्म की उन्नत नस्ल की गायों का करते हैं पालन, दूध बेचकर करते हैं कमाई ब्रजेश के पास जर्सी, साहीवाल, बछौड़, गिर आदि जैसी 26 नस्ल उन्नत नस्ल की गायें हैं जिससे प्रतिदिन 200 लीटर दूध का उत्पादन होता है। वह दूध को बरौनी डेयरी को बेचते हैं जिससे उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है। ब्रजेश के अनुसार विदेशी किस्म की गायों को पालने में काफी जोखिम है और देशी गायों से ज्यादा दूध होता नहीं है। इसे देखते हुए उन्होंने मिश्रित किस्म के गायों का पालन बेहतर समझा। गायों को पालने में करते हैं आधुनिक तकनीकों का उपयोग ब्रजेश के अनुसार गायों को पालने के लिए वे आधुनिक तरीकों का उपयोग करते हैं। जैसे कि गायों के लिए शार्टेट शूट सीमेन का इस्तेमाल करना जिससे हमेशा बछिया ही होती है। वहीं गौशाला में आत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर सरोगेसी गाय भी पाल रहे हैं, जिससे प्रतिदिन 50 लीटर दूध मिलता है। गौशाला से लेकर गोबर गैस प्लांट तक आज ब्रजेश की चार एकड़ जमीन पर मौसम के अनुसार मक्का, जौ, बाजरा जैसी कई चीजों की खेती की जाती है। जिससे पशुओं के लिए चारा बनाया जाता है। ब्रजेश के अनुसार उन्होंने गौशाला को दो तरीकों से बनाया है- मिल्किंग शेड और मुक्त गौशाला। जहां पशु अपनी पूरी स्वतंत्रता के साथ रह सकते हैं। वहीं इन गायों से जो गोबर प्राप्त होता है उसका उपयोग कर वर्मी कम्पोस्ट और गोबर गैस बनाने के लिए यूनिट को भी स्थापित किया है। वह अपने उत्पादों को राज्य के विभिन्न हिस्सों के किसानों को भी बेचते हैं। किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए शुरू किया ट्रेनिंग सेंटर ब्रजेश ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आदर्श किसान संस्थान ट्रेनिंग सेंटर शुरू किया है। इसमें वह बरौली दुज्ध संघ की मदद से एक महीने के 10 दिनों में करीब 400 किसानों को उन्नत पशुपालन की ट्रेनिंग देते हैं। इससे उन्हें लागत को कम करके अधिक आय अर्जित करने में मदद मिलती है। इस ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षित किसान आज आधुनिक तौर-तरीके अपना कर खेती और पशुपालन से अच्छी आमदनी कर रहे हैं। उन्नत खेती की तकनीक का करते हैं भरपूर इस्तेमाल युवा किसान ब्रजेश ने चार एकड़ की जमीन पर उन्नत तकनीक का भरपूर इस्तेमाल किया है। उन्होंने यहां शिमला मिर्च, स्ट्रॉबेरी, गन्ना और टमाटर की खेती शुरू की। उन्होंने दो एकड़ जमीन पर शिमला मिर्च, एक एकड़ पर टमाटर और एक एकड़ पर स्ट्रॉबेरी और गन्ना लगा रखा है। वे बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने पूरी जमीन पर पहले प्लास्टिक बिछाया और बेडिंग सिस्टम के तहत उसमें छेद कर पौधा लगाया। सिंचाई के लिए उन्होंने ड्रीप इरिगेशन की व्यवस्था की। ब्रजेश के मुताबिक इस सिस्टम से प्रति एकड़ 3-4 लाख रुपए की बचत होगी। इस तरह ब्रजेश का वार्षिक टर्नओवर करीब 5 करोड़ रुपए है और उन्होंने अपने कामों को संभालने के लिए 20 लोग लगा रखें हैं। इससे गांवों के लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। आप भी इस मॉडल को अपना का कर सकते हैं अच्छी कमाई यह जरूरी नहीं कि इस मॉडल को बड़े पैमाने पर ही अपनाएं। आप छोटे स्तर पर भी इसे शुरू कर सकते हैं। इस मॉडल में पशुपालन को खेती के साथ करने की तकनीक विकसित की गई है और उनसे प्राप्त उत्पादों का बेहतर प्रबंधन और उपयोग समझाया गया है जिससे आमदनी बढ़ाई जा सकती है। जैसे आप खेती करते है साथ में पशुपालन भी करें। खेती में भी मिश्रित खेती को अपनाएं ताकि यदि एक फसल उत्पादन पर घाटा हो तो उसकी भरपाई दूसरी फसल से की जा सके। जैसा कि ब्रजेश अपने 4 एकड़ खेत में चार-पांच प्रकार की फसलें लेते हैं। वहीं पशुपालन के लिए एक ही किस्म की गायों का चयन नहीं करके अलग-अलग प्रकार की गायों की उन्नत नस्ल का चयन करते हैं। इससे सभी प्रकार की गायों से अच्छा उत्पादन लिया जा सकेगा। इस आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं- मान लें, आपने एक ही नस्ल की चार गायें लें ली और चारों गायों में कुछ खामियों की वजह से दूध की गुणवत्ता में खराबी आ गई तो फिर आप क्या करेंगे? किसान ब्रजेश ने पशुपालन में जाखिम को कम करने के लिए विभिन्न प्रकार की गायों को पालने का विचार किया। अब बात आती है गायों से प्राप्त गोबर की। गायों से प्राप्त गोबर से कम्पोस्ट खाद तैयार कर खेत में उपयोग लिया जा सकता है। जैसा कि ब्रजेश ने किया। वहीं गोबर का उपयोग गोबर गैस बनाने में किया जा सकता है। इसके अलावा गाय के मूत्र से भी कमाई की जा सकती है। आजकल तो बाजार में गाय का मूत्र दवाओं की दुकान में बिकता है। बता दें कि गाय के मूत्र में कई रोगों को खत्म करने की क्षमता है। इसलिए आज पथरेड़ा गौशाला व पंतजलि जैसी कई कंपनियां गौमूत्र बेचकर अच्छी खासी कमाई कर रही हैं। खेती और पशुपालन में काफी संभावनाएं, युवाओं को स्वरोजगार का अवसर खेती और पशुपालन में काफी संभावनाएं है। यदि इसे आधुनिक तरीके और एक मिशन के रूप में किया जाए तो इससे न केवल बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है बल्कि अच्छी खासी कमाई भी की सकती है। आजकल युवा पढ़लिख कर नौकरी की तलाश करते हैं। इससे बेहतर है कि वे स्वरोजगार की ओर अग्रसर हो और नए विचार के साथ उसमें नई तकनीक को विकसित कर अपनी आमदनी को बढ़ाए। इससे अन्य युवाओं भी प्ररेणा मिलेगी और आत्मनिर्भर भारत का सपना भी साकार हो सकेगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक 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