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GST bill will give a boost to the agriculture sector

GST bill will give a boost to the agriculture sector

29 August, 2016 Total Views 598

Tsunami of debates and discussions came crawling in ever since the GST bill been given a go-ahead from the centre. As the passage of the GST bill rolls in towards scripting history in the Indian economy, various sectors agreed-disagreed with the India’s biggest tax reform. While PM Modi made a strong pitch saying it will put an end to tax terrorism, some were skeptical if India was ready to take such a great leap forward.

Indian agriculture sector which contributes around 16% to GDP, are yet to pull down the curtain on how the implementation of the bill would affect the sector as there are mostly marginal and small farmers in the country. However, many lauded the centre’s decision saying it will help in the free flowing of the agri-products without any hindrance although there might be slight variation in taxation.

“Farmers appreciate this decision,” claimed P. Chengal Reddy, Chief Advisor of the Consortium of Indian Farmers Association (CIFA).

“GST is like a big boost to the agriculture sector,” commented PPS Pangali, President of BORLAUG Farmers Association for South Asia.

“Interstate moving needs permission or approval as there are various taxes charged by different states. Now, this GST bill will solve most of the problem and will pave way for free market and moving from one part to another for retail and processing. Traders when they take a particular product across the country, at every point they are subject to various taxes, approvals, permissions and license. So this GST bill is the first act towards total liberalization of agriculture marketing,” explains Chengal Reddy to Krishi Jagran.

While Pangali feels that the introduction of the constitution (122nd) amendment bill will play a weighty role in the affordability of agri-machineries. “It will give incentives on the sale of diesel which is the main product with which trucks carrying goods and tractors on the field operate. Incentive to agri-machinery on which excise duty is high will make it easily affordable than Chinese machinery. In India, where the farmers are mainly small and marginal and cannot afford expensive machineries, it will be a positive factor,” Pangali said.

However, the agri-commodity sector is still hanging by thread as to whether the APMC or mandi taxes will be abolished and only GST will be applicable.

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हरियाणा बजट 2020 की मुख्य बातें - हरियाणा बजट की पूरी जानकारी

हरियाणा बजट 2020 की मुख्य बातें - हरियाणा बजट की पूरी जानकारी

हरियाणा सरकार का बजट 2020. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने शुक्रवार को वित्तमंत्री के हैसियत से बजट पेश किया। सीएम ने 1.42 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया। जबकि पिछले साल बजट 1.32 लाख करोड़ रुपए का था। सरकार ने किसानों के लिए बिजली की दरें सस्ती की है। साथ ही बजट में सतत कृषि विकास के साथ जैविक और प्राकृतिक खेती पर जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री ने बड़ी पहल करते हुए कृषि एवं किसान कल्याण गतिविधियों के लिए बजट अनुमान 2020-21 में कुल 6481.48 करोड़ के परिव्यय का प्रस्ताव किया है, जो कि बजट अनुमान 2019-20 के 5230. 54 करोड रुपये की तुलना में 23.92 प्रतिशत अधिक है। इसमें कृषि क्षेत्र के लिए 3364.90 करोड़, पशुपालन के लिए 1157.41 करोड़, बागवानी के लिए 492.82 करोड़ और मत्स्य पालन के लिए 122.42 करोड़ का परिव्यय शामिल है। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू हरियाणा बजट 2020 की खास बातें हरियाणा में अब किसानों को 7.50 रुपये प्रति यूनिट की जगह 4.75 रुपये देंगे होंगे। राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण लेने वाले किसानों को भी ब्याजमुक्त ऋण की सुविधा मिलेगी। 3 वर्ष में एक लाख एकड़ क्षेत्र में जैविक एवं प्राकृतिक खेती का विस्तार किया जाएगा। इसके लिए उपयोग धनराशि का प्रावधान किया है। खेती को जोखिम फ्री करने का प्रावधान। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लाभ के लिए प्रत्येक खंड कार्यालय में बीमा कंपनियों के प्रतिनिधि उपलब्ध रहेंगे। योजना ट्रस्ट माडल के रूप में चलेगी। सीएम ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को 3 वर्षों में दिए गए मुआवजे का विस्तार से उल्लेख किया। कृषि को उन्नत बनाने व किसानों की आय दो गुनी करने पर जोर। 54 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा रहा है। रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल रोकने की कार्ययोजना। 111 मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं बनेंगी। हरियाणा की सभी बड़ी मंडियों में क्रॉप ड्रायर लगाए जाएंगे, ताकि किसानों को फसल उत्पादन सुखाने में कोई परेशानी न आए। उनको फसलों का पूरा भाग बिना किसी कट के मिल सके। सभी सब्जी मंडियों में महिला किसान के लिए अलग से 10 प्रतिशत स्थान आरक्षित किया गया है। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने हेतु किसान कल्याण प्राधिकरण में विशेष महिला सेल की स्थापना की जाएगी। गोदाम में चोरी की समस्या को रोकने के लिए राज्य के भंडारण निगम हेफेड, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग इत्यादि के सभी गोदामों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। इस वर्ष 52 गोदामों में कैमरे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। शेष गोदामों को अगले चरणों में लिया जाएगा। जिन प्रगतिशील किसानों ने फसल विविधीकरण को अपनाया है, उन्हें मास्टर ट्रेनर के रूप में चयनित किया जाएगा। इन मास्टर ट्रेनर को दूसरे किसानों को फसल विविधीकरण के सफलतापूर्वक प्रोत्साहन करने पर पुरस्कृत किया जाएगा। अल्प बजट प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलेगा। किन्नू, अमरूद और आम के बगीचे पर 20 हजार रुपए प्रति एकड़ का अनुसान दिया जाएगा। हर ब्लॉक में पराली खरीद केंद्र बनाए जाएंगे। मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां शुरू होंगी। दुग्ध उत्पादकों की सब्सिडी चार रुपए से बढ़ाकर 5 रुपए प्रति लीटर की गई है। प्रदेश में पहला सरकारी टेट्रा पैक संयंत्र स्थापित किया जाएगा। कृषि उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए मोबाइल ऐप बनाई जाएगी। कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा दिया जाएगा। विशेष कृषि आधारित गतिविधियों के नाम से एक नई कैटेगिरी बनाई जाएगी जिससे बिजली बिलों की राशि पहले से कम होगी। हरियाणा में किसानों को कृषि पंप सेट के लिए फरीदाबाद व यमुनानगर में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित होंगे। 200 गोशालाओं में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित होंगे। 33 हजार सौर इनवर्टर चार्जर स्थापित होंगे। हरियाणा सरकार को समझौता ज्ञापन के तहत उपरी यमुना नदी बोर्ड को 458.42 करोड़ रुपए की प्रारंभिक राशि 5 सालों में चरणबद्ध रूप में देनी है, ताकि इन बांधों का निर्माण हो सके। सूक्ष्म सिंचाई के लिए 1200 करोड़ की योजनाएं। एक लाख 80 हजार रुपये से कम आय व पांच एकड़ से कम जमीन वालों को आयुष्मान भारत योजना का लाभ मिलेगा। बागवानी उत्पादन इकाइयों को प्रोत्साहित करने की योजना। गन्ना उत्पादों को 340 रुपये क्विंटल दिया जा रहा है। 355 करोड़ की लागत से पानीपत व 263 करोड़ से करनाल चीनी मिलों का आधुनिकीकरण होगा। शाहबाद चीनी मिल में 60 करोड़़ से एथोनाल संयंत्र लगाया जाएगा। जींद, झज्जर, नूंह, गुरुग्राम, फरीदाबाद के जल भराव के क्षेत्रों में 2500 एकड़ में मत्स्य पालन के अंतर्गत लाया जाएगा। विदेशी व संकर नस्ल के सांडों से निपटने की कार्ययोजना बनेगी। पशुपालकों को 200 रुपये प्रति स्ट्रा की दर से अच्छे पशुओं के प्रजनन के लिए सीमन देंगे। 11 लाख एकड़ लवणीय व जल भराव वाली एक लाख एकड़ जमीन को सुधारा जाएगा। यह कार्य पीपीपी के तहत किया जाएगा। हरियाणा में फसल अवशेष प्रबंधन पर रहेगा खास जोर। खेतों में फसल अवशेष प्रबंधन करने वालों को प्रोत्साहन। कृषि, ट्रैक्टर एवं कृषि उपकरणों के क्षेत्र में नई तकनीक व सरकारी योजनाओं की नवीनतम जानकारी के लिए हमेशा बने रहिये ट्रैक्टर जंक्शन के साथ।

बेबी कॉर्न की खेती की जानकारी - जानें बेबी कॉर्न मक्का की खेती कैसे करें.

बेबी कॉर्न की खेती की जानकारी - जानें बेबी कॉर्न मक्का की खेती कैसे करें.

बेबी कॉर्न की खेती : कम इनवेस्टमेंट में ज्यादा कमाई ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं बेबी कॉर्न की खेती से मोटी कमाई की। बेबी कॉर्न दोहरे उद्देश्यों वाली महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। यह अधिक तेजी से विकास करने वाली फसल है। आजकल अपरिपक्व मक्के के भुट्टे को सब्जी के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जिसको बेबी कॉर्न कहा जाता है। पहले बेबीकॉर्न के व्यजंन सिर्फ बड़े शहरों के होटलों में मिलते थे लेकिन अब यह आमजन के बीच काफी लोकप्रिय हो गया है। बेबी कॉर्न उद्योग उच्च आय के अवसर प्रदान करता है तथा किसानों के लिए रोजगार और निर्यात की संभावनाएं पैदा करता है। बेबी कॉर्न (मक्का) एक स्वादिष्ट आहार बेबी कॉर्न एक स्वादिष्ट, पौष्टिक तथा बिना कोलेस्ट्रोल का खाद्य आहार है। इसके साथ ही इसमें फाइबर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसमें खनिज की मात्रा एक अंडे में पाए जाने वाले खनिज की मात्रा के बराबर होती है। बेबी कॉर्न के भुट्टे, पत्तों में लिपटे होने के कारण कीटनाशक रसायन से मुक्त होते हैं। स्वादिष्ट एवं सुपाच्य होने के कारण इसे एक आदर्श पशु चारा फसल भी माना जाता है। हरा चारा, विशेष रूप से दुधारू मवेशियों के लिए अनुकूल है जो एक लैक्टोजेनिक गुण है। यह भी पढ़ें : मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में. बेबी कॉर्न की फसल से कमाई / Baby Corn Cultivation मक्का के अपरिपक्व भुट्टे को बेबी कॉर्न कहा जाता है, जो सिल्क की 1-3 सेमी लंबाई वाली अवस्था तथा सिल्क आने के 1-3 दिनों के अंदर तोड़ लिया जाता है। इसकी खेती एक वर्ष में तीन से चार बाज की जा सकती है। बेबी कॉर्न की फसल रबी में 110-120 दिनों में, जायद में 70-80 दिनों में तथा खरीफ के मौसम में 55-65 दिनों में तैयार हो जाती है। एक एकड़ जमीन में बेबीकॉर्न फसल में 15 हजार रुपए का खर्च आता है जबकि कमाई एक लाख रुपए तक हो सकती है। साल में चार बार फसल लेकर किसान चार लाख रुपए तक कमा सकता है। यह भी पढ़ें : जानें चंदन की खेती कैसे करें विश्व और भारत में बेबी कॉर्न की वैज्ञानिक खेती / भारतीय बेबी कॉर्न की माँग विदेश में वर्तमान समय में बेबी कॉर्न की खेती विश्व में सबसे अधिक थाईलैंड एवं चीन में की जा रही है। विकासशील देशों जैसे एशिया-प्रशांत क्षेत्रों में बेबीकॉर्न खेती की तकनीक को बढ़ावा देने की काफी गुंजाइश है। भारत में बेबी कॉर्न की खेती उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मेघालय तथा आंधप्रदेश में की जा रही है। बिहार राज्य के लघु एवं सीमांत किसानों के लिए इसकी खेती काफी फायदेमंद हो सकती है। आमतौर पर धान और गेहूं कृषि प्रणाली में जायद की फसल के रूप में गरमा मूंग लिया जाता है। जिसका आर्थिक लाभ किसान नहीं उठा पाते हैं। गरमा मूंग की खेती अगर किसान 15 मार्च के बाद करते हैं तो लाभांश की दृष्टि से यह किसान के लिए फायदेमंद नहीं होती है। उस परिस्थिति में अगर किसान बेबीकॉर्न की वैज्ञानिक खेती करते हैं तो काफी लाभ की संभावना है। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती बेबी कॉर्न भुट्टे का उपयोग बेबी कॉर्न का पूरा भुट्टा खाया जाता है। इसे कच्चा या पकाकर खाया जाता है। कई प्रकार के व्यंजनों में इसका उपयोग किया जाता है। जैसे पास्ता, चटनी, कटलेट, क्रोफ्ता, कढ़ी, मंचूरियन, रायता, सलाद, सूप, अचार, पकौड़ा, सब्जी, बिरयानी, जैम, मुरब्बा, बर्फी, हलवा, खीर आदि। इसके अलावा पौधे का उपयोग चारे के लिए किया जाता है जो कि बहुत पौष्टिक है। इसके सूखे पत्ते एवं भुट्टे को अच्छे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ बेबी कॉर्न की श्रेष्ठ प्रभेद/प्रजाति का चयन बेबी कॉर्न की प्रजाति का चयन करते समय भुट्टे की गुणवत्ता को ध्यान में रखना चाहिए। भुट्टे के दानों का आकार और दानों का सीधी पंक्ति में होना चयन में एक समान भुट्टे पकने वाली प्रजाति जो मध्यम ऊंचाई की अगेती परिपक्व (55 दिन) हों, उनको प्राथमिकता देनी चाहिए। भारत में पहला बेबी कॉर्न प्रजाति वीएल-78 है। इसके अलावा एकल क्रॉस हाईब्रिज एचएम-4 देश का सबसे अच्छा बेबी कॉर्न हाइब्रिड है। वीएन-42, एचए एम-129, गोल्डन बेबी (प्रो-एग्रो) बेबी कॉर्न का भी चयन कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम बेबी कॉर्न खेती : उत्पादन तकनीक और मृदा की तैयारी स्वीटकॉर्न और पॉपकॉर्न की तरह ही बेबी कॉर्न की खेती के लिए मृदा की तैयारी और फसल प्रबंधन किया जाता है। इसकी खेती की अवधि केवल 60-62 दिनों की होती है जबकि अनाज की फसल के लिए यह 110-120 दिनों की होती है। इसके अलावा कुछ और विभिन्नताएं हैं जैसे झंडों (नर फूल) को तोडऩा, भुट्टों में सिल्क (मोचा) आने के 1-3 दिन में तोडऩा। बेबी कॉर्न के लिए खेत की तैयारी और बुवाई का तरीका (baby corn plant) बेबी कॉर्न की खेती के लिए खेत की तीन से चार बार जुताई करने के बाद 2 बार सुहागा चलाना चाहिए, जिससे सरपतवार मर जाते हैं और मृदा भुरभुरी हो जाती है। इस फसल में बीज दर लगभग 25-25 किग्रा प्रति हैक्टेयर होती है। बेबी कॉर्न की खेती में पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी और पौधे की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी होनी चाहिए। इसके साथ ही बीज को 3-4 सेमी गहराई में बोना चाहिए। मेड़ों पर बीज की बुवाई करनी चाहिए और मेड़ों को पूरब से पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए। बेबी कॉर्न में बीजोपचार/बेबीकॉर्न में रोग से बचाव बेबी कॉर्न के बीजों को बीज और मृदा से होने वाले रोगों से बचाना होता है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना सबसे अच्छा तरीका है। एहतियात के तौर पर बीज और मृदा से होने वाले रोगों एवं कीटों से बचाने के लिए उन्हें फफूंदनाशकों और कीटनाशकों से उपचारित करना चाहिए। बाविस्टिन : इसका प्रयोग 1:1 में 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से पत्ती अंगमारी से बचाने के लिए किया जाता है। थीरम : इसका प्रयोग 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज दर से बीज को डाउनी मिल्ड्यू से बचाने के लिए किया जाता है। कार्बेन्डाजिम : इसका प्रयोग 3 ग्राम प्रति किग्रा बीज दर से पौधों को अंगमारी से बचाने के लिए किया जाता है। फ्रिपोनिल : इसका प्रयोग 44 मिली प्रति किग्रा बीज की दर से दीमक को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा बुवाई से पहले जैविक खाद एजोस्पिरिलम के 3-4 पैकेट से उपचार करने से बेबीकॉर्न की गुणवत्ता और उपज में वृद्धि होती है। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले बुवाई का समय बेबी कॉर्न की खेती पूरे वर्ष की जा सकती है। बेबी कॉर्न को नमी और सिंचित स्थितियों के आधार पर जनवरी से अक्टूबर तक बोया जा सकता है। मार्च के दूसरे सप्ताह में बुवाई के बाद अप्रैल के तीसरे सप्ताह में सबसे अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। बेबी कॉर्न की खेती में खाद और उर्वरक प्रबंधन बेबी कॉर्न की खेती में भूमि की तैयारी के समय 15 टन कम्पोस्ट या गोबर प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। बेसल ड्रेसिंग उर्वरकों के रूप में 75:60:20 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से एनपीके एवं बुवाई के तीन सप्ताह बाद शीर्ष ड्रेसिंग उर्वरकों के रूप में 80 किग्रा नाइट्रोजन और 20 किग्राम पोटाश देना चाहिए। यह भी पढ़ें : हरियाणा पशु किसान क्रेडिट कार्ड योजना 2020 बेबी कॉर्न की खेती में सिंचाई प्रबंधन बेबी कॉर्न की फसल जल जमाव एवं ठहराव को सहन नहीं करती है। इसलिए खेत में अच्छी आतंरिक जल निकासी होनी चाहिए। आमतौर पर पौध एवं फल आने की अवस्था में, बेहतर उपज के लिए सिंचाई करनी चाहिए। अत्यधिक पानी, फसल को नुकसान पहुंचाता है। बरसात के मौसम में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, जब तक कि लंबे समय तक सूखा न रहें। बेबी कॉर्न की खेती में खरपतवार नियंत्रण बेबी कॉर्न की खेती में खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए 2-3 बार हाथ से खुरपी द्वारा निराई पर्याप्त होती है। खरीफ के मौसम में और जब मृदा गीली होती है तो किसी भी किसी कृषि कार्य को करना मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति में खरपतवारनाशक दवाइयों के प्रयोग से खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। बुवाई के तुरंत बाद सिमाजीन या एट्राजीन दवाइयों का उपयोग करना चाहिए। औसतन 1-1.5 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से 500-650 लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग करना चाहिए। पहली निराई बुआई के दो सप्ताह बाद करनी चाहिए। मिट्टी चढ़ाना या टॉपड्रेसिंग बुवाई के 3-4 सप्ताह के बाद करनी चाहिए। बुवाई के 40-45 दिनों के बाद झंडों या नर फूलों को तोडऩा चाहिए। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू कीट और रोग प्रबंधन बेबी कॉर्न फसल में शूट फ्रलाई, पिंक बोरर और तनाछेदक कीट प्रमुख रूप से लगते हैं। कार्बेरिल 700 ग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से 700 लीटर पानी में मिलाकर छिडक़ाव करने से इन कीटों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। बेबी कॉर्न के साथ अंतर्वर्ती फसल बेबी कॉर्न के साथ अंतर्वर्ती फसल किसानों को और अधिक लाभ प्रदान करती है। ये फसलें दूसरी फसल पर कोई बुरा प्रभाव नहीं डालती है और मृदा की उर्वराशक्ति को भी बढ़ाती है। अत: फसली खेती में बेबी कॉर्न की फसल आलू, मटर, राजमा, चुकंदर, प्याज, लहसुन, पालक, मेथी, फूल गोभी, ब्रोकली, मूली, गाजर के साथ खरीफ के मौसम में लोबिया, उड़द, मंूग आदि के साथ उगाई जा सकती है। यह भी पढ़ें : अनुबंध खेती जानकारी : जानिए क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती / संविदा खेती बेबी कॉर्न की कटाई / तुड़ाई / बेबी कॉर्न का उत्पादन बेबी कॉर्न को आमतौर पर रेशम उद्भव अवस्था में बुवाई के लगभग 50-60 दिनों के बाद हाथ से काटा जाता है। इसकी तुड़ाई के समय भुट्टे का आकार लगभग 8-10 सेमी लंबा, भुट्टे के आधार के पास व्यास 1-1.5 सेमी एवं वजन 7-8 ग्राम होना चाहिए। भुट्टे को 1-3 सेमी सिल्क आने पर तोड़ लेना चाहिए। इसको तोड़ते समय इसके ऊपर की पत्तियों को नहीं हटाना चाहिए। नहीं तो ये जल्दी खराब हो जाता है। खरीफ के मौसम में प्रतिदिन एवं रबी के मौसम में एक दिन के अंतराल पर सिल्क आने के 1-3 दिनों के अंदर भुट्टों की तुड़ाई कर लेनी चाहिए नहीं तो अंडाशय का आकार, भुट््टे की लंबाई एवं भुट्टा लकड़ी की तरह हो जाता है। जब बेबी कॉर्न को एक माध्यमिक फसल के रूप में उगाया जाता है तो पौधों के शीर्ष के भुट्टों को छोडक़र दूसरे भुट्टों की बेबी कॉर्न के लिए तुड़ाई की जाती है और शीर्ष भुट्टों को स्वीट कॉर्न या पॉपकार्न के लिए परिपक्त होने के लिए छोड़ दिया जाता है। कटाई के बाद बेबी कॉर्न का प्रबंधन तुड़ाई के बाद बेबीकॉर्न की ताजगी लंब समय तक बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है। तुड़ाई के बाद भुट्टों को छायादार जगह में रखकर उसके छिलके को हटाना चाहिए। इसका भंडारण रेफ्रीजरेटर या किसी ठंडी जगह में किसी टोकरी या प्लास्टिक थैले में करना चाहिए। बेबी कॉर्न खेती के लिए सरकारी सहायता मक्का अनुसंधान निदेशालय, भारत सरकार देशभर में बेबीकॉर्न की खेती के लिए किसानों के बीच जागरूकता अभियान चला रहा है। अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट https://iimr.icar.gov.in पर लॉगिन कर सकते हैं। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

मूंग की जानकारी - जानें मूंग की बुवाई और मूंग की नई किस्म के बारे में.

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जायद फसल मूंग की जानकारी ट्रैक्टर जंक्शन पर किसान भाइयों का स्वागत है। सभी किसान भाई जानते हैं कि देश में इस समय रबी फसल की कटाई चल रही है। नवसवंत् से पहले सभी खेतों में रबी की फसल काटी जा चुकी होगी। रबी की फसल की कटाई के तुरंत बाद किसान भाई खेत में ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल उगाकर कमाई कर सकते हैं। रबी की फसल के तुरंत बाद खेत में दलहनी फसल मूंग की बुवाई करने से मिट्टी की उर्वरा क्षमता में वृद्धि होती है। इसकी जड़ों में स्थित ग्रंथियों में वातावरण से नाइट्रोजन को मृदा में स्थापित करने वाले सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं। इस नाइट्रोजन का प्रयोग मूंग के बाद बोई जाने वाली फसल द्वारा किया जाता है। यह भी पढ़ें : जानें चंदन की खेती कैसे करें भारत मे खरीफ मूंग की खेती / ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती भारत में मूंग एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दालों में से एक है। मूंग गर्मी और खरीफ दोनों मौसम की कम समय में पकने वाली एक मुख्य दलहनी फसल है। ग्रीष्म मूंग की खेती गेहूं, चना, सरसों, मटर, आलू, जौ, अलसी आदि फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में की जा सकती है। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान प्रमुख ग्रीष्म मूंग उत्पादक राज्य है। गेहूं-धान फसल चक्र वाले क्षेत्रों में जायद मूंग की खेती द्वारा मिट्टी उर्वरता को उच्च स्तर पर बनाए रखा जा सकता है। मूंग से नमकीन, पापड़ तथा मंगौड़ी जैसे स्वादिष्ट उत्पाद भी बनाए जाते हैं। इसके अलावा मूंग की हरी फलियों को सब्जी के रूप में बेचकर किसान अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। किसान भाई इसकी एक एकड़ जमीन से 30 हजार रुपए तक की कमाई कर सकते हैं। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ मूंग की बुवाई का समय/जुताई ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई 15 मार्च से 15 अप्रैल तक करनी चाहिए। जिन किसान भाइयों के पास सिंचाई की सुविधा है वे फरवरी के अंतिम सप्ताह से भी बुवाई शुरू कर सकते हैं। बसंतकालीन मूंग बुवाई मार्च के प्रथम पखवाड़े में करनी चाहिए। खरीफ मूंग की बुवाई का उपयुक्त समय जून के द्वितीय पखवाड़े से जुलाई के प्रथम पखवाड़े के मध्य है। बोनी में देरी होने पर फूल आते समय तापमान में वृद्धि के कारण फलियां कम बनती है या बनती ही नहीं है,इससे इसकी पैदावार प्रभावित होती है। मूंग की फसल के लिए खेत तैयार करना रबी फसल की कटाई के तुरंत मूंग की बुआई करनी है तो पहले खेतों की गहरी जुताई करें। इसके बाद एक जुताई कल्टीवेटर तथा देशी हल से कर भलीभांति पाटा लगा देना चाहिए, ताकि खेत समतल हो जाए और नमी बनी रहे। दीमक को रोकने के लिए 2 प्रतिशत क्लोरोपाइरीफॉस की धूल 8-10 कि.ग्रा./एकड़ की दर से खेत की अंतिम जुताई से पूर्व खेत में मिलानी चाहिए। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती मूंग की खेती में बीज जायद के सीजन में अधिक गर्मी व तेज हवाओं के कारण पौधों की मृत्युदर अधिक रहती है। अत: खरीफ की अपेक्षा ग्रीष्मकालीन मूंग में बीज की मात्रा 10-12 किग्रा/एकड़ रखें। मूंग की खेती में बीजोपचार बुवाई के समय फफूंदनाशक दवा (थीरम या कार्बेन्डाजिम) से 2 ग्राम/कि.ग्रा. की दर से बीजों को शोधित करें। इसके अलावा राइजोबियम और पी.एस.बी. कल्चर से (250 ग्राम) बीज शोधन अवश्य करें। 10-12 किलोग्राम बीज के लिए यह पर्याप्त है। यह भी पढ़ें : मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना - जानें क्या है सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम मूंग की प्रमुख प्रजातियां/ मूंग की नई किस्म मूंग की प्रमुख प्रजातियों में सम्राट, एचएमयू 16, पंत मूंग-1, पूजा वैशाखी, टाइप-44, पी.डी.एम.-11, पी.डी.एम.-5, पी.डी.एम.-8, मेहा, के. 851 आदि है। मूंग की खेती में खाद एवं उर्वरक दलहनी फसल होने के कारण मूंग को अन्य खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा नाइट्रोजन की कम आवश्यकता होती है। जड़ों के विकास के लिए 20 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फास्फोरस तथा 20 किग्रा पोटाश प्रति हैक्टेयर डालना चाहिए। मूंग की फसल में सिंचाई / मूंग का पौधा में सिंचाई जायद ऋतु में मूंग के लिए गहरा पलेवा करके अच्छी नमी में बुवाई करें। पहली सिंचाई 10-15 दिनों में करें। इसके बाद 10-12 दिनों के अंतराल में सिंचाई करें। इस प्रकारकुल 3 से 5 सिंचाइयां करें। यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शाखा निकलते समय, फूल आने की अवस्था तथा फलियां बनने पर सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले मूंग की फलियों की तुड़ाई और कटाई मूंग की फलियां जब 50 प्रतिशत तक पक जाएं तो फलियों की तुड़ाई करनी चाहिए। दूसरी बार संपूर्ण फलियों को पकने पर तोडऩा चाहिए। फसल अवशेष पर रोटावेटर चलाकर भूमि में मिला दें ताकि पौधे हरी खाद का काम करें। इससे मृदा में 25 से 30 किग्राम प्रति हैक्टेयर नाइट्रोजन की पूर्ति आगामी फसल के लिए हो जाती है। मूंग की खेती में खरपतवार नियंत्रण निराई-गुड़ाई Ñ मूंग के पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए खेत को खरपतवार रहित रखना अति आवश्यक है। इसके लिए पहली सिंचाई के बाद खुरपी द्वारा निराई आवश्यक है। रासायनिनक विधि द्वारा 300 मिली प्रति एकड़ इमाजाथाईपर 10 प्रतिशत एसएल की दर से बुआई के 15-20 दिनों बाद पानी में घोलकर खेत में छिडक़ाव करें। मूंग की फसल में रोग एवं कीटों का प्रकोप ग्रीष्मकाल में कड़ी धूप व अधिक तापमान रहने से मूंग की फसल में रोगों व कीटों का प्रकोप कम होता है। फिर भी मुख्य कीट जैसे माहू, जैडिस, सफेद मक्खी, टिड्डे आदि से फसल को बचाने के लिए 15-20 दिनों बाद 8-10 किग्रा प्रति एकड़ क्लोरोपाइरीफॉस 2 प्रतिशत या मैथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत की धूल का पौधों पर बुरकाव करें। पीले पत्ते के रोग से प्रभावित पौधों को उखाडक़र जला दें या रासाायनिक विधि के अंतर्गत 100 ग्राम थियोमेथाक्सास का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर रखे में छिडक़ाव करें। मूंग का अधिक उत्पादन लेने के लिए क्या करें? स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें। सही समय पर बुवाई करें, देर से बुवाई करने पर पैदावार कम हो जाती है। किस्मों का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता के अनुसार करें। बीज उपचार अवश्य करें जिससे पौधो को बीज और मिटटी जनित बीमारियों से प्रारंभिक अवस्था में प्रभावित होने से बचाया जा सके। मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग करे जिससे भूमि की उर्वराशक्ति बनी रहती है, जो अधिक उत्पादन के लिए जरूरी है। खरीफ मौसम में मेड नाली पद्धति से बुवाई करें समय पर खरपतवारों नियंत्रण और कीट और रोग रोकथाम करें। पीला मोजेक रोग रोधी किस्मों का चुनाव क्षेत्र की अनुकूलता के अनुसार करें। पौध संरक्षण के लिये एकीकृत पौध संरक्षण के उपायों को अपनाना चाहिए। यह भी पढ़ें : हरियाणा पशु किसान क्रेडिट कार्ड योजना 2020 मूंग की फसल में सरकारी सहायता भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा फसल उत्पादन (जुताई, खाद, बीज, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशी, सिंचाई के साधनों), कृषि यंत्रों, भंडारण इत्यादि हेतु दी जाने वाली सुविधाओं/अनुदान सहायता /लाभ की जानकारी के लिए संबधित राज्य/जिला/विकास/खंड स्थित कृषि विभाग से संपर्क करें। मूंग की जैविक खेती बहुत से जागरूक किसान भाई अब जैविक खेती को अपना रहे हैं। जैविक खेती में शुरुआत के दो सालों में पैदावार रसायनिक खेती की तुलना में 5 से 15 फीसदी तक कम रहती है। लेकिन दो वर्ष बाद यह धीरे-धीरे सामान्य की तुलना में अधिक पहुंच जाती है। जैविक विधि से मूंग की खेती करने पर खरीफ सीजन में 8 से 12 क्विंटल और जायद में 6 से 9 क्विंटल पैदावार प्राप्त होती है। यह भी पढ़ें : यूरिया खाद रेट 2020 : इफको नैनो यूरिया, एक बोतल की कीमत रु.240 अधिक जानकारी के लिए देखें एम-किसान पोर्टल - https://mkisan.gov.in फार्मर पोर्टल - https://farmer.gov.in/ मूंग की खेती में उपज और आमदनी मूंग की खेती अच्छी तरह से करने पर 5-6 क्विंटल प्रति एकड़ आसानी से उपज प्राप्त कर सकते हैं। कुल मिलाकर यदि आमदनी की बात करें तो 25-30 हजार प्राप्त कर सकते हैं। देश के जागरूक किसान देश की प्रमुख कंपनियों के नए व पुराने ट्रैक्टर उचित मूल्य पर खरीदने, लोन, इंश्योरेंस, अपने क्षेत्र के डीलरों के नाम जानने, आकर्षक ऑफर व कृषि क्षेत्र की नवीनतम अपडेट जानने के लिए ट्रैक्टर जंक्शन के साथ बनें रहिए।

जानें चंदन की खेती कैसे करें ( Indian Sandalwood Plantation )

जानें चंदन की खेती कैसे करें ( Indian Sandalwood Plantation )

चंदन की खेती : कम जमीन में ज्यादा कमाई देशभर के किसान भाइयों का ट्रैक्टर जंक्शन पर एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं करोड़पति बनने की। चंदन की खेती से जुडक़र किसान करोड़पति बन सकते हैं। बशर्तें उन्हें धैर्य के साथ चंदन की खेती करनी होगी। अगर किसान आज चंदन के पौधे लगाते हैं तो 15 साल बाद किसान अपने उत्पादन को बाजार में बेचकर करोड़ों रुपए कमा सकते हैं। देश में लद्दाख और राजस्थान के जैसलमेर को छोडक़र सभी भू-भाग में चंदन की खेती की जा सकती है। चंदन के बीज/ पौधे/मिट्टी चंदन की खेती के लिए किसानों को सबसे पहले चंदन के बीज या फिर छोटा सा पौधा या लाल चंदन के बीज लेने होंगे जो कि बाजार में उपलब्ध है। चंदन का पेड़ लाल मिट्टी में अच्छी तरह से उगता है। इसके अलावा चट्टानी मिट्टी, पथरीली मिट्टी और चूनेदार मिट्टी में भी ये पेड़ उगाया जाता है। हालांकि गीली मिट्टी और ज्यादा मिनरल्स वाली मिट्टी में ये पेड़ तेजी से नहीं उग पाता। यह भी पढ़ें : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 2020 ( PMFBY ) में बड़े बदलाव - जानें लाभ चंदन खेती : बुवाई का समय/जलवायु अप्रैल और मई का महीना चंदन की बुवाई के लिए सबसे अच्छा होता है। पौधे बोने से पहले 2 से 3 बार अच्छी और गहरी जुताई करना जरूरी होता है। जुताई होने के बाद 2x2x2 फीट का गहरा गड्ढ़ा खोदकर उसे कुछ दिनों के लिए सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर आपके पास काफी जगह है तो एक खेत में 30 से 40 सेमी की दूरी पर चंदन के बीजों को बो दें। मानसून के पेड़ में ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं, लेकिन गर्मियों में इन्हें सिंचाई की जरूरत होती है। चंदन के पेड़ को 5 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले इलाके में लगाना सही माना जाता है। इसके लिए 7 से 8.5 एचपी वाली मिट्टी उत्तम होती है। एक एकड़ भूमि में औसतन 400 पेड़ लगाए जाते हैं। इसकी खेती के लिए 500 से 625 मिमी वार्षिक औसम बारिश की आवश्यकता होती है। यह भी पढ़ें : गन्ने की खेती कैसे करें - गन्ना खेती की जानकारी, बसंतकालीन गन्ने की खेती चंदन की खेती में पौधरोपण चंदन का पौधा अद्र्धजीवी होता है। इस कारण चंदन का पेड़ आधा जीवन अपनी जरुरत खुद पूरी करता है और आधी जरूरत के लिए दूसरे पेड़ की जड़ों पर निर्भर रहता है। इसलिए चंदन का पेड़ अकेले नहीं पनपता है। अगर चंदन का पेड़ अकेला लगाया जाएगा तो यह सूख जाएगा। जब भी चंदन का पेड़ लगाएं तो उसके साथ दूसरे पेड़ भी लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि चंदन के कुछ खास पौधे जैसे नीम, मीठी नीम, सहजन, लाल चंदा लगाने चाहिए जिससे उसका विकास हो सके। यह भी पढ़ें : राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) - मध्यप्रदेश उद्यानिकी विभाग की योजना चंदन की खेती में खाद प्रबंधन चंदन की खेती में जैविक खादकी अधिक आवश्यकता नहीं होती है। शुरू में फसल की वृद्धि के समय खाद की जरुरत पड़ती है। लाल मिट्टी के 2 भाग, खाद के 1 भाग और बालू के 1 भाग को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। गाद भी पौधों को बहुत अच्छा पोषण प्रदान करता है। चंदन की खेती में सिंचाई प्रबंधन बारिश के समय में चंदन के पेड़ों का तेजी से विकास होता है लेकिन गर्मी के मौसम में इसकी सिंचाई अधिक करनी होती है। सिंचाई मिट्टी में नमी और मौसम पर निर्भर करती है। शुरुआत में बरसात के बाद दिसंबरसे मई तक सिंचाई करना चाहिए। रोपण के बाद जब तक बीज का 6 से 7 सप्ताह में अंकुरण शुरू ना हो जाए तब तक सिंचाई को रोकना नहीं चाहिए। चंदन की खेती में पौधों के विकास के लिए मिट्टी का हमेशा नम और जल भराव होना चाहिए। अंकुरित होने के बाद एक दिन छोडक़र सिंचाई करें। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू चंदन की खेती में खरपतवार चंदन की खेती करते समय, चंदन के पौधे को पहले साल में सबसे अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। पहले साल में पौधों के इर्द-गिर्द की खरपतवारको हटाना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो दूसरे साल भी साफ-सफाई करनी चाहिए। किसी भी तरह का पर्वतारोही या जंगली छोटा कोमला पौधा हो तो उसे भी हटा देना चाहिए। चंदन की खेती में कीट एवं रोग नियंत्रण चंदन की खेती में सैंडल स्पाइक नाम का रोग चंदन के पेड़ का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। इस रोग के लगने से चंदन के पेड़ सभी पत्ते ऐंठाकर छोटे हो जाते हैं। साथ ही पेड़ टेड़े-मेढ़े हो जाते हैं। इस रोग से बचाव के लिए चंदन के पेड़ से 5 से 7 फीट की दूरी पर एक नीम का पौधा लगा सकते हैं जिससे कई तरह के कीट-पंतगों से चंदन के पेड़ की सुरक्षा हो सकेगी। चंदन के 3 पेड़ के बाद एक नीम का पौधा लगाना भी कीट प्रबंधन का बेहतर प्रयोग है चंदन की फसल की कटाई चंदन का पेड़ जब 15 साल का हो जाता है तब इसकी लकड़ी प्राप्त की जाती है। चंदन के पेड़ की जड़े बहुत खुशबूदार होती है। इसलिए इसके पेड़ को काटने की बजाय जड़ सहित उखाड़ लिया जाता है। पौधे को रोपने के पांच साल बाद से चंदन की रसदार लकड़ी बनना शुरू हो जाता है। चंदन के पेड़ को काटने पर उसे दो भाग निकलते हैं। एक रसदार लकड़ी होती है और दूसरी सूखी लकड़ी होती है। दोनों ही लकडिय़ों का मूल्य अलग-अलग होता है। चंदन का बाजार भाव देश में चंदन की मांग इतनी है कि इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती है। देश में चंदन की मांग 300 प्रतिशत है जबकि आपूर्ति मात्र 30 प्रतिशत है। देश के अलावा चंदन की लकड़ी की मांग चाइना, अमेरिका, इंडोनेशिया आदि देशों में भी है। वर्तमान में मैसूर की चंदन लडक़ी के भाव 25 हजार रुपए प्रति किलो के आसपास है। इसके अलावा बाजार में कई कंपनियां चंदन की लडक़ी को 5 हजार से 15 हजार रुपए किलो के भाव से बेच रही है। एक चंदन के पेड़ का वजन 20 से 40 किलो तक हो सकता है। इस अनुमान से पेड़ की कटाई-छंटाई के बाद भी एक पेड़ से 2 लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है। यह भी पढ़ें : डेयरी उद्यमिता विकास योजना 2019-20 (डीईडीएस) - जानें डेयरी लोन कैसे ले चंदन के पेड़ से करोड़पति बनने की राह आसान अगर कोई किसान चंदन के सौ पेड़ रोपता है और उसमें से अगर 70 पेड़ भी बड़े हो जाते हैं तो किसान 15 साल बाद पेड़ों को काटकर और बाजार में भेजकर एक करोड़ रुपए आसानी से प्राप्त कर सकता है। यह किसी भी बैंक में एफडी और प्रॉपर्टी में निवेश से भी कई गुना ज्यादा आपको लाभ दे सकता है। चंदन की खेती के लिए लोन देश में अब कई राष्ट्रीयकृत बैंक और को-ऑपरेटिव बैंक भी चंदन की खेती के लिए बैंक लोन उपलब्ध करा रही है। चंदन की खेती के नियम देश में साल 2000 से पहले आम लोगों को चंदन को उगाने और काटने की मनाही थी। सात 2000 के बाद सरकार ने अब चंदन की खेती को आसान बना दिया है। अगर कोई किसान चंदन की खेती करना चाहता है तो इसके लिए वह वन विभाग से संपर्क कर सकता है। चंदन की खेती के लिए किसी भी तरह के लाइसेंस की जरूरत नहीं होती है। केवल पेड़ की कटाई के समय वन विभाग से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है जो आसानी से मिल जाता है। जानकारी : चंदन / चंद की प्रजाति / रक्तचंदन औषधी वनस्पती पूरे विश्व में चंदन की 16 प्रजातियां है। जिसमें सेंलम एल्बम प्रजातियां सबसे सुगंधित और औषधीय मानी जाती है। इसके अलावा लाल चंदन, सफेद चंदन, सेंडल, अबेयाद, श्रीखंड, सुखद संडालो प्रजाति की चंदन पाई जाती है। यह भी पढ़ें : अनुबंध खेती जानकारी : जानिए क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती / संविदा खेती चंदन के बीज तथा पौधे कहां पर मिलते हैं? चंदन की खेती के लिए बीज तथा पौधे दोनों खरीदे जा सकते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार की लकड़ी विज्ञान तथा तकनीक (Institute of wood science & technology) संस्थान बैंगलोर में है। यहां से आप चंदन की पौध प्राप्त कर सकते हैं। पता इस प्रकार है : Tree improvement and genetics division Institute of wood science and technology o.p. Malleshwaram Bangalore – 506003 (India) E-mail – [email protected] tel no. – 00 91-80 – 22-190155 fax number – 0091-80-23340529 किसान भाई अधिकारी जानकारी के लिए Institute of Wood Science and Technology – ICFRE की वेबसाइट iwst.icfre.gov.in पर संपर्क कर सकते हैं। सभी कंपनियों के ट्रैक्टरों के मॉडल, पुराने ट्रैक्टरों की री-सेल, ट्रैक्टर खरीदने के लिए लोन, कृषि के आधुनिक उपकरण एवं सरकारी योजनाओं के नवीनतम अपडेट के लिए ट्रैक्टर जंक्शन वेबसाइट से जुड़े और जागरूक किसान बने रहें।

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स्वराज इनोवेशन अवार्ड्स के तीसरे संस्करण का दिल्ली में भव्य आयोजन

स्वराज इनोवेशन अवार्ड्स के तीसरे संस्करण का दिल्ली में भव्य आयोजन

स्वराज ट्रैक्टर्स ने किया भारतीय कृषि के नायकों का सम्मान 20.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर वाले महिंद्रा गु्रप की एक इकाई स्वराज ट्रैक्टर्स की ओर से 24 फरवरी को नई दिल्ली में स्वराज इनोवेशन अवार्ड्स के तीसरे संस्करण का आयोजन किया गया। इस कृषि कॉन्क्लेव में स्वराज इनोवेशन अवार्ड्स 2020 के विजेताओं को सम्मानित किया गया। कृषि के क्षेत्र में किसानों और संस्थानों द्वारा दिए गए उल्लेखनीय योगदान को ये पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर थे। तोमर ने किसानों के कल्याण के लिए स्वराज ट्रैक्टर के योगदान की सराहना की। भारतीय कृषि अनुसुधान परिषद (आईसीएआर), कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कॉन्क्लेव में “ कृषि के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव” विषय पर व्यापक विमर्श किया गया। यह भी पढ़ें : महिंद्रा एंड महिंद्रा मित्सूबिशी के साथ मिलकर लाएगी ट्रैक्टर्स की नई रेंज k2 कार्यक्रम के मुख्य वक्ता स्वराज डिवीजन के सीईओ हरीश चव्हाण ने कहा कि देश के आर्थिक विकास में कृषि एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और वर्तमान दौर में हमें अपने उत्पादन में तेजी लाते हुए स्थायी कृषि पद्धतियों को अपनाने की आवश्यकता है। चव्हाण ने आगे कहा कि हम वार्षिक स्वराज इनोवेशन अवार्ड्स की मेजबानी करते हुए गर्व अनुभव करते हैं क्योंकि यह अवार्ड्स हमें कृषि क्षेत्र में लोगों और संगठनों द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों और उनके योगदान को पहचानने का अवसर प्रदान करते हैं। ये पुरस्कार प्रतिभागियों और पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं को समुदाय के बड़े लाभ के लिए खेती और संबंधित क्षेत्रों में सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिए एक प्लेटफॉर्म प्रदान करते हैं। यह भी पढ़ें : एस्कॉर्ट ने जनवरी माह में बेचे 6,063 ट्रैक्टर, बिक्री में 1.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी पुरस्कार समारोह में कृषि क्षेत्र के विभिन्न गणमान्य व्यक्ति और प्रमुख सरकारी अधिकारी भी शामिल हुए, जिन्होंने इस कार्यक्रम के दौरान पैनल चर्चा और तकनीकी सत्रों में भाग लिया। वहीं प्रतिभागियों को स्थायी और प्रौद्योगिकी संचालित कृषि पद्धतियां जैसे विभिन्न विषयों पर कृषि क्षेत्र मकें प्रसिद्ध विशेषज्ञों के विचार जानने का अवसर मिला। यह भी पढ़ें : Tractor Sales January 2020; John Deere Tractor Recorded 46 Percent Growth सात कैटेगिरी में चौदह पुरस्कार इस स्वराज अवाड्र्स 2020 में सात कैटेगिरी में चौदह पुरस्कार दिए गए। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि क्षेत्र के इन दिग्गजों को पुरस्कृत किया। पुरस्कार के तहत उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, मेघालय, उत्तराखंड हरियाणा, तमिलनाडू, गुजरात, छत्तीसगढ़ के किसान, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र और कोऑपरेटिव में काम करने वाले दिग्गजों को सम्मानित किया गया। इन्हें मिला सम्मान श्रेष्ठ कृषि विज्ञान केंद्र (दो विजेता) रामकृष्ण मिशन केवीके रांची, झारखंड : जैविक खेती को प्रोत्साहन के लिए केवीके मुरैना, मध्यप्रदेश : शहद के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उत्पादकों को प्रोत्साहित किया। सरसों और अन्य फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों की सहायता की। महंगे फर्टिलाइजर की बजाए परागण से कृषि उत्पादकता बढ़ाने का अनूठा प्रयोग किया। श्रेष्ठ कृषि वैज्ञानिक (दो विजेता) डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह : डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के निदेशक हैं। उन्होंने गेहूं और जौ की 48 किस्मों के विकास के लिए अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. बख्शीराम : अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रीडिंग साइंटिस्ट डा. बख्शीराम कोयंबटूर स्थित आईसीएआर शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हैं। उनके द्वारा विकसित गन्ने की वैरायटी देश के 56 फीसदी क्षेत्र में उगाई जाती है। यह भी पढ़ें : ITOTY Awards के दूसरे संस्करण का इंतजार शुरू श्रेष्ठ प्रगतिशील किसान (महिला) मुकेश देवी : हरियाणा के झज्जर जिले के गांव बिरहोर की मुकेश देवी अपने गांव की पहली मधुमक्खी पालक है। उन्होंने 2004 में कर्ज लेकर मधुमक्खियों के 30 बॉक्स खरीदे और कारोबार शुरू किया। आज इनके पास 7000 बॉक्स है। उनका सालाना मुनाफा 2.65 करोड़ रुपए हो चुका है। श्रेष्ठ प्रगतिशील किसान (पुरुष) अब्दुल हादी खान : उत्तरप्रदेश के सीतापुर में बखरिया निवासी अब्दुल हादी खानन अल्प शिक्षित हैं। उन्होंने आम, अनानास, वर्मी कंपोस्ट और नैपियर का मिश्रित खेती का नया मॉडल अपनाया। उन्होंने खेत में आड़ी-टेड़ी मेड़ बनाकर सिंचाई की नई पद्धति विकसित की जिससे सिंचाई का खर्च 50 फीसदी कम हो गया। श्रेष्ठ राज्य (दो विजेता) मेघालय : मेघालय की 81 फीसदी आबादी खेती पर ही निर्भर है। मेघालय ने स्ट्रॉबेरी, हल्दी, कटहल और दूध के क्षेत्र में कई सफल प्रयोग किए। उत्तराखंड : उत्तराखंड के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के मार्गदर्शन में कृषि क्षेत्र विकास कर रहा है। राज्य में कृषि क्षेत्र घटने के बावजूद खाद्यान्न उत्पादन बढ़ रहा है। राज्य ने सभी छोटे व सीमांत किसानों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की है। श्रेष्ठ राष्ट्रीय सहकारी समिति नेशनल कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन ऑफ इंडिया, आणंद : एनसीडीएफआई सहकारिता के माध्यम से डेयरी के अलावा तिलहन, खाद्य तेल और अन्य फसलों के प्रोत्साहन के लिए काम करती हैं। डेयरी क्षेत्र में सबसे उल्लेखनीय योगदान है। पिछले साल उसका कारोबार 1103 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। देश श्वेत क्रांति के जनक डा. वर्गीज कुरियन 2006 तक एनसीडीएफआई के चेयरमैन रहे थे। श्रेष्ठ राज्य सहकारी समिति छत्तीसगढ़ स्टेट कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड : छत्तीसगढ़ मार्कफेड ने धान की खरीद, उसके प्रबंधन और भुगतान में ऑटोमेशन को बढ़ावा देकर सहकारिता क्षेत्र को नया आयाम दिया है। धान खरीद का भुगतान सभी 18 लाख किसानों को पीएफएमएस पोर्टल से जुड़े एसएफटी के जरिए किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी कर्मचारी का कोई दखल नहीं होता है। श्रेष्ठ प्राथमिक सहकारी समिति मल्कानूर कोऑपरेटिव क्रेडिट एंड मार्केटिंग सोसायटी लिमिटेड : तेलंगाना की मल्कानूर कोऑपरेटिव क्रेडिट एंड मार्केटिंग सोसायटी ने कृषि, क्रेडिट, एग्री स्टोररेज, प्रोसेसिंग, मार्केटिंग, डेयरी और फिशिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 1956 में स्थापित इस सहकारी समिति में आज 7650 किसान जुड़े हैं। समिति अपने सदस्यों को फसल कर्ज व दूसरे तरह के कृषि कर्ज उपलब्ध कराती है। साथ ही बच्चों की पढ़ाई, चिकित्सा और बेटियों की शादी के लिए व्यक्तिगत कर्ज भी देती है। श्रेष्ठ फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (दो विजेता) रामरहीम प्रगति प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड : मध्यप्रदेश के देवास में 2012 में स्थापित रामरहीम प्रगति प्रोड्यूशर कंपनी लिमिटेड में 304 स्वयं सहायता समूह शेयरधारक हैं और इन समूहों से करीब 4200 सदस्य जुड़े हैं। यह संगठन किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के अलावा बोनस भी देता है। कंपनी एनसीडीईएक्स में सूचीबद्ध होने वाली पहली फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी भी है। वेलियनगिरी उझावन प्रोडसर कंपनी लिमिटेड : तमिलनाडु में कोयंबटूर की वेलियनगिरि उझावन प्रोड्यूसर कंपनी नारियल, सुपारी, सब्जियां, हल्दी और केला उत्पादकों के लिए काम करती है। यह एफपीओ सदस्य किसानों को नई तकनीक अपनाने और बेहतर उत्पादकता पाने के लिए प्रोत्साहित और सहायता करता है। संगठन का कारोबार 2016-17 में 2.37 करोड़ रुपए था जो वर्ष 2018-19 में बढक़र 11.88 करोड़ रुपए हो गया। श्रेष्ठ एग्री टेक्नोलॉजी स्टार्टअप एगनेक्सट (एग्रीकल्चर नेक्स्ट) : कंपनी के सीईओ तरनजीत सिंह भामरा ने 2016 में किसानों और एग्रीकल्चर वैल्यू चेन से जुड़े सभी पक्षों को लाभ दिलाने के उद्देश्य से इस कंपनी की स्थापना की थी। कंपनी के इमेज प्रोसेसिंग सॉल्यूशन से खेत की तस्वीर की प्रोसेसिंग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिये की जाती है। इससे उपज की क्वालिटी का आकलन खेत में खड़ी फसल से ही किया जा सकता है। कंपनी अपने क्लाउड बेस्ड एप्लीकेशन के लिए कई तरह के टूल्स का इस्तेमाल करती है जिनसे उपज की क्वालिटी का तुरंत पता लगाया जा सकता है। स्वराज एवं महिंद्रा के बारे में : स्वराज ट्रैक्टर्स 20.7 बिलियन अमरीकी डॉलर वाले महिंद्रा ग्रुप का एक डिवीजन है और यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढऩे वाला टै्रक्टर ब्रांड है। 1974 में स्थापित, स्वराज ने स्थापना के बाद से 1.5 मिलियन से अधिक ट्रैक्टर बेचे हैं। भारत में अनाज के कटोरे के तौर पर मशहूर पंजाब में स्थित स्वराज एक ऐसा ब्रांड है जो किसानों द्वारा किसान के लिए बनाया जाता है, क्योंकि उसके कई कर्मचारी भी किसान हैं। वे रीयल वर्ल्ड परफोरमेंस लाते हैं और सुनिश्चित प्रदर्शन और स्थायी गुणवत्ता के साथ एक प्रामाणिक, शक्तिशाली उत्पाद बनाते हैं, जिसका एक ही उद्देश्य है- जिससे भारतीय किसान को आगे बढऩे के अवसर मिल सकें। भारत में ग्राहक संतुष्टि में लगातार शीर्ष कंपनियों में शामिल स्वराज ट्रैक्टर्स 15 एचपी से 65 एचपी की रेंज में ट्रैक्टर बनाती है और खेती के संपूर्ण समाधान भी प्रदान करती है। वहीं महिंद्रा गु्रप 20.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कंपनियों का फेडरेशन है जो लोगों को आवागमन के नए समाधान, ग्रामीण समृद्धि को बढ़ावा, शहरी जीवन के विस्तार, नए व्यवसायों का पोषण करने और समुदायों को बढ़ावा देने में सक्षम बनाता है। उत्पादों की संख्या के आधार पर यह दुनिया की सबसे बड़ी ट्रैक्टर कंपनी है। महिंद्रा, कृषि व्यवसाय, खाद, वाणिज्यिक वाहनों, परामर्श सेवाओं, ऊर्जा, औद्योगिक उपकरण, रसद, रियल एस्टेट, स्टील, एयरोस्पेस, डिफेंस और टू-व्हीलर में अपनी मजबूत उपस्थिति का भी आनंद उठाता है। भारत में मुख्यालय वाला महिंद्रा 100 देशों के 2,40,000 से अधिक लोगों को रोजगार देता है। कृषि, ट्रैक्टर एवं कृषि उपकरणों के क्षेत्र में नई तकनीक व सरकारी योजनाओं की नवीनतम जानकारी के लिए हमेशा बने रहिये ट्रैक्टर जंक्शन के साथ।

John Deere India Gets BS-V Certification for 3029 EWX Engine

John Deere India Gets BS-V Certification for 3029 EWX Engine

John Deere India gets BS-V certification for its 3029 EWX engine, after more than four years of imposition. John Deere India is the Pune based domestic branch of the world’s most popular producer of tractors and farm implements. In India, John Deere is the customer most likeable brand. John Deere makes trust by providing quality products at an affordable price. John Deere supply tractors, harvesters, tractor implements and construction equipment. John Deere provides hp ranging from 28-120 and more than 35 tractors in India. John Deere also supplies farm implements and road construction equipment which is quite popular among Indian customers. First time in India any brand gets BS-V certificate for its road construction equipment and at the end of the year domestically manufactured 3029 EWX engine releases in the market. John Deere always stands strong on the expectations of the customers. They produced according to their need and budget. They manufactured products which are affordable and easily fit in the budget of the customers. John Deere always maintains standard with every release of their product. They always come up with new technology and innovations for effective and efficient work. So this time John Deere engine 3029 EWX gets BS-V certification and this is the good sign for the company.

महिंद्रा एंड महिंद्रा मित्सूबिशी के साथ मिलकर लाएगी ट्रैक्टर्स की नई रेंज k2

महिंद्रा एंड महिंद्रा मित्सूबिशी के साथ मिलकर लाएगी ट्रैक्टर्स की नई रेंज k2

देश की अग्रणी ट्रैक्टर कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा अब जापान की कंपनी मित्सुबिशी के साथ मिलकर ट्रैक्टर्स की नई रेंज लाने जा रही है। इसके जरिए कंपनी घरेलू और वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगी। यह जानकारी महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर पवन गोयनका ने हाल ही में कंपनी के अर्निंग्स एंड कॉन्फ्रेंस कॉल में दी। k2 रेंज को घरेलू और वैश्विक दोनों बाजारों के लिए डिजाइन किया जाएगा गोयनका ने जानकारी देते हुए बताया कि अब हम एक नए प्रोग्राम पर कार्य कर रहे हैं जो कि ट्रैक्टर की नई रेंज K2 होगी। इसके तहत ट्रैक्टर के चार वैरियंट बनाए जाएंगे। इस पर सबसे पहले मित्सूबिशी एग्रीकल्चर मशीनरी के साथ मिलकर जापान में कार्य किया जाएगा। इस रेंज को घरेलू और वैश्विक दोनों बाजारों के लिए डिजाइन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि यह हमारे द्वारा अभी तक की सबसे महत्वाकांक्षी ट्रैक्टर डेवलेपमेंट से संबंधित कार्य योजना है। K2 रेंज के ट्रैक्टर्स 2021 के मध्य तक लांच किए जाने प्रस्तावित है। हालांकि सभी हॉर्सपावर की रेंज के ट्रैक्टर दो साल में लांच कर दिए जाएंगे। कंपनी ने संकेत दिया कि वह कृषि उत्पादकता बढ़ाने और कुशल श्रम की कमी के मुद्दों को सुलझाने के लिए बुद्धिमान ट्रैक्टरों पर भी काम कर रहा है। आपको बता दें कि लगभग पांच साल पहले महिंद्रा एंड महिंद्रा ने मित्सुबिशी एग्रीकल्चर मशीनरी के साथ एक समझौता किया और 33 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल की थी। यह भी पढ़ें : एस्कॉर्ट ने जनवरी माह में बेचे 6,063 ट्रैक्टर, बिक्री में 1.2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी महिंद्रा के नोवो, जीवो और युवा ट्रैक्टर प्लेटफार्म पर उपलब्ध है बेहतर तकनीक हालांकि महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी ने नोवो, जीवो और युवा ट्रैक्टर प्लेटफार्म के जरिए बेहतर तकनीक उपलब्ध करा रही है। गोयनका ने बताया कि हालांकि महिंद्रा और स्वराज ब्रांडों के तहत महिंद्रा की ग्रोथ लगातार बढ़ रही है। कंपनी ने अपनी तकनीकी बढ़त दिखाने के लिए नोवो, जीवो और युवा प्लेटफार्म के तहत नए फीचर्स के साथ प्रोडक्ट्स भी पेश किए हैं। यह भी पढ़ें : Tractor Sales January 2020; John Deere Tractor Recorded 46 Percent Growth चालू तिमाही में 5 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि गोयनका ने कहा कि ट्रैक्टर बाजार में चालू तिमाही में लगभग पांच प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि होगी। लेकिन उद्योग राजकोषीय घाटा लगभग सात प्रतिशत कम कर देगा। ट्रैक्टर उद्योग में अप्रैल-दिसंबर 2019 की अवधि के दौरान 5.66 लाख यूनिट्स की घरेलू बिक्री में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट रही थी। एक साल पहले की अवधि की तुलना में निर्यात में 17 प्रतिशत की गिरावट आई है और यह 59 हजार यूनिट है। उन्होंने कहा कि अगले वित्त वर्ष के विकास की भविष्यवाणी करना बहुत जल्दबाजी होगी। लेकिन पांच प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है। देश में रबी की फसल अच्छी रही है और जलाश्यों में जल का स्तर भी बढ़ा है। इस बार मानसून भी सामान्य से अच्छा रहने की उम्मीद है, जो ट्रैक्टर उद्योग के लिए अच्छा होगा। सबसे कम दाम में महिंद्रा ट्रैक्टर कृषि, ट्रैक्टर एवं कृषि उपकरणों के क्षेत्र में नई तकनीक व सरकारी योजनाओं की नवीनतम जानकारी के लिए हमेशा बने रहिये ट्रैक्टर जंक्शन के साथ।

Tractor Sales January 2020; John Deere Tractor Recorded 46 Percent Growth

Tractor Sales January 2020; John Deere Tractor Recorded 46 Percent Growth

Domestic tractor sales grew by 4.7% y-o-y in January 2020 on account of low base and better monsoon, although lower commercial activity kept it from growing further. One of the most important factor in this growth is South Indian market. Demands from South India market is getting strong from Dec’19. Domestic sales of Mahindra Tractor in January 2019 were recorded 20948 units and in January 2020 tractor sales were recorded 22329 units. This shows a clear 6.6% increase in the sales of Mahindra tractor. In FY’20 (Apr-Jan) due to weak demand from East & South India market, Mahindra tractor sales decreases 30% and 26% cumulatively . India’s no. 2 Tractor manufacturer TAFE is losing market share month on month. In January 2020 TAFE tractor sales 8184 units against 9046 units in January 2019. This shows TAFE sales dropped by 9.5%. In FY’20 (Apr-Jan) Tafe loses 1.27% in market share PAN India. Rajasthan which is strongest state of TAFE they lose 3.23% Market share and in Gujarat TAFE lose 3.39% MS to competition in FY’20 (Apr-Jan) . In Jan 2020 John Deere becomes no. 3 tractor manufactures in domestic sales. John Deere tractor sales 6926 tractors in January 2020 comparison to 4731 tractors in January 2019 recorded 46.4% growth. It is a very good sign for the company. John deere registered 73.8% growth in South India and 51.7% growth in West India. Escorts Tractor - In January 2019 domestic sales of Escorts tractor were 5762 units and in January 2020 domestic sales were recorded 5845 units. This clearly shows the growth of 1.4% in the sales of Escorts tractors. IN FY’20 (Apr-Jan) Escorts Tractor production decline 31% in 31-40 HP Segment which showing Escorts brand Powertrac is losing sales in this segment on other side Escorts registered 52.5% growth in Up to 30 HP segment. That indicates Escorts Farmtrac ATOM is now generating more demand. Sonalika Tractors January 2019 records 5800 units Sonalika tractor sales record on the other hand in January 2020 Sonalika tractor sales were recorded 5585 units. This shows a 3.7% decline in sales. In FY’20 (Apr-Jan) Sonalika Tractor sales declined 31% in East India and 14.3% in South India. New Holland tractor sales decline by 9.5% in January 2020 as compared to January 2019. 1726 units tractor sales recorded in January 2019 whereas 1557 units tractor sales recorded in January 2020. In FY 2020 (Apr-Jan) New Holland Tractor sales decline 43% in East India and 17% in South India. Kubota Tractors recorded 28% growth in January 2020. In January 2019 sales were 661 units and in January 2020 sales were 846 units. Captain Tractors recorded 144.6% growth in domestic sales of tractors. In January 2019 sales were 204 units and in January 2020 sales were 499 units. Force Motors recorded a growth of 6.6% tractor sales. Force Tractor sold 308 tractor in Jan’ 20 VST Shakti tractors In January 2020 VST Shakti tractor sales were declined by 3.9% in comparison to January 2019. ACE Tractors Sales decreased by 36.8% in January 2020 in comparison to January 2019. Preet tractor Sales decreased to 156 units as compared to505 units sold in January 2019. Indo Farm equipments in January 2020 6.6% sales increased as compared to January 2019.

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