मटर की फसल : कम समय और कम लागत में ज्यादा मुनाफा

मटर की फसल : कम समय और कम लागत में ज्यादा मुनाफा

Posted On - 06 Nov 2020

मटर की खेती : नवंबर में बोएं मटर, जनवरी-फरवरी में काटे मुनाफे की फसल

सर्दियों के दिनों में मटर की सब्जी लोगों की पहली पसंद रहती है। दलहनी सब्जियों में मटर पहले स्थान पर है। सब्जी वाली मटर के ताजे हरे दानों से अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं और इन ताजे हरे दानों को कोल्ड स्टोरेज में रखकर लंबे समय तक प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके अलावा मटर दाल भी खाने में काम आती है। मटर के सूखे दानों में औसतन 22 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। मटर की फसल कम समय और कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने के कारण किसानों की प्रमुख पसंद है। किसान नवंबर माह में मटर की फसल की बुवाई करके जनवरी और फरवरी के माह में मुनाफे की फसल काट सकते हैं। वैसे तो मटर की फसल हर तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी सबसे ज्यादा उपयुक्त होती है। जिसका पीएच मान 6 से 7.5 के बीच हो। वहीं अम्लीय भूमि मटर की खेती के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं मानी जाती है।

 

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मटर की खेती के लिए सही समय

मटर की खेती के लिए नम और ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है। इसलिए अक्टूबर और नवंबर माह का समय उपयुक्त रहता है। हमारे देश के अधिकांश हिस्सों में मटर की फसल रबी के सीजन में उगाई जाती है। जिन स्थानों पर वार्षिक वर्षा 60 से 80 सेमी तक होती है उन स्थानों पर मटर की फसल सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। मटर बीज के अंकुरण के लिए न्यूनतम तापमान 5 डिग्री सेल्सियस और उपयुक्त तापमान 22 डिग्री सेल्सियस की आवश्यता होती है। मटर की वृद्धि काल में कम तापमान की आवश्यकता होती है। 


मटर की खेती के लिए भूमि का चयन ( pea cultivation )

मटर की खेती के लिए नमी युक्त सभी कृषि योग्य भूमि उपयुक्त रहती है। मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अधिक उत्तम होती हैं। मटर की खेती के लिए पी.एच.मान 6.0 और 7.5 के मध्य वाली भूमि श्रेष्ठ होती है। वहीं अम्लीय तथा क्षारीय मृदा में मटर की फसल फसल की अच्छी वृद्धि नही होती हैं। अच्छी फसल के लिए भूमि में जलनिकास का उत्तम प्रबंध होना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि मृदा में वायु का आवागमन भली प्रकार हो सके।


मटर उत्पादन के लिए भूमि की तैयारी 

मटर की फसल के लिए खरीफ की फसल से खेत खाली होते ही एक गहरी जुताई की जाती है। इसके बाद 3-4 बार हैरो या देशी हल से खेत की जुताई की जाती हैं। बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। नमी की कमी होने पर अंतिम जुताई से पहले पलेवा कर देना चाहिए।

 


खेत में मटर बोने की विधि और बीज उपचार

मटर की फसल के लिए एक हेक्टेयर खेत में लंबे पौधों वाली प्रजातियों की 80 से 100 किलोग्राम तथा बौनी प्रजातियों की 128 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बीज जनित रोगों से बचाव के लिए 2 ग्राम थीरम एवं 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज अथवा 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित करत हैं। इसके बाद बीज के मटर को विशेष राइजोबियम कल्चर से 200 ग्राम प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर छाया में सुखाने के बाद बोया जाता है। खेत में मटर की अधिकांश बुवाई हल द्वारा कूंडों में की जाती हैं। बुवाई के लिए सीडड्रिल मशीन का उपयोग किया जाता है। पौधों के बीच का अंतर 6-7 से.मी. रखते हैं। बीज को 4-5 से.मी. गहराई पर बोते हैं।


मटर की उन्नत किस्में 

यहां आपको राज्यों के अनुसार मटर की उन्नत किस्में बताई जा रही है। 

  • राजस्थान :  डी एम आर- 7 (अलंकार) और पंत मटर- 42 आदि प्रमुख है।
  • गुजरात :  जे पी- 885, आई पी एफ डी- 10-12, इन्द्रा और प्रकाश आदि प्रमुख है।
  • मध्यप्रदेश :  प्रकाश (आई पी एफ डी-1-10) और विकास (आई पी एफ डी- 99-13) आदि प्रमुख है।
  • बिहार : डी डी आर- 23 (पूसा प्रभात) और वी एल मटर 42 आदि प्रमुख है।
  • छत्तीसगढ़ : शुभ्रा (आई एम- 9101), विकास (आई पी एफ डी- 99-13), पारस और प्रकाश आदि प्रमुख है।
  • महाराष्ट्र :  जे पी- 885, अंबिका, इंद्रा (के पी एम आर- 400), आदर्श (आई पी एफ- 99-25) और आई पी एफ डी-10-12 आदि प्रमुख है।
  • पंजाब : जय (के पी एम आर- 522), पंत मटर- 42, के एफ पी- 103, उत्तरा (एच एफ पी- 8909) और अमन (आई पी एफ- 5-19) आदि प्रमुख है।
  • हरियाणा :  उत्तरा (एच एफ पी- 8909), डी डी आर- 27 (पूसा पन्ना), हरीयाल (एच एफ पी- 9907 बी), अलंकार, जयंती (एच एफ पी- 8712) और आई पी एफ- 5-19 आदि प्रमुख है।
  • उत्तरप्रदेश :  स्वाती (के पी एफ डी- 24), मालवीय मटर (एच यू डी पी- 15), विकास, सपना, (के पी एम आर- 1441) और आई पी एफ- 4-9 आदि प्रमुख है। 


मटर की फसल के लिए खाद एवं उवर्रक 

मटर की फसल दलहनी वर्ग में आती है। इसलिए इसमें नत्रजन की विशेष आवश्यकता नही होती हैं। प्रारंभ में राइजोबियम बैक्टीरिया के क्रियाशील होने तक 20-30 कि. ग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती हैं। इसके अतिरिक्त 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 40-50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना आवश्यक हैं। गोबर की खाद 20 टन प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि की तैयारी के समय ही देना लाभदायक रहता हैं।  उर्वरक सदैव बीज की कतारों से 5 से.मी. की दूरी पर बीज सतह से 3-4 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिए। फास्फेट उर्वरक उपज में वृद्धि के साथ गुणवत्ता में भी वृद्धि करता हैं। पोटाषिक उर्वरक भी उपज में वृद्धि तथा नत्रजन स्थिरीकरण में सहायता करते हैं। 


मटर की खेती में सिंचाई / मटर की सिंचाई

मटर की खेती में दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई फूल निकलते समय बोने के 45 दिन बाद व दूसरी सिंचाई आवश्यकता पडऩे पर फल बनते समय, बोने के 60 दिन बाद करनी चाहिए। सिंचाई सदैव हल्की करनी चाहिए। स्प्रिंकलर सिस्टम का प्रयोग सिंचाई के लिए उपयुक्त होता हैं। मटर की खेती में शीतकालीन वर्षा हो जाने पर दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।


मटर की फसल की निराई-गुड़ाई 

मटर की फसल में 1-2 बार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है जो कि फसल की किस्म पर निर्भर करती है। पहली निराई व गुड़ाई, जब पौधों में तीन-चार पत्ते हों या बिजाई से 3-4 सप्ताह बाद करें। दूसरी, फूल आने से पहले करें। खेत की मेढ़ों पर पाए जाने वाले वार्षिक घास वाले और चौड़ी पत्तों वाले खरपतवारों की रोकथाम उनको नष्ट करने के उपरांत की जा सकती है।


मटर की फसल में रोग और बचाव के उपाय

मटर की फसल में कई तरह के रोग लगते हैं। समय पर बचाव के उपाय करने पर किसानों को नुकसान नहीं होता है। यहां पर प्रमुख रोगों के बारे में बताया जा रहा है।

1. चूर्णी फफूंदी रोग (पाउडरी मिल्डयू) 

यह रोग एरीसाइफी पालीगोनी नामक फफूंदी से लगता हैं। यह रोग अधिकतर नम मौसम में होता है। पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसी रचना दिखाई देती हैं। पछेती किस्मों में इसका प्रभाव गंभीर रूप से होता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए 3 किलोग्राम घुलनशील गंधक या सल्फेक्स को 1000 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टेयर में छिडक़ाव करें। यदि आवश्यकता हो तो 15 दिन बाद दूसरा छिडक़ाव करें। 

2. गेरूई रोग (रस्ट)

यह रोग यूरोमाइसीज फेबी नामक फफूंदी से पनपता है। यह रोग कभी-कभी फसल को बहुत अधिक क्षति पहुंचाता हैं। इसे रोकने के लिए रोग रोधी किस्मों को ही खेत में उगाना चाहिए। इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 या डाइथेन जेड-78 के 2.25 कि.ग्रा. को 1000 ली. पानी में घोलकर, प्रति हैक्टेयर छिडक़ाव करना चाहिए।


मटर में हानिकारक कीट एवं उनकी रोकथाम 

1. एफिड 

ये जनवरी माह के आखिरी सप्ताह में दिखाई देने लगते हैं और वयस्क दानों व पत्तियों के रस को चूसते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इमीडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिडक़ाव करना चाहिढ7 इसके अलावा रोटेनोन या रोटेनोन निकोटिन का छिडक़ाव किया जा सकता है।

2. तना छेदक 

यह कीट मटर की अगेती फसल को बहुत अधिक हानि पहुंचाता है। यह कीड़ा मुलायम हरे तने तथा पीटिओल में छेद करके अंदर सुंरग बनाता हैं। जिससे पौधे सूखकर मर जाते हैं। वयस्क कीट पत्तियों को नुकसान पहुंचाता हैं। पत्तियां पीली तथा सूख जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए मटर को नवंबर में बोना चाहिए तथा ट्राइजोफास 0.75-1.00 मि.ली./ली. पानी से सप्ताहिक अंतराल से दो बार छिडक़ाव करना चाहिए अथवा बीज का उपचार क्लोरपाईरीफास (5 मिली./कि.बीज) से करके बुवाई करनी चाहिए।

3. फली छेदक

इन कीटों की इल्लियां फली में छेद करके उसमें हरे दानों को खा जाती हैं। इसके लिए ट्राइजोफास 1.00 मि.ली./ली. या प्रोफेनोफास 0.75-1.00 मिली./ली. पानी की दर से छिडक़ाव करना चाहिए।


मटर की फलियों की तुड़ाई / मटर की तुड़ाई

सब्जी के लिए नवबर माह में बोई गई फसल जनवरी के मध्य से फरवरी के अंत तक फलिया देती हैं। फलियों को 10-12 दिन के अंतर पर 3-4 बार में तोडऩा चाहिए। अगेती प्रजातियां जैसे अर्किल दिसंबर के अंत तक फलियां देने लगती हैं। फलियों से सब्जियों के लिए तोड़ते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि फलियों में दाने पूर्णतया भर गए हों और फलियों के छिलके का रंग हरा हो। छिलके का रंग पीला पडऩे पर बाजार में फलियों की कीमत कम मिलती हैं। 

 

मटर की फसल की उपज 

मटर की अगेती फसल में हरी फलियों की पैदावार 40-50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है। वहीं मध्यम तथा पछेती फसल से 60-70 क्विंटल/हैक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती हैं तथा फलियां तोडऩे के पश्चात् 150 क्विंटल प्रति हैैक्टेयर हारा चारा प्राप्त होता है।

 

 

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