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फरवरी माह में खेत में खड़ी फसलों की देखभाल - गेहूं, जौ, चना व मटर

फरवरी माह में खेत में खड़ी फसलों की देखभाल - गेहूं, जौ, चना व मटर

14 February, 2020

फरवरी माह में गेहूं, जौ, चना मटर की फसल की देखभाल कैसे करें

देशभर के जागरूक किसान भाइयों का ट्रैक्टर जंक्शन पर स्वागत है। फरवरी का महीना शुरू हो चुका है। देशभर में अब तक मौसम मेहरबान है। किसानों के खेत फसलों से लहलहा रहे हैं। बसंत पंचमी के बाद चारों ओर पीले फूल खिले हुए हैं और मौसम में ठंड धीरे-धीरे कम हो रही है। किसानों को अच्छी पैदावार लेने के लिए फरवरी महीने में मौसम के उतार-चढ़ाव का ध्यान रखना होगा। अचानक बढऩे वाले तापमान से अपनी फसलों की सुरक्षा सबसे जिम्मेदारी वाला काम है। आधुनिक कृषि विधियों की जानकारी से किसान फसलों का उत्पादन बेहतर तरीके से बढ़ा सकता है। आज हम फरवरी महीने में गेहूं, जौ, चना व मटर की फसल में ध्यान रखने वाली प्रमुख सावधानियों पर चर्चा करते हैं।

 

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फरवरी में गेहूं की फसल की देखभाल

  • समय पर बोई गई गेहूं की फसल में फूल आने लगते हैं। इस दौरान फसल की सिंचाई बहुत आवश्यक होती है। गेहूं में समय से बुवाई की दर से तीसरी सिंचाई गांठ बनने (बुवाई से 60-65 दिन बाद) की अवस्था तथा चौथी सिंचाई फूल आने से पूर्व (बुवाई के 80-85 दिनों बाद) एवं पांचवी सिंचाई दुग्ध अवस्था (110-115 बाद) में करें। 
  • पिछेती या देर से बोई गई गेहूं की फसल में कम अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए फसल में अभी क्रांतिक अवस्थाओं जैसे शीर्ष जड़े निकलना, कल्ले निकलते समय, बाली आते समय, दानों की  दूधिया अवस्था एवं दाना पकते समय सिंचाई करनी चाहिए। मार्च या अप्रैल में अगर तापमान सामान्य से अधिक बढऩे लगे तो एक या दो अतिरिक्त सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। 
  • पौधों की उचित बढ़वार एवं विकास के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से पौधों की वृद्धि, जनन क्षमता एवं कार्यिकी प्रभावित होती है। भारतीय मृदा में जस्ते की औसम मात्रा 1 पीपीएम के लगभग पाई जाती है। मृदा में जस्ते की मात्रा 0.5 पीपीएम से कम होने पर इसकी कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। पौधों में जस्ते की कमी की क्रांतिक मात्रा 20 पीपीएम होती है। जस्ता के प्रयोग की मात्रा जस्ते की कमी, मृदा प्रकार एवं फसल के प्रकार आदि पर निर्भर करती है। खड़ी फसल में कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का छिडक़ाव 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार करना चाहिए। 
  • लोह की कमी या कम कार्बनिक पदार्थ वाली चूनेदार, लोहा-पीलापन और क्षारीय मृदा में फसल उत्पादन में मुख्य रूप से बाधा है। मृदा एवं पौधों में इसकी क्रांतिक मात्रा क्रमश:4.5 एवं 50 पीपीएम है। लोहे की कमी की पूर्ति पर्णीय छिडक़ाव से भी की जा सकती है। गेहूं, धान, गन्ना, मूंगफली, सोयाबीन आदि में 1-2 प्रतिशत आयरन सल्फेट का पर्णीय छिडक़ाव, मृदा अनुप्रयोग की अपेक्षा अधिक लाभकारी पाया गया है। मृदा में अनुप्रयोग की मात्रा (150-150 किलोग्राम/हैक्टेयर आयरन सल्फेट) पर्णीय छिडक़ाव की अपेक्षा अधिक होने के कारण मृदा अनुपयोग आर्थिक रूप से लाभप्रद नहीं है। लोहे की कमी को दूर करने में आयरन-चिलेट अन्य अकार्बनिक स्त्रोतों की अपेक्षा अधिक लाभकारी होती है। परंतु महंगे होने के कारण किसान इसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं।

 

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फरवरी में जौ की फसल की देखभाल

  • जौ की फसल में दूसरी सिंचाई गांठ बनने की अवस्था (बुवाई के 55-60 दिनों बाद) में और तीसरी सिंचाई दूधिया अवस्था (बुवाई के 95-100 दिनों बाद) में करें। जौ की फसल में निराई-गुडाई का अच्छा प्रभाव होता है। खेत में यदि कंडुवा रोगग्रस्त बाली दिखाई दे तो उसे निकालकर जला दें। क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में अधिक संख्या में हल्की सिंचाई देना, ज्यादा गहरी एवं कम सिंचाई देने की अपेक्षाकृत उत्म माना जाता है। धारीदार या पीता रतुआ पत्तों पर पीले, छोटे-छोटे कील कतारों में, बाद में पीले रंग के हो जाते हैं। कभी-कभी ये कील-पत्तियों के डंठलों पर भी पाए जाते हैं। इसलिए रतुआरोधी प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए। काला रतुआ लाल भूरे से लेकर काले रंग के लंबे कील पत्तियों के डंठल पर पाए जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए प्रति हैक्टेयर 2 किग्रा जिबेन (डाइथेन जेड-78) का छिडक़ाव करें। 500-600 लीटर घोल एक हैक्टेयर क्षेत्रफल के लिए काफी होता है।
  • जौ एवं गेहूं के जिन खेतों में अधिक वर्षा का पानी भर जाता है, उनमें पानी निकालने के बाद नाइट्रोजन के लिए सी.ए.एन. के डालने से कुछ मात्रा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। अधिक पानी के भर जाने से ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, इसलिए सीएएन की सिफारिश की जाती है।

 

मटर की फसल की देखभाल

  • मटर की फसल में चूर्णिल आसिता रोग के कारण पत्तियों तथा फलियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है। रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही सल्फरयुक्त कवकनाशी जैसे सल्पफेक्स 2.5 किग्रा/हैक्टेयर या 3.0 किग्रा/हैक्टेयर घुलनशील गंधक या कार्बेन्डाजिम 500 ग्राम या ट्राइडोमोपपर्क (80 ई.सी.) 500 मि.ली. की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल में 2-3 छिडक़ाव करें। 
  • रतुआ रोग से पौधों की वृद्धि रूक जाती है। पीले धब्बे पहले पत्तियों पर और फिर तने पर बनने लगते हैं। धीरे-धीरे ये हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाटोजा 1 लीटर या प्रोपीकोना 1 लीटर या डाइथेन एम-45 को 2 किग्रा हैक्टेयर की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर 2-3 बार छिडक़ाव करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं।
  • फलीबेधक कीट फलियों में छेद बनाकर बीजों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए फलियों पर सूक्ष्म छिद्रों से इसके मौजूद होने का पता लग जाता है। फली निकलने की अवस्था में फल पर इमिडाक्लोप्रिड 0.5 प्रतिशत या डाइमेथोएट 0.03 प्रतिशत का 400-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडक़ाव करें। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों का उपयोग एवं समय से बुवाई फली बेधक के प्रकोप से बचने में सहायक होते हैं।
  • माहूं कीट पत्तियों व मुलायम तनों से रस चूसकर एक ऐसा चिपचिपा पदार्थ भारी मात्रा मे स्त्रावित करता है जिसके द्वारा काली फफूंद का आक्रमण इन भागों में हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए 0.05 प्रतिशत मेटासिस्टाक्स या 0.05 प्रतिशत रोगोर के घोल का छिडक़ाव 15-20 दिनों के अंतराल पर कीटों के दिखाई देते ही एक या दो बार आवश्यकतानुसार करें।
  • देर से बोई गई मटर की फसल में फली आने पर सिंचाई करें। अगेती फसल पकने की अवस्था में होगी, अत: समय पर कटाई करें।

 

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चने की फसल की देखभाल

  • चने में आवश्यकता हो तो फूल आने से पूर्व ही सिंचाई करें। फूल आते समय सिंचाई नहीं करनी चाहिए अन्यथा फूल झडऩे से हानि होती है। चने की फसल बारानी क्षेत्रों में जल की आवश्यकता को मिट्टी की गहराई में संचित नमी से पूरा करती है। सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने तथा जाड़े की वर्षा न होने पर बुवाई के 45 दिनों बाद सिंचाई करना लाभप्रद होता र्है। असिंचित क्षेत्रो में चने की कटाई फरवरी के अंत में होती है।
  • चने की फसल में झुलसा रोग की रोकथाम के लिए जिंक मैग्जीन कार्बामेंट 2.0 किग्रा अथवा जीरम 90 प्रतिशत 2 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव करें।
  • फेरोमोन ट्रैप ऐसा रसायन है जो अपने ही वर्ग के कीटों को संचार द्वारा आकर्षित करता है। मादा कीट में जो हार्मोन निकलता है यह उसी तरह की गंध से नर कीटों को आकर्षित करता है। इन रसायनों को सेक्स पफेरोमोन ट्रैप कहते हैं। इसका उपयोग चने के फलीछेदक कीट के फसल पर प्रकोप करने की समय की जानकारी के लिए किया जाता है। पफेरोमोन का रसायन एक सेप्टा (कैन्सूल) में यौन जाल में रख दिया जाता है। 5-6 फलीछेदक कीट के नर यौन जाल में फंसने पर चने की फसल पर कीटनाशी दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। 20 पफेरोमोन ट्रैप प्रति हैक्टेयर की दर से लगाएं।
  • यदि चने के खेत में चिडिय़ा बैठ रही हो तो किसान भाई समझ लें कि चने में फली छेदक का प्रकोप होने वाला है। इन रसायनों का प्रयोग तभी करना चाहिए जब चना में फली छेदक का प्रकोप अधिक हो। उसके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 750 मि.ली. या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. 1.50 लीटर या इंडेक्सोकार्ब 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्वीनालफॉस 25 ई.सी. 1-1.4 प्रति मि.ली. पानी या स्पाइनोसैड 45 प्रतिशत, 0.2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या इमामेक्टीन बेंजोएट 5 प्रतिशत, 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव अवश्य करें। 
  • चने में फलीछेदक कीट नियंत्रण के लिए न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वाइरस 250 से 350 शिशु समतुल्य 600 लीटर प्रति पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव फरवरी के अंतिम सप्ताह में करें। चने में 5 प्रतिशत एन.एस.के.ई. या 3 प्रतिशत नीम ऑयल तथा आवश्यकतानुसार कीटनाशी का प्रयोग करें।

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विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित

विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित

सरकार ने जारी की अधिसूचना, किसानों को जल्द उपलब्ध होंगे इन फसलों के बीज भारत में कृषि उन्नत बनने को लेकर कृषि वैज्ञानिक फसलों की नई-नई किस्मों की पहचान करने में लगे हुए जिससे किसानों को सुरक्षित फसल का उत्पादन मिल सके और उत्पादन भी बेहतर हो। इसी कड़ी में हाल ही में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर ने विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित की है जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसी के साथ भारत सरकार की केंद्रीय बीज उपसमिति ने इन विभिन्न फसलों की नवीनतम किस्मों को व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन के लिए अधिसूचित कर दिया है। बताया जा रहा है कि आगामी वर्षों में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित इन सभी नवीन किस्मों को व्यावसायिक खेती हेतु बीजोत्पादन कार्यक्रम में लिया जाएगा, जिससे इनका बीज प्रदेश के किसानों को उपलब्ध हो सकेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 कौन-कौनसी फसलों की है ये नई आठ किस्में धान : भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर द्वारा विकसित चावल की तीन नवीन किस्म- छत्तीसगढ़ राइस हाइब्रिड-2, बस्तर धान-1, प्रोटेजीन धान को विश्वविद्यालय की ओर से विकसित किया गया है। दलहन : दलहन की तीन नवीन किस्म विकसित की गई हैं। इनमें छत्तीसगढ़ मसूर-1, छत्तीसगढ़ चना-2, छत्तीसगढ़ अरहर-1 है। तिलहन : तिलहन की दो नवीन किस्म विकसित की गई हैं। इनमें छत्तीसगढ़ कुसुम-1 तथा अलसी की आर.एल.सी.-161 किस्मों को छत्तीसगढ़ राज्य में व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन हेतु अधिसूचित किया गया है। अलसी की नवीन किस्म आर.एल.सी. 161 छत्तीसगढ़ के अलावा पंजाब, हिमाचल और जम्मू कश्मीर राज्यों के लिए अनुशंसित की गई है। क्या है इन किस्मों की विशेषताएं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय विकसित विभिन्न फसलों की यह नवीन किस्में विशेष गुणधर्मों से परिपूर्ण है। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई इन किस्मों की विशेषताएं इस प्रकार से हैं- राइस हाइब्रिड-2 ये धान की नई तीन किस्मों में से एक है। इसकी उपज क्षमता 5144 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म छत्तीसगढ़ में सिंचित क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है। इस किस्म की पकने की अवधि 120-125 दिन है। इस किस्म का चावल लंबा-पतला होता है। यह किस्म झुलसन, टुंगरो वायरस एवं नेक ब्लास्ट रोगों के लिए सहनशील तथा गंगई के लिए प्रतिरोधी व पत्तिमोड़ रोग के प्रति सहनशील पाई गई है। बस्तर धान-1 यह विश्वविद्यालय द्वारा विकसित धान की बौनी किस्म है। इसका दाना लंबा एवं पतला होता है। इस किस्म की पकने की अवधि 105-110 दिनों की है। इसका औसत उत्पादन 4000-4800 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म हल्की एवं उच्चहन भूमि हेतु उपयुक्त है। प्रोटेजीन धान यह नवीन किस्म बौनी प्रजाति के धान की किस्म है जिसकी पकने की अवधि 124-128 दिनों की है। इसका दाना मध्यम लंबा व पतले आकार होता है। जिसमें जिंक की मात्रा 20.9 पी.पी.एम. तथा प्रोटीन का प्रतिशत 9.29 पाया गया है। इस किस्म की औसत उपज क्षमता 4500 किलोग्राम/हेक्टेयर है। छत्तीसगढ़ मसूर-1 दहलन की इस किस्म की उपज क्षमता 1446 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। मसूर की यह किस्म औसत 91 दिन (88 से 95 दिन) में पक कर तैयार हो जाती है। इसके पुष्प हल्के बैगनी रंग के होते है। इस किस्म के 100 दानों का औसत वजन 3.5 ग्राम (2.7 से 3.8 ग्राम) होता है। इस किस्म में दाल रिकवरी 70 प्रतिशत तथा 24.6 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। यह किस्म मसूर के प्रमुख कीटों के लिए सहनशील है। छत्तीसगढ़ चना-2 दलहन की नई किस्मों में चना की नवीन किस्म छत्तीसगढ़ चना-2 की उपज क्षमता छत्तीसगढ़ में 1732 किलोग्राम/हेक्टेयर पाई गई है। चने की यह किस्म औसत 97 दिनों (90-105 दिनों) में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के 100 दानों का वजन 23.5 ग्राम (22.8 ग्राम से 24.0 ग्राम) है। यह किस्म उकठा रोग हेतु आंशिक प्रतिरोधी पाई गई है। छत्तीसगढ़ अरहर-1 दहलन की किस्मों में नई विकसित की गई छत्तीसगढ़ अरहर-1 किस्म की उपज क्षमता खरीफ में औसत उपज 1925 किलोग्राम/हेक्टेयर है तथा रबी में 1535 किलोग्राम/हेक्टेयर पाई गई है। अरहर की यह किस्म 165-175 दिन खरीफ में तथा 130-140 दिन रबी में पक कर तैयार हो जाती है। इसके सौ दानों का वजन करीब 9-10 ग्राम होता है। इस किस्म के पुष्प पीले लाल रंग के होते हैं। इस किस्म की दाल रिकवरी 65-75 प्रतिशत पाई गई है। राज्य स्तरीय परीक्षणों में यह किस्म उकठा हेतु आंशिक प्रतिरोधी है तथा इसमें फली छेदक रोग भी कम लगता है। छत्तीसगढ़ कुसुम-1 विश्वविद्यालय द्वारा विकसित तिलहन की दो नवीन किस्मों में से छत्तीसगढ़ कुसुम-1 को जननद्रव्य जी.एम.यू. 7368 से चयन विधि द्वारा विकसित किया गया। इस किस्म में तेल की मात्रा 31-33 प्रतिशत तक पाई जाती है तथा यह किस्म 115 से 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। इस किस्म से 1677 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर औसत उपज मिलती है। यह किस्म छत्तीसगढ़ में धान आधारित फसल चक्र में रबी सीजन हेतु उपयुक्त है। कुसुम की यह किस्म अल्टेनेरिया लीफ ब्लाइट बीमारी हेतु आंशिक प्रतिरोधी है। साथ ही जल्दी पकने के कारण इसकी फसल में एफिड कीट द्वारा कम नुकसान होता है। आर.एल.सी.-161 अलसी की यह नवीन किस्म वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त पाई गई है एवं विपुल उत्पादन देने में सक्षम है। इस किस्म को अखिल भारतीय समन्वय अलसी परियोजना के अंतर्गत विकसित किया गया है। यह किस्म देश के चार राज्यों छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू के लिए सिफारिश की गई है। विश्वविद्यालय द्वारा यह किस्म दो प्रजातियों आयोगी एवं जीस-234 से मिलाकर तैयार की गई है। जिसका औसत उत्पादन 1262 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और 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जानें कैसे हरियाणा के किसान ने पराली से कमाए दो करोड़ रुपये

जानें कैसे हरियाणा के किसान ने पराली से कमाए दो करोड़ रुपये

पराली प्रबंधन : आप भी कर सकते हैं पराली बेचकर कमाई, जानें कैसे? पंजाब व हरियाणा में पराली जलाने की समस्या किसानों के लिए ही नहीं, अपितु सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके लिए दोनों राज्यों की सरकारें किसानों को जागरूक करने के साथ ही पराली प्रबंधन के लिए अनुदान पर मशीनें भी उपलब्ध करा रही है ताकि पराली की समस्या से निबटा जा सके। इसी बीच हरियाणा के एक युवा किसान ने पराली की समस्या को ही उसका समाधान बना दिया। जी हां, ऐसा ही कुछ कर दिखाया है कैथल, हरियाणा के फर्श माजरा गांव के 32 वर्षीय किसान वीरेंद्र यादव ने। उन्होंने पराली को जलाने जगह उससे ही कमाई करना शुरू कर दिया। इनकी कहानी काफी दिलचस्प है और प्रेरणादायी भी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सामने आई पराली प्रबंधन की समस्या आस्ट्रेलिया से भारत आए इस किसान ने खेती करना शुरू किया तो उसके सामने पराली की समस्या सामने आई। जिससे निबटने के लिए इसे जलाने जगह इसे बेचकर कमाई करने का विचार उनके मन में आया और यही से शुरू हुई इस युवा किसान की सफलता की कहानी, इनका मेहनत और प्रयास रंग लाया और इन्होंने पराली बेचकर मात्र एक साल में दो करोड़ की कमाई कर डाली। वे इस सीजन में दो महीने में 50 लाख रुपए की आय प्राप्त कर चुके हैं। वहीं पराली प्रबंधन को कारोबार का रूप देकर इससे दो सौ युवाओं को रोजगार भी दे रहे हैं। बता दें कि किसान वीरेंद्र यादव को आस्ट्रेलिया की नागरिकता मिली हुई हैं। वे अपनी पत्नी व दो बेटियों सहित आस्ट्रेलिया में रह रहे थे। और वहां फल-सब्जियों का थोक का कारोबार किया करते थे जिसमें उन्हेें सालाना 35 लाख रुपए की कमाई होती थी। लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और वे वापिस अपने वतन भारत लौट आए और यहां आकर खेती करना शुरू किया तो उनके सामने पराली प्रबंधन की समस्या आई। किसान वीरेंद्र ने ऐसे की पराली बेचकर दो करोड़ की कमाई मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार वीरेंद्र के मुताबिक जब गांव में खेती के दौरान फसल अवशेष के निपटान की समस्या सामने आई। वहीं, जब पराली को जलाने से उठने वाले प्रदूषण ने दोनों बेटियों की सेहत को आफत में डाल दिया, तो उन्होंने कुछ करने की ठानी। वीरेंद्र की दोनों बेटियों को प्रदूषण के कारण एलर्जी हो गई। वह बताते हैं, तब मैंने गंभीरता से सोचा कि आखिर इस समस्या का बेहतर समाधान कैसे हो सकता है। जब पता चला कि पराली को बेचा जा सकता है, तो इसमें जुट गया। वीरेंद्र ने क्षेत्र में स्थित एग्रो एनर्जी प्लांट और पेपर मिल से संपर्क किया तो वहां से पराली का समुचित मूल्य दिए जाने का आश्वसान मिला। तब उन्होंने इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया। न केवल अपने खेतों से बल्कि अन्य किसानों से भी पराली खरीकर बेचने का काम उन्होंने शुरू किया। इसमें सबसे जरूरी था पराली को दबाकर इसके सघन गट्ठे बनाने वाले उपकरण का इंतजाम करना, ताकि उन्हें ले जाना आसान हो जाए। पराली उपकरणों पर अनुदान वीरेंद्र ने पराली प्रबंधन के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग से 50 प्रतिशत अनुदान पर तीन स्ट्रा बेलर खरीदे। अब सप्ताह भर पहले चौथा बेलर भी खरीद लिया है। एक बेलर की कीमत 15 लाख रुपए है। बेलर पराली के आयताकार गट्ठे बनाने के काम आता है। वीरेंद्र बताते हैं कि दो माह के धान के सीजन में उन्होंने तीन हजार एकड़ से 70 हजार क्विंटल पराली के गट्ठे बनाए। 135 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 50 हजार क्विंटल पराली गांव कांगथली के सुखबीर एग्रो एनर्जी प्लांट को बेची। 10 हजार क्विंटल पराली पिहोवा के सैंसन पेपर मिल को भेज चुके हैं और 10 हजार क्विंटल पराली के लिए इसी पेपर मिल से दिसंबर और जनवरी में भेजने का करार हो चुका है। इस तरह इस सीजन में अब तक उन्होंने 94 लाख 50 हजार रुपए का कारोबार किया है। इसमें से खर्च निकालकर उनका शुद्ध मुनाफा 50 लाख रुपए बनता है। अगले वर्ष जनवरी माह तक और भी कमाई होने की उम्मीद है। इधर पंजाब में भी किसान की आय का साधन बनी पराली पंजाब के कंगन गांव के किसान मनदीप सिंह ने बताया कि वह नकोदर के गांव बीड़ में स्थापित बिजली उत्पादन यूनिट को करीब 20,000 क्विंटल धान की पराली बेच रहा है और पराली की गांठें बनाने के बाद 135 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब के साथ बेच रहे हैं। उन्होंने कहा कि धान की पराली उनकी कमाई का स्थायी साधन बन गई है। आप कैसे कर सकते हैं पराली से कमाई / पराली का उपयोग पराली को जलाने के वजाह किसान इसे बिजली संयत्रों को बेचकर अच्छी कमाई कर सकता है। पंजाब के किसान ऐसा करके अच्छा पैसा कमा रहे हैं इससे एक ओर तो आमदनी हो रही है तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की सुरक्षा भी। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार पंजाब राज्य के जालंधर के जिला उपायुक्त घनश्याम थोरी ने बताया कि जिला प्रशासन के प्रयास से किसान पराली प्रबंधन के प्रति जागरूक हुआ है। पिछले साल जिले में रेक्स समेत सिर्फ 20 बेलर मशीनें थी और इस साल सरकार की 50 प्रतिशत सब्सिडी स्कीम अधीन किसानों को 12 अन्य बेलर मशीनें दीं गई हैं। उन्होंने बताया कि यह मशीन एक दिन में 20 से 25 एकड़ धान की पराली को बेल देती है और एक एकड़ में 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। पराली की यह गांठें बिजली उत्पादन प्लांट की तरफ से 135 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदी जा रही है। थोरी ने बताया कि नकोदर के गांव बीड़ में स्थापित छह मेगावाट की क्षमता वाला बिजली उत्पादन यूनिट 30 हजार एकड़ में पराली का प्रबंधन कर रहा है और यह प्लांट 24 घंटे काम कर रहा है। पराली से चिंता मुक्त | पराली के उपयोग | पराली से पैसा कमाओ | Parali Ka Upyog अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क 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कैबिनेट की बैठक : किसानों के हित में तीन अहम फैसले, जूट व गन्ना किसानों को होगा फायदा

कैबिनेट की बैठक : किसानों के हित में तीन अहम फैसले, जूट व गन्ना किसानों को होगा फायदा

अनाज की पैकिंग के लिए अब सिर्फ जूट के बैग का ही होगा इस्तेमाल अब अनाज की पैकिंग के लिए सिर्फ जूट के बैगों का इस्तेमाल होगा। हाल ही में कैबिनेट की बैठक में सरकार ने यह फैसला लिया है। सरकार का मानना है कि ऐसा करने से जूट उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। वहीं दूसरी ओर पॉलीथिन या प्लास्टिक के बैगों का चलन कम होगा जो पर्यावरण के लिए नुकसान देय साबित हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कैबिनेट की बैठक हुई इसमें एथनॉल की कीमत बढ़ाने सहित कुल तीन अहम फैसले लिए गए। इसके अलावा कैबिनेट की बैठक में जूट बैग का इस्तेमाल बढ़ाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को केंद्र सरकार के इन फैसलों के बारें में जानकारी दी। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर कैबिनेट की बैठक में सरकार ने यह तय किया कि खाद्यानों की पैकिंग के लिए अब सिर्फ जूट बैग का इस्तेमाल होगा। इससे देश में जूट और जूट बैग उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। यह भी तय किया गया है कि 20 फीसदी चीनी की पैकिंग के लिए जूट बैग का इस्तेमाल होगा। जावड़ेकर ने कहा कि जूट के इस्तेमाल से जुड़े फैसले से देश में जूट का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही इससे जूट उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि जूट उद्योग में करीब 4 लाख मजदूर काम करते हैं। उन्हें इस फैसले से फायदा होगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 भारत में कहां - कहां होता है जूट का उत्पादन भारत दुनियाभर में सबसे अधिक जूट का उत्पादन करने वाला देश है। पूरी दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत जूट का उत्पादन भारत में होता है। भारत में जूट का वार्षिक अनुमानित उत्पादन 11,494 हजार बंडल है। जूट मुख्य रूप से गंगा के डेल्टा में पैदा की जाने वाली बायो-डिग्रेडेबल फसल है। भारत में पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, मेघालय, त्रिपुरा और आंध्र प्रदेश में जूट का उत्पादन होता है। इनमें से भारत में सबसे अधिक जूट का उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। देश में पैदा किए जाने वाले कुल जूट का 75 प्रतिशत उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। इसके बाद दूसरा नंबर बिहार का आता है। सरकार के इस फैसले से जूट उत्पादन करने वाले किसानों को फायदा होगा। जूट की खेती में होगा उन्नत बीजों का इस्तेमाल, किसान की आय बढ़ेगी केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जूट की खेती के लिए उन्नत बीजों का इस्तेमाल होगा। इससे हर हेक्टेयर किसानों की आय 10,000 रुपए तक बढ़ जाएगी। उन्होंने कहा कि देश में जूट उत्पादन बढ़ाने पर सरकार ध्यान दे रही है। इसी वजह से 2017 में बांग्लादेश और नेपास से जूट के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया था। उन्होंने कहा कि सरकार ने जीएम पोर्टल से जूट बैग खरीदने का फैसला किया है। इस पोर्टल पर 10 फीसदी जूट बैग की नीलामी होगी। इससे जूट बैग के मूल्य निर्धारण में मदद मिलेगी। इससे देश में जूट का उत्पादन बढ़ेगा। एथेनॉल की कीमतों में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को दी मंजूरी, गन्ना किसानों को होगा फायदा कैबिनेट की बैठक में केंद्र सरकार की ओर से लिए गए अहम फैसलों में एथेनॉल की कीमतों में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को दी मंजूरी देना प्रमुख है। इससे गन्ना किसानों को फायदा होगा। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने बताया कि कैबिनेट ने एथेनॉल की कीमत में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। शुगर जूस से बनने वाले एथेनॉल की कीमत 3.25 रुपए 62.62 रुपए प्रति लीटर कर दी गई है। बी हैवी की कीमत बढ़ाकर 57.61 रुपए कर दी गई है। सी हैवी की कीमत बढ़ाकर 45.69 प्रति लीटर कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह एथेनॉल की कीमत में 2 से 3.35 रुपए की वृद्धि की गई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी और परिवहन पर आने वाला खर्च तेल मार्केटिंग कंपनियां उठाएंगी। उन्होंने कहा कि एथेनॉल की कीमतें बढ़ाने से चीनी मिलों को गन्ना किसानों को फायदा होगा। एथेनॉल की कीमतों में वृद्धि से किसानों को कैसे होगा फायदा अभी देश में पेट्रोल में 10 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता है। इसके लिए इंडियन ऑयल जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां चीनी मिलों से एथेनॉल खरीदती हैं। एथेनॉल की खपत लगातार बढ़ रही है। पिछले 5 साल में इसकी खपत करीब पांच गुनी हो गई है। केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर का कहना है कि 2014 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 38 करोड़ लीटर एथेनॉल चीनी मिलों से खरीदा था। 2019 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने चीनी मिलों से 195 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदा। एथेनॉल की खरीद बढऩे से चीनी मिलों के हाथ में पैसा आता है। इससे उन्हें किसानों को गन्ने के मूल्य का भुगतान करने में मदद मिलती है। इस तरह एथेनॉल की खपत पढऩे से आखिरकार गन्ना किसानों को फायदा होता है। बांधों के रखरखाव के लिए को भी दी मंजूरी, 10,211 करोड़ रुपए होंगे खर्च कैबिनेट की बैठक में देश में बांधों को उन्नत बनाने और उनके रखरखाव के लिए योजना को भी मंजूरी दी गई है। इस बारे जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि 19 राज्यों में 736 बांधों को उन्नत बनाने और उनके रखरखाव के लिए व्यापक योजना को मंजूरी दी गई है। इस पर 10,211 करोड़ रुपए की रकम खर्च होगी। उन्होंने कहा कि देश में 80 फीसदी बांध 25 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। इसलिए इन्हें रखरखाव की काफी जरूरत है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

कृषि वैज्ञानिकों ने जारी की दो नई किस्में, जानें, कौनसी है ये दो किस्में और इनकी विशेषताएं अब गन्ना किसानों की फसल रेड रॉट रोग के कारण बर्बाद नहीं होगी। हाल ही में कृषि वैज्ञानिकों ने गन्ने की दो ऐसी किस्मों को पहचाना है जिस पर इस रोग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता यानि इन किस्मों में इस रोग से लडऩे की क्षमता है और इसलिए इन किस्मों में यह रोग नहीं लगेगा। बता दें कि पिछले कुछ दिनों पूर्व रेड रॉट रोग का प्रभाव से उत्तरप्रदेश के सीतापुर, लखीमपुर खोरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर आदि जिलों में देखा गया जिससे यहां के किसानों की 80 फीसदी फसल सूख कर तबाह हो गई। पर अब किसानों को इस रोग से डरने की जरूरत नहीं है। हाल ही में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ व उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने गन्ने की नई किस्म सीओएलके-कोलख 14201 जो जल्दी तैयार हो जाती है और सामान्य किस्म सीओएस-कोशा 14233 जारी की है। प्रदेश के किसानों को गन्ने की दो नई प्रजातियां बोने के लिए अगले साल से मिलनी शुरू हो जाएंगी। यह दोनों ही प्रजाति अधिक पैदावार देने वाली हैं। इनमें कीट और रोग भी कम लगता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर के डायरेक्टर डॉ. जे सिंह ने बताया कि हाल ही में आयुक्त गन्ना एवं चीनी उद्योग संजय आर भूसरेड्डी की अध्यक्षता में बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक लखनऊ में हुई थी, जिसमें गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर, सेवरही, मुजफफरनगर तथा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ के साथ-साथ चीनी मिल दौराला, अजवापुर, पलिया, बिसवांं एवं रोजा द्वारा विभिन्न होनहार जीनोटाइप के उपज एवं चीनी परता के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर विभिन्न जीनोटाइप में अगेती किस्मों में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित कोलख 14201 तथा मध्य देर से पकने वाली किस्मों में गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर द्वारा विकसित कोशा 14233 बेहतर पाई गई, जिसे सर्वसम्मति से सामान्य खेती के लिए स्वीकृत किया गया। भूसरेड्डी ने कहा कि वर्तमान में गन्ना किस्म को 0238 में लाल सडऩ रोग के आपतन के कारण किसानों को अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए, जिस कड़ी में यह दोनों किस्में सामान्य खेती के लिए बेहतर है। क्या है नई किस्म कोलख 14201 व कोशा 14233 की विशेषताएं किस्म कोलख 14201 में परीक्षण के दौरान 900-1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज प्राप्त हुई है। वहीं औसतन 13.0 प्रतिशत पोल इन केन भी प्राप्त हुआ जो को. 0238 से ज्यादा था। वहीं इस किस्म का गन्ना बिलकुल सीधा खड़ा रहता है, और इसको बंधाई की कम आवश्यकता पड़ती है। साथ ही इसका गुड़ सुनहरे रंग और उत्तम गुणवत्ता का होता है। जो ऑर्गैनिक गुड़ उत्पादन के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। कोलख 14201 और कोशा 14233 में लाल सडऩ रोग से लडऩे की क्षमता बहुत ज्यादा है, और कोलख 14201 पर बेधक कीटों का भी बेहद कम आक्रमण होता है। गन्ने की सीओ-0239 किस्म का होगा विलोपन गन्ने की सीओ-0239 किस्म और सीओ 0118 किस्म एक ही है। अत: स्वीकृत किस्मों की सूची में से सीओ 0239 का नाम विलोपित कर दिया जाएगा। समिति द्वारा यह भी निर्णय लिया गया कि एकल गन्ना किस्मों की बुवाई के कारण प्रदेश में रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, अत: प्रजातीय संतुलन बनाए रखने के लिए अगेती एवं मध्य देर कि किस्मों का संतुलन रखा जाना जरूरी है। वहीं सीओ 0239 किस्म के विलोपन को लेकर डॉ सिंह का कहना है कि सीओ 0238 का रकबा प्रदेश में बहुत बड़ा है इसलिए इतना आसान नहीं हैं सीओ 0238 को परिवर्तित करना। गन्ने की सीओ - 0239 किस्म का क्यूं किया जा रहा है विलोपन मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के निदेशक डॉ. ज्योत्सेंद्र सिंह का कहना है कि परीक्षण आंकड़ों पर गहन चर्चा के बाद यह पाया गया, कि इस शीघ्र गन्ना किस्म में प्रचलित किस्म सीओ -0238 से ज्यादा उपज क्षमता के साथ-साथ ज्यादा चीनी परता भी मिला है। आज जब गन्ने की सीओ-0238 किस्म में वृहद स्तर पर लाल सडऩ रोग की समस्या बढ़ रही है। वहीं किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में सीओ 0238 पर रोक लगाने की संभावना अधिक बढ़ रही है। वहीं इसको सीओ 0238 को परिवर्तित कर के को.लख. 14201 को बढ़ावा देने आवश्यकता अब बढ़ गई है। आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट करने का लिया निर्णय 0239 किस्म के विलोपन के साथ ही आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट कर दिया जाएगा। इस संबंध में चीनी मिल प्रतिनिधियों की ओर से लखनऊ में हुई बैठक में यह अवगत कराया गया कि गन्ना किस्म कोपीके 05191 में चीनी परता कम है तथा लाल सडऩ रोग का भी प्रकोप बढ़ रहा है। इस पर समिति द्वारा इसे आगामी सालों में फेजआउट करने का निर्णय लिया गया है। कब तक किसानों को मिल पाएगा इन दो नई किस्मों का बीज डॉ. सिंह के अनुसार चयनित किसानों और चीनी मिलों के माध्यम से कोलख.14201 का बीज तैयार कराया जा रहा है। अगले वर्ष किसानों को इसका बीज आसानी मिल सकेगा। अगले वर्ष 50 फीसदी तक किसानों के पास कोलख 14201 का बीज तैयार मिलेगा जिसका वे बुवाई में उपयोग कर बेहतर गन्ना का उत्पादन कर सकेंगे। जल्द ही किसानों को मिलेंगी और नई किस्में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार साह के अनुसार जल्द ही उत्तरी राज्यों के लिए गन्ने की चार किस्में कोलख 14204, Co15023, CoPb14185 व CoPb11453 और दक्षिणी राज्यों के लिए तीन किस्में MS13081, VSI 12121 और Co13013 को संबंधित कृषि जलवायु क्षेत्रों में खेती के लिए जारी किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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