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दीपावली पर झारखंड के किसानों को मिली सौगात, अब धान के मिलेंगे ज्यादा दाम 

दीपावली पर झारखंड के किसानों को मिली सौगात, अब धान के मिलेंगे ज्यादा दाम 

झारखंड में समर्थन मूल्य पर धान की खरीद : किसानों को मिलेगा 182 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस


दीपावली से पहले केंद्र व राज्य सरकारें किसानों के हित में कई फैसले कर रही है जिनका लाभ भविष्य में किसानों को मिलेगा। केंद्र सरकार की ब्याज पर ब्याज माफी योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, मध्यप्रदेश में सोलर रूफटॉप योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई अनुदान योजना व मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना,  छत्तीसगढ़ में गोधन न्याय योजना व  राजीव गांधी न्याय योजना, पंजाब सरकार की गेहूं बीज सब्सिडी नीति से किसानों को लाभ मिल रहा है। अब धान के किसानों के लिए झारखंड सरकार ने बोनस के रूप में 182 रुपए प्रति क्विंटल अतिरिक्त देने का प्रस्ताव लिया है। झारखंड में समर्थन मूल्य पर धान की खरीद पर किसानों को ज्यादा पैसा मिलेगा।  माना जा रहा है कि सरकार के इस निर्देश से झारखंड के लाखों किसानों को सीधा लाभ होगा और वे बिचौलियों के चक्कर में न पडक़र अधिक से अधिक धान खरीद केंद्रों पर बेचेंगे।

 

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झारखंड में समर्थन मूल्य पर धान की खरीद

दीपावली से पहले झारखंड की हेमंत सरकार ने किसानों को खास उपहार दिया है। झारखंड की राज्य सरकार ने किसानों के लिए प्रति क्विंटल की दर से धान की खरीद दर निर्धारित की है। झारखंड की सरकार राज्य के किसानों से साधारण किस्म का धान 1868 रुपये प्रति क्विंटल एवं ग्रेड ए का धान 1888 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदेगी। इसके अलावा बोनस के रूप में 182 रुपये प्रति क्विंटल अतिरिक्त दिये जाने का भी प्रस्ताव है। खरीफ विपणन मौसम 2020-21 के दौरान हेमंत सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर दी है। इसके तहत किसानों को साधारण किस्म का धान 1868 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मिलेगा। वहीं, ग्रेड-ए धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1888 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किसानों से धान की खरीद की जायेगी।

 


मंत्रिपरिषद की अगली बैठक में प्रस्ताव पर होगी चर्चा / यह होगा झारखंड में धान का भाव

झारखंड के किसानों को धान की खरीद पर बोनस के रूप में 182 रुपये प्रति क्विंटल अतिरिक्त दिये जाने का भी प्रस्ताव है। मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार इस प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद की अगली बैठक में विचार के लिए रखा जायेगा। झारखंड कैबिनेट की बैठक में अगर बोनस के रूप में 182 रुपये प्रति क्विंटल अतिरिक्त दिये जाने के प्रस्ताव को पारित करती है, तो राज्य के किसानों को साधारण किस्म के धान पर 1868 रुपये प्रति क्विंटल के साथ बोनस के 182 रुपये प्रति क्विंटल मिलती है, तो कुल 2050 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किसानों को मिलेगा। वहीं, अगर ग्रेड- ए धान के लिए 1888 रुपये प्रति क्विंटल के साथ बोनस के 182 रुपये प्रति क्विंटल जोड़ दिया जाये, तो 2070 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किसानों को मिलेगा।


धान खरीद को लेकर झारखंड सरकार का वादा

झारखंड की हेमंत सोरन गठबंधन सरकार ने पिछले विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान किसानों से 2300 से लेकर 2700 रुपये प्रति क्विंटल कीमत पर धान किसानों से खरीदने का वादा किया था। अब धान पर बोनस देने के प्रस्ताव को इसी रूप में देखा जा रहा है। हेमंत सरकार द्वारा खरीफ विपणन मौसम 2020-21 के तहत फिलहाल न्यूनतम समर्थन मूल्य इसी के आसपास रखा जा रहा है। 

 

खुलेंगे धान अधिप्राप्ति सेंटर / धान खरीदी के लिए अधिप्राप्ति केंद्र

झारखंड राज्य खाद्य एवं असैनिक आपूर्ति निगम लिमिटेड द्वारा राज्य के रजिस्टर्ड किसानों की संख्या एवं प्रखंड से दूरी को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त संख्या में धान अधिप्राप्ति केंद्र संचालित किये जायेंगे, ताकि रजिस्टर्ड किसानों को अधिक नुकसान न हो और उनकी आमदनी पहले की अपेक्षा और बेहतर हो सके.। जिलावार अधिप्राप्ति केन्द्रों की संख्या का निर्धारण झारखण्ड राज्य खाद्य एवं असैनिक आपूर्ति निगम लिमिटेड द्वारा खाद्य सार्वजानिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग झारखण्ड से सहमति प्राप्त करते हुए किया जायेगा।


पिछली बार खरीदा था सबसे ज्यादा धान

वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए तय लक्ष्य तीन लाख टन के सापेक्ष 3.24 लाख टन धान की खरीद पूरे राज्य में की गई। धान खरीद का अब तक का यह सर्वोच्च आंकड़ा रहा हैा। हालांकि इस खरीद की वजह धान खरीद के लिए पूर्व निर्धारित तिथि को डेढ़ माह बढ़ाया जाना रहा। 31 मार्च की जगह धान की खरीद 15 मई तक की गई। वहीं, 2018-19 में 2.27 लाख टन धान की खरीद पूरे राज्य में की गई थी।

 

 

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खुरपका-मुंहपका रोग : सरकार ने पशुओं के टीकाकरण पर लगाई रोक

खुरपका-मुंहपका रोग : सरकार ने पशुओं के टीकाकरण पर लगाई रोक

पशुओं का टीकाकरण रोका : जानें, क्या है कारण और किन राज्यों में लगाई गई हैं रोक सरकार ने पशुओं में होने वाले खुरपका-मुंहपका रोग के टीकाकरण पर रोक लगा दी है। अब पशुओं को इस रोग का टीका नहीं लगाया जाएगा। दरअसल इस रोग के टीकाकरण के प्रयोग में आने वाली वैक्सिन की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं होने के कारण केंद्र सरकार ने झारखंड सहित कोई आधा दर्जन राज्यों को इसका इस्तेमाल न करने की सलाह दी थी। केंद्र के निर्देश के बाद झारखंड राज्य सरकार ने जिला पशुपालन अधिकारियों को रोक का आदेश जारी कर दिया है। हैदराबाद की एक कंपनी ने दवा की आपूर्ति की थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की इकाई आरवीआरआइ से वैक्सिन की जांच कराई गई थी जिसमें गुणवत्ता मानक के अनुसार नहीं पाया गया था। बता दें कि बीते साल झारखंड के टंडवा व करीबी इलाके में इस रोग से अनेक जानवरों की मौत हो गई थी। केंद्र से समय पर निर्देश व दवा का इंतजाम नहीं होता है तो बीमारी फैलने पर पशुपालकों का बड़ा नुकसान हो सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किन राज्यों में लगाई पशुओं के टीकाकरण पर रोक / खुरपका-मुंहपका रोग का टीकाकरण झारखंड सहित जिन अन्य प्रदेशों में टीकाकरण पर रोक लगाई गई है वे हैं पंजाब, राजस्थान, असम, दमन व जम्मू कश्मीर। सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रदेश में करीब 30 लाख जानवरों का टीकाकरण किया जाना है। राज्य के 24 में 22 जिलों में टीकाकरण का काम प्रारंभ हो गया था। करीब 70 हजार जानवरों को टीके लगाये जा चुके थे इसी बीच रोक का आदेश आ गया है। कृषि एवं पशुपालन सचिव अबु बकर सिद्दीकी का कहना है कि केंद्र से पुन: निर्देश के अनुसार टीकाकरण का काम शुरू होगा। क्या है खुरपका-मुंहपका रोग खुरपका-मुंहपका रोग जिसे झारखंड की स्थानीय भाषा में खुरहा-चपका रोग भी कहते हैं, मूलत: दो खुर वाले गाय, भैंस, बैल, सांड, भेंड, बकरियों में होता है। ऐसे में इनका चलना और खड़े होना और खाना मुश्किल होता है। तेज बुखार होने के कारण जानवर खाना-पीना और जुगाली करना भी बंद कर देते हैं। बच्चों पर ज्यादा बुरा असर होता है। यह अति संक्रामक रोग है। वयस्क पशुओं की क्षमता कम कर देता है और इसके विषाणु लंबे समय तक जीवित रहते हैं। पशुओं में कैसे फैलता है ये रोग चिकित्सकों के अनुसार रोग अत्यन्त सूक्ष्म विषाणु से फैलता है। जिसमें ओ, ओ, ए, सी, एशिया-1, एशिया-2, एशिया-3, सैट-1, सैट-3 और इनकी 14 उप-किस्में मुख्य है। देश में यह रोग मुख्यत: ओ, ए, सी तथा एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा अपने पांव पसारता है। पशुओं में रोग फैलने का एक अन्य कारण नम-वातावरण, पशु की आंतरिक कमजोरी, पशुओं का स्थान बदलने क्षेत्र में रोग का प्रकोप भी इस बीमारी को फैलाने में सहायक हैं। खुरपका मुहंपका रोग ग्रसित पशु की कैसे करें देखभाल बीमारी हो जाने पर रोग ग्रस्त पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग करके रखें। बीमार पशुओं की देख-भाल करने वाले व्यक्ति भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहे। बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा दे। पशु बाड़े की समय-समय पर सफाई करें। इस बीमारी से मरे पशु के शव को खुला छोडक़र गाड़ दें ताकि वायरस ना फैले। टीका नहीं लग रहा तो कैसे कर सकते हैं रोग ग्रसित पशु का उपचार / खुरपका - मुंहपका रोग का इलाज जिन राज्यों में पशुओं के टीकाकरण पर रोक लगाई गई है वहां के पशुपालक चिकित्सक की सलाह लेकर उपचार करवा सकते हैं। चिकित्सकों के अनुसार मुंह खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते है। मुंह में बोरो-ग्लिसरीन तथा खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

जानें, क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग / बिना मिट्टी के खेती की तकनीक कोरोना संक्रमण के दौर में सरकार का सबसे अधिक ध्यान कृषि की ओर गया है। इस दौरान जहां सभी व्यवसाय ठप हो गए, वहीं कृषि व्यवसाय ने लोगों को काफी राहत पहुंचाई। किसान ने अन्नदाता बनकर देश के लोगों की खाद्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया। कोरोना संक्रमण के दौर में बंपर फसल का उत्पादन हुआ जो अन्य वर्षों की तुलना में काफी अधिक रहा। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक बजट का उपयोग कृषि क्षेत्र में करने का मन बनाया हुआ है। सरकार का फोकस कृषि पर होने से लोगों की रूचि भी खेतीबाड़ी के काम की ओर होने लगी है। इस दौरान खेती में कई नवाचार भी किए जा रहे हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बिना मिट्टी के खेती आज कई पढ़े-लिखे युवक खेती को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं जिसके उन्हें काफी सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। इसी कड़ी में हाल ही में उदयपुर के चार दोस्तों ने खेती में एक नवाचार किया है जो काफी सराहनीय है। मीडिया में प्रसारित जानकारी के अनुसार कोरोना काल में ट्यूरिज्म व्यवसाय ठप होने के बाद उदयपुर के इन चार दोस्तों दिव्य जैन, भूपेन्द्र जैन, रौनक और विक्रम ने खेती में नई तकनीक के साथ भाग्य आजमाया है। यह नई तकनीक इसलिए खास है जिसकी चर्चा चारों ओर हो रही है। दरअसल उदयपुर शहर के इन चारों दोस्तों ने बिना मिट्टी के खेती करने की शुरुआत की है जो काफी दिलचस्प होने के साथ आश्चर्यचकित करने वाली भी है। भला बिना मिट्टी के खेती कैसे हो सकती है। पर ऐसा संभव कर दिखाया है उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने। क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming at home) हाइड्रोपोनिक्स का मतलब होता है जलीय कृषि। यानि इस खेती में फसल पानी में उगाई जाती है और इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता। खेती की इस आधुनिक तकनीक में फसल पानी और उसके पोषण स्तर के जरिए बढ़ती है। भारत के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पानी की कमी रहती है लेकिन इस तकनीक से सामान्य तकनीक की अपेक्षा सिर्फ 10 प्रतिशत पानी की जरूरत पड़ती है, साथ ही मिट्टी की भी कोई जरूरत नहीं होती। बस सूर्य का प्रकाश फसल को मिलता रहना चाहिए। लेकिन जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती वहां कस्टमाइज्ड तरीके से रोशनी की व्यवस्था की जाती है। इन चारों दोस्तों ने इसी तकनीक को आधार बनाकर उदयपुर शहर से 12 किमी दूर दस हजार वर्गफीट की जमीन पर ऑटोमेटेड फार्म बैंक टू रूट्स तैयार की और बिना मिट्टी के खेती करने लगे। इसके माध्यम से ये ओक लेट्यूस, ब्रॉकली, पाक चाय, चैरी-टोमेटो, बेल पेपर और बेसिल की खेती कर रहे हैं। इन सब्जियों की सबसे ज्यादा मांग पांच सितारा होटल्स में होती है और पर्यटक इन्हें पसंद भी करते हैं। कैसे की जाती है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming) बिना मिट्टी के पानी से होने वाली इस फार्मिंग को करने के लिए उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने रिसर्च किया और फिर उदयपुर में पॉली हाउस बनाकर उसमें खेती शुरू कर दी। इस खेती में मिट्टी का कहीं भी उपयोग नहीं किया गया है। इसमें तापमान को स्थिर रखते हुए पौधों की जड़ तक पाइप से पानी पहुंचाया जाता है और उसी से पोषक सब्जियों की पैदावार होती है। हाइड्रोपोनिक खेती में बीज बोने से लेकर बढऩे तक की एक अलग प्रक्रिया होती है। ये पौधे छोटे प्लास्टिक के कप- ए आकार की फ्रेम में कतार में रखे जाते हैं। इससे पौधों की जड़ में जरूरत के अनुसार पानी चलता रहता है। इस पानी में न्यू्ट्रेंट सोल्यूशन मिलाए जाते हैं ताकि पौधों को जरूरी पोषक तत्व मिलते रहें। पॉली हाउस में तैयार किए जाने वाले इन पौधों को पानी के पाइप से पहुंचाया जाता है। पौधे पॉली हाउस में 27 से 30 डिग्री तक तापमान मेंटेन करके रखा जाता है। पेस्ट्रीसाइड्स का इस्तेमाल नहीं होने से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन / हाइड्रोपोनिक उर्वरक यह खेती इसलिए भी लोगों के लिए चर्चा का विषय बन चुकी है कि इस तकनीक से खेती में पेस्ट्रीसाइड्स का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल रहा है। इस फार्मिंग के सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं। इससे दो माह की अवधि के दौरान ऐसी फसल तैयार हो चुकी है। इस सब्जी से बनने वाली चीजें स्वादिष्ट होने के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद है, जिसे पांच सितारा होटल्स में नाश्ते और फास्ट फू्रड में सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गेहूं : पछेती किस्मों की बुवाई में अपनाएं ये तकनीक, होगा भरपूर मुनाफा

गेहूं : पछेती किस्मों की बुवाई में अपनाएं ये तकनीक, होगा भरपूर मुनाफा

गेहूं की खेती : जानें, कौनसी है ये तकनीक और इससे कैसे मिल सकता है बेहतर उत्पादन अधिकांशत: हमारे देश में गेहूं की पछेती किस्म की बुवाई 20 नबंवर के बाद से शुरू हो जाती है। पछेती किस्म की बुवाई का एक फायदा ये है कि ये किस्म जल्दी पककर तैयार हो जाती है। अगर किसान उन्नत तकनीक से पछेती किस्मों की बुवाई करें, तो ज्यादा पैदावार के साथ अच्छी आमदनी मिल सकती है। गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई मध्य नबंवर के बाद करना सही रहता है। यह किस्में कम समय में पकने वाली होती हैं, साथ ही गर्मी व तापमान को सहन करने की क्षमता भी इसमें अन्य किस्मों की तुलना में अधिक होती है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 गेहूं की पछेती उन्नत किस्में व उनकी विशेषताएं एच.डी.-3059 (पूसा पछेती) : यह किस्म वर्ष 2013 में जारी की गई है। इस किस्म की उत्पादकता 39.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसे पकने में 157 दिन लगते हैं। इस किस्म के पौधें की ऊंचाई 93 सेमी. होती है। यह किस्म रस्ट अवरोधी होने के साथ ही अधिक तापमान सहन करने की क्षमता रखती है। इसमें उच्च प्रोटीन होने के कारण इसका उपयोग ब्रेड, बिस्किट, चपाती बनाने में किया जाता है। एच.डी.-2985 (पूसा बसन्त ) : यह किस्म वर्ष 2011 में जारी की गई है। इस किस्म की उत्पादकता 37.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म को पकने में 105-110 दिन का समय लगता है। यह किस्म लीफ रस्ट एवं फोलियर ब्लाइट अवरोधी है। इस किस्म का उपयोग बिस्किट एवं चपाती बनाने में किया जाता है। पी.बी.डब्लू.-590 : यह किस्म 2009 में जारी की गई है। यह किस्म दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के लिए उपयुक्त पाई गई है। इसकी उत्पादन क्षमता 42.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस किस्म को पकने में 121 दिन का समय लगता है। यह किस्म ताप सहिष्णु, लीफ रस्ट अवरोधी है। इस किस्म में उच्च प्रोटीन होने से इसका उपयोग चपाती बनाने के लिए किया जाता है। डी.बी.डब्लू.-173 : यह किस्म वर्ष 2018 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 47.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके पकने की अवधि 122 दिन है। यह किस्म पीला एवं भूरा रस्ट अवरोधी है। यह किस्म ताप सहिष्णु है। इसमें प्रोटीन एवं आयरन में अधिकता है। इसमें बायो- फोर्टीफाईड प्रजाति-प्रोटीन 125 प्रतिशत, आयरन 40.7 पीपीएम होता है। डी.बी.डब्लू.-90 : यह किस्म वर्ष 2014 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 42.80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म 121 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसके पौधें की ऊंचाई - 76 से 105 सेमी तक होती है। यह स्ट्रिप एवं लीफ रस्ट अवरोधी है और उच्च तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। डब्लू.एच. 1124 : यह किस्म वर्ष 2015 में जारी की गई है। इसकी उत्पादकता 42.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसके पकने की अवधि 123 दिन की है। यह पीला एवं भूरा रस्ट रोग के प्रति अवरोधी है। यह भी उच्च तापमान को सहन कर सकती है। डब्लूएच 1021 : यह किस्म भी देरी से बुवाई के लिए अच्छी मानी जाती है। इस किस्म से 39.1 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। ये भी अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। राज 3765 : यह किस्म 1996 जारी की गई है। इस किस्म के पौधे 85-95 सेंटीमीटर ऊंची अधिक फुटान वाली, रोली रोधक किस्म है। तना मजबूत होने के कारण यह आड़ी नहीं गिरती है। इसकी पत्तियां हरे रंग की होती हैं। पत्तियों पर सफेद पाउडर नहीं होता है। यह किस्म सामान्य बुवाई, सिंचाई व पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। सामान्य बुवाई में इसके पकने का समय 120 से 125 दिन है, जबकि पिछेती बुवाई में यह किस्म 110 से 115 दिन में पककर तैयार हो जाती है। दाने शरबती चमकीले आभा लिए सख्त व बड़े आकार के होते हैं। यह किस्म पिछेती बुवाई में औसतन 38 से 42 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उपज दे सकती है। गेहूं की पछेती किस्म की बुवाई का समय गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई 20 नवंबर से लेकर 25 दिसंबर तक की जा सकती है। 15 दिसंबर तक बुवाई कर लेने पर पैदावार ज्यादा मिलती है। हर हाल में पछेती किस्म की बुवाई 25 दिसंबर तक पूरी कर लेनी चाहिए। इसके बाद बुवाई करने पर उत्पादन में कमी आ जाती है। पछेती किस्म की बुवाई के लिए बीज की मात्रा पछेती किस्म की बुवाई के लिए 55 से 60 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए। सबसे पहले पछेती किस्मों की बुवाई के लिए बीज को करीब 12 घंटे पानी में भिगोकर रखना चाहिए। इससे बीज का जल्दी व ज्यादा जमाव होता है। इसके बाद बीज को पानी से निकाल कर उसे दो घंटे फर्श पर छाया में सुखाना चाहिए। पछेती किस्मों का बीजोपचार पछेती किस्मों की बुवाई से पहले बीजों उपचारित करना बेहद जरूरी है। दीमक से बचाव के लिए 150 मिली क्लोरोपाइरीफोस 20 फीसद का साढ़े चार लीटर पानी में घोल बनाकर एक कुंतल बीज को उपचारित करें। अगले दिन कंडुआ व करनाल बंट रोग से बचाव के लिए एक ग्राम रेक्सिल फफूंदनाशक दवा प्रति किलो बीज की दर से सूखा उपचार करें। अंत में बिजाई से थोड़ा पहले जीवाणु खाद एजोटोवेक्टर तथा फोसफोटीका से उपचारित कर लेना चाहिए। गेहूं की पछेती फसल कैसे करें/पछेती किस्मों की बुवाई का तरीका बीज को उपचारित करने के बाद बीज की बुवाई उर्वरक ड्रिल से करें और पछेती बुवाई में खूड़ से खूड़ की दूरी करीब 20 सेंटीमीटर की जगह करीब 18 सेंटीमीटर रखें। किसान जीरो सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल से भी बुवाई कर सकते हैं। खाद्य व उर्वरक विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को बुवाई से पहले गली सड़ी गोबर की खाद प्रति एकड़ डालना चाहिए। अगर 6 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट प्रति एकड़ खेत में डालें, तो फास्फोरस खाद की मात्रा आधी कर दें। इसके साथ ही बुवाई के समय 50 किलोग्राम डीएपी या 75 किलोग्राम एनपीके 12:32:16 तथा 45 किलोग्राम यूरिया व 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट 21 प्रतिशत डाल दें। ध्यान दें कि एनपीके या डीएपी उर्वरकों को ड्रिल से दें। इसके अलावा जिंक और यूरिया को आखिरी जुताई के दौरान डालें। वहीं पहली सिंचाई पर 60 से 65 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डालना चाहिए। अगर रेतीली भूमि है, तो यूरिया दो बार पहली और दूसरी सिंचाई पर डालना चाहिए। पीला रतवा रोग से बचाव के लिए ये करें गेहूं में पीला रतवा रोग का प्रकोप अधिक रहता है। इसकी रोकथाम के लिए करीब 200 मिलीलीटर प्रापिकानाजोल 25 ईसी दवा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छडक़ देना चाहिए। अगर इस तकनीक से गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई की जाए तो फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कब-कब करें सिंचाई गेहूं की पहली सिंचाई 3 सप्ताह की जगह 4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। इसके बाद की सिंचाई मध्य फरवरी तथा 25 से 30 दिनों के बाद करनी चाहिए। फिर 20 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। वहीं फुटाव के समय, गांठें बनते समय, बालियां निकलने से पहले, दूधिया दशा में और दाना पकते समय सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई व खरपतवार नाशक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। कनकी, मंडूसी व जंगली जई खरपतवार की रोकथाम के लिए क्लोडिनाफाप 15 प्रतिशत 160 ग्राम प्रति एकड़ बुवाई के 30 से 35 दिन बाद 250 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ना चाहिए। दीमक से बचाव के लिए बुवाई से एक दिन पहले 150 मिली क्लोरोपायरीफोस 20 ईसी दवा को 5 लीटर पानी में घोलकर बनाएं और इसे 100 किलो बीज के ऊपर छिडक़ दें। जंगली मटर, बथुआ, हिरनखुरी आदि की रोकथाम के लिए 500 ग्राम 2,4 डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत को 250 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ बिजाई के 30-35 दिन बाद छिडक़ाव करें। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

कपास : समर्थन मूल्य पर खरीद जारी

कपास : समर्थन मूल्य पर खरीद जारी

किसानों को कपास बेचने में आ रही है परेशानी तो यहां करें फोन, होगा समाधान देश भर में खरीफ की फसल की समर्थन मूल्य पर खरीद जारी है। सरकारी आंकड़ों के हिसाब देखें तो इस साल खरीफ फसलों की बंपर सरकारी खरीद की जा रही है। इसमें सबसे ज्यादा धान की खरीद हुई है। इसी के साथ सीसीआई द्वारा कपास की खरीद का काम भी जारी है। जानकारी के अनुसार सीसीआई ने मध्यप्रदेश के किसानों से बीते दिनों 6 लाख 29 हजार क्विंटल कपास खरीदा है। मीडिया से मिली जानकारी के आधार पर सीसीआई द्वारा गुरुवार तक 6 लाख क्विंटल कपास की खरीदी की जा चुकी है। बता दें कि सीसीआई द्वारा प्रति वर्ष कपास की खरीदी की जाती है। इस वर्ष भी इंदौर संभाग में 19 खरीदी केंद्र बनाए हैं, जहां किसान अपनी कपास की उपज निर्धारित मापदंडों की होने पर सीसीआई को बेच सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 क्या है कपास का समर्थन मूल्य / कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य केंद्र सरकार ने चालू कपास सीजन 2020-21 के लिए कपास (लंबा रेशा) का एमएसपी 5,825 रुपए प्रति क्विंटल जबकि कपास (मध्यम रेशा) का 5,515 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। कितनी कपास खरीदने का है सरकार का लक्ष्य सरकारी आंकड़ों के अनुसार सीसीआई ने बीते सीजन 2019-20 में रिकॉर्ड 105.14 लाख गांठ कपास की खरीद की गई और चालू सीजन 2020-21 में एजेंसी ने 125 लाख गांठ कपास खरीदने का लक्ष्य रखा है। बीते सीजन में सरकार ने किसानों से 28,500 करोड़ रुपए मूल्य की कपास खरीदी थी, जबकि इस साल 35,000 करोड़ मूल्य की कपास खरीदने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार के अनुमान के अनुसार, पिछले साल देश में कपास का उत्पादन 357 लाख गांठ था जबकि इस साल 360 लाख गांठ होने का अनुमान है। क्या है कपास खरीद के सरकारी मापदंड कृषि मंत्रालय के दिशा निर्देश के अनुसार, एफएक्यू (फेयर एवरेज क्वालिटी) तय किया गया। कपास में एफएक्यू के तहत 12 फीसदी तक नमी स्वीकार्य है। कोई किसान यह नहीं कह सकता है कि 12 फीसदी से कम नमी पर सीसीआई ने कॉटन नहीं खरीदा। अगर 12 फीसदी से कम नमी पर एजेंसी द्वारा खरीद से मना करने की कोई शिकायत है तो उनके संज्ञान में लाया जाए। बता दें कि हरियाणा में कपास की खरीद के लिए 17 सेंटर हैं जबकि पंजाब में 21 सेंटर हैं। 8 प्रतिशत से अधिक नमी पर होती है समर्थन मूल्य में कटौती सीसीआई की खरीद में आठ फीसदी ही मानक तय किया गया है, जिस पर होने वाली खरीद के लिए किसानों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलता है, लेकिन उससे अधिक नमी होने पर हरेक फीसदी पर एमएसपी में कटौती की जाती है और इसकी भी अनुमति 12 फीसदी तक ही है। इससे ऊपर नमी होने पर सीसीआई कपास नहीं खरीदती है। इधर मध्यप्रदेश के किसानों का आरोप, नहीं खरीदी जा रहा पूरा कपास मीडिया में प्रकाशित जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के सनावद क्षेत्र के किसानों ने सीसीआई द्वारा उनका कपास नहीं खरीदने और मापदंड का पालन नहीं करने की शिकायत की है। उधर, सनावद क्षेत्र के किसानों ने सीसीआई पर उनका कपास नहीं खरीदने के आरोप लगाए हैं। किसान विक्रम मंडलोई ग्राम मर्दाना का कहना है कि कपास की 100 गाड़ी में से करीब 20 गाड़ी कपास ही सीसीआई द्वारा खरीदा जा रहा है, शेष 80 गाड़ी कपास वाले किसानों के माल में कोई न कोई कमी बताकर खरीदने से इंकार किया जा रहा है। बता दें कि इसे लेकर सनावद और भीकन गांव मंडी में किसान पूर्व में हंगामा भी कर चुके हैं। इस कारण कुछ घंटे कपास की खरीदी भी बंद रही थी। प्रशासनिक अधिकारियों की समझाइश पर खरीदी फिर शुरू हो सकी थी। किसान सीसीआई अधिकारियों और व्यापारियों के बीच सांठ -गांठ के आरोप भी लगा चुके हैं। जबकि सीसीआई वाले निर्धारित मापदंडों के अनुसार कपास खरीदी करने की बात कर रहे हैं। सीसीआई : यदि नहीं खरीदा जा रहा है कपास, तो करें शिकायत मध्यप्रदेश के इंदौर में किसानों से कपास की खरीद नहीं करने के आरोप को लेकर सीसीआई के महाप्रबंधक श्री मनोज बजाज (इंदौर) का कहना है कि लाख 29 हजार क्विंटल कपास की खरीदी की जा चुकी है। भारत सरकार के मापदंडों के अनुसार सीसीआई द्वारा 8-12 प्रतिशत नमी के साथ एफएक्यू वाला कपास खरीदा जाता है। कपास की नमी जांचने के लिए उपकरण भी दिए गए हैं, जिनका इस्तेमाल होते देखा जा सकता है। यदि किसी किसान को कोई शिकायत है तो वह अपने नाम, मोबाईल नंबर, गाड़ी नंबर (जिसमें कपास लाया) और मंडी में आने की तारीख के साथ मुझे शिकायत करें। संबंधित मंडी में इसके विवरण का रजिस्टर रखा जाता है। मंडी सचिव से पुष्टि के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। किसान यहां करें शिकायत, होगा समाधान दरअसल जिन किसानों का कपास नहीं खरीदा जा रहा है, वे अपनी शिकायत महाप्रबंधक, भारतीय कपास निगम, कपास भवन, रेसकोर्स रोड, इंदौर स्थित कार्यालय में व्यक्तिगत मिलकर या फोन नंबर 0731-2532703 पर कर सकते हैं। उनकी समस्या का समाधान किया जाएगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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