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मानसून में मुनाफा देगी ये 10 सब्जियां : जानें संपूर्ण जानकारी

मानसून में मुनाफा देगी ये 10 सब्जियां : जानें संपूर्ण जानकारी

24 June, 2020

जल्दी पकने वाली किस्मों का करे चयन, उन्नत किस्में अपनाएं

देश के कई हिस्सों में मानसून ने दस्तक दे दी है। और इस बार मौसम विज्ञानियों ने मानसून के अच्छा रहने के संकेत भी दिए हैं। इस समय देश के कई भागों में मानसून पूर्व की बारिश भी हो रही है। इसे देखते हुए किसानों ने खरीफ की फसल की बुवाई करना शुरू कर दिया है। ऐसे में किसान इन खरीफ फसलों के साथ सब्जियां भी उगाए तो उसे भरपूर फायदा मिलेगा। बारिश का पानी उपलब्ध होने के कारण अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। खरीफ की फसल की सिंचाई के साथ ही इसकी सिंचाई भी हो जाएगी। सिंचाई के लिए पानी, वर्षा जल के रूप में उपलब्ध होने से सिंचाई कार्य पर खर्च होने वाली बिजली की बचत होगी और वर्षा के जल का समुचित उपयोग भी हो सकेगा। आज हम आपको उन 10 सब्जियों के बारें बताएंगे जिनकी बाजार में मांग बनी रहती है जिन्हें उगाकर किसान भाई अच्छी कमाई कर सकते हैं। साथ ही इन सब्जियों की उन्नत किस्मों की जानकारी भी देंगे जिनसे कम समय में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

 

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खीरा -

खीरा की बाजार में मांग हर मौसम में रहती है। बाजार में खीरे की अधिक मांग बने रहने के कारण खीरे की खेती किसान भाइयों के लिए बहुत ही लाभदायक है। खीरे का उपयोग खाने के साथ सलाद के रूप में बढ़ता ही जा रहा है, जिससे बाजार में इसकी कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं। इसके साथ ही खीरे की खेती रेतीली भूमि में अच्छी होती ऐसे में किसान भाइयों के पास जो ऐसी भूमि है, जिसमें दूसरी फसलों का उत्पादन अच्छा नहीं होता है उसी भूमि में खीरे की खेती से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। यह हर प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। जिनमें जल निकास का सही रास्ता हो। अच्छी उपज के लिए जीवांश पदार्थयुक्त दोमट भूमि सबसे अच्छी होती है। इसकी फसल जायद और वर्षा में ली जा सकती है। 

उन्नत किस्में :  खीरे का अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत किस्मों में पंजाब नवीन, हिमांगी, जापानी लॉन्ग ग्रीन, जोवईंट सेट, पूना खीरा, पूसा संयोग, शीतल, फ़ाईन सेट, स्टेट 8 , खीरा 90, खीरा 75, हाईब्रिड1 व हाईब्रिड-2, कल्यानपुर हरा खीरा इत्यादि प्रमुख है। बता दें किस्मों का चयन अपने क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को ध्यान मेें रखकर किया जाना चाहिए।

 

 

लोबिया- 

लोबिया वर्षा ऋतु में उगाई जाने वाली फसल है। इस फसल मेें मक्का की उपेक्षा सूखा तथा गर्मी को सहन करने की क्षमता अधिक होती है। इसकी खेती के लिए कई उत्तम किस्में मौजूद है जिनका चुनाव संबंधति क्षेत्र की स्थिति व जलवायु को देखकर करना चाहिए। 

उन्नत किस्में :   लोबिया की उत्तम किस्मों में टाइप-2, पूसा बरसानी, पूसा फाल्गुनी, पूसा दो फसली, पूसा ऋतुराज, पूसा कोमल, सी-152, 68 एफएम, अम्बा, स्वर्ण शामिल हैं। इसके अलावा इसकी चारे के लिए उपयुक्त किस्मों में रशियन जोइंट, 10 सिरसा, यूपीसी-278, यूपीसी-5286, के.-397, जवाहर-1 लोबिया, जवाहर लोबिया-21 प्रमुख रूप से उपयोगी है। 

 

चौलाई- 

चौलाई की खेती के लिए अर्ध शुष्क वातावरण को उपयोगी माना जाता हैं। भारत में चौलाई की खेती लगभग सभी जगह पर की जा सकती हैं। इसके पौधों को विकास करने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती हैं। चौलाई को गर्मी और बरसात दोनों मौसम में उगाया जा सकता हैं। 

उन्नत किस्में : चौलाई की उन्नत किस्मों में कपिलासा, आर एम ए 4, छोटी चौलाई, बड़ी चौलाई, अन्नपूर्णा, सुवर्णा, पूसा लाल, गुजरती अमरेन्थ 2 है। इसके अलावा और भी कई किस्में बाजार में उपलब्ध हैं जिन्हें काफी जगहों अलग-अलग मौसम के आधार पर उगाया जाता है। इसमें पी आर ए 1, मोरपंखी, आर एम ए 7, पूसा किरण, आई सी 35407, पूसा कीर्ति और वी एल चुआ 44 जैसी कई किस्में शामिल हैं।

 

ककड़ी-

कद्दू वर्गीय सब्जियों में ककड़ी का बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह कुकरबिटेसी परिवार से संबंधित है एवं इसका वानस्पतिक नाम कुकमिस मेलो है। इसे मुख्य रूप से कच्ची सलाद के रूप में खाया जाता है। गर्मियों में इसके सेवन से ठंड की अनुभूति होती है और लू लगने की संभावना भी कम होती है। ककड़ी की खेती हमारे देश में लगभग हर क्षेत्र में की जाती है। यदि ककड़ी की खेती में उन्नत बीजों के साथ खाद, उर्वरक एवं सिंचाई का ध्यान रखा जाए तो इसकी फसल से अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

 उन्नत किस्में : ककड़ी की उन्नत किस्मों में अर्का शीतल ऐसी किस्म है जिसके फल काफी कोमल तथा हल्के हरे रंग के होते हैं। फल लम्बाई में लगभग 22 सेंटिमीटर और भार में 100 ग्राम तक के होते हैं। इस किस्म में तीखापन (कडुवाहट) बिल्कुल नहीं होती है। इसकी औसत उत्पादन क्षमता लगभग 200 किवंटल प्रति हैक्टेयर होती है। इसकी दूसरी किस्म लखनऊ अर्ली है। यह किस्म लखनऊ और उत्तरी भारत के क्षेत्रों में बहुत प्रचलित है। इसके फल मुलायम, लम्बे और गूदेदार होते हैं। इसके अलावा ककड़ी अन्य किस्में में कुछ स्थानीय किस्में भी है जो नसदार, नस रहित लम्बा हरा और सिक्किम ककड़ी के नाम से जानी जाती हैं।

 

तुरई- 

यह बेल पर लगने वाली सब्जी होती है। इसकी सब्जी की भारत में छोटे कस्बों से लेकर बड़े शहरों में बहुत मांग है। क्योंकि यह अनेक प्रोटीनों के साथ खाने में भी स्वादिष्ट होती है, जिसे हर मनुष्य इसकी सब्जी को पसंद करता है। इसकी खेती हर प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, किन्तु उचित जल निकास धारण क्षमता वाली जीवांश युक्त हलकी दोमट भूमि इसकी सफल खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। वैसे उदासीन पी एच मान वाली मिट्टी इसके लिए अच्छी रहती है। नदियों के किनारे वाली भूमि भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है, कुछ अम्लीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। 

उन्नत किस्में : तुरई की जल्दी तैयार होने व अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों में पंजाब सदाबहार, पूसा नसदार,  सरपूतिया, एमए-11, कोयम्बूर 1, कोयम्बूर 2 व पी के एम 1 आदि हैं।

 

फूलगोभी-

फूलगोभी एक लोकप्रिय सब्जी है और क्रूसिफेरस परिवार से संबंधित है और यह कैंसर की रोकथाम के लिए प्रयोग की जाती है। यह सब्जी दिल की ताकत को बढ़ाती है। यह शरीर का कोलैस्ट्रोल भी कम करती हैं। फूल गोभी बीजने वाले मुख्य राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, आसाम, हरियाणा और महाराष्ट्र हैं। यह फसल रेतली दोमट से चिकनी किसी भी तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती हैं। देर से बीजने वाली किस्मों के लिए चिकनी दोमट मिट्टी को पहल दी जाती है। जल्दी पकने वाली के लिए रेतली दोमट का प्रयोग करें। मिट्टी की पी एच 6-7 होनी चाहिए। मिट्टी की पी एच बढ़ाने के लिए उसमें चूना डाला जा सकता है। 

उन्नत किस्में : फूलगोभी का अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत किस्मों में पूसा सनोबाल 1, पूसा सनोबाल के-1, स्नोबाल 16 प्रमुख है। इसके अलावा पंत शुभ्रा, अर्ली कुंवारी, पूसा दीपाली भी अच्छा उत्पादन देने वाली किस्में हैं।

 

करेला- 

करेला अपने औषधीय गुणों के कारण सब्जियों में अपना एक महत्वपूर्ण स्थानर रखता है। करेले के कच्चे फलों का रस मधुमेह (शुगर) के रोगियों के लिए बहुत उपयोगी है। वहीं उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) के रोगियों के लिए भी लाभदायक है। इसमें उपस्थिति कडुवाहट (मोमोर्डसीन) खून को साफ करने में बेदह उपयोगी है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए गर्म और आद्र्रता वाले क्षेत्र क्षेत्र सर्वोत्तम होते है। अत: इसकी फसल खरीफ व जायद दोनों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। 

उन्नत किस्में : इसकी अच्छी पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों में पूसा दो मौसमी, पूसा विशेष, अर्का हरित, कल्यानपुर बारह मासी शामिल है।

 

भिंड़ी-

रोजाना के खाने में भिंडी की सब्जी को सब से ज्यादा पसंद किया जाता है। इसकी तरी वाली सब्जी के साथ-साथ खुश्क सब्जी भी ज्यादातर लोगों की मनपसंद होती है और कलौंजी वाली भरवां भिंडियों की तो बात ही अलग है। कुल मिला कर शादी जैसे समारोहों तक की शान बनने वाली भिंडी की मांग 12 महीने बनी रहती है। इस सदाबहार सब्जी की खेती सभी प्रकार की जमीन में की जा सकती है, मगर अच्छे जलनिकास वाली दोमट मिट्टी व जैविक खादों से भरपूर खेत इसके लिए ज्यादा बढिय़ा रहते हैं। वहीं इसकी खेती हल्की अम्लीय जमीन में भी की जा सकती है। 

उन्नत किस्में :  इसकी उन्नत किस्मों में पूसा 4, परभनी क्रांति, पंजाब-7, पूसा सावनी, हिसार उन्नत, हिसार नवीन, एचबीएच-142, पंजाब-8 प्रमुख रूप से उपयोगी हैं। 

 

लौकी-

सब्जियों में घीया (लौकी) एक कद्दूवर्गीय महत्वपूर्ण सब्जी है। घीया (लौकी) को विभिन्न प्रकार के व्यंजन जैसे- रायता, कोफ्ता, हलवा, खीर इत्यादि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता हैं। यह कब्ज को कम करने, पेट को साफ करने, खांसी या बलगम दूर करने में अत्यन्त लाभकारी है। इसके मुलायम फलों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खाद्य रेशा, खनिज लवण के अलावा प्रचुर मात्रा में अनेकों विटामिन पाये जाते हैं। निर्यात की दृष्टि से सब्जियों में घीया (लौकी) अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

उन्नत किस्में :  इसकी उन्नत किस्मों में काशी गंगा किस्म के प्रत्येक फल का औसत भार 800 से 900 ग्राम होता है। गर्मी के मौसम में 50 दिनों बाद तथा बरसात में 55 दिनों बाद फलों की प्रथम तुड़ाई की जा सकती है। इस घीया (लौकी) प्रजाति की औसत उत्पादन क्षमता 44 टन प्रति हेक्टेयर है। वहीं पूसा समर प्रोलिफिक राउंड किस्म की पैदावार 200 से 250 किवंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा इसकी अन्य उन्नत किस्मों में काशी बहार, पूसा नवीन, अर्को बहार, नरेन्द्र रश्मि, पूसा सन्देश, पूसा कोमल,  पूसा हाइब्रिड 3, उत्तरा आदि शामिल है जो अच्छा उत्पादन देती है।

 

 

टमाटर-

टमाटर कई सब्जियों के साथ मिलाकर बनाया जाता है। टमाटर में पर्याप्त मात्रा में कैरोटिन नामक वर्णक होता है जो शरीर में खून बनाने में मदद करता है। लोग इसको कई तरीके से उपयोग करते हैं। ये सलाद के रूप में कच्चा खाया जाता है। इसका सूप पीना लोग काफी पंसद करते हैं। इससे चटनी, सॉस, जैली आदि बनाई बनती है जिसकी बारहों महीने बाजार में मांग बनी रहती है। इसकी खेती बारहों महीने की जा सकती है। 

उन्नत किस्में : इसकी सामान्य किस्मों में पूसा गौरव, पूसा शीतल, सालेनागोला, साले नबड़ा, वी.एल.टमाटर-1, आजाद टी-2, अर्का विकास, अर्का सौरभ,पंत टी -3 प्रमुख रूप से शामिल है। वहीं संकर किस्मों में रुपाली, नवीन, अविनाश-2, पूसा हाइब्रिड-4, मनीशा, विशाली, पूसा हाइब्रिड-2, रक्षिता, डी.आर.एल-304, एन.एस. 852, अर्कारक्षक, अर्का सम्राट व अर्का अनन्या हैं।

 

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भारत में अगस्त माह तक बना रहेगा टिड्डी दल का खतरा, किसान बरतें सावधानी

भारत में अगस्त माह तक बना रहेगा टिड्डी दल का खतरा, किसान बरतें सावधानी

नई टिड्डियों के कुछ झुंड भारत के पूर्वी व उत्तरी राज्यों सहित नेपाल पहुंचे, मचा सकते हैं तबाही भारत में टिड्डी दल का खतरा अगस्त महीने तक बना रहने की संभावना है। इसे देखते हुए किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए। खाद्य एवं कृषि संगठन के टिड्डी स्टेटस अपडेट के अनुसार मानसून की बारिश से पहले भारत-पाक सीमा की ओर जाने वाले वसंत ऋतु में पैदा हुए टिड्डियों के कई झुंडों में से कुछ भारत के पूर्वी और उत्तरी राज्यों में पहुंचे हैं। कुछ समूह नेपाल तक पहुंच गए। ऐसा पूर्वानुमान है कि मानसून की शुरुआत के साथ टिड्डियों का ये समूह राजस्थान लौटेगा और ईरान और पाकिस्तान से अब भी आ रहे अन्य टिड्डियों के समूहों के साथ मिल जाएगा। इनके जुलाई के मध्य के करीब अफ्रीका के हॉर्न से आ रहे टिड्डियों के समूह के साथ भी मिल जाने की संभावना है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर टिड्डियों में प्रजनन समय से पहले ही शुरू हो चुका है, जहां जुलाई में टिड्डियों के पर्याप्त बच्चे हो जाएंगे जो अगस्त के मध्य में गर्मियों के मौसम में पैदा होने वाले टिड्डियों के झुंड के रुप में सामने आएंगे। भारत में अभी राजस्थान राज्य के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, दौसा तथा भरतपुर और उत्तर प्रदेश के झांसी और महोबा जिलों में गुलाबी टिड्डियों और वयस्क पीली टिड्डियों के झुंड अभी भी सक्रिय बने हुए हैं। टिड्डियों का यह सिलसिला अगस्त माह तक चलने वाला है अत: किसानों को अपनी फसलों को इनसे बचाने के लिए पहले से ही कारगर कदम उठाने चाहिए ताकि संभावित हानि से बचा जा सके। वैसे प्रशासन अपने स्तर पर काम करता ही है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

धान की फसल में अब रोग लगने का मौसम, ये उपाय अपनाएं और अधिक उत्पादन पाएं

धान की फसल में अब रोग लगने का मौसम, ये उपाय अपनाएं और अधिक उत्पादन पाएं

धान की उन्नत खेती : ये उपाय अपनाएं, स्वस्थ और अधिक उत्पादन पाएं कई बार महंगे बीजों की खरीद के बावजूद किसान की फसल में कई रोग लग जाते हैं जिससे उत्पादन में कमी आ जाती है। बात करें धान की तो इस फसल की बुवाई से लेकर कटाई के बीच कई रोग लगते हैं जो इसके उत्पादन को कम कर देते हैं। इससे किसान को काफी मेहनत करने के बाद भी भरपूर लाभ नहीं मिल पाता। जैसा की हम जानते हैं इस बार अच्छे मानसून का अनुमान होने से देश भर में धान की बुवाई का कार्य जोरों पर है। यदि धान की बुवाई ( Paddy Sowing ) करते समय ही कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो इसमें लगने वाले रोगों से सुरक्षा कर संभावित हानि से बचा जा सकता है। इसके अलावा बुवाई के बाद से लेकर कटाई तक भी इस फसल का ध्यान रखना बेहद जरूरी है क्योंकि इसमें इस दौरान भी कई रोगों का प्रकोप बना रहता है जो इसके उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। आइए जानतें हैं धान की स्वस्थ खेती के तरीके जिनसे उत्पादन में वृद्धि कर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बुवाई से पहले बीजों का शोधन क्यों जरूरी धान की बुवाई से पूर्व इसके बीजों का शोधन किया जाना बेहद जरूरी है। धान की बुवाई या रोपाई से कटाई के बीच कई रोग लगते हैं। यदि बुवाई से पूर्व ही बीजों का शोधन कर इसे बोया जाए तो इससे रोगों की रोकथाम शुरुआत में ही हो जाती है। बीजों का शोधन करने से इसमें रोग लगने की संभावना बहुत ही कम हो जाती है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है। बीज शोधन से पहले करें पुष्ट बीजों का चयन धान के बीजों की बुवाई या रोपाई से पूर्व पुष्ट बीजों का चयन करना बहुत आवश्यक है। इसके लिए सबसे पहले बीज को नमक के घोल में डालें। दस लीटर पानी में 1.7 किलो सामान्य नमक डालकर घोल बनाएं और इस घोल में बीज डालकर हिलाएं, भारी एवं स्वस्थ बीज नीचे बैठ जाएंगे और हल्के बीज ऊपर तैरने लगेंगे। हल्के बीज निकालकर अलग कर दें तथा नीचे बैठे भारी बीजों को निकालकर साफ पानी में दो-तीन बार धोएं व छाया में सुखाए। कवक जनित रोगों से सुरक्षा के लिए यह करें उपाय धान को कवकजनित रोग से सुरक्षा के लिए इसके बीजों को 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। बीज उपचार के लिए बीज उपचार यंत्र (सीड ट्रीटिंग ड्रम) में बीज आधा भर लें तथा बीज की मात्रा के अनुसार आवश्यक कवकनाशी डालकर घुमा कर 5 मिनट बाद बीज की बुआई करें। यदि आप प्रमाणिक किस्म के बीजों का उपयोग कर रहे हैं तो इसे नमक के घोल में डुबोने की आवश्यकता नहीं है। झुलसा एवं सडऩ रोग से बचाव के लिए इस तरह करें बीज शोधन धान की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग लगते हैं इसमें से सडऩ तथा झुलसा रोग प्रमुख रोगों में से एक है। इस रोग से कभी-कभी 50 प्रतिशत तक फसल का नुकसान हो जाता है। इस रोग से बचाव के लिए धान की नर्सरी तैयार करने से पहले ही बीजोपचार करें। इससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है एवं फसलें फफूंदी जनित रोगों से मुक्त रहती है। इस रोग से धान को बचाने के लिए 04 किलोग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से शुष्क बीजोपचार कर बुवाई करें। भूमि का शोधन भी जरूरी, करें यह उपाय भूमि शोधन के लिए 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ट्राईकोडर्मा को लगभग 75 किलोग्राम गोबर कि सड़ी खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 7-8 दिन के लिए छायादार स्थान पर रखें एवं बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला दें। बैक्टरियल ब्लाईटरोग से प्रभावित क्षेत्र के लिए ऐसे करें बीज शोधन बैक्टरिया ब्लाईट रोग से प्रभावित क्षेत्र में 25 किलोग्राम बीज के लिए 04 किलोग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लिन या 40 ग्राम प्लाटोमाइसिन पानी में मिलाकर रात भर बीज को भिगोकर, दूसरे दिन छाया में सुखाकर नर्सरी में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त 25 किलोग्राम बीज को रात भर पानी में भिगोकर बाद में दूसरे दिन अतिरिक्त पानी निकालकर 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेन्डाजिम को 8- 10 लीटर पानी में घोलकर बीज में मिला दें फिर छाया में अंकुरित कर नर्सरी में डालें। नर्सरी लगने के 10 दिन के भीतर ट्राईकोडर्मा का एक छिडक़ाव कर दें। यदि नर्सरी में कीटों का प्रभाव दिखाई दे तो 1.25 ली. क्यनालफास 25 ईसी या 1.5 ली. क्लोरपायरिफास 20 ईसी प्रति हेक्टेयर में छिडक़ाव करें। धान की फसल में लगने वाले अन्य रोग व उनके नियंत्रण के उपाय भूरी चित्ती रोग : धान की खेती में भूरी चित्ती का रोग ज्यादातर दक्षिण-पूर्वी राज्यों में देखने को मिलता हैं। धान के पौधों पर इस रोग का प्रभाव उसके कोमल भागों पर होता है। इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर गोल, छोटे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। धीरे-धीरे ये धब्बे आपस में मिलकर बड़ा आकार ले लेते हैं। इससे पौधे की पत्तियां सूखाने लगती है और पौधा विकास करना बंद कर देता है। इस रोग के लगने से पौधे में बालियां काफी कम मात्रा में आती है। उपाय - इस रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में धान के पौधों को रोपाई से पहले थिरम या कार्बनडाईजिम की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए। वहीं खड़ी फसल प्रभाव दिखाई देने पर 10 से 12 दिन के अंतराल में मैंकोजेब का छिडक़ाव पौधे पर करना चाहिए। इसके अलावा इणडोफिल एम 45 की ढाई किलो मात्रा को एक हजार लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करने से भी लाभ मिलता है। खैरा रोग : चावल की खेती में लगने वाला ये रोग भूमि में उर्वरक की कमी की वजह से देखने को मिलता है। इस रोग के लगने से शुरुआत में पौधे की निचली पत्तियों का रंग पीला दिखाई देने लगता है और पत्तियों पर कत्थई रंग के धब्बे बनना शुरू हो जाते हैं। इस रोग से पौधे की पत्तियां सूखकर गिरने लगती है। पौधों में ये रोग जस्ता की कमी की वजह से दिखाई देता है। उपाय - इस रोग से रोकथाम के लिए खेत में जिंक सल्फेट का छिडक़ाव आखिरी जुताई के समय करना चाहिए या फिर रोग दिखाई देने पर लगभग 5 किलो जिंक सल्फेट का छिडक़ाव पौधों पर 10 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए। इसके अलावा ढाई किलो बुझे हुए चूने को प्रति हेक्टेयर की दर से 900 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर पौधों पर छिडक़ना चाहिए। टुंग्रो रोग : धान के पौधों में लगने वाला ये रोग कीट की वजह से फैलता है। पौधों पर इस रोग का प्रभाव शुरुआती अवस्था में देखने को मिलता है। इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों का रंग संतरे की तरह पीला दिखाई देने लगता है और इस रोग के लगने से पौधों का आकार बौना दिखाई देने लगता है। रोगग्रस्त पौधे में बालियां भी देरी से बनती है जिनका आकार बहुत छोटा दिखाई देता है। इससे दाने बहुत कम और हल्की मात्रा में पड़ते हैं। उपाय - इस रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में पौध रोपाई के समय इसके पौधों को क्लोरोपायरीफॉस की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए। यदि खड़ी फसल में रोग दिखाई दे तो मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी., कार्बेरिल 50 डब्ल्यू. पी. या फोस्फेमिडोन 85 डब्ल्यू. एस.सी. की उचित मात्रा का छिडक़ाव पौधों पर करना चाहिए। पत्ती मरोडक रोग : पत्ती मरोडक रोग को पत्ती लपेटक के नाम से भी जानते हैं। धान के पौधों में पट्टी मरोडक रोग का प्रभाव पौधे की पत्तियों पर दिखाई देता है। इस रोग की सुंडी पौधे की पत्तियों को लपेटकर सुरंग बना लेती है और उसके अंदर रहकर पत्तियों का रस चूसती हैं। इससे पौधे की पत्तियों का रंग पीला दिखाई देने लगता हैं। रोग के अधिक बढऩे से पत्तियां जाली के रूप में दिखाई देने लगती हैं। उपाय - इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे की समय से रोपाई करें और उसमें खरपतवार नहीं होने दें। इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बोफ्यूरान 3 जी या कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी की उचित मात्रा का छिडक़ाव करना चाहिए। इसके अलावा क्लोरपाइरीफास, क्यूनालफास, ट्राएजोफास या मोनोक्रोटोफास का छिडक़ाव भी रोग की रोकथाम के लिए अच्छा होता है। वहीं जैविक तरीके से रोग नियंत्रण करने के लिए रोगग्रस्त पत्तियों को तोडक़र उन्हें जला देना चाहिए। झोंका रोग : धान की फसल में लगने वाला झोंका रोग फसल की रोपाई के लगभग 30 से 40 दिन बाद शुरू हो जाता हैं। इस रोग की मुख्य वजह मौसम में होने वाला परिवर्तन को माना जाता हैं। इस रोग की शुरुआत में पौधों के पर्णच्छद और पत्तियों मटमैले धब्बे बन जाते हैं। इससे पौधे बहुत कमजोर हो जाते है और टूटकर गिरने लगते हैं। उपाय - इस रोग से धान की फसल को बचाने के लिए लिए शुरुआत में बीजों की रोपाई से पहले उन्हें थीरम या कार्बेन्डाजिम की दो से ढाई ग्राम मात्रा को प्रति किलो की दर से बीजों में मिलाकर उपचारित कर लेना चाहिए। यदि खड़ी फसल में रोग दिखाई दे तो कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्लू.पी. या एडीफेनफास 50 प्रतिशत ई.सी. की आधा लीटर मात्रा को 500 से 700 लीटर पानी में मिलाकर पौधों पर छिडक़ाव करना चाहिए। इसके अलावा हेक्साकोनाजोल, मैंकोजेब या जिनेब की उचित मात्रा का पौधों पर छिडक़ाव करना भी रोग की रोकथाम के लिए उपयोगी होता है। हिस्पा रोग : धान की फसल में लगने वाला ये एक कीट रोग हैं। इस रोग के बीटल (कीड़े) पौधे की पत्तियों के अर्द्ध चर्म को खा जाते है जिससे पौधे की पत्तियों पर सफेद रंग के धब्बे दिखाई देने लगते है इस रोग के बढऩे से पौधों को काफी ज्यादा नुक्सान पहुंचता हैं। उपाय - इसकी रोकथाम के लिए धान की रोपाई समय पर करनी चाहिए। खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी या कार्बोफ्यूरान 3 जी की 18 से 20 किलो मात्रा को 500 से 700 लीटर पानी में मिलकर पौधों पर छिडकना चाहिए। इसके अलावा ट्राएजोफास, मोनोक्रोटोफास, क्लोरपाइरीफास या क्यूनालफास की उचित मात्रा का छिडक़ाव भी किसान भाई पौधों पर कर सकते हैं। तना छेदक रोग : धान के पौधों में तना छेदक रोग का प्रभाव कीटों की वजह से फैलता हैं। इस कीट के रोग पौधे पर अपने लार्वा को जन्म देते हैं जो पौधे के तने में छेद कर उसे अंदर से खोखला कर देता हैं। इससे पौधे को पोषक तत्व मिलने बंद हो जाते हैं जिससे पौधा विकास करना बंद कर देता है और तने के खोखले हो जाने की वजह से पौधे जल्द ही टूटकर गिरने लगते हैं। उपाय - इस रोग की रोकथाम के लिए खेतों के चोरों तरफ फसल रोपाई के समय फूल वाले पौधों की रोपाई करनी चाहिए। यदि खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर पौधों पर क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. या क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई.सी.की डेढ़ लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में मिलाकर पौधों पर छिडक़ना चाहिए। इसके अलावा मोनोक्रोटोफास, कार्बोफ्यूरान या ट्रायजोफास की उचित मात्रा का छिडक़ाव भी फसल में लाभ पहुंचाता हैं। फुदका रोग : धान का फुदका रोग फसल के तैयार होने के समय देखने को मिलता है। धान की फसल में तीन तरह के फुदका रोग पाए जाते हैं जिन्हें एक सामान रूप से उपचारित किया जाता है। जिन्हें कीट की अवस्था के आधार पर हरा, भूरा और सफेद पीठ वाला फुदका के नाम से जानते हैं। रोग की शुरुआती अवस्था में इसके कीटों का रंग हरा दिखाई देता हैं जो बाद में कीट के व्यस्क होने के साथ बदलता हैं। इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों का रस चूसकर और उन्हें खाकर पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे पौधे का विकास रूक जाता है। उपाय - इस रोग से धान की फसल को बचाने के लिए शुरुआत में खेत की गहरी जुताई कर फसल को समय पर उगा देना चाहिए। यदि खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर फेरोमोन ट्रैप की 5 से 7 ट्रैप को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में लगाना चाहिए। इसके अलावा फसल पर रोग दिखाई देने पर इमिडाक्लोप्रिड, फिप्रोनिल या कार्बोफ्यूरान की उचित मात्रा का छिडक़ाव पौधों पर करना चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

मंडी में सब्जियों की आवक कम होने से बढ़े दाम, किसानों को हो रहा है मुनाफा

मंडी में सब्जियों की आवक कम होने से बढ़े दाम, किसानों को हो रहा है मुनाफा

आमसान छू रहे सब्जियों के भाव, टमाटर 80 से 100 रुपए किलो तक बिका इन दिनों मंडी में सब्जियों के भाव आसमान को छू रहे हैं। इस समय सभी प्रकार की सब्जियों के भावों में तेजी देखने को मिल रही है। इनमें टमाटर के भावों ने तो प्याज और आम को भी पीछे छोड़ दिया है। जहां आम का बाजार भाव 20-40 रुपए किलो व प्याज के भाव 20-25 रुपए किलो चल रहा है। वहीं टमाटर 80 से 100 रुपए तक के भाव में बिक रहा है। बता दें कि पिछले कुछ महीनों पहले यही टमाटर बाजार में 10-20 रुपए किलो बिक रहा था और किसानों को इसके अच्छे दाम भी नहीं मिल पा रहे थे। हालात ये हो गए थे कि किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही थी लेकिन अब टमाटर के भावों में तेजी आने से किसानों को भी टमाटर के अच्छे दाम मिल रहे हैं। इधर टमाटर के बढ़े भावों का असर आम लोगों पर भी पड़ा है। अब उन्हें टमाटर के अधिक दाम चुकाने पड़ रहे है। टमाटर के भावों में आए उछाल को लेकर सब्जी विक्रेताओं का कहना है कि मंडी में पहले लोकल स्तर का टमाटर आ रहा था लेकिन अब ज्यादातर सब्जी की फसल खत्म होने से का दौर चल रहा है। आगे से सब्जियां नहीं आ रही है। इसलिए इनकी कीमतें बढ़ रही है। वहीं अदरक, धनिया और लहसुन के भाव भी सौ से डेढ़ सौ रुपए तक पहुंच गए है। इसके अलावा आलू सहित अन्य सब्जियों के भाव में बढ़ोतरी देखी गई। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

जोधपुर व बाड़मेर में टिड्डी दल ने तबाह हुई कई हेक्टेयर फसलें

जोधपुर व बाड़मेर में टिड्डी दल ने तबाह हुई कई हेक्टेयर फसलें

टिड्डी दल से सबसे ज्यादा राजस्थान प्रभावित बीकानेर में बड़ी मात्रा में मिले टिड्डी के अंडे, बहरोड़ में फसलों को नुकसान, अलवर के शहरी इलाके में घुसा टिड्डी दल, आसपास गांव में फसल के नुकसान अंदेशा पाकिस्तान से आए टिड्डी दल ने देश के 105 जिलों में अपना आतंक मचाया है। यह टिड्डी दल एक राज्य से दूसरे राज्य व एक जिले से दूसरे जिले की ओर बढ़ रही है। इसी क्रम में टिड्डी दल राजस्थान के अलवर जिले के बहरोड़ और उसके आसपास पहुंचा जिसने वहां फसलों को काफी नुकसान पहुंचाया। शुक्रवार करीब 12 बजे टिड्डी दल अलवर के शहरी इलाकों में दिखाई दिया। लोग कौतुहल वश इस टिड्डी दल को देख रहे थे, वहीं शहर के आसपास लगते गांवों के किसानों को फसल के नुकसान का डर सता रहा था। जानकारी के अनुसार देश में टिड्डियों के एक से ज्यादा दल सक्रिय है जो देश के अलग-अलग राज्यों में देखे गए हैं। ये हवा के रूख के साथ आगे बढ़ते हैं और एक राज्य से दूसरे राज्य की ओर बढ़ रहे हैं। इस तरह देश के कई इलाकों में फसलों को अपना निशाना बनाते हुए इनका दल बढ़ता जा रहा है। हालांकि हर राज्य में प्रशासन पूरी तैयारी के साथ इन पर नियंत्रण करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है लेकिन इन पर पूर्णरूप से नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। यदि हम पिछले दो महीनों की बात करें तो इस दौरान टिड्डी दल के हुए हमलों में सबसे ज्यादा राजस्थान के जोधपुर व बाड़मेर जिले प्रभावित हुए। जोधपुर में 383 जगहों से टिड्डियों को खदेड़ा गया। वहीं बाडमेर में 378 जगहों पर ऑपरेशन किए गए। इसके अलावा बीकानेर, श्रीगंगानर, जैसलमेर और नागौर में भी टिड्डी दल से नुकसान हुआ। पेस्टीसाइड छिडक़ाव की बात करे तो पिछले दो महीनों में राजस्थान में सबसे अधिक 87 प्रतिशत पेस्टीसाइड का छिडक़ाव किया गया और केंद्र व राज्य सरकार की ओर से 90 प्रतिशत ऑपरेशन राजस्थान में ही किए गए। इसका मतलब यहां काफी पैमाने पर नुकसान को देखते हुए प्रशासन द्वारा ये कदम उठाए गए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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