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चने की फसल को फली छेदक व झुलसा रोग से बचाएं, ये उपाय अपनाएं

चने की फसल को फली छेदक व झुलसा रोग से बचाएं, ये उपाय अपनाएं

फसल कीट व रोग प्रबंधन : जानें, कौन-कौन से रोग चने की फसल को कर सकते हैं खराब और क्या करें उपाय

फसलों में कीट व रोगों का प्रकोप हर मौसम में देखने को मिलता है। लेकिन सर्दियों में तापमान कम रहने से फसलों में कीट व रोग लगने की ज्यादा संभावना रहती है। यदि समय पर इन कीटों व रोगों पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो उत्पादन में कमी आ जाती है। यही नहीं कई बार इन कीटों व रोगों की वजह से पूरी की पूरी फसल चौपट हो जाती है। इसलिए इसका समय रहते नियंत्रण करना बहुत ही आवश्यक हो जाता है। आज हम बात करेंगे चने की फसल पर फली छेदक कीट व झुलसा रोग प्रबंधन पर। इस समय देश के कई भागों में चने की फसल लगी हुई है। रबी फसलों में गेहूं के बाद चना ही सबसे महत्वपूर्ण फसल माना गया है। इसके बाजार में भाव भी अच्छे मिलते हैं।

 

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फली छेदक

यह एक हरे रंग की लटें होती हैं, जो 1.25 इंच लंबी होती है, जो बाद में भूरे रंग की हो जाती है। शुरुआत में चने की पत्तियों को खाती हैं। इसके बाद फली लगने पर उनमें छेद कर दाने को खोखला कर देती हैं। इससे दाना नहीं बन पाता और फसल खराब होने लगती है।

 


रोकथाम के उपाय

  • जैविक नियंत्रण हेतु जनवरी-फरवरी माह से 5-6 फेरोमेन ट्रेप प्रति हैक्टेयर में लगावें। एक या अधिक फलीछेदक की तितलियां (दो से तीन दिन लगातार) आने पर 5-8 दिन के बीच पहला छिडक़ाव करें।
  • चने में फली छेदक कीड़े के नियंत्रण हेतु लगभग 50 प्रतिशत फूल आने पर एनपीवी 250 एलई एक मिलीलीटर दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।
  • दूसरा छिडक़ाव 15 दिन बाद बीटी 750 मिली लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से करें।
  • तीसरा छिडक़ाव आवश्यक हो तो एनपीवी का उपयोग करें।
  • जैविक नियंत्रण हेतु करीब 50 प्रतिशत फूल आने पर एजेडिरेक्टिन (नीम का तेल) 700 मिलीलीटर प्रति हैक्टेयर की दर से घोल बनाकर छिडक़ाव करें।
  • रासायनिक नियंत्रण हेतु फूल आने से पहले तथा फली लगने के बाद मैलाथियॉन 5 प्रतिशत चूर्ण का 20-20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करें। कीट प्रकोप दिखाई देते ही एसीफेट 75 एस.पी. 500 ग्राम दवा का आवश्यकतानुसार पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव करे या इंडोक्सीकार्ब 14.5 एस.सी. 1 मिलीलीटर प्रति लीटर या ईमामेक्टिन बेन्जोएट 5 एस.जी. 0.5 ग्राम प्रति लीटर में घोल बनाकर छिडक़ाव करें।

 

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कटवा सुंडी

कटवा सुंडी उगते पौधों के तनों को या शाखाओं को काटकर नुकसान पहुचातें है। इसकी रोकथाम के लिए 0.4 प्रतिशत फैनबालरेट पाउडर 10 कि.ग्रा. के हिसाब से घुडा करें। हैलियोथिस, पत्तों, फुलों, फलियों को खा जाने वाली संडी है। रोकथाम के लिए 400 मि.ली. ऐंडोसल्फान 37 ई सी को 100 लीटर पानी में घोलकर छिडक़े तथा 151 दिन बाद फिर छिडक़ाव करें।


झुलसा रोग

निचली पत्तियों का पीला पडक़र झडऩा व फलियों का कम बनना व छिदा या विरल होना इस रोग के विशिष्ट लक्षण हैं। प्रारंभ में पत्तियों पर जलसंतृप्त बैंगनी रंग के धब्बे बनते हैं, जो बाद में बड़े होकर भूरे हो जाते हैं। फूल मर जाते हैं और फलियां बहुत कम बनती हैं।

 

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रोकथाम के उपाय

झुलसा रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैन्कोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिडक़ाव करना चाहिए।


चने में अन्य फंफूदी जनित रोग

चांदनी ( एस्कोकाइटा ब्लाइट ) -

चना में एस्कोकाइटा पत्ती धब्बा रोग एस्कोकाइटा रेबि नामक फफूंद द्वारा फैलता है। उच्च आर्द्रता और कम तापमान की स्थिति में यह रोग फसल को क्षति पहुंचाता है। पौधे के निचले हिस्से पर गेरूई रंग के भूरे कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और संक्रमित पौधा मुरझाकर सूख जाता है। पौधे के धब्बे वाले भाग पर फंफूद के फलनकाय (पिकनीडिया) देखे जा सकते हैं। ग्रसित पौधे की पत्तियों, फूलों और फलियों पर हल्के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।


रोकथाम के उपाय

चना में केप्टान या मेंकोजेब या क्लोरोवेलोनिल 2 से 3 ग्राम प्रति लीटर पानी का 2 से 3 बार छिडक़ाव करने से रोग को रोका जा सकता है।


धूसर फफूंद ( बोट्राइटिस ग्रेमोल्ड )

यह रोग चना में वोट्राइटिस साइनेरिया नामक फंफूद से होता है। अनुकूल वातावरण होने पर यह रोग आमतौर पर पौधों में फूल आने और फसल के पूर्णरूप से विकसित होने पर फैलता है। वायुमंडल और खेत में अधिक आर्द्रता होने पर पौधों पर भूरे या काले भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। फूल झड़ जाते हैं और संक्रमित पौधों पर फलियां नहीं बनती हैं। शाखाओं एवं तनों पर जहां फंफूद के संक्रमण से भूरे या काले धब्बे पड़ जाते हैं, उस स्थान पर पौधा गल या सड़ जाता है। तंतुओं के सडऩे के कारण टहनियां टूटकर गिर जाती हैं और संक्रमित फलियों पर नीले धब्बे पड़ जाते हैं। फलियों में दाने नहीं बनते हैं, और बनते भी है तो सिकुड़े हुए होते हैं। संक्रमित दानों पर भूरे व सफेद रंग के कवक तन्तु दिखाई देते हैं।

 

रोकथाम के उपाय

रोग के लक्षण दिखाई देते ही तुरंत केप्टान या काबेंडाजिम या मेंकोजेब या क्लोरोथेलोनिल का 2 से 3 बार एक सप्ताह के अंतराल पर छिडक़ाव करना चाहिए ताकि इस रोग के प्रकोप से फसल को बचाया जा सके।


हरदा रोग

चना का यह रोग यूरोमाईसीज साइसरीज (एरोटीनी) नामक फंफूद से होता है। पौधों में वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा होने, मिट्टी में नमी बहुत बढ़ जाने और वायुमंडलीय तापमान बहुत गिर जाने पर इस रोग का आक्रमण होता है। पौधों के पत्तियों, तना, टहनियों और फलियों पर गोलाकार प्यालिनुमा सफेद भरे रंग का फफोले बनते हैं। बाद में तना पर के फफोले काले हो जाते हैं एवं पौधे सूख जाते हैं। इस रोग से 80 प्रतिशत तक क्षति पाई गई है।


रोकथाम के उपाय

फंफूद के उपयुक्त वातावरण बनते ही मेनकोजेब 75 प्रतिशत घुलन चूर्ण 2 किलोग्राम का सज्ञात्मक छिडक़ाव करना चाहिए।


स्टेमफिलियम ब्लाईट

चना में यह रोग स्टेमफिलियम सरसिनीफार्म नामक फंफूद से होता है, पत्तियों पर बहुत छोटे भूरे काले रंग के धब्बे बनते हैं। पहले पौधे के निचले भाग की पत्तियां प्रभावित होकर झड़ती हैं और रोग ऊपरी भाग पर बढ़ते जाता है। खेत में यह रोग एक स्थान से शुरू होकर धीरे-धीरे चारों ओर फैलता है। तीव्र आक्रमण की अवस्था में पत्तियां झड़ जाती हैं एवं फलन नहीं हो पाता है।


रोकथाम के उपाय

रोग के लक्षण दिखाई देने के साथ ही शुरू में ही प्रभावित पौधों को फसल से निकाल कर जला देना चाहिए ताकि रोग फैल नहीं पाए। वहीं इसके रासायनिक नियंत्रण के लिए मैनकोजेब 75 प्रतिशत 2 किलोग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराईड 50 प्रतिशत 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सुरक्षात्मक छिडक़ाव करना चाहिए।


पाले से फसल का बचाव

चने की फसल में पाले के प्रभाव के कारण काफी क्षति हो जाती है। पाले के पडऩे की संभावना दिसंबर-जनवरी में अधिक होती है। पाले के प्रभाव से फसल को बचाने के लिए फसल में गंधक के तेजाब की 0.1 प्रतिशत मात्रा यानि एक लीटर गन्धक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिडक़ाव करना चाहिए। पाला पडऩे की संभावना होने पर खेत के चारों और धुआं करना भी लाभदायक रहता है।

 

 

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