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गंगा किनारे बसे शहरों में होगी प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भर बनेंगे किसान

गंगा किनारे बसे शहरों में होगी प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भर बनेंगे किसान

07 September, 2020

गोवंश आधारित जीरो बजट प्राकृतिक खेती

ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। केंद्र सरकार किसानों के जीवन में खुशहाली लाने के लिए उनकी आय बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। देश के लोगों को बिना कीटनाशक के शुद्ध और पौष्टिक अनाज व सब्जियां मिलें और खेती से किसान आत्मनिर्भर बनें इस दिशा में सरकार के प्रयास लगातार जारी है। अब सरकार ने गंगा किनारे बसे शहरों में प्राकृतिक खेती पर ध्यान केंद्रित किया है।

प्रायोगिक तौर पर देश के सबसे बड़े राज्य उप्र के किसान अब प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भर बनेंगे। यूपी के 6 जिलों में फसलों के प्रमाणीकरण हेतु लैब की सुविधा तथा प्राकृतिक खेती का रकबा बढ़ाने पर जोर दिया जायेगा। खेती को बढ़ावा देने के लिए मंडल स्तर पर फसलों के प्रमाणीकरण का कार्य होगा। सरकार का मानना है कि कृषि क्षेत्र से ही सबसे ज्यादा रोजगार मिलते हैं इसलिए कृषि के विकास तथा किसानों की खुशहाली के लिए सरकार संकल्पित हैं। 

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1
 

गंगातट पर बसी 1038 ग्राम पंचायतों में प्राकृतिक खेती की प्लानिंग

उप्र की योगी सरकार जीरो फार्मिंग के जरिए कृषि के पारंपरिक और मूलभूत तरीके पर लौटने पर जोर दे रही है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश  के 27 जिलों, 21 नगर निकाय, 1038 ग्राम पंचायतों और 1648 राजस्व ग्रामों में गंगा यात्रा के दौरान किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति विशेष रूप से जागरूक किया गया। सरकार की ओर से गंगा तट के दोनों ओर नमामि गंगे परियोजना के तहत व्यापक रूप से किसानों के फायदे के लिए प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

 

 

पहले चरण में प्रदेश की 1038 ग्राम पंचायतों में मास्टर ट्रेनर तैयार किए जा रहे हैं, जो गांवों में जाकर किसानों को गो आधारित खेती का प्रशिक्षण देंगे। गंगा किनारे गंगा मैदान, गंगा उद्यान, गंगा वन तथा गंगा तालाब को विकसित किया जा रहा है, जो प्राकृतिक खेती के लिए काफी सहायक होंगे। वहीं, गंगा नर्सरी के माध्यम से किसानों को मुफ्त में फूल तथा फलों वाले पौधे वितरित की योजना है।

तटवर्ती ग्रामवासियों को प्राकृतिक खेती व अपने खेतों की मेड़ों पर फलदार वृक्ष लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उत्तरप्रदेश में गोवंश आधारित जीरो बजट खेती के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी समय-समय पर आयोजित किए जा रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विश्वविद्यालयों के माध्यम से न सिर्फ प्राकृतिक कृषि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, बल्कि अधिक से अधिक किसानों को इसके प्रति जागरूक भी किया जा रहा है।

 

छह जिलों में लैब की सुविधा शीघ्र

प्राकृतिक कृषि उत्पादों का उचित मूल्य मिल सकें, इसके लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश के 6 जिलों लखनऊ, वाराणसी, मेरठ, गोरखपुर, आगरा और झांसी में प्राकृतिक उत्पादों के प्रमाणीकरण के लिए लैब की सुविधा भी जल्द उपलब्ध करायी जाएगी। प्राकृतिक खेती की फसलों के प्रमाणीकरण का कार्य मंडल स्तर पर मंडी परिषद द्वारा किया जाएगा।

 

प्राकृतिक खेती को कृषि पाठ्यक्रम में शामिल करने की योजना

देश में किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए कई योजनाएं चल रही है। किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गोवंश आधारित जीरो बजट प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन हो और आय बढ़ सके। उत्तरप्रदेश में निराश्रित गोवंश आश्रयस्थलों को गौ आधारित प्राकृतिक कृषि एवं अन्य गौ उत्पादों के प्रशिक्षण केंद्र में विकसित करने की योजना है। बुंदेलखंड को जीरो बजट खेती के मुख्य केंद्र में रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे पूरे क्षेत्र का आर्थिक विकास कृषि के माध्यम से संभव हो सकेगा। प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए इसे कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी शामिल करने की भी योजना है।

 

प्रति गाय 900 रुपए की मिलेगी सहायता

उत्तरप्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार चरणबद्ध तरीके से कार्य कर रही है। उत्तर प्रदेश में 5 लाख से अधिक गोवंश की जियो टैगिंग की गई है। वहीं 4.76 लाख से अधिक निराश्रित गोवंश की देखभाल की जा रही है। निराश्रित गायों के पालन-पोषण के लिए गोपालकों को प्रति माह प्रति गाय 900 रुपए की सहायता राशि प्रदान करने का निर्णय लिया गया है। गोकशी और गोवंश से जुड़े अपराधों को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश में गोवध निवारण (संशोधन) अध्यादेश-2020 लागू है। अध्यादेश के तहत 10 वर्षों तक का कठोर कारावास और 5 लाख तक का जुर्माने का प्रावधान है।

 

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के लाभ : कम खर्च में ज्यादा पैदावार

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग यानी प्राकृतिक खेती ऐसी खेती जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से बचा जाता है। इस खेती के पैरोकारों का कहना है कि यह खेती देसी गाय के गोबर और मूत्र पर आधारित है। जीरो बजट खेती का उद्देश्य किसानों को कर्ज के जाल से बाहर निकालना है। उन्हें महंगे बीज, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की खरीद के चंगुल से मुक्त कराना है।

किसानों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कर खेती से उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। जीरो बजट खेती में खेतों की सिंचाई, मड़ाई और जुताई का सारा काम गोवंश की मदद से किया जाता है, जिसकी वजह से किसी भी प्रकार के डीजल या ईंधन वाले वाहनों की जरूरत नहीं होती। कम लागत लगने से खेती करने पर किसानों को फसलों पर अधिक मुनाफा प्राप्त होता है। सोने पे सुहागा यह है कि इस विधि से जो भी फसल उगाई जाती है वह सेहत के लिए काफी लाभदायक होती है, क्योंकि इसे उगाने के लिए के लिए किसी भी तरह के रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। 

 

 

केंद्र की मोदी सरकार बजट में कर चुकी है घोषणा

मोदी सरकार 2.0 के पहले बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने किसानों की आर्थिक हालत में सुधार के लिए कई कदम उठाए जाने का ऐलान किया था, जिसमें जीरो बजट खेती मुख्य बिन्दु था। जीरो बजट फार्मिंग में किसान जो भी फसल उगाएं उसमें फर्टिलाइजर, कीटनाशकों के बजाय किसान प्राकृतिक खेती करेंगे। इसमें रासायनिक खाद के स्थान पर गोबर, गौमूत्र, चने के बेसन, गुड़ और मिट्टी से बने खाद का इस्तेमाल किया जाता है। 

सभी किसान भाई जानते हैं कि खेतों में रसायनों के अधिक प्रयोग से अधिक पानी की आवश्यकता होती है, लगातार रासायनिक खाद के उपयोग से उपजाऊ भूमि की उपज क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। रासायनिक खाद से उपजे अनाज से हमारे अंदर कहीं न कहीं धीमा जहर भी पहुंच रहा है। इससे लोग तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। अगर स्वास्थ्य जीवन की ओर उन्मुख होना है, तो प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना ही होगा।

 

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मूंगफली की सरकारी खरीद : नेफैड 5,275 रुपए समर्थन मूल्य पर खरीदने को तैयार

मूंगफली की सरकारी खरीद : नेफैड 5,275 रुपए समर्थन मूल्य पर खरीदने को तैयार

किसान एक नवंबर से करा सकेंगे पंजीकरण, 18 नबंवर से शुरू होगी मूंगफली की खरीद राजस्थान के किसानों के लिए खुशी की खबर है। सरकारी एजेंसी नेफैड किसानों से समर्थन मूल्य पर मूंगफली खरीदने को तैयार हो गया है। नेफैड 18 नवंबर से मूंगफली की खरीद शुरू करेगा। अभी कुछ दिनों पहले नेफैड ने राजस्थान के किसानों से मूंगफली खरीदने को लेकर असमर्थता प्रकट की थी। इसके बाद राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार व नेफैड से प्रदेश के किसानों से मूंगफली की खरीद समर्थन मूल्य पर करने का आग्रह किया था। इसके बाद नेफैड ने मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद को मंजूरी देते हुए राजस्थान के किसानों को राहत प्रदान की है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 समर्थन मूल्य पर मूंगफली खरीद के लिए पंजीकरण बता दें कि राजस्थान में मूंगफली की खरीद के लिए 20 अक्टूबर से पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की जाने वाली थी, लेकिन इसी बीच नेफैड ने अपने गोदामों में जगह खाली नहीं होने का हवाला देते हुए मूंगफली की खरीद के लिए असमर्थता जताई थी। इसके बाद राजस्थान में मूंगफली की सरकारी खरीद के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया रोक दी गई थी। अब चूंकी नेफैड ने मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद को हरी झंडी दे दी है। इसी के साथ मूंगफली खरीद के लिए पंजीकरण कराने की प्रक्रिया एक बार फिर से शुरू कर दी जाएगी। पूर्व में अन्य फसल का पंजीकरण कराने वाले किसान भी करा सकेंगे पंजीयन सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना ने मीडिया को दी गई जानकारी में बताया कि नेफैड एवं भारत सरकार से वार्ता के बाद अब किसान 1 नवंबर से मूंगफली बेचान के लिए ई-मित्र या खरीद केन्द्रों से पंजीयन करा सकेंगे। राज्य में समर्थन मूल्य पर मूंगफली की खरीद 18 नवंबर से आरंभ की जाएगी। 1 नवंबर से मूंग, उड़द एवं सोयाबीन की खरीद के लिए 20 अक्टूबर से पंजीयन प्रारंभ कर दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि किसानों द्वारा पूर्व में भी किसी अन्य जिंस का पंजीयन कराया जा चुका है तो वह किसान भी मूंगफली का पंजीयन करा सकते हैं। पहले पंजीकरण किए गए थे स्थगित नेफैड के मूंगफली खरीदने से इनकार करने के बाद राजस्थान में मूंगफली की सरकारी खरीद के लिए किए जाने वाले पंजीकरण को स्थगित कर दिया गया था। जिससे किसान सिर्फ मूंग, उड़द, एवं सोयाबीन का ही पंजीकरण करवा पा रहे थे परन्तु अब नाफैड ने समर्थन मूल्य पर मूंगफली को भी मंजूरी दे दी है। इसी के साथ पुन: पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। बता दें कि किसान को अपनी किसी भी फसल का समर्थन मूल्य पर विक्रय के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य हैं। पंजीकरण के अभाव में किसान की मूंगफली सहित अन्य उपज नहीं खरीदी जाएगी। मूंगफली उपज विक्रय के लिए कहां और कब कराएं पंजीकरण किसान ई-मित्र केंद्र एवं खरीद केन्द्रों पर प्रात: 9 बजे से सायं 7 बजे तक पंजीकरण करवा सकते है। किसान एक जनआधार कार्ड में अंकित नाम में से जिसके नाम गिरदावरी होगी उसके नाम से एक पंजीयन करवा सकेगें। किसान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि जिस तहसील में कृषि भूमि है उसी तहसील के कार्यक्षेत्र वाले खरीद केन्द्र पर उपज बेचान हेतु पंजीकरण कराएं। दूसरी तहसील में यदि पंजीकरण कराया जाता है तो पंजीकरण मान्य नहीं होगा। किसान पंजीयन कराते समय यह सुनिश्चित कर ले कि पंजीकृत मोबाइल नंबर, से जनआधार कार्ड से लिंक हो जिससे समय पर तुलाई दिनांक की सूचना मिल सके। किसान प्रचलित बैंक खाता संख्या सही दे ताकि ऑनलाइन भुगतान के समय किसी प्रकार की परेशानी किसान को नहीं हो। मूंगफली की समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए ये दस्तावेज होंगे देने किसान को पंजीकरण केंद्रों पर अपने साथ जनआधार कार्ड नंबर, खसरा नंबर, गिरदावरी की प्रति, बैंक पासबुक की प्रति ले जानी होगी। किसानों को यह दस्तावेज पंजीकरण फार्म के साथ अपलोड करने होंगे। जिस किसान द्वारा बिना गिरदावरी के अपना पंजीयन करवाया जाएगा, उसका पंजीयन समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए मान्य नहीं होगा। यदि ई-मित्र द्वारा गलत पंजीयन किए जाते हैं या तहसील के बाहर पंजीकरण किए जाते है तो ऐसे ई-मित्रों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

पीएम किसान सम्मान निधि योजना : अब किसान के खातें में आ सकते हैं 11,000 रुपए

पीएम किसान सम्मान निधि योजना : अब किसान के खातें में आ सकते हैं 11,000 रुपए

खाद खरीदने के लिए सरकार देगी 5000 रुपए सालाना, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने की केंद्र सरकार से सिफारिश किसानों के लिए एक खुश खबर आई हैं। सरकार किसान को खाद खरीदने के लिए पैसा उनके खाते में देने की तैयारी में हैं। खबर है कि खाद खरीदने के लिए सरकार किसानों को 5000 रुपए की रकम सालाना देने वाली है जिसे दो किस्तों मेें भुगतान किया जाएगा। ये रकम पीएम किसान योजना में मिलने वाली 6000 रुपए से अलग होगी। यानि अब किसान को सरकार की ओर से सालाना कुल मिलकर 11,000 रुपए की मदद की जाएगी। ऐसा इसलिए किया जा सकता है क्योंकि सरकार चाहती है कि खाद यूरिया बेचने वाली कंपनियों को सरकार जो सब्सिडी देती है वो सीधी किसान के खाते में जाए जिससे किसान स्वयं यूरिया खाद की खरीद कर सके। क्योंकि देखने में आया है कि सरकार की ओर से यूरिया खाद कंपनियों को सब्सिडी दी जाती है उसके बाद भी किसान को यूरिया खाद के लिए किल्लत का सामना करना पड़ता है। वहीं इसकी कालाबाजारी होने से किसान को ऊंचे दामों में यूरिया खरीदना पड़ता है। इस समस्या का समाधान करने के साथ ही किसानों की आय बढ़ाने के प्रयास सरकार द्वारा किए जा रहे हैं जिससे किसान भाइयों को फायदा होगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 सीएसीपी ने केंद्र सरकार को भेजा प्रस्ताव कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ( एग्रीकल्चर कोस्ट एंड प्राइज कमीशन (सीएसीपी)) ने केंद्र सरकार से किसानों को सीधे 5000 रुपए सालाना खाद सब्सिडी के तौर पर नकद देने की सिफारिश की है। आयोग चाहता है कि किसानों को 2,500 रुपए की दो किश्तों में भुगतान किया जाए। पहली किश्त खरीफ की फसल शुरू होने से पहले और दूसरी रबी की शुरुआत में दी जाए। केंद्र सरकार ने सिफारिश मान ली तो किसानों के पास ज्यादा नकदी होगी, क्योंकि सब्सिडी का पैसा सीधे उनके खाते में आएगा। हर साल सरकार खाद सब्सिडी पर करती है 80 हजार करोड़ खर्च उर्वरक सब्सिडी के लिए सरकार सालाना लगभग 80 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम करती है। 2019-20 में 69418.85 रुपए की उर्वरक सब्सिडी दी गई। जिसमें से स्वदेशी यूरिया का हिस्सा 43,050 करोड़ रुपए है। इसके अलावा आयातित यूरिया पर 14049 करोड़ रुपए की सरकारी सहायता अलग से दी गई। छह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां, 2 सहकारी और 37 निजी कंपनियों को यह सहायता मिली है। इसके बावजूद किसानों को समय पर खाद उपलब्ध नहीं हो पाती है। सब्सिडी देने के बाद भी किसान को महंगे दामों पर यूरिया की खरीदना पड़ता है। खाद सब्सिडी को लेकर क्या है सरकार की योजना केंद्र सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए किसानों को उर्वरक की सब्सिडी सीधे उनके बैंक अकाउंट में देने पर विचार कर रही है। किसानों के खाते में नकद सब्सिडी जमा कराने के लिए 2017 में ही नीति आयोग की एक विशेषज्ञ समिति गठित कर दी गई थी लेकिन अब तक इस पर ठोस काम नहीं हो पाया। लेकिन अब सीएसीपी की सिफारिश के बाद नई व्यवस्था लागू होने की उम्मीद जग गई है। अब सरकार चाहती है कि ये पैसा किसान को सीधा पहुंचाया जाए जिससे वह स्वयं खाद की खरीद कर सके। बता दें कि अभी कुछ दिन पहले ही एक कार्यक्रम के दौरान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि इन यूरिया कंपनियों को सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी को समाप्त करके उस पैसे को किसान के खाते में डाल दिया जाए जिससे किसान खुद खाद खरीद सके और इन कंपनियों का सब्सिडी खाने का खेल खत्म हो जाए। उन्होंने कहा था कि मैं केंद्र सरकार के समक्ष इस बात को रखूंगा। इन सब बातों से लगता है कि केंद्र सरकार भी अब यूरिया कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी को सीधा किसानों को दिया जाएगा। किसानों को रकबा के हिसाब दिया जाए पैसा मीडिया में प्रसारित व प्रकाशित खबरों के अनुसार राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि सरकार खाद सब्सिडी खत्म करके रकबे के हिसाब से उसका पूरा पैसा किसानों के अकाउंट में दे दे तो यह अच्छा होगा। लेकिन अगर सब्सिडी खत्म करके उस पैसे का कहीं और इस्तेमाल करेगी तो किसान इसके विरोध में उतरेंगे। जितना पैसा उर्वरक सब्सिडी के रूप में कंपनियों को जाता है उतने में हर साल सभी 14.5 करोड़ किसानों को 6-6 हजार रुपये दिए जा सकते हैं। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

हींग की खेती : हिमाचल प्रदेश में किसानों ने शुरू की हींग की खेती

हींग की खेती : हिमाचल प्रदेश में किसानों ने शुरू की हींग की खेती

भारत में पहली बार हो रही है हींग की खेती, किसानों में उत्साह भारतीय व्यंजनों में हींग का बड़ा महत्व हैं। हमारे देश में हींग का इस्तेमाल भोजन में काफी पुराने समय से किया जा रहा है। इसके अलावा इसे दवा के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है। जहां एक ओर हींग भोजन में महक ला दती है वहीं दूसरी ओर इसके इस्तेमाल से कई बीमारियों दूर हो जाती हैं। पेट व सांस संबंधी रोगों में इसका उपयोग रामबाण माना जाता है। इसके औषधीय महत्व के कारण ही इसका इस्तेमाल भोजन में किया जाता है। अभी तक इसकी खेती हमारे भारत में नहीं होती थी। इस कारण हम हींग का आयात विदेशों से करते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत हर साल करीब 1200 टन कच्चे हींग का आयात करता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 हींग का पेड़ कहां मिलता है यह मुख्य रूप से ईरान, अफगानिस्तान और उजबेकिस्तान से आता है। इसमें सबसे ज्यादा भारत में अफगानिस्तान से हींग का आयात किया जाता है। पिछले साल अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान से लगभग 1500 टन कच्चे हींग का आयात किया गया। इस पर 942 करोड़ रुपए खर्च किए गए। हींग की हमारे देश में खपत को देखते हुए इसे उगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारत में हींग की खेती : लाहौल घाटी के गांव क्वारिंग की गई है हींग की रोपाई / भारत में हींग की खेती कहां होती है हाल ही में हिमाचल प्रदेश में सुदूर लाहौल घाटी के किसानों ने पालमपुर स्थित सीएसआईआर संस्था द्वारा विकसित कृषि-प्रौद्योगिकी की मदद से हींग की खेती शुरू की है। इसके तहत हींग की पहली रोपाई 15 अक्टूबर को लाहौल घाटी के गांव क्वारिंग में की गई थी। चूंकि भारत में फेरूला हींग के पौधों की रोपण सामग्री की कमी इस फसल की खेती में एक बड़ी अड़चन थी। इसलिए सीएसआईआर के पालमपुर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरसोर्स टेक्नोलॉजी ( आईएचबीटी ) द्वारा हींग के बीजों को भारत लाया गया और इसकी खेती की तकनीक विकसित की। इसके बाद हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी में इसकी खेती का प्रयास किया जा रहा है। यदि इसमें सफलता मिलती है तो देश के अन्य भागों में भी इसे उगाने के प्रयास किए जा सकेंगे। यहां यह बताया जरूरी होगा कि हींग की खेती में काफी चुनौतियां है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि आप इसके 100 पौधे रोपते हैं तो इनमें से एक ही पेड़ अच्छी तरह विकसित हो पाता है। हींग की खेती से बदल सकती है किसानों की आर्थिक स्थिति समाचार पत्र में प्रकाशित खबरों एवं मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार सीएसआईआर आईएचबीटी के निदेशक संजय कुमार ने बताया कि भारतीय हिमालय क्षेत्र के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों में लद्दाख और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र हींग की खेती से इन क्षेत्रों के लोगों की आर्थिक स्थिति बदल सकती है। कुमार ने कहा कि आईएचबीटी ने हींग की खेती पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं और हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी के मडगारण, बीलिंग और कीलोंग गांवों में बीज उत्पादन श्रृंखला की स्थापना और व्यावसायिक स्तर पर इसकी खेती के लिए प्रदर्शन प्लॉट तैयार किए हैं। संस्थान ने शुरू में हींग की खेती के लिए 300 हेक्टेयर की पहचान की है। किसानों द्वारा पांच वर्ष के चक्र को सफलतापूर्वक पूरा करने और इसके परिणाम देखने के बाद इसे अधिक क्षेत्रों में विस्तारित किया जा सकता है। हींग की खेती से किसानों को क्या होगा फायदा / हींग का मूल्य किसानों को खेती की लागत और शुद्ध रिटर्न के बारे में पूछे जाने पर, कुमार ने कहा कि इससे किसानों को अगले पांच वर्षों में लगभग 3 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की लागत आएगी और उन्हें पांचवें वर्ष से न्यूनतम 10 लाख रुपए का शुद्ध लाभ मिलेगा। हम राज्य सरकार के साथ मिलकर किसानों को वित्त और तकनीकी जानकारी देंगे। यह देश के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में किसानों के लिए गेम चेंजर साबित होगा। कैसा होता है हींग का पौधा / हींग का वैज्ञानिक नाम हींग (Hing) का वैज्ञानिक नाम फेरूला एसा-फौटिडा है। हींग सौंफ़ की प्रजाति का एक ईरान मूल का पौधा (ऊंचाई 1 से 1.5 मी. तक) है। ये पौधे भूमध्यसागर क्षेत्र से लेकर मध्य एशिया तक में पैदा होते हैं। भारत में यह कश्मीर और पंजाब के कुछ हिस्सों में पैदा होता है। हींग एक बारहमासी शाक है। इस पौधे के विभिन्न वर्गों (इनमें से तीन भारत में पैदा होते हैं) के भूमिगत प्रकन्दों व ऊपरी जड़ों से रिसनेवाले शुष्क वानस्पतिक दूध को हींग के रूप में प्रयोग किया जाता है। कच्ची हींग का स्वाद लहसुन जैसा होता है, लेकिन जब इसे व्यंजन में पकाया जाता है तो यह उसके स्वाद को बढा़ देती है। इसकी आयु पांच वर्ष होती है। इसके एक पौधे से औसतन आधा से एक लीटर तक हींग का दूध पैदा होता है। इस दूध से ही हींग बनाया जाता है। हींग के औषधीय उपयोग / हींग की तासीर हींग में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो संक्रमण और दर्द की समस्या को दूर करते हैं। जैसे दांतों में संक्रमण, मसूड़ों से खून निकलने और दर्द जैसी समस्या में इस प्रयोग करके राहत पाई जा सकती है। हींग में कोउमारिन नामक पदार्थ पाया जाता है जो ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके अलावा सर्दी-जुकाम, तनाव और माइग्रेन के कारण होने वाले सिरदर्द में हींग के प्रयोग से आराम मिल जाता है। पेट की समस्या, कान दर्द, स्कीन इंनफेक्शन सहित दाद, खाज, खुजली जैसे चर्म रोगों के लिए हींग का उपयोग बहुत फायदेमंद है। हींग ( Hing ) के प्रकार हींग दो प्रकार की होती हैं- एक हींग काबूली सुफाइद (दुधिया सफेद हींग) और दूसरी हींग लाल। हींग का तीखा व कटु स्वाद है और उसमें सल्फर की मौजूदगी के कारण एक अरुचिकर तीक्ष्ण गंध निकलता है। यह तीन रूपों में उपलब्ध हैं- टियर्स, मास और पेस्ट। टियर्स, वृत्ताकार व पतले, राल का शुद्ध रूप होता है इसका व्यास पांच से 30 मि.मी. और रंग भूरे और फीका पीला होता है। मास - हींग साधारण वाणिज्यिक रूप है जो ठोस आकारवाला है। पेस्ट में अधिक तत्व मौजूद रहते हैं। सफेद व पीला हींग जल विलेय है जबकि गहरे व काले रंग की हींग तैल विलेय है। अपने तीक्ष्ण सुगंध के कारण शुद्ध हींग को पसंद नहीं किया जाता बल्कि इसे स्टार्च ओर गम (गोंद) मिलाकर संयोजित हींग के रूप में, ईंट की आकृति में बेचा जाता है। इसकी पहली बार भारत के हिमाचल प्रदेश में इसकी खेती की जा रही है। हींग की खेती के लिए आवश्यक बातें हींग के पौधे विकसित होने के लिए ठंड और शुष्क जलवायु जरूरी हैं। इसलिए हींग की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त होता है। हींग की खेती के लिए ऐसी जमीन उपयुक्त मानी जाती है जिसमें रेत, मिठ्ठी के ठेले व चिकनी अधिक हो। इसके साथ ही सूरज की धूप सीधे उस जगह पडऩी चाहिए जहां इसकी खेती की जा रही है। इसकी रोपाई करते समय पौधे से पौधे के बीच की दूरी 5 फीट रखनी चाहिए। कैसे की जाती है हींग की खेती / हींग का बीज हींग के बीज को पहले ग्रीन हाऊस में 2-2 फीट की दूरी से बोया जाता है। पौध निकलने पर इसे फिर 5-5 फीट की दूरी पर लगाया जाता है। हाथ लगाकर जमीन की नमी को देख कर ही इसमें पानी का छिडक़ाव किया जा सकता है, अधिक पानी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है। पौधों को नमी के लिए गीली घास का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके पौधे को पेड़ बनने में पांच वर्ष का समय लगता है। इसकी जड़ों व तनों से गौंद निकाला जाता है। इसका बीज भारतीय मसाल बोर्ड से मिल सकता है। इसका बीज ईरान से मंगवाया गया है। कृषि विज्ञानी द्वारा रिसर्च के लिए इसे ही अलग-अलग जगहों पर उगाया जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : 8.54 लाख किसानों के खातों में पहुंचे 18,539.86 करोड़ रुपए

समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : 8.54 लाख किसानों के खातों में पहुंचे 18,539.86 करोड़ रुपए

सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदा 100 लाख टन धान भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) और राज्य की खरीद एजेंसियों ने सोमवार तक 98.19 लाख टन धान की खरीद की है। इससे देश के विभिन्न राज्यों के 8.54 लाख किसानों के खातों में करीब 18,539.86 करोड़ रुपए आए हैं। यह खरीद 18,880 रुपए प्रति टन के एमएसपी की दर से की गई है। मीडिया में प्रकाशित खबरों से मिली जानकारी के अनुसार एक सरकारी बयान में कहा गया है कि खरीफ 2020-21 के लिए धान की खरीद पंजाब, हरियाणा, यूपी, तमिलनाडु, उत्तराखंड, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर और केरल जैसे खरीद करने वाले राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में तेजी से चल रही है। इन राज्यों में 19 अक्टूबर तक 8.54 लाख किसानों से 18,880 रुपए प्रति टन के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की दर से 18,539.86 करोड़ रुपए मूल्य के 98.19 लाख टन से अधिक धान की खरीद की गई है। बता दें कि खरीफ मार्केटिंग सीजन (केएमएस) 2019-20 की इसी अवधि के दौरान 80.20 लाख टन धान की खरीद हुई थी। चालू सत्र में धान खरीद, पिछले सत्र की तुलना में 22.43 प्रतिशत अधिक है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 779 किसानों से की 806.11 टन मूंग और उड़द की खरीद सोमवार तक, सरकार ने अपनी नोडल एजेंसियों के माध्यम से तमिलनाडु, महाराष्ट्र और हरियाणा में 779 किसानों से 5.80 करोड़ रुपए की 806.11 टन मूंग और उड़द की खरीद की है। इसी प्रकार, कर्नाटक और तमिलनाडु में 3,961 किसानों से 52.40 करोड़ रुपये की 5,089 टन नारियल गरी की खरीद की गई है। बयान में कहा गया है कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में एमएसपी मूल्य पर कपास की खरीद का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। सोमवार तक, 40,196 किसानों से 565.90 करोड़ रुपए मूल्य का 2,00,512 गांठ कपास खरीदा गया। बता दें कि राज्यों से मिले प्रस्ताव के आधार पर, मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और आंध्र प्रदेश से खरीफ विपणन सत्र 2020 के लिए 42.46 लाख टन दलहनों और तिलहनों की खरीद के लिए मंजूरी दी गई थी। वहीं आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल राज्यों के लिए 1.23 लाख टन नारियल गरी की खरीद करने के लिए भी मंजूरी दी गई है। खरीफ सीजन 2020-21 के विभिन्न फसलों लिए तय समर्थन मूल्य / खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 2020-21 धान (सामान्य) 1868, धान (ग्रेड ए)-1888, ज्वार (हाईब्रिड)-2620 , ज्वार (मालदंडी)- 2640 , बाजरा- 2150, रागी 3295, मक्का 1850, तूर (अरहर)-6000, मूंग- 7196, उड़द - 6000, मूंगफली- 5275, सूरजमुखी-5885, सोयाबीन (पिला)- 3880, तिल- 6855, नाइजरसीड- 6695, कपास (मध्यम रेशा)- 5515, कपास (लंबा रेशा)- 5825 रुपए सरकार ओर से तय किया हुआ समर्थन मूल्य है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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