जनवरी माह के कृषि कार्य : अनाज, तिलहन, दलहन व चारा फसलों में होगा फायदा

जनवरी माह के कृषि कार्य : अनाज, तिलहन, दलहन व चारा फसलों में होगा फायदा

Posted On - 08 Jan 2021

रबी फसलों में सिंचाई : गेहूं, जौ, चना, सरसों व मसूर में सिंचाई का सही समय

फसलों की बेहतर पैदावार के लिए उनकी समय-समय पर देखभाल करना बेहद जरूरी होता है। इसके लिए जरूरी है कि फसलों को उनकी आवश्यकतानुसार सिंचाई, निराई-गुड़ाई व रोगों से सुरक्षित किया जाना जरूरी है। इसके लिए किसानों को हम हर माह किए जाने वाले कृषि कार्यों की जानकारी देते हैं ताकि किसान भाइयों को अपनी बोई हुई फसलों का बेहतर उत्पादन मिलने में मदद मिल सके। इसी क्रम में आज हम जनवरी माह में किए जाने वाले कृषि कार्यों को बताएंगे जिससे आपको लाभ होगा।

 

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गेहूं

  • गेहूं में सिंचाई 27 से 30 दिन के अंतर पर करते रहे।
  • जहां देर से गेहूं की बुवाई की गई हो तो उसकी प्रथम सिंचाई बुवाई के 21-25 दिन बाद करें।
  • जनवरी अंत तक हल्की मिट्टी वाली जमीन में एक बोरा यूरिया (1/3 नत्रजन की आखिरी किस्त) भी दे सकते है।
  • चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को प्रकोप होने पर 1.25 किग्रा. 2,4-डी सोडियम साल्ट (8 0 प्रतिशत) या फिर 1.5 लिटर 2,4-डी एस्टर (34.6 प्रतिश) प्रति हेक्टेयर की दर से 600 लिटर पानी में घोलकर बोआई के 30 -32 दिन बाद छिडक़ाव करें।
  • यदि घास कुल के खरपतवार जैसे गुली डंडा (गेंहू का मामा) का अधिक प्रकोप हो तो मैथावेज्थाजुरान 70 प्रतिशत घु. पा.(टिबुलिन) 2 किग्रा./हेक्टेयर या फिर आइसोप्रोतुरोंन 75 प्रतिशत घु. पा. 1.25 किग्रा./हेक्टेयर की दर से 700 लीटर पानी में मिलाकर बोवाई के लगभग 30 दिन बाद छिडक़ाव करें।
  • दीमक का प्रकोप होने पर 2 लीटर लिंडेन या क्लोरपाइरिफास को 2 लीटर पानी में 20 कि.ग्रा. रेत के साथ मिलाएं तथा गेहूं की खड़ी फसल में बुरकाव करके सिंचाई करें।
  • टोका की रोकथाम के लिए 10 कि.ग्रा. मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत का छिडक़ाव करें।
  • मोल्या रोग का प्रकोप होने पर संभावित रोगग्रस्त खेतों में 6 कि.ग्रा. एल्डीकार्व या 13 कि.ग्रा. कार्बोपयूरान बीजाई के समय खाद मे मिलाकर डालें।

 


जौ

  • जौ में दीमक व पाले से फसल को बचाए। इसके लिए पाले से बचाव के लिए टै्रक्टर जंक्शन की ओर से अलग से लेख में जानकारी दी गई है उसे पढ़े। वैसे जौ में दीमक तथा पाले से बचाव गेहूं की तरह ही किया जाता है।
  • जस्ते की कमी आने पर उसकी मात्रा की पूर्ति के लिए गेहूं की तरह ही उपचार करें।
  • जौ की फसल की सिंचाई अवश्य करें।


चना

  • चने की पुष्प आने के पहले सिंचाई करें।
  • चना की फसल की फूल आने की अवस्था में सिंचाई अवश्य करें। ऐसा करने से दाना अच्छा पड़ता है और पैदावार में बढ़ोतरी होती है।
  • जस्ते की कमी होने पर फसल में पुरानी पत्तियां पीली तथा बाद में जली सी हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए जिंक सल्फेट की स्प्रे से उपचार करें।

 

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सरसों

  • सरसों में फलियां बनते समय सिंचाई अवश्य करें।
  • सरसों में चेपा का प्रकोप होने पर इसकी रोकथाम के लिए 270 मि.ली. मेटासिस्टास्क या 60 मि.ली. फासफिमिडान 87 एस एल को 270 लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करें। 17 दिन बाद छिडक़ाव फिर से दोहराएं।
  • बीमारियों पर नियंत्रण के लिए 600 ग्राम मैन्काजेव (डाइथेन एम-47) 270 लीटर पानी में का 17 दिन के अंतर पर 3-4 बार छिडक़ाव करें।


मसूर

  • मसूर की फसल में व्हील हैंड हो से खोदकर खरपतवार निकाल दें इससे फसल में वृद्धि होगी।
  • मसूर की समय-समय पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें।


मटर

  • दाना मटर में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें।
  • सिाप के नियंत्रण के लिए 700 मि.ली.एंडोसल्फान 37 इ सी को 270 लीटर पानी में घोलकर छिडक़े।
  • पाउडरी मिल्डयु नियंत्रण के लिए 0.3 प्रतिशत घुलनशील सल्फर का घोल का छिडक़ाव करें।


शरदकालीन मक्का

  • शरदकालीन मक्का की आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। इससे पाले बचाव होगा व फसल भी अच्छी होगी।


गन्ना

  • शरदकालीन गन्ने में 1/3 नत्रजन की तीसरी व आखरी किस्त 1 बोरा यूरिया डाल दें।
  • जस्तें की कमी नजर आए तो 0.7 प्रतिशत जिंक सल्फेट एवं 2.7 प्रतिशत यूरिया का घोल छिडक़े।
  • खरपतवार की स्थिति में गुडाई एवं सिंचाई करें।
  • दीमक से बचाव के लिए 2.7 लीटर क्लोरपाइरीफास 20 ईसी 600 लीटर पानी में घोलकर फुवारे से छिडक़े।


चारा फसलें ( बरसीम, रिजका व जई )

  • बरसीम, रिजका व जई की हर कटाई बार सिंचाई करते रहें इससे बढ़वार अच्छी होती है।
  • जई में कटाई के बाद आधा बोरा यूरिया भी डालें।

 

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सब्जियां

आलू

  • आलू के पौधों पर मिट्टी चढ़ाएं।
  • आलू में जनवरी के प्रथम सप्ताह तक हर हालत में पौधों के ऊपरी भाग (डंठल) को काट दें, उसके बाद आलू को 20-25 दिन तक जमीन के अन्दर ही पड़े रहने दें। ऐसा करने से आलू का छिलका कड़ा हो जाएगा और खराब नहीं होगा।
  • आलू की फसल में जब पत्तियां व तने पीले पडऩे लगे तो उन्हें काट दें तथा 10-17 दिन बाद मिट्टी खोदकर आलू निकाल लें इससे आलू काफी देर तक खराब नहीं होता।


मटर

  • मटर की फलियां तोडऩे के लिए तैयार हो गई हो और फूल आ रहे हो तब हल्की सिंचाई 10-17 दिन बाद करते रहना चाहिए। इससे पाले से बचाव होता है।
  • कीट नियंत्रण के लिए 0.1 प्रतिशत मैलाथियान या 0.1 प्रतिशत एण्डोसल्फान का स्प्रे 15 दिन बाद करते रहें।
  • पाउडरी मिल्डयु के लिए 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम प्रति लीटर पानी में ) घुलनशील सल्फर की स्प्रे 7 दिन के अंतर पर करें।
  • यदि मटर तुड़ाई लायक हो गई हो तब 10-15 दिन के अंतर से फलियां की तुड़ाई करना शुरू कर दें।


गोभी

  • फूल गोभी के फूल उस समय काटने चाहिए जब वे ठोस, सफेद व धब्बे रहित बिलकुल साफ हों।
  • बंद गोभी को तब काटें जब वह बंधी और कोमल हो। यदि कटाई में देर हो गई तो गांठें फट सकती हैं।

 

पालक व मेथी

  • हर 17-20 दिन बाद कटाई करके पालक में 20 कि.ग्रा. तथा मेथी में 10 कि.ग्रा. यूरिया छिडक़ कर हल्की सिंचाई करें।
  • इसके बाद यदि आसपास खरपतवार उग आए हो तो उन्हें खुरपी की सहायता से निकाल दें।
  • कीट नियंत्रण के लिए 2 मि.ली. मैलाथियान 70 ई सी प्रति लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें।


लहसुन

  • लहसुन की फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करें।
  • 50 किलोग्राम यूरिया खड़ी फसल में डाल दें।


बैंगन

  • जिन्होंने बैंगन की शरद मौसमी की फसल लगा रखी है, वे समय पर फलों की तुड़ाई करें।
  • बैंगन में फल तब तोड़े जाने चाहिए जब वे मुलायम हों और उनमें ज्यादा बीज न बने हो।


टमाटर

  • टमाटर के पौधों को बांस की लकड़ी का सहारा दें ताकि वह नीचे की ओर नहीं झुके।


फल एवं फूल

  • अमरुद, पपीते, आंवले और नींबू के पके फलों की तुड़ाई करें।
  • आम, अमरुद, अंगूर, नींबू के बागों में साफ सफाई, गुड़ाई, कांट छांट, खाद दें।
  • कटाई-छटाई में सूखी टहनियां निकाल दें तथा फंफूद नाशक 0.3 प्रतिशत कापर आक्सीक्लाराइड स्प्रे करें।
  • गर्मी के फूलों के लिए नर्सरी तैयार करने का काम शुरू करें।

 

 

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