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अब छोटे व सीमांत किसानों को बैंक से मिल सकेगा आसानी से लोन

अब छोटे व सीमांत किसानों को बैंक से मिल सकेगा आसानी से लोन

08 August, 2020

आरबीआई ने कृषि सहित अन्य सेक्टरों को किया प्रॉयोरिटी सेक्टर में शामिल

देश का शीर्षस्थ बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अब छोटे व सीमांत किसानों सहित कमजोर तबके को दिए जाने वाले कर्ज का लक्ष्य बढ़ाने का फैसला किया है। इससे छोटे व सीमांत किसानों को लाभ होगा। उन्हें आसानी से बैंक से सस्ता लोन मिल सकेगा। जानकारी के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से प्रायॉरिटी सेक्टर में कृषि, एमएसएमई, शिक्षा, हाउसिंग, सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई सेक्टर को शामिल किया गया है।

इसके अंतर्गत स्टार्टअप को भी शामिल  किया गया है। इससे स्टार्टअप की नकदी संबंधी समस्या खत्म होगी और नया कारोबार प्रारंभ करने में सहायता मिलेगी। पहले ऐसा नहीं था स्टार्टअप्स को हमेशा एमएसएमई कैटेगरी में ही माना जाता था और उन्हें तीन साल का मुनाफा दिखाना होता था। लेकिन अब स्टार्टअप को प्रॉयोरिटी सेक्टर में शामिल किए जाने के बाद उन्हें बैंक से लोन लेने में आसानी होगी। 

 

 

रिजर्व बैंक के फैसले की खास बातें

  • नई गाइडलाइन में फ्रेंडली लेंडिंग पॉलिसी पर जोर दिया गया है। इसका मकदस लंबी अवधि के विकास लक्ष्यों को हासिल करना है।
  • आरबीआई के इस फैसले के बाद छोटे व सीमांत किसानों और समाज के कमजोर व वंचित तबके को बैंक से आसानी से लोन मिल सकेगा।
  • केंद्रीय बैंक ने विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए स्टार्टअप्स को भी पीएसएल के दायरे में शामिल कर लिया गया है। इससे स्टार्टअप को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • अक्षय ऊर्जा सेक्टर के लिए कर्ज देने की सीमा बढ़ा दी है। इसमें सोलर पावर और कंप्रेस्ड बायो गैस प्लांट शामिल हैं।
  • बैंकों को छोटे व सीमांत किसानों को ज्यादा कर्ज देने का निर्देश भी दिया गया है। कमजोर तबके के लोगों को बैंक लोन दे ताकि उन्हें आर्थिक मदद मिल सके। 

 

स्टार्टअप को कारोबार चलाने में नहीं आएगी दिक्कत

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से प्रायॉरिटी सेक्टर में कृषि, एमएसएमई, शिक्षा, हाउसिंग, सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई सेक्टर शामिल किए जाने से इस क्षेत्रों से जुड़े लोगों को फायदा होगा। वहीं कारोबारियों का मानना है कि इससे स्टार्टअप्स के सामने अब अपना कारोबार चलाने के लिए नकदी का संकट पैदा नहीं होगा।

आसानी से लोन मिल जाने से उनके पास पर्याप्त पूंजी उपलब्ध रहेगी जिससे वह नया कारोबार प्रारंभ कर सकेंगे। विश्लेषकों का कहना है कि स्टार्टअप्स को हमेशा एमएसएमई कैटेगरी में ही माना जाता था और उन्हें तीन साल का मुनाफा दिखाना होता था। लेकिन अब ये बाध्यता नहीं रहेगी, उन्हें कम दरों पर बैंकों से आसानी से कर्ज मिल सकेगा। इससे उनकी नकदी संबंधी समस्या का निदान हो सकेगा।
 

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पीएम किसान सम्मान निधि योजना : अब किसान के खातें में आ सकते हैं 11,000 रुपए

पीएम किसान सम्मान निधि योजना : अब किसान के खातें में आ सकते हैं 11,000 रुपए

खाद खरीदने के लिए सरकार देगी 5000 रुपए सालाना, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने की केंद्र सरकार से सिफारिश किसानों के लिए एक खुश खबर आई हैं। सरकार किसान को खाद खरीदने के लिए पैसा उनके खाते में देने की तैयारी में हैं। खबर है कि खाद खरीदने के लिए सरकार किसानों को 5000 रुपए की रकम सालाना देने वाली है जिसे दो किस्तों मेें भुगतान किया जाएगा। ये रकम पीएम किसान योजना में मिलने वाली 6000 रुपए से अलग होगी। यानि अब किसान को सरकार की ओर से सालाना कुल मिलकर 11,000 रुपए की मदद की जाएगी। ऐसा इसलिए किया जा सकता है क्योंकि सरकार चाहती है कि खाद यूरिया बेचने वाली कंपनियों को सरकार जो सब्सिडी देती है वो सीधी किसान के खाते में जाए जिससे किसान स्वयं यूरिया खाद की खरीद कर सके। क्योंकि देखने में आया है कि सरकार की ओर से यूरिया खाद कंपनियों को सब्सिडी दी जाती है उसके बाद भी किसान को यूरिया खाद के लिए किल्लत का सामना करना पड़ता है। वहीं इसकी कालाबाजारी होने से किसान को ऊंचे दामों में यूरिया खरीदना पड़ता है। इस समस्या का समाधान करने के साथ ही किसानों की आय बढ़ाने के प्रयास सरकार द्वारा किए जा रहे हैं जिससे किसान भाइयों को फायदा होगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सीएसीपी ने केंद्र सरकार को भेजा प्रस्ताव कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ( एग्रीकल्चर कोस्ट एंड प्राइज कमीशन (सीएसीपी)) ने केंद्र सरकार से किसानों को सीधे 5000 रुपए सालाना खाद सब्सिडी के तौर पर नकद देने की सिफारिश की है। आयोग चाहता है कि किसानों को 2,500 रुपए की दो किश्तों में भुगतान किया जाए। पहली किश्त खरीफ की फसल शुरू होने से पहले और दूसरी रबी की शुरुआत में दी जाए। केंद्र सरकार ने सिफारिश मान ली तो किसानों के पास ज्यादा नकदी होगी, क्योंकि सब्सिडी का पैसा सीधे उनके खाते में आएगा। हर साल सरकार खाद सब्सिडी पर करती है 80 हजार करोड़ खर्च उर्वरक सब्सिडी के लिए सरकार सालाना लगभग 80 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम करती है। 2019-20 में 69418.85 रुपए की उर्वरक सब्सिडी दी गई। जिसमें से स्वदेशी यूरिया का हिस्सा 43,050 करोड़ रुपए है। इसके अलावा आयातित यूरिया पर 14049 करोड़ रुपए की सरकारी सहायता अलग से दी गई। छह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां, 2 सहकारी और 37 निजी कंपनियों को यह सहायता मिली है। इसके बावजूद किसानों को समय पर खाद उपलब्ध नहीं हो पाती है। सब्सिडी देने के बाद भी किसान को महंगे दामों पर यूरिया की खरीदना पड़ता है। खाद सब्सिडी को लेकर क्या है सरकार की योजना केंद्र सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए किसानों को उर्वरक की सब्सिडी सीधे उनके बैंक अकाउंट में देने पर विचार कर रही है। किसानों के खाते में नकद सब्सिडी जमा कराने के लिए 2017 में ही नीति आयोग की एक विशेषज्ञ समिति गठित कर दी गई थी लेकिन अब तक इस पर ठोस काम नहीं हो पाया। लेकिन अब सीएसीपी की सिफारिश के बाद नई व्यवस्था लागू होने की उम्मीद जग गई है। अब सरकार चाहती है कि ये पैसा किसान को सीधा पहुंचाया जाए जिससे वह स्वयं खाद की खरीद कर सके। बता दें कि अभी कुछ दिन पहले ही एक कार्यक्रम के दौरान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि इन यूरिया कंपनियों को सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी को समाप्त करके उस पैसे को किसान के खाते में डाल दिया जाए जिससे किसान खुद खाद खरीद सके और इन कंपनियों का सब्सिडी खाने का खेल खत्म हो जाए। उन्होंने कहा था कि मैं केंद्र सरकार के समक्ष इस बात को रखूंगा। इन सब बातों से लगता है कि केंद्र सरकार भी अब यूरिया कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी को सीधा किसानों को दिया जाएगा। किसानों को रकबा के हिसाब दिया जाए पैसा मीडिया में प्रसारित व प्रकाशित खबरों के अनुसार राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि सरकार खाद सब्सिडी खत्म करके रकबे के हिसाब से उसका पूरा पैसा किसानों के अकाउंट में दे दे तो यह अच्छा होगा। लेकिन अगर सब्सिडी खत्म करके उस पैसे का कहीं और इस्तेमाल करेगी तो किसान इसके विरोध में उतरेंगे। जितना पैसा उर्वरक सब्सिडी के रूप में कंपनियों को जाता है उतने में हर साल सभी 14.5 करोड़ किसानों को 6-6 हजार रुपये दिए जा सकते हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

हींग की खेती : हिमाचल प्रदेश में किसानों ने शुरू की हींग की खेती

हींग की खेती : हिमाचल प्रदेश में किसानों ने शुरू की हींग की खेती

भारत में पहली बार हो रही है हींग की खेती, किसानों में उत्साह भारतीय व्यंजनों में हींग का बड़ा महत्व हैं। हमारे देश में हींग का इस्तेमाल भोजन में काफी पुराने समय से किया जा रहा है। इसके अलावा इसे दवा के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है। जहां एक ओर हींग भोजन में महक ला दती है वहीं दूसरी ओर इसके इस्तेमाल से कई बीमारियों दूर हो जाती हैं। पेट व सांस संबंधी रोगों में इसका उपयोग रामबाण माना जाता है। इसके औषधीय महत्व के कारण ही इसका इस्तेमाल भोजन में किया जाता है। अभी तक इसकी खेती हमारे भारत में नहीं होती थी। इस कारण हम हींग का आयात विदेशों से करते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत हर साल करीब 1200 टन कच्चे हींग का आयात करता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 हींग का पेड़ कहां मिलता है यह मुख्य रूप से ईरान, अफगानिस्तान और उजबेकिस्तान से आता है। इसमें सबसे ज्यादा भारत में अफगानिस्तान से हींग का आयात किया जाता है। पिछले साल अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान से लगभग 1500 टन कच्चे हींग का आयात किया गया। इस पर 942 करोड़ रुपए खर्च किए गए। हींग की हमारे देश में खपत को देखते हुए इसे उगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारत में हींग की खेती : लाहौल घाटी के गांव क्वारिंग की गई है हींग की रोपाई / भारत में हींग की खेती कहां होती है हाल ही में हिमाचल प्रदेश में सुदूर लाहौल घाटी के किसानों ने पालमपुर स्थित सीएसआईआर संस्था द्वारा विकसित कृषि-प्रौद्योगिकी की मदद से हींग की खेती शुरू की है। इसके तहत हींग की पहली रोपाई 15 अक्टूबर को लाहौल घाटी के गांव क्वारिंग में की गई थी। चूंकि भारत में फेरूला हींग के पौधों की रोपण सामग्री की कमी इस फसल की खेती में एक बड़ी अड़चन थी। इसलिए सीएसआईआर के पालमपुर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरसोर्स टेक्नोलॉजी ( आईएचबीटी ) द्वारा हींग के बीजों को भारत लाया गया और इसकी खेती की तकनीक विकसित की। इसके बाद हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी में इसकी खेती का प्रयास किया जा रहा है। यदि इसमें सफलता मिलती है तो देश के अन्य भागों में भी इसे उगाने के प्रयास किए जा सकेंगे। यहां यह बताया जरूरी होगा कि हींग की खेती में काफी चुनौतियां है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि आप इसके 100 पौधे रोपते हैं तो इनमें से एक ही पेड़ अच्छी तरह विकसित हो पाता है। हींग की खेती से बदल सकती है किसानों की आर्थिक स्थिति समाचार पत्र में प्रकाशित खबरों एवं मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार सीएसआईआर आईएचबीटी के निदेशक संजय कुमार ने बताया कि भारतीय हिमालय क्षेत्र के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में लद्दाख और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र हींग की खेती से इन क्षेत्रों के लोगों की आर्थिक स्थिति बदल सकती है। कुमार ने कहा कि आईएचबीटी ने हींग की खेती पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं और हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी के मडगारण, बीलिंग और कीलोंग गांवों में बीज उत्पादन श्रृंखला की स्थापना और व्यावसायिक स्तर पर इसकी खेती के लिए प्रदर्शन प्लॉट तैयार किए हैं। संस्थान ने शुरू में हींग की खेती के लिए 300 हेक्टेयर की पहचान की है। किसानों द्वारा पांच वर्ष के चक्र को सफलतापूर्वक पूरा करने और इसके परिणाम देखने के बाद इसे अधिक क्षेत्रों में विस्तारित किया जा सकता है। हींग की खेती से किसानों को क्या होगा फायदा / हींग का मूल्य किसानों को खेती की लागत और शुद्ध रिटर्न के बारे में पूछे जाने पर, कुमार ने कहा कि इससे किसानों को अगले पांच वर्षों में लगभग 3 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की लागत आएगी और उन्हें पांचवें वर्ष से न्यूनतम 10 लाख रुपए का शुद्ध लाभ मिलेगा। हम राज्य सरकार के साथ मिलकर किसानों को वित्त और तकनीकी जानकारी देंगे। यह देश के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में किसानों के लिए गेम चेंजर साबित होगा। कैसा होता है हींग का पौधा / हींग का वैज्ञानिक नाम हींग (Hing) का वैज्ञानिक नाम फेरूला एसा-फौटिडा है। हींग सौंफ़ की प्रजाति का एक ईरान मूल का पौधा (ऊंचाई 1 से 1.5 मी. तक) है। ये पौधे भूमध्यसागर क्षेत्र से लेकर मध्य एशिया तक में पैदा होते हैं। भारत में यह कश्मीर और पंजाब के कुछ हिस्सों में पैदा होता है। हींग एक बारहमासी शाक है। इस पौधे के विभिन्न वर्गों (इनमें से तीन भारत में पैदा होते हैं) के भूमिगत प्रकन्दों व ऊपरी जड़ों से रिसनेवाले शुष्क वानस्पतिक दूध को हींग के रूप में प्रयोग किया जाता है। कच्ची हींग का स्वाद लहसुन जैसा होता है, लेकिन जब इसे व्यंजन में पकाया जाता है तो यह उसके स्वाद को बढा़ देती है। इसकी आयु पांच वर्ष होती है। इसके एक पौधे से औसतन आधा से एक लीटर तक हींग का दूध पैदा होता है। इस दूध से ही हींग बनाया जाता है। हींग के औषधीय उपयोग / हींग की तासीर हींग में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो संक्रमण और दर्द की समस्या को दूर करते हैं। जैसे दांतों में संक्रमण, मसूड़ों से खून निकलने और दर्द जैसी समस्या में इस प्रयोग करके राहत पाई जा सकती है। हींग में कोउमारिन नामक पदार्थ पाया जाता है जो ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके अलावा सर्दी-जुकाम, तनाव और माइग्रेन के कारण होने वाले सिरदर्द में हींग के प्रयोग से आराम मिल जाता है। पेट की समस्या, कान दर्द, स्कीन इंनफेक्शन सहित दाद, खाज, खुजली जैसे चर्म रोगों के लिए हींग का उपयोग बहुत फायदेमंद है। हींग ( Hing ) के प्रकार हींग दो प्रकार की होती हैं- एक हींग काबूली सुफाइद (दुधिया सफेद हींग) और दूसरी हींग लाल। हींग का तीखा व कटु स्वाद है और उसमें सल्फर की मौजूदगी के कारण एक अरुचिकर तीक्ष्ण गंध निकलता है। यह तीन रूपों में उपलब्ध हैं- टियर्स, मास और पेस्ट। टियर्स, वृत्ताकार व पतले, राल का शुद्ध रूप होता है इसका व्यास पांच से 30 मि.मी. और रंग भूरे और फीका पीला होता है। मास - हींग साधारण वाणिज्यिक रूप है जो ठोस आकारवाला है। पेस्ट में अधिक तत्व मौजूद रहते हैं। सफेद व पीला हींग जल विलेय है जबकि गहरे व काले रंग की हींग तैल विलेय है। अपने तीक्ष्ण सुगंध के कारण शुद्ध हींग को पसंद नहीं किया जाता बल्कि इसे स्टार्च ओर गम (गोंद) मिलाकर संयोजित हींग के रूप में, ईंट की आकृति में बेचा जाता है। इसकी पहली बार भारत के हिमाचल प्रदेश में इसकी खेती की जा रही है। हींग की खेती के लिए आवश्यक बातें हींग के पौधे विकसित होने के लिए ठंड और शुष्क जलवायु जरूरी हैं। इसलिए हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त होता है। हींग की खेती के लिए ऐसी जमीन उपयुक्त मानी जाती है जिसमें रेत, मिठ्ठी के ठेले व चिकनी अधिक हो। इसके साथ ही सूरज की धूप सीधे उस जगह पडऩी चाहिए जहां इसकी खेती की जा रही है। इसकी रोपाई करते समय पौधे से पौधे के बीच की दूरी 5 फीट रखनी चाहिए। कैसे की जाती है हींग की खेती / हींग का बीज हींग के बीज को पहले ग्रीन हाऊस में 2-2 फीट की दूरी से बोया जाता है। पौध निकलने पर इसे फिर 5-5 फीट की दूरी पर लगाया जाता है। हाथ लगाकर जमीन की नमी को देख कर ही इसमें पानी का छिडक़ाव किया जा सकता है, अधिक पानी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है। पौधों को नमी के लिए गीली घास का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके पौधे को पेड़ बनने में पांच वर्ष का समय लगता है। इसकी जड़ों व तनों से गौंद निकाला जाता है। इसका बीज भारतीय मसाल बोर्ड से मिल सकता है। इसका बीज ईरान से मंगवाया गया है। कृषि विज्ञानी द्वारा रिसर्च के लिए इसे ही अलग-अलग जगहों पर उगाया जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : 8.54 लाख किसानों के खातों में पहुंचे 18,539.86 करोड़ रुपए

समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : 8.54 लाख किसानों के खातों में पहुंचे 18,539.86 करोड़ रुपए

सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदा 100 लाख टन धान भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और राज्य की खरीद एजेंसियों ने सोमवार तक 98.19 लाख टन धान की खरीद की है। इससे देश के विभिन्न राज्यों के 8.54 लाख किसानों के खातों में करीब 18,539.86 करोड़ रुपए आए हैं। यह खरीद 18,880 रुपए प्रति टन के एमएसपी की दर से की गई है। मीडिया में प्रकाशित खबरों से मिली जानकारी के अनुसार एक सरकारी बयान में कहा गया है कि खरीफ 2020-21 के लिए धान की खरीद पंजाब, हरियाणा, यूपी, तमिलनाडु, उत्तराखंड, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर और केरल जैसे खरीद करने वाले राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में तेजी से चल रही है। इन राज्यों में 19 अक्टूबर तक 8.54 लाख किसानों से 18,880 रुपए प्रति टन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की दर से 18,539.86 करोड़ रुपए मूल्य के 98.19 लाख टन से अधिक धान की खरीद की गई है। बता दें कि खरीफ मार्केटिंग सीजन (केएमएस) 2019-20 की इसी अवधि के दौरान 80.20 लाख टन धान की खरीद हुई थी। चालू सत्र में धान खरीद, पिछले सत्र की तुलना में 22.43 प्रतिशत अधिक है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 779 किसानों से की 806.11 टन मूंग और उड़द की खरीद सोमवार तक, सरकार ने अपनी नोडल एजेंसियों के माध्यम से तमिलनाडु, महाराष्ट्र और हरियाणा में 779 किसानों से 5.80 करोड़ रुपए की 806.11 टन मूंग और उड़द की खरीद की है। इसी प्रकार, कर्नाटक और तमिलनाडु में 3,961 किसानों से 52.40 करोड़ रुपये की 5,089 टन नारियल गरी की खरीद की गई है। बयान में कहा गया है कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में एमएसपी मूल्य पर कपास की खरीद का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। सोमवार तक, 40,196 किसानों से 565.90 करोड़ रुपए मूल्य का 2,00,512 गांठ कपास खरीदा गया। बता दें कि राज्यों से मिले प्रस्ताव के आधार पर, मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और आंध्र प्रदेश से खरीफ विपणन सत्र 2020 के लिए 42.46 लाख टन दलहनों और तिलहनों की खरीद के लिए मंजूरी दी गई थी। वहीं आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्यों के लिए 1.23 लाख टन नारियल गरी की खरीद करने के लिए भी मंजूरी दी गई है। खरीफ सीजन 2020-21 के विभिन्न फसलों लिए तय समर्थन मूल्य / खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 2020-21 धान (सामान्य) 1868, धान (ग्रेड ए)-1888, ज्वार (हाईब्रिड)-2620 , ज्वार (मालदंडी)- 2640 , बाजरा- 2150, रागी 3295, मक्का 1850, तूर (अरहर)-6000, मूंग- 7196, उड़द - 6000, मूंगफली- 5275, सूरजमुखी-5885, सोयाबीन (पिला)- 3880, तिल- 6855, नाइजरसीड- 6695, कपास (मध्यम रेशा)- 5515, कपास (लंबा रेशा)- 5825 रुपए सरकार ओर से तय किया हुआ समर्थन मूल्य है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

अनुबंध कृषि : किसान और व्यापारी के बीच विवादों के समाधान के लिए सरकार ने जारी किए नियम

अनुबंध कृषि : किसान और व्यापारी के बीच विवादों के समाधान के लिए सरकार ने जारी किए नियम

जानें, क्या है कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से जुड़े इन नियमों में और इससे किसानों को क्या होगा फायदा अनुबंध कृषि (Contract Farming) से जुड़े विवादों के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने नियम ओर प्रक्रिया जारी की है। अधिसूचित नियमों के अनुसार, सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) दोनों पक्षों से समान प्रतिनिधित्व वाले सुलह बोर्ड का गठन करके विवाद को हल किया जाएगा। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार एक अधिकारी ने बताया कि सुलह बोर्ड की नियुक्ति की तारीख से 30 दिनों के भीतर सुलह की प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए। यदि सुलह बोर्ड विवाद को हल करने में विफल रहता है, तो या तो पार्टी उप-विभागीय प्राधिकरण से संपर्क कर सकती है, जिसे उचित सुनवाई के बाद आवेदन दाखिल करने के 30 दिनों के भीतर मामले का फैसला करना होगा। अधिकारी ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जहां किसानों की भूमि एक से अधिक सब डिवीजन में आती है। अधिकारी ने बताया, ऐसे मामलों में, भूमि के सबसे बड़े हिस्से पर अधिकार क्षेत्र मजिस्ट्रेट के पास निर्णय लेने का अधिकार होगा। अधिकारी ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में शामिल पक्षों को समीक्षा के लिए उच्च प्राधिकरण के पास जाने का अधिकार होगा। अधिकारी ने कहा- संबंधित जिले के कलेक्टर या कलेक्टर द्वारा नामित अतिरिक्त कलेक्टर अपीलीय प्राधिकारी होंगे। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसान 30 दिनों के भीतर कर सकते हैं अपील दायर अनुबंध कृषि (Contract Farming) नियमों को लेकर अधिकारी ने कहा कि इस तरह के आदेश के तीस दिनों के भीतर, किसान खुद जाकर या इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील दायर कर सकते हैं। संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, प्राधिकरण को ऐसी अपील दायर करने की तारीख से 30 दिनों के भीतर मामले का निपटान करना होगा। अधिकारी ने कहा कि अपीलीय अधिकारी द्वारा पारित आदेश में सिविल कोर्ट के निर्णय का बल होगा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में किसान इस कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य किसानों को उनकी फसल खराब होने पर सुनिश्चित मूल्य की गारंटी देना है। क्या है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) और इसे लेेकर किसान में क्यूं बना हुआ है डर अनुबंध पर खेती का मतलब ये है कि किसान अपनी जमीन पर खेती तो करता है, लेकिन अपने लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए। कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान को पैसा नहीं खर्च करना पड़ता। इसमें कोई कंपनी या फिर कोई आदमी किसान के साथ अनुबंध करता है कि किसान द्वारा उगाई गई फसल विशेष को कॉन्ट्रैक्टर एक तय दाम में खरीदेगा। इसमें खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी सब खर्च कॉन्ट्रैक्टर के होते हैं। कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को खेती के तरीके बताता है। फसल की क्वालिटी, मात्रा और उसके डिलीवरी का समय फसल उगाने से पहले ही तय हो जाता है। हालांकि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। बता दें कि गुजरात में बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों में अनुबंध पर खेती की जा रही है और इस खेती के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। इसके बावजूद देश के कई राज्यों में किसान इसका विरोध कर रहे हैं, किसानों को डर है कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग कानून किसी भी विवाद के मामले में बड़े कॉर्पोरेट और कंपनियों का पक्ष लेंगे। इस आशंका को खारिज करते हुए, अधिकारी ने कहा कि किसानों के हित में कृषि कानूनों का गठन किया गया है। अधिकारी ने कहा कि एक समझौते में प्रवेश करने के बाद भी, किसानों को अपनी पसंद के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट को समाप्त करने का विकल्प होगा। हालांकि, अन्य पक्ष-किसी भी कंपनी या प्रोसेसर-को समझौते के प्रावधानों का पालन करना होगा। वे दायित्वों को पूरा किए बिना कॉन्ट्रैक्ट से बाहर नहीं निकल सकते है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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