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पपीते की खेती : एक सीजन में कमाएं 10 लाख रुपए, इन किस्मों का करें चयन

पपीते की खेती : एक सीजन में कमाएं 10 लाख रुपए, इन किस्मों का करें चयन

23 September, 2020

जानें कैसे करें पपीते की उन्‍नत खेती  ( Papita ki Kheti )

फलों में पपीते का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह फल कच्चा और पकाकर दोनों तरीके से उपयोग में लाया जाता है। भारत में अधिकांश हिस्सों में इसकी खेती की जाती है। पपीते में भरपूर मात्रा में विटामिन ए पाया जाता है। जिन लोगों को अपच की समस्या है उनके लिए तो पपीता रामबाण इलाज है। इसके सेवन से अपच की समस्या खत्म हो जाती है। ये फल पित्त का शमन तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है। इसलिए जब हम बीमार हो जाते हैं तो डाक्टर भी हमें पपीता खाने की सलाह देता है।

इसमें पर्याप्त मात्रा में पानी होता है जो त्वचा को नम रखने में सहायक होता है। इसके अलावा पपीते का इस्तेमाल घरेलू सौंदर्य प्रसाधन में भी किया जाता है। कई लोग पपीते के गूदे को चहरे पर लगाते हैं जिससे चहरे पर निखार आता है और त्वचा में नमी बनी रहती है। पपीते का सौंदर्य जगत तथा उद्योग जगत में व्यापक प्रयोग किया जाता है। यदि इसकी उन्नत तरीके की खेती की जाए तो कम लागत पर अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। यही नहीं इसकी खेती के साथ ही इसकी अंत:वर्तीय फसलों को भी बोया जा सकता है। इनमें दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि की फसल इसके साथ ली जा सकती है लेकिन ध्यान रखें इसके साथ मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिंडी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंत:वर्तीय फसलों के रूप में नहीं उगाना चाहिए। इससे पपीते के पौधे को हानि होती है। 

 

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पपीते में पाए जाने वाले पोषक तत्व

पपीते का वानस्पतिक नाम केरिका पपाया है। पपीता कैरिकेसी परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य है। पपीता एक बहुलिडीस पौधा है तथा मुरकरटय से तीन प्रकार के लिंग नर, मादा तथा नर व मादा दोनों लिंग एक पेड़ पर होते हैं। इसमें विटामिन ए पाया जाता है। कच्चे फल से पपेन बनाया जाता है। इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है। पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है। 

 

भारत में कहां - कहां होती है इसकी खेती

देश की विभिन्न राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिज़ोरम में इसकी खेती की जाती है। अब तो पूरे भारत में इसकी खेती की जाने लगी है। 

 

 

पपीते की उन्नत किस्में

 

पूसा डोलसियरा

यह अधिक ऊपज देने वाली पपीते की गाइनोडाइसियश प्रजाति है। जिसमें मादा तथा नर-मादा दो प्रकार के फूल एक ही पौधे पर आते हैं पके फल का स्वाद मीठा तथा आकर्षक सुगंध लिये होता है। इस किस्म से करीब 40-45 किग्रा प्रति पेड़ उपज प्राप्त की जा सकती है। 

 

पूसा मेजेस्टी

यह भी एक गाइनोडाइसियश प्रजाति है। इसकी उत्पादकता अधिक है, तथा भंडारण क्षमता भी अधिक होती है। यह पूरे भारत वर्ष में उगाई जा सकती है। इसकी उपज की बात करें तो इसकी उपज 35-40 किग्रा प्रति पेड़ प्राप्त की जा सकती है।
इसके अलावा इसकी अन्य किस्मों में पूसा जॉयंट जिससे प्रति पेड़ 30-35 किग्रा उपज प्रति पेड़, पूजा ड्वार्फ़ किस्म जिससे 40-45 किग्रा उपज प्रति पेड़ तथा पूसा नन्हा किस्म जिससे 25-30 किलोग्राम उपज प्रति पेड़ प्राप्त की जा सकती है। 

 

पपीते की संकर किस्म- रेड लेडी 786

पपीते की एक नई किस्म पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा विकसित की गई है, जिसे रेड लेडी 786 नाम दिया है। यह एक संकर किस्म है। इस किस्म की खासियत यह है कि नर व मादा फूल ही पौधे पर होते हैं, लिहाजा हर पौधे से फल  मिलने की गारंटी होती है। पपीते की अन्य किस्मों में नर व मादा फूल अलग-अलग पौधे पर लगते हैं, ऐसे में फूल निकलने तक यह पहचानना कठिन होता है कि कौन सा पौधे नर है और कौन सा मादा। इस नई किस्म की एक ख़ासियत यह है कि इसमें साधारण पपीते में लगने वाली पपायरिक स्काट वायरस नहीं लगता है। यह किस्म सिर्फ 9 महीने में तैयार हो जाती है। इस किस्म के फलों की भंडारण क्षमता भी ज्यादा होती है। पपीते में एंटी आक्सीडेंट पोषक तत्व कैरोटिन,पोटैशियम,मैग्नीशियम, रेशा और विटामिन ए, बी, सी सहित कई अन्य गुणकारी तत्व भी पाए जाते हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। इसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, झारखंड और राजस्थान में भी उगाया जा रहा है।

 

पपीते की खेती का उचित समय

वैसे तो इसकी खेती साल के बारहों महीने की जा सकती है लेकिन इसकी खेती का उचित समय फरवरी और मार्च एवं अक्टूबर के मध्य का माना जाता है, क्योंकि इस महीनों में उगाए गए पपीते की बढ़वार काफी अच्छी होती है।

 

पपीते की खेती के लिए जलवायु व भूमि

पपीते की अच्छी खेती गर्म नमी युक्त जलवायु में की जा सकती है। इसे अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है, न्यूनतम 5 डिग्री सेल्सियस से कम नही होना चाहिए लू तथा पाले से पपीते को बहुत नुकसान होता है। पपीता बहुत ही जल्दी बढऩे वाला पेड़ है। साधारण ज़मीन, थोड़ी गर्मी और अच्छी धूप मिले तो यह पेड़ अच्छा पनपता है, पर इसे अधिक पानी या ज़मीन में क्षार की ज़्यादा मात्रा रास नहीं आता है। वहीं पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी. एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है।

 

 

पपीता की नर्सरी कैसे तैयार करें / पौधे तैयार करना 

पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों का उगाना बहुत महत्व रखता है। इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम पर्याप्त होती है। बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे की जार या बोतल में रखा हो जिसका मुंह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है। बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को उपचारित करना चाहिए।

बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊंची उठी हुई संकरी होनी चाहिए इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं। इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू, तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्र में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं। जिस स्थान पर नर्सरी हो उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ़ कर देना चाहिए तथा जमीन को 2 प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए। वह स्थान जहां तेज धूप तथा अधिक छाया न आए चुनना चाहिए।

एक एकड़ के लिए 4059 मीटर जमीन में उगाए गए पौधे काफी होते हैं। इसमें 2.5 * 10 * 0.5 आकार की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें, और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें। इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2' गहराई पर 3' * 6' के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दे और फिर 1/2' गोबर की खाद के मिश्रण से ढक कर लकड़ी से दबा दें ताकि बीज ऊपर न रह जाए। यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें तो इनमें भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें। बोई गई क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह शाम होज द्वारा पानी दें। बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं। जब इन पौधों में 4-5 पत्तियां और ऊंचाई 25 से.मी. हो जाए तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सडऩ और उकठा रोग लग जाता है। उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल, जून-अगस्त में उगाने चाहिए।

 

खेत की तैयारी 

पौधे लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए ताकि पानी न भर सकें। फिर पपीता के लिए 50*50*50 सेमी आकार के गड्ढे 1.5*1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बी.एच.सी. 10 प्रतिशत डस्ट मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए। ऊंची बढऩे वाली किस्मों के लिए 1.8*1.8 मीटर फासला रखना चाहिए। पौधे 20-25 सेमी के फासले पर लगाने चाहिए। 

 

पपीते के रोपण 

आपने जो खेत में 2 *2 मीटर की दूरी पर 50*50*50 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदें थे उन्हें 15 दिनों के लिए खुले छोड़ दें ताकि ताकि गड्ढों को अच्छी तरह धूप लग जाए और हानिकारक कीड़े - मकोड़े व रोगाणु आदि नष्ट हो जाएं। इसके बाद पौधे का रोपण करना चाहिए। पौधे लगाने के बाद गड्ढे को मिट्टी और गोबर की खाद 50 ग्राम एल्ड्रिन मिलाकर इस प्रकार भरना चाहिए कि वह जमीन से 10-15 सेंटीमीटर ऊंचा रहे। गड्ढे की भराई के बाद सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाए। पौधे लगाते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए जिससे पानी तने से न लगे। 

 

खाद व उर्वरक

  • पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है। इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरुरत है। अत: अच्छी फ़सल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फ़ॉस्फऱस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधे 20-25 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, एक किलोग्राम बोनमील और एक किलोग्राम नीम की खली की जरुरत पड़ती है। खाद की यह मात्र तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्टूबर महीनों में देनी चाहिए।
  • पपीता जल्दी बढऩे व फल देने वाला पौधा है, जिसके कारण भूमि से काफी मात्रा में पोषक तत्व निकल जाते हैं। लिहाजा अच्छी उपज हासिल करने के लिए 250 ग्राम नाइट्रोजन, 150 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे हर साल देना चाहिए। नाइट्रोजन की मात्रा को 6 भागों में बांट कर पौधा रोपण के 2 महीने बाद से हर दूसरे महीने डालना चाहिए।
  • फास्फोरस व पोटाश की आधी-आधी मात्रा 2 बार में देनी चाहिए। उर्वरकों को तने से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधे के चारों ओर बिखेर कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा फरवरी-मार्च और आधी जुलाई-अगस्त में देनी चाहिए। उर्वरक देने के बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।

 

सिंचाई व अन्य क्रियाएं

पपीता के पौधों की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिट्टी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्यत: शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीक अपना सकते हैं। इसके अलावा समय-समय पर इसके पौधों के आसपास उगने वाली खरपतवार को भी हटाते रहे। वैसे तो इसमें यह समस्या कम ही रहती है पर बारिश के दिनों में खरपतवार का उग जाती है इसे हटा देना चाहिए। इसके अलावा शीत ऋतु में पाले से बचाने के लिए खेत में धुआँ करना चाहिए तथा खेत में नमी बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। 

 

पपीते के कीट व नियंत्रण के उपाय 

एफिड - कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस गोसीपाई, माइजस परसिकी है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। तथा पौधे में मौजेक रोग के वाहक का कार्य करते है।
नियंत्रण का उपाय - मिथाइल डेमेटान या डायमिथोएट की 2 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर पौधरोपण के बाद आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतर से पत्तियों पर छिडक़ाव करना चाहिए।
लाल मकड़ी -  इसे वैज्ञानिक भाषा में ट्रेट्रानायचस सिनोवेरिनस कहते है। यह पपीते का प्रमुख कीट है जिसके आक्रमण से फल खुरदुरे और काले रंग के हो जाते है। तथा पत्तियां पर आक्रमण की स्थिति में फफूंद पीली पड़ जाती है।
नियंत्रण का उपाय - पौधे पर आक्रमण दिखते ही प्रभावित पत्तियों को तोडक़र दूर गड्ढे में दबा देना चाहिए। वेटेबल सल्फर 2.5 ग्राम/ ली. या डाइकोफॉल 18.5 ईसी की 2.5 मिली या ओमाइट 1.5 मिली मात्रा / ली. पानी में मिलाकर छिडक़ाव करना चाहिए।

 

पपीते की तुड़ाई कब करें

पपीत के पूर्ण रूप से परिपक्व फलों को जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डंठल सहित इसकी तुड़ाई करनी चाहिए। तुड़ाई के बाद स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लेना चाहिए तथा सड़े-गले फलों को अलग हटा देना चाहिए। 

 

पपीते के फलों से पपेन निकालने की विधि व उत्पादन

साधारणत: पपेन को पपीते के कच्चे फलों से निकला जाता है। पपेन के लिए 90-100 दिन विकसित कच्चे फलों का चुनाव करना चाहिए। कच्चे चुने हुए फलों से सुबह 3 मि.मी. गहराई के 3-4 चीरे गोलाई आकार में लगाने चाहिए। इसके पूर्व पौधों पर फलों से निकलने वाले दूध को एकत्रित करने के लिए प्लास्टिक के बर्तन को तैयार रखना चाहिए। फलों पर प्रथम बार के ( चीरा लगाने के बाद ) 3-4 दिनों बाद पुन: चीरा लगाकर पपेन एकत्रित करना चाहिए। पपेन (दूध) प्राप्त होने के बाद उसमे 0.5 प्रतिशत पोटेशियम मेन्टाबाई सल्फेट परिरक्षक के रूप में मिलाना चाहिए ताकि पपेन को 3-4 दिन तक सुरक्षित रखा जा सके। पपेन को अच्छी तरह सुखाकर पपेन को प्रसंस्करण केंद्र को भेजा जा सकता है।

इस प्रकार पपीते की पपेन के लिए उपयुक्त किस्मों सी ओ -2 एवं सी ओ - 5 के पौधों से 100 - 150 ग्राम पपेन प्रति पौधा प्रति वर्ष प्राप्त हो जाता है। इस पपेन को अच्छी तरह सूखाकर पैंकिंग किया जाता है। इस पपेन को अच्छी तरह सुखाकर प्राप्त पपेन को प्रसंस्करण के लिए संयंत्र महाराष्ट्र के जलगाँव तथा येवला ( नासिक ) को भेज जा सकता है। इससे आपको कमाई अच्छी कमाई होगी। इसके अलावा इन फलों से पपेन निकालने के बाद उनसे अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे टूटी फ्रूटी, मुरब्बा बनाया जा सकता है तथा चीरा लगे पके फलों का जैम जेली मुरब्बा रास या गुदा जिसे प्यूरी कहते है बनाकर डिब्बाबंद किया जा सकता है। बता दें कि भारत पपीता प्यूरी का एक बड़ा निर्यातक है। 

 

 

पपीते की प्राप्त उपज / पपीते की खेती से कमाई

आमतौर पर पपीते की उन्नत किस्मों से प्रति पौधे 35-50 किलोग्राम उपज मिल जाती है, जबकि इस नई किस्म से 2-3 गुणा ज्यादा उपज मिल सकती है। वहीं पपीते की प्रति हेक्टेयर राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता 317 क्विंटल / हेक्टेयर है। पपीते का एक स्वस्थ पेड़ आपको एक सीजन में करीब 40 किलो तक फल देता है। यदि आप दो पड़ों के बीच करीब 6 फिट का गैप रख सकते हैं और इस हिसाब से आप एक हेक्टेयर में करीब 2250 पेड़ तैयार कर सकते हैं। इस हिसाब से आप एक सीजन में एक हेक्टेयर पपीते की फसल से 900 क्विंटल पपीता पैदा कर सकते हैं। यदि आप संकर पपीते उगाते हैं तो आपको इस प्रकार कमाई प्राप्त हो सकती है-

कुल लागत= 165,400 रुपए आती है। 

कुल उत्पादन ( क्विंटल / हेक्टेयर)= 900

विक्रय से प्राप्त राशि = 405,000 रुपए  

लाभ लागत अनुपात = 2.44

पपीता की खेती से मुनाफा / शुद्ध लाभ= 1,94,600  

इस तरह आप यदि 5 हैक्टेयर में पपीते का उत्पादन करते हैं तो आपको 194600*5 = 9,73,000 रुपए प्राप्त होते हैं। इसके अलावा पपीते का पपेन बेचने से से होने वाली कमाई अलग है। इस प्रकार आप एक सीजन में 10 लाख रुपए तक की कमाई कर सकते हैं।

 

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विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित

विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित

सरकार ने जारी की अधिसूचना, किसानों को जल्द उपलब्ध होंगे इन फसलों के बीज भारत में कृषि उन्नत बनने को लेकर कृषि वैज्ञानिक फसलों की नई-नई किस्मों की पहचान करने में लगे हुए जिससे किसानों को सुरक्षित फसल का उत्पादन मिल सके और उत्पादन भी बेहतर हो। इसी कड़ी में हाल ही में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर ने विभिन्न फसलों की आठ नई किस्में विकसित की है जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसी के साथ भारत सरकार की केंद्रीय बीज उपसमिति ने इन विभिन्न फसलों की नवीनतम किस्मों को व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन के लिए अधिसूचित कर दिया है। बताया जा रहा है कि आगामी वर्षों में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित इन सभी नवीन किस्मों को व्यावसायिक खेती हेतु बीजोत्पादन कार्यक्रम में लिया जाएगा, जिससे इनका बीज प्रदेश के किसानों को उपलब्ध हो सकेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 कौन-कौनसी फसलों की है ये नई आठ किस्में धान : भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर द्वारा विकसित चावल की तीन नवीन किस्म- छत्तीसगढ़ राइस हाइब्रिड-2, बस्तर धान-1, प्रोटेजीन धान को विश्वविद्यालय की ओर से विकसित किया गया है। दलहन : दलहन की तीन नवीन किस्म विकसित की गई हैं। इनमें छत्तीसगढ़ मसूर-1, छत्तीसगढ़ चना-2, छत्तीसगढ़ अरहर-1 है। तिलहन : तिलहन की दो नवीन किस्म विकसित की गई हैं। इनमें छत्तीसगढ़ कुसुम-1 तथा अलसी की आर.एल.सी.-161 किस्मों को छत्तीसगढ़ राज्य में व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन हेतु अधिसूचित किया गया है। अलसी की नवीन किस्म आर.एल.सी. 161 छत्तीसगढ़ के अलावा पंजाब, हिमाचल और जम्मू कश्मीर राज्यों के लिए अनुशंसित की गई है। क्या है इन किस्मों की विशेषताएं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय विकसित विभिन्न फसलों की यह नवीन किस्में विशेष गुणधर्मों से परिपूर्ण है। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई इन किस्मों की विशेषताएं इस प्रकार से हैं- राइस हाइब्रिड-2 ये धान की नई तीन किस्मों में से एक है। इसकी उपज क्षमता 5144 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म छत्तीसगढ़ में सिंचित क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है। इस किस्म की पकने की अवधि 120-125 दिन है। इस किस्म का चावल लंबा-पतला होता है। यह किस्म झुलसन, टुंगरो वायरस एवं नेक ब्लास्ट रोगों के लिए सहनशील तथा गंगई के लिए प्रतिरोधी व पत्तिमोड़ रोग के प्रति सहनशील पाई गई है। बस्तर धान-1 यह विश्वविद्यालय द्वारा विकसित धान की बौनी किस्म है। इसका दाना लंबा एवं पतला होता है। इस किस्म की पकने की अवधि 105-110 दिनों की है। इसका औसत उत्पादन 4000-4800 किलोग्राम/हेक्टेयर है। यह किस्म हल्की एवं उच्चहन भूमि हेतु उपयुक्त है। प्रोटेजीन धान यह नवीन किस्म बौनी प्रजाति के धान की किस्म है जिसकी पकने की अवधि 124-128 दिनों की है। इसका दाना मध्यम लंबा व पतले आकार होता है। जिसमें जिंक की मात्रा 20.9 पी.पी.एम. तथा प्रोटीन का प्रतिशत 9.29 पाया गया है। इस किस्म की औसत उपज क्षमता 4500 किलोग्राम/हेक्टेयर है। छत्तीसगढ़ मसूर-1 दहलन की इस किस्म की उपज क्षमता 1446 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। मसूर की यह किस्म औसत 91 दिन (88 से 95 दिन) में पक कर तैयार हो जाती है। इसके पुष्प हल्के बैगनी रंग के होते है। इस किस्म के 100 दानों का औसत वजन 3.5 ग्राम (2.7 से 3.8 ग्राम) होता है। इस किस्म में दाल रिकवरी 70 प्रतिशत तथा 24.6 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। यह किस्म मसूर के प्रमुख कीटों के लिए सहनशील है। छत्तीसगढ़ चना-2 दलहन की नई किस्मों में चना की नवीन किस्म छत्तीसगढ़ चना-2 की उपज क्षमता छत्तीसगढ़ में 1732 किलोग्राम/हेक्टेयर पाई गई है। चने की यह किस्म औसत 97 दिनों (90-105 दिनों) में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म के 100 दानों का वजन 23.5 ग्राम (22.8 ग्राम से 24.0 ग्राम) है। यह किस्म उकठा रोग हेतु आंशिक प्रतिरोधी पाई गई है। छत्तीसगढ़ अरहर-1 दहलन की किस्मों में नई विकसित की गई छत्तीसगढ़ अरहर-1 किस्म की उपज क्षमता खरीफ में औसत उपज 1925 किलोग्राम/हेक्टेयर है तथा रबी में 1535 किलोग्राम/हेक्टेयर पाई गई है। अरहर की यह किस्म 165-175 दिन खरीफ में तथा 130-140 दिन रबी में पक कर तैयार हो जाती है। इसके सौ दानों का वजन करीब 9-10 ग्राम होता है। इस किस्म के पुष्प पीले लाल रंग के होते हैं। इस किस्म की दाल रिकवरी 65-75 प्रतिशत पाई गई है। राज्य स्तरीय परीक्षणों में यह किस्म उकठा हेतु आंशिक प्रतिरोधी है तथा इसमें फली छेदक रोग भी कम लगता है। छत्तीसगढ़ कुसुम-1 विश्वविद्यालय द्वारा विकसित तिलहन की दो नवीन किस्मों में से छत्तीसगढ़ कुसुम-1 को जननद्रव्य जी.एम.यू. 7368 से चयन विधि द्वारा विकसित किया गया। इस किस्म में तेल की मात्रा 31-33 प्रतिशत तक पाई जाती है तथा यह किस्म 115 से 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। इस किस्म से 1677 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर औसत उपज मिलती है। यह किस्म छत्तीसगढ़ में धान आधारित फसल चक्र में रबी सीजन हेतु उपयुक्त है। कुसुम की यह किस्म अल्टेनेरिया लीफ ब्लाइट बीमारी हेतु आंशिक प्रतिरोधी है। साथ ही जल्दी पकने के कारण इसकी फसल में एफिड कीट द्वारा कम नुकसान होता है। आर.एल.सी.-161 अलसी की यह नवीन किस्म वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त पाई गई है एवं विपुल उत्पादन देने में सक्षम है। इस किस्म को अखिल भारतीय समन्वय अलसी परियोजना के अंतर्गत विकसित किया गया है। यह किस्म देश के चार राज्यों छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू के लिए सिफारिश की गई है। विश्वविद्यालय द्वारा यह किस्म दो प्रजातियों आयोगी एवं जीस-234 से मिलाकर तैयार की गई है। जिसका औसत उत्पादन 1262 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और 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जानें कैसे हरियाणा के किसान ने पराली से कमाए दो करोड़ रुपये

जानें कैसे हरियाणा के किसान ने पराली से कमाए दो करोड़ रुपये

पराली प्रबंधन : आप भी कर सकते हैं पराली बेचकर कमाई, जानें कैसे? पंजाब व हरियाणा में पराली जलाने की समस्या किसानों के लिए ही नहीं, अपितु सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके लिए दोनों राज्यों की सरकारें किसानों को जागरूक करने के साथ ही पराली प्रबंधन के लिए अनुदान पर मशीनें भी उपलब्ध करा रही है ताकि पराली की समस्या से निबटा जा सके। इसी बीच हरियाणा के एक युवा किसान ने पराली की समस्या को ही उसका समाधान बना दिया। जी हां, ऐसा ही कुछ कर दिखाया है कैथल, हरियाणा के फर्श माजरा गांव के 32 वर्षीय किसान वीरेंद्र यादव ने। उन्होंने पराली को जलाने जगह उससे ही कमाई करना शुरू कर दिया। इनकी कहानी काफी दिलचस्प है और प्रेरणादायी भी। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सामने आई पराली प्रबंधन की समस्या आस्ट्रेलिया से भारत आए इस किसान ने खेती करना शुरू किया तो उसके सामने पराली की समस्या सामने आई। जिससे निबटने के लिए इसे जलाने जगह इसे बेचकर कमाई करने का विचार उनके मन में आया और यही से शुरू हुई इस युवा किसान की सफलता की कहानी, इनका मेहनत और प्रयास रंग लाया और इन्होंने पराली बेचकर मात्र एक साल में दो करोड़ की कमाई कर डाली। वे इस सीजन में दो महीने में 50 लाख रुपए की आय प्राप्त कर चुके हैं। वहीं पराली प्रबंधन को कारोबार का रूप देकर इससे दो सौ युवाओं को रोजगार भी दे रहे हैं। बता दें कि किसान वीरेंद्र यादव को आस्ट्रेलिया की नागरिकता मिली हुई हैं। वे अपनी पत्नी व दो बेटियों सहित आस्ट्रेलिया में रह रहे थे। और वहां फल-सब्जियों का थोक का कारोबार किया करते थे जिसमें उन्हेें सालाना 35 लाख रुपए की कमाई होती थी। लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और वे वापिस अपने वतन भारत लौट आए और यहां आकर खेती करना शुरू किया तो उनके सामने पराली प्रबंधन की समस्या आई। किसान वीरेंद्र ने ऐसे की पराली बेचकर दो करोड़ की कमाई मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार वीरेंद्र के मुताबिक जब गांव में खेती के दौरान फसल अवशेष के निपटान की समस्या सामने आई। वहीं, जब पराली को जलाने से उठने वाले प्रदूषण ने दोनों बेटियों की सेहत को आफत में डाल दिया, तो उन्होंने कुछ करने की ठानी। वीरेंद्र की दोनों बेटियों को प्रदूषण के कारण एलर्जी हो गई। वह बताते हैं, तब मैंने गंभीरता से सोचा कि आखिर इस समस्या का बेहतर समाधान कैसे हो सकता है। जब पता चला कि पराली को बेचा जा सकता है, तो इसमें जुट गया। वीरेंद्र ने क्षेत्र में स्थित एग्रो एनर्जी प्लांट और पेपर मिल से संपर्क किया तो वहां से पराली का समुचित मूल्य दिए जाने का आश्वसान मिला। तब उन्होंने इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया। न केवल अपने खेतों से बल्कि अन्य किसानों से भी पराली खरीकर बेचने का काम उन्होंने शुरू किया। इसमें सबसे जरूरी था पराली को दबाकर इसके सघन गट्ठे बनाने वाले उपकरण का इंतजाम करना, ताकि उन्हें ले जाना आसान हो जाए। पराली उपकरणों पर अनुदान वीरेंद्र ने पराली प्रबंधन के लिए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग से 50 प्रतिशत अनुदान पर तीन स्ट्रा बेलर खरीदे। अब सप्ताह भर पहले चौथा बेलर भी खरीद लिया है। एक बेलर की कीमत 15 लाख रुपए है। बेलर पराली के आयताकार गट्ठे बनाने के काम आता है। वीरेंद्र बताते हैं कि दो माह के धान के सीजन में उन्होंने तीन हजार एकड़ से 70 हजार क्विंटल पराली के गट्ठे बनाए। 135 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 50 हजार क्विंटल पराली गांव कांगथली के सुखबीर एग्रो एनर्जी प्लांट को बेची। 10 हजार क्विंटल पराली पिहोवा के सैंसन पेपर मिल को भेज चुके हैं और 10 हजार क्विंटल पराली के लिए इसी पेपर मिल से दिसंबर और जनवरी में भेजने का करार हो चुका है। इस तरह इस सीजन में अब तक उन्होंने 94 लाख 50 हजार रुपए का कारोबार किया है। इसमें से खर्च निकालकर उनका शुद्ध मुनाफा 50 लाख रुपए बनता है। अगले वर्ष जनवरी माह तक और भी कमाई होने की उम्मीद है। इधर पंजाब में भी किसान की आय का साधन बनी पराली पंजाब के कंगन गांव के किसान मनदीप सिंह ने बताया कि वह नकोदर के गांव बीड़ में स्थापित बिजली उत्पादन यूनिट को करीब 20,000 क्विंटल धान की पराली बेच रहा है और पराली की गांठें बनाने के बाद 135 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब के साथ बेच रहे हैं। उन्होंने कहा कि धान की पराली उनकी कमाई का स्थायी साधन बन गई है। आप कैसे कर सकते हैं पराली से कमाई / पराली का उपयोग पराली को जलाने के वजाह किसान इसे बिजली संयत्रों को बेचकर अच्छी कमाई कर सकता है। पंजाब के किसान ऐसा करके अच्छा पैसा कमा रहे हैं इससे एक ओर तो आमदनी हो रही है तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरण की सुरक्षा भी। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार पंजाब राज्य के जालंधर के जिला उपायुक्त घनश्याम थोरी ने बताया कि जिला प्रशासन के प्रयास से किसान पराली प्रबंधन के प्रति जागरूक हुआ है। पिछले साल जिले में रेक्स समेत सिर्फ 20 बेलर मशीनें थी और इस साल सरकार की 50 प्रतिशत सब्सिडी स्कीम अधीन किसानों को 12 अन्य बेलर मशीनें दीं गई हैं। उन्होंने बताया कि यह मशीन एक दिन में 20 से 25 एकड़ धान की पराली को बेल देती है और एक एकड़ में 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। पराली की यह गांठें बिजली उत्पादन प्लांट की तरफ से 135 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदी जा रही है। थोरी ने बताया कि नकोदर के गांव बीड़ में स्थापित छह मेगावाट की क्षमता वाला बिजली उत्पादन यूनिट 30 हजार एकड़ में पराली का प्रबंधन कर रहा है और यह प्लांट 24 घंटे काम कर रहा है। पराली से चिंता मुक्त | पराली के उपयोग | पराली से पैसा कमाओ | Parali Ka Upyog अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क 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कैबिनेट की बैठक : किसानों के हित में तीन अहम फैसले, जूट व गन्ना किसानों को होगा फायदा

कैबिनेट की बैठक : किसानों के हित में तीन अहम फैसले, जूट व गन्ना किसानों को होगा फायदा

अनाज की पैकिंग के लिए अब सिर्फ जूट के बैग का ही होगा इस्तेमाल अब अनाज की पैकिंग के लिए सिर्फ जूट के बैगों का इस्तेमाल होगा। हाल ही में कैबिनेट की बैठक में सरकार ने यह फैसला लिया है। सरकार का मानना है कि ऐसा करने से जूट उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। वहीं दूसरी ओर पॉलीथिन या प्लास्टिक के बैगों का चलन कम होगा जो पर्यावरण के लिए नुकसान देय साबित हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कैबिनेट की बैठक हुई इसमें एथनॉल की कीमत बढ़ाने सहित कुल तीन अहम फैसले लिए गए। इसके अलावा कैबिनेट की बैठक में जूट बैग का इस्तेमाल बढ़ाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को केंद्र सरकार के इन फैसलों के बारें में जानकारी दी। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर कैबिनेट की बैठक में सरकार ने यह तय किया कि खाद्यानों की पैकिंग के लिए अब सिर्फ जूट बैग का इस्तेमाल होगा। इससे देश में जूट और जूट बैग उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। यह भी तय किया गया है कि 20 फीसदी चीनी की पैकिंग के लिए जूट बैग का इस्तेमाल होगा। जावड़ेकर ने कहा कि जूट के इस्तेमाल से जुड़े फैसले से देश में जूट का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही इससे जूट उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि जूट उद्योग में करीब 4 लाख मजदूर काम करते हैं। उन्हें इस फैसले से फायदा होगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 भारत में कहां - कहां होता है जूट का उत्पादन भारत दुनियाभर में सबसे अधिक जूट का उत्पादन करने वाला देश है। पूरी दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत जूट का उत्पादन भारत में होता है। भारत में जूट का वार्षिक अनुमानित उत्पादन 11,494 हजार बंडल है। जूट मुख्य रूप से गंगा के डेल्टा में पैदा की जाने वाली बायो-डिग्रेडेबल फसल है। भारत में पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, मेघालय, त्रिपुरा और आंध्र प्रदेश में जूट का उत्पादन होता है। इनमें से भारत में सबसे अधिक जूट का उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। देश में पैदा किए जाने वाले कुल जूट का 75 प्रतिशत उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। इसके बाद दूसरा नंबर बिहार का आता है। सरकार के इस फैसले से जूट उत्पादन करने वाले किसानों को फायदा होगा। जूट की खेती में होगा उन्नत बीजों का इस्तेमाल, किसान की आय बढ़ेगी केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जूट की खेती के लिए उन्नत बीजों का इस्तेमाल होगा। इससे हर हेक्टेयर किसानों की आय 10,000 रुपए तक बढ़ जाएगी। उन्होंने कहा कि देश में जूट उत्पादन बढ़ाने पर सरकार ध्यान दे रही है। इसी वजह से 2017 में बांग्लादेश और नेपास से जूट के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया था। उन्होंने कहा कि सरकार ने जीएम पोर्टल से जूट बैग खरीदने का फैसला किया है। इस पोर्टल पर 10 फीसदी जूट बैग की नीलामी होगी। इससे जूट बैग के मूल्य निर्धारण में मदद मिलेगी। इससे देश में जूट का उत्पादन बढ़ेगा। एथेनॉल की कीमतों में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को दी मंजूरी, गन्ना किसानों को होगा फायदा कैबिनेट की बैठक में केंद्र सरकार की ओर से लिए गए अहम फैसलों में एथेनॉल की कीमतों में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को दी मंजूरी देना प्रमुख है। इससे गन्ना किसानों को फायदा होगा। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने बताया कि कैबिनेट ने एथेनॉल की कीमत में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। शुगर जूस से बनने वाले एथेनॉल की कीमत 3.25 रुपए 62.62 रुपए प्रति लीटर कर दी गई है। बी हैवी की कीमत बढ़ाकर 57.61 रुपए कर दी गई है। सी हैवी की कीमत बढ़ाकर 45.69 प्रति लीटर कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह एथेनॉल की कीमत में 2 से 3.35 रुपए की वृद्धि की गई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी और परिवहन पर आने वाला खर्च तेल मार्केटिंग कंपनियां उठाएंगी। उन्होंने कहा कि एथेनॉल की कीमतें बढ़ाने से चीनी मिलों को गन्ना किसानों को फायदा होगा। एथेनॉल की कीमतों में वृद्धि से किसानों को कैसे होगा फायदा अभी देश में पेट्रोल में 10 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता है। इसके लिए इंडियन ऑयल जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां चीनी मिलों से एथेनॉल खरीदती हैं। एथेनॉल की खपत लगातार बढ़ रही है। पिछले 5 साल में इसकी खपत करीब पांच गुनी हो गई है। केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर का कहना है कि 2014 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 38 करोड़ लीटर एथेनॉल चीनी मिलों से खरीदा था। 2019 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने चीनी मिलों से 195 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदा। एथेनॉल की खरीद बढऩे से चीनी मिलों के हाथ में पैसा आता है। इससे उन्हें किसानों को गन्ने के मूल्य का भुगतान करने में मदद मिलती है। इस तरह एथेनॉल की खपत पढऩे से आखिरकार गन्ना किसानों को फायदा होता है। बांधों के रखरखाव के लिए को भी दी मंजूरी, 10,211 करोड़ रुपए होंगे खर्च कैबिनेट की बैठक में देश में बांधों को उन्नत बनाने और उनके रखरखाव के लिए योजना को भी मंजूरी दी गई है। इस बारे जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि 19 राज्यों में 736 बांधों को उन्नत बनाने और उनके रखरखाव के लिए व्यापक योजना को मंजूरी दी गई है। इस पर 10,211 करोड़ रुपए की रकम खर्च होगी। उन्होंने कहा कि देश में 80 फीसदी बांध 25 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। इसलिए इन्हें रखरखाव की काफी जरूरत है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

कृषि वैज्ञानिकों ने जारी की दो नई किस्में, जानें, कौनसी है ये दो किस्में और इनकी विशेषताएं अब गन्ना किसानों की फसल रेड रॉट रोग के कारण बर्बाद नहीं होगी। हाल ही में कृषि वैज्ञानिकों ने गन्ने की दो ऐसी किस्मों को पहचाना है जिस पर इस रोग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता यानि इन किस्मों में इस रोग से लडऩे की क्षमता है और इसलिए इन किस्मों में यह रोग नहीं लगेगा। बता दें कि पिछले कुछ दिनों पूर्व रेड रॉट रोग का प्रभाव से उत्तरप्रदेश के सीतापुर, लखीमपुर खोरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर आदि जिलों में देखा गया जिससे यहां के किसानों की 80 फीसदी फसल सूख कर तबाह हो गई। पर अब किसानों को इस रोग से डरने की जरूरत नहीं है। हाल ही में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ व उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने गन्ने की नई किस्म सीओएलके-कोलख 14201 जो जल्दी तैयार हो जाती है और सामान्य किस्म सीओएस-कोशा 14233 जारी की है। प्रदेश के किसानों को गन्ने की दो नई प्रजातियां बोने के लिए अगले साल से मिलनी शुरू हो जाएंगी। यह दोनों ही प्रजाति अधिक पैदावार देने वाली हैं। इनमें कीट और रोग भी कम लगता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर के डायरेक्टर डॉ. जे सिंह ने बताया कि हाल ही में आयुक्त गन्ना एवं चीनी उद्योग संजय आर भूसरेड्डी की अध्यक्षता में बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक लखनऊ में हुई थी, जिसमें गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर, सेवरही, मुजफफरनगर तथा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ के साथ-साथ चीनी मिल दौराला, अजवापुर, पलिया, बिसवांं एवं रोजा द्वारा विभिन्न होनहार जीनोटाइप के उपज एवं चीनी परता के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर विभिन्न जीनोटाइप में अगेती किस्मों में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित कोलख 14201 तथा मध्य देर से पकने वाली किस्मों में गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर द्वारा विकसित कोशा 14233 बेहतर पाई गई, जिसे सर्वसम्मति से सामान्य खेती के लिए स्वीकृत किया गया। भूसरेड्डी ने कहा कि वर्तमान में गन्ना किस्म को 0238 में लाल सडऩ रोग के आपतन के कारण किसानों को अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए, जिस कड़ी में यह दोनों किस्में सामान्य खेती के लिए बेहतर है। क्या है नई किस्म कोलख 14201 व कोशा 14233 की विशेषताएं किस्म कोलख 14201 में परीक्षण के दौरान 900-1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज प्राप्त हुई है। वहीं औसतन 13.0 प्रतिशत पोल इन केन भी प्राप्त हुआ जो को. 0238 से ज्यादा था। वहीं इस किस्म का गन्ना बिलकुल सीधा खड़ा रहता है, और इसको बंधाई की कम आवश्यकता पड़ती है। साथ ही इसका गुड़ सुनहरे रंग और उत्तम गुणवत्ता का होता है। जो ऑर्गैनिक गुड़ उत्पादन के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। कोलख 14201 और कोशा 14233 में लाल सडऩ रोग से लडऩे की क्षमता बहुत ज्यादा है, और कोलख 14201 पर बेधक कीटों का भी बेहद कम आक्रमण होता है। गन्ने की सीओ-0239 किस्म का होगा विलोपन गन्ने की सीओ-0239 किस्म और सीओ 0118 किस्म एक ही है। अत: स्वीकृत किस्मों की सूची में से सीओ 0239 का नाम विलोपित कर दिया जाएगा। समिति द्वारा यह भी निर्णय लिया गया कि एकल गन्ना किस्मों की बुवाई के कारण प्रदेश में रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, अत: प्रजातीय संतुलन बनाए रखने के लिए अगेती एवं मध्य देर कि किस्मों का संतुलन रखा जाना जरूरी है। वहीं सीओ 0239 किस्म के विलोपन को लेकर डॉ सिंह का कहना है कि सीओ 0238 का रकबा प्रदेश में बहुत बड़ा है इसलिए इतना आसान नहीं हैं सीओ 0238 को परिवर्तित करना। गन्ने की सीओ - 0239 किस्म का क्यूं किया जा रहा है विलोपन मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के निदेशक डॉ. ज्योत्सेंद्र सिंह का कहना है कि परीक्षण आंकड़ों पर गहन चर्चा के बाद यह पाया गया, कि इस शीघ्र गन्ना किस्म में प्रचलित किस्म सीओ -0238 से ज्यादा उपज क्षमता के साथ-साथ ज्यादा चीनी परता भी मिला है। आज जब गन्ने की सीओ-0238 किस्म में वृहद स्तर पर लाल सडऩ रोग की समस्या बढ़ रही है। वहीं किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में सीओ 0238 पर रोक लगाने की संभावना अधिक बढ़ रही है। वहीं इसको सीओ 0238 को परिवर्तित कर के को.लख. 14201 को बढ़ावा देने आवश्यकता अब बढ़ गई है। आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट करने का लिया निर्णय 0239 किस्म के विलोपन के साथ ही आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट कर दिया जाएगा। इस संबंध में चीनी मिल प्रतिनिधियों की ओर से लखनऊ में हुई बैठक में यह अवगत कराया गया कि गन्ना किस्म कोपीके 05191 में चीनी परता कम है तथा लाल सडऩ रोग का भी प्रकोप बढ़ रहा है। इस पर समिति द्वारा इसे आगामी सालों में फेजआउट करने का निर्णय लिया गया है। कब तक किसानों को मिल पाएगा इन दो नई किस्मों का बीज डॉ. सिंह के अनुसार चयनित किसानों और चीनी मिलों के माध्यम से कोलख.14201 का बीज तैयार कराया जा रहा है। अगले वर्ष किसानों को इसका बीज आसानी मिल सकेगा। अगले वर्ष 50 फीसदी तक किसानों के पास कोलख 14201 का बीज तैयार मिलेगा जिसका वे बुवाई में उपयोग कर बेहतर गन्ना का उत्पादन कर सकेंगे। जल्द ही किसानों को मिलेंगी और नई किस्में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार साह के अनुसार जल्द ही उत्तरी राज्यों के लिए गन्ने की चार किस्में कोलख 14204, Co15023, CoPb14185 व CoPb11453 और दक्षिणी राज्यों के लिए तीन किस्में MS13081, VSI 12121 और Co13013 को संबंधित कृषि जलवायु क्षेत्रों में खेती के लिए जारी किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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