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फरवरी माह में खेत में खड़ी फसलों की देखभाल - गेहूं, जौ, चना व मटर

फरवरी माह में खेत में खड़ी फसलों की देखभाल - गेहूं, जौ, चना व मटर

14 February, 2020

फरवरी माह में गेहूं, जौ, चना मटर की फसल की देखभाल कैसे करें

देशभर के जागरूक किसान भाइयों का ट्रैक्टर जंक्शन पर स्वागत है। फरवरी का महीना शुरू हो चुका है। देशभर में अब तक मौसम मेहरबान है। किसानों के खेत फसलों से लहलहा रहे हैं। बसंत पंचमी के बाद चारों ओर पीले फूल खिले हुए हैं और मौसम में ठंड धीरे-धीरे कम हो रही है। किसानों को अच्छी पैदावार लेने के लिए फरवरी महीने में मौसम के उतार-चढ़ाव का ध्यान रखना होगा। अचानक बढऩे वाले तापमान से अपनी फसलों की सुरक्षा सबसे जिम्मेदारी वाला काम है। आधुनिक कृषि विधियों की जानकारी से किसान फसलों का उत्पादन बेहतर तरीके से बढ़ा सकता है। आज हम फरवरी महीने में गेहूं, जौ, चना व मटर की फसल में ध्यान रखने वाली प्रमुख सावधानियों पर चर्चा करते हैं।

 

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फरवरी में गेहूं की फसल की देखभाल

  • समय पर बोई गई गेहूं की फसल में फूल आने लगते हैं। इस दौरान फसल की सिंचाई बहुत आवश्यक होती है। गेहूं में समय से बुवाई की दर से तीसरी सिंचाई गांठ बनने (बुवाई से 60-65 दिन बाद) की अवस्था तथा चौथी सिंचाई फूल आने से पूर्व (बुवाई के 80-85 दिनों बाद) एवं पांचवी सिंचाई दुग्ध अवस्था (110-115 बाद) में करें। 
  • पिछेती या देर से बोई गई गेहूं की फसल में कम अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए फसल में अभी क्रांतिक अवस्थाओं जैसे शीर्ष जड़े निकलना, कल्ले निकलते समय, बाली आते समय, दानों की  दूधिया अवस्था एवं दाना पकते समय सिंचाई करनी चाहिए। मार्च या अप्रैल में अगर तापमान सामान्य से अधिक बढऩे लगे तो एक या दो अतिरिक्त सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। 
  • पौधों की उचित बढ़वार एवं विकास के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से पौधों की वृद्धि, जनन क्षमता एवं कार्यिकी प्रभावित होती है। भारतीय मृदा में जस्ते की औसम मात्रा 1 पीपीएम के लगभग पाई जाती है। मृदा में जस्ते की मात्रा 0.5 पीपीएम से कम होने पर इसकी कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। पौधों में जस्ते की कमी की क्रांतिक मात्रा 20 पीपीएम होती है। जस्ता के प्रयोग की मात्रा जस्ते की कमी, मृदा प्रकार एवं फसल के प्रकार आदि पर निर्भर करती है। खड़ी फसल में कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का छिडक़ाव 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार करना चाहिए। 
  • लोह की कमी या कम कार्बनिक पदार्थ वाली चूनेदार, लोहा-पीलापन और क्षारीय मृदा में फसल उत्पादन में मुख्य रूप से बाधा है। मृदा एवं पौधों में इसकी क्रांतिक मात्रा क्रमश:4.5 एवं 50 पीपीएम है। लोहे की कमी की पूर्ति पर्णीय छिडक़ाव से भी की जा सकती है। गेहूं, धान, गन्ना, मूंगफली, सोयाबीन आदि में 1-2 प्रतिशत आयरन सल्फेट का पर्णीय छिडक़ाव, मृदा अनुप्रयोग की अपेक्षा अधिक लाभकारी पाया गया है। मृदा में अनुप्रयोग की मात्रा (150-150 किलोग्राम/हैक्टेयर आयरन सल्फेट) पर्णीय छिडक़ाव की अपेक्षा अधिक होने के कारण मृदा अनुपयोग आर्थिक रूप से लाभप्रद नहीं है। लोहे की कमी को दूर करने में आयरन-चिलेट अन्य अकार्बनिक स्त्रोतों की अपेक्षा अधिक लाभकारी होती है। परंतु महंगे होने के कारण किसान इसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं।

 

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फरवरी में जौ की फसल की देखभाल

  • जौ की फसल में दूसरी सिंचाई गांठ बनने की अवस्था (बुवाई के 55-60 दिनों बाद) में और तीसरी सिंचाई दूधिया अवस्था (बुवाई के 95-100 दिनों बाद) में करें। जौ की फसल में निराई-गुडाई का अच्छा प्रभाव होता है। खेत में यदि कंडुवा रोगग्रस्त बाली दिखाई दे तो उसे निकालकर जला दें। क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में अधिक संख्या में हल्की सिंचाई देना, ज्यादा गहरी एवं कम सिंचाई देने की अपेक्षाकृत उत्म माना जाता है। धारीदार या पीता रतुआ पत्तों पर पीले, छोटे-छोटे कील कतारों में, बाद में पीले रंग के हो जाते हैं। कभी-कभी ये कील-पत्तियों के डंठलों पर भी पाए जाते हैं। इसलिए रतुआरोधी प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए। काला रतुआ लाल भूरे से लेकर काले रंग के लंबे कील पत्तियों के डंठल पर पाए जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए प्रति हैक्टेयर 2 किग्रा जिबेन (डाइथेन जेड-78) का छिडक़ाव करें। 500-600 लीटर घोल एक हैक्टेयर क्षेत्रफल के लिए काफी होता है।
  • जौ एवं गेहूं के जिन खेतों में अधिक वर्षा का पानी भर जाता है, उनमें पानी निकालने के बाद नाइट्रोजन के लिए सी.ए.एन. के डालने से कुछ मात्रा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। अधिक पानी के भर जाने से ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, इसलिए सीएएन की सिफारिश की जाती है।

 

मटर की फसल की देखभाल

  • मटर की फसल में चूर्णिल आसिता रोग के कारण पत्तियों तथा फलियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है। रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही सल्फरयुक्त कवकनाशी जैसे सल्पफेक्स 2.5 किग्रा/हैक्टेयर या 3.0 किग्रा/हैक्टेयर घुलनशील गंधक या कार्बेन्डाजिम 500 ग्राम या ट्राइडोमोपपर्क (80 ई.सी.) 500 मि.ली. की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल में 2-3 छिडक़ाव करें। 
  • रतुआ रोग से पौधों की वृद्धि रूक जाती है। पीले धब्बे पहले पत्तियों पर और फिर तने पर बनने लगते हैं। धीरे-धीरे ये हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाटोजा 1 लीटर या प्रोपीकोना 1 लीटर या डाइथेन एम-45 को 2 किग्रा हैक्टेयर की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर 2-3 बार छिडक़ाव करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं।
  • फलीबेधक कीट फलियों में छेद बनाकर बीजों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए फलियों पर सूक्ष्म छिद्रों से इसके मौजूद होने का पता लग जाता है। फली निकलने की अवस्था में फल पर इमिडाक्लोप्रिड 0.5 प्रतिशत या डाइमेथोएट 0.03 प्रतिशत का 400-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडक़ाव करें। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों का उपयोग एवं समय से बुवाई फली बेधक के प्रकोप से बचने में सहायक होते हैं।
  • माहूं कीट पत्तियों व मुलायम तनों से रस चूसकर एक ऐसा चिपचिपा पदार्थ भारी मात्रा मे स्त्रावित करता है जिसके द्वारा काली फफूंद का आक्रमण इन भागों में हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए 0.05 प्रतिशत मेटासिस्टाक्स या 0.05 प्रतिशत रोगोर के घोल का छिडक़ाव 15-20 दिनों के अंतराल पर कीटों के दिखाई देते ही एक या दो बार आवश्यकतानुसार करें।
  • देर से बोई गई मटर की फसल में फली आने पर सिंचाई करें। अगेती फसल पकने की अवस्था में होगी, अत: समय पर कटाई करें।

 

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चने की फसल की देखभाल

  • चने में आवश्यकता हो तो फूल आने से पूर्व ही सिंचाई करें। फूल आते समय सिंचाई नहीं करनी चाहिए अन्यथा फूल झडऩे से हानि होती है। चने की फसल बारानी क्षेत्रों में जल की आवश्यकता को मिट्टी की गहराई में संचित नमी से पूरा करती है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने तथा जाड़े की वर्षा न होने पर बुवाई के 45 दिनों बाद सिंचाई करना लाभप्रद होता र्है। असिंचित क्षेत्रो में चने की कटाई फरवरी के अंत में होती है।
  • चने की फसल में झुलसा रोग की रोकथाम के लिए जिंक मैग्जीन कार्बामेंट 2.0 किग्रा अथवा जीरम 90 प्रतिशत 2 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव करें।
  • फेरोमोन ट्रैप ऐसा रसायन है जो अपने ही वर्ग के कीटों को संचार द्वारा आकर्षित करता है। मादा कीट में जो हार्मोन निकलता है यह उसी तरह की गंध से नर कीटों को आकर्षित करता है। इन रसायनों को सेक्स पफेरोमोन ट्रैप कहते हैं। इसका उपयोग चने के फलीछेदक कीट के फसल पर प्रकोप करने की समय की जानकारी के लिए किया जाता है। पफेरोमोन का रसायन एक सेप्टा (कैन्सूल) में यौन जाल में रख दिया जाता है। 5-6 फलीछेदक कीट के नर यौन जाल में फंसने पर चने की फसल पर कीटनाशी दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। 20 पफेरोमोन ट्रैप प्रति हैक्टेयर की दर से लगाएं।
  • यदि चने के खेत में चिडिय़ा बैठ रही हो तो किसान भाई समझ लें कि चने में फली छेदक का प्रकोप होने वाला है। इन रसायनों का प्रयोग तभी करना चाहिए जब चना में फली छेदक का प्रकोप अधिक हो। उसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 750 मि.ली. या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 1.50 लीटर या इंडेक्सोकार्ब 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्वीनालफॉस 25 ई.सी. 1-1.4 प्रति मि.ली. पानी या स्पाइनोसैड 45 प्रतिशत, 0.2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या इमामेक्टीन बेंजोएट 5 प्रतिशत, 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव अवश्य करें। 
  • चने में फलीछेदक कीट नियंत्रण के लिए न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वाइरस 250 से 350 शिशु समतुल्य 600 लीटर प्रति पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव फरवरी के अंतिम सप्ताह में करें। चने में 5 प्रतिशत एन.एस.के.ई. या 3 प्रतिशत नीम ऑयल तथा आवश्यकतानुसार कीटनाशी का प्रयोग करें।

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कृषि बिलों पर बवाल, किसानों के साथ कई राजनीतिक पार्टियां भी उतरी विरोध में

कृषि बिलों पर बवाल, किसानों के साथ कई राजनीतिक पार्टियां भी उतरी विरोध में

कृषि के तीन बिल: क्या है ये कृषि के ये तीन विधेयक और इनसे किसानों को क्या होगा फायदा या नुकसान, जानें पूरी जानकारी केंद्र सरकार की ओर से लोकसभा में पेश किए कृषि बिलों को लेकर चारों और बवाल मचा हुआ है। कई राजनीतिक पार्टियां किसानों के साथ इस बिल के विरोध में मैदान में उतर चुकी है। यहीं नहीं सतारूढ़ सरकार के अंदर ही इसको लेकर कुछ लोगों में विरोधाभास है। हाल ही में खाद्य प्रसंसकरण मंत्री हरसिमरत कौर बादल इन बिलों के विरोध स्वरूप अपना इस्तीफा दे दिया। यही नहीं हरियाणा, पंजाब सहित अन्य राज्यों में भी इसके विरोध के सुर मुखर हो गए हैं। जगह-जगह विपक्षी पार्टियां इस बिल के खिलाफ रणनीति बनाने में जुट गई हैं। वहीं किसान भी इन बिलों को लेकर चिंतित है। उसे लगता है कि इस बिल के लागू हो जाने पर उसके हाथ बंध जाएंगे और वह अपने ऊपर होने वाले शोषण के विरूद्ध आवाज तक नहीं उठा पाएगा। इधर सतारूढ़ भाजपा पार्टी इस बिल की खूबियों के बारे में चर्चा करते नहीं थक रही है पर सरकार की बात किसानों के गले नहीं उतर रही है। उसे लगता है कि ये बिल उसके अस्तित्व को खत्म करने के लिए ही लागू किए जा रहे हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या है वे कृषि के तीन बिल जिन पर मचा हुआ है घमासान कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल, मूल्य आश्वासन कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल क्या है इन तीन बिलों में 1. कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य ( संवर्धन और सुविधा ) विधेयक 2020 कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य ( संवर्धन और सुविधा ) अध्यादेश, 2020, राज्य सरकारों को मंडियों के बाहर की गई कृषि उपज की बिक्री और खरीद पर टैक्स लगाने से रोकता है और किसानों को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता देता है। सरकार का कहना है कि इस बदलाव के जरिए किसानों और व्यापारियों को किसानों की उपज की बिक्री और खरीद से संबंधित आजादी मिलेगी, जिससे अच्छे माहौल पैदा होगा और दाम भी बेहतर मिलेंगे। सरकार का तर्क सरकार का कहना है कि इस अध्यादेश से किसान अपनी उपज देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेच सकते हैं। इस अध्यादेश में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) के बाहर भी कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था तैयार करना है। इसके जरिये सरकार एक देश, एक बाजार की बात कर रही है। किसानों की घबराहट मंडी के बाहर किसानों को उपज बेचने की सुविधा मिलने के बाद मंडियों में कौन आएगा। इस तरह तो मंडियों का अस्तित्व खतम हो जाएगा और इससे मंडी में काम करने वाले लोग बेरोजगार हो जाएंगे। बता दें कि मंडी के अंदर किसानों को उपज क्रय-विक्रय करने पर शुल्क देना पड़ता है पर मंडी के बाहर इनसे किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा। इसके बावजूद भी एक बात जो किसान के मन में हैं कि इससे मंडी के बाहर उपज क्रय-विक्रय होने से मंडी की भूमिका ही खतम हो जाएगी और इससे समर्थन मूल्य पर फसल बेचना भी बंद कर दिया जा सकता है। इससे किसानों को यदि मंडी के बाहर व्यापारियों से कम दाम मिला तो उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं रहेगा। हालांकि सरकार किसानों को आश्वस्त कर रही है कि इस बिल के बाद भी न तो मंडी बंद की जाएगी और न ही समर्थन मूल्य पर खरीद। 2. आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों में खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे और कालाबाजारी करते थे, उसको रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन 1955 बनाया गया था जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गई थी। अब नये विधेयक आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को हटाने के लिए लाया गया है। इन वस्तुओं पर राष्ट्रीय आपदा या अकाल जैसी विशेष परिस्थितियों के अलावा स्टॉक की सीमा नहीं लगेगी। सरकार का तर्क इस पर सरकार का मानना है कि अब देश में कृषि उत्पादों को लक्ष्य से कहीं ज्यादा उत्पादित किया जा रहा है। किसानों को कोल्ड स्टोरेज, गोदामों, खाद्य प्रसंस्करण और निवेश की कमी के कारण बेहतर मूल्य नहीं मिल पाता है। किसानों को इससे क्या नुकसान इस विधेयक के तहत आवश्यक वस्तु की सूची से अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी वस्तुओं को हटाया गया है। इससे व्यापारी मंडी के बाहर किसानों से समर्थन मूल्य से कुछ रुपए ज्यादा में सौंदे कर लेंगे और इसका स्टॉक कर लेंगे। और कुछ समय बाद बाजार में कृत्रिम तेजी दिखाकर ऊंचे दामों में विक्रय करेंगे। इससे किसान को सिर्फ चंद पैसे ज्यादा ही मिलेंगे जबकि व्यापारियों की पौ बारह होगी। होना तो ऐसा चाहिए कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह व्यापारियों के लिए भी सूची जारी करें ताकि उस सूची से कम में किसानों से सौदा नहीं कर पाएं। वहीं यदि कल को सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को खतम कर दिया गया तो व्यापारियों को खुली छूट मिल जाएगी और वे मनमाने मूल्य (यानि समर्थन मूल्य से भी नीचे) पर सौंदे करेंगे जिससे किसानों को हानि होगी। और तो और बिल के अनुसार किसान किसी विवाद के लिए कोर्ट का दरवाजा भी नहीं खटखटा सकते है। इससे एक प्रकार से किसानों को ही नुकसान होने की संभावना अधिक दिखाई देती है। इधर सरकार आश्वासन और तर्कों से किसानों को संतुष्ट करने में लगी हुई है। 3. कृषि सेवाओं पर किसान ( सशक्तिकरण और संरक्षण ) समझौता बिल इस अध्यादेश में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात है। छोटे किसानों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला किया गया है। सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश किसानों को शोषण के भय के बिना समानता के आधार पर प्रोसेसर्स, एग्रीगेटर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुडऩे में सक्षम बनाएगा। इससे बाजार की अनिश्चितता का जोखिम किसानों पर नहीं रहेगा और साथ ही किसानों की आधुनिक तकनीक और बेहतर इनपुट्स तक पहुंच भी सुनिश्चित होगी. इससे किसानों की आय में सुधार होगा। सरकार का तर्क सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश किसानों की उपज की वैश्विक बाजारों में आपूर्ति के लिए जरूरी आपूर्ति चेन तैयार करने को निजी क्षेत्र से निवेश आकर्षित करने में एक उत्प्रेरक के रूप में काम करेगा. किसानों की ऊंचे मूल्य वाली कृषि के लिए तकनीक और परामर्श तक पहुंच सुनिश्चित होगी, साथ ही उन्हें ऐसी फसलों के लिए तैयार बाजार भी मिलेगा। बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और किसानों को अपनी फसल का बेहतर मूल्य मिलेगा। किसानों द्वारा इस बिल का विरोध क्यूं इस बिल का विरोध करने वालों का दावा है कि अब निजी कंपनियां खेती करेंगी जबकि किसान मजदूर बन जाएगा। किसान नेताओं का कहना है कि इसमें एग्रीमेंट की समयसीमा तो बताई गई है लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य का जिक्र नहीं किया गया है। इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जायेगा। इस अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है लेकिन सरकार यह बात भूल जाती है कि हमारे किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती क्योंकि हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है और हमारे यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है वहीं पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है। कृषि अध्यादेशों को लेकर किसान विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। विरोधियों का मनना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों का शोषण होता है। पिछले साल गुजरात में पेप्सिको कम्पनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कंपनी ने वापस ले लिया था। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कंपनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कंपनियाँ किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है। यदि ऐसा हुआ तो इससे किसानों को काफी हानि होने की संभावना रहेगी। प्रधानमंत्री के किसानों को आश्वासन और विरोधी पार्टियों का हंगामा प्रधानमंत्री के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी किसान अपना उत्पाद खेत में या व्यापारिक प्लेटफॉर्म पर देश में कहीं भी बेच सकेंगे। इस बारे में केंद्रीय कृषमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में बताया कि इससे किसान अपनी उपज की कीमत तय कर सकेंगे। वह जहां चाहेंगे अपनी उपज को बेच सकेंगे जिसकी मदद से किसान के अधिकारों में इजाफा होगा और बाजार में प्रतियोगिता बढ़ेगी। किसान को उसकी फसल की गुणवत्ता के अनुसार मूल्य निर्धारण की स्वतंत्रता मिलेगी। लोकसभा में बिल पास करते हुए सरकार ने कहा कि इस बदलाव के जरिए किसानों और व्यापारियों को किसानों की उपज की बिक्री और खरीद से संबंधित आजादी मिलेगी। जिससे अच्छे माहौल पैदा होगा और दाम भी बेहतर मिलेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार, विधेयकों से किसानों को लाभ होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को ट्वीट कर कहा, ये विधेयक सही मायने में किसानों को बिचौलियों और तमाम अवरोधों से मुक्त करेंगे। उन्होंने कहा, इस कृषि सुधार से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नए-नए अवसर मिलेंगे, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा। इससे हमारे कृषि क्षेत्र को जहां आधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ मिलेगा, वहीं अन्नदाता सशक्त होंगे। मोदी ने बिलों के विरोध को लेकर कहा कि किसानों को भ्रमित करने में बहुत सारी शक्तियां लगी हुई हैं। प्रधानमंत्री ने एक ट्वीट में साफ किया कि एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी। अब किसान अपनी मर्जी का मालिक होगा। वह मंडियों और बिचौलियों के जाल से निकल अपनी उपज को खेत पर ही कंपनियों, व्यापारियों आदि को बेच सकेगा। उसे इसके लिए मंडी की तरह कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। मंडी में इस वक्त किसानों से साढ़े आठ फीसद तक मंडी शुल्क वसूला जाता है। इसकेे अलावा उन्होने कई फायदे भी बताएं। प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद भी विरोध के स्वर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आश्वासन देने के बाद भी किसान संगठन और राजनीतिक पार्टियां इसका लगातार विरोध कर प्रदर्शन करने में लगी हुई है। किसानों को व्यापारियों द्वारा शोषण किए जाने की चिंता सता ही है तो राज्य सरकारों को अपने सरकारी मंडी के संदर्भ में मिले अधिकारों को छिनने का डर सता रहा है। इसके विपरीत अन्य विरोधी राजनीतिक पार्टियों को सरकार के विरूद्ध मोर्चा खोलने का एक मुद्दा हाथ आ गया है जिसे वो किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहती है। इस तरह पक्ष व विपक्ष दोनों के लिए किसान अहम बने हुए हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

स्टीविया की खेती : खेतों में उगाएं, लाखों कमाएं, चीनी से 300 गुना मीठा होता है

स्टीविया की खेती : खेतों में उगाएं, लाखों कमाएं, चीनी से 300 गुना मीठा होता है

स्टीविया की खेती के बारे में पूरी जानकारी. भारत सहित अन्य देशों में मधुमेह रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आज की भागदौड़ वाली जिंदगी और अनियमित खान-पान के कारण करीब 10 में से 5 व्यक्ति इस बीमारी से ग्रसित हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड एवेल्यूएशन और पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की नवंबर 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 25 बरस में भारत में डायबिटीज के मामलों में 64 प्रतिशत का इजाफा हुआ। एक शोध के अनुसार, साल 2017 में दुनिया के कुल डायबिटीज रोगियों का 49 प्रतिशत हिस्सा भारत में था और 2025 में जब यह आंकड़ा 13.5 करोड़ पर पहुंचेगा तो देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर एक बड़ा बोझ होने के साथ ही आर्थिक रूप से भी एक बड़ी चुनौती पेश करेगा। शोध में दिए गए ये आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। इसे देखते हुए मधुमेह रोगियों के लिए स्टीविया एक औषधी के रूप में उन्हें लाभ पहुंचा सकती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 स्टीविया से आएगी जीवन में मिठास, एक एकड़ में 5 लाख की कमाई स्टीविया चीनी से 300 गुना मीठा होता है और उसमें कैलोरीज की मात्रा शून्य होती है जो शरीर में शुगर के लेवल को कंट्रोल करने में मदद करता है। इसलिए डाक्टरों द्वारा मधुमेह रोगियों को इसके सेवन की सलाह दी जाती है। यदि इसकी आधुनिक तरीके से खेती की जाए तो किसान इस फसल से लाखों रुपए कमा सकता है। स्टीविया को उगाया जाना काफी आसान है और इसकी लागत भी कम आती है और मुनाफा कई गुना अधिक होता है। चूंकि बाजार में इसकी मांग काफी होने के कारण इसे बेचने में भी किसान को कोई परेशानी नहीं आती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि किसान को भी स्मार्ट तरीके से काम करना होगा तभी उसे अधिक कमाई मिल सकती है। उसे परंपरागत तरीके से काम नहीं करके आधुनिक तरीके से काम व सोच को विकसित करना होगा ताकि वे अधिक आमदनी का प्राप्त कर सके। यही कारण है कि वर्तमान समय में कुछ स्मार्ट किसान ऐसी फसलों की खेती कर रहे हैं जिससे अधिक मुनाफा होता है। स्टीविया एक ऐसी उपज है जो किसान के जीवन में ही नहीं अपितु मधुमेह रोगियों के जीवन में भी मिठास घोल देगी। तो आइए जानते हैं स्टीविया के उत्पादन और इससे होने वाली आमदनी के बारे में। क्या है स्टीविया स्टीविया माने मीठी तुलसी, सूरजमुखी परिवार (एस्टरेसिया) के झाड़ी और जड़ी बूटी के लगभग 240 प्रजातियों में पाया जाने वाला एक जीनस है, जो पश्चिमी उत्तर अमेरिका से लेकर दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। स्टीविया रेबउडियाना प्रजातियां, जिन्हें आमतौर पर स्वीटलीफ, स्वीट लीफ, सुगरलीफ या सिर्फ स्टीविया के नाम से जाना जाता है, मीठी पत्तियों के लिए वृहत मात्रा में उगाया जाता है। स्वीटनर और चीनी स्थानापन्न के रूप में स्टेविया, चीनी की तुलना में धीरे-धीरे मिठास उत्पन्न करता है और ज्यादा देर तक रहता है, हालांकि उच्च सांद्रता में इसके कुछ सार का स्वाद कड़वापन या खाने के बाद मुलैठी के समान हो सकता है। इसके सार की मिठास चीनी की मिठास से 300 गुणा अधिक मीठी होती है, न्यून-कार्बोहाइड्रेट, न्यून-शर्करा के लिए एक विकल्प के रूप में बढ़ती मांग के साथ स्टीविया का संग्रह किया जा रहा है। भारत सहित अन्य देशों में तेजी से बढ़ रही है स्टीविया की मांग चिकित्सा अनुसंधान ने भी मोटापे और उच्च रक्त चाप के इलाज में स्टीविया के संभव लाभ को दिखाया है। क्योंकि रक्त ग्लूकोज में स्टीविया का प्रभाव बहुत कम होता है, यह कार्बोहाइड्रेट-आहार नियंत्रण में लोगों को स्वाभाविक स्वीटनर के रूप में स्वाद प्रदान करता है। इसके अलावा इसमें ग्लूकोज रक्त पर स्टीविया का प्रभाव नगण्य होता है, यहां तक कि ग्लूकोज सहनशीलता को यह बढ़ाता है, इसलिए, यह प्राकृतिक मिठास के रूप में मधुमेह रोगियों और कार्बोहाइड्रेट नियंत्रित आहार पर रहने वाले अन्य लोगों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। कहां-कहां होती है स्टीविया की खेती स्टीविया की खेती मूल रूप से पराग्वे में होती है। दुनिया में इसकी खेती पराग्वे, जापान, कोरिया, ताइवान, अमेरिका इत्यादि देशों में होती है। भारत में दो दशक पहले इसकी खेती शुरू हुई थी। इस समय इसकी खेती बंगलोर, पुणे, इंदौर व रायपुर और उत्तर प्रदेश व महाराष्ट के कुछ हिस्सों में इसकी खेती की जाती है। कैसे उगाए स्टीविया स्टीविया को उगाने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत नहीं पड़ती है। किसान चाहे तो इसे खेत की मेड पर भी उगा सकता है। इतना ही नहीं घर के गार्डन में भी इसे उगाकर इसका लाभ लिया जा सकता है। यदि व्यवसायिक स्तर पर इसका लाभ लेना है और कमाई करनी है तो इसे व्यापक स्तर पर उगाना ही फायदेमंद रहता है। इसका रोपण कलम द्वारा किया जाता है। जलवायु व भूमि स्टीविया के लिए समशीतोष्ण जलवायु अधिक उपयुक्त रहती है। इसे 10 से 41 अंश तक की जलवायु में स्टीविया बिना किसी बांधा के सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है परन्तु यदि तापक्रम इससे कम या ज्यादा हो तो उसे मेंटेन करने हेतु उचित व्यवस्था करनी आवश्यक होगी। इसकी खेती करते समय किसान को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्टीविया की वही वेराइटी लगाई जाए जो उच्च तापक्रम में सफलतापूर्वक उगाई जा सके तथा पौधों को तेज गर्मी से बचाने के लिए इनका रोपण मक्की अथवा जैट्रोफा आदि के पौधों के बीच में किया जाए तो ज्यादा तापक्रम का प्रभाव नहीं होगा। इसकी भूमि की बात करें तो इसकी खेती के लिए समुचित जलनिकास, भुरभुरी, समतल, बलुई दोमट अथवा दोमट भूमि सबसे उपयुक्त रहती है। रोपण का उचित समय इसकी खेती का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसकी बुवाई सिर्फ एक बार की जाती है और सिर्फ जून और दिसंबर महीने को छोडक़र दसों महीनों में इसकी बुवाई होती है। एक बार फसल की बुवाई के बाद पांच साल तक इससे फसल हासिल कर सकते हैं। साल में हर तीन महीने पर इससे फसल प्राप्त कर सकते हैं। एक साल में कम से कम चार बार कटाई की जा सकती है। स्टीविया की उन्नत किस्में एस.आर.बी.- 123 : स्टीविया की इस प्रजाति का उदगम स्थल पेरूग्वे है तथा या भारतवर्ष के दक्षिणी पठारी क्षेत्रों के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इस प्रजाति की वर्ष भर में 5 कटाइयां ली जा सकती है तथा इस किस्म मे ग्लुकोसाइड की मात्रा 9 से 12 प्रतिशत पाई गई है। एस. आर. बी.- 512 : यह प्रजाति ऊत्तरी भारत के लिए ज्यादा उपयुक्त है। इस प्रजाति 9 से 12 प्रतिशत ग्लुकोसाइड पाए जाए हैं तथा वर्ष भर में 5 कटाइयाँ ली जा सकती है। एस.आर.बी.- 128 : कृषिकरण की दृष्टि से स्टीविया की या किस्म सर्वोत्तम मानी जाती है। इसमें 12 प्रतिशत तक ग्लुकोसाइड पाए गए हैं। यह प्रजाति भारतवर्ष के उत्तरी क्षेत्रों के लिए भी उतनी ही उपयुक्त है जितनी की दक्षिणी भारतवर्ष के लिए। खेती हेतु स्टीविया के पौधे लेने से पूर्व रखी जाने वाली सावधानियां स्टीविया के पौधे खरीदने से पूर्व किसानों द्वारा निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए- क्या आपके पौधे टिश्यु कल्चर विधि से तैयार किए गये हैं अथवा तने की कलम (स्टेम कटिंग) विधि से? टिश्यु कल्चर विधि से तैयार पौधे नि:संदेह उत्तम होते हैं। स्टीविया की जो वेरायटी आप ले रहे हैं क्या यह आपकी जलवायु के अनुकूल है? आपके द्वारा ली गई वेरायटी से स्टीवियासाइड की मात्रा कितनी है? क्या आपने प्लांटिंग मेटेरियल प्रदायकर्त्ता से संबंधित वेरायटी के स्टिवियोसाइड कंटेंट की मात्रा के बारे में कोई गारंटी ली है? स्टीविया के रोपण की विधि इसका प्रवर्धन बीजों द्वारा, वानस्पतिक कल्लो अथवा जड़ सहित छोटे कल्लों द्वारा किया जाता है। स्टीविया का रोपन कलमों द्वारा किया जाता है। जिसके लिए 15 सेंटीमीटर लंबी कलमों को काटकर पोलिथिन की थैलियों में तैयार कर लिया जाता है। टीस्यू कल्चर से भी पौधों को बनाया जाता है जो सामान्यत: 5-6 रुपए प्रति पौधे मिलते हैं। वैसे इसकी अक्टूबर या नवंबर के महीने में पौधों की रोपाई 30*30 सेमी. की दूरी पर करनी चाहिए। रोपाई के बाद तुरन्त सिंचाई करनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक इसकी खेती में एक और फायदा ये है कि इसमे सिर्फ देसी खाद से ही काम चल जाता है। इसके लिए 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या 5-6 टन केंचुआ खाद तथा 60:60 किग्रा फास्फोरस एवं पोटास पौधरोपण के समय खेत में मिला देना चाहिए। कुल 120 किग्रा नत्रजन को 3 बार बराबर मात्रा में खड़ी फसल में देना चाहिए। सिंचाई इसकी पूरी फसल की अवधि में 4-5 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। इसलिए अवश्याकतानुसार इसकी सिंचाई करते रहना चाहिए, क्योंकि स्टीविया की फसल को पानी की आवश्यकता चावल की फसल जैसी ही रहती है। इसे पूरे वर्ष सिंचाई की आवश्यकता रहती है इसलिए इसकी समय-समय पर सिंचाई करना जरूरी है। बेहतर होगा कि इसकी सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई का उपयोग किया जाए ताकि इसे पूरे समय पानी की उपलब्धता होती रहे और पानी की बचत भी हो सके। खरपतवार नियंत्रण स्टीविया की फसल की निरंतर सफाई करते रहना चाहिए तथा जब भी किसी प्रकार के खरपतवार फसल में उन्हें उखाड़ दिया जाना चाहिए। नियमित अंतरालों पर खेत की निकाई-गुड़ाई भी करते रहना चाहिए। जिससे जमीन की नमी बनी रहे। खरपतवार नियंत्रण का कार्य हाथ से ही किया जाना चाहिए तथा इसके लिए किसी प्रकार के रासायनिक खरपतवार नाशी का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। कीट व रोग नियंत्रण यू तो स्टीविया पर अधिकांशता किसी विशेष रोग अथवा कीट का प्रकोप नहीं देखा गया है। परंतु काई बार भूमि में बोरोन तत्व की कमी के कारण लीप स्पॉट का प्रकोप हो सकता है। इसके निदान हेतु 6 प्रतिश बोरेक्स का छिडक़ाव किया जा सकता है। वैसे नियमित अंतरालों पर गौमूत्र अथवा नीम के तेल को पानी में मिश्रित करके उसका छिडक़ाव करने से फसल में किसी प्रकार के रोग व कीट नहीं लगते हैं। पत्तियों की तुड़ाई रोपण के लगभग चार माह के उपरान्त स्टीविया की फसल प्रथम कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई का कार्य पौधों पर फूल आने के पूर्व ही कर लिया जाना चाहिए क्योंकि फूल आ जाने से पौधे में स्टिवियोसाइड की मात्रा घटने लगती है जिससे इसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इस प्रकार प्रथम कटाई चार माह के उपरान्त तथा आगे की कटाइयाँ प्रत्येक 3-3 माह में आने लगती है। कटाई चाहे पहली हो अथवा दूसरी अथवा तीसरी, यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि किसी भी स्थिति में कटाई का कार्य पौधे पर फूल आने के पूर्व ही कर लेनी चाहिए। इसमें करीब 3-4 बार पत्तियों की तुड़ाई की जा सकती है। अंत में सारी फसल को काट लेना चाहिए। पत्तियों को सुखाना व भंडारण करना पत्तियों लेने के बाद उन्हें छाया में सुखाया चाहिए। 3-4 दिन तक इन्हें छाया में सूखा लिए जाने पर पत्ते पूर्णतया नमी रहित हो जाते हैं तथा इसके बाद इसका भंडारण, वायुरोधक डिब्बों अथवा पाली बैग में किया जाता है। इस तरह इसे बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। स्टीविया के पत्ते भी बेचे जा सकते हैं, इसको पाउडर बनाकर के भी बेचा जा सकता है तथा इसका एक्सट्रैक्ट भी निकाला जा सकता है। वैसे किसान के स्तर पर इसके सूखे पत्तें बेचे जाना ही उपयुक्त होता है। यदि पाउडर बनाकर बेचा जाए तो इसे बेचने पर सूखी पत्तियों की तुलना में दुगुनी कमाई होती है। कितनी होती है उपज एक बहुवर्षीय फसल होने के कारण स्टीविया की उपज में प्रत्येक कटाई के साथ निरंतर बढ़ती जाती है। हालांकि उपज की मात्रा काई कारकों जैसे लगाई गई प्रजाति, फसल की वृद्धि, कटाई का समय आदि पर निर्भर करता है, परन्तु चार कटाइयों में प्राय: 2 से 4 टन तक सूखे पत्तों का उत्पादन हो सकता है। वैसे एक औसतन फसल से वर्ष भर से लगभग 2.5 टन सूखे पत्ते प्राप्त हो जाते हैं। अनुमानत: सूखी पत्तियों का उत्पादन 12-15 कुंतल प्रति हेक्टेयर होता है। कितनी हो सकती है कमाई बाजार में स्टीविया के पत्तों की बिक्री दर 60 से 120 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो सकती है। वैसे यदि औसतन 2.5 टन पत्तों का उत्पादन हो तथा इनकी बिक्री दर 100 रुपए प्रति किलोग्राम मानी जाए तो इस फसल से प्रतिवर्ष किसान को 2.5 लाख रूपये प्रति एकड़ की प्राप्तियां होगी। फसल से होने वाले लाभ एवं हानि की गणना यदि पांच एकड़ की प्राप्तियां होगी। फसल से होने वाले लाभ एवं हानि की गणना यदि पंच वर्षीय फसल के आधार पर की जाए तो इस फसल से किसान को पांच वर्षों में लगभग 8.40 लाख रुपए लाभ होना अनुमानित है। वहीं इसकी पत्तियों का पाउडर बनाकर बेचा जाए तो एक एकड़ में करीब 5 लाख की कमाई आसानी से की जा सकती है। भारत में स्टीविया की खेती देश में स्टीविया की खेती बड़े स्तरपर मुख्यत: कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्य तक ही सीमित है। मध्यप्रदेश में स्टीविया की खेती प्रारंभ हो चुकी है। राजस्थान में स्टीविया की खेती भरतपुर जिला मुख्यालय पर लुपिन ह्यूमन वैलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन द्वारा प्रायोगिक तौर पर कराई जा चुकी है। उत्तरप्रदेश में स्टीविया की खेती के प्रति किसान जागरूक हो रहे हैं और कई जगह किसानों ने स्टीविया की खेती शुरू कर दी है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु 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चीनी के निर्यात की अवधि बढ़ाने से गन्ना किसानों को मिलेगा बकाया राशि का भुगतान

चीनी के निर्यात की अवधि बढ़ाने से गन्ना किसानों को मिलेगा बकाया राशि का भुगतान

अतिरिक्त समय मिलने से चीनी मिलों को बकाया चुकाने में मिलेगी मदद सरकार की ओर से चीनी के निर्यात की अवधि को तीन महीने बढ़ाए जाने दिए जाने से चीनी मिलों को राहत मिली है वहीं किसानों को भी उनका गन्ने की फसल का बकाया भुगतान मिलने की राह खुल गई है। हाल ही में सरकार ने चीनी के निर्यात के लिए समय सीमा और तीन महीने बढ़ाकर दिसंबर कर दी है। इससे चीनी मिलों को ज्यादा निर्यात करने का मौका मिलेगा। इससे मिलें किसानों के गन्ने के बकाए का भुगतान करने के लिए अतिरिक्त रकम हासिल कर सकेंगी। इससे वे गन्ना किसानों का बकाया चुकता कर सकेगी। जानकारी के अनुसार चालू शुगर सीजन ( अक्टूबर -सितंबर 2019-20 ) में चीनी मिलों ने 57 लाख टन चीनी का अनुबंध किया है, जो 60 लाख टन के लक्ष्य के करीब है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बता दें कि हर साल, सरकार अधिकतम स्वीकार्य निर्यात मात्रा (एमएईक्यू) के तहत निर्यात के लिए अलग-अलग मिल का कोटा तय करती है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया को बताया कि यह निर्णय लिया गया है कि उन चीनी मिलों, जिन्होंने इस महीने के अंत तक आंशिक रूप से चीनी सीजन 2019-20 का ( एमएईक्यू) कोटा निर्यात किया है, उन्हें इस कैलेंडर वर्ष के अंत तक अपने कोटा की शेष राशि का निर्यात करने की अनुमति दी जाएगी। ऐसा मानना है कि इस निर्णय से चीनी मिलों के पास नकदी बढ़ेगी जिससे वे किसानों का गन्ना बकाया रुपए का भुगतान कर सकेंगे। गन्ना किसानों का 13,000 करोड़ रुपए है बकाया गन्ना किसानों का चीनी मिलों के ऊपर करीब 13,000 रुपए बकाया है जिसका भुगतान अभी तक चीनी मिलों की ओर से नहीं किया गया है। इसको लेकर सरकार ने चीनी मिलों को चीनी निर्यात के लिए अतिरिक्त समय दिया है ताकि वे इस समय के दौरान चीनी का निर्यात करके उससे प्राप्त रुपए से किसानों को भुगतान करेंगे। बता दें कि सरकार निर्यात के लिए चीनी मिलों को प्रति टन 10,448 रुपए की सहायता प्रदान करती है। अधिकारी ने कहा कि कोविड-19 के बीच आपूर्ति में व्यवधान के कारण वैश्विक बाजार में चीनी की मांग बढ़ी है। अधिकारी ने बताया कि थाईलैंड में सूखा है। इसलिए इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश जो थाईलैंड से आयात करते हैं, वे भारत पर निर्भर हैं। अधिकारी ने कहा कि समय सीमा के विस्तार के कारण 60 लाख टन का लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद है। अखिल भारतीय चीनी व्यापार संघ के अध्यक्ष प्रफुल्ल विठलानी ने बताया कि समय अवधि में विस्तार से चीनी मिलों को शेष 3 लाख टन चीनी का पूरी तरह से निर्यात करने में मदद मिलेगी। किसानों के खाते में जाएगी रकम सरकार ने 60 लाख टन चीनी के निर्यात को मंजूरी दे दी है। इस पर सरकार 6268 करोड़ रुपए का निर्यात सब्सिडी देगी। सरकार ऐसी व्यवस्था करेगी, जिससे निर्यात से हासिल रकम किसानों के खाते में जाएगी। कैबिनेट की बैठक में यह फैसला लिया गया। कैबिनेट की बैठक के बाद रेल मंत्री पीयूष गोयल और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस बारे में प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मीडिया को यह जानकारी दी। जावड़ेकर ने चीनी निर्यात के फैसले के बारे में बताया कि इससे किसानों को सीधे तौर पर फायदा होगा। अभी किसानों का काफी पैसा चीनी मिलों पर बकाया है। सरकार के इस फैसले से उनके हाथ में पैसा आएगा। उन्होंने बताया कि अभी देश में 162 लाख टन चीनी का स्टॉक है। इसमें से 40 लाख टन का बफर स्टॉक शामिल है। कुल स्टॉक से 60 लाख टन के निर्यात को मंजूरी दी गई है। इस स्टॉक के निर्यात होने से प्राप्त रुपए से किसानों का बकाया भुगतान किया जाएगा। इस वर्ष कितना चीनी निर्यात हुआ अब तक देश का चीनी निर्यात मौजूदा मार्केटिंग ईयर में अब तक बढक़र 17.44 लाख टन रहा है, जबकि पिछले पूरे चीनी मार्केटिंग सीजन 2017-18 में करीब पांच लाख टन चीनी का ही निर्यात हुआ था। चीनी उद्योग के आंकड़ों में यह जानकारी दी गई। देश में चीनी का मार्केटिंग सीजन 1 अक्टूबर से शुरू होकर 30 सितंबर तक चलता है। अखिल भारतीय चीनी व्यापार संघ ने एक बयान में कहा, एक अक्टूबर 2018 से छह अप्रैल 2019 के बीच 17.44 लाख टन चीनी का निर्यात किया गया। इसमें से कच्ची चीनी की मात्रा लगभग आठ लाख टन थी। अभी 4.3 लाख टन चीनी का निर्यात होना है बाकी व्यापार संघ के अनुसार अभी 4.3 लाख टन चीनी फिलहान निर्यात की प्रक्रिया में है। चीनी व्यापार संघ के मुख्य कार्याधिकारी आरपी भगरिया ने बताया कि अब तक कुल मिलाकर करीब 27 लाख टन चीनी निर्यात अनुबंध किया जा चुका है जिसमें से 21.7 लाख टन चीनी मिलों से भेजी जा चुकी है। वैश्विक बाजारों में चीनी के दाम काफी नीचे चल रहे हैं। यही वजह है कि घटी कीमतों के बीच भारतीय निर्यात प्रतिस्पर्धा में नहीं ठहर पा रहा है, क्योंकि देश में चीनी के दाम विश्व बाजार के दाम के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं। यही वजह है कि पिछले मार्केटिंग ईयर में केवल पांच लाख टन चीनी का ही निर्यात हो पाया था। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

किसानों से धान, बाजरा व ज्वार की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद शुरू करने की तैयारी

किसानों से धान, बाजरा व ज्वार की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद शुरू करने की तैयारी

किसान फसल बेचने के लिए 15 अक्टूबर तक करा सकेंगे पंजीयन केंद्र सरकार की ओर से इस वित्तीय वर्ष के लिए खरीफ की फसल धान, बाजरा व ज्वार के समर्थन मूल्य तय कर दिए गए हैं। इससे किसानों को मंडी में फसल बेचने में आसानी होगी। समर्थन मूूल्य वह न्यूनतम मूल्य होता है जिस पर सरकार किसान से फसल खरीदती है। यह मूल्य हर वित्तीय वर्ष के लिए अलग-अलग तय किए जाते हैं। समर्थन मूल्य से नीचे जिंस की खरीद नहीं की जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो किसान इसकी शिकायत कर सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मध्यप्रदेश में पंजीयन का कार्य शुरू मध्यप्रदेश सरकार ने तय समर्थन मूल्य पर किसानों से उपज खरीदने को लेकर पंजीयन का कार्य शुरू कर दिया है। राज्य में इसके पंजीयन का कार्य 15 सितंबर से शुरू हो चुका है जो 15 अक्टूबर तक चलेगा। इस बार पंजीयन का कार्य पिछले वर्ष के मुकाबले अधिक समय के लिए किया जाएगा। इसके पीछे कारण यह है कि किसानों से अधिक से अधिक जिंसों की खरीद की जा सके जिससे किसानों को फायदा हो। खरीफ फसलों का समर्थन मूल्य 2020 / समर्थन मूल्य खरीद योजना 2020 बता दें कि इस वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए खरीफ फसलों में धान का समर्थन मूल्य 1868 रुपए, बाजरा 2150 रुपए एवं ज्वार 2620 रुपए समर्थन मूल्य तय किया गया है। इस समर्थन मूल्य पर खरीद को लेकर मध्यप्रदेश सरकार ने इसके पंजीयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत किसान अपना पंजीकरण करवा कर मंडी में बिना कोई रूकावट के समर्थन मूल्य पर फसल बेच सकेंगे। धान, ज्वार एवं बाजरा बेचने के लिए यहां से करवाएं पंजीकरण ऐसे किसान जिनकी स्वयं की अपनी जमीन है अर्थात भू-स्वामी है वह किसान एमपी किसान एप, कॉमन सर्विस सेंटर, लोक सेवा केंद्र, ई-उपार्जन पंजीयन एप या वेब पोर्टल से या समिति स्तर पर स्थापित केंद्र से पंजीकरण करवा सकते हैं। वहीं ऐसे सिकमीदार या वनाधिकार पट्टाधारी किसानों को पंजीयन हेतु समिति स्तर पर स्थापित केंद्र से ही करवानी होगी। मध्यप्रदेश में धान, बाजरा एवं ज्वार का पंजीकरण प्रारंभ हो चुका है किसान भाई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक पंजीयन केंद्र पर सुबह 10.30 बजे से लेकर शाम 05.30 बजे तक शासकीय अवकाश एवं रविवार को छोडक़र कर करवा सकते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य 2020 पंजीयन हेतु आवश्यक दस्तावेज पहले से पंजीकृत किसान: जिन किसानों का पहले से पंजीकरण है ऐसे किसानों को किसी नए दस्तावेज की आवश्यकता नहीं होगी परन्तु बैंक खाता परिवर्तन की दशा में बैंक पासबुक की छायाप्रति देनी होगी। नवीन किसान: नए किसान जो पहली बार पंजीकरण करवा रहे है वह किसान आधार नंबर की छायाप्रति, समग्र सामाजिक सुरक्षा मिशन अंतर्गत जारी सदस्य आईडी तथा बैंक पासबुक की छायाप्रति। सिकमी एवं पट्टाधारी किसान: वनाधिकार पट्टाधारी/ सिकमिदार किसानों को वन पट्टा एवं सिकमी अनुबंध की प्रति। पंजीयन में भूमि रकबा एवं बोई गई फसल की जानकारी गिरदावरी डाटाबेस ली जाएगी। सहमत न होने पर गिरदावरी में दावा/ आपत्ति का प्रावधान उपलब्ध होगा) पूर्व पंजीकृत किसान का विवरण, बैंक खाता एवं मोबाइल नंबर की जानकारी विगत वर्ष के पंजीयन डाटा से ली जाएगी। किसान को बैंक खता एवं मोबाइल नंबर ओटीपी आधारित संशोधन की सुविधा होगी। धान, ज्वार एवं बाजरा किसान पंजीयन के लिए आवश्यक निर्देश किसान अपना पंजीयन आधार नंबर एवं समग्र आई डी के आधार पर कर सकते है। पंजीयन के लिए आधार अथवा समग्र आई डी का होना अनिवार्य है। यदि किसान के पास आधार नंबर और समग्र आईडी दोनों उपलब्ध नहीं है, तो कृपया नजदीकी ग्राम पंचायत से संपर्क कर सकते हैं। किसान अपनी परिवार समग्र आईडी से सदस्य समग्र आईडी खोज सकते है। बैंक खाता क्रमांक पासबुक में से देख कर सही प्रविष्ट करें। यदि आधार नंबर लोड नहीं हो रहा हो तो समग्र आईडी से अपना पंजीयन करें। पंजीयन के बाद पावती प्रिंट करें तथा खरीदी के समय पावती ले जाना अनिवार्य है। पंजीयन के लिए मोबाइल नंबर होना अनिवार्य है। शिकायत/समस्या होने पर सी.एम.हेल्पलाइन 181 पर संपर्क कर सकते हैं। इधर हरियाणा में 25 से शुरू हो सकती है धान की खरीद हरियाणा सरकार सार्वजनिक खाद्य वितरण प्रणाली के लिए खरीदी जाने वाले धान की खरीद पहली अक्टूबर के बजाय 25 सितंबर से शुरू करना चाह रही है। इसकी अनुमति के लिए खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के अधिकारी की ओर से केंद्र सरकार को पत्र लिखा जाएगा। हाल ही में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने अपने हरियाणा निवास में फसल खरीद की तैयारियों की समीक्षा की। बैठक के बाद उन्होंने मीडिया को बताया कि किसानों को धान की फसल बेचने में कोई दिक्कत न आए, इसलिए पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष 200 खरीद केंद्र ज्यादा बनाए जाएंगे। ये खरीद केंद्र प्रदेश के उन आठ जिलों में बनाए जाएंगे जिनमें धान की पैदावार अधिक होती है। हिसार, सिरसा, भिवानी क्षेत्र में बाजरा की पैदावार अच्छी है। किसानों को बाजरे की फसल बेचने के लिए ज्यादा दूर न जाना पड़े इसलिए पिछले साल के मुकाबले खरीद केंद्र करीब दोगुने कर दिए हैं। इसी तरह मूंग की खरीद के लिए भी 15 से बढ़ाकर 30 खरीद केंद्र बनाने का फैसला लिया है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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