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अब पहले से महंगा बिकेगा किसानों का गन्ना, सरकार ने घोषित किए नए दाम

अब पहले से महंगा बिकेगा किसानों का गन्ना, सरकार ने घोषित किए नए दाम

जानें क्या है एफआरपी और इसे कैसे किया जाता है निर्धारित?

सरकार की ओर से गन्ना का उचित लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एफआरपी ) बढ़ा दिया गया है। इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भी मंजूरी दे दी है। अब किसानों को चीनी मिलों को गन्ना बेचने पर पहले से अधिक दाम मिलेंगे। इससे करीब एक करोड़ गन्ना किसानों को फायदा होगा। बता दें कि रबी व खरीफ की फसलों की तरह ही गन्ना का न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले से तय किया जाता है। और इसी मूल्य पर ही चीनी मिलों द्वारा किसानों से गन्ने की खरीद कर भुगतान किया जाता है। गन्ना उत्पादक किसानों को उनके उत्पाद का उचित और लाभकारी मूल्य मिल सके, इसके लिए सरकार द्वारा एफआरपी का निर्धारण ‘एफआरपी’गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के तहत किया जाता है। जिसे देश भर में सामान्य रूप से लागू किया जाता है। 

 

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क्या है एफआरपी? 

एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य है, जिस पर चीनी मिलों को किसानों से गन्ना खरीदना होता है। कमीशन ऑफ एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेज (सीएसीपी) हर साल एफआरपी की सिफारिश करता है। सीएसीपी गन्ना सहित प्रमुख कृषि उत्पादों की कीमतों के बारे में सरकार को अपनी सिफारिश भेजती है। उस पर विचार करने के बाद सरकार उसे लागू करती है। सरकार गन्ना ( नियंत्रण ) आदेश, 1966 के तहत एफआरपी तय करती है।

 

 

वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए कितना तय किया गया गन्ना का एफआरपी 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2020-21 के लिए गन्ना का उचित एवं लाभकारी ( एफआरपी ) के दाम 10 रुपए बढ़ाकर इस वर्ष 285 रुपए प्रति क्विंटल करने को मंजूरी दे दी है। यह दाम गन्ने के अक्टूबर 2020 से शुरू होने वाले नए विपणन सत्र के लिए तय किया गया है। यह निर्णय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिश पर किया गया है। सीएसीपी सरकार को प्रमुख कृषि उत्पादों के दाम को लेकर सलाह देने वाली संस्था है। एफआरपी गन्ने का न्यूनतम मूल्य होता है जिसे चीनी मिलों को गन्ना उत्पादक किसानों को भुगतान करना होता है। 

 

10 प्रतिशत रिकवरी के आधार पर निर्धारित किया मूल्य

इस वर्ष गन्ने के ‘उचित एवं लाभकारी मूल्य - एफआरपी गन्ना सीजन 2020-21 के लिए एफआरपी 10 प्रतिशत की रिकवरी के आधार पर 285 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। रिकवरी में 10 प्रतिशत से अधिक प्रत्येक 1 प्रतिशत की वृद्धि के लिए प्रति क्विंटल 2.85 रुपए का प्रीमियम प्रदान करने तथा प्रत्येक रिकवरी में 1 प्रतिशत की कमी पर एफआरपी में 2.85 रुपए प्रति क्विंटल की दर से कमी करने का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था ऐसी चीनी मिलों के लिए है जिनकी रिकवरी 10 प्रतिशत से कम लेकिन 9.5 प्रतिशत से अधिक है। हालांकि ऐसी चीनी मिलों के लिए जिनकी रिकवरी 9.5 प्रतिशत या उससे कम है एफआरपी 270.75 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है।

 

भारत में कहां - कहां और कितना होता है गन्ने का उत्पादन 

2015-16 के अनुमान के मुताबिक, उत्तर प्रदेश गन्ने का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है, क्योंकि यह अनुमानित 145.39 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन करता है, जो अखिल भारतीय उत्पादन का 41.28 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल 2.17 लाख हेक्टेयर के क्षेत्र में बोई जाती है, जो कि अखिल भारतीय गन्ने की खेती का 43.79 प्रतिशत हिस्सा है। इसके बाद गन्ना उत्पादन में दूसरा नंबर महाराष्ट्र का आता है। यहां अनुमानित 72.26 मिलियन टन गन्ना का उत्पादन होता है जो कि अखिल भारतीय गन्ना उत्पादन का 20.52 प्रतिशत है।

महाराष्ट्र की कृषि भूमि का क्षेत्रफल जहां गन्ने की कुल बुवाई 0.99 मिलियन हेक्टेयर पर की जाती है वह मोटे तौर पर काली मिट्टी से युक्त क्षेत्र है। तीसरे स्थान पर कर्नाटक राज्य है। यहां 34.48 मिलियन टन गन्ना का उत्पादन किया जाता है जो कि देश के कुल गन्ना उत्पादन का लगभग 11 प्रतिशत है। राज्य की कृषि भूमि के 0.45 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र के कुल क्षेत्र पर गन्ने की बुवाई की जाती है। वहीं तमिलनाडु गन्ने का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो कि 26.50 मिलियन टन गन्ना का अनुमानित उत्पादन करता है, जो कि देश के गन्ना उत्पादन का लगभग 7.5 प्रतिशत है। इधर बिहार में 14.68 मिलियन टन गन्ना का उत्पादन होता है। यह देश के गन्ना उत्पादन का 4.17 प्रतिशत है।

 

भारत में कितनी चीनी मिलें जो किसानों से गन्ने की खरीद करती हैं

देश में 31.01.2018 की स्थिति के अनुसार 735 स्थापित चीनी कारखाने हैं जिनकी लगभग 340 लाख टन चीनी का उत्पादन करने के लिए पर्याप्त पेराई क्षमता है। यह क्षमता मोटे तौर पर प्राइवेट क्षेत्र की यूनिटों और सहकारी क्षेत्र की यूनिटों के बीच समान रूप से विभाजित है। चीनी मिलों की क्षमता कुल मिलाकर 2500 टीसीडी-5000 टीसीडी की रेंज में है, लेकिन यह लगातार बढ़ रही है और 10,000 टीसीडी से अधिक भी हो रही है। गुजरात और पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्र में देश में 2 मात्र रिफाइनरियां भी स्थापित की गई हैं जो मुख्य रूप से आयातित रॉ चीनी और स्वदेशी रूप से उत्पादित रॉ चीनी से परिष्कृत चीनी का उत्पादन करती हैं।

 

चीनी कारखानों की संख्या एक नजर में

  • सहकारी कारखानों की संख्या- 327
  • प्राइवेट कारखानों की संख्या- 365
  • सरकारी कारखानों की संख्या- 43
  • देश में कुल कारखानों की संख्या- 735 (इसमें पश्चिम बंगाल व गुजरात में प्रत्येक रिफाइनरी शामिल है।)

 

 

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