चावल की चार नई किस्में विकसित, कम पानी में देंगी बेहतर उत्पादन

Published - 19 Jun 2021

चावल की चार नई किस्में विकसित, कम पानी में देंगी बेहतर उत्पादन

भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान : जानें, इन नई चार किस्मों की खासियत और लाभ

निरंतर गिरते जल स्तर और पानी किल्लत को ध्यान में रखते हुए भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआईआरआर) ने हाल ही में चावल की चार ऐसी नई किस्में विकसित की है जो कम पानी में बेहतर उत्पादन देने में समक्ष हैं। आज जहां कई राज्यों में किसान पानी की किल्लत को देखते हुए चावल की खेती से दूरी बना रहे हैं उनके लिए ये किस्में वरदान से कम साबित नहीं होंगी। कम पानी में चावल की खेती करने के उद्देश्य से ये किस्में अच्छी बताई जा रही हैं। इन किस्मों के संबंध में आईसीएआर-आईआईआरआर के निदेशक कहना है कि चावल की ये चार किस्में निश्चित रूप से देश में चावल के उत्पादन को स्थिर करेंगी। जीवाणु रोग और संक्रमण के कारण बेहतरीन चावल का दाना भी प्रभावित हो जाता है, इसे ध्यान में रखते हुए भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान ने चावल की चार किस्में विकसित की गई हैं। 

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कौनसी है ये हैं चावल की नई किस्में

भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआईआरआर) ने जो चार नई किस्में विकसित की है उनमें डीआरआर धन 53, डीआरआर धन 54, डीआरआर धन 55 और डीआरआर धन 56 हैं।

  • डीआरआर धन 53 की खासियत : चावल के ओरिजे रोग को सबसे गंभीर रोग माना जाता है, जो फसल की उपज को कम कर देता है। इस तरह के संक्रमणों को रोकने के लिए, आईसीएआर के वैज्ञानिक ने डीआरआर धन 53 विकसित किया, जो एक उपन्यास टिकाऊ बैक्टीरियल ब्लाइट प्रतिरोधी उच्च उपज वाले महीन अनाज वाले चावल की किस्म है। इसकी  बीज से बीज की परिपक्तता भी लगभग 130 से 135 दिनों की होती है, जिसमें औसत उपज 5.50 टन / हेक्टेयर प्राप्त होती है। इसमें अच्छे एचआरआर और वांछनीय अनाज गुणवत्ता लक्षणों के साथ मध्यम पतला प्रकार का अनाज होता है। इस किस्म को तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और बिहार के सिंचित और बैक्टीरियल ब्लाइट स्थानिक क्षेत्रों में खेती के लिए जारी किया गया है।  
  • डीआरआर धन 54 और 55 की खासियत : भारत में अधिकांश क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण, डीआरआर धन 54 और डीआरआर धन 55 को एरोबिक सिस्टम के तहत और सूखे बीज चावल के तहत खेती के लिए विकसित किया गया था। यह किस्म मुख्य रूप से हरियाणा के जल-सीमित क्षेत्रों के लिए जारी की गई है। इसके अलावा इस किस्म को ओडिशा, बिहार और झारखंड, गुजरात और तेलंगाना में भी लगाया जा सकता है। डीआरआर धन 54 और डीआरआर धन 55 में प्रमुख कीटों और रोगों के लिए कई कीट और रोग प्रतिरोधक क्षमता है इसमें नेक ब्लास्ट, गॉल मिज, लीफ ब्लास्ट और राइस थ्रिप्स और स्टेम बोरर और प्लांट हॉपर के लिए मध्यम प्रतिरोधी किस्म है।
  • डीआरआर धन 56 की खासियत : चावल की चौथी किस्म डीआरआर धन 56 है, जो हुआंग-हुआ-झान/फाल्गुनन से विकसित एक क्रॉस ब्रीड है जिसे अफ्रीका और एशिया चरण 3 के संसाधन-गरीबों के लिए सहयोगी परियोजना ग्रीन सुपर राइस के तहत बनाया गया है। भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान-हैदराबाद और भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान-फिलीपींस। चावल की यह किस्म फॉल्स स्मट और लीफ ब्लास्ट के लिए प्रतिरोधी है और यह बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के लिए मध्यम प्रतिरोधी है और तना छेदक के लिए भी सहिष्णु है। डीआरआर धन 56 पंजाब और हरियाणा की सिंचित परिस्थितियों में खेती के लिए जारी किया गया है।  


भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान द्वारा इससे पूर्व विकसित की गई अन्य किस्में

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित बासमती चावल की किस्मों मेें पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1509 किस्में काफी अच्छी हैं। इसके अलावा अन्य बासमती की उन्नत किस्में पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1637 आदि देश के लगभग 1.5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती हैं। वर्ष 2018-19 के दौरान इन किस्मों के उत्पादन से भारत ने 32800 रुपए करोड़ की विदेशी मुद्रा अर्जित की थी। 

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भारत में कहां-कहां होता है चावल का उत्पादन

भारत में पश्चिम बंगाल भारत में चावल का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और पंजाब, छत्तीसगढ़ व तमिलनाडु राज्य आते हैं जहां चावल की खेती प्रमुखता से की जाती है। 


भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान के बारें में

भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान की स्थापना मुख्य रूप से तीन उद्देश्यों को लेकर की गई थी। उपरांव भूमि में चावल की उत्पादकता बढ़ाना, स्थानीय प्रजाति को उपरी जमीन के लिए विकसित करना तथा धान आधारित फसल चक्र को बढ़ावा देना इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं। केंद्र में अनुसंधान के साथ-साथ किसानों के खेत में नई प्रजाति का प्रत्यक्षण भी कराया जाता है।  

 

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