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मक्का फसल के अवशेषों से पशुओं के खाने के लिए बनाया साइलेज

मक्का फसल के अवशेषों से पशुओं के खाने के लिए बनाया साइलेज

जानें, कैसे तैयार होता है पशुओं के लिए साइलेज और क्या है इसके फायदें

पराली जलाने की समस्या से देश के कई राज्य जूझ रहे हैं। पराली जलाने से वातावरण में फैलता धुआं हमारे सांस लेने के लिए काम में आने वाली प्राणवायु आक्सीजन को दूषित करता जा रहा है। पराली जलाने से वातावरण में कार्बन की मात्रा अधिक होती जा रही है ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा है। इसका परिणाम ये हो रहा है कि ऐसे इलाकों के आसपास के लोग अस्थमा, एलर्जी सहित अन्य बीमारियों का शिकार होते जा रहे हैं। हवा में मिलता जहर हमारी सांसों के द्वारा शरीर में पहुंच रहा है जो कई बीमारियों को न्योता दे रहा है। इन सबके बीच होशंगाबाद के एक किसान ने पराली की समस्या का समाधान खोज कर प्रदेश का मान बढ़ाया है। इन्होंने मक्का फसल के अवशेषों का उपयोग पशुओं के खाने के लिए साइलेज बनाने के काम में लिया जिससे उन्हें काफी मुनाफा हो रहा है। 
हम आज बात करेंगे होशंगाबाद जिले के उन्नत कृषक शरद वर्मा की जिन्होंने मक्का फसल के अवशेषों को लेकर जो नवाचार किया ह, वह सम्भवत: मध्यप्रदेश में पहला है। इसमें फसल अवशेष से साइलेज बनाया जाता है, जिससे किसानों को जहां ज़्यादा मुनाफा मिलता है, वहीं पशुओं के दूध में फेट की मात्रा भी बढ़ती है। शरद वर्मा के इस नवाचार ने प्रदेश की शान बढ़ा दी है।

 

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साइलेज बनाने की मशीन सबसे पहले खरीदी

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार मूलत: ग्राम घाटली ( इटारसी ) जिला होशंगाबाद के उन्नत कृषक शरद वर्मा ने मीडिया को बताया कि 2016 में वे आस्ट्रेलिया /न्यूजीलैंड के दौरे पर गए थे। वहां इसका प्रयोग होते देखा था, तभी विचार किया था कि इस मशीन की अपने देश में भी जरूरत है। आखिरकार मैंने इसे खरीदने के लिए ब्राजील की एक कंपनी, जो इसे भारत में बनाती है, से संपर्क किया और इसे 4 लाख रुपए में खरीदा लिया। इस स्वचालित मशीन से मक्का के फसल अवशेष से साइलेज बनाया जाता है। 

एयरटाइट एक बोरी में 50 किलो साइलेज आ जाता है। इसकी 20 बोरियों को घर में रखना आसान है। पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। दूध भरे हरे भुट्टे के साइलेज से पशुओं के दूध में फेट की मात्रा भी बढ़ती है। वर्मा ने कहा कि फिलहाल मक्का 8 रुपए किलो बिक रही है, जबकि यह साइलेज डेयरी वाले 500 रुपए क्विंटल में खरीद रहे हैं। अब तक 200 क्विंटल से अधिक साइलेज बना लिया है। इसकी अच्छी मांग निकल रही है। इससे पराली की समस्या के समाधान के साथ ही प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। बता दें कि वर्मा की पत्नी कंचन वर्मा को कृषि कर्मण अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

 


मशीन से कैसे बनाया जाता है मक्का अवशेष से साइलेज

इस बारे में डॉ. के.के. मिश्रा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, क्षेत्रीय कृषि अनुसन्धान केंद्र , पंवारखेडा के अनुसार श्री वर्मा का यह नवाचार हर दृष्टि फायदेमंद है। पर्यावरण प्रदूषण के बचाव के साथ ही डेयरी वालों को 5 रुपए किलो में पशुओं के लिए पौष्टिक आहार मिल रहा है, जबकि, श्री दीपक वासवानी, सहायक यंत्री कृषि के अनुसार मध्यप्रदेश में यह पहली मशीन है जिसे लखनऊ से लाया गया है। इनमें बने 4 ड्रम में मक्के की पराली की कटिंग, थ्रेशिंग और कॉम्प्रेस कर साइलेज बनाती है, जिसे 50 किलो के एयरटाइट बैग में रखा जाता है। 3-4 दिन सेट होने के लिए रखा जाता है। यह पशुओं के लिए बढिय़ा आहार है। वहीं श्री जितेन्द्र सिंह, उप संचालक कृषि , होशंगाबाद के अनुसार श्री शरद वर्मा का मक्का के अपशिष्ट का यह नवाचार आम के आम , गुठलियों के दाम जैसा है। इससे पराली की समस्या भी रुकेगी और किसान को अतिरिक्त आय भी होगी।


मशीन को एक जगह से दूसरी जगह लाना ले जाना भी आसान

यह मशीन पोर्टेबल है , जिसे किसानों के खेत तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। अभी इस मशीन पर अनुदान नहीं मिलता है। इसे लेकर शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा, वहां से स्वीकृति मिलने पर अनुदान दिया जाएगा। इससे किसानों को लाभ होगा।


बिना मशीन भी इस तरह बनाया जाता है साइलेज

साइलेज बनाने के लिए दाने वाली फसलें जैसे- मक्का, ज्वार, जई, बाजरा आदि का उपयोग किया जाता है। क्योंकि इनमें कार्बोहाईड्रेट की मात्रा अधिक होती है। इससे दबे चारे में किण्वन क्रिया तेज होती है। दलहनीय फसलों का साइलेज अच्छा नहीं रहता है, लेकिन दहलनीय फसलों को दाने वाली फसलों के साथ मिलकार साइलेज बनाया जा सकता है। शीरा या गुड़ के घोल का उपयोग किया जाए, जिससे अम्ल की मात्रा बढ़ाई जा सकती है।


साइलेज क्या होता है / साइलेज बनाने का तरीका

जिस चारे से साइलेेज बनाना है उसे काट कर थोड़ी देर के लिए खेत में सुखाने के लिए छोड़ देना चाहिए, जब चारे में नमी 70 प्रतिशत के लगभग रह जाए, उसे कुट्टी काटने वाले मशीन से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर गड्ढों में अच्छी तरह से दबाकर भर देना चाहिए। छोटे गड्ढों को आदमी पैरों से दबा सकते हैं, जबकि बड़े गड्ढें ट्रैक्टर चलाकर कर दबा देने चाहिए। जब तक जमीन की तह से लगभग एक मीटर ऊंची ढेर न लग जाएं, तब तक भराई करते रहना चाहिए। भराई के बाद उपर से गुंबदकार बना दें तथा पोलिथीन या सूखे घास से ढक कर मिट्टी अच्छी तरह से दबा दें। साइलेज बनाने के लिए गड्ढे हमेशा ऊंचे स्थान पर बनाने चाहिए, जहां से बारिश के पानी का निकासी अच्छी तरह से हो सके। भूमि में पानी का स्तर नीचे हो। 

इसके अलावा गड्ढे का आकार चारे व पशुओं की संख्या पर निर्भर करता है। गड्ढों के धरातल में ईंटों से तथा चारों ओर से सीमेंट एवं ईटों से भली भांति भराई कर देनी चाहिए। गड्ढे को भरने के तीन महीने बाद उसे खोलना चाहिए। खोलते वक्त एक बात का विशेष ध्यान रखें कि साइलेज एक तरफ से परतों में निकाला जाए। ध्यान रहे गड्ढे के उपरी भागों और दीवारों के पास में कुछ फफूंदी लग जाती है, जिसे पशु को खिलाना नहीं चाहिए।

 

 

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आम बजट 2021 : किसान व कृषि उद्योगों को उम्मीदें, मिल सकती हैं कई सौगातें

आम बजट 2021 : किसान व कृषि उद्योगों को उम्मीदें, मिल सकती हैं कई सौगातें

जानें, बजट में सरकार से क्या मांग कर रहे हैं किसान? एक फरवरी को आम बजट पेश किया जाना है। जिसको लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। बजट को लेकर किसानों व उद्योग जगत को काफी उम्मीदें हैं। आशा की जा रही है कि सरकार इस बजट में किसानों व कृषि से जुड़े उद्योगों पर विशेष ध्यान देगी और इस लिहाज से इस बजट में सरकार किसानों व कृषि उद्योग जगत को कई सौगातें दे सकती है। बता दें कि संसद का बजट सत्र 29 जनवरी से शुरू होगा और एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करेंगी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 कृषि रसायनों पर जीएसटी घटाया जाए, दर 12 फीसदी करने की मांग उद्योग संगठन क्रॉपलाइफ इंडिया ने आगामी केंद्रीय बजट में कृषि रसायनों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर घटाकर 12 फीसदी करने की मांग की है। उसने कहा है कि जीएसटी घटाने से कृषि रसायनों (एग्रोकेमिकल्स) की कीमतों को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे किसानों को फायदा होगा। अभी कृषि रसायनों पर जीएसटी दर 18 फीसदी है। क्रॉपलाइफ इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) असित्व सेन ने कहा कि सरकार को जीएसटी के नियमों को भी सरल बनाना चाहिए। कंपनियों को किसी राज्य में चुकाए गए टैक्स पर दूसरे राज्य के इनपुट क्रेडिट को समायोजित करने की अनुमति देनी चाहिए। क्रॉप लाइफ ने सरकार से एग्रोकेमिकल कंपनियों के अनुसंधान एवं विकास (आरएंडटी) खर्च पर 200 फीसदी भारित कटौती प्रदान करके अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने की कोशिश करनी चाहिए। सेन ने कहा कि सरकार उन इकाइयों को यह सुविधा प्रदान करने पर विचार कर सकती है, जिनके पास 50 करोड़ रुपये की न्यूनतम अचल संपत्ति है और जो 10 करोड़ रुपये का खर्च कर रही हैं। उद्योग ने यह भी मांग की कि सरकार तकनीकी कच्चे माल और तैयार उत्पादों दोनों पर एक समान मूल सीमा शुल्क 10 फीसदी बनाए रखे। क्रॉप लाइफ इंडिया फसल सुरक्षा में शोध और विकास आधारित कंपनियों का संगठन है। भारतीय कृषक समाज की डीजल पर टैक्स घटाने की मांग भारतीय कृषक समाज ने डीजल पर टैक्स कम करने और फल एवं सब्जियों पर परिवहन सिब्सडी की मांग की है। बीकेएस ने कृषि क्षेत्र की विकास और किसानों के कल्याण के लिए वित्त मंत्रालय को 15 सुझाव दिए। इसमें डीजल पर कर की दर में कटौती तथा अल्कोहल को जीएसटी व्यवस्था में शामिल करने का सुझाव शामिल हैं। वहीं यूरिया के दाम बढ़ाए जाने और पोटाश की कीमतों में कमी करने की मांग की है। यह भी पढ़ें : गणतंत्र दिवस पर महिंद्रा लेकर आया किसानों के लिए खास ऑफर पीएम किसान सम्मान निधि की रकम बढ़ाई जाए डीएनए में छपी खबर के मुताबिक सरकार किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाने पर विचार कर रही है। यह सालाना 10 हजार तक हो सकती है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार किसान सम्मान निधि योजना के तहत मौजूदा वार्षिक किस्त को 10000 रुपये तक बढ़ा सकती है. इस बजट में, किसानों ने सरकार से मांग की है कि 6 हजार की राशि कृषि के लिए अपर्याप्त है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए। वित्त वर्ष 2019-20 के लिए बजट अनुमान (बीई) लगभग 1.51 लाख करोड़ रुपये था, जो अगले वित्त वर्ष 2020-21 में बढक़र 1.54 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसके अलावा, 2019-20 में लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपए की तुलना में 2020-21 में ग्रामीण विकास के लिए आवंटन को बढ़ाकर 1.44 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। पीएम कृषि सिंचाई योजना के तहत, इसे 2019-20 में 9682 करोड़ से बढ़ाकर 2020-21 में 11,127 करोड़ रुपये कर दिया गया है। कृषि आंदोलन और बजट : हो सकती है किसानों के लिए लाभकारी घोषणाएं इस समय केंद्र के नए तीन कृषि कानूनों को लेकर किसानों का विरोध जारी है। और सरकार चाहती है कि किसी भी तरह किसान आंदोलन खत्म कर दें। इस लिहाज से माना जा रहा है कि इस बार आम बजट में सरकार किसानों का विशेष ख्याल रखते हुए उन्हें कई सौगातें दे सकती है ताकि नए कृषि कानूनों से पैदा हुआ गतिरोध दूर हो सके। हालांकि केंद्र सरकार ने किसानों के लिए पहले से कई लाभकारी योजनाएं चला रखी हैं जिनका किसानों को लाभ मिल रहा है। इसमें पीएम सम्मान निधि योजना प्रमुख रूप से हैं। इस योजना के द्वारा किसानों के खाते में सीधा पैसा आता है जिससे किसानों को काफी सहायता मिलती है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

सब्जियों की खेती :  जानें, कम खर्च में सब्जियों की खेती कैसे करें?

सब्जियों की खेती : जानें, कम खर्च में सब्जियों की खेती कैसे करें?

कृषि मार्गदर्शन : यह तरीके अपनाएं, कम लागत में अधिक पैदावार पाएं देश में बड़े क्षेत्रफल पर सब्जियों की खेती की जाती है। यदि आप भी सब्जियों की खेती आधुनिक और उन्नत खेती को अपनाते है तो अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। जनवरी व फरवरी महीने में आप सब्जियों की उन्नत किस्में लगा सकते हैं जिससे मार्च और अप्रैल महीने तक अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है। तो आइए जानते हैं कम खर्च में सब्जियों की उन्नत खेती कैसे करें। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मल्चिंग विधि अपनाएं सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना ले। इसके बाद मेड़ का निर्माण करके चार-चार इंच की दूरी पर बीज की बुवाई कर दें। मेड़ को प्लास्टिक मल्चिंग से ढक देना चाहिए। जब बीज अंकुरित हो जाए तब पौधे को मल्चिंग में छेद करके बाहर निकाल दें। बता दें कि इस विधि को अपनाने से सब्जियों में खरपतवार भी नहीं होता है। वहीं सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत भी नहीं पड़ती है। वहीं फसल कई तरह के रोगों से भी बची रहती है। बीजों को बोने से पहले उपचारित करें अन्य फसलों की तरह सब्जियों के बीजों का भी बुआई से पहले उपचार करना चाहिए। इसके लिए कार्बेंडाजिम एक से दो ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। ग्वारफली के बीजों के लिए दो ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किलो बीज की दर से काम में लेना चाहिए, जिस भी सब्जी के बीज का उपचार करें, उसमें एफआईआर का ध्यान रखें। एफ यानी फफूंदनाशी, आई यानी इन्सेक्टीसाइड और आर यानी कल्चर। इन तीनों तरीके से उपचार करने से बीज हर तरह से सुरक्षित हो जाता है। यह भी पढ़ें : जनधन योजना : देश के 41 करोड़ लोगों को मिला योजना लाभ टपक सिंचाई पद्धति का करें प्रयोग सब्जियों में सिंचाई के लिए टपक पद्धति का इस्तेमाल करें। इस विधि इससे जहां एक ओर पानी कम लगता है और सीधा जड़ों में पानी पहुंचाता है जिससे पौधों को काफी समय तक नमी मिलती रहती है। इससे पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती और कम पानी में कई एकड़ क्षेत्र की सिंचाई करना संभव हो पाता है। अच्छी बढ़वार के लिए पानी में मिलकर दें उर्वरक उर्वरकों को सीधा खेत में नहीं छिडक़कर पानी में मिलाकर पौधे की जड़ों मेें देना चाहिए। इससे जहां उर्वरक का खर्च कम होगा। वहीं उर्वरक सीधे पौधे को लगेगा। जिससे पौधे की बढ़वार अच्छी होगी। वहीं मल्चिंग से ढंकने से वाष्प का निर्माण होता है जो पौधे की बढ़वार में मददगार होती है। ऑर्गेनिक कीटनाशकों का करें प्रयोग मल्चिंग विधि अपनाने से खरपतवार काफी कम होती है। वहीं कीट पतंगे भी फसल को कम नुकसान पहुंचाते हैं। घास मल्चिंग के नीचे रहकर ही खत्म हो जाती है। हालांकि विभिन्न कीट पतंगों से फसल को बचाने के लिए समय-समय पर जैविक कीटनाशकों का छिडक़ाव करते रहना चाहिए। अधिक पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों का करें चयन उपरोक्त तरीके अपनाने के अलावा अधिक पैदावार देने वाली उन्नत किस्मों का चयन किया जाना चाहिए। इसके लिए आप अपने क्षेत्रीय कृषि विभाग से अपने क्षेत्रानुसार अनुशंसित किस्म के बारे में जानकारी ले सकते हैं। हम भी ट्रैक्टर जंक्शन के माध्यम से समय-समय पर उन्नत किस्मों की जानकारी किसान भाइयों को देते हैं। बता दें कि उन्नत किस्म का चयन करने से पैदावार अधिक साथ ही गुणवत्ता के लिहाज से भी सही रहती हैं। गुणवत्तापूर्ण उत्पादन होने पर बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं। यह भी पढ़ें : अधिक ठंड में फसलों को नुकसान, जानें, पाले से फसलों को कैसे बचाएं भूमि की उर्वराशक्ति बनाएं रखने के लिए फसल चक्र अपनाएं एक ही फसल को बार-बार बोने से भूमि की उर्वराशक्ति कम होने लगती है। इसलिए जहां तक संभव हो बदल-बदल कर फसल बोएं। इससे खेत की उर्वराशक्ति बनी रहेगी। भूमि में कार्बन-नाइट्रोजन के अनुपात में वृद्धि होती है। भूमि की क्षरीयता मेें सुधार होता है। फसलों का बीमारियों से बचाव होता है, कीटों का नियंत्रण होता है। भूमि में विषाक्त पदार्थ एकत्र नहीं होते। अधिक मूल्यवान फसलों के साथ चुने गए फसल चक्रों में मुख्य दहलहनी, फसलें, चना, मटर, मसूर, अरहर उर्द, मूंग, लोबिया, राजमा आदि का समावेश जरूरी हो गया है। फसल चक्र के निर्धारण में मूलभूत सिद्धांतों का ध्यान रखना जरूरी है जैसे अधिक खाद चाहने वाली फसल के बाद कम पानी चाहने वाली फसलों का उत्पादन, अधिक पानी चाहने वाली फसल के बाद कम पानी चाहने वाली फसल, अधिक निराई गुड़ाई वाली फसल के बाद कम निराई गुड़ाई चाहने वाली फसल लगाए। फसल चक्र के सिद्धांत को आप साधारण तरीके से ऐसे भी समझ सकते हैं। जैसे आपके खेत में इस बार अगर दलहन है तो अगली बार अनाज लगाना चाहिए। तिलहन है तो सब्जी, अगर सब्जी है तो चारा बोएं, इन सब फसलों का चुनाव करना चाहिए। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

इफको बनी दुनिया की शीर्ष सहकारी संस्था, धान की खरीद में छत्तीसगढ़ ने रिकार्ड तोड़ा

इफको बनी दुनिया की शीर्ष सहकारी संस्था, धान की खरीद में छत्तीसगढ़ ने रिकार्ड तोड़ा

साल 2021 के शुरुआती महीने में कृषि जगत की खास दो उपलब्धियां साल के शुरुआती महीने में ही भारतीय कृषि जगत की ओर से दो उपलब्धियां दर्ज की गई हैं। एक ओर इफको दुनिया की शीर्ष सहकारी संस्था बन गई हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ ने अधिक धान की सरकारी खरीद में रिकार्ड बना लिया है। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर मिली जानकारी के अनुसार उर्वरक कंपनी इफको (इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड) दुनिया की शीर्ष सहकारी संस्था बन गई है। पिछले साल दुनिया में इफको ने 125वें स्थान से ओवरऑल टर्नओवर रैंकिंग में 65वां स्थान प्राप्त किया है। वहीं इस साल इफको ने भारत के पाले में एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज करा दी है। इसके साथ ही इफको अब दुनिया की शीर्ष 300 सहकारी संस्थाओं के बीच प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद से अधिक कारोबार के अनुपात के आधार पर पहले स्थान पर आ गई है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 इफको का राष्ट्र के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दुनिया की शीर्ष सहकारी संस्था बनने इस पर इफको ने कहा कि, ‘इफको राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय सहकारी गठबंधन (आईसीए) द्वारा प्रकाशित नौवीं वार्षिक विश्व सहकारी मॉनिटर रिपोर्ट के अनुसार, यह उद्यम के टर्नोवर और देश की संपत्ति को दर्शाता है।’ इफको ने एक बयान में कहा कि इस रिपोर्ट के सातवें संस्करण ने प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मुकाबले कारोबार के अनुपात के आधार पर इफको को दुनिया की शीर्ष सहकारी कंपनी बताया है। इस रिपोर्ट में प्रति व्यक्ति जीडीपी पर किए गए कारोबार को आधार बनाया गया है। प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के आधार पर कारोबार के हिसाब से श्रेणी तय करने का मतलब सहकारी संस्था के कारोबार को उस देश की क्रय शक्ति से संबंधित करना है जहां कंपनी परिचालन करती है। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर सर्वाधिक धान की खरीद छत्तीसगढ़ राज्य में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी अब तक सर्वाधिक धान खरीदी हो चुकी है। राज्य निर्माण के 20 वर्ष में इस साल सर्वाधिक धान खरीदी का रिकॉर्ड आज बन गया है। इस साल चालू धान खरीदी सीजन में 21 जनवरी तक 84 लाख 44 हजार मीट्रिक टन धान की खरीदी हो चुकी है, जो बीते वर्ष राज्य में क्रय किए गए कुल धान 83.94 लाख मीट्रिक टन से 50 हजार मीट्रिक टन अधिक है, जबकि धान खरीदी के लिए कुछ दिन अभी बाकी है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में राज्य में बीते 2 सालों में धान खरीदी की मात्रा और खेती-किसानी और किसानों की संख्या में लगातार रिकॉर्ड बढ़ोतरी कृषि प्रधान राज्य छत्तीसगढ़ के लिए एक शुभ संकेत है। यह भी पढ़ें : जनधन योजना : देश के 41 करोड़ लोगों को मिला योजना लाभ प्रदेश में कहां कितनी हुई धान की खरीद खरीफ वर्ष 2020-21 में 21 जनवरी 2021 तक राज्य के बस्तर जिले में एक लाख 20 हजार 471 मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। इसी प्रकार बीजापुर जिले में 55 हजार 401 मीट्रिक टन, दंतेवाड़ा जिले में 13 हजार 401 मीट्रिक टन, कांकेर जिले में 2 लाख 65 हजार 350 मीट्रिक टन, कोण्डागांव जिले में एक लाख 25 हजार 945 मीट्रिक टन, नारायणपुर जिले में 17 हजार 252 मीट्रिक टन, सुकमा जिले में 33 हजार 711 मीट्रिक टन, बिलासपुर जिले में 4 लाख 30 हजार 664 मीट्रिक टन, गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही 64 हजार 991 मीट्रिक टन, जांजगीर-चांपा जिले में 7 लाख 71 हजार 608 मीट्रिक टन, कोरबा जिले में एक लाख 15 हजार 821 मीट्रिक टन, मुंगेली जिले में 3 लाख 44 हजार 629 मीट्रिक टन खरीदी की गई है। इसी तरह रायगढ़ जिले में 4 लाख 98 हजार 428 मीट्रिक टन, बालोद जिले में 4 लाख 96 हजार 276 मीट्रिक टन, बेमेतरा जिले में 5 लाख 70 हजार 736 मीट्रिक टन, दुर्ग जिले में 3 लाख 81 हजार 633 मीट्रिक टन, कवर्धा जिले में 3 लाख 86 हजार 87 मीट्रिक टन, राजनांदगांव व जिले में 7 लाख 3 हजार 423 मीट्रिक टन, बलौदाबाजार जिले में 6 लाख 4 हजार 191 मीट्रिक टन, धमतरी जिले में 4 लाख 7 हजार 864 मीट्रिक टन, गरियाबंद जिले में 2 लाख 94 हजार 996 मीट्रिक टन, महासमुंद जिले में 6 लाख 38 हजार 190 मीट्रिक टन, रायपुर जिले में 4 लाख 68 हजार 276 मीट्रिक टन, बलरामपुर जिले में एक लाख 34 हजार 643 मीट्रिक टन, जशपुर जिले में एक लाख 273 मीट्रिक टन, कोरिया जिले में एक लाख 3 हजार 960 मीट्रिक टन, सरगुजा जिले में एक लाख 35 हजार 683 मीट्रिक टन और सूरजपुर जिले में एक लाख 59 हजार 690 मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। किसानों को कितनी मिली प्रोत्साहन राशि छत्तीसगढ़ सरकार की राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत राज्य में फसल उत्पादकता को बढ़ावा मिला है। चालू वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार इस योजना के तहत राज्य के 19 लाख किसानों को 5750 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि प्रदान कर रही है। अब तक राज्य के 19 लाख 54 हजार 332 किसानों ने समर्थन मूल्य पर धान बेच चुके हैं। कस्टम मिलिंग के लिए मिलर्स को 27 लाख 70 हजार 693 मीट्रिक टन धान का डी.ओ. जारी किया जा चुका है, जिसके विरूद्ध अब तक 25 लाख 45 हजार 512 मीट्रिक टन धान का उठाव कर लिया गया है। यह भी पढ़ें : कंबाइन हार्वेस्टर : खेती की लागत घटाएं, किसानों का मुनाफा बढ़ाएं किसानों की संख्या बढ़ी, धान की खरीद में हुआ इजाफा बता दें कि प्रदेश में वर्ष 2017-18 में जहां 56.88 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई थी। वहीं वर्ष 2018-19 में 80.83 लाख मीट्रिक तथा वर्ष 2019-20 में 83.94 लाख मीट्रिक टन धान समर्थन मूल्य पर क्रय किया गया था। पंजीकृत किसानों की संख्या में भी साल-दर-साल बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2017-18 में धान बेचने के लिए पंजीकृत कृषकों की संख्या 15.77 लाख थी, वह वर्ष 2018-19 में बढक़र 16.96 लाख तथा वर्ष 2019-20 में बढक़र 19.55 लाख हो गई थी। इस साल समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिए पंजीकृत किसानों की संख्या में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है, जो 21.52 लाख है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

नौकरी छोड़ अपनाई बांस की खेती, आज सालाना कमा रहे एक करोड़

नौकरी छोड़ अपनाई बांस की खेती, आज सालाना कमा रहे एक करोड़

जानें, कैसे करें बांस की खेती ताकि हो मोटी कमाई? बांस की खेती ने महाराष्ट्र के उस्मानाबाद के रहने वाले राजशेखर की तकदीर ही बदल दी। कभी वह 2 हजार की नौकरी करके अपना गुजारा करते थे। पर आज बांस की खेती कर सालाना एक करोड़ रुपए से ज्यादा का टर्नओवर कर रहे हैं। राजशेखर की कामयाबी से प्रभावित होकर दूर-दूर से लोग उनके खेत में लगे बांस के पौधों को देखने के लिए आते हैं और बांस की खेती के तरीके की जानकारी लेते हैं। बता दें कि राजशेखर एक किसान परिवार से संबंध रखते हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रैक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 अन्ना हजारे के संपर्क में आए, खेेती और जल संरक्षण के गुर सीखे मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार राजशेखर बताते हैं कि उनके पास 30 एकड़ जमीन भी थी। लेकिन, पानी की कमी के चलते उपज अच्छी नहीं होती थी। तब न तो बिजली थी, न ही हमें सिंचाई के लिए पानी मिल पाता था। इसलिए हमारे गांव का नाम निपानी पड़ गया। मैंने अपनी तरफ से नौकरी की पूरी कोशिश की, लेकिन जब कहीं मौका नहीं मिला तो अन्ना हजारे के पास रालेगण चला गया। उन्हें गांव में काम करने के लिए कुछ युवाओं की जरूरत थी। वहां भी मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ। अन्ना से बहुत मिन्नत की तो मुझे पानी और मिट्टी के संरक्षण का काम दिया गया। दो हजार रुपए महीने की तनख्वाह थी। चार-पांच साल तक वहां काम किया। तनख्वाह कम थी, लेकिन इस दौरान मुझे खेती और जल संरक्षण को लेकर काफी कुछ सीखने को मिला। ऐसे की बांस की खेती की शुरुआत, पहले साल ही टर्नओवर पहुंचा 20 लाख राजशेखर के अनुसार जब वे 30 साल थे तब एक दिन खबर मिली कि उनके पिता को पैरालिसिस हो गया है। इसके बाद वह अपने गांव लौट आए। यहां आकर फिर से खेती करने का विचार किया। इसी बीच उन्हें पता चला कि पास के गांव में एक किसान अपनी बांस की खेती को उजाडऩा चाहता है। उसे बांस की खेती में फायदा नहीं हो रहा था। उन्होंने वहां से बांस के 10 हजार पौधे उठा लिए और अपने खेत में लगा दिए। तीन साल बाद जब बांस तैयार हुए तो हाथों-हाथ बिक गए। इसका सत्कारात्मक परिणाम यह निकला कि बांस की खेती से पहले ही साल टर्नओवर 20 लाख रुपए पहुंच गया। आज खेत में उगा रखें हैं 50 तरह के बांस पहले ही साल अच्छी कमाई होने से राजशेखर का कॉन्फिडेंस बढ़ गया। अगले साल उन्होंने पूरे खेत में बांस के पौधे लगा दिए। सिंचाई के लिए गांव के 10 किलोमीटर लंबे नाले की सफाई करवाई। उसे खोदकर गहरा किया ताकि बारिश का पानी जमा हो सके। इससे उन्हें सिंचाई में भी मदद मिली और गांव को पानी का एक सोर्स भी मिल गया। उनके आसपास के लोग बताते हैं कि रोजाना कम से कम 100 लोग उनसे मुलाकात करने और सलाह लेने आते हैं। राजशेखर ने बांस की 50 से ज्यादा किस्में लगा रखी हैं। इनमें कई विदेशी वैराइटी भी हैं। महाराष्ट्र के साथ-साथ दूसरे राज्यों से भी लोग उनके यहां बांस खरीदने आते हैं। उन्होंने एक नर्सरी का सेटअप भी तैयार किया है, जिसमें बांस की पौध तैयार की जाती है। यह भी पढ़ें : गणतंत्र दिवस पर महिंद्रा लेकर आया किसानों के लिए खास ऑफर किसानों को देते हैं ट्रेनिंग, मिल चुके हैं कई पुरस्कार और सम्मान बांस की खेती के साथ-साथ राजशेखर किसानों को इसकी ट्रेनिंग भी देते हैं। कुछ साल पहले उन्हें नागपुर में हुई एग्रो विजन कांफ्रेंस में भी बुलाया गया था। राजशेखर इंडियन बैंबू मिशन के एडवाइजर के तौर पर भी काम कर चुके हैं। उन्हें कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। अभी उनके यहां 100 से ज्यादा लोग काम करते हैं। ये लोग खेती के अलावा मार्केटिंग और ट्रांसपोर्टेशन का भी काम देखते हैं। ऐसे करें बांस की खेती राजशेखर के अनुसार बांस की खेती के लिए किसी खास जमीन की जरूरत नहीं होती है। आप ये समझ लीजिए कि जहां घास उग सकती है, वहां बांस की भी खेती हो सकती है। इसके लिए बहुत देखभाल और सिंचाई की भी जरूरत नहीं होती है। जुलाई में बांस की रोपाई होती है। अमूमन बांस तैयार होने में तीन साल लगते हैं। इसकी खेती के लिए सबसे जरूरी है, उसकी वैराइटी का चयन। अलग-अलग किस्म के बांस का उपयोग और मार्केट रेट अलग होता है। बांस का पौधा तीन-चार मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इसके बीच की जगह पर दूसरी फसल की खेती भी की जा सकती है। बांस की खेती के लिए राष्ट्रीय बैंबू मिशन से भी मदद ली जा सकती है। इसके तहत हर राज्य में मिशन डायरेक्टर बनाए गए हैं। बांस की चीजों की है बाजार में मांग आजकल मार्केट में बांस की खूब डिमांड है। गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी बांस से बने प्रोडक्ट की मांग है। लोग घर की सजावट और नया लुक देने के लिए बांस से बने प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। बांस से बल्ली, सीढ़ी, टोकरी, चटाई, फर्नीचर, खिलौने तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा कागज बनाने में भी बांस का उपयोग होता है। राजशेखर बताते हैं कि अभी देश में बांस एक बड़ी इंडस्ट्री के रूप में उभर रहा है। बहुत कम लोग हैं जो बांस की खेती कर रहे हैं। जो कर रहे हैं, वे इसे बिजनेस के लिहाज से नहीं कर रहे हैं। यह भी पढ़ें : कंबाइन हार्वेस्टर : खेती की लागत घटाएं, किसानों का मुनाफा बढ़ाएं एक एकड़ में 10 हजार का खर्चा, कमाई तीन लाख तक एक एकड़ खेत में बांस लगाने के लिए 10 हजार के आसपास का खर्च आता है। तीन-चार साल बाद इससे प्रति एकड़ तीन लाख रुपए की कमाई हो सकती है। एक बार लगाया हुआ बांस, अगले 30-40 साल तक रहता है। बाजार में बांस की कीमत बांस की कीमत उसकी क्वालिटी पर निर्भर होती है। उसी के मुताबिक बांस से आमदनी होती है। क्वालिटी के मुताबिक एक बांस की कीमत 20 रुपए से लेकर 100 रुपए तक मिल सकती है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें 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