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पराली जलाने की समस्या से निबटने के लिए सरकार करेगी किसानों की मदद

पराली जलाने की समस्या से निबटने के लिए सरकार करेगी किसानों की मदद

क्या है पराली और इसका कैसे हो सकता है उपयोग

हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने की समस्या काफी पुरानी है। यहां के किसानों द्वारा पराली जलाने के बाद उठे धुंए से दिल्ली में भी पर्यावरण को नुकसान होने का अंदेशा जताया गया था। इस पर जमकर सियासत भी हुई थी। जिस पर यहां के किसानों ने अपनी मजबूरी भी बयां की। वहीं सरकार ने पराली जलाने वाले किसानों पर के प्रति कड़ा रूख भी अपनाया और कृषि विभाग की ओर से किसानों को नोटिस जारी कर जुर्माना लगाया गया और जुर्माना नहीं भरने वाले किसानों पर एफआईआर दर्ज कराई गई।

 

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इसके बाद पराली जलाने का सिलसिला कम जरूर हुआ पर बिलकुल खत्म नहीं। आखिरकार सरकार ने इस समस्या का हल किसानों से मिलकर निकालने की पहल की। इसी क्रम में हरियाणा सरकार द्वारा पराली जलाने की समस्या से निबटने के लिए किसानों की मदद करने का निश्चय किया है और इसके लिए फसल अवशेष प्रबंधन योजना की शुरुआत की गई। इस योजना के तहत किसानों की मदद के लिए हरियाणा राज्य सरकार ने 1,304.95 करोड़ रुपए जारी किए हैं।  

 

 

क्या है पराली

पराली धान की फसल के कटने बाद बचा बाकी हिस्सा होता है जिसकी जड़ें धरती में होती हैं। किसान पकने के बाद फसल का ऊपरी हिस्सा काट लेते हैं क्योंकि वही काम का होता है बाकी अवशेष होते हैं जो किसान के लिए बेकार होते हैं, उन्हें अगली फसल बोने के लिए खेत खाली करने होते हैं तो सूखी पराली को आग लगा दी जाती है। पराली ज्यादा होने की वजह यह भी है कि किसान अपना समय बचाने के लिए आजकल मशीनों से धान की कटाई करवाते है। मशीनें धान का सिर्फ उपरी हिस्सा काटती हैं और और नीचे का हिस्सा भी पहले से ज्यादा बचता है। इसी बचे  हुए हिस्से के अवशेष को हरियाणा व पंजाब में पराली कहा जाता है।

 

पराली जलाने पर क्या है जुर्माने का प्रावधान

एनजीटी के आदेशानुसार दो एकड़ में फसलों के अवशेष जलाने पर 2500 हजार रुपए, दो से पांच एकड़ भूमि तक 5 हजार रुपए, 5 एकड़ से अधिक जमीन पर धान के अवशेष जलाने पर 15 हजार रुपये जुर्माना किए जाने का प्रावधान है। इसके लिए जिम्मेदारी सरकार ने जिला राजस्व अधिकारी की तय की गई है। 

 

अवशेष प्रबंधन हेतु सरकारी की योजनाओं के लिए दिया गया बजट

हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल ने राज्य में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए 1,304.95 करोड़ रुपए की एक व्यापक योजना स्वीकृति प्रदान की है। इस योजना का उद्देश्य राज्य में फसल अवशेषों को जलाने से रोकना है। केंद्र सरकार द्वारा इस वर्ष इस योजना के तहत राज्य को 170 करोड़  रुपए मुहैया करवाए गए हैं। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्री संजीव कौशल ने बताया कि राज्य सरकार ने फसल अवशेष के इन-सीटू प्रबंधन के लिए कृषि यंत्रीकरण को प्रोत्साहन योजना के तहत केंद्र सरकार को 639.10 करोड़ रुपए की वार्षिक योजना प्रस्तुत की है।

 

पराली प्रबंधन के लिए सरकार किसानों को देगी 1,000 रुपए प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि

पराली जलाने की समस्या से निबटने के लिए हरियाणा राज्य सरकार राज्य के किसानों को प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि दे रही है जिसे इस वर्ष भी जारी रखा गया है। इस योजना को और भी व्यापक रूप से बढ़ाया जा रहा है। इसके लिए केंद्र सरकार के तरफ से हरियाणा राज्य सरकार को वित्तीय मदद भी दी गई है। साथ ही फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए इन-सीटू योजना के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के कृषि यंत्र सब्सिडी पर दिए जा रहे हैं जिसे किसान आसानी से ऑनलाइन आवेदन कर के प्राप्त कर सकते हैं।

इसके अलावा सर्वोच न्यायालय के निर्देशों के तहत गैर-बासमती उत्पादों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सात दिनों के भीतर 1000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है। राज्य सरकार ने पर्याप्त मशीनों और परिचालन लागत के रूप में 1,000 रुपए प्रति एकड़ प्रदान करके, गैर-बासमती तथा बासमती की मुच्छल किस्म उगने वाले छोटे और सीमांत किसानों की मदद की है। इन दोनों उद्देश्यों के लिए राज्य सरकार द्वारा राज्य बजट में पहले ही 453 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।

 

कस्टम हायरिंग सेंटर की स्थापना सहित सरकार द्वारा किए गए अन्य उपाय

योजना के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए श्री कौशल ने बताया कि राज्य सरकार फसल अवशेष प्रबंधन के लिए उपकरण वितरित करने, कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित करने और कृषि एवं किसान कल्याण निदेशालय में राज्य मुख्यालय पर समर्पित नियंत्रण स्थापित करने सहित धान की पुआल के प्रबंधन के लिए हर संभव उपाय कर रही है। हरियाणा सरकार द्वारा इन-सीटू प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए स्ट्रा बेलर इकाइयों की स्थापना को भी प्रोत्साहित किया गया है। इस पहल के तहत, 5 नवंबर 2019 तक 64 ऐसी इकाइयां जबकि 6 नंबर से 11 दिसंबर के बीच 131 इकाइयां स्थापित की गई। राज्य सरकार ने इन इकाइयों की खरीद के लिए किसानों को 155 परमिट भी जारी किए हैं।

 

 

क्या और कैसे हो सकता हैं पराली का उपयोग

पर्यावरणविदों के अनुसार पराली को ट्रैक्टर में छोटी मशीन (रपट) द्वारा काटकर खेत में उसी रपट द्वारा बिखेरा जा सकता है। इससे आगामी फसल को प्राकृतिक खाद मिल जाएगी और प्राकृतिक जीवाणु व लाभकारी कीट जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए पराली के अवशेषों में ही पल जाएंगे। पराली को मशीनों से उखाडक़र एक जगह 2-3 फ़ीट का खड्डा खोदकर उसमें जमा कर सकते हैं।

उसकी एक फुट की तह बनाकर उस पर पानी में घुले हुए गुड़, चीनी, यूरिया,गाय-भैंस का गोबर इत्यादि का घोल छिडक़ दें और थोड़ी मिट्टी डालकर हर 1-2 फुट पर इसे दोहरा दें तो एनारोबिक बैक्टीरिया पराली को गलाने में सहायक हो जाएं, अगर केंचुए भी खड्ड में छोड़ सकें तो और भी अच्छा है। आखिरी तह को मिट्टी के घोल में तर पॉलिथीन से ढक देना चाहिए। इतना ही नहीं पराली का प्रयोग चारा और गत्ता बनाने के अलावा बिजली बनाने के लिए भी हो सकता है। गैसीफायर द्वारा गैस बनाकर ईंधन के रूप में मिथेन गैस मिल सकती है।

 

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कम लागत में शुरू करें कुल्हड़ व्यवसाय, होगी अच्छी कमाई

कम लागत में शुरू करें कुल्हड़ व्यवसाय, होगी अच्छी कमाई

जानें, कैसे शुरू करें कुल्हड़ व्यवसाय और कहां से मिलेगी मदद सरकार अब देश में घरेलू उद्योग को बढ़ावा दे रही है। ऐसे व्यवसाय को शुरू करने के लिए सरकार मदद भी करती है। इन छोटे व्यवसाय की खास बात ये हैं कि ये कम पूंजी में शुरू किए जा सकते हैं और इनसे काफी अच्छी कमाई की जा सकती है। इन्हीं में एक कुल्लड़ व्यवसाय भी है जिसकी बाजार में काफी मांग है। हम जानते हैं कि सरकार खुद चाहती है कि लोग प्लास्टिक से बने गिलास, कप, प्लेट आदि सामान का इस्तेमाल करना बंद कर दे और उसके स्थान पर मिट्टी के बने सामानों का उपयोग करें। इससे दो लाभ हैं, एक तो प्लास्टिक कचरे से मुक्ति मिलेगी जो पर्यावरण के लिए खतरा बना है। वहीं लाखों लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेेगा। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 रेलवे स्टेशन पर कुल्हड़ में चाय मिलेगी हाल ही में राजस्थान के अलवर में ढिगावड़ा रेलवे स्टेशन पर ढिगावड़ा - बांदीकुई रेलखंड पर विद्युतीकृत रेलमार्ग के लोकार्पण समारोह के अवसर पर रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि आने वाले समय में देश के हर रेलवे स्टेशन पर प्लास्टिक मुक्त कुल्हड़ में ही चाय मिलेगी। गोयल ने कहा कि आज देश में लगभग 400 रेलवे स्टेशनों पर कुल्हड़ में ही चाय मिलती है। आगे चलकर हमारी योजना है कि देश के हर रेलवे स्टेशन पर सिर्फ कुल्हड़ में चाय बिकेगी। भारतीय रेलवे प्लास्टिक से मुक्ति के लिए यात्रियों को कुल्हड़ में चाय उपलब्ध कराएंगी। इससे प्लास्टिक कचरे में मुक्ति मिलेगी, वहीं कुल्हड की मांग बढऩे से लोगों को रोजगार मिलेगा। भविष्य में कुल्लड़ व्यवसाय की संभावनाओं को देखते हुए हम आज आपको इस व्यवसाय को शुरू करने के बारे में बताएंगे कि आप किस तरह कम पूंजी लगाकर इस व्यवसाय को शुरू कर काफी अच्छी कमाई कर सकते हैं। कुल्हड़ व्यवसाय शुरू करने से यह जानना है जरूरी मिट्टी के कुल्हड़ बनाने के लिए आपको सबसे पहले एक अच्छी क्वालिटी की मिट्टी चाहिए होती है। जिसका प्रयोग आप कुल्हड़ बनाने में करते हैं। आप अच्छी क्वालिटी की मिट्टी को अपने नजदीकी नदी या फिर तलाब जैसे क्षेत्रों से प्राप्त कर सकते हैं। आपको कुछ कुल्हड़ बनाने के लिए साचें की भी जरूरत पड़ेगी। आप इसको मार्केट से आसानी से प्राप्त कर सकते हैं और यह ज्यादा महंगा भी नहीं मिलता है। आप अपने कुल्हड़ बनाने की क्वलिटी के हिसाब से इसे मार्केट से खरीद सकते हैं। इसके अतिरिक्त आपको कुल्हड़ को पकाने के लिए और फाइनल रूप देने के लिए एक बड़े आकार की भट्टी का भी निर्माण करना पड़ेगा। कुल्हड़ बनाने के व्यवसाय में कितनी लगती है लागत कुल्हड़ का व्यवसाय शुरू करने के लिए आपको कम से कम 15 से लेकर 20 रुपए लगाने पड़ेंगे। इससे आप मशीनरी के अलावा कुछ रॉ मैटेरियल इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए खरीदेंगे जो बहुत कम कीमत पर आपको मिल जाएंगे। व्यवसाय शुरू होने के बाद आपको इसको संचालित करने के लिए बहुत ही कम निवेश करना होगा। कुल्हड़ बनाने की मशीन की क्या है कीमत आप कुल्हड़ व्यवसाय एक अच्छे स्तर पर करना चाहते हैं, तो आपको आपके नजदीकी मार्केट में अनेक प्रकार की कुल्लड़ बनाने की मशीन भी बड़ी ही आसानी से और कम दामों पर मिल जाएगी। यदि आप मशीन खरीदते हैं, तो करीब आपको 5000 से लेकर 8000 रुपए के बीच में ये मशीन आसानी से बाजार में मिल जाएगी। कुल्हड़ बनाने के व्यवसाय के लिए सरकारी योजना का लाभ केंद्र सरकार ने सभी कुम्हारों के लिए कुंभार सशक्तिकरण योजना की शुरुआत की है। इस योजना के अंतर्गत सभी कुम्हार का काम करने वाले व्यक्तियों को इलेक्ट्रॉनिक चाक का वितरण किया जाता है। इसके अतिरिक्त भारत सरकार का दावा है, कि अनेकों प्रकार के मिट्टी के बने बर्तनों को अच्छे दाम पर कुम्हार से लोग खरीदेंगे। कुल्हड़ बनाने के लिए लेना होगा लाइसेंस जिस प्रकार से हमें किसी अन्य प्रकार के व्यवसाय को शुरू करने के लिए उससे संबंधित सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक होता है, उसी प्रकार हमें इस व्यवसाय के अंदर एक ट्रेड लाइसेंस प्राप्त करना जरूरी है। इसके अलावा आपको अपने व्यवसाय को एमएसएमई के तहत भी रजिस्टर कर लेना चाहिए, इससे आपको व्यवसाय शुरू करने में फायदा मिल सकता है। कैसे बनाए जाते हैं कुल्लड़/कुल्लड़ बनाने का क्या है तरीका सबसे पहले अच्छी किस्म की मिट्टी को बारीक गेहूं के आटे के समान किसी मशीनी यंत्र की सहायता से उसे पीस लेना है। वे पूरी तरह से जब आपको आटे के समान लगने लगे तब आपको उसे छोड़ देना है। अब आपको कुल्लड़ बनाने के लिए एक मशीन और कुछ सांचे की आवश्यकता पड़ेगी। पानी और मिट्टी को एक साथ गूंथने के बाद में गूंथी हुई मिट्टी को सांचे में डालना है और फिर मशीन की सहायता से इसे एक अच्छा सा आकार दे देना है। आपके सांचे में से आसानी से कुल्लड़ बाहर निकल जाए इसके लिए आपको इसके अंदर तेल या फिर पाउडर का इस्तेमाल करना है, जिससे आपका कुल्लड़ सुरक्षित रूप से सांचे से बाहर आ जाएगा। कुल्हड़ का साइज आप अपनी कुल्हड़ का साइज अपने सांचे के अनुसार ही रख सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि आप का सांचा 200 मिलीलीटर का है, तो आपका कुल्लड़ भी 200 मिलीलीटर का ही बनेगा। मार्केट में आपको अलग-अलग साइज के सांचे मिल जाएंगे। मिट्टी को कुल्लड़ का आकार देने के बाद इसे धूप में कम से कम जब तक यह सुख नहीं जाता है, तब तक इसे वैसे ही छोड़ देना है। कुल्हड़ को अंतिम रूप देने के लिए आपको एक भट्टी की आवश्यकता पड़ेगी। आप अपनी सुविधा के अनुसार भट्टी का निर्माण स्वयं ही कर सकते हैं। जब आपको लगने लगे, कि आपका कुल्लड़ धूप में पूरी तरह सूख कर तैयार हो चुका है, तब आपको इस भट्टी में अपने कुल्लड़ को डालकर पकाना होगा। भट्टी में कुल्लड़ को पकाने के लिए आपको भट्टी को जलाने के लिए कुछ बुरादा भी चाहिए होगा, आप आग जलाने के लिए किसी भी बुरादे का इस्तेमाल कर सकते हैं, और आपको यह सस्ते दामों पर लडक़ी के टाल या फर्नीचर का काम करने वाली दुकानों में उपलब्ध हो जाएगा। जब आपको लगने लगे, कि आपके कुल्हड़ का रंग धीरे-धीरे पूरी तरह से बदल गया है, तब आपको अपने कुल्लड़ को भट्टी के अंदर से निकाल लें। इसके बाद आपका कुल्लड़ बाजार में बिकने के लिए पूरी तरह से तैयार है। कैसे करें कुल्हड़ की पैकेजिंग यदि आप कुल्लड़ को दूर-दूर तक बेचने के लिए सप्लाई करते हैं, तो आपको इसकी सुरक्षा के लिए अच्छी पैकेजिंग भी करनी आवश्यक है, जिससे आपका कुल्लड़ सही स्थान पर सुरक्षित रूप में पहुंच जाए। पैकेजिंग करके आप अपने कुल्लड़ को सुरक्षित रख सकते हैं और इसे एक अलग ब्रांडिंग की तरह बाजार में बेच सकते हैं। यदि आप अपने कुल्हड़ को दूर-दूर तक नहीं सप्लाई करते हैं और अपने नजदीक के ही मार्केट में इसे बेचते हैं. तो आपको किसी विशेष प्रकार के पैकेजिंग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. आपका कुल्हड़ यदि अच्छा होगा, तो बिना पैकेजिंग के भी अच्छे दामों में बिक जाएगा। कहां- कहां बेच सकते हैं कुल्हड़ आप अपने द्वारा बनाए हुए कुल्लड़ को नजदीकी रेस्टोरेंट, होटल या फिर चाय-कॉफी की दुकानों पर बेच सकते हैं। इसके अलावा शादी, पार्टी सहित मंदिरों में होने वाले आयोजनों के लिए भी आर्डर ले सकते हैं। कितना होता है मुनाफा बात करें इस कुल्लड़ व्यवसाय से मुनाफे की तो एक अनुमान के मुताबिक चाय के कुल्लड़ सैकड़ों के हिसाब से 50 रुपए में बिकते हैं, और लस्सी के कुल्लड़ लगभग 100 रुपए सैकड़ा बिकते हैं और इसके अलावा दूध के कुल्हड़ करीब 150 रुपए सैकड़ा बिकते हैं। प्याली की बात करें तो यह 100 रुपए सैकड़ा बिक जाती है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

किसान आंदोलन : नए कृषि कानूनों को लेकर मचा बवाल, पीछे हटने को तैयार नहीं सरकार

किसान आंदोलन : नए कृषि कानूनों को लेकर मचा बवाल, पीछे हटने को तैयार नहीं सरकार

जानें, क्या है ऐसा इन नए तीन कृषि कानूनों में जिसे लेकर हो रहा विरोध? और अब क्या होगा आगे? नए कृषि कानूनों को लेकर देश में बवाल मचा हुआ है। एक ओर किसानों की सरकार से नाराजगी बरकरार है जिसे लेकर देश भर में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। दूसरी ओर केंद्र सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं है। वे हर तरीके से किसानों को समझाने का प्रयास कर रही है लेकिन किसान बात मानने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि दोनों के बीच नए कानूनों को लेकर मतभेद की स्थिति पैदा हो गई है। परिणामस्वरूप किसान सडक़ों पर उतर आए है और पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी में किसान आंदोलनरत हैं। किसान आंदोलन से जहां भारतीय रेल सेवा प्रभावित हो रही हैं वहीं मंडियों में सब्जियां नहीं पहुंचने से इसनके दाम बढ़ बढ़ गए हैं। किसान आंदोलन को देखते हुए कई जगह पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई हैं। सोनीपत, बहादुरगढ़, मथुरा और गाजियाबाद से दिल्ली को जोडऩे वाले पांचों एंट्री प्वाइंट्स पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किसान आंदोलन अपडेट किसान आंदोलन के दौरान किसानों के आंदोलन में शामिल लुधियाना समराला के खटरा भगवानपुरा गांव के रहने वाले किसान गज्जर सिंह की बहादुरगढ़ बाईपास पर न्यू बस स्टैंड के पास रविवार देर रात दिल का दौरा पडऩे से मौत हो गई। बता दें कि साल 2020 के मानसून सत्र में केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पास कराए गए तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने मोर्चा खोल दिया है। किसानों द्वारा कई इलाकों में पुलिस की ओर से उन्हें रोकने के लिए लगाए बैरिकेड को उखाड़ कर फेंक दिए गए हैं। वहीं कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर पथराव की खबर भी है। पुलिस प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए वॉटर कैनन का इस्तेमाल कर रही है। इन नए कानूनों का इतना जबरदस्त विरोध आखिर क्यूं किया जा रहा है? आज हम इसी विषय पर चर्चा कर इसके पीछे की वजह जानने का प्रसाय करेंगे और इसी के साथ कानूनों को लेकर किसानों का डर और आंदोलन को लेकर सरकार की पीड़ा जानेंगे। कौनसे हैं वे नए तीन कानून हैं जिनका किसान कर रहे हैं विरोध कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है। किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे। निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे। लेकिन, सरकार ने इस कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है। इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है। बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं। कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020 इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है। इसे सामान्य भाषा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहते है। आप की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा। किसान इस कानून का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020 यह न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि आम जन के लिए भी खतरनाक है। अब कृषि उपज जुटाने की कोई सीमा नहीं होगी। उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी। सरकार को पता नहीं चलेगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहां है? खुली छूट। यह तो जमाखोरी और कालाबाजारी को कानूनी मान्यता देने जैसा है। सरकार कानून में साफ लिखती है कि वह सिर्फ युद्ध या भुखमरी या किसी बहुत विषम परिस्थिति में रेगुलेट करेगी। सिर्फ दो कैटेगोरी में 50 प्रतिश (होर्टिकल्चर) और 100 प्रतिशत (नॉन-पेरिशबल) के दाम बढऩे पर रेगुलेट करेगी नहीं, बल्कि कर सकती है कि बात कही गई है। क्या है कृषि कानूनों को लेकर किसानों को डर? नए कृषि कानूनों में सरकार ने किसानों को उपज मंडी के बाहर अपने अनाज बेचने की छूट दी है। नए कानूनों के अनुसार किसानों के लिए मंडी के बाहर कारोबार का रास्ता खुल गया है, लेकिन इस बीच किसानों को डर है कि सरकार धीरे-धीरे न्यूनतम समर्थन मूल्य को खत्म कर सकती है। जबकि केंद्र सरकार साफ कर चुकी है कि एमएसपी खत्म नहीं किया जाएगा, लेकिन किसानों की मांग है कि सरकार कानून में इसे शामिल करे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म नहीं होगा। नए कानूनों में सरकार ने मंडियों को खत्म करने की बात नहीं की है, लेकिन किसानों को डर है कि कानूनों से मंडियां खत्म हो सकती हैं। इसमें मंडियों के आढ़ाती भी किसानों का साथ दे रहे हैं और उनका कहना है कि मंडियां बचेंगी तभी तो किसान अपनी फसल बेच पाएगा। किसानों का कहना है कि मंडी के अंदर औसतन 6-7 फीसदी तक का मंडी टैक्स लगता है, जबकि बाहर कोई टैक्स नहीं लगता है। ऐसे में आढ़ाती टैक्स बचाने के लिए मंडी के बाहर खरीद कर सकते हैं। किसानों की मांग है कि टैक्स व्यवस्था को ठीक किया जाए। किसान संगठनों को डर है कि मंडी व्यवस्था कमजोर होने के बाद कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और किसानों को नुकसान होगा। किसानों को डर है कि कॉरपोरेट्स फायदा कमाने के लिए न्यूनतम समर्थन (एमएसपी) कीमतों से कम पर खरीदारी करेंगे। किसानों की मांग है कि सरकार सुनिश्चित करे कि फसल एमएसपी से कम में ना बिके। किसानों को डर है कि कृषि क्षेत्र में पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के आने से जमाखोरी बढ़ेगी और इससे छोटे किसानों को नुकसान होगा। इसलिए किसानों की मांग है कि सरकार जमाखोरी रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। एक कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर भी है, इसमें किसानों के अदालत जाने का हक छीन लिया गया है। कानून के अनुसार किसानों और कंपनियों के बीच विवाद होने पर एसडीएम फैसला करेगा। इसके बाद भी विवाद नहीं सुलझने की स्थिति में किसानों को डीएम के यहां अपील करनी होगी, वह कोर्ट नहीं जा सकते हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें डीएम और एसडीएम पर विश्वास नहीं है। उनकी मांग है कि विवाद होने पर उन्हें कोर्ट जाने की छूट दी जाए। क्या हैं किसानों की मांग केंद्र सरकार संसद के पिछले सत्र में खेती से जुड़े तीन कानून लेकर आई थी। ये तीन कानून हैं- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन-कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। ये तीनों कानून संसद के दोनों सदनों से पारित हो भी चुके हैं और कानून बन चुके हैं। किसानों की मांग है कि इन तीनों का कानूनों को सरकार वापस ले। और इसी को वापस लेने की मांग को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं। सरकार का दावा, नए कानून किसानों के हित में केंद्र के नए कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसान आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मासिक मन की बात कार्यक्रम में कहा कि किसानों को नए अधिकार और नए अवसर मिले हैं। पीएम ने कहा कि संसद ने कृषि सुधारों को काफी विचार-विमर्श के बाद कानूनी स्वरूप दिया है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत में खेती और उससे जुड़ी चीजों के साथ नए आयाम जुड़ रहे हैं। बीते दिनों हुए कृषि सुधारों ने किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। किसानों की वर्षों से कुछ मांगें थीं और उन्हें पूरा करने के लिए हर राजनीतिक दल ने कभी न कभी वादा किया था, लेकिन वे कभी पूरी नहीं हुईं। प्रधानमंत्री ने कहा, संसद ने काफी विचार-विमर्श के बाद कृषि सुधारों को कानूनी स्वरूप दिया। इन सुधारों से न सिर्फ किसानों के अनेक बंधन समाप्त हुए हैं, बल्कि उन्हें नए अधिकार और अवसर भी मिले हैं। संसद द्वारा मानसून सत्र में पारित तीन कृषि विधेयकों को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी के बाद कानूनों के रूप में लागू किया जा चुका है जिनका कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं और अनेक किसान सडक़ों पर उतर आए हैं। अब आगे क्या? केंद्र की भाजपा सरकार किसानों को नए कानून को लेकर बार-बार सफाई दे रही है कि ये कानून हर तरीके से किसानों के हित में हैं, पर किसान इस बात को मानने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि एक ओर किसान इन नए कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं? अब आगे क्या होगा? इस बात को लेकर सरकार में विचार-विर्मश चल रहा है। वहीं किसान, आंदोलन को ओर तेज करने की रणनीति बना रहे हैं। इस बीच कई विपक्षी दल किसानों का सहयोग कर रहे हैं जो केंद्र की भाजपा सरकार की चिंता को बढ़ा रहा है। आगे क्या होगा सरकार का रूख? क्या बेक फुट आएगी सरकार या फिर किसान ही समझ जाएंगे सरकार की बात? इस बारे में अभी कुछ भी तय कर पाना मुश्किल है। फिलहाल किसानों की ओर से आंदोलन को ओर तेज करने की बात कही जा रही है जिसको लेकर केंद्र सरकार चिंतित है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

गेहूं की खेती : किसानों की रूचि बढ़ी, बंपर उत्पादन का अनुमान

गेहूं की खेती : किसानों की रूचि बढ़ी, बंपर उत्पादन का अनुमान

गेहूं का उत्पादन : जानें, क्या है गेहूं की बुवाई दुगुनी होने का कारण, इससे किसानों को लाभ इस समय देश के अधिकांश राज्यों में गेहूं की बुवाई का काम चल रहा है। इस बार किसान अन्य फसलों की अपेक्षा गेहूं उत्पादन में रूचि दिखा रहे हैं। किसानों का उत्साह देखते ही बनता है। मध्यप्रदेश में इस बार किसानों ने गेहूं की दुगुनी बुवाई की है और अभी बुवाई का काम जारी है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 गेहूं की बुवाई में ज्यादा रुचि, चना का रकबा कम हुआ कृषि मंत्रालय के पिछले सप्ताह प्राप्त आंकड़ों के अनुसार चना के रकबे में कमी आई है। जबकि इस बार किसानों ने चने के बदले गेहूं की बुवाई में ज्यादा रुचि दिखाई है। आंकड़ों के अनुसार चना का रकबा 22 फीसदी तक कम हुआ है। पिछले इस समय तक जहां देश में 61.91 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस साल केवल 48.35 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो पाई है। इसका कारण इस साल अनियमित मौसम बताया जा रहा है। तो वहीं कारोबारियों की माने तो इस साल चने का भाव अच्छा नहीं मिलने के कारण किसानों ने गेहूं की तरफ रुख किया है। हालांकि गेहूं की बुवाई भी पिछले साल के मुकाबले पीछे चल रही है। लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि गेहूं की बुवाई में किसान तेजी दिखा सकते हैं। क्योंकि इस साल मानसून बारिश अच्छी हुई है। जिससे गेहूं की फसल को लाभ मिल सकता है। फिलहाल इस साल अभी तक गेहूं का रकबा 96.77 लाख हैक्टेयर ही पहुंचा है। जो कि पिछले सत्र इस समय के मुकाबले लगभग तीन लाख हैक्टेयर कम है। इसके अलावा ऐसा माना जा रहा है कि गेहूं की सरकारी खरीद के कारण किसानों को ठीक दाम मिलने की उम्मीद रहती है जिसके फलस्वरूप वह बुवाई में उत्साह दिखा रहे हैं। इस बार मध्यप्रदेश में गेहूं-चने की बुवाई दुगुनी मध्यप्रदेश में गत वर्ष की तुलना में गेहूं-चने की बुवाई दोगुनी रफ्तार से की जा रही है। अब तक गेहूं की बोनी 33.27 लाख हेक्टेयर में हो गई हैं जबकि गत वर्ष इस अवधि में मात्र 14.99 लाख हेक्टेयर में बोनी हो पाई थी। वहीं चने की बोनी 16.70 लाख हेक्टेयर में हो गई है। जो गत वर्ष अब तक 10.96 लाख हेक्टेयर में हुई थी। राज्य में अब तक रबी फसलों की कुल बोनी 62.77 लाख हेक्टेयर में हो गई है जो लक्ष्य के विरूद्ध 45 फीसदी है। जबकि गत वर्ष इस अवधि में 34.46 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी। कृषि विभाग के मुताबिक प्रदेश में रबी फसलों का सामान्य क्षेत्र 107.33 लाख हेक्टेयर है। इस वर्ष 136.97 लाख हेक्टेयर में रबी फसलें लेने का लक्ष्य रखा गया है। इसके विरूद्ध 18 नवम्बर तक 68.77 लाख हेक्टेयर में बोनी कर ली गई है। प्रदेश की प्रमुख रबी फसल गेहूं की बुवाई ने रफ्तार पकड़ ली है। 102.27 लाख हेक्टेयर लक्ष्य के विरूद्ध 33.27 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बोनी हे. गई है। वही चने की बोनी 19.27 लाख हेक्टेयर लक्ष्य के विरूद्ध अब तक 16.70 लाख हे. में कर ली गई है। इसी प्रकार मटर 1.67 लाख हे. में, मसूर 3.95, सरसों 5.82 लाख हे. में बोई गई है। वहीं अलसी की बोनी 64 हजार एवं गन्ना 28 हजार हे. में बोया गया है। अब तक राज्य में जौ, मटर एवं अलसी लक्ष्य से अधिक क्षेत्र में बोई जा चुकी है। प्रदेश में अब तक कुल अनाज फसलें 33.71 लाख हे. में, दलहनी फसलें 22.32 लाख हेक्टेयर में एवं तिलहनी फसलें 6.46 लाख हेक्टेसी में बोई गई है। गेहूं से बनी पहचान, देश के कई शहरों में है एमपी के गेहूं की मांग अभी तक सोयाबीन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा मध्यप्रदेश सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। मध्यप्रदेश अब उच्च कोटि के गेहूं के अधिकतम उत्पादन के लिए भी जाना जाने लगा है। मध्यप्रदेश के किसान अब वैज्ञानिक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसमें कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) किसानों की पूरी मदद भी कर रहा है। यहां के किसानों ने देश में सबसे उच्च कोटि के गेहूं का उत्पादन किया है। राज्य के सैकड़ों किसानों के बीच मालवा क्षेत्र के उज्जैन जिले का एक किसान तो गेहूं उत्पादन के मामले में मिसाल बन गया। स्वाद और गुणवत्ता के कारण मध्यप्रदेश के शर्बती गेहूं की महानगरों में सबसे ज्यादा मांग है। इस किस्म के गेहूं की कीमत भी सबसे ज्यादा है। इसे मुम्बई, पुणे, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे महानगरों की थोक और खुदरा बाजारों में गोल्डेन या प्रीमियम गेहूं के नाम से जाना जाता है। वहीं, उत्तर भारत के शहरों और दिल्ली की बाजार में इसे एमपी का गेहूं नाम से भी जाना जाता है। भारत में सर्वाधिक गेहूं उत्पादक राज्य है उत्तरप्रदेश उत्तर प्रदेश भारत में सबसे ज्यादा गेहूं उगाने वाला राज्य है। और देश के कुल गेहूं उत्पादन का 34 प्रतिशत गेहूं यहां पैदा होता है। यह फसल उत्तर प्रदेश के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी भाग में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के 96 लाख हेक्टेयर भूमि में इसकी पैदावार होती है। राज्य में गेहूं का कुल उत्पादन 300.010 लाख मीट्रिक टन है। पिछले पांच सालों में देश में गेहूं उत्पादन की क्या है स्थिति भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार देश में वर्ष 2015-16 में 92287.53 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ। 2016-17 में 98518.22 मिलियन टन, 2017-18 में 99870 मिलियन टन, 2018-19 में 103596.2 मिलियन टन, 2019-20 में 107179.3 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया गया है। आंकड़ों को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि देश में गेहूं का उत्पादन साल दर साल बढ़ता जा रहा है। 2019-20 में देश के किस राज्य में हुआ कितना उत्पादन उत्तर प्रदेश में 32089.2, मध्य प्रदेश में 18583.1, पंजाब में 18206.5, हरियाणा में 12072, राजस्थान में 10573, बिहार में 6545, गुजरात 3261, महाराष्ट्र में 2076.1, उत्तराखंड में 1002.4, पश्चिम बंगाल में 582.8, हिमाचल प्रदेश में 564.6, झारखंड में 430.6, कर्नाटक में 207.9, छत्तीसगढ़ में 143.7, असम में 23.4, उड़ीसा में 0.2 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। हरियाणा चौथे नंबर पर, सबसे कम गेहूं उत्पादन असम व उड़ीसा में देश में कुल 16 राज्यों में गेहूं उत्पादन होता है। कुल उत्पादन की बात की जाए तो हरियाणा चौथे नंबर पर आता है। जबकि प्रति हेक्टेयर गेहूं उत्पादन में पंजाब के बाद दूसरा स्थान है। वहीं सबसे कम गेहूं उत्पादन वाले राज्यों में असम व उड़ीसा शामिल है। यहां आंशिक ही गेहूं होता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकारों की किसानों को खुश करने के प्रयास

किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकारों की किसानों को खुश करने के प्रयास

मध्यप्रदेश में मंडी शुल्क में भारी कटौती, अब 1.50 रुपए की जगह 50 पैसा लगेगा मंडी शुल्क किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकारों की ओर से किसानों को खुश करने के प्रयास जारी हैं। हाल ही में यूपी के बाद मध्यप्रदेश ने भी अपने यहां मंडी शुल्क में भारी कटौती कर दी है। पहले यहां मंडी शुल्क 100 रुपए पर 1.50 पैसा लिया जाता था लेकिन कटौती के बाद अब किसानों को 100 रुपए पर सिर्फ 50 पैसा ही मंडी शुल्क चुकाना होगा। मध्यप्रदेश सरकार का मानना है कि इससे किसानों को काफी राहत पहुंचेगी। बता दें कि इससे पहले यूपी में आदित्नाथ योगी की सरकार ने अपने यहां मंडी शुल्क में घटाया है। यूपी में पहले मंडी शुल्क 2 रुपए लिया जाता था जिसे अब घटकर एक रुपया कर दिया गया है। यह भी आपको बताते चले कि हर राज्य में मंडी शुल्क की अलग-अलग होता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मध्यप्रदेश में मंडी शुल्क मीडिया में प्रकाशित खबरों के हवाले से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मध्य प्रदेश की कृषि उपज मंडियों में व्यापारियों से लिए जाने वाले मंडी शुल्क की राशि अब 1.50 रु. के स्थान पर 50 पैसे प्रति 100 रु. होगी। यह छूट 14 नवंबर 2020 से आगामी 3 माह के लिए रहेगी। मध्य प्रदेश सरकार ने गत दिनों व्यापारियों से इस संबंध में किए गए वादे को पूरा कर दिया है। व्यापारियों द्वारा मुख्यमंत्री श्री चौहान को आश्वत किया गया था कि इससे मंडियों की आय में कमी नहीं होगी। 3 महीने बाद इस छूट के परिणामों का अध्ययन कर आगे के लिए निर्णय लिया जाएगा। मंडी शुल्क : आगे भी जारी रखी जा सकती है ये छूट व्यापारियों के आश्वासन पर मंडी शुल्क में छूट दी गई है। छूट की अवधि में यदि मंडियों को प्राप्त आय से मंडियों के संचालन, उनके रखरखाव एवं कर्मचारियों के वेतन भत्तों की व्यवस्था सुनिश्चित करने में कठिनाई नहीं होती है, तो राज्य शासन द्वारा इस छूट को आगे भी जारी रखा जा सकता है। पिछले साल मंडी शुल्क से हुई थी 1200 करोड़ रुपये की आय वर्ष 2019-20 में प्रदेश की कृषि उपज मंडी समितियों को मंडी फीस एवं अन्य स्रोतों से कुल 12 सौ करोड़ रुपए की आय हुई थी। मंडी बोर्ड में लगभग 4200 तथा मंडी समिति सेवा में लगभग 29 सौ अधिकारी-कर्मचारी कार्यरत हैं तथा लगभग 2970 सेवानिवृत्त अधिकारी-कर्मचारी हैं। इनके वेतन भत्तों पर गत वर्ष 677 करोड़ रुपए का व्यय हुआ था। किसानों से क्यूं लिया जाता है मंडी शुल्क मंडी शुल्क में कटौती किसानों के द्वारा उत्पादित फसल, सब्जी, फल-फूल तथा अन्य प्रकार के उत्पाद को बेचने के लिए सभी राज्यों में मंडी शुल्क लिया जाता है। मंडी शुल्क से होने वाली आय के बदले में वहां विभिन्न व्यवस्थाएं जैसे पानी शौचालय, रुकने की व्यवस्था, गाड़ी पार्किंग की व्यवस्था शासन की तरफ से ही की जाती है। मंडी में किसानों के लिए एक अच्छे बाजार के साथ ही अन्य प्रकार की सुविधा भी दी जाती है। मंडी शुल्क का क्या होता है उपयोग आपके मन में एक बात जरूर आती है कि सरकार द्वारा लिया जाने वाला मंडी शुल्क कहां खर्च किया जाता है। तो बता दें कि मंडी शुल्क से प्राप्त आय का उपयोग राजस्थान राज्य कृषि विपन्न बोर्ड, कृषि उपज मंडी समितियों के संचालन, मंडी प्रांगणों के विकास व संचालन, कृषि विपन्न की आधारभूत संरचना विकसित करने एवं कृषकों, मजदूरों व हम्मालों आदि के लिए विभिन्न योजनाओं के संचालन करने में किया जाता है। इधर 180 टन प्याज लेकर गुवाहाटी पहुंची किसान रेल, फरवरी 2021 तक चलेगी पिछले दिनों इंदौर से 180 टन प्याज लेकर रवाना हुई किसान रेल गुवाहाटी पहुंच गई है। यह किसान ट्रेन फरवरी 2021 तक चलाई जाएगी। बता दें कि यह किसान रेल इंदौर से गुवाहाटी के लिए रवाना हुई थी। पश्चिम रेलवे की इस पहली किसान रेल को लक्ष्मीबाई नगर स्टेशन से इंदौर के सांसद श्री शंकर ललवानी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इस साप्ताहिक किसान रेल को फरवरी 2021 तक हर मंगलवार को चलाया जाएगा। 20 कोच वाली इस रेल के 18 कोच में 180 टन प्याज लादा गया। शेष 2 कोच में रास्ते के अन्य स्टेशनों से किसानों की फसल लादी गई है। इस ट्रेन का इंदौर से गुवाहाटी पहुंचने का रूट बैरागढ़, बीना, झांसी,कानपुर,लखनऊ ,बाराबंकी, हाजीपुर, कटिहार, किशनगंज और न्यू जलपाईगुड़ी जैसे प्रमुख स्टेशनों से होते हुए गुवाहाटी है। इस दौरान इस किसान रेल का इन स्टेशनों पर ठहराव होता है। उल्लेखनीय है कि भारत की पहली ‘किसान रेल’ को केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से हरी झंडी दिखाकर महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित देवलाली से बिहार के दानापुर के लिए 7 अगस्त में रवाना किया था। किसान रेल चलाने का उद्देश्य किसानों की मदद करना है। किसान रेल के माध्यम से किसान अपने कृषि उत्पादों, सब्ज़ी और फल आदि को बड़े शहरों के बाज़ार की मंडियों तक आसानी से भेज सकते हैं। इस किसान रेल से सस्ती दरों पर कृषि उत्पादों, खासतौर से जल्दी खराब होने वाली उपज के परिवहन में मदद मिलेगी, जिससे किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलाने में सहायक होगी। इससे देश के किसान आत्मनिर्भर व समृद्ध होंगे। बता दें कि भारतीय रेलवे द्वारा कोविड-19 महामारी के चलते देश भर में खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 96 मार्गों पर 4,610 रेलगाडिय़ों का संचालन पीपीपी मॉडल के तहत किया जा रहा है। जिसका किराया मालगाड़ी जैसा ही होगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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