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अनाज बैंक : महिलाओं की अनूठी पहल, यहां पैसे नहीं उधार मिलता है अनाज

अनाज बैंक : महिलाओं की अनूठी पहल, यहां पैसे नहीं उधार मिलता है अनाज

जानें, क्या है अनाज बैंक और किस तरह मिलती है इससे मदद

अनाज बैंक, जहां पैसे नहीं, उधार मिलता है अनाज। जी हां, आपने सही सुना है। उत्तरप्रदेश के शिवराजपुर (कानपुर) क्षेत्र के छब्बा निवादा गांव में महिलाओं के द्वारा एक अनाज बैंक का संचालित किया जा रहा है जहां समूह की महिलाएं जरूरत पडऩे पर अनाज उधार ले जाती है और नई फसल कटने पर उसे वापिस लौटा देती हैं। ब्याज के रूप में ये अनाज उधार लेने वाली महिला को कुछ अतिरिक्त अनाज और देना होता है। इस तरह यह अनाज बैंक संचालित किया जा रहा है जिससे कई महिलाओं को मदद मिल रही है।

 

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लॉकडाउन में बहुत काम आया अनाज बैंक

मीडिया में प्रकाशित खबर के हवाले से कोरोना महामारी (कोविड-19) के दौरान लगे लॉकडाउन में जहां लोग घर से बाहर निकल नहीं पा रहे थे। तब अनाज बैंक की ऐसे लोगों के बड़ा काम आया। यहां की महिलाओं ने घर में लगी चक्की में आटा पीसकर उन लोगों तक पहुंचाया जिन्हें खाने में मुश्किलें आ रही थीं। बता दें कि यहां लॉकडाउन में ही गेहूं की कटाई चल रही थी तब ही महिलाओं ने अपनी अनाज बैंकों में ज्यादा गेहूं भर लिया। इन महिलाओं ने मिलकर आटा, चावल, दाल और तेल सबकी किट बनाकर श्रमिक भारती संस्था को दिया। यहां से ये सामान उन लोगों को पहुंचाया गया जो जरुरतमंद थे। महिलाओं के मुताबिक हमारे इन अनाज बैंकों ने लॉकडाउन के दौरान शहरों से गांवों को लौटे लोगों की मदद की थी।

 

 

क्या है अनाज बैंक और इसका काम?

श्रमिक भारती संस्था की ओर से प्रोत्साहित ये अनाज बैंक महिलाओं का एक साझा प्रयास है, जिसमें महिलाएं अपने घरों से 2-3 किलो अनाज जुटाकर कुछ अंशदान करती हैं और अनाज का बड़ा हिस्सा उन्हें किसी संस्था से दान में मिल जाता है। शुरुआत संस्था के सहयोग से होती है पर महिलाओं की भागीदारी रहती है, बाद में महिलाएं इसे संचालित करती हैं। समूह की महिलाएं जरुरत पडऩे पर अनाज ले जाती हैं और फसल कटने पर ब्याज समेत वापस कर जाती है। इस अनाज को रखने के लिए बखारी (स्टोरेज टैंक) भी संस्था देती है। 

 

 

कब से हुई इन अनाज बैंकों की शुरुआत?

श्रमिक भारती एक गैर सरकारी संस्था हैं जो 1986 से ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के सशक्तिकरण, महिला स्वयं सहायता समूह, जैविक खेती को बढ़ावा और स्वच्छता पर काम कर रही है। कानपुर समेत यूपी के छह जिलों कानपुर देहात, भदोही, चंदौली, फतेहपुर और बाराबंकी में 223 अनाज बैंक संचालित हो रहे हैं। इन अनाज बैंकों की शुरुआत वर्ष 2016 में गेहूं से हुई थी। अभी महिलाएं इन अनाज बैंकों में चावल, दाल और तेल भी रख रही हैं। इस संस्था के अलावा भी देश के दूसरे कई गैर सरकारी संगठन भी अपने-अपने स्तर पर इस तरह की अनाज बैंकों का संचालन कर रहे हैं। 

 

अनाज बैंक से महिलाओं का आत्मसम्मान सुरक्षित

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में इसी संस्था से जुड़े जिला कोऑर्डिनेटर नरेंद्र त्रिपाठी ने मीडिया को बताया कि गांवों में एक तबका बेहद गरीब है, जो भूमिहीन अथवा बेहद कम जोत का मालिक है, इनके यहां आज भी जब राशन आता है तब चूल्हा चलता है। अनाज उधार लेने की परंपरा पहले भी रही है लेकिन अनाज उधार लेना सम्मान से जुड़ा मामला भी है, किसे अच्छा लगता है गेहूं-चावल उधार लेने जाए। अब अनाज बैंक बनने से क्या हुआ कि महिलाएं बिना किसी को बताए ले जाती हैं, उनका आत्मसम्मान सुरक्षित रहता है और दूसरा वो जो ब्याज में समूह को वापस करती हैं उसका लाभ भी उन्हें ही मिलता है। समूह में अगर कोई महिला एक क्विंटल अनाज ले जाती है तो चार से पांच महीने में जब फसल कटती है वो एक क्विंटल 25 किलो गेहूं वापस करती है। 

 

बैंक में कैसे इकट्ठा होता है इतना सारा अनाज?

इस समय गांव छब्बा निवादा में पांच स्वयं सहायता समूह चल रहे हैं और हर समूह के पास एक अनाज बैंक है। इन पांचों समूहों में से हर समूह की एक महिला अनाज बैंक का संचालन करती है। एक अनाज बैंक में एक बखारी (कंटेनर) और साढ़े तीन क्विंटल गेहूं एक समूह को परियोजना द्वारा दिया जाता है। फसल कटने पर एक क्विंटल गेहूं उस समूह की महिलाएं देती (अंशदान) हैं जिन्हें बखारी दी जाती है। उधार गेहूं देने पर हर साल ब्याज का जो गेहूं आता है वो इन बैंकों में बढ़ता जाता है।

 

आप भी खोल सकते हैं अनाज बैंक

इस कंपनी की सदस्य और अनाज बैंक की संचालिका गीता इन अनाज बैंक को खोलने का सबसे आसान तरीका बताती हैं। अनाज बैंक खोलने के लिए यह बिलकुल जरूरी नहीं कि कोई संस्था सहयोग करे तभी खोल सकते हैं। किसी भी गांव की 10-15 महिलाएं मिलकर जब गेहूं या धान की फसल कटाई के समय अपने-अपने घरों से थोड़ा-थोड़ा अनाज इकट्ठा कर अनाज बैंक की शुरुआत कर सकती हैं।  

 

 

 

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