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आलू की नई किस्में किसानों के लिए बनी वरदान, 75 से 135 दिन में होगी तैयार

आलू की नई किस्में किसानों के लिए बनी वरदान, 75 से 135 दिन में होगी तैयार

20 August, 2020

75 से 135 दिन में तैयार होगी आलू की फसल, मिलेगा बेहतर उत्पादन

देश में आलू की खेती करीब-करीब सभी जगह पर होती है। देश की जलवायु और भौगौलिक परिस्थिति के अनुसार पूरे साल भर आलू की खेती की जाती है। आलू उत्पादक राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश और पंजाब अग्राणी राज्य माने जाते है। देश में सबसे ज्यादा आलू का उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है।

आलू की बाजार में मांग बारहों में महीने बनी रहती है इसलिए किसानों का रूझान आलू की खेती की ओर अधिक होने लगा है। किसान आलू के उत्पादन को बढ़ाने के लिए ऐसी किस्मों का चुनाव करना चाहता है जो कम समय में पककर तैयार हो जाए जिससे उसे लाभ प्राप्त हो सके। किसानों की इस समस्या को दूर करने में केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला मदद कर रहा है।

 

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केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला ने देश में विभिन्न राज्यों की जलवायु अनुसार अभी तक 51 आलू की प्रजातियां विकसित की हैं। इन सभी प्रजातियों को देश के अलग-अलग क्षेत्रों में उगाया जाता है। इनमें से कई प्रजातियां ऐसी हैं जो 75-135 दिनों में ही तैयार हो जाती हैं और इनका उत्पादन भी अधिक होता है।

इसी कड़ी में केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला ने आलू की तीन नई प्रजातियां विकसित की और ये तीनों ही प्रजातियां मैदानी इलाकों में आसानी से पैदा की जा सकेंगी। संस्थान द्वारा इन किस्मों का प्रयोग पूरी तरह सफल रहा है। किसान इस आलू की नई किस्मों को लगाकर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते है। आइए जानते हैं आलू की वे किस्में जो किसानों को कम समय में अधिक उत्पादन दे सकती है।

 

 

कुफरी आलू मैदानी इलाकों में अधिक उत्पादन देने वाली किस्में

कुफरी गंगा

वैज्ञानिकों के मुताबिक कुफरी गंगा सबसे कम समय में तैयार होने वाली प्रजा ति है। साथ ही इसका उत्पादन भी अच्छा है। यह प्रजाति जहां कम समय में तैयार हो जाती है, वहीं अधिक उत्पादन मिलता है। इसके अलावा इस बीज में रोगों से लडऩे की क्षमता भी अन्य प्रजातियों से ज्यादा होती है। आलू की कुफरी गंगा प्रजाति अगेती फसल के लिए सबसे उपयुक्त रहती है।

इस आलू का कंद सफेद क्रीम अंडाकरण में होता है इसमें उथली आंखे और गूदा सफेद क्रीमी होता है। इसमें शुष्क पदार्थ 18 प्रतिशत होता है। यह प्रजाति होपर एवं माइट रोग से प्रतिरोधी है। यह करीब 75-80 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी उपज 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है।  

 

कुफरी नीलकंठ

 उत्तर भारतीय मैदानों के लिए जारी कुफरी नीलकंठ ऑक्सीकरण रोधी है और संकर की औसत उपज 35-38 टन/हैक्टेयर होती है। यह संकर कंद उत्कृष्ट स्वाद के साथ गहरे बैंगनी काले रंग लिए होते हैं। मलाईदार गूदा, बेहतर भंडारण स्थायित्व (कटाई पश्चात जीवनकाल), मध्यम शुष्कता (18 प्रतिशत) और मध्यम सुप्तता के साथ-साथ आकार में अंडाकार होते हैं।

यह पकाने में आसान होता है। भुरभुरा होने के साथ-साथ खाना पकाने के बाद मलिनकिरण से मुक्त होता है। भारत में ज्यादातर सफेद या पीले रंग के छिलके वाले आलू पसंद किए जाते हैं, हालांकि पूर्वी भारत में लाल छिलके वाले आलू की मांग रही है और अब इसे उत्तर-पश्चिमी एवं पश्चिम-मध्य मैदानी इलाकों में भी पसंद किया जा रहा है।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के मैदानी इलाकों, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और इसी तरह के कृषि पारिस्थितिकी वाले राज्य में इसकी खेती सरलता से की जा सकती है। कुफरी नीलकंठ में कुफरी ललित, कुफरी लालिमा और कुफरी सिंधुरी नाम की प्रचलित किस्में हैं। इस किस्म से 35-38 टन / हैक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। 

 

कुफरी लीमा

वैज्ञानिकों के मुताबिक कम समय में तैयार होने वाली इस फसल में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होगी, जो किसानों के लिए लाभदायक साबित होगी। काफी शोध के बाद यह नई प्रजाति तैयार की गई है। इस प्रजाति को भारत सरकार ने भी सहमति दे दी है। यूपी में किसान आलू की अगेती प्रजाति को लगाकर फिर गन्ने की बुवाई करते हैं। समय से पहले आलू की इस प्रजाति में फसल का आकार अच्छा होगा और अन्य प्रजाति की अपेक्षा किसानों के लिए यह काफी लाभकारी होगी। 

 

कुफरी आलू की अन्य शीध्र तैयार होने वाली किस्में

कुफरी चंद्रमुखी - आलू की इस किस्म में फसल 80 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 200 क्विंटल तक होती है।
कुफरी शीलामान - आलू की खेती की यह किस्म 100 से 130 दिनों में तैयार होती है, जबकि उपज 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।
कुफरी नवताल-  आलू की इस किस्म में फसल 75 से 85 दिनों में तैयार दो जाती है। इसमें 200 से 250 प्रति क्विटंल तक पैदावार होती है।
कुफरी अलंकार - आलू की यह किस्म 70 दिन में तैयार हो जाती है। यह किस्म पछेती अंगमारी रोग के लिए कुछ हद तक प्रतिरोधी है यह प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल उपज देती है।
कुफरी लालिमा - यह शीघ्र तैयार होने वाली किस्म है जो 90-100 दिन में तैयार हो जाती है इसके कंद गोल आंखे कुछ गहरी और छिलका गुलाबी रंग का होता है यह अगेती झुलसा के लिए मध्यम अवरोधी है . 
कुफरी लवकर - यह किस्म 100-120 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म से 300-400 क्विंटल /हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।
कुफरी स्वर्ण - यह किस्म 110 में दिन में तैयार हो जाती है। उत्पादन की बात करें तो इससे प्रति हेक्टेयर 300 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है। 
कुफरी बहार - यह किस्म 90-110 दिन में लंबे दिन वाली दशा में 100-135 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म से करीब 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।  
कुफरी ज्योति - यह किस्म 80 -120 दिन तैयार होती है। इससे 150-250 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।
कुफरी बादशाह - यह किस्म 100-120 दिन में तैयार हो जाती है। इससे 250-275 क्विंटल /हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।
कुफरी सिंदूरी - आलू की यह प्रजाति 120 से 140 दिन में तैयार हो जाती है। इससे 300-400 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। 
कुफरी देवा - यह किस्म 120-125 दिन में तैयार होती है। इससे 300-400 क्विंटल /हेक्टर तक उत्पादन लिया जा सकता है। 

 

आलू की कुफरी संकर किस्में 

कुफरी जवाहर - 90-110 दिन में तैयार खेतो में अगेता झुलसा और फोम रोग कि यह प्रति रोधी किस्म है यह 250-300 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज दे सकती है।
कुफरी संतुलज - यह संकर किस्म सिन्धु गंगा मैदानों और पठारी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयोगी है। किस्म से 75-80 दिनों की फसल तैयार हो जाती है। इसकी उपज की बात करें तो इससे 23-28 टन / हेक्टेयर तक उपज मिल सकती है।
कुफरी अशोक - आलू की इस संकर किस्म से फसल 75-80 दिनों में तैयार हो जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 23-28 टन तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

 

 

आलू की नवीनतम किस्में

 कुफरी चिप्सोना -1, कुफरी चिप्सोना -2, कुफरी गिरिराज, कुफरी 

 

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कैबिनेट की बैठक : किसानों के हित में तीन अहम फैसले, जूट व गन्ना किसानों को होगा फायदा

कैबिनेट की बैठक : किसानों के हित में तीन अहम फैसले, जूट व गन्ना किसानों को होगा फायदा

अनाज की पैकिंग के लिए अब सिर्फ जूट के बैग का ही होगा इस्तेमाल अब अनाज की पैकिंग के लिए सिर्फ जूट के बैगों का इस्तेमाल होगा। हाल ही में कैबिनेट की बैठक में सरकार ने यह फैसला लिया है। सरकार का मानना है कि ऐसा करने से जूट उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। वहीं दूसरी ओर पॉलीथिन या प्लास्टिक के बैगों का चलन कम होगा जो पर्यावरण के लिए नुकसान देय साबित हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कैबिनेट की बैठक हुई इसमें एथनॉल की कीमत बढ़ाने सहित कुल तीन अहम फैसले लिए गए। इसके अलावा कैबिनेट की बैठक में जूट बैग का इस्तेमाल बढ़ाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को केंद्र सरकार के इन फैसलों के बारें में जानकारी दी। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर कैबिनेट की बैठक में सरकार ने यह तय किया कि खाद्यानों की पैकिंग के लिए अब सिर्फ जूट बैग का इस्तेमाल होगा। इससे देश में जूट और जूट बैग उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। यह भी तय किया गया है कि 20 फीसदी चीनी की पैकिंग के लिए जूट बैग का इस्तेमाल होगा। जावड़ेकर ने कहा कि जूट के इस्तेमाल से जुड़े फैसले से देश में जूट का उत्पादन बढ़ेगा। साथ ही इससे जूट उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि जूट उद्योग में करीब 4 लाख मजदूर काम करते हैं। उन्हें इस फैसले से फायदा होगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 भारत में कहां - कहां होता है जूट का उत्पादन भारत दुनियाभर में सबसे अधिक जूट का उत्पादन करने वाला देश है। पूरी दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत जूट का उत्पादन भारत में होता है। भारत में जूट का वार्षिक अनुमानित उत्पादन 11,494 हजार बंडल है। जूट मुख्य रूप से गंगा के डेल्टा में पैदा की जाने वाली बायो-डिग्रेडेबल फसल है। भारत में पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, मेघालय, त्रिपुरा और आंध्र प्रदेश में जूट का उत्पादन होता है। इनमें से भारत में सबसे अधिक जूट का उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। देश में पैदा किए जाने वाले कुल जूट का 75 प्रतिशत उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है। इसके बाद दूसरा नंबर बिहार का आता है। सरकार के इस फैसले से जूट उत्पादन करने वाले किसानों को फायदा होगा। जूट की खेती में होगा उन्नत बीजों का इस्तेमाल, किसान की आय बढ़ेगी केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जूट की खेती के लिए उन्नत बीजों का इस्तेमाल होगा। इससे हर हेक्टेयर किसानों की आय 10,000 रुपए तक बढ़ जाएगी। उन्होंने कहा कि देश में जूट उत्पादन बढ़ाने पर सरकार ध्यान दे रही है। इसी वजह से 2017 में बांग्लादेश और नेपास से जूट के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया था। उन्होंने कहा कि सरकार ने जीएम पोर्टल से जूट बैग खरीदने का फैसला किया है। इस पोर्टल पर 10 फीसदी जूट बैग की नीलामी होगी। इससे जूट बैग के मूल्य निर्धारण में मदद मिलेगी। इससे देश में जूट का उत्पादन बढ़ेगा। एथेनॉल की कीमतों में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को दी मंजूरी, गन्ना किसानों को होगा फायदा कैबिनेट की बैठक में केंद्र सरकार की ओर से लिए गए अहम फैसलों में एथेनॉल की कीमतों में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को दी मंजूरी देना प्रमुख है। इससे गन्ना किसानों को फायदा होगा। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने बताया कि कैबिनेट ने एथेनॉल की कीमत में 5 से 8 फीसदी वृद्धि के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। शुगर जूस से बनने वाले एथेनॉल की कीमत 3.25 रुपए 62.62 रुपए प्रति लीटर कर दी गई है। बी हैवी की कीमत बढ़ाकर 57.61 रुपए कर दी गई है। सी हैवी की कीमत बढ़ाकर 45.69 प्रति लीटर कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह एथेनॉल की कीमत में 2 से 3.35 रुपए की वृद्धि की गई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी और परिवहन पर आने वाला खर्च तेल मार्केटिंग कंपनियां उठाएंगी। उन्होंने कहा कि एथेनॉल की कीमतें बढ़ाने से चीनी मिलों को गन्ना किसानों को फायदा होगा। एथेनॉल की कीमतों में वृद्धि से किसानों को कैसे होगा फायदा अभी देश में पेट्रोल में 10 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता है। इसके लिए इंडियन ऑयल जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां चीनी मिलों से एथेनॉल खरीदती हैं। एथेनॉल की खपत लगातार बढ़ रही है। पिछले 5 साल में इसकी खपत करीब पांच गुनी हो गई है। केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर का कहना है कि 2014 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 38 करोड़ लीटर एथेनॉल चीनी मिलों से खरीदा था। 2019 में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने चीनी मिलों से 195 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदा। एथेनॉल की खरीद बढऩे से चीनी मिलों के हाथ में पैसा आता है। इससे उन्हें किसानों को गन्ने के मूल्य का भुगतान करने में मदद मिलती है। इस तरह एथेनॉल की खपत पढऩे से आखिरकार गन्ना किसानों को फायदा होता है। बांधों के रखरखाव के लिए को भी दी मंजूरी, 10,211 करोड़ रुपए होंगे खर्च कैबिनेट की बैठक में देश में बांधों को उन्नत बनाने और उनके रखरखाव के लिए योजना को भी मंजूरी दी गई है। इस बारे जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि 19 राज्यों में 736 बांधों को उन्नत बनाने और उनके रखरखाव के लिए व्यापक योजना को मंजूरी दी गई है। इस पर 10,211 करोड़ रुपए की रकम खर्च होगी। उन्होंने कहा कि देश में 80 फीसदी बांध 25 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। इसलिए इन्हें रखरखाव की काफी जरूरत है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

गन्ने की इन दो नई किस्मों में नहीं लगेगा रेड रॉट रोग

कृषि वैज्ञानिकों ने जारी की दो नई किस्में, जानें, कौनसी है ये दो किस्में और इनकी विशेषताएं अब गन्ना किसानों की फसल रेड रॉट रोग के कारण बर्बाद नहीं होगी। हाल ही में कृषि वैज्ञानिकों ने गन्ने की दो ऐसी किस्मों को पहचाना है जिस पर इस रोग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता यानि इन किस्मों में इस रोग से लडऩे की क्षमता है और इसलिए इन किस्मों में यह रोग नहीं लगेगा। बता दें कि पिछले कुछ दिनों पूर्व रेड रॉट रोग का प्रभाव से उत्तरप्रदेश के सीतापुर, लखीमपुर खोरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर आदि जिलों में देखा गया जिससे यहां के किसानों की 80 फीसदी फसल सूख कर तबाह हो गई। पर अब किसानों को इस रोग से डरने की जरूरत नहीं है। हाल ही में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ व उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर ने गन्ने की नई किस्म सीओएलके-कोलख 14201 जो जल्दी तैयार हो जाती है और सामान्य किस्म सीओएस-कोशा 14233 जारी की है। प्रदेश के किसानों को गन्ने की दो नई प्रजातियां बोने के लिए अगले साल से मिलनी शुरू हो जाएंगी। यह दोनों ही प्रजाति अधिक पैदावार देने वाली हैं। इनमें कीट और रोग भी कम लगता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर के डायरेक्टर डॉ. जे सिंह ने बताया कि हाल ही में आयुक्त गन्ना एवं चीनी उद्योग संजय आर भूसरेड्डी की अध्यक्षता में बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक लखनऊ में हुई थी, जिसमें गन्ना शोध संस्थान शाहजहांपुर, सेवरही, मुजफफरनगर तथा भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ के साथ-साथ चीनी मिल दौराला, अजवापुर, पलिया, बिसवांं एवं रोजा द्वारा विभिन्न होनहार जीनोटाइप के उपज एवं चीनी परता के आंकड़े प्रस्तुत किए गए। प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर विभिन्न जीनोटाइप में अगेती किस्मों में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित कोलख 14201 तथा मध्य देर से पकने वाली किस्मों में गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर द्वारा विकसित कोशा 14233 बेहतर पाई गई, जिसे सर्वसम्मति से सामान्य खेती के लिए स्वीकृत किया गया। भूसरेड्डी ने कहा कि वर्तमान में गन्ना किस्म को 0238 में लाल सडऩ रोग के आपतन के कारण किसानों को अब नई गन्ना किस्मों को अपनाना चाहिए, जिस कड़ी में यह दोनों किस्में सामान्य खेती के लिए बेहतर है। क्या है नई किस्म कोलख 14201 व कोशा 14233 की विशेषताएं किस्म कोलख 14201 में परीक्षण के दौरान 900-1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज प्राप्त हुई है। वहीं औसतन 13.0 प्रतिशत पोल इन केन भी प्राप्त हुआ जो को. 0238 से ज्यादा था। वहीं इस किस्म का गन्ना बिलकुल सीधा खड़ा रहता है, और इसको बंधाई की कम आवश्यकता पड़ती है। साथ ही इसका गुड़ सुनहरे रंग और उत्तम गुणवत्ता का होता है। जो ऑर्गैनिक गुड़ उत्पादन के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। कोलख 14201 और कोशा 14233 में लाल सडऩ रोग से लडऩे की क्षमता बहुत ज्यादा है, और कोलख 14201 पर बेधक कीटों का भी बेहद कम आक्रमण होता है। गन्ने की सीओ-0239 किस्म का होगा विलोपन गन्ने की सीओ-0239 किस्म और सीओ 0118 किस्म एक ही है। अत: स्वीकृत किस्मों की सूची में से सीओ 0239 का नाम विलोपित कर दिया जाएगा। समिति द्वारा यह भी निर्णय लिया गया कि एकल गन्ना किस्मों की बुवाई के कारण प्रदेश में रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, अत: प्रजातीय संतुलन बनाए रखने के लिए अगेती एवं मध्य देर कि किस्मों का संतुलन रखा जाना जरूरी है। वहीं सीओ 0239 किस्म के विलोपन को लेकर डॉ सिंह का कहना है कि सीओ 0238 का रकबा प्रदेश में बहुत बड़ा है इसलिए इतना आसान नहीं हैं सीओ 0238 को परिवर्तित करना। गन्ने की सीओ - 0239 किस्म का क्यूं किया जा रहा है विलोपन मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के निदेशक डॉ. ज्योत्सेंद्र सिंह का कहना है कि परीक्षण आंकड़ों पर गहन चर्चा के बाद यह पाया गया, कि इस शीघ्र गन्ना किस्म में प्रचलित किस्म सीओ -0238 से ज्यादा उपज क्षमता के साथ-साथ ज्यादा चीनी परता भी मिला है। आज जब गन्ने की सीओ-0238 किस्म में वृहद स्तर पर लाल सडऩ रोग की समस्या बढ़ रही है। वहीं किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में सीओ 0238 पर रोक लगाने की संभावना अधिक बढ़ रही है। वहीं इसको सीओ 0238 को परिवर्तित कर के को.लख. 14201 को बढ़ावा देने आवश्यकता अब बढ़ गई है। आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट करने का लिया निर्णय 0239 किस्म के विलोपन के साथ ही आगामी सालों में कोपीके 05191 को फेजआउट कर दिया जाएगा। इस संबंध में चीनी मिल प्रतिनिधियों की ओर से लखनऊ में हुई बैठक में यह अवगत कराया गया कि गन्ना किस्म कोपीके 05191 में चीनी परता कम है तथा लाल सडऩ रोग का भी प्रकोप बढ़ रहा है। इस पर समिति द्वारा इसे आगामी सालों में फेजआउट करने का निर्णय लिया गया है। कब तक किसानों को मिल पाएगा इन दो नई किस्मों का बीज डॉ. सिंह के अनुसार चयनित किसानों और चीनी मिलों के माध्यम से कोलख.14201 का बीज तैयार कराया जा रहा है। अगले वर्ष किसानों को इसका बीज आसानी मिल सकेगा। अगले वर्ष 50 फीसदी तक किसानों के पास कोलख 14201 का बीज तैयार मिलेगा जिसका वे बुवाई में उपयोग कर बेहतर गन्ना का उत्पादन कर सकेंगे। जल्द ही किसानों को मिलेंगी और नई किस्में भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार साह के अनुसार जल्द ही उत्तरी राज्यों के लिए गन्ने की चार किस्में कोलख 14204, Co15023, CoPb14185 व CoPb11453 और दक्षिणी राज्यों के लिए तीन किस्में MS13081, VSI 12121 और Co13013 को संबंधित कृषि जलवायु क्षेत्रों में खेती के लिए जारी किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

ये 5 कृषि यंत्र खेती के काम को बनाएंगे आसान, जानिएं आधुनिक कृषि यंत्रों की विशेषताएं

ये 5 कृषि यंत्र खेती के काम को बनाएंगे आसान, जानिएं आधुनिक कृषि यंत्रों की विशेषताएं

अब किसानों को निराई - गुड़ाई के कार्य में नहीं होगी दिक्कत, खर्चा भी होगा कम भारत में अधिकतर किसान परंपरागत रूप से खेती करते आ रहे हैं। इससे उनको अधिक श्रम के साथ खर्चा भी अधिक होता है। आज अनेक प्रकार के कृषि यंत्र बाजार में उपलब्ध हैं जो खेती के काम को आसान बनाने में मदद करते हैं। पर जानकारी के अभाव में हमारे किसान भाई इनका प्रयोग नहीं कर पाते हैं। नतीजा वही अधिक श्रम व पैसा खर्च करने के बाद भी न तो उत्पादन में बढ़ोतरी होती है और न ही श्रम लागत कम हो पाती है। इससे किसानों को जितना लाभ फसल के उत्पादन पर होना चाहिए उतना नहीं मिल पाता है। आज हम बात करेंगे खेती में निराई-गुड़ाई के कार्य में प्रयोग किए जाने वाले यंत्रों के बारे मेें, जो किसानों को कम खर्च में निराई-गुड़ाई का कार्य करने में उनकी मदद करेंगे। किसान अपनी जरूरत के हिसाब से यंत्रों का चयन कर सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 पावर वीडर पावर वीडर आमतौर पर छोटी मशीनें होती हैं जिसको इस्तेमाल करना बेहद आसान है। इसमें एक या दो इंजन लगे होते हैं. इंजन से ब्लेड, मैकेनिकल क्लच और गियरबॉक्स को जोडऩे के लिए एक शाफ्ट लगी होती है। इसकी गति को नियंत्रित करने के लिए चेन या बेल्ट ड्राइव अथवा वर्म गियर का उपयोग किया जाता है। सामान्यत दो या चार गियर वाले वीडर आते हैं। छोटे वीडर 1.5 से 5 हॉर्स पावर क्षमता वाले होते हैं। आमतौर पर दो स्ट्रोक इंजनों की क्षमता करीब 25 से 50 सीसी है। इनकी ईंधन खपत 60 से 80 मिनट प्रति लीटर होती है। इसका उपयोग खरपतवार निकालने के लिए किया जाता है। यह सब्जियों फूलों व फलों के पौधों सहित कपास में अनाश्यक कतारों के बीच में उग आई खरपतवार निकालने के काम आता है। इसके अलावा ये गन्ना की फसल मेें निराई-गुड़ाई तथा मिट्टी चढ़ाने में काम आता है। यह खासकर उन छोटे तथा सीमान्त किसानों के लिए फायदेमंद रहता है जो ट्रैक्टर तथा उससे संबंधित यंत्रों पर भारी- भरकम दाम खर्च करने में सक्षम नहीं हैं। अपने आकर और फीचर्स के चलते कई कीमतों के पावर वीडर बाजार में उपलब्ध हैं। मिनी पावर वीडर की कीमत 10,000 रूपए से शुरू होकर 50,000 रुपए तक हो सकती है। जबकि मध्यम या दीर्घ पावर वीडर पचास हजार से डेढ़ लाख रुपए तक की कीमतों में आते हैं। उन्नत और एडवांस तकनीक वाले पावर वीडर की कीमतें एक से ढाई लाख रुपए तक हो सकती है। पूसा वीडर यह निराई-गुड़ाई के लिए बहुत कम कीमत में मौजूद है। 8 किलोग्राम वजन वाले इस साधारण यंत्र से भी निराई-गुड़ाई का काम किया जाता है। यंत्र में लगे हैंडल को अपनी सुविधानुसार ऊपर नीचे एडजस्ट कर सकते हैं। इस यंत्र को खड़े हो कर ही चलाया जाता है। पूसा 4 पहिए का वीडर यह बहुत ही साधारण यंत्र है। इस यंत्र में निराई-गुड़ाई करने के लिए 30 सेंटीमीटर चौड़ा फाल लगा है। इस यंत्र से 40 सेंटीमीटर या उस से ज्यादा कतार से कतार की दूरी वाली फसलों की गुड़ाई कर सकते हैं। यंत्र का वजन तकरीबन 12 किलोग्राम है। खड़े हो कर एक व्यक्ति द्वारा इसे चलाया जाता है। हाथ से चला कर गुड़ाई करने वाले ये दोनों यंत्र भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली द्वारा बनाए गए हैं। इन के लिए आप इस संस्थान के कृषि अभियांत्रिकी विभाग से संपर्क कर के पूरी जानकारी ली जा सकती है। ट्रेकआन कल्टीवेटर कम वीडर यह यंत्र गन्ना, कपास, मैंथा, फूल, पपीता और केले की फसलों व दूसरी कतार वाली फसलों की निराई-गुड़ाई व खाद मिलाने के काम आता है। यह यंत्र पहाड़ी इलाकों में कृषि व बागानों के काम के लिए भी कारगर है। इस यंत्र से निराई-गुड़ाई का खर्च तकरीबन 30 से 40 रुपए प्रति बीघा आता है। यह कल्टीवेटर कम वीडर 2 माडलों में मौजूद है। पहला मौडल टीके160पी पेट्रोल से चलने वाला है व दूसरा मौडल टीके 200के केरोसिन से चलता वाला है। दोनों में 4 स्ट्रोक इंजन होता है। इस में 4.8 हार्सपावर का इंजन लगा है। इस में लगे रोटर की चौड़ाई 12 से 18 इंच तक है। इस यंत्र का वजन तकरीबन 80 किलोग्राम है। इस यंत्र को अमर हैड एंड गीयर मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी द्वारा बनाया गया है। यह यंत्र अपने आप आगे की ओर खेत तैयार करता हुआ चलता है। मशीन को धकेलना नहीं पड़ता है। जरूरत के मुताबिक रोटर की चौड़ाई व गहराई घटाई-बढ़ाई जा सकती है। पावर टिलर चालित यंत्र इस यंत्र को केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल, मध्य प्रदेश द्वारा बनाया गया है। इस यंत्र को 8-10 हार्स पावर के टिलर के साथ जोड़ कर चलाया जा सकता है। इस की कीमत करीब 18000 से 20000 रुपए है। नोट- उपरोक्त कृषि यंत्रों को खरीदने के इच्छुक किसान भाई ट्रैक्टर जंक्शन से संपर्क कर सकते हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

धान में कंडुआ रोग का प्रकोप, ऐसे करें बचाव

धान में कंडुआ रोग का प्रकोप, ऐसे करें बचाव

जानें, क्या है कंडुआ रोग? और उसके लक्षण व नियंत्रण के उपाय पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार के कई जिलों में धान की फसल में कंडुआ रोग देखा जा रहा है। हालांकि इस समय अधिकतर धान की फसल कट चुकी है लेकिन कई जिलों में धान की पछेती फसल तैयार होने को है लेकिन उससे पहले ही इस रोग ने फसल पर हमला बोल दिया है जिससे किसानों की मुश्किल बढ़ गई है। जानकारी के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया, देवरिया, गोरखपुर, बनारस, चंदौली, महाराजगंज और यूपी से सटे बिहार के कैमूर जैसे जिलों में कंडुआ का प्रकोप देखा गया है। इस रोग की खासियत ये है कि जैसे-जैसे धान की फसल बढ़ती जाती है इसका असर भी बढ़ता जाता है। इस रोग से प्रभावित फसल की उत्पादन कम हो जाता है। वहीं अनाज का वजन कम हो जाता है और आगे अंकुरण में भी समस्या आती है। ये रोग उच्च आर्द्रता और जहां 25-35 सेंटीग्रेड तापमान होता है वहां पर ज्यादा फैलता है, ये हवा के साथ एक खेत से दूसरे खेत उडक़र जाता है और फसल को संक्रमित कर देता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या है कंडुआ रोग ( फाल्स स्मट ) कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कंडुआ एक प्रमुख फफंूद जनित रोग है, जो कि अस्टीलेजनाइडिया विरेन्स से उत्पन्न होता है। इसका प्राथमिक संक्रमण बीज से होता है, इसलिए धान की खेती में बीज शोधन करना जरूरी है। इसका द्वितीय संक्रमण वायु जनित बीजाणु द्वारा होता है। यह रोग कंडुआ अक्टूबर से नवंबर तक धान की अधिक उपज देने वाली किस्मों में आता है। जिस खेत में यूरिया का प्रयोग अधिक होता है और वातावरण में काफी नमी होती है उस खेत में यह रोग प्रमुखता से आता है। धान की बालियों के निकलने पर इस रोग का लक्षण दिखाईं देने लगता है। इस रोग से धान की फसल को काफी नुकसान होता है। क्या है कंडुआ रोग के लक्षण धान वैज्ञानिकों के अनुसार धान का ये रोग बालियों के निकलने पर दिखाई देता है। इसका असर धान के दानों पर पड़ता है। यह रोग लगने पर प्रभावित दानों के अंदर रोगजनक फफूंद अंडाशय को एक बड़े कटुरुप में बदल देता है। बाद में ये दाने जैतुनी हरे रंग के हो जाते है। इस रोग के प्रकोप से दाने कम बनते है और उपज में दस से 25 प्रतिशत की कमी आ जाती है। धान को कंडुआ रोग से बचाने के उपाय धान को कंडुआ रोग से बचाने के लिए धान की बुवाई से पहले बीजों उपचारित किया जाना बेहद जरूरी है। जिस खेत में इस रोग का प्रकोप हुआ हो उस खेत से लाकर बीज कभी न बोएं। इसके अलावा बीजों को बोने से पहले उपचारित कर करें। इसके लिए सदैव प्रमाणिक बीज का ही इस्तेमाल करें। धान वैज्ञानिक के अनुसार कंडुआ रोग वाले खेतों में नमक के घोल में धान के बीज को उपचारित करना चाहिए। बीज को साफ कर सुखाने के बाद नर्सरी डालने के समय कार्जेन्डाजिम-50 के चूर्ण दो ग्राम या एक ग्राम यीरम किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद रोग के लक्षण दिखने पर टाईसाईक्लाजोल-75 डब्ल्यू पी पंद्रह ग्राम प्रति लीटर अथवा क्लोरोयाईनोनील-75 डब्ल्यू पी बीस ग्राम प्रति लीटर अथवा प्रोपिकोनाजोल-25डब्ल्यू पी पंद्रह ग्राम प्रतिलीटर की दर से पानी में मिलाकर प्रति एकड छिडक़ाव करना चाहिए। इस प्रकार इस रोग से धान की फसल को बचाया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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